Dushman (Anti-Body) Short film – Original Sequence, Behind the Scenes…etc

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कल पुणे के थीएट्रिकस ग्रुप द्वारा एलियन हैंड सिंड्रोम नामक मानसिक विकार (जिसमे व्यक्ति का एक हाथ कभी-कभी उसके नियंत्रण से बाहर होकर अपनी मर्ज़ी से हिलने-डुलने लगता है, चीज़ें पकड़ने लगता है और कुछ मामलों में लोगो पर या स्वयं पीड़ित पर हमला करता है) पर मेरी लिखी कहानी-स्क्रिप्ट पर ‘दुश्मन (एंटी-बॉडी)’ नामक शॉर्ट फिल्म बनायीं।

Dushman (Vimeo)

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जिसके लिए मुझे अबतक अच्छी प्रतिक्रियाएं ज़्यादा मिली हैं। टीम ने उम्मीद से अच्छा काम किया है। वैसे फिल्म को मैंने एक लड़की किरदार के हिसाब से लिखा था पर कास्टिंग में समस्या होने की वजह से स्क्रिप्ट बदलनी पड़ी और तुफ़ैल ने मुख्य भूमिका निभाई। इस फिल्म को फाइनैंस मैंने किया था और फिल्म बनते समय कुछ दृश्य कम बजट की वजह से हटाने पड़े। पुणे से इतनी दूर सिर्फ इंटरनेट के माध्यम से कोलैबोरेशन करने की वजह से कुछ बातें खासकर मेडिकल, साइंटिफिक कोण फिल्म में मंद पड़ गए या हो नहीं पाये। ओवरआल जितना अच्छा किया जा सकता था उतना हो नहीं पाया, जिसकी ज़िम्मेदारी मैं लेता हूँ। शायद इसलिए कि इस जटिल आईडिया को कार्यान्वित करने में कई बातों का ध्यान रखते हुए बहुत सावधानी बरतनी थी। वैसे ऐसा मेरे साथ पहले कई बार हुआ है पर तब सोचा गया आईडिया और फाइनल रिजल्ट में अंतर कम या काम चलाऊ होता था। चलिए इस बहाने कई बातें सीखी इस दौरान। सबसे बड़ी बात यह की अगर आप कहीं मौजूद नहीं हो सकते तो जटिल कहानियां, सीन को इस तरह प्रेषित करें कि वह आसान लगे करने वालो को, किरदार कर रहे लोग कनेक्ट करें। साथ ही किसी भी माध्यम के कलाकारों चाहे वो चित्रकार हो, ग्राफ़िक डिज़ाइनर हो, अभिनेता हो या और कोई रचनाकार हो…माध्यम में उनके सकारात्मक पहलुओं और कमियों के हिसाब से आईडिया या कहानी की नींव रखनी चाहिए। इसे मेरी सफाई मत समझिए बस कभी आगे भूल जाऊं इसलिए सबकी मदद के लिए, एक रिफरेन्स की तरह, सबसे शेयर करना चाहता था। यहाँ जो सोचा था इस फिल्म को बनाने से पहले उसके मुख्य अंश लिख रहा हूँ।

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1. Story Plot

सोनल को ग्रेजुएशन के बाद नौकरी मिलती है और वह उत्साह के साथ कंपनी ज्वाइन करती है। अपनी मिलनसार, jolly-chirpy नेचर की वजह से वह सबसे घुल – मिल जाती है। कुछ महीनो बाद एक एक्सीडेंट (सीढ़ियों से गिरकर / रोड एक्सीडेंट) में उसके सर पर चोट लगती है जिसके बाद से उसके अंदर धीरे-धीरे “Alien Hand Syndrome” के लक्षण दिखने लगते है। शुरू में पब्लिक प्लेसेस पर राइट हैंड में झटके से लगना, लोगो के सर या कमर पर हलके से मारना फिर स्थिति बिगड़ना – एक हाथ द्वारा उल्टा-सीधा मेकअप कर देना, स्ट्रीट मार्किट में कोई चीज़ उठा लेना जो उसे नहीं चाहिए: दुकानदार के पूछने पर मना करना पर उस चीज़ को ना छोड़ना फिर दुकानदार से लड़ाई / बहस, colleague-boss को पीटना और फिर बिना उसकी बात सुने पागल, चुड़ैल आदि संज्ञा देकर उसे नौकरी से निकाला जाना  etc . इस सब के दौरान उसकी दोस्त तान्या हमेशा उसके साथ रहती है।

