Tan-Mann ka Vaham #zahan

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एक अंधेरे गलियारे में विजय बेचैनी से घूम रहा था। दूर अपनी पत्नी जीवा की परछाई देख उसकी उलझन कुछ कम हुई।
“बड़ी देर लगा दी इस बार?”

जीवा – “हाँ, अमीर लोगों में रिश्तेदार तो कम होते हैं पर उनके चेले-चपाटो की भीड़ इतनी रहती है कि समय लग गया।”

जीवा अपनी पहचान बदल कर एक निजी अस्पताल से जुड़वाँ बच्चे चोरी कर लायी थी। दोनों की अपेक्षा से उलट काम जल्दी और आसानी से हो गया। कुछ दिन शांत रहने के बाद डीलर से एकसाथ दो बच्चों का बढ़िया दाम मिलने की उम्मीद थी।

उसी रात जीवा ने विजय को जगाया।

“सुनो मेरा मन कुछ अजीब सा हो रहा है। तबियत ख़राब लग रही है। तुम्हे पूरे शरीर में खुजली नहीं हो रही?”

विजय – “हाँ, हरारत सी तो लग रही है। मैं तुझसे पूछने ही वाला था।”

जीवा ने संकोच से पूछा – “कहीं किसी ने बददुआ तो नहीं दे दी? कोई छाया-प्रेत ना छोड़ दिया हो…”

विजय – “हाँ! 2 दर्जन बच्चे उठाने के बाद तो जैसे तुझे बड़ी दुआएं मिली होंगी। शायद मौसम बदलने का असर होगा। अभी गोली ले लेते हैं…सुबह देखेंगे।”

सुबह दोनों के हाल ख़राब हो गये थे। जगह-जगह चकत्ते पड़ गये थे, तेज़ बुखार और हरी-नीली नसें बाहर आने को थी।

जीवा – “देखो मैंने कहा था ये किसी ऊपरी आत्मा का प्रकोप है। दोनों बच्चे एकदम ठीक हैं। अभी भी समय है, हम बच्चे लौटाकर माफ़ी मांग आते हैं।”

हर पल बिगड़ती हालत में विजय और जीवा को यही सबसे सही उपाय लगा। बच्चा चोर व्यापार चैन के दोनों मज़दूर, बच्चों को लेकर अस्पताल गये। जल्द ही पुलिस के साथ बच्चों के घरवाले आ गये। जीवा और विजय बच्चों के अभिभावकों से अपने कर्मों की माफ़ी मांगने लगे और खुद से ऊपरी छाया हटाने की विनती करने लगे। तब हवलदार ने उन्हें बताया – “तुमपर कोई प्रेत-व्रत नहीं है। यह युगल अफ्रीका के देश घाना से लौटा हैं। जहाँ से लौटते हुए इन्हे वहाँ फैल रहा रोटोला रोग हो गया है। स्त्री के गर्भवती होने, शुरुआती लक्षण गंभीर होने के कारण दंपत्ति इस अस्पताल में भर्ती हो गया और संयोग से उसी दिन ये दो बच्चे हो गये। माँ से यह संक्रमण बच्चों में आ गया। अगले दिन रोटोला के सही इलाज के लिए इन्हे शहर के बड़े हॉस्पिटल भेजा जाना था कि उस से पहले ही तुमने बच्चे उठा लिये।”

विजय ने अपनी चुसी हुई काया की शक्ति जुटाकर पूछा – “…तो ये बच्चे कैसे ठीक थे?”

हवलदार – “ठीक नहीं थे, उनपर दवाई की भारी डोज़ का असर था इसलिए पूरे लक्षण पता नहीं चल रहे थे।”

वैसे गलती दोनों की थी पर खीजते विजय का मन जीवा को थप्पड़ मारने का था…उसमें अब शक्ति कहाँ थी।

समाप्त!
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Art – Azika H.

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Jasoos Saas (Hasya Kahani)

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लक्ष्मी कुमारी स्वेटर बुनने से तेज़ गति से अपनी बहु पर विचार बुन रही थीं।  वैसे उनकी बहु शताक्षी ठीक थी….बल्कि जैसी कुलक्षणी, कलमुँही बहुएं टीवी और अख़बारों में दिखती हैं उनके सामने तो शताक्षी ठीक होने की पराकाष्ठा ही समझो। फिर भी लक्ष्मी को एक बात परेशान करती थी। केवल उन्हें ही नहीं, कॉलोनी की कुछ और सास भी इस मुद्दे पर चिंतित थीं। कई घरों की 25 से लेकर 40 साल की महिलाएं आपस में अक्सर झुंड में घंटों पता नहीं क्या बतियाती रहती थीं। बाहर से लगता कि मानो चुगलियों की कितने पहाड़ चढ़ रही हैं। बड़ा और सभी कोण से ढका घर होने के कारण अक्सर दर्जन भर स्त्रियां शताक्षी के घर पर डेरा जमाती।

मोहल्ले की सासों से जब रहा नहीं गया और उनकी मिसमिसी का रौला-रप्पा हो गया तो सबने पैसे मिलाकर अच्छी क्वालिटी के माइक्रोफोन और कैमरे लक्ष्मी कुमारी के आँगन में लगवाये, जहाँ बहुओं की चुगलियों का गोरख धंधा चलता था। दो दिन बाद वीकेंड को बहुओं की मैराथन बैठक हुई। अगले दिन सत्संग का बहाना बनाकर वृद्ध जेम्स बांडनियाँ गुप्त अड्डे पर मिलीं। कॉलोनी की सासें अपनी साँसें थाम कर बहुओं की मीटिंग की फुटेज देखना शुरू करती हैं।

“दीदी, कल छुटकी की वजह से छोटा भीम हार गया। मैं तो दूध उबलने रखने जा रही थी कि मीनू ने बताया कि कालिया को जीत कर टाइटल मिल गया। इतनी झुंझलाहट हुई कि मैं कच्चा दूध ही पी गयी और मीनू की अभ्यास पुस्तिका फाड़ी सो अलग…”

“हाँ! इस वजह से कल पूरा दिन मेरा भी मूड ऑफ रहा। ऑफिस से लौटे पीकू के पापा पुच्ची करने को बढे तो ऐसी कोहनी मारी मैंने…नील पड़ गया उनके होंठों पर। हुँह! भला कालिया को जिताना कोई बात हुई?”

छोटा भीम पर गंभीर चर्चा के बीच शिवा कार्टून सीरीज की फैन शताक्षी बोली।

“…पेड़ाराम ने अपनी पड़ोसन के चक्कर में शिवा का फूफा जो किडनैप करवाया उस से मेरा दिल बैठ गया सच्ची। अरे! आपने सुना…शक्तिमान को दोबारा शुरू कर रहे हैं।”

उसके बाद मोटू पतलू, माइटी राजू, गली गली सिम सिम, डोरेमॉन, शिनचैन पर शिद्दत से चर्चा हुई। इतना ही नहीं बीच-बीच में महिलाओं ने कार्टून सीरियल्स के मंगल गीत…टाइटल सांग भी गुनगुनाये। गृहणियों को जब फुर्सत मिलती थी तब टीवी के सामने बच्चे होते, जो कोई और चैनल चलने ही नहीं देते थे। कोई विकल्प ना होने के कारण थोड़े समय बाद कार्टून्स, एनिमेशन में बच्चों की तरह महिलाओं को भी मौज आने लगी और देखते ही देखते यह कार्टून क्रान्ति महिला मोर्चा बन गया।

बहुओं की बुराई और गप्पों के लिए ब्रेड रोल, पकोड़े तल कर लायी एक सास निराशा में बोली।

“भक…”

ये केवल एक ‘भक’ नहीं बल्कि ‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया’ वाली हार की स्वीकृति थी। गुप्त फुटेज देख रही सास मंडली के सारे अंदेशों का मुरब्बा बन चुका था। धूलधूसरित पहलवान की तरह सब अपने कार्टूनी सत्संग से घर लौट आयीं।

समाप्त! भक!
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Art – Sebastien K.
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बोगस परग्रही (कहानी) #ज़हन

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बोगस परग्रही सीरीज़ में आपका स्वागत है। यहाँ हर एपिसोड में हम कवर करेंगे भौजीकसम ग्रह के दो खोजी-टोही वैज्ञानिक कुच्चु सिंह और पुच्चु सिंह के रोमांचक कारनामे।

ब्रह्माण्ड में तैरते अनगिनत पत्थरों में से उन दोनों को पृथ्वी की खोजबीन और जांच की जिम्मेदारी मिली थी। उनके उन्नत यान में सदियों तक ईंधन और आहार की कमी नहीं होने वाली थी। पृथ्वी के इतना पास होते हुए भी मानवो के अंतरिक्ष स्टेशन, अन्य यंत्र उन्हें नहीं देख पाते थे। कुच्चु-पुच्चु बुद्धिमान तो थे पर अव्वल दर्जे के आलसी भी थे। उनका साढ़े तीन फ़ीट का कद भौजीकसम ग्रह पर औसत से 4-5 इंच ऊपर था, जिसका उन्हें घमंड था पर पृथ्वी की जानकारी, तस्वीरें और वीडियो देख कर उनका मुँह पार्थिव पटेल से भी छोटा बन गया। भौजीकसम का एक वर्ष पृथ्वी के 26 वर्षो के बराबर था और उन्हें 15 भौजीकसम वर्षों में अपने कई मिशन निपटाने थे। उनके पास 390 वर्ष हैं, इस जानकारी के बाद दोनों और ज़्यादा आराम में आ गए। पहले कुछ वर्ष सुस्ताने के बाद अपने मिशन की शुरुआत के लिए उन्होंने धरती का सबसे विविध देश भारत चुना। कुछ असफल मिशन और कई सालों बाद एक मिशन की तैयारी करते हुए दोनों बात कर रहे थे।

कुच्चु – “पुच्चु यार पहले की तरह नहीं करना है, देश के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों को उठाना था तो तुम न्यूज़ साइट्स के भरोसे निर्मल बाबा, राखी सावंत, मीका सिंह, के.आर.के. को उठा लाये थे। फिर सबकी मेमोरी एडजस्ट करनी पड़ी थी, उनके दिमागों में इतना कचरा भरा था हमारे सिस्टम क्रैश होते-होते बचे।”

पुच्चु – “नहीं इस बार आलस नहीं होगा। कॉम्प्रिहेन्सिव विक्ट्री होगी इस बार! जय सोहनी महिवाल।”

कुच्चु – “सोहनी महिवाल? दुनिया का इतिहास कम देख, रोज़ अलग लव स्टोरी पढ़के डिप्रेस हो जाता है। रात में तकिये में मुंह घुसाये मीरा को छोड़ दो राणा जी, उसे कृष्णा में रम जाने दो, ज़हर मत पिलाओ…चिल्लाते हुए सुबक रहा था।”

तभी उनका यान चक्करघिन्नी बन जाता है। दोनों कंट्रोल्स सँभालने की कोशिश करते हैं पर तेज़ी से घूमते दिशाहीन यान में कुच्चु किचन में जा गिरता है और उसका मुँह ओवन में फँस जाता है, वहीं पुच्चु खोपड़े पर लगे आघात के बाद अचेत हो जाता है। सब सामान्य होने के बाद उन्हें अपने यान में एक घायल परग्रही मिलता है।

पुच्चु – “ऐ छी-छी सी शक्ल वाले भईया ! कौन हो तुम?”

परग्रही – “हाँ तेरी शक्ल बड़ी मिस यूनिवर्स वाली है! लोलू सिंह! सुनो मेरे पास ज़्यादा समय नहीं है। बड़ी ऊर्जा लगानी पड़ी तुम्हारे यान के अंदर आने में… “

कुच्चु – “तो कहीं भी घुस आओगे? हम नहीं दे रहे अपना समय उधार। जाओ आगे बढ़ो!”

परग्रही – “ऐसा ज़ोर का घुसंड मारूंगा कि षठकोण जैसे मुँह के आठों कोण पिचक जाएंगे।”

कुच्चु – ” षठकोण….उसमे तो 6 कोण होते हैं ना?”

परग्रही – “टेक्निकेलिटीज़ में ही मर जाना दोनों सरऊ! हमारे ग्रह पर 8 होते हैं। सुनो इस बार टोक मत देना, मर जाओगे। टोही यंत्रों से मुझे तुम दोनों के बारे में सब पता चल गया है। तुम्हारी बकवास भाषा भी यूँ चुटकी में सीख ली। मेरा नाम सोनपपड़ा है, मैं तुमसे कई प्रकाश वर्ष दूर डॉयबिटीज़ ग्रह से उसी काम के लिए आया था जो तुम दोनों कर रहे हो यानी पृथ्वी की रिसर्च फलाना। हम जैसे और भी कुछ परग्रही गुप्त अनुसंधान यान पृथ्वी के आस-पास अदृश्य घूम रहे हैं। मेरे शरीर पर बदला बम बंधा है, अगर फट गया तो यान और तुम दोनों का नामोनिशान नहीं मिलेगा। तुम्हे पृथ्वी पर जाकर मेरा एक बदला लेना होगा…”

पुच्चु – “भक! तुम किसी लाला के ज़ुल्म से पीड़ित हमारी बिछड़ी मम्मी हो जो तुम्हारे बिहाफ पर बदला लें?”

सोनपपड़ा ने एक हल्का ऊर्जा वार किया और पुच्चु के होंठ गलत प्लास्टिक सर्जरी के बाद सूजे होंठ जैसे हो गये।

सोनपपड़ा – “आया मज़ा? या और मस्त माहौल में जीना है?”

कुच्चु – “नहीं…नहीं अंकल जी! हम समझ गये। किस तरह का बदला लेना है आपको? आप घायल कैसे हो गये? लाइए आपके चरणों की चुम्मी ले लूँ…”

सोनपपड़ा खुश होते हुए बोला – “नहीं, इट्स ओके! मेरी परी जैसी गर्लफ्रेंड परिया को कुकिंग का बहुत शौक है। मेरे बर्थडे पर मुझे सरप्राइज़ देने के लिए उसने धरती से कुछ सामान बटोर कर आलू पकोड़े बनाये। मैं तो बाहर का सारा सामान यान के अनुसार चेक करके लाता था पर सरप्राइज के चक्कर में वो आलू उठा लायी। हमारे यान के मेटीरियल में पता नहीं क्या रिएक्शन हुआ और एक तेज़ धमाके में यान तहस-नहस हो गया। विशेष सूट के कारण धमाके की वेव में हम लोग तुरंत नहीं मरे पर घायल अंतरिक्ष में जा गिरे। बेचारी परिया तो पूरी चुड़ैलिया बन गयी, आलू को गाली देती हुई जाने कहाँ भाग गयी। इधर मेरे शरीर के मिनरल जा चुके हैं, मैं अब कुछ देर का मेहमान हूँ। उस से पहले मैंने अपने मन में बदला बम एक्टिवेट कर लिया है।”

पुच्चु – “किस से बदला? पृथ्वी से?”

सोनपपड़ा – “नहीं! आलू से बदला। ये तरल तुम किसी भी आलू की फसल पर डाल आओ। उस आलू के आंतरिक गुण के अनुसार इस तरल का एक चैन रिएक्शन शुरू होगा, जिसकी किरणों से धरती के सारे आलू लुप्त हो जायेंगे, चाहे उनके खेत एक-दूसरे से हज़ारो किलोमीटर्स दूर ही क्यों ना हों।”

कुच्चु – “…पर आलू जैसी महत्वपूर्ण फसल लुप्त होने से तो धरती का पारितंत्र (इकोसिस्टम) बिगड़ जायेगा? इस से तो पृथ्वी की कई प्रजातियों पर बुरा असर पड़ेगा, कुछ तो शायद लुप्त जाएं। पृथ्वी पर त्राहि-त्राहि मच जायेगी।”

सोनपपड़ा – “ये ब्रैकेट में इकोसिस्टम बताने की ज़रुरत नहीं थी, मुझे भी पता है पारितंत्र का मतलब और प्रजातियां लुप्त हों या चपातियां मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। बदला इज़ बदला! अगर नहीं माने तो बम फोड़ दूँगा। दोनों में से कोई एक जाओ यह तरल लेकर, अगर तुम्हारे आने से पहले मैं मर गया तो भी बम फूट जाएगा और ऑबवियस्ली तुम्हारा साथी, यान स्पेस डस्ट बन जायेंगे। जब तक तुम मुझे नष्ट हुए आलू के सैंपल नहीं लाकर दिखाते तब तक मुझे चैन नहीं मिलेगा। मेरे मन की तसल्ली ही इस बम को डिफ्यूज कर सकती है।”

पुच्चु और कुच्चु धर्मसंकट में फँस गये। यह एक काम करने से उनके कई आगामी मिशन बर्बाद हो सकते थे। दोनों मन ही मन अपने आलस्य को कोस रहे थे कि अगर मेहनत से काम किया होता तो अबतक कितने मिशन, अनुसंधान आदि पूरे हो चुके होते। टिक टिक गुज़रते समय के बीच, दिल पर पत्थर रखकर और पुच्चु को पुच्ची देकर कुच्चु पृथ्वी की ओर कूच कर गया। जल्द ही वह आधे गुलगुले, आधे राख हो चुके आलू के सैंपल लाया, जिन्हे वह एक भारतीय खेत में तरल डालने के बाद लाया था। नष्ट हुए आलू को देखकर सोनपपड़ा के दिल को करार आया और वह परिया को याद करते हुए हमेशा की निन्नी सो गया।

पुच्चु – “माफ़ करना भाई! मेरी जान बचाने के लिए तुम्हे आलू ख़त्म करने पड़े। श्री अक्षय कुमार जी की कोट ख़राब कर दी कि जब तक रहेगा समोसे में आलू… “

कुच्चु – “अबे रिलैक्स! कुछ नहीं हुआ। इसकी आड़ में हमारा एक मिशन और पूरा हो गया। इस सोहनहलवे का दिया तरल मैं एक भारतीय प्रयोगशाला के खेत में डाल कर आया हूँ। वहाँ जेनेटिकली मॉडिफाइड आलू (आनुवांशिक रूप से रूपांतरित फसल) उग रहे थे। उस खेत में एक लुप्तप्राय बैक्टीरिया और आलू के अंश से बड़े आलू उगाने पर टेस्ट चल रहा था। अब उस तरल से निकली किरणों से सिर्फ उस खेत और 2-3 जगह उस जैसे आंतरिक गुण लिए मॉडिफाइड आलू ही लुप्त हुए बाकी सारी पृथ्वी के आलू बच गए क्योकि सिर्फ उस खेत के आलूओं के गुणों के अनुसार बनी तरल की घातक किरणे बाकी आलू की फसल को पकड़ ही नहीं पाई।”

पुच्चु – “वाह भाई! आज तूने मेरी जान, हमारे भौजीकसम ग्रह की लाज और पृथ्वी बचा ली। आज से दोनों टाइम का खाना मैं बनाऊँगा…
…एक हफ्ते तक।”

समाप्त!
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मवाली भूत (कहानी) #trendster

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गिरधारी बाबा ऊपरी संकट, भूत-प्रेत-चुड़ैल भगाने में पारंगत थे। एक सुनसान रात बाबा भारी ज्वर से पीड़ित अपने आश्रम के बाहर पड़े होते हैं और कई भूत, चुड़ैल और प्रेत उन्हें घेर लेते हैं। बुखार मे तप रहे बाबा कराहते हुए कहते हैं – “चीटिंग! अब इस हालत में बदला लोगे तुम लोग?”
भूत दल के मुखिया – “ओहोहोहो…देखो बहुरानी आदर्श-उसूलों की बात कर रहीं हैं! तब ये बातें कहाँ होती हैं जब हमारा ध्यान बँटाकर हमे झाड़ू-चिमटे पेले जाते हैं? भगवान की आड़ लेकर मंत्र फूंके जाते हैं? हमारा भी तब ऐसा ही हाल होता है। खैर, हम बदला-वदला लेने नहीं आये हैं, हफ्ता लेने आये हैं।”

गिरधारी बाबा – “हफ्ता?”

मुखिया भूत – “हाँ! हमारे नाम पर इतना पैसा कमाते हो, तुम और तुम्हारे शिष्य ऐश से रहते हैं। कुछ हमारा भी बनता है ना?”

गिरधारी बाबा – “वो सब तो ठीक है पर तुम लोग पैसों का क्या करोगे? छी-छी-छी मर गए पर लालच नहीं गया…”

यह बात सुनकर भूतों ने गुस्से में गिरधारी बाबा को खाट से गिरा दिया और अच्छे से धूल-कीचड में मेरिनेट किया।

मुखिया भूत – “आया मज़ा या और करें…वो पैसा हमे अपने जीवित सगे-संबंधियों, मित्रों की मदद के लिए चाहिए। जिन्हें बहुत ज़रुरत है सिर्फ उनतक पैसा पहुंचाना होगा। तुम्हारे यहाँ जो नए पीड़ित आएंगे उनपर लगी आत्माओं से निपटने में हम मदद करेंगे।”

गिरधारी बाबा – “अगर मैं ना कर दूँ तो…”

मुखिया भूत – “अबे! कोई अंगारों पे थोड़े ही नचवा रहें है तुझे। ज़रा सा हफ्ता ही तो मांगा है। मना करोगे तो हम तुम्हारे काम में निरंतर विघ्न-बाधा डालते रहेंगे। एक हफ्ते मे जो 25-30 केस निपटाते हो वो 5-7 रह जाएंगे। तुम्हारी ही इनकम और गुडविल कम होगी…सोच लो?”

समाप्त!

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– मोहित शर्मा ज़हन

भूतनी बीवी (कहानी) – मोहित शर्मा ज़हन

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गर्मी और उमस से परेशान क्षितिज छत पर टहल रहा था तभी एक आवाज़ से वह ठिठका, जैसे किसी ने उसका नाम लिया हो। मन का वहम मान कर वह मुड़ा तो “हू!” उसकी पत्नी राधिका हँस रही थी। क्षितिज की घिग्घी बंध गई, राधिका को मरे 4 महीने हो गए थे। डर के मारे क्षितिज की लो फ्रीक्वेंसी चीख निकली जो इंसान तो नहीं पर शायद चमगादड़ सुन सकते थे। हँसते-हँसते पागल राधिका की आत्मा इस मोमेंट को भी एन्जॉय कर रही थी। फिर उसने क्षितिज को समझाया।

“डरो मत तुमसे मिलने आई हूँ बस, कुछ नहीं करुँगी।” क्षितिज ने खुद को सम्भाला, आत्मा होते हुए भी राधिका के चेहरे की वजह से डर की जगह उसके मन में पुरानी यादें चलने लगी।

क्षितिज – “क्या करती हो यार? अभी यहीं पजामे में ही सू-सू कर देता मैं! मुझे लगा तुम्हारा अकेले मन नहीं लग रहा तो मुझे मारने आई होगी।”

राधिका – “हा हा हा….तुम्हारा चेहरा देख कर इतनी हँसी आई कि मन तो था थोड़ा कायदे से डराऊं तुम्हे। फिर सोचा कहीं फ्री फण्ड में हार्ट अटैक न आ जाए।”

क्षितिज बोला – “…और यह बताओ तुम्हे हू करने की क्या ज़रुरत है तुम तो पहले से ही…“

कुछ देर ख़ामोशी में दोनों एक-दूसरे को देखते रहे जैसे आँखों को भी बातें करने का मौका दे रहें हों, फिर राधिका बोली। “बस तुम्हे देखने आई थी, दूर से देखकर जा रही थी पर मन नहीं माना। बस एक चीज़ देखने की इच्छा है, नहीं तो मेरी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी।”

क्षितिज आतुर होकर बोला – “क्या? जो बोलो वो लाकर दूँ, क्या करूँ?”

राधिका – “वो जो शॉर्ट्स में तुम चिकनी चमेली और बेबी डॉल में सोने की मैशअप पर डांस करते थे प्लीज वो दिखा दो….प्लीज प्लीज प्लीज!”

क्षितिज – “सत्यानाश जाए तेरा करमजली चुड़ैल! हे भगवान….किसी को भेजो इसको ऊपर लाने के लिए।”

फिर क्षितिज ने शॉर्ट्स में इन आइटम सांग्स पर अपने अंदाज़ मे डांस किया और राधिका के ठहाके गूंजने लगे। जब गाने ख़त्म हुए तब नम हुयी आँखों को क्षितिज ने पोंछा पर अब राधिका वहां नहीं थी।

समाप्त!
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दुग्गी ऑफ़ ऑल ट्रेड्स

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नमस्ते! 🙂 अक्सर किसी क्षेत्र में सफल या अच्छी जगह पहुंचे लोगो को किस्मत को कोसते, कहते देखता हूँ कि हम यहाँ तो सफल हैं पर इस चक्कर में जिस दूसरे क्षेत्र में भी रूचि थी उसमे कुछ न कर पाने या कम कर पाने का मलाल है। मतलब आपको विराट कोहली भी बनना है और सुनीता विलियम्स भी? या मोहम्मद अली तो बनेंगे ही पर साथ में नेताजी बोस वाला तमगा भी चाहिए? एक जगह समय दिया, मेहनत की तो फल भी उसी में मिलना चाहिए न? आपका ऐसा बोलना इन क्षेत्रों में कर्म की तपस्या से सफल हुए, अपना पूरा जीवन एक दिशा में लगा चुके लोगो का अपमान है। अंधो में काणा राजा होना और वाकई में विलक्षण प्रतिभा होना दो अलग बातें है। जैसे संभव है आप अपने परिवार और दोस्तों के बीच सबसे अच्छी स्केचिंग करते हों पर असल दुनिया में जिन्हे पेशेवर कहा जाता है वो लोग वर्षो-दशकों तक दिन पर दिन, तिल-तिल संघर्ष कर अपना हुनर निखारते हैं, तो अपने गाहे-बगाहे के काम पर ज़बरदस्ती की आहें न भरें।

अब या तो आप अरबों में एक हों और जन्मजात एक से अधिक क्षेत्रों में ख्याति पाने लायक हों (ज़्यादा खुश न हों अरबों में एक लिखा है…. चले गुलाबी मोर बनने :p) या आपने वाकई अपने मुख्य क्षेत्र के साथ-साथ अन्य क्षेत्रो में कई वर्षों या दशकों तक काम किया हो तब सोचा जा सकता है। उदाहरण के लिए किसी रचनाकार का यह कहना कि भगवान् ने इतना दिमाग दिया है, मैं चाहता तो ये आई.टी., कोडिंग फलाना क्या मुश्किल था मेरे लिए? क्या भैया? किसी की स्किल, कला, प्रतिभा का सम्मान करना इतना मुश्किल भी नहीं है! भाग्य, परिस्थिति और रूचि के चक्कर से अगर वह आपकी तरह किसी कलात्मक क्षेत्र में होता तो आपका डीम्ड पापा/मम्मी होता। आपके क्लोज सर्किल में लोगो ने तारीफ कर दी तो आप तो दिल पर ही ले बैठे। यह वेरीफाई ज़रूर करें कि आप मास्टर ऑफ़ ऑल ट्रेड्स हैं की जगह दुग्गी ऑफ़ ऑल ट्रेड्स तो नहीं हैं? ऐसा करने से आप खुद को कमाल आर. खान या वो एक्टर-डायरेक्टर-सिंगर-वाइब्रेटर बाबा जैसो की राह पर चलने से रोक सकते हैं।

इस स्थिति में एक अपवाद है अगर कोई अन्य विधा, स्किल आपके क्षेत्र से जुडी हो तो समय के साथ आप उसमे अच्छे हो सकते हैं। जैसे एक लेखक के लिए समीक्षक होना, किसी खेल के पूर्व खिलाडी के लिए उस खेल का कोच या रेफरी बन जाना थोड़ा आसान होता है। हालांकि, इस बदलाव के भी अच्छे होने की गारंटी नहीं है। जीवन में आपने जो राह चुनी है, जो निर्णय लिए हैं, उनकी अच्छी-बुरी बातें स्वीकार करें। साथ ही अपने चुनाव, निर्णय के सही होने पर जैसे कूद कर पूरा श्रेय आप लेते हैं उसी तरह गलत होने पर वैसे ही कूद कर नहीं आ सकते कोई बात नहीं पर, ज़िम्मेदारी लेने से न बचें। परिवार या अन्य किसी व्यक्ति, बात पर दोष डालना उचित नहीं क्योकि आप कोई 7 साल के बच्चे नहीं हैं!

– मोहित शर्मा ज़हन

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Event news (March 2016)

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Amazing event!

बाइनरी मम्मी (लघुकथा) – लेखक मोहित शर्मा ज़हन

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नेत्र रोग डॉक्टर के पास, अपने 5 वर्ष के बच्चे के साथ चिंतित माँ-बाप बैठे थे।

माँ – “सीनू के पापा को मोटे वाला डबल-लेंस चश्मा लगा था तो इसे भी चश्मा ना लगे इसलिए नियमित गाजर का जूस, विटामिन और सारे घरेलु नुस्खे करती थी। फिर भी पता नहीं कैसे इसे इतनी कम उम्र में ही धुंधला दिखने लगा?”

डॉक्टर – “बच्चे को ज़रुरत से अधिक विटामिन A देने की वजह से उसे हाइपरविटामिनोसिस-ए विकार हो गया है। जिस से उसका लिवर, हड्डियां कमज़ोर हो गयी हैं और उसकी दृष्टि पर असर पड़ा है।”

महिला का पति सोचने लगा कि घर के अन्य सदस्यों में भी उसकी पत्नी ने किसी न किसी विटामिन का हाइपरविटामिनोसिस करवा रखा होगा। एक बार खुद पत्नी को किसी ने अनीमिया के लक्षण बता दिए, तबसे अब तक पता नहीं देश का कितना लोखंड खा चुकी होगी। तभी महिला की आवाज़ से उसका ध्यान टूटा।

“आज से गाजर का जूस बंद!”

समाप्त!

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Art – Shivani Ramaiah
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नवीन रंजिश – मोहित शर्मा (ज़हन) #mohit_trendster

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यह कहानी है दो खानदानों के बीच पीढ़ियों से चली आ रही रंजिश की, जिसका अंत देखने सुनने वालो को असंभव लगता था। बदले ज़माने के नये परिवेश में भी राणा और वर्मा परिवारों की दुश्मनी बरकरार थी, और होती भी क्यों ना? इनके पुरखों ने ना जाने कितनी आहुतियाँ दे डाली थी अब तक इन झगड़ों में। सीधे ढर्रे पर चलते जीवन में जैसे सुर्ख रंग की मिलावट की आदत पड़ गयी थी इन्हे।
आज बरसो बाद एक बार फिर से दोनों परिवार आमने सामने थे। क्या पुरुष – क्या महिला, सबकी आँखों में बरसों का रोष झलक रहा था। एक तरफ वर्मा परिवार के मुखिया भानु वर्मा, जिन्हे अपनी पीएचडी डिग्री का गुमान और दूसरी तरफ राणा परिवार के सर्वेसर्वा संग्राम राणा जिन्होंने अपने पुरखों की शान में अपनी मूँछे नहीं कटाई। पर यह ऊपरी आडम्बर किसकी तसल्ली के लिए गढ़े जा रहे थे इसका जवाब किसी के पास नहीं था?
क्या इतिहास खुद को आज दोहराने वाला था? तो क्या कहानी का एक और पन्ना खून के रंग में रंगने वाला था? जानते हैं भानु वर्मा की शान, उनके अनुज बलिदान वर्मा कि ज़ुबानी।
“अरे कुछ ना हुआ भैया जी….मैं पहले ही कह रहा था कि बात सुलटा लो पर दोनों तरफ इतने कलमुँहे, कुल्टा लोग भरे पड़े है कि नहीं जी चाहे मकान-दुकान चले जायें पर आन-बान-शान ना चली जाये। और सब लड़ने को तैयार, मेरी भी मती मारी गयी थी जो जोश में आकर अपने भईया से भी आगे कूद के आगे आ गया। वही बात है कि जब एड्रिनलिन पम्प करता है तो आदमी जम्प करता है। तेज़ बहस, ललकारों को सुनकर मुफ्त की लड़ाई देखने की आस में भीड़ इखट्टा हो गयी, जिनको देखकर पास के स्कूल से हटकर चूरन-चाट वालो ने हमारे आस-पास ठेले लगा लिए। दोनों साइड जो कुछ एक लड़ना नहीं चाह रहे थे उन्हें लगा कि इतनी भीड़ और ठेले लग गये है उन्हें निराश घर नहीं भेजना चाहिए।
जंग का आगाज़ हुआ और……आई मम्मी इतनी ज़ोर का सरिया लगा ना मेरे खोपड़े पे कि डेढ़ सेकंड में गिव-अप कर दिया मैंने और चुस्की वाले की रेहड़ी की टेक लेके बैठ गया। लड़ाई शुरू होती इस से पहले ही गली के अपार्टमेंट की एक बालकनी जहाँ पूरी नवीन किराना स्टोर जॉइंट फैमिली संडे मूवी का प्लान कैंसल कर के हमारे युद्ध के एंटरटेनमेंट से अपने पैसे बचाने के मूड में थी, छज्जे समेत हम सबके ऊपर डह गयी।
संग्राम राणा परं ईंटो की बरसात हो गयी, जिसमे से एक ईंट ने घिसट कर उसकी मूँछ को नेस्तोनाबूद कर दिया। मेरे बड़े भ्राता भानु के खोपड़े पर नवीन किराना वालो कि नववधु का घुटना ऐसा लगा कि वह पीएचडी डॉक्टर से सीधा सातवी कक्षा वाले हो गए। ऊपर किसी कि गंदी नाली का पाइप चोक था वो टूटकर हमारी बहु-बेटियों का मेकअप धो गया।
किसकी टांग कौनसी है, किसकी कोहनी किसके पेट में चुभ रही है….कुछ पता नहीं। दुश्मनो के जो मुँह एक दूसरे को देखना तक पसंद नहीं करते थे वो मलबे के नीचे कामुक मुद्राओं दबे अनचाहे आपस में कहाँ-कहाँ चुंबन ले रहे थे। ताऊ जी जो मिलने आये थे और मज़े-मज़े में साथ आ गए और नवीन किराने वालो के कुत्ते के मुँह इस तरह मलबे में आमने-सामने पोज़ीशण्ड थे कि मदद आने तक कुत्ते से मुँह चटवाने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं था। ये जो रायता फैला इसके साफ़ होने के बाद पता चला दोनों पार्टीज की नानीयां, दादियां टकली हो गयी है। फिर किसी ने बताया की बुढ़िया के बाल वाले के कस्टमर ज़्यादा हो गए थे इसलिए उसने…..”
अंत में अस्पताल में ही सुलह हुई और दोनों परिवारो को यह बात समझ आई कि पुरानी रंजिशों को चलाते रहने में समझदारी नहीं है। अब दोनों परिवारो कि नयी रंजिश शुरू हुयी……नवीन किराना स्टोर फैमिली से।
– मोहित शर्मा (ज़हन) #mohitness #mohit_trendster #freelance_talents

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