Kubodh (Hindi Story) #zahan

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इंटरनेट क्रांति के बाद समान विचार, व्यवसाय और रुचियों वाले लोग काफी करीब आ गये थे। जहाँ किसी और दौर में अनमोल जैसे नये लेखक के लिए स्थापित साहित्यकारों से बात करना सपना होता वहीं अब सोशल मीडिया पर रोज़ बड़े नामों से बातचीत हो जाया करती थी। कुछ बातें लंबी खींच जाती तो कुछ थोड़े शब्दों में निपट जाती। कुछ बड़े नामों को सोशल मीडिया की लत लग गयी थी…पर समस्या यह थी कि वे बड़े नाम थे। अब पूरा दिन ऑनलाइन भी रहना था और आम जनता के लिए खुद को व्यस्त भी दिखाना था। उनकी प्रोफाइल व अक्सर साझा की गयी जानकारी बड़ी अच्छी लगती। ऐसा लगता जैसे हर बात, हर पोस्ट-अपडेट में बड़ा समय दिया गया है। ऐसे ही एक ‘कुछ बड़े’ सज्जन सुबोध दिखाते कि उन्हें अपनी ऑनलाइन छवि का कोई फर्क नहीं पड़ता पर नामचीन लोगों-कलाकारों के साथ उनकी तस्वीरें, उनको टैग करती लंबी पोस्ट्स देखकर लगता कि उनके सबसे बड़े राज़दार तो सुबोध साहब हैं। मानो अपने सोशल मीडिया के लिए उन्होंने अलग से पी.आर. (जनसंपर्क) अधिकारी रखा हुआ हो। सुबोध की ऑनलाइन जगमगाहट से आकर्षित अनमोल अक्सर उनकी तस्वीरों, बातों और पोस्ट्स पर अपने विचार रखता पर उसे कोई जवाब नहीं मिलता। जबकि सुबोध की बातों पर इतना मज़मा नहीं होता था कि वे कभी अनमोल से बात तक ना कर पायें। उनसे कहीं बड़े और व्यस्त लोग अनमोल की बातों से प्रभावित होकर उससे चर्चा करते रहते थे।

“व्यस्त लेखकों के पास कहाँ समय होता होगा कि सबको जवाब दें।”

ऐसा सोचकर अनमोल बात भूल गया। कई वर्षों तक गाहे बगाहे सुबोध की ऑनलाइन गतिविधि देखने के बाद अनमोल ने गौर किया कि सुबोध अपने साथ काम करने वालों और अपने स्तर से ऊपर के कलाकारों पर ही ध्यान देते हैं….या अगर कोई किसी कारणवश देश या विदेश की ख़बरों में आया हो। अनमोल जैसे बहुत से लोग सुबोध को दिखते नहीं थे।

अनमोल अपनी रिटेल नौकरी करते हुए लिखता रहा और उसके एकसाथ 3 उपन्यास प्रकाशित हुए। अनमोल जल्द ही बाजार में ‘बड़ा नाम’ बन गया और उसकी किताबों के अधिकार एक नामी फिल्म निर्माता ने खरीद लिए। खबर आते ही सुबोध का रडार गड़गड़ाया और उन्होंने अनमोल को टैग करते हुए उसकी मेहनत, लगन, फलाना-ढिमका पर ढाई किलोमीटर की पोस्ट कर दी। वह जनता को दिखा रहे थे कि “देखो, मैं एक और बड़े नाम -अनमोल को जानता हूँ।” अनमोल ने सुबोध की पोस्ट की बातें पढ़ी और “भक!” बोलकर…उन्हें ब्लॉक कर मन की शान्ति पायी।

समाप्त!
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Sachcha Salute (Hindi Story) #Zahan

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सर्दी का एक शांत दिन। इस मौसम में तापमान और अपराध काफी कम हो गये थे। वार्सा जंगली देहात में नियुक्त हुए नये थानेदार बिमलेश शर्मा ने फाइलों में गुम दीवान से कहा – “इस बार सरकार सख्त है। आप भी कंप्यूटर सीख लो दीवान जी, नहीं तो 60 से पहले रिटायरमेंट पकड़ा देंगे कप्तान साहब।”

“4-5 साल बचे हैं सर। अब दिमाग खपा के क्या करेंगे? जब तक वो ऑडिट-शॉड़िंत करेंगे तब तक वैसे ही रिटायर होने का समय आ जाएगा।”

विमलेश – “अच्छा, थाने के आस-पास ये बुढ़िया कौन घूमती रहती है? इतना मन से सैल्यूट तो सिपाही नहीं मारते जितने मन से वो सैल्यूट करती है।”

दीवान – “अरे वो पागल है सर कुछ भी बड़बड़ाती रहती है। डेढ़ साल से तो मैं ही देख रहा हूँ और सिपाही तो बताते हैं कि मेरे आने से पहले से है। किसी को उसकी बात भी नहीं समझ आती। शायद बच्चा मर गया करके कुछ कहती रहती है। इसके अलावा कोई शब्द कभी, कोई कभी। पता नहीं चलता कि कौन है, कहाँ की है। बोली से यहाँ की तो लगती नहीं। छोड़ो सर, क्यों टाइम ख़राब करना।”

इस से आगे सवाल करना “सामान्य दुनिया” के लिए बचकाना माना जाता है इसलिए जिज्ञासा होते हुए भी विमलेश चुप हो गया। थाने में जीप से आते जाते हुए बुढ़िया का दिल से किया हुआ सैल्यूट विमलेश का दिल चीर देता था और उन भोली, सच्ची सी आँखों में झाँकने की तो जैसे उसमे हिम्मत ही नहीं थी। नज़रें फेर कर विमलेश ड्राइवर से बात करने या फ़ोन पर व्यस्त होने का नाटक करता। आखिर सिपाहियों और जूनियर अफसरों के सामने उसे खुद को बचकाना थोड़े ही दिखाना था।

शहर से दूर स्थित इस जंगली क्षेत्र में सरकार और निजी कंपनियों के विस्तार से वन संपदा नष्ट हो रही थी। जंगल की जनजातियों का निवासस्थान और भोजन के स्रोत कम होते जा रहे थे। बड़े शहरों के न्यायालयों में अंट-शंट विस्तारीकरण तोलना आसान है। पहले तो वहाँ पहुँचते-पहुँचते जंगलों की आवाज़ गुम हो जाती है…उसपर बड़े लोगो के पास अपने अनुसार परिष्कृत चिकनी-चुपड़ी भाषा में न्याय की देवी को बरगलाने का पुराना अनुभव है। आदिवासी रोष का फूलता गुब्बारा फोड़ने के लिए एक दुर्घटना काफी थी। दुर्भाग्य से वो बहुत जल्द हो गयी। निर्माणाधीन बांध का हिंसा टूटने से बहे गाँव से आदिवासियों में बहुत गुस्सा भर गया। उन्होंने आस-पास के सरकारी और निजी संस्थानों को घेरकर तोड़फोड़, आगजनी और वहाँ नियुक्त कर्मचारियों को मारना शुरू कर दिया। दंगे जैसी स्थिति में वार्सा थाना भी चपेट में आ गया। थाने के कुछ सिपाही और सीमित संसाधन आदिवासी फ़ौज के सामने पर्याप्त नहीं थे। बाढ़ से अस्त-व्यस्त हुए रास्तों और बाहर से कट चुके वार्सा की भौगोलिक स्थिति के कारण मदद आने में समय लगता। ऊपर से हिंसा बड़े क्षेत्र में फैली थी इसलिए कुछ दिनों तक वहाँ नियुक्त पुलिस बल को खुद ही जूझना था…पर क्या उनके पास कुछ घंटे भी थे या नहीं?

भीड़ ने थाने के आस-पास आग लगा दी और धीरे-धीरे अपने और ढाई दर्जन पुलिस बल के बीच दूरी कम करने लगे। स्थानीय लोगों और आदिवासी कर्मचारियों को बक्शा जा रहा था बाकी सभी ‘शहरी दानवों’ को ख़त्म किया जा रहा था। डाकघर, बांध, नरेगा दफ्तर आदि कार्यालयों को पहले ही स्वाहा कर चुके आदिवासीयों का सामना पहली बार बंदूकधारी ‘दुश्मन’ से था। हवाई फायरिंग बेअसर रही। कुछ सिपाही जंगलों में भागे और कुछ लड़ते हुए मारे गये। पीछे से उड़ती ईंट लगने के बाद विमलेश बेहोश हो गया। बंद होती आँखों को ये एहसास था कि शायद अब वो दोबारा नहीं खुल पायेंगी।

आँखें दोबारा खुलीं…सूरज की किरणों को रोकता बुढ़िया का मुस्काता चेहरा विमलेश को देख रहा था। जब उसकी आँखें रौशनी के हिसाब से देखने लायक हुई तो बुढ़िया वापस सैल्यूट की मुद्रा में आ गयी। विमलेश को बीते चार दिनों की कुछ बातें याद आ रही थी। इन 4-5 दिनों में बुढ़िया ने झाड़ियों में टिन-प्लास्टिक के सहारे बने अपने छोटे से बसेरे में विमलेश को आदिवासियों की नज़रों से बचा कर रखा था। उस दिन धुएँ, ऊहापोह के बीच बुढ़िया भगदड़ में जगह-जगह से चोटिल, बेहोश थानेदार को खून के प्यासे आदिवासियों के बीच से घसीट लायी थी। बुखार में तपते, कभी होश में आते तो कभी बेसुध होते विमलेश को बुढ़िया अपने गुज़ारे वाला चीनी का पानी और अपने मुँह से चबाये चने खिला रही थी।

स्थिति अब काबू में थी और अर्धसैनिक बल, आपातकालीन दल क्षेत्र में फ़ैल चुके थे। बूढी अम्मा के सहारे घिसटता हुआ वह किसी तरह अपने स्टेशन तक पहुँचा। विमलेश पागल बुढ़िया को माँ की तरह अपनाकर उसकी देखभाल करने का फैसला कर चुका था। एम्बुलेंस का इंतेज़ार करते स्ट्रेचर पर पड़े विमलेश की नज़रें बूढी अम्मा को ढूँढ रही थीं, जो लोगो की भीड़ में जाने कहाँ गायब हो गयी थी? मन में कुछ आशंका जन्मीं – “कहीं किसी ने उसे दुत्कार कर भगा तो नहीं दिया? भीड़ देखकर वो दूर तो नहीं चली गयी? नहीं-नहीं!” इतने में भीड़ को किनारे करती बुढ़िया विमलेश को पिलाने अपनी चीनी के पानी वाली पन्नी लेकर आयी। झर-झर बहती आँखों से विमलेश स्ट्रेचर पर लड़खड़ा कर खड़ा हुआ…और  बुढ़िया को सैल्यूट करने लगा।

समाप्त!
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Artwork – Nicola S.

Adrenalin Rush waali Jhurjhuri (Hindi Story) #zahan

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दिलीप ने चलती गाड़ी से शराब की बोतल सड़क पर पटकी। नशे में कार चला रहे उसके दोस्त हफ़ीज़ ने उसे टोका।
“ऐसे बोतल नहीं फेंकनी चाहिए! जानवरों और लोगों के पैरों में कांच चुभ सकता है। दुपहिया वालों का एक्सीडेंट हो सकता है।”
दिलीप ने उसे झिड़का – “साले! पापा को मत सीखा और कार भी नशे में नहीं चलानी चाहिए….लोग मर सकते हैं। फ़िर भी चला रहा है ना तू?”

हफ़ीज़ का मूड़ ठीक करने के लिए दिलीप दार्शनिक स्टाइल में आ गया।
“शराब, चरस में टुन्न रहना ही नशा नहीं है। भाई जीवन जी, मौज कर….एड्रनलिन रश को समझ! यूँ बिना देखे कार घुमा देना, बिना सोचे बोतल से लेकर किसी बेवक़ूफ़ की हड्डी तोड़ देना इस सब से जो झुरझुरी मचती है शरीर में उसे महसूस कर। भाड़ में गयी दुनिया!”

हफ़ीज़ की आशंका सच हो गयी और बोतल का बड़ा टुकड़ा अँधेरे में सड़क पार करती एक महिला माया की चप्पल चीरता हुआ उसके पैर में घुस गया। चोट के कारण अगले दिन माया जिस घर की सफाई और बर्तन करने जाती थी वहाँ जाने में लेट हो गयी। इधर सुबह-सुबह दिलीप को अचानक खांसी का दौरा उठा और शराब-गांजे के नशे में उसके मुँह और सांस की नली में उल्टी भर गयी। घर के बाकी सदस्य नींद में होने और माया के देर से आने के कारण जीवन के लिए दिलीप के संघर्ष को कोई सुन नहीं पाया। दिलीप उसी दुनिया में सांस लेने को तड़प रहा था जिसे अक्सर भाड़ में भेजकर उसे एड्रनलिन रश वाली झुरझुरी मिलती थी। कुछ ही समय में उसकी मौत हो गयी।

अपने बिगड़ैल बेटे को खोकर बिलख रहे परिवार के बीच माया सिसक रही थी। काम के बहाने खाली कमरे की आड़ में आकर उसकी सिसकारी हल्की हँसी में बदल गयी। आखिर एड्रनलिन रश की झुरझुरी पर केवल अमीरों का हक़ थोड़े ही है।

समाप्त!
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एक सीमान्त (लघुकथा) #laghukatha

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नम्रता को उसके गायक पति शिबू भोला ने डेढ़ घंटे बाद फ़ोन करने की बात कही थी। बेचैनी में उसने जैसे डेढ़ घंटे के 5400 सेकण्ड्स पूरे होते ही शिबू को फ़ोन मिलाया।

“हैलो!”

“हाँ हैलो…अभी गाड़ी में हूँ…”

…पर नम्रता को उस सब से कहाँ मतलब था। शिबू की आवाज़ से वो भांप भी चुकी थी कि कॉल जारी रखने से कोई परेशानी नहीं होगी।

“क्या रहा?”

“हाँ, मेरे साथ 2 रिकॉर्डिंग करेंगे ये लोग।”

नम्रता चहक उठी। काफी समय से खाली और परेशान चल रहे शिबू को एक बार फिर काम मिल गया था।

कुछ देर बाद शिबू की तेज़ आवाज़ सुनकर नम्रता बाहर आयी। शिबू अपनी बेल्ट से गेट के गार्ड को बुरी तरह पीट रहा था। गार्ड अपने रेडियो पर शिबू का ही मशहूर गाना सुन रहा था। नम्रता और ड्राइवर ने उसे रोका और अचानक इस गुस्से का कारण पूछा। शिबू भोला किसी बच्चे की तरह ज़मीन पर बैठकर रोने लगा।

शिबू – “7 एल्बम आ गयी हैं! लेकिन बारह साल से सब $@#&*# बस एक हिट “चाइना की चुन्नी” गाना सुने जा रहे हैं और हर जगह मुझसे गवाए जा रहे हैं। ढाई सौ गाने रिकॉर्ड रखे हैं, उन्हें कोई म्यूजिक प्रोडूसर नहीं खरीदता। आज भी चाइना की चुन्नी के 2 रीमिक्स की रिकॉर्डिंग की डील मिली है। 7 रीमिक्स पहले ही हो चुके हैं। मन किया सूअरों को वहीं मार दूँ। फ़िर याद आया तू जो झूठा हँसते हुए इन्वेस्टमेंट, कूपन-डिस्काउंट फलाना की बातें करती है ना…वो साल-दो साल पहले तक तुझे पता भी नहीं था क्या होते हैं। तेरी झूठी हँसी में ढका दर्द हर रात मेरे सीने पर आ जाता है, फिर मैं करवट तक नहीं ले पाता। आज से 50 साल बाद कोई कहेगा की एक-दो गानों पर पूरी ज़िन्दगी रोटी खा गया…गाने तो मैं हज़ार बनाता पर दुनिया ने उस एक-दो के आगे कुछ सुनना ही नहीं चाहा…“

समाप्त!
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Art – Felix Benjamin

#ज़हन

Jasoos Saas (Hasya Kahani)

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लक्ष्मी कुमारी स्वेटर बुनने से तेज़ गति से अपनी बहु पर विचार बुन रही थीं।  वैसे उनकी बहु शताक्षी ठीक थी….बल्कि जैसी कुलक्षणी, कलमुँही बहुएं टीवी और अख़बारों में दिखती हैं उनके सामने तो शताक्षी ठीक होने की पराकाष्ठा ही समझो। फिर भी लक्ष्मी को एक बात परेशान करती थी। केवल उन्हें ही नहीं, कॉलोनी की कुछ और सास भी इस मुद्दे पर चिंतित थीं। कई घरों की 25 से लेकर 40 साल की महिलाएं आपस में अक्सर झुंड में घंटों पता नहीं क्या बतियाती रहती थीं। बाहर से लगता कि मानो चुगलियों की कितने पहाड़ चढ़ रही हैं। बड़ा और सभी कोण से ढका घर होने के कारण अक्सर दर्जन भर स्त्रियां शताक्षी के घर पर डेरा जमाती।

मोहल्ले की सासों से जब रहा नहीं गया और उनकी मिसमिसी का रौला-रप्पा हो गया तो सबने पैसे मिलाकर अच्छी क्वालिटी के माइक्रोफोन और कैमरे लक्ष्मी कुमारी के आँगन में लगवाये, जहाँ बहुओं की चुगलियों का गोरख धंधा चलता था। दो दिन बाद वीकेंड को बहुओं की मैराथन बैठक हुई। अगले दिन सत्संग का बहाना बनाकर वृद्ध जेम्स बांडनियाँ गुप्त अड्डे पर मिलीं। कॉलोनी की सासें अपनी साँसें थाम कर बहुओं की मीटिंग की फुटेज देखना शुरू करती हैं।

“दीदी, कल छुटकी की वजह से छोटा भीम हार गया। मैं तो दूध उबलने रखने जा रही थी कि मीनू ने बताया कि कालिया को जीत कर टाइटल मिल गया। इतनी झुंझलाहट हुई कि मैं कच्चा दूध ही पी गयी और मीनू की अभ्यास पुस्तिका फाड़ी सो अलग…”

“हाँ! इस वजह से कल पूरा दिन मेरा भी मूड ऑफ रहा। ऑफिस से लौटे पीकू के पापा पुच्ची करने को बढे तो ऐसी कोहनी मारी मैंने…नील पड़ गया उनके होंठों पर। हुँह! भला कालिया को जिताना कोई बात हुई?”

छोटा भीम पर गंभीर चर्चा के बीच शिवा कार्टून सीरीज की फैन शताक्षी बोली।

“…पेड़ाराम ने अपनी पड़ोसन के चक्कर में शिवा का फूफा जो किडनैप करवाया उस से मेरा दिल बैठ गया सच्ची। अरे! आपने सुना…शक्तिमान को दोबारा शुरू कर रहे हैं।”

उसके बाद मोटू पतलू, माइटी राजू, गली गली सिम सिम, डोरेमॉन, शिनचैन पर शिद्दत से चर्चा हुई। इतना ही नहीं बीच-बीच में महिलाओं ने कार्टून सीरियल्स के मंगल गीत…टाइटल सांग भी गुनगुनाये। गृहणियों को जब फुर्सत मिलती थी तब टीवी के सामने बच्चे होते, जो कोई और चैनल चलने ही नहीं देते थे। कोई विकल्प ना होने के कारण थोड़े समय बाद कार्टून्स, एनिमेशन में बच्चों की तरह महिलाओं को भी मौज आने लगी और देखते ही देखते यह कार्टून क्रान्ति महिला मोर्चा बन गया।

बहुओं की बुराई और गप्पों के लिए ब्रेड रोल, पकोड़े तल कर लायी एक सास निराशा में बोली।

“भक…”

ये केवल एक ‘भक’ नहीं बल्कि ‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया’ वाली हार की स्वीकृति थी। गुप्त फुटेज देख रही सास मंडली के सारे अंदेशों का मुरब्बा बन चुका था। धूलधूसरित पहलवान की तरह सब अपने कार्टूनी सत्संग से घर लौट आयीं।

समाप्त! भक!
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Art – Sebastien K.
#ज़हन

Hindi Laghukatha – Yaadon ki Tasveer

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आज रश्मि के घर उसके कॉलेज की सहेलियों का जमावड़ा था। हर 15-20 दिनों में किसी एक सहेली के घर समय बिताना इस समूह का नियम था। आज रश्मि की माँ, सुमित्रा से 15 साल बड़ी मौसी भी घर में थीं।

रश्मि – “देख कृतिका…तू ब्लैक-ब्लैक बताती रहती है मेरे बाल…धूप में पता चलता है। ये ब्राउन सा शेड नहीं आ रहा बालों में? इनका रंग नेचुरल ब्राउन है।”

कृतिका – ” नहीं जी! इतना तो धूप में सभी के बालों का रंग लगता है।”

सुमित्रा बोली – “शायद दीदी से आया हो। इनके तो बिना धूप में देखे अंग्रेज़ों जैसे भूरे बाल थे। रंग भी एकदम दूध सा! आजकल वो कौनसी हीरोइन आती है…लंदन वाली? वैसी! “

जगह-जगह गंजेपन को छुपाते मौसी के सफ़ेद बाल और चेचक के निशानों से भरा धुंधला चेहरा माँ की बतायी तस्वीर से बहुत दूर थे। रश्मि का अपनी माँ और मौसी से इतना प्यार था कि वो रुकी नहीं… “क्या मम्मी आपकी दीदी हैं तो कुछ भी?” रश्मि की हँसी में उसकी सहेलियों की दबी हँसी मिल गयी।

झेंप मिटाने को अपनी उम्रदराज़ बहन की आँखों में देख मुस्कुराती सुमित्रा जानती थी कि उसकी कही तस्वीर एकदम सही थी पर सिर्फ उसकी यादों में थी।

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#ज़हन Artwork – Chuby M Art

बोगस परग्रही (कहानी) #ज़हन

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बोगस परग्रही सीरीज़ में आपका स्वागत है। यहाँ हर एपिसोड में हम कवर करेंगे भौजीकसम ग्रह के दो खोजी-टोही वैज्ञानिक कुच्चु सिंह और पुच्चु सिंह के रोमांचक कारनामे।

ब्रह्माण्ड में तैरते अनगिनत पत्थरों में से उन दोनों को पृथ्वी की खोजबीन और जांच की जिम्मेदारी मिली थी। उनके उन्नत यान में सदियों तक ईंधन और आहार की कमी नहीं होने वाली थी। पृथ्वी के इतना पास होते हुए भी मानवो के अंतरिक्ष स्टेशन, अन्य यंत्र उन्हें नहीं देख पाते थे। कुच्चु-पुच्चु बुद्धिमान तो थे पर अव्वल दर्जे के आलसी भी थे। उनका साढ़े तीन फ़ीट का कद भौजीकसम ग्रह पर औसत से 4-5 इंच ऊपर था, जिसका उन्हें घमंड था पर पृथ्वी की जानकारी, तस्वीरें और वीडियो देख कर उनका मुँह पार्थिव पटेल से भी छोटा बन गया। भौजीकसम का एक वर्ष पृथ्वी के 26 वर्षो के बराबर था और उन्हें 15 भौजीकसम वर्षों में अपने कई मिशन निपटाने थे। उनके पास 390 वर्ष हैं, इस जानकारी के बाद दोनों और ज़्यादा आराम में आ गए। पहले कुछ वर्ष सुस्ताने के बाद अपने मिशन की शुरुआत के लिए उन्होंने धरती का सबसे विविध देश भारत चुना। कुछ असफल मिशन और कई सालों बाद एक मिशन की तैयारी करते हुए दोनों बात कर रहे थे।

कुच्चु – “पुच्चु यार पहले की तरह नहीं करना है, देश के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों को उठाना था तो तुम न्यूज़ साइट्स के भरोसे निर्मल बाबा, राखी सावंत, मीका सिंह, के.आर.के. को उठा लाये थे। फिर सबकी मेमोरी एडजस्ट करनी पड़ी थी, उनके दिमागों में इतना कचरा भरा था हमारे सिस्टम क्रैश होते-होते बचे।”

पुच्चु – “नहीं इस बार आलस नहीं होगा। कॉम्प्रिहेन्सिव विक्ट्री होगी इस बार! जय सोहनी महिवाल।”

कुच्चु – “सोहनी महिवाल? दुनिया का इतिहास कम देख, रोज़ अलग लव स्टोरी पढ़के डिप्रेस हो जाता है। रात में तकिये में मुंह घुसाये मीरा को छोड़ दो राणा जी, उसे कृष्णा में रम जाने दो, ज़हर मत पिलाओ…चिल्लाते हुए सुबक रहा था।”

तभी उनका यान चक्करघिन्नी बन जाता है। दोनों कंट्रोल्स सँभालने की कोशिश करते हैं पर तेज़ी से घूमते दिशाहीन यान में कुच्चु किचन में जा गिरता है और उसका मुँह ओवन में फँस जाता है, वहीं पुच्चु खोपड़े पर लगे आघात के बाद अचेत हो जाता है। सब सामान्य होने के बाद उन्हें अपने यान में एक घायल परग्रही मिलता है।

पुच्चु – “ऐ छी-छी सी शक्ल वाले भईया ! कौन हो तुम?”

परग्रही – “हाँ तेरी शक्ल बड़ी मिस यूनिवर्स वाली है! लोलू सिंह! सुनो मेरे पास ज़्यादा समय नहीं है। बड़ी ऊर्जा लगानी पड़ी तुम्हारे यान के अंदर आने में… “

कुच्चु – “तो कहीं भी घुस आओगे? हम नहीं दे रहे अपना समय उधार। जाओ आगे बढ़ो!”

परग्रही – “ऐसा ज़ोर का घुसंड मारूंगा कि षठकोण जैसे मुँह के आठों कोण पिचक जाएंगे।”

कुच्चु – ” षठकोण….उसमे तो 6 कोण होते हैं ना?”

परग्रही – “टेक्निकेलिटीज़ में ही मर जाना दोनों सरऊ! हमारे ग्रह पर 8 होते हैं। सुनो इस बार टोक मत देना, मर जाओगे। टोही यंत्रों से मुझे तुम दोनों के बारे में सब पता चल गया है। तुम्हारी बकवास भाषा भी यूँ चुटकी में सीख ली। मेरा नाम सोनपपड़ा है, मैं तुमसे कई प्रकाश वर्ष दूर डॉयबिटीज़ ग्रह से उसी काम के लिए आया था जो तुम दोनों कर रहे हो यानी पृथ्वी की रिसर्च फलाना। हम जैसे और भी कुछ परग्रही गुप्त अनुसंधान यान पृथ्वी के आस-पास अदृश्य घूम रहे हैं। मेरे शरीर पर बदला बम बंधा है, अगर फट गया तो यान और तुम दोनों का नामोनिशान नहीं मिलेगा। तुम्हे पृथ्वी पर जाकर मेरा एक बदला लेना होगा…”

पुच्चु – “भक! तुम किसी लाला के ज़ुल्म से पीड़ित हमारी बिछड़ी मम्मी हो जो तुम्हारे बिहाफ पर बदला लें?”

सोनपपड़ा ने एक हल्का ऊर्जा वार किया और पुच्चु के होंठ गलत प्लास्टिक सर्जरी के बाद सूजे होंठ जैसे हो गये।

सोनपपड़ा – “आया मज़ा? या और मस्त माहौल में जीना है?”

कुच्चु – “नहीं…नहीं अंकल जी! हम समझ गये। किस तरह का बदला लेना है आपको? आप घायल कैसे हो गये? लाइए आपके चरणों की चुम्मी ले लूँ…”

सोनपपड़ा खुश होते हुए बोला – “नहीं, इट्स ओके! मेरी परी जैसी गर्लफ्रेंड परिया को कुकिंग का बहुत शौक है। मेरे बर्थडे पर मुझे सरप्राइज़ देने के लिए उसने धरती से कुछ सामान बटोर कर आलू पकोड़े बनाये। मैं तो बाहर का सारा सामान यान के अनुसार चेक करके लाता था पर सरप्राइज के चक्कर में वो आलू उठा लायी। हमारे यान के मेटीरियल में पता नहीं क्या रिएक्शन हुआ और एक तेज़ धमाके में यान तहस-नहस हो गया। विशेष सूट के कारण धमाके की वेव में हम लोग तुरंत नहीं मरे पर घायल अंतरिक्ष में जा गिरे। बेचारी परिया तो पूरी चुड़ैलिया बन गयी, आलू को गाली देती हुई जाने कहाँ भाग गयी। इधर मेरे शरीर के मिनरल जा चुके हैं, मैं अब कुछ देर का मेहमान हूँ। उस से पहले मैंने अपने मन में बदला बम एक्टिवेट कर लिया है।”

पुच्चु – “किस से बदला? पृथ्वी से?”

सोनपपड़ा – “नहीं! आलू से बदला। ये तरल तुम किसी भी आलू की फसल पर डाल आओ। उस आलू के आंतरिक गुण के अनुसार इस तरल का एक चैन रिएक्शन शुरू होगा, जिसकी किरणों से धरती के सारे आलू लुप्त हो जायेंगे, चाहे उनके खेत एक-दूसरे से हज़ारो किलोमीटर्स दूर ही क्यों ना हों।”

कुच्चु – “…पर आलू जैसी महत्वपूर्ण फसल लुप्त होने से तो धरती का पारितंत्र (इकोसिस्टम) बिगड़ जायेगा? इस से तो पृथ्वी की कई प्रजातियों पर बुरा असर पड़ेगा, कुछ तो शायद लुप्त जाएं। पृथ्वी पर त्राहि-त्राहि मच जायेगी।”

सोनपपड़ा – “ये ब्रैकेट में इकोसिस्टम बताने की ज़रुरत नहीं थी, मुझे भी पता है पारितंत्र का मतलब और प्रजातियां लुप्त हों या चपातियां मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। बदला इज़ बदला! अगर नहीं माने तो बम फोड़ दूँगा। दोनों में से कोई एक जाओ यह तरल लेकर, अगर तुम्हारे आने से पहले मैं मर गया तो भी बम फूट जाएगा और ऑबवियस्ली तुम्हारा साथी, यान स्पेस डस्ट बन जायेंगे। जब तक तुम मुझे नष्ट हुए आलू के सैंपल नहीं लाकर दिखाते तब तक मुझे चैन नहीं मिलेगा। मेरे मन की तसल्ली ही इस बम को डिफ्यूज कर सकती है।”

पुच्चु और कुच्चु धर्मसंकट में फँस गये। यह एक काम करने से उनके कई आगामी मिशन बर्बाद हो सकते थे। दोनों मन ही मन अपने आलस्य को कोस रहे थे कि अगर मेहनत से काम किया होता तो अबतक कितने मिशन, अनुसंधान आदि पूरे हो चुके होते। टिक टिक गुज़रते समय के बीच, दिल पर पत्थर रखकर और पुच्चु को पुच्ची देकर कुच्चु पृथ्वी की ओर कूच कर गया। जल्द ही वह आधे गुलगुले, आधे राख हो चुके आलू के सैंपल लाया, जिन्हे वह एक भारतीय खेत में तरल डालने के बाद लाया था। नष्ट हुए आलू को देखकर सोनपपड़ा के दिल को करार आया और वह परिया को याद करते हुए हमेशा की निन्नी सो गया।

पुच्चु – “माफ़ करना भाई! मेरी जान बचाने के लिए तुम्हे आलू ख़त्म करने पड़े। श्री अक्षय कुमार जी की कोट ख़राब कर दी कि जब तक रहेगा समोसे में आलू… “

कुच्चु – “अबे रिलैक्स! कुछ नहीं हुआ। इसकी आड़ में हमारा एक मिशन और पूरा हो गया। इस सोहनहलवे का दिया तरल मैं एक भारतीय प्रयोगशाला के खेत में डाल कर आया हूँ। वहाँ जेनेटिकली मॉडिफाइड आलू (आनुवांशिक रूप से रूपांतरित फसल) उग रहे थे। उस खेत में एक लुप्तप्राय बैक्टीरिया और आलू के अंश से बड़े आलू उगाने पर टेस्ट चल रहा था। अब उस तरल से निकली किरणों से सिर्फ उस खेत और 2-3 जगह उस जैसे आंतरिक गुण लिए मॉडिफाइड आलू ही लुप्त हुए बाकी सारी पृथ्वी के आलू बच गए क्योकि सिर्फ उस खेत के आलूओं के गुणों के अनुसार बनी तरल की घातक किरणे बाकी आलू की फसल को पकड़ ही नहीं पाई।”

पुच्चु – “वाह भाई! आज तूने मेरी जान, हमारे भौजीकसम ग्रह की लाज और पृथ्वी बचा ली। आज से दोनों टाइम का खाना मैं बनाऊँगा…
…एक हफ्ते तक।”

समाप्त!
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Poster #1 – Kathputli (Short Film)

मरणोपरांत आशीर्वाद (कहानी) #ज़हन

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पत्नी के देहांत के बाद रविन्दु सामंत गहरे अवसाद में चले गए थे। उनकी दिनचर्या अपने कमरे तक सीमित हो गयी थी। वहीं उनके तीन बच्चो की अब और इंतज़ार करने की इच्छा नहीं थी। एक शांत दिन उनके 3 बच्चो ने उन्हें बेहोशी की दवा सुंघा कर बेहोश किया और फिर पंखे से टांग कर उन्हें मार दिया गया, कुछ इस तरह कि पत्नी की मौत के शोक में उनकी मौत एक आत्महत्या लगे। उनकी लिखाई से मिलता-जुलता नोट रखने जा रहा उनका छोटा बेटा राजदीप कुछ देखकर ठिठक गया। पुलिस के सामने दी जाने वाली अपनी कहानी का रिहर्सल कर रहे उसके बड़े भाई-बहन ने कारण पूछा तो जवाब आया – “यहाँ तो पहले से एक नोट पड़ा है!”

“नोट है या ऐसे ही कोई रसीद-वसीद?”

राजदीप – “नोट ही है, लिखा है वो हम पर बोझ नहीं बनना चाहते थे और संपत्ति हम तीनो में बाँटकर आज रात पापा हमेशा के लिए ऋषिकेश के एक आश्रम जाने वाले थे।”

3-4 क्षण अवाक रहने के बाद तीनो बिना नज़रे मिलाये फिर अपने काम में लग गए। कुछ समय बाद पुलिस औपचारिकता निभा कर चली गई। एक हफ्ता बीतने के बाद रविन्दु सामंत के इंश्योरेंस एजेंट की शिकायत पर पुलिस का जांच दल दोबारा उनके घर आया। बीमा एजेंट के अनुसार रविन्दु सामंत के सुसाइड नोट की लिखावट उनकी राइटिंग से पूरी तरह नहीं मिलती थी। पुलिस टीम द्वारा जांच के लिए कुछ सामग्री जप्त की गयी और थोड़े दिन के बाद नतीजे की पुष्टि की बात हुई। तीनों भाई-बहन के चेहरे सफ़ेद पड़ गए और उन्हें जेल दिखने लगा। उन्हें यकीन था कि पुलिस के विशेषज्ञ लिखावट में अंतर पकड़ लेंगे। 5 दिनों बाद उन्हें सभी पत्र और जांच के लिए जप्त की गयी सामग्री वापस कर दी गयी। राजदीप अचंभित था कि आखिर कैसे दोनों लिखावट मिल गयीं और वो लोग बच गए? वह सारे पत्र देखने लगा और एक कागज़ देखकर उसे सांप सूँघ गया।  भाई ने कहा “चलो जान बची, पर तू सिर पकडे क्यों कांप रहा है? ठण्ड रख! अब कोई नहीं आ रहा हमें पकड़ने।”

राजदीप – “सुसाइड नोट की राइटिंग तो मैच हो गयी पापा की लिखावट से पर यह सुसाइड नोट वो नहीं जो मैंने लिखा था… “

समाप्त!

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Read रंग का मोल (कहानी)

काश में दबी आह! (कहानी) #ज़हन

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स्कूल जाने को तैयार होती शिक्षिका सुरभि पड़ोस के टीवी पर चलता एक गाना सुनकर ठिठक गई। पहले इक्का-दुक्का बार उसे जो भ्रम हुआ था आज तेज़ गाने की आवाज़ ने वो दूर कर दिया। जाने कब वो सब भूलकर सुनते-सुनते उस गाने के बोल पड़ोस के घर के गेट से सटकर गुनगुनाने लगी। अपनी धुन में मगन सुरभि का ध्यान पडोसी की 4 साल की बेटी पीहू के अवाक चेहरे पर गया और वह मुस्कुराते हुए सामान्य होकर वहाँ से स्कूल की तरफ बढ़ चली। आज स्कूल में सुरभि का मन नहीं लग रहा था, वो तो यादों के सागर में गोते लगा रही थी। किस तरह वह अपने गायक, गिटारिस्ट बॉयफ्रेंड घनश्याम के गानों, रियाज़ को घंटो सुना करती थी। उसके दर्जनों गानों के बोल सुरभि को आज भी याद थे।

ज़िन्दगी को सुलझाते हुए जाने कब दोनों का रिश्ता उलझ गया और अपने सपनो का पीछा करता घनश्याम सुरभि से अलग हो गया। सुरभि में अपने परिवार से बग़ावत करने की हिम्मत नहीं थी। दूर जाने का दर्द तो दोनों को बहुत था पर अक्सर चल रहे पल इंसान के सामने कुछ ऐसे दांव रखते हैं कि बीते लम्हों की याद आने में काफी समय लग जाता है। कभी दो जिस्म, एक जान यह जोड़ा अब एकल जीवन में व्यस्त एक-दूसरे के संपर्क में भी नहीं था।  दोनों का लगा शायद वक़्त एक मौका और देगा पर कुछ सालों बाद सुरभि की शादी हो गई। आज वो खुश थी कि देर से सही पर कम से कम उसके पूर्व प्रेमी को अपनी मंज़िल तो मिली। शाम को लौटकर सबसे पहले उसने इंटरनेट पर इन गानों और घनश्याम का नाम ढूँढा। सुरभि हैरान थी कि इन गानों के साथ घनश्याम का नाम कहीं नहीं था। उसे लगा शायद घनश्याम ने मायानगरी जाकर अपना नाम बदल लिया हो पर गायको, म्यूजिक टीम की तस्वीरों, वीडिओज़ में घनश्याम कहीं नहीं था। सुरभि के आँसुओं की धारा में एक से अधिक दुख बह रहे थे। प्यार को जलाकर रिश्ते की आँच पर जो सपने पकायें थे उनके व्यर्थ जाने का दुख, घनश्याम की तरह हिम्मत ना दिखाने का दुख, उसका प्रेमी ज़िंदा भी है या नहीं यह तक ना जान पाने की टीस…

उधर लालगंज से दूर फ़िरोज़ाबाद में चूड़ी की दूकान पर खरीददार महिला को कंगन पहनाते घनश्याम के कानो पर रेडियो में किसी और द्वारा गाये अपने गानों का कोई असर नहीं पड़ रहा था। उसकी आँखों की तरह उसकी बातें भी पत्थर बन चुकी थीं।

समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन

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