नौकरी जाने के साथ-साथ इस डिसऑर्डर की वजह से उसका ब्रेकअप भी हो जाता है। परेशान होकर उसे अपना राइट हैंड काटने के अलावा कोई चारा नहीं दिखता, वो अपना हाथ काट लेती है, उसकी लाइफ दोबारा सामान्य हो जाती है। पर थोड़े दिन बाद एक रात वो साँस रुक जाने से जागती है और देखती है की उसके लेफ्ट हैंड ने उसका गला पकड़ रखा है।

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2. एलियन हैंड सिंड्रोम (मेकअप सीन)

सोनल को ऑफिस लौटने की जल्दी थी। आखिर नयी जॉब में कुछ दिनों बाद ही लंबी छुट्टी लेना कहाँ जमता है। वजह चाहे जायज़ भी हो पर अंजान शहर में खुद को साबित करने की राह शुरू करते ही स्पीडब्रेकर आत्मविश्वास डिगा देता है। अब एक्सीडेंट के बाद से सर में होने वाला दर्द काफी कम हो गया था। उसने बॉस और साथियों को बता दिया था कि वह आज से ऑफिस आएगी। अकेले रहने का यह फायदा भी था कि सोनल की एक हॉबी मेकअप तसल्ली से होता है। मस्कारा, नेल आर्ट, फाउंडेशन, हेयर स्ट्रीक सब में मास्टरी, खुद पर इतने प्रयोग जो किये थे बचपन से अबतक। नहीं तो कसबे के छोटे घर में कभी मम्मी झाँक के देख रही हैं, कभी पापा फाइल उठाने या जूते का रैक झाड़ने आ गए, एक कमांडो की तरह लाइट मेकअप करना पड़ता था।

अचानक सोनल को दाएं हाथ में एक झटका लगा। शायद नस फड़की होगी सोच कर सोनल वापस अपनी हॉबी में तल्लीन हो गयी। तभी उसका उसकी मर्ज़ी के बिना हाथ मस्कारा उठाकर उसकी आँखों के चारो तरफ गोले बनाने लगा। सोनल की डर से घिग्घी बन्ध गयी।

“ये हो क्या रहा है? कहीं मुझमे कोई भूत-चुड़ैल तो नहीं आ गया? नहीं….नहीं मुझे ऑफिस जाना है। शायद नींद में हूँ!”

सोनल ने मस्कारा के निशान साफ़ करने के लिए हाथ बढ़ाया तो दांया हाथ ड्रेसिंग टेबल पर पड़े मेकअप के सामान पर झपट पड़ा और दहाड़ें मारती सोनल पर अलग-अलग आकृतियां बनाने लगा। कुछ देर बाद जब वह हाथ रुका और सोनल के आया तब तक सोनल थक कर निढाल हो चुकी थी। सर में फिर से दर्द शुरू हो गया था, शीशे के सामने मेकअप से वीभत्स हुआ चेहरा देख वह बेहोश होकर सीधे शीशे पर गिरी। जब होश आया तो सोनल ने खुद को संभाल कर ऑफिस फ़ोन किया कि वह आज नहीं आ सकती।

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3. Basic Scene/Sequence Break 

सीन 1 (short scene)

सोनल (फ़ोन पर) – “डैड! मुझे नौकरी मिल गयी। अपने बैच में सबसे पहले। आप चिंता मत करो मेरे साथ यहाँ तानिया है।”

सीन 2 (short scene)

सोनल अपने ऑफिस में बॉस और कलीग्स से formally मिलती हुयी।

सीन 3 (split)

सोनल सीढ़ियों से गिरती है या उसकी स्कूटी का एक्सीडेंट होता है (अगर ज़्यादा रिस्क है तो symbolic दिखा दें।) उसके सिर में चोट लगती है। Head Injury क़े लिये bandage दिखायें। तानिया एक कमरे में उसके पास बैठी है।

तानिया – “सब ठीक हो जायेगा सोनल, तू बहुत स्ट्रांग है।”

सीन 4 (split)

*) – इसके बाद सोनल रिकवर करती है पर वह धीरे-धीरे एलियन हैंड सिंड्रोम के लक्षण दिखाने लगी।

i) – Doing makeup and one of her hands making bizarre figures on her face from maskara, powder etc.

अपने बिगड़े हुए चेहरे के साथ सोनल रोते हुए ऑफिस फोन कर रही है – “आज मैं ऑफिस नहीं आ पाऊँगी।”

ii) – . Alien Hand grabbing articles from street market and surprised vendor.

वेंडर – “मैडम पर्स चाहिए तो बोलो, ऐसे हैंडल टूट जाएगा।”

सोनल – “नहीं!!! मुझे यह पर्स नहीं चाहिए। (बड़ी मुश्किल से सोनल पर्स नीचे रखती है)

सोनल अब एक बेल्ट खींचने लगती है।

वेंडर – “मैडम या तो तुम पागल है या चोर, जो भी हो यहाँ से निकलो नहीं तो constable को बुलाऊंगा।”

सोनल – “मै चोर नहीं हूँ…कितने की है ये बेल्ट, कितने का पर्स है, ला दे। पागल नहीं हूँ!”

सीन 5

 Sonal beating a colleague and when her boss interferes she beats him, Embarrassed Sonal is fired from her job. (People calling her crazy not believing her rare disorder)

Colleague 1 (साहिल) – “सोनल तुम्हे सर ने clients की जो लिस्ट दी थी वो मुझे चाहिए।”

सोनल उसके बाल पकड़ कर पीटने लगती है।

साहिल – “अरे…..क्या मज़ाक है यह? छोडो मुझे। “

Colleague 2 (Rahul) – “सोनल छोडो साहिल को, ये तुम्हारा college नहीं है। “

बॉस आता है।

बॉस – “सोनल क्या हुआ? साहिल ने कुछ किया क्या तुम्हारे साथ? डरो मत मुझे बताओ!”

सोनल – “यह मैं नहीं… सर सॉरी but मैं तो… “

सोनल का हाथ साहिल को छोड़ कर उसके boss को मारने लगता है।

साहिल – “पागल… पागल है यह लड़की।”

बॉस – “सोनल अभी के अभी यहाँ से निकलो। तुमने जितने दिन का काम किया है उतने पैसे तुम्हारे अकाउंट में आ जाएंगे। यू आर फायर्ड!”

सीन 6 (Short)

Her Boyfriend breaking up with her (on phone only)

सीन 7

 आख़िरकार परेशान होकर उसने अपना हाथ काट दिया।

(Dark Circles under her eyes, वो अपने हाथ को पकड़ कर उसे डाँट रही है उसपर चिल्ला रही है। जवाब में उसका हाथ उसे मार रहा है, बाल खींच रहा है। परेशान होकर वह अपना हाथ काट लेती है। हाथ काटने के बाद उसे पकड़ कर सोनल चिल्लाती है – “अब मार मुझे, मार। अपनी मर्ज़ी से हिल। ” (पीछे चीखती हुयी तानिया – “यह क्या कर दिया सोनल!”

सीन 8

 (After few weeks) लाइफ फिर से नार्मल हुयी।

सोनल (तानिया से) – हाँ, डिसेबल्ड quota में एक गवर्नमेंट बैंक में क्लर्क कि जॉब है। फैमिली की बहुत expectations है, ऐसे सब ख़त्म नहीं हो सकता। मैं कल ऑफिस ज्वाइन करुँगी।

तानिया – “You are a fighter, इतना सब होने के बाद भी तुमने हिम्मत नहीं हारी। I am proud of you!”

सीन 9

 फिर उस रात वो उठती है और देखती है उसके दूसरे हाथ ने उसका गला पकड़ रखा है।

The End!

मोहित शर्मा ज़हन
 
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महत्वपूर्ण मैत्री – मोहित ट्रेंडस्टर

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अपनी आँखों से थोड़ा दूर अपनी हथेली ऐसे लाएं की वो आपकी दृष्टि का बड़ा हिस्सा बाधित कर दे, कुछ क्षणों में आप पायेंगे कि आपकी आँखों ने उस बाधा के होते हुए भी आस-पास और आगे देखने की आदत बना ली है। जीवन में मित्रता का महत्व हम देखते-सुनते ही रहते है पर कुछ बातें इतनी प्रत्यक्ष होती है हमारे सामने कि व्यस्त दिनचर्या के चलते उनकी भूमिका हम सभी अनदेखी कर दिया करते है। संगती के प्रभाव पर यह तक कहा गया है कि मनुष्य का व्यक्तित्व मुख्यतः अपने करीबी 5-7 लोगो का मिश्रण होता है जिनके साथ वह सबसे अधिक समय व्यतीत करता है। ऑनलाइन मैत्री ने ऐसी परिभाषाओं और समीकरणों को बदला ज़रूर है पर बात की महत्ता अब भी कम नहीं हुयी है। हाँ, अब उन करीबी लोगो में यांत्रिक उपकरण और उनकी दुनिया भी शामिल हो गयी है।

मानव अपने पूर्वज बंदर कि भांति किसी की सीधी नक़ल तो नहीं करता पर अवचेतन मस्तिष्क में किसको देखा, किस से सीखा, क्या अनुभव हुए की खिचड़ी बन जाती है और हम अनजाने में अपने मित्रों, परिवार जन और सहकर्मियों के अच्छे-बुरे गुण, हाव-भाव, बोली पकड़ते चलते है जिससे अपने व्यक्तित्व में कई बदलाव आते है। एक बड़ा और करीबी दोस्तों का दल अत्यंत आवश्यक है बच्चो एवम किशोरों के लिए, क्योकि बड़े दल की विविधता हर तरह से एक बच्चे का दायरा बढ़ाती है और जीवन को देखने के नज़रिये में संतुलन प्रदान करती है। मैंने अपने स्कूल, कॉलेज, लेखन तथा कार्यक्षेत्र के मित्रों से अनेको बातें, सबक सीखें है। किसी की दशमलव प्रतिशत में किसी की दहाई प्रतिशत में मेरे जीवन पर पड़ी छाप अब मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा है। अलग-अलग कारकों से किन्ही दो व्यक्तियों के जीवन पर उनके निकट दोस्तों का असर समान नहीं होता पर यह निश्चित है की ऑनलाइन या आमने-सामने आपकी दिनचर्या में अच्छे मित्र आपके जीवन पर बड़ा सकारात्मक प्रभाव छोड़ेंगे और बुरे मित्रों से कई अनचाही बातें आपको तब तक घेरें रहेंगी जब तक आप उनके साथ रहने के आदि होकर जीवन में कई समझौते नहीं कर लेते। “अच्छे” से मतलब आपके लक्ष्य, जीवन की दिशा में प्रेरणा देने वाले। अगर आप टाइप ए या टाइप बी केटेगरी में फसें हों तो सही मित्र आपको दोनों पर्सनालिटी वर्गीकरण का बढ़िया मिश्रण प्रदान कर सकता/सकते है। यहाँ यह भी विचारणीय है कि आप कितने लोगो के जीवन को प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से किन दिशाओं में प्रभावित कर रहे है, कितने लोग आपको अपना अच्छा मित्र मानते है। यहाँ परोक्ष अधिक महत्व लिए है क्योकि कम समय में आपको अपने जीवन पर ध्यान देना है इसलिए कइयों के करीबी होने में आपका समय बहुत व्यय होगा।

– मोहित शर्मा (ज़हन) #mohitness #mohit_trendster #trendybaba #freelance_talents

भूरा हीरो बनाम ग्रीक गॉड – मोहित शर्मा (ज़हन)

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उम्र बढ़ने के साथ हम जीवन के विभिन्न पहलुओं में सामाजिक ढाँचे के अनुसार ढलते है और कभी-कभी ढाले जाते है। जैसे किसी देश में अगर मनोरंजन के किसी साधन या स्रोत पर पाबंदी है या प्रोत्साहन है वहाँ जनता की पसंद-टेस्ट उस अनुसार ढल जायेगी, यहाँ तक कि सामाजिक परिदृश्य को देखने में भी वैसा ही चश्मा पहना जाने लगेगा। दुनिया भर के मनोरंजन स्रोत देखने पर आप पाएंगे कि हर जगह कितना दूषितवर्गीकरण व्याप्त है साथ ही पश्चिमी देशो के गोरे वर्ण के लोगो को इतना अधिक इस तरह प्रोजेक्ट किया जाता है कि दुनिया में मानवजाति के वह सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। धीरे-धीरे समय के साथ हम बाकी किस्म के लोगो में भी वो मनोरंजन के साधन देखते-देखते यह बात और भावना घर कर जाती है। एक निश्चित सीमा और प्रारूप (format) के आदि हो जाने के कारण अगर उस से अलग या नया कुछ होता है तो कई लोग उसे सिरे से नकार देते है।

बाहुबली मेरे कुछ जानने वालो को सिर्फ इसलिए पसंद नहीं आई क्योकि ऐसे एक्शन और स्टोरीलाइन में वो गोरे रंग के ग्रीक गॉड मॉडल जैसे हीरोज़ को देखते आये है और यह दक्षिण भारतीय नायक प्रभास उन्हें जमा नहीं। यह नायक उन्हें किसी बॉलीवुड या स्थानीय मसाला फॉर्मेट में ही जमता। ऐसा शायद इस फिल्म के समापन भाग में अभिनेत्री अनुष्का शेट्टी को भी सुनने को मिले जो तब युवा अवस्था के किरदार में दिखेंगी। क्या इतना कड़ा है यह फॉर्मेट की आदत पड़ जाने का बंधन जो हम सौइयों अन्य बातों को भूलकर सिर्फ वर्ण या स्थान का रोना रोने बैठ जाएँ? मेहनत और प्रयोगो को सराहना सीखें क्योकि दुनिया के आगे बढ़ने में इन दोनों बातों का महत्वपूर्ण योगदान है। किसी ने टोका कि यह तो लोमड़ी के अंगूर खट्टे वाली बात हो गयी, भारत में ऐसे लोग मिलेंगे ही नहीं जो फॉर्मेट में फिट बैठे तो उन्हें बता दूँ कि भारत आपकी सोच से कहीं अधिक विशाल है, रैंडम देश के 15 – 20 शहरों का दौरा करें आपको हर तरह के प्रारूप के अनेको लोग मिल जायेंगे।

एक सम्बंधित एक्सट्रीम उदाहरण और उसका परिणाम भी बताना चाहूंगा, पाकिस्तान और बांग्लादेश के अलग होने के पीछे भी यह भावना थी। वही भावना कि वह हमारे जैसे नहीं है तो हम में से एक कैसे होंगे? पाकिस्तानी नेतृत्व, भारत के दूसरी तरफ बसे अपने बंगाली भाग के नागरिको से दोयम दर्जे सा व्यवहार करता था (दोनों रीजन्स के विकास में बहुत अंतर था) और उनका मखौल सा उड़ाता था (regional, ethnic ego) जिस वजह से दोनों स्थानो में दरार बढ़ती चली गयी और बांग्लादेश अलग हुआ। अलग बातों, चीज़ों, लोगो के प्रति लचीला रवैया अपनाये, ज़रूरी नहीं कि अगर कोई प्रारूप अनदेखा है तो बेकार ही होगा।

– मोहित शर्मा (ज़हन)
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जीवनशैली में संतुलन – लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)

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Mohit Trendster @ Lucknow, 2010
 
पर्यटन के स्वरुप में बड़े बदलाव आयें है। सदियों तक जो पर्यटन स्थल दुनियाभर में मशहूर थे, जिन्हे सिर्फ देखना लाखो-करोडो की दिली ख्वाइश होती थी….अब वहाँ जाने वाले नयी पीढ़ी के बहुत से लोग उन्हें बोरिंग बताते है, वहाँ घूम कर आने के बाद वो सवाल करते है कि आखिर क्या ख़ास है इन जगहों में? इतना हव्वा किस बात का बनाया जाता है इनपर? कारण जानने से पहले इस बात पर ध्यान दें कि हम लोग ट्रांज़िशन दौर का हिस्सा रहे जिसमे तकनीक बड़ी तेज़ी से बदली, और हमे समाज के दोनों छोर देखने-जीने को मिले। अब आप कहेंगे की बदलाव तो हर पीढ़ी देखती है, तो इस दौर से जुडी पीढ़ियों पर यह टिप्पणी क्यों? सोचिये आप सन 1828 में जी रहे है और एकदम से आपको 1850 में भेजा जाए तो आपको  बदली बातें, चीज़ें समझने में अधिक कठिनाई नहीं आयेगी पर यह कठिनाई 1970 से सीधे 1990 जाने पर बढ़ेगी और 1992 से अगर कोई 2015 में आयेगा उसको आजकल की दिनचर्या में कई बदलाव दिखेंगे जिनकी उसे आदत नहीं होगी।
इस बदलाव के बाद हम जैसे मनोरंजन और जानकारी के अनेको मल्टीमीडिया साधनो से घिर गये। ग्राफिक्स, एनीमेशन, विडीयोज़ में दुनिया का क्या से क्या खंगाल डाला, जिस वजह से किसी चीज़ का क्रेज़ क्या होता है यह लगभग भूल गए। अनुभवों के लिए सिर्फ डिजिटल साधनो पर निर्भर हो चुके है और इनके इतर दुनिया जो भी है उस से कटने लगे। शायद जो लोग ऐतिहासिक इमारतों, जगहों को बोरिंग बता रहे थे वो उस जगह को देखने, उसकी कहानी जानने के अलावा यह भी अपेक्षा रख रहे थे कि वो ईमारत ब्रेक डांस करेगी, टूट कर फिर अपने आप बन जायेगी, या टूरिस्ट गाइड की जगह खुद अपना इतिहास बताएगी।
अब बच्चे-युवा और बड़े भी जो शहरी जीवन के आदि हो चुके है उन्हें 2 दिन गाँव में बिताने भारी पड़ जाते है और बातों से ज़्यादा हम मोबाइल टेक्स्ट्स, मैसेजेस से वार्तालाप करते है। इस लेख से मैं आपको वर्तमान तौर-तरीके छोड़ कर वापस इतिहास में जाने की सलाह नहीं दे रहा, बस एक संतुलन बनाने की बात बता रहा हूँ। कुछ समय स्वयं को, अपनों को और प्रकृति को दें – डिजिटल प्रारूपों में औरों से अनुभव लेने के साथ-साथ ज़िन्दगी में खुद अपने अनुभव बटोरें। एक जीवनशैली की अधिकता से स्वयं को एक मशीन में ना बदलने दें। बैलेंस बनाना मुश्किल ज़रूर है पर ज़माना कितना भी आगे बढ़ जाये कई मूलभूत बातें जस की तस रहती है, बस उन्ही के सिरे पकड़ते हुए शुरुआत करें।
– मोहित शर्मा (ज़हन)
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सपनो की एक्सपायरी डेट – मोहित शर्मा (ज़हन)

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अपने सपनो के लिए जगदोजहद, मेहनत करते लोगो को देखना प्रेरणादायक होता है। एक ऐसा आकर्षण जिसकी वजह से हम फिल्मो, टीवी सीरियल्स से बंधे रहते है, उनके किरदारों में अपने जीवन को देखते है, ऐसा आकर्षण जिसके कारण कठिन समय में हम खुद को दिलासा देते है कि यह सब झेलने के बाद, यह वक़्त गुजरने के बाद हमे अपना सपना मिल जायेगा या उस से दूरी और कम हो जायेगी। कुछ ख्वाबो का महत्व इतना होता है कि उनके पूरे या ना पूरे होने पर जीवन की दिशा बदल जाती है, जबकि कुछ सपने बस किसी तरह अपनी जगह आपके ज़हन में बना लेते है – बाहर से देखने पर यह सपने बचकाने लगते है पर फिर भी अक्सर यह आपको परेशान करते है।
व्यक्ति की आयु, परिस्थिति अनुसार सपने बदलते है, नए सपने इतने बड़े हो जाते है जो किसी उम्र के अधूरे-पुराने सपनो के आड़े आकर धुँधला कर देते है। मैंने कहीं सