Interview with #comics Superfan Supratim Saha

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नागपुर में रह रहे सुप्रतिम साहा का नाम भारतीय कॉमिक्स प्रेमियों के लिए नया नहीं है। सुप्रतिम भारत के बड़े कॉमिक्स कलेक्टर्स में से एक हैं, जो अपने शौक के लिए जगह-जगह घूम चुके हैं। कहना अतिश्योक्ति नहीं, ऐसे सूपरफैंस की वजह से ही भारतीय कॉमिक्स उद्योग अभी तक चल रहा है। पहले कुछ कॉमिक कम्युनिटीज़ में इनका अभूतपूर्व योगदान रहा और समय के साथ ये अपने काम में व्यस्त हो गए। हालांकि, अब भी कुछ कॉमिक्स ग्रुप पर सुप्रतिम दिख जाते हैं। ये मृदुभाषी और सादा जीवन व्यतीत करने में विश्वास करते हैं, इनके बात करने और वाक्य गढ़ने का तरीका मुझे बहुत भाता है इसलिए साक्षात्कार के जवाब में मेल से भेजे इनके जवाबों को जस का तस रखा है।

अपने बारे में कुछ बताएं?

सुप्रतिम – 80 के दशक में भारत के पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में मेरा जनम हुआ। मैने अपनी स्कूलिंग अगरतला शहर से की। मैने इंजिनियरिंग की नागपुर शहर से और बॅंगलुर शहर मे कुछ टाइम जॉब करने के बाद मैने मास्टर्स की चेन्नई शहर मे, आज मैं नागपुर के एक कॉलेज मे वाइस प्रिन्सिपल के पद पे काम कर रहा हू. आज भी मैं रेगुलार कॉमिकस खरीदता हू और पढ़ता हु्। मुझे मालूम हैं मेरा यह जुड़ाव कॉमिक्स के साथ हमेशा  रहेगा. इस सफ़र मे मैं अपने कुछ दोस्तो का नाम लेना चाहूँगा जिन्होने हमेशा मेरा साथ निभाया, बंटी फ्रॉम कोलकाता, संजय आकाश  दिल्ली से, गुरप्रीत पटियाला से, और बहत सारे दोस्त, वरुण ,मोहित, महफूज़ ,ज़हीर,विनय,अजय ढिल्लों  जिन्हे मैं ऑनलाइन मिला और इन सब से भी मेरी काफ़ी अच्छी दोस्ती हैं। सबके नाम शायद मैं यहा लिख नही पाया पर  मैं सबका आभारी हूँ जिन्होने इस सफ़र पे मेरा साथ निभाया।

कॉमिक्स कलेक्शन का आपका सफर कैसे शुरू हुआ?

सुप्रतिम – मेरे कॉमिक्स पढ़ने की अगर बात करे तो ये शुरुवात हुई थी 1991-92 के आसपास। उन दिनों मैं क्वार्टर में रहता था और हर एक  घर से बटोर के जो कॉमिक्स मुझे मिलते थे उनमे से ज़्यादा तर या तो टिनटिन होते थे या फिर इंद्रजाल कॉमिक्स।  हिंदी कॉमिक इंडस्ट्री से मैं जुड़ा 1994 में जब मेरे एक राजस्थानी मित्र ने मुझे दो कॉमिक्स दी, वो दो कॉमिक्स थे डॉ नो और उड़ती मौत। राज कॉमिक्स और साथ ही अन्य हिंदी  कॉमिक्स के साथ मैं इन्ही दो कॉमिक्स की वजह से जुड़ा।

अब तक कॉमिक्स के लिए कहाँ-कहाँ घूम चुके हैं?

सुप्रतिम – कॉमिक्स के लिए ट्रेवल करना मैंने शुरू किया सन 2009 से, यह वो समय था जब मैं बैंगलोर में था.बैंगलोर के अनिल बुक शॉप से बहत सारी कॉमिक्स मैंने रिकलेक्ट की.इसको छोड़के मैंने सबसे ज़्यादा कॉमिक्स कलेक्ट की नागपुर से। इस शहर ने मुझे ऑलमोस्ट 1500 + कॉमिक्स दी जिनमे मैक्सिमम दुर्लभ कॉमिक्स थे। इन 8 सालो में मैंने दिल्ली, नागपुर, कोलकाता, हैदराबाद, बैंगलोर, चेन्नई, पटियाला, अम्बाला, अगरतला जैसे शहरो से भी कॉमिक्स ली। दिल्ली शहर में दरीबा कलां के गोडाउन  से भी मैंने 1000+ कॉमिक्स ली।  इन दो शहर को छोड़के हैदराबाद शहर में भी मुझे 300+ विंटेज डायमंड कॉमिक्स मिलें। ऐसी कॉमिक्स जो की 35 साल से भी अधिक पुराने हैं,जैसे की लंबू मोटू ,फौलादी सिंह ,महाबली शाका ,मामा भांजा और वॉर सीरीज वाली कॉमिक्स। इन सब को छोड़के मेरे पास बंगाली कॉमिक्स भी है भारी संख्या में, करीबन 500 ,जिनमे पिछले 60-80 साल पुराने कॉमिक्स भी हैं। मैं आज भीं रेगुलर कॉमिक्स लेता हु हिंदी बंगाली इंग्लिश में।

पहले के माहौल और अब में क्या अंतर दिखते हैं आपको?

सुप्रतिम – पहले के माहौल में कॉमिक्स एक कल्चर हुआ करता  था, आजकल कॉमिक्स तो दूर की बात हैं किताबों को पढ़ने के लिए भी पेरेंट्स बच्चो को प्रोत्साहित नहीं करते।  विडियो गेम्स केबल टीवी आदि तो मेरे बचपन में भी आराम से उपलब्ध थे ,पर इन सबके बावजूद अगर हर दिन खेलने नहीं गए, तैराकी नहीं की तो घर पे डांट पड़ती थी। आजकल कॉमिक्स,खासकर के कोई भी “रीजनल ” फ्लेवर की कॉमिकस को पढ़ना लोगो के सामने खुदको हास्यास्पद करने जैसा हैं। यही वजह हैं की सिर्फ वही लोग देसी कामिक्से पढ़ते हैं जिनमे रियल पैशन हैं, वरना मंगा और वेस्टर्न कॉमिक्स को ही सीरियस कॉमिक्स समझने और ज़ाहिर करने वालो की भी कमी नहीं हैं। एक कॉमिक बुक फैन होने के नाते मुझे सभी कामिक्से देसी  या विदेसी  अच्छे  लगते  है पर भाषा के नाम पे यह भेदभाव आज बहत ज़्यादा प्रभावशाली हैं।

अपने शहर के बारे में बताएं।

सुप्रतिम – मेरा जन्म भारत के पूर्वोत्तर मे स्थित अगरतला शहर मे हुआ। गौहाटी के बाद ये पूर्वोत्तर के सात राज्यो मे दूसरा प्रमुख शहर भी हैं। बॉर्डर से सटे होने की वजह से यहा बीएसएफ भी कार्यरत हैं जिनमे से काफ़ी लोग हिन्दी भाषी है। साथ ही साथ ओ एन जी सी होने के कारण से हिन्दी भाषी लोग काफ़ी मात्रा मे मौजूद भी है। ज़ाहिर सी बात हैं की इस वजह से हिन्दी कॉमिक्स शुरू से ही यहा रहते लोगो का मनोरंजन करती आ रही हैं. समय के साथ साथ हिन्दी कॉमिक्स का क्रेज़ यहा काफ़ी कम हो चुका हैं पर आज भी मैं घर जाता हू तो भूले भटके एक आधा दुकान मे कुछ दुर्लभ कॉमिकसे खोज ही निकलता हूँ।

आप अक्सर स्केच बनाते हैं, स्केचिंग का शौक कब लगा?

सुप्रतिम – स्केचिंग का  शौक  मुझे कॉमिक्स से नही  लगा। उन दिनो (1993) जुरासिक पार्क फिल्म का क्रेज़  सबके सिर चढ़के बोल रहा था , मेरे घर पे एक किताब थी जिसका नाम था “अतीत साक्षी फ़ॉसिल” उस किताब मे डाइनॉसॉर के बारे मे जानकारियाँ थी और अनूठे चित्र थे, मैं दिन भर उन्ही के चित्र कॉपी करने के कोशिश मे लगा रहता था। कुछ एक बार जब मेरे इन प्रयासो को लोगो ने मुर्गी,बतक के चित्र के रूप मे शिनाख्त की तो मैं फिर कॉमिक स्टार्स के चित्र बनाने लगा। बचपन मे सबसे ज़्यादा चित्र मैने भेड़िया के बनाए (प्री-1997) ,नागराज के चित्र बनाते हुए मैं काई बार पढ़ाई के वक़्त पकड़ा भी गया। आज कल समय मिलता नही हैं पर उत्सुकता पहले जैसी ही हैं।

आपके हिसाब से एक अच्छी कॉमिक्स के क्या मापदण्ड हैं? 

सुप्रतिम – एक अच्छी  कॉमिक्स का मापदंड किसी एक विषय पे निर्भर नहीं करता, पर पहला मापदंड यह हैं की उसके चित्र और कहानी में से कोई भी एक पहलु जोरदार होनि चाहिये। हालाकी चित्र अव्वल दर्जे का हो तो सबसे पहले ध्यान आकर्षित करता है। पर ऐसे कॉमिक भी होते हैं जिनमे चित्र का योगदान कम होता है और कहानी इतनी ज़बरदस्त होती है की दिल को छु जाती हैन.जैसे की “अधूरा प्रेम”.वैसे ही काफ़ी ऐसे कॉमिक्स भी होते हैं जिनके साधारण से कहानी कोचित्रकला के वजह से एक अलग ही आकर्षण मिलता हैन. मनु जी के द्वारा बनाए गये सभी परमाणु के कॉमिक्स इस श्रेणी मे आते हैं. आज भी अगर कॉमिक्स के क्वालिटी की बात आए तो आकर्षक चित्रकला ही वो प्रमुख माध्यम हैं जिससे आप एक कॉमिक्स से प्रभावित होते हैं।

अपनी पसंदीदा कॉमिक्स, लेखक, कलाकार और कॉमिक किरदारों के बारे में बताएं। 

सुप्रतिम – मेरी पसंदीदा कॉमिक्स, किरदार के हिसाब से देखा जायें तो  होंगे ग्रांड मास्टर रोबो, ख़ज़ाना सीरीज़, भूल गया डोगा, टक्कर, खरोंच, 48 घंटे सीरीज़, लाश कहा गयी, चमकमणी, महारावण सीरीज़, अग्नि मानव सीरीज़, प्रोफ शंकु सीरीज़ आदि। अनुपम सिन्हा जी ,सत्यजीत राय,संजय जी मेरे प्रिय लेखक मे से हैं। प्रताप जी,अनुपम जी, मनु जी, डिगवॉल जी, ललित शर्मा जी, चंदू जी, सुजोग ब्न्दोपध्यय जी, अभिषेक चटेर्ज़ी, मलसुनी जी, मयुख चौधरी जी,गौतम कर्मकारजी मेरे प्रिय कलाकार हैं।  ध्रुव, नागराज, परमाणु, डोगा, भेड़िया, प्रोफेसर शंकु, कौशिक, फेलूदा, महाबली शाका,फॅनटम, घनादा मेरे फ़ेवरेट क़िरदार हैं।

बचपन की कोई हास्यास्पद घटना, याद बांटिये। 

सुप्रतिम – बचपन मे मेरे एक राजस्थानी मित्र राकेश कुमार मीना ने मुझे पहली बार राज कॉमिक से अवगत कराया। उसीके साथ हुआ एक वाक़या मुझे याद हैं जिसे हास्यास्पद घटना कहा जा सकता हैं। राकेश और मेरे पास जितनी भी कॉमिकस थी, उनको हम एक्सचेंज करके पढ़ते थे। एक बार हुआ यह की मुझे उससे दो कॉमिक से लेनी थी, जिनमे से एक थी इंद्र की और दूसरी थी ताउजी कि, अब हुआ यह की यह दोनो कॉमिक आठ रुपये के थे। जब मैने उसे अपने दो कॉमिकसे दी तो उसने मुझे कहा की तेरे दो कॉमिक्सो का मूल्य पन्द्रह रुपये हैं तो मैं तुझे मेरे दो कॉमिक, जो की सोलह रुपये के हैं, तुझे नही दे सकता। उसके इस बिज़नेस माइंडनेस की जब भी कल्पना करता हू तो आज 22 साल बाद यह घटना हास्यास्पद ही लगता हैं। दूसरी घटना भी 1995 की ही हैं, मैं अपने फॅमिली के साथ जा रहा था बन्गलोर्, हम कलकत्ता  मे ठहरे हुए थे और मशहूर कॉलेज स्ट्रीट से होके गुज़र रहे थे की मुझे एक दुकान मे कॉमिकस दिखि। मेरे कहने पे पापा ने मुझे दो कॉमिकसे दिलवाई, एक थी “बौना शैतान” और दूसरी “ताजमहल की चोरिं “मुझे हैरत हुई जब दुकानदार ने पापा से 6 ही रुपये माँगे, और मुझे पहली बार मालूम पड़ा की सेकेंड हॅंड बुक्स किसे कहते है। बचपन के यह मासूम किससे सही मायने मे हास्यास्पद ना सही,होठों पे मुस्कान ज़रूर लाती हैं।
बदलते समय के अनुसार कॉमिक्स प्रकाशकों को क्या सलाह देना चाहेंगे?

सुप्रतिम – देसी कॉमिक्स के दौर को मैं कूछ किस्म मे बाँटना चाहूँगा. 1940-1970 के दशक मे बंगाल मे वीदेसी कॉमिक्स के अनुकरण मे काफ़ी विकसित कॉमिकस बनी, जिनमे सायबॉर्ग जैसे कॉन्सेप्ट्स काम मे लाए गये। 1970 से हिन्दी कॉमिक इंडस्ट्री मे भी सहज सरल चित्रो के साथ कॉमिकसे आई। 1980 से कॉमिकसे काफ़ी विकसित हो गई और 1990-2000 तक हिन्दी कॉमिक इंडस्ट्री का सुनेहरा दौर रहा। 2000 के बाद की बात करें तो डिजिटल फॉरमॅट्स के बदौलत हिन्दी कॉमिक इंडस्ट्री मे काफ़ी चेंजस आयें। आज भी कुछ कॉमिक्स मे जैसे की बंगाली कॉमिक्स इंडस्ट्री मे मैनुअल कलरिंग का प्रयोग बखूबी से किया जाता हैं। समय के साथ कुच्छ इंडस्ट्रीस बदल गये और कूछ ने अपना पुराना स्टाइल बरकरार रखा, पर एक अच्छी कॉमिक्स को आज भी फैंस जैसे  भाँप लेते है। बदलते समय में स्टाइल बदला होगा पर अच्छे कॉमिक्स का मापदंड वही हैं जो पहले से थे। प्रकशको से मेरी बीनति रहेगी की यह पॅशन ही हैं जो एक कॉमिक को आकर्षक बनाती हैं ना की नयी तकनीक. कॉमिक बनाते वक़्त उन मौलिकताओ का ध्यान रखे जिनकी वजह से कॉमिक्स ने हमारे बचपन को इतने रंगो मे रंगा।

कॉमिक्स पाठकों के लिए आपका क्या सन्देश है?

सुप्रतिम – कॉमिक्स पाठक बंधुओ के लिए मैं यही बोलना चाहूँगा की आप मे से काफ़ी लोग अभी किसी कारणवश कॉमिक्स से दूर होते जा रहे हैं, कोशिश  करिए की अपने आनेवाले पीढ़ी को आप प्रोत्साहित करे कॉमिक्स पढ़ने के लिए और खुद भी पढ़ें और खरीदें।

– मोहित शर्मा ज़हन

Indian Comics Fandom Magazine (Vol. 11)

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News, photos and Updates: Diamond Comics, Tinkle, Campfire Graphic Novels, Tamil Comics, Champak, Lot Pot, Jasoos Babloo, Red Streak Publications, Raj Comics, Amar Chitra Katha, Holy Cow Entertainment, Meta Desi Comics, TBS Planet Comics, Yali Dreams Creations, Anik Planet, Kavya Comics, Premeir Artfx Studio, Green Humor, MB Comics Studio.
Special: Artist-Author Akshay Dhar Interview, Late Writer Ved Prakash Sharma (Tribute), Artist Gaman Palem, ICF Awards 2016 Champions Corner
Contributors: Vipul Dixit, Vyom Dayal, Aakash Kumar, Mohit, Avyact, Youdhveer Singh, Rishabh Kurmi, Sanjay Singh
Editor: Mohit Trendster
Freelance Talents (March 2017)
भारतीय कॉमिक्स जगत से जुडी ख़बरें, जानकारी, चित्र, लेख, फैन फिक्शन, साक्षात्कार आदि!

Interview with Writer Anurag Kumar Singh

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Originally Published – http://www.culturepopcorn.com/
श्री अनुराग कुमार सिंह पिछले 8 वर्षो से राज कॉमिक्स के साथ जुड़े हुए हैं। इस बीच उन्होंने कई कॉमिक्स की परिकल्पना, संपादन और लेखन में योगदान दिया। जनवरी 2008 के एक इवेंट में इनसे मिला और पाया कि अनुराग जी एक मृदुभाषी, हँसमुख, मिलनसार व्यक्ति है, जो निरंतर अपनी प्रतिभा को निखारने और नए आईडिया सोचने में लगे रहते हैं। कहानी गढ़ने और सीन-अनुक्रम जोड़ने का इनका तरीका मुझे काफी पसंद है। हालांकि, जितने परिकल्पनाओं का इनके पास भंडार है उस अनुपात में कॉमिक नहीं आयी है अबतक पर आशा करता हूँ आने वाले समय में वो इसकी भरपाई कर देंगे। पेश है उनसे बातचीत के कुछ अंश। – मोहित शर्मा ज़हन
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Q) – अपने बारे में बताएं – आपका बचपन, शिक्षा, गांव-शहर, ननिहाल आदि। 
अनुराग – मेरा नाम अनुराग कुमार सिंह है! मैं किशनगंज, बिहार का रहने वाला हूँ! मेरी प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा मेरे ननिहाल पूर्णिया में हुई है! वहीँ मेरा बचपन बीता है! मैंने रसायन शास्त्र से स्नातक किया है! और अब राज कॉमिक्स के लिए कहानियां लिखता हूँ!
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Q) – कॉमिक्स प्रेम कब जागा और आपकी पहली कॉमिक कौनसी थी?
अनुराग – कॉमिक्स के प्रति प्रेम मेरे अंदर 7 साल की उम्र में ही जाग गया था! मेरे घर में सभी कॉमिक्स नॉवेल्स और पत्र पत्रिकाओं को पढ़ने के शौक़ीन रहे हैं! मेरे पापा फैंटम और मेंड्रेक के फैन रहे हैं! मेरे ननिहाल में भी सभी ऐसे ही रहे हैं! सो मुझे भी पढ़ने की लत शुरू से ही लग गई! मेरी पहली कॉमिक ताऊ जी की कोई कॉमिक्स थी जिसका नाम मुझे याद नहीं है! उसके बाद चाचा चौधरी और डायमंड के अन्य किरदार भी पढ़ लेता था! राज कॉमिक्स की पहली कॉमिक्स जो मैंने पढ़ी थी वो थी कातिलों का क्लब जिसका अगला भाग आज तक नहीं पढ़ पाया! नागराज की पहली कॉमिक जो मैंने पढ़ी थी वो थी प्रलयंकारी मणि और शंकर शहंशाह! तब मुझे पता भी नहीं था कि नागराज क्या चीज है!
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Q) – आपके पसंदीदा किरदार कौन हैं और क्यों?
अनुराग – मेरा पसंदीदा किरदार है परमाणु जो हमेशा से मेरा प्रिय किरदार रहा है! इसको लिखने की अतृप्त इच्छा अब भी मेरे मन में दबी है! हालाँकि मल्टीस्टार कॉमिक्स पुनरुत्थान और विस्तार सीरिज़ में मैं परमाणु को लिख चुका हूँ पर सोलो में अब तक कोई मौका नहीं मिल पाया है मुझे! इसको पसन्द करने के कई कारण है! एक तो ये विज्ञान से जुड़ा किरदार है और मैं खुद भी विज्ञान का छात्र रहा हूँ तो इसके प्रति मेरा झुकाव स्वभाविक है! दूसरा मनु जी ने परमाणु/विनय और उनके सभी किरदारों को इतने सुंदर तरीके से चित्रित किया है कि कोई भी कॉमिक रीडर इससे सहज ही जुड़ जायेगा! तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण है कि परमाणु की स्टोरीज और आर्ट का जो स्टैंडर्ड हुआ करता था उसके नीचे गिरने की जो फ्रस्टेशन थी उसने मुझे परमाणु की कहानियों से और ज्यादा जुड़ने और उसे ठीक करने के लिए प्रेरित किया! आप ऐसा भी कह सकते हैं कि मेरे राइटिंग के क्षेत्र में आने का कारण सिर्फ और सिर्फ परमाणु ही था!
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Q) – लेखन के क्षेत्र में कैसे कूदना हुआ?
अनुराग – उपरोक्त प्रश्न में मैं ये बता ही चुका हूँ कि लेखन के क्षेत्र में आने का का कारण क्या था! सन 2006 में राज कॉमिक्स ने फोरम की शुरुआत की थी! फोरम से जुड़ने के बाद मुझे मेरे जैसे अन्य मित्र मिले जो राज कॉमिक्स के वर्तमान स्थिति से नाखुश थे! वो उनको सुझाव देते शिकायतें करते! हम आपस में बहस करते! उनमें से कुछ स्टोरी  भी लिखते थे! उनको देख कर मेरे अंदर का राइटर भी बाहर आने को आतुर होने लगा! पर एक पूरी स्टोरी लिखनी मुझे आती नहीं थी और नेट के साधन भी सिमित थे! इसलिए मैं सिर्फ शॉर्ट में आइडियाज लिख कर देता था! तब 2008 में फैन मीटिंग में शामिल होने दिल्ली जाने का मौका मिला! जहाँ संजय जी से मिलने के बाद पक्का मन बना लिया कि अब राइटर ही बनना है! और फिर उसके कुछ महीनों बाद ही मैंने राज कॉमिक्स ज्वाइन कर लिया!
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Q) – राज कॉमिक्स फोरम के दौर के बारे में नए पाठकों को बताएं। 
अनुराग – फोरम के बारे में क्या कहूँ? जितना भी कहूंगा कम लगेगा! ये एक ऐसा मंच था जो हम जैसे पाठकों के लिए किसी वरदान से कम नहीं था! इस मंच ने मुझे खुद को व्यक्त करना सिखाया! अपनी भावनाओं को जाहिर करने का इससे अच्छा मंच हो ही नहीं सकता! नहीं तो इससे पहले कॉमिक पढ़ कर जो भी विचार मन में आते थे वो मन में ही घुमड़ते रहते थे किसी प्रेत की तरह! कहने को बहुत कुछ होता था पर कोई सुनने वाला नहीं होता! फोरम में कई अच्छे दोस्त मिले जो मेरी तरह समान रूचि रखते थे! जिनके साथ खुल कर अपने विचार रख सकता था! बहस कर सकता था!
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Q) – जीवन और लेखन में किन कलाकारों, लेखकों और लोगो को अपना आदर्श मानते हैं?
अनुराग –  राइटिंग में अनुपम जी, वाही जी और संजय जी को मैं अपना आदर्श मानता हूँ! आर्टिस्ट में अनुपम जी, मनु जी का कोई तोड़ नहीं है!
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Q) – अबतक की आपकी सर्वश्रेष्ठ रचना किसे मानते हैं?
अनुराग – जलजीवनी को मैं अपनी सर्वश्रेष्ठ रचना मानता  हूँ! ये कहानी मैंने बहुत मन से लिखी थी और भेड़िया से मानसिक जुड़ाव होने  के बाद ये एकमात्र ऐसी स्टोरी है जिसकी परिकल्पना और लेखन सबकुछ मेरा अपना था!
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Q) – कई पाठकों को शिकायत है कि आपका काम काफी कम देखने को मिलता है, उनसे क्या कहेंगे?
अनुराग – इसको आप मेरा आलस्य कह सकते हैं या मन की दुविधा! जब तक कोई कांसेप्ट मुझे रोमांचित नहीं करता मैं उससे जुड़ नहीं पाता! मैंने बेमन से भी कई बार लिखने की कोशिश की है पर या तो वो पूरी नहीं हो पाती या फिर आशानुकूल नहीं होती!
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Q) – आगामी प्रोजेक्ट्स के बारे में कुछ बताएं। 
अनुराग – सर्वनायक विस्तार की आगामी कहानी पर काम कर रहा हूँ!
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Q) – युवा लेखकों के लिए आपके क्या सुझाव हैं?
अनुराग – एक ही सुझाव है एडिटिंग प्रोसेस से भयभीत न हों! आपकी कहानी कितनी भी अच्छी हो उसमें गड़बड़ियां सम्भव है! उनको दूर करके ही आपका बेस्ट बाहर आयेगा! इसलिए बीच में ही कोशिश करना बन्द न करें!
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Q) – कॉमिक्स परिदृश्य में आपके आने के बाद से क्या बदलाव महसूस किये?
अनुराग – कॉमिक्स अब सहज रूप से उपलब्ध नहीं होता! और अब ये आम लोगों की पहुँच से दूर हो चुका है!
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Q) – कॉमिक बेस के सिकुड़ने का क्या कारण है और आपके मत में स्थिति में किस तरह सुधार किया जा सकता है?
अनुराग – कई कारण है! नए रीडर्स का न जुड़ना! पुराने रीडर्स का दूर जाना! महंगा और सहज उपलब्ध न होना! कहावत है जो दिखेगा वही बिकेगा! कॉमिक्स कैरक्टर्स का एनिमेशन, टीवी सीरीज या मूवीज में न आ पाना! सुधार के लिए सबसे जरूरी है नए रीडर्स को जोड़ना! इसके लिए मोशन कॉमिक और एनिमेशन बननी चाहिए। बुक फेयर और कॉमिक कॉन जैसे इवेंट ज्यादा से ज्यादा होना चाहिए। पेंटिंग कॉम्पिटिशन जैसी एक्टिविटी द्वारा भी छोटे बच्चों को कॉमिक्स से जोड़ा जा सकते हैं।
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Q) – कॉसप्ले, कॉमिक कॉमिक इवेंट्स पर आपका क्या नजरिया है?
अनुराग – कॉस्प्ले और कॉमिक इवेंट्स कॉमिक इंडस्ट्री के लिए संजीवनी का काम कर सकते हैं। पर इसे छोटे शहरों में भी आयोजित करवाने की कोशिश करनी चाहिए ताकि उन रीडर्स को भी कॉमिक्स से जोड़ सकें जो किन्ही कारणवश कॉमिक्स से दूर चले गए हैं।
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Q) – कोई पुराना, बंद हो चुका किरदार लिखने का अवसर मिले तो किसे चुनेंगे?
अनुराग – राज कॉमिक्स में मैं निःसंदेह परमाणु को ही चुनूँगा। अगर दूसरे पब्लिकेशन की बात करूँ तो राम रहीम और तौसी।

Interview With Comics Artist Tadam Gyadu (Comics Reel)

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Tadam Gyadu is a self learnt young emerging comics artist from Arunachal Pradesh, one of the north-eastern states of India. His second comics Brahmaand Vikhandan released this month, previously he was credited in Adrishya Shadyantra earlier this year, both comics of Nagraj by Raj Comics. He has been a part of many independent comics and freelance works in past and goes by the pseudonym PencilDude. In an exclusive interview with Mohit Sharma, Tadam talks about his art and inspirations.

Q) – Who inspired you to become an artist & how old were you when you started sketching/art?

Tadam – I always had a keen interest in art. When I was in kindergarten, long before comics came into my life, I used to copy the illustrations from my textbooks. Apples, bananas, planes and stuff, We also had some “life of the Buddha” books in our home, I copied their illustrations too. later, when passed to class three, i got my first comic book- So Ja Nagraj – illustrated by Anupam Sinha sir. i instantly fell in love with comics. And started copying those illustrations. I think I was 9 or 10 years old when I first started drawing comic heroes.

Q) – What is the story behind your pseudonym PencilDude?

Tadam – Actually there is no story behind my pseudonym. I know some great artists and writers like munshi premchand , artgerm, manu sir etc who use pseudonyms and I find it kinda cool to have one. So I did some brainstorming and came up with my very own alias – pencildude.

Q) – Were you involved in any creative, extra curricular activities in school?

Tadam – I used to sing, dance, draw and write at school. We had some good extra- curricular activities in school and I took part in most of them except sports, I am terrible at it.

Q) – What is/are your favorite genre(s)?

Tadam – My favorite genres are fantasy and sci-fi with some philosophy.

Q) – Other hobbies and pastimes besides art? 

Tadam – Other than art, I like to enjoy music, movies and books.

Q) – Tell us more about your upcoming projects?

Tadam – As of now, I am not involved in any project. I am focusing on honing my skills. So I am taking some time off. I will be back pretty soon.

Q) – Who are your role models or people you look up to in art & life (and why)?

Tadam – In art, there is not a particular one whom I consider my role model. Anupam sir, who drove me into comics art. Sir David finch, from whose tutorial videos I learnt a lot of technical things of comic art. Dheeraj dkboss kumar, Lalit Sharma, Sumit kumar, abhishek malsuni sir are some who taught me many things. In short, I follow whoever is good and try to use their plus points into my own style. In life, my mother and my Grandpa are my role models. They inspire me to do whatever I do and I would not have been I, if they were not with me.

Q) – Where do you see yourself 10 years from now?

Tadam – I see myself practicing to make myself better.

Q) – What advice would you give to young artists who want to pursue art as career?

Tadam – Well, I am an amateur myself, so I don’t have anything of my own to say. But I would like to pass on something, which the great Mukesh singh had said in an interview for the newcomers : be the first __________. (fill your name on the blank).

Q) – Your best artwork till date?

Tadam – I can’t decide which is the best artwork I did till date because whichever artwork I do, at first it seems pleasing but when I look at it after few days then I laugh at myself, seeing so many silly mistakes. So, I guess that best artwork is yet to come.

Q) – Tell us more about Arunachal’s art scene.

Tadam – As I said already, there is not much scope for an artist in Arunachal. There are no good art colleges, neither are there any publishing houses or production houses which would hire artists. The aspiring artists, who do not have much knowledge about the carriers they can pursue in art, either get interested in other things or become sign board painters, because there is nobody who can guide them. I hope people will get aware soon.

Q) – Share some interesting items from your ‘Bucketlist’ & few random facts about yourself?

Tadam – Let me share them one by one.  (a) I myself came to know about art as a carrier after I passed out class 10 and went out for further studies in Assam. (b) Once I was planning to be an Engineer. Thank God, I wasn’t that Good in studies. © I don’t like living in cities, maybe because I lived most of my life in village. I think that’s all in my mind right now.

Interview by Mohit Trendster

साक्षात्कार – अक्षय धर (मेटा देसी कॉमिक्स)

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काफी समय से कॉमिक्स जगत में सक्रीय लेखक-कलाकार-प्रकाशक अक्षय धर का मार्च 2016 में साक्षात्कार लिया। जानकार अच्छा लगा कि भारत में कई कलाकार, लेखक इतने कम प्रोत्साहन के बाद भी लगातार बढ़िया काम कर रहें हैं। पेश है अक्षय के इंटरव्यू के मुख्य अंश। – मोहित शर्मा ज़हन

Q – अपने बारे में कुछ बताएं? 

अक्षय – मेरा नाम अक्षय धर है और मैं एक लेखक हूँ। लेखन मुझे किसी भी और चीज़ से ज़्यादा पसंद है। मैं मेटा देसी कॉमिक्स प्रकाशन का संस्थापक हूँ। अपने प्रकाशन के लिए कुछ कॉमिक्स का लेखन और संपादन का काम भी करता हूँ। अपने काम में कितना सफल हूँ, यह आप लोग बेहतर बता सकते हैं।

Q – पहले और अब आर्टिस्ट व लेखकों में क्या अंतर महसूस किया आपने?

अक्षय – कॉमिक्स के मामले में ज़्यादा अंतर नहीं लगता मुझे, क्योकि विदेशो की तुलना में भारत में कभी भी उतना विस्तृत और प्रतिस्पर्धात्मक कॉमिक्स कल्चर नहीं रहा। हाँ पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न कलाकारों, लेखकों का काम देखने को मिल रहा है। फिर भी पहले लेखकों की फोल्लोविंग अधिक थी, यह स्थिति धीरे-धीरे चित्रकारों, कलाकारों के पक्ष में झुक रही है। भारत के साथ-साथ अन्य देशो के कॉमिक इवेंट्स में लेखकों की तुलना में कलाकारों अधिक आकर्षण का केंद्र रहते हैं। अब कॉमिक्स की कहानियों और कला में बेहतर संतुलन देखने को मिल रहा है।

Q – आपके पसंदीदा कलाकार, लेखक और क्यों?

अक्षय – मेरे पसंदीदा लेखक और कलाकार पाश्चात्य प्रकाशनों से हैं क्योकि वहां जैसे प्रयोग, अनुशासन और अनुभव भारत में कम देखने को मिलते हैं। लेखकों में मैं Mark Waid, Greg Rucka, Jim Zum, Jeff Parker, Grant Morrison, Garth Ennis, Gail Simone and Warren Ellis का काम बड़े चाव से पढता हूँ। कलाकारों में Geof Darrow and J.H.Williams. हालांकि, Adam Hughes, Stjepan Sejic and Darick Robertson जैसे आर्टिस्ट्स का काम मुझे अच्छा लगता है।

Q – अपने देश में कॉमिक्स का क्या भविष्य देखते हैं?

अक्षय – भारत में बहुत सम्भावनाएं है। कला, कहानियों-किवदंतियों-किस्सों के रूप में हमारे पास अथाह धरोहर है। हमारे इतिहास में इन कलाओं के कई उदाहरण है। इतनी संभावनाओं के होने के बाद भी आम देशवासी का नजरिया कॉमिक्स के प्रति बड़ा नकारात्मक और निराश करने वाला है। अगर लोग कॉमिक्स को बच्चों की तरह बड़ो के लिए भी माने और उनको साहित्य में जगह दें। कॉमिक्स को नकारने के बजाये एक कहानी, शिक्षा को बताने का साहित्यिक तरीका मानें, तो भारतीय कॉमिक्स बहुत जल्द बड़े स्तर पर आ जाएंगी।

Q – इंडिपेंडेंट कॉमिक्स प्रकाशित करना इतना मुश्किल काम क्यों है?

अक्षय – भारत में इंडिपेंडेंट कॉमिक्स बनाना और प्रकाशित करना बहुत मुश्किल हैं, क्योकि –

1. “बचकानी चीज़” कॉमिक्स की जो छवि बनी है देश के लोगो के दिमाग में वो सबसे बड़ी बाधा है। लोगो को थोड़ा लचीला होना चाहिए।

2. दुर्भाग्यवश, पहले से ही कम कॉमिक पाठकों में अधिकतर भारतीय कॉमिक फैंस कुछ किरदारों या 2-3 प्रकाशनों के अलावा किसी नयी कॉमिक को पढ़ना पसंद नहीं करते। बैटमैन, नागराज, चाचा चौधरी पढ़िए पर नए प्रकाशनों को भी ज़रूर मौका दीजिये।

Q – अब तक का अपना सबसे चुनौतीपूर्ण और सर्वश्रेष्ठ काम किसे मानते हैं और क्यों? 

अक्षय – ग्राउंड जीरो ऍंथोलॉजी के अंतिम 2 कॉमिक्स के बारे में सोचकर गर्व महसूस करता हूँ। यह काम दर्जन भर से अधिक उन लोगो की ऐसी टीम के साथ किया जिन्हे कॉमिक्स के बारे में कोई अनुभव नहीं था। मुझे प्रकाशन का अनुभव नहीं था फिर भी जिस स्तर की ये कॉमिक्स बनी है देख कर अच्छा लगता है। साथ ही पाठको को हर कॉमिक्स के साथ हमारे लेखन, कला में सुधार लगेगा।

 रैट्रोग्रेड के लिए मन में एक सॉफ्टस्पॉट हमेशा रहेगा। दिल्ली में आयोजित, भारत के पहले कॉमिक कॉन में पॉप कल्चर द्वारा प्रकाशित मेरी यह कॉमिक पाठकों द्वारा काफी सराही गयी थी। यह एक बड़ी कहानी है, जिसे मैं आगे जारी करना चाहता हूँ, जिसपर विचार चल रहा है। अभी तक इवेंट्स में लोग हमारे स्टाल पर रूककर इस कॉमिक, कहानी के बारे में पूछते हैं।

Q – मेटा देसी कॉमिक्स के अब तक के सफर के बारे मे  बताएं।

अक्षय – मेटा देसी कॉमिक्स की शुरुआत मैंने उन प्रतिभाओं को मौका देने के लिए की थी, जिनसे मैं अपने देश भर में कॉमिक इवेंट्स के दौरान मिला था। अपनी तरफ से कुछ कलाकारों, लेखकों की मदद के लिए यह कदम उठाया था। धीरे-धीरे इसका इतना विस्तार हुआ कि अब मेटा देसी की अच्छी-खासी फॉलोइंग है। ग्राउंड जीरो सीरीज में 3 कॉमिक्स आने के बाद अब हमनें पाठको की मांग पर अभिजीत किनी द्वारा बनाए गए होली हेल को अलग कॉमिक दी है। जातक माँगा के रूप में हमारी वेबसाइट पर वेबकॉमिक चल रही है। जिसमे हम बिना शब्दों का प्रयोग कर माँगा स्टाइल में जातक कथाएं बना रहें हैं। हाल ही में चेरियट कॉमिक्स के साथ मिलकर एक नयी लाइन आईसीबीएम कॉमिक्स की शुरुआत की है, जिसमे पाठको को अलग अंदाज़ में कुछ कॉमिक्स मिलेंगी। ऐसा करने से प्रकाशन में हमारा खर्च भी साझा हुआ है।

Q – कॉमिक कॉन जैसे इवेंट्स में क्या सुधार होने चाहिए?

अक्षय – कॉमिक कॉन में दोनों तरह की बातें है। एक तरफ इतने बड़े इवेंट के रूप में कई इंडिपेंडेंट पब्लिशर, रचनाकारों को एक प्लेटफार्म मिलता है, वहीं दूसरी और उनपर मर्केंडाइज, गिफ्ट आदि कंपनियों को अधिक स्टाल देकर कॉमिक इवेंट को डाइल्यूट करने की बात कही जाती है। मेरे मत में अगर प्रकाशनों से उन्हें पर्याप्त सेल नहीं मिल रही तो अपना व्यापार बनाए रखने के लिए और आगे के इवेंट्स करने के लिए उन्हें अन्य कंपनियों की ज़रुरत पड़ती है।

यह कम करने के लिए हमे इवेंट्स पर और कॉमिक्स फैंस की ज़रुरत है। जो हमारी कॉमिक्स खरीदें और हमे बताये कि हम क्या सही कर रहें है, कहाँ हम गलत हैं, किस किरदार या रचनाकार में क्या सम्भावनाएं है।

Q – भविष्य में कॉमिक्स से जुडी योजनाओं के बारे में जानकारी साझा कीजिये। 

अक्षय – अभी कुछ प्रोजेक्ट्स शुरुआती चरण में है जिनके बारे में बताना संभव नहीं। वैसे इस साल चेरियट कॉमिक्स के साथ मिलकर 3 कॉमिक्स प्रकाशित करने की योजना है। जिनमे से एक होली हल का तीसरा अंक होगा।

Q – कई पाठक कम प्रचलित या नए प्रकाशन की कॉमिक्स, नोवेल्स और किताबे खरीदने से डरते है। उनके लिए आपका क्या संदेश है?

अक्षय – मेरा यही संदेश है कि हम लालची नहीं है, कला-कॉमिक्स और अंतहीन काल्पनिक जगत के प्रति अपने जनून के लिए कर रहें है। जैसा लोग कहते हैं सिर्फ जनून से पेट नहीं भरते इसलिए हमे आपके सहयोग और मार्गदर्शन की आवश्यकता है। यह बिल्कुल ज़रूरी नहीं कि जिस चीज़ से आप अंजान हों वह अच्छी नहीं होगी। नयी प्रतिभाओं को मौका दीजिये, कुछ नया मनोरंजन आज़मा कर देखिये…..हो सकता है आपके सहयोग से कई कलाकारों का जीवन सफल हो जाए। बहुत-बहुत धन्यवाद!

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सदाबहार परशुराम शर्मा जी से मेरी मुलाक़ात….

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जीवन में कई बार छोटी-छोटी बातें आपको चौकाने का दम रखती है, बशर्ते आपकी आदत या किस्मत ऐसी बातों को देख सकने कि हो। भाग्य से कुछ सामान खरीदने बाजार गया और बाइक स्टैंड पर लगाते समय क्रिएटिव कोर्सेज का एक पोस्टर दिखा जिसपर एक नाम को पढ़कर लगा कि यह तो कहीं अच्छी तरह सुना लग रहा है पर उस समय भाग-दौड़ में याद नहीं आ रहा था कि कहाँ। पोस्टर पर एक संजीदा बुज़ुर्ग गिटार पकडे  खड़े थे। खैर, सामान खरीदते समय याद आया की पोस्टर पर लिखा नाम परशुराम शर्मा तो बीते ज़माने के प्रख्यात उपन्यास एवम कॉमिक्स लेखक का भी था। साथ में यह भी याद था कि परशुराम जी का पता मेरठ का बताया जाता था। इतना काफी था इस निष्कर्ष पर आने के लिए कि सामने लेखक-विचारक परशुराम शर्मा जी का ही ऑफिस है। पहले तो मैंने भगवान जी को धन्यवाद दिया कि उन्होंने बाइक जिस एंगल पर स्टैंड करवाई वहां से मुंडी टिल्ट करके थैला उठाने में मुझे सर का पोस्टर दिख गया। थोड़ी झिझक थी पर मैंने सोचा कि अब इतनी पास खड़ा हूँ तो बिना मिले तो नहीं जाऊँगा। उनसे बड़ी सुखद और यादगार भेंट हुई और काफी देर तक बातों का सिलसिला चलता रहा, इस बीच उन्होंने अपने सुन्दर 2 गीत मुझे सुनाये और बातों-बातों में मेरे कुछ आइडियाज पर चर्चा की।

270 से अधिक नोवेल्स और कई कॉमिक्स प्रकाशनों के लिए सौइयों कॉमिक्स लिख चुके 68 वर्षीय परशुराम जी अब मेरठ में अपना क्रिएटिव इंस्टिट्यूट चलाने के साथ-साथ स्थानीय म्यूजिक एलबम्स,  वीडिओज़ बनाते है। बहुमुखी प्रतिभा के धनि परशु जी लेखन के अलावा गायन, निर्देशन, अभिनय में भी हाथ आज़मा चुके है और अब तक उनकी लगन किसी किशोर जैसी है। यह उनके साथ हुयी भेंट, कुछ बातें उनके आग्रह पर हटा ली गयी है।

 *) – दशको तक इतना कुछ लिखने के बाद आपके बारे में पाठक बहुत कम जानते है, ऐसा क्यों?

परशुराम शर्मा – बस मुफलिसी का जीवन पसंद है जहाँ मैं अपनी कलाओं में लीन रहूँ। वैसे उस वक़्त अचानक सब छोड़ने का प्लान नहीं था वो हिंदी नोवेल्स, कॉमिक्स का बुरा दौर था इसलिए अपना ध्यान दूसरी बातों पर केंद्रित किया। 

*) – अब आप क्या कर रहे है?

परशुराम शर्मा – अब भी कला में लीन हूँ। बच्चो को संगीत और वाद्य सिखाता हूँ, डिवोशनल, रीजनल एलबम्स-वीडिओज़ बनाता हूँ। कभी कबार स्थानीय फिल्मो में अभिनय करता हूँ। 68 साल का हूँ पर इन कलाओं  सानिध्य में हमेशा जवान  रहूँगा। 

*) – क्या नोवेल्स-कॉमिक्स के ऑफर अब तक आते है आपके पास?

परशुराम शर्मा – कुछ प्रकाशक अब भी मुझसे हिंदी नावेल सीरीज लिखने की बात करते है पर अब इस फील्ड में पैसा बहुत कम हो गया है। युवाकाल जैसी तेज़ी नहीं जो वॉल्यूम बनाकर  मेहनताने भरपाई कर सकूँ। इतना दिमाग लगाने के बाद अगर  पारिश्रमिक ना मिले तो निराशा होती है। अखबार वाले मुझे लेखो के 200-300 रुपये  चैक देते थे और पूछने पर बताते कि लोग तो फ्री में लिखने को तैयार है, हम तो फिर भी आपको कुछ दे रहे है। 

*) – अब किन पुराने साथियों के संपर्क में है?

परशुराम शर्मा – कभी कबार कुछ मित्रों से बातचीत हो जाती है। यहाँ स्थानीय कार्यक्रमों में वेदप्रकाश शर्मा जी, अनिल मोहन आदि उपन्यासकारों से भी मिलना हो जाता है। 

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Parshuram ji in T Series Video

 *) – क्या अंतर है पहले और अब कि ज़िन्दगी में?

परशुराम शर्मा – पहले जीवन की गति इतनी तीव्र थी कि ठहर कर कुछ सोचना या अवलोकन कर पाना कठिन था। आजकल कुछ आराम है तो वह भागदौड़ में रचनात्मकता किसी सुखद फिल्म सी आँखों के सामने चलती है। 

*) – आपके लिए कुछ सबसे यादगार पल बांटे। 

परशुराम शर्मा – ऐसे बहुत से लम्हे आये जब मुझे विश्वास ही नहीं हुआ अपने भाग्य पर। जो अब याद है उनमे जैकी श्रॉफ का मेरे साथ फोटो खिंचवाने के लिए लाइन में लगना , अमिताभ बच्चन जी का मुझसे मिलने पर यह बताना कि मेरे लेटेस्ट उपन्यास की 5 कॉपीज़ उनके पास रखी है, प्रकाशकों का मेरी कई कृतियों के लिए लड़ना आदि। 

*) – इंटरनेट के आने से क्या बदलाव महसूस किये आपने?

परशुराम शर्मा – ज़्यादा तो मैंने सीखा नहीं पर कुछ वर्ष पहले जिज्ञासावश अपना नाम सर्च किया तो बहुत कम काम था मेरा वहां। मैं कुछ प्रशंषको का धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने जाने कहाँ-कहाँ से खोजकर मेरी कई कॉमिक्स और उपन्यासों की लिस्टस, चित्र आदि इंटरनेट पर अपलोड किये। सच कहूँ तो अब उनमे से काफी काम तो मैं भूल चुका हूँ  कि वो मैंने ही लिखे थे।  

*) – आपके ऑफिस के बाहर कुछ पोस्टर्स और भी लगे है उनके बारे में बताएं? 

परशुराम शर्मा – एक पोस्टर कुछ समय पहले आई फिल्म “देसी डॉन” का है, कुछ एलबम्स साईं बाबा पर रिलीज़ हुयी पिछले 3 वर्षों में। 

*) – लेखन, संगीत, अभिनय, निर्देशन आदि विभिन्न कलाओं में ऐसी निरंतरता, दक्षता कैसे लाते है आप?

परशुराम शर्मा – इसका उत्त्तर मेरे पास भी नहीं है, शायद इन कलाओं के प्रति मेरा दीवानापन मुझे रचनात्मक कार्य करते रहने को प्रेरित करता है। 

*) – भविष्य कि योजनाओं और प्रोजेक्ट्स से अवगत करायें। 

परशुराम शर्मा – कुछ होनहार बच्चो को संगीत में लगातार शिक्षा दे रहा हूँ, उनमे एक ख़ास हीरा तराशा है जिसका नाम है अंश। उसके साथ साईं बाबा पर डिवोशनल एल्बम अक्टूबर 2014 में लांच की, अब वह कुछ टैलेंट शोज़ के ऑडिशंस दे रहा है। बहुत जल्द आप उसे टीवी पर देखेंगे। नयी पीढ़ी के प्रति  दायित्व निभाने के साथ – साथ जीवन में सोचे ख़ास, चुनिंदा आइडियाज को किस तरह अलग-अलग माध्यमो में  मूर्त रूप दूँ यह सोच रहा हूँ। 

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Master Ansh

*) – कॉमिक्स पाठको को क्या संदेश देना चाहेंगे? क्या हम आपका नाम दोबारा कॉमिक्स में देखने की उम्मीद कर सकते है। 

परशुराम शर्मा – मैं उनका आभार प्रकट करूँगा जिन्होंने इस मरती हुयी इंडस्ट्री में जान फूँकी। काल बदलते है, इसलिए चाहे बदले प्रारूपों में ही सही कॉमिक्स का सुनहरा समय फिर से आयेगा। जी हाँ! आगे दोबारा मैं कॉमिक्स लिख सकता हूँ अगर परिस्थिति सही बनी तो। 

 इस तरह उनका धन्यवाद करता हुआ, आशीर्वाद लेकर फूल के कुप्पा हुआ मैं उनके ऑफिस से बाहर निकला। जल्द ही उनकी अनुमति लेकर जो गीत उन्होंने मुझे सुनाये थे वो अपलोड करूँगा।
 – मोहित शर्मा (ज़हन)

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Interview with Mithilesh Gupta

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Promo Poster by Tadam Gyadu
 
कॉमिक्स प्रशंषक और कलाकार श्री मिथिलेश गुप्ता से उनकी आगामी फैन लाइव-एक्शन फिल्म “बांकेलाल और क्रुकबांड” और अन्य प्रोजेक्ट्स को लेकर हुयी बातचीत के अंश। आशा है इस फिल्म को अच्छा रेस्पोंस मिले और अपने उद्देश्य में सफल हो।
*) – अपना और अपने साथियों का संक्षिप्त परिचय हमसे करायें। 
पहले तो सभी कॉमिक्स प्रेमियों को मेरा नमस्कार, मैं भी आप सभी की तरह एक कॉमिक्स प्रेमी हूँ. मेरा नाम मिथिलेश गुप्ता है और मैं यु तो इंदौर का रहने वाला हूँ .पर यहाँ हैदराबाद में ३ साल से रह रहा हु और एक हेल्थ केयर MNC में काम करता हु। मेरी इस मूवी की टीम में और ३ मुख्य लोग शामिल हैं
जिनसे मेरी मुलाक़ात हैदराबाद कॉमिक्स कोंन  में हुयी थी ,सभी कॉमिक्स फंस हैं और हैदराबाद में ही कार्यरत हैं।
प्रद्युम्नदेव जोधा जी जो की राजस्थान से हैं  और वो विक्रमसिंह के किरदार में हैं .और इस फिल्म के प्रोडूसर भी हैं .उनके बिना ये फिल्म बनाना मुमकिन नही था। दुसरे “मोहन मौर्य ” जी हैं जो क्रूक् बांड के किरदार में हैं और राजस्थान से ही हैं, और उन्होंने इस फिल्म के लिए २ गाने लिखे हैं .
तीसरे सिद्धार्थ गुप्ता जी जो “ग्वालियर ” से हैं और इस फिम्ल में “मोटू ” के रोले में नज़र आएंगे .
*) – फिल्म को बनाने का विचार कैसे आया और क्या माहौल था मूवी बनने से पहले?
साल के पहले महीने में मेरी एक documentary film जो की चेतन भगत के नावेल “हाफ गर्लफ्रेंड ” पर आधारित है बन के रिलीज़ हो चुकी थी ..लोगो का अच्छा रेस्पोंसे मिला .जिसकी शूटिंग मेरे मोबाइल से मध्यप्रदेश और बिहार में की गयी थी। इस के बाद मैं अपनी एक हॉरर नावेल लव ट्रायंगल पर काम कर रहा था २ दिन की शूटिंग भी हो गयी थी पर कैमरा अच्छा नहीं था तो कहानी बंद टालनी  पड़ी। तभी मुझे कॉमिक्स पर कुछ काम करने का विचार आया ,हालाँकि ये विचार आने का एक रीज़न ये भी मान सकते हैं की प्रद्युमन भाई के पास कुछ कॉमिक्स चरित्रों के ड्रेस बने हुए थे कॉमिक कोंन के लिए,
मतलब अब मेरे दिमाग में कहानी घुमने लगी और प्लान बन गया बस मेने इन तीनो को मन में रखकर ४ चरित्रों वाली कहानी गढ़नी शुरू की . “बांकेलाल और क्रूक् बांड ” और मुझे लगता है सभी अपने किरदारों में एक दम फिट लगे हैं। मेने इन् चारो को फोन करके अपना कांसेप्ट सूनाया की मैं एक मूवी बनाना चाहता हूँ पहले तो कुछ लोग नहीं मान पाए ,मेने सन्डे को मिलके समझाने का कहा …और एक मीटिंग करवाया।
इसके पहले हम सब एक दो बार ही मिले थे ..हैदराबाद में, फिर क्या  था मेने जब अपने डायरेक्शन के नज़रिए से इन्हें समझाया यकीन मानिय एक ने भी ना नहीं बोला.मतलब सबको मेरा  कांसेप्ट पसंद  आ गया था। और प्रद्युमन भाई के पास २ बड़े कैमरे भी थे मतलब काम हो गया था और फिर इस मूवी पर पूरे जोरो से मेने काम करना शुरू कर दिया शूटिंग के लिए।
*) – क्या प्रक्रिया रही इस फिल्म को बनाने में? 
एक्टिंग. सबको यही लग रहा था होगा या नहीं ,मेने कहा जेसे आप उन् किरदारों को कॉमिक्स में पढ़ते हैं उसे अपने आप में ढाल लो .बस फिर उस एक हफ्ते सब उन् किरदारों की पढने में फिर से बिजी हो गए थे ….हालाँकि हमारे पास ओनली सन्डे ही था बाकी दिन ऑफिस का था .प्लान था एक सन्डे में इश  फिल्म को फिल्म लेन्गे. अब हमारे पास ड्रेस थी। २ बड़े कैमरे भी हो गए थे। मेने स्क्रिप्ट एक हफ्ते में लिख चूका था ..अगले हफ्ते ही हमारे मीटिंग के शूटिंग स्टार्ट कर दी गयी फ़रवरी के पहले वीक में .लोकेशन था प्रद्युमन भाई का बड़ा फ्लैट जिसे हमने क्रूक्बोंद का ऑफिस बनया था और कुछ बाहर की शूटिंग एक जंगल और रोड पर करनी पड़ी। एक दिन में शूटिंग नहीं हो पायी .क्युकी बांकेलाल और विक्रमसिंह के ड्रेसिंग में १ घंटा तक लग जाता था फिर मैं स्क्रिप्ट पढ पढ़ कर चारो के किरदारों को सेट पे एक्ट करने बताता था …काफी टाइम लग रहा था क्युकी बार बार प्रैक्टिस करनी पडी .अरे भाई पन्नो से चरित्रों को निभाना कोई आसान काम नही था, और फिर नेक्स्ट वीक फिर शूटिंग  करना पड़ा।
टाइम की कमी के कारण नेक्स्ट शूटिंग २ हफ्तों के बाद की, काफी सीन्स फिर से करने पड़े ,और ऐसे १ महिना निकल गया .काफी ट्विस्ट जनम लेने लगे थे ,हम सब एक्टर्स तो हैं नहीं फिर भी हमने अपने आप के एक्टर्स को बहार निकाल के एक्टिंग की है जो आपको जरुर पसंद आयेगी . सभी ने फिल्म को बनाने में काफी न्यू न्यू आइडियाज दिए हैं ,जो इस फिल्म की  जान हैं।
*) – फिल्म को बनाने में क्या क्या challanges आये ?
काफी सारे ,,,,,,,क्युकी सभी का अपना जॉब भी था और हमारे पास सिर्फ एक सन्डे होता था ,,,पर उसमे भी अगर एक का भी सन्डे फ्री न हुआ तो बाकी ३ कुछ नही कर पा रहे थे। रात रात भर जाग जाग जार शूटिंग करी गयी और काफी क्लोज हो गए हम सब, सेट पर डिनर के साथ साथ मस्ती भी काफी होती थी .
सभी की हार्ड वर्क की मैं तारीफ़ करूंगा जिन्होंने इतना साथ दिया और मेरे वर्क पे भरोसा किआ …मैं जेसा चाहता था मूवी उससे भी बेहतर बन रही है इसलिए टाइम लग रहा है और अब शूटिंग हो चुकी है। फिल्म को ज्यादा अच्छा बनाने के लिए अब २ sundays सिर्फ डबिंग में जा रहे है जो काफी समय ले रहा है .और मैं ऑफिस से आकर एडिटिंग वर्क भी कर रहा हु .तो वहीँ  सोंग्स की धून भी मोहन जी और मैं बना रहे थे। चूँकि ये fanmade फिल्म है और हमरे पास कोई फंडिंग नहीं थी, हम सबने मिलके ये सब किया है और वर्क तो बहुत जादा हुआ है कैमरे के पीछे भी काफी दोस्तों ने हार्ड वर्क किया है।
*) – किस तरह कि कहानी देखने को मिलेगी फैन्स को? 
कहानी एकदम न्यू होगी, क्युकी क्रूक बांड  और बांकेलाल तो एक कॉमिक्स के हैं नहीं मेने उन्हें दो अलग अलग कॉमिक्स से उठाया है . उन्हें वेसा ही दिखाया है जेसा वो कॉमिक्स में होते हैं . पर दोनों का एक साथ मिलाप एकदम सुपर है (हा हा हा ) खूब हँसेंगे आप सब। हमने कभी इन् किरदारों को पन्नो से बहार तो देखा नही , मुझे उम्मीद है आप लोगो को जरुर अच्छा लगेगा इन् दो कॉमेडी पात्रों को देख कर और इसमें कुछ सुपर हीरोज आपको गेस्ट रोले में भी दिख सकते हैं।
*) – आगामी प्रोजेक्ट्स के बारे में कुछ बतायें।
ट्रेलर काफी फंस को  पसंद आया है और आ भी रहा है। मूवी के अछे रेस्पोंसे मिलने पर ऐसे ही कुछ और प्रोजेक्ट्स आपको देखने को मिलेंगे .जो की लाइन में हैं और इसके बाद मैं अपनी होर्रोरे मूवी “माय रूममेट -एक होर्रोरे लव स्टोरी ” जो २ कपल्स की कहानी है – की शूटिंग स्टार्ट करूँगा जो की बहुत बेस्ट होगी ..जिसका एक पोस्टर भी आ चूका है, उसके बाद मोहित शर्मा जी के कुछ प्रोजेक्ट मेरे पास आ चुके है और वर्क चल रहा है .समाज से जुडी कुछ और मूवीज भी आने वाले है। अच्छा लग रहा है जादा से ज्यादा लोग जुड़ रहे हैं , उम्मीद है फ्यूचर में काफी अछे फिल्म बना पाउँगा और मेरा ये जुनून कामयाब होगा .
*) – कॉमिक्स फैन्स के लिए कुछ शब्द…. 
इतना ही कहूँगा मैं कोई दूसरा नही आपकी ही तरह एक कॉमिक्स फेन हूँ, हैदराबाद कॉमिक्स कोंन में “तिरंगा ” बनाने के बाद फंस ने बहुत लाइक किया जिसके दम पे ये बना पाया हु। प्रद्युम्न भाई जो को “डोगा “बनते आये हैं कॉमिक कोंन  में,वो मेरे लिए एक inspiration हैं उनको सलाम .
और मैं भी कॉमिक्स की दुनिया में कुछ अलग कर रहा हु, सायद आपको पसंद आये, कोई सपोर्ट नही है किसी से जो है आप सबके जेसे फंस ही है। तभी ये बना पाया हूँ. दिन रात हम जुटे हैं एक साथ ताकि फिल्म अच्छी बन के सामने आये, आप सब का सहयोग चाहिए बस।
थैंक यू आल .
“कॉमिक्स हैं हमारा जूनून “
आपका
मिथिलेश गुप्ता

You & Me Film-Production | Facebook

– मोहित शर्मा (ज़हन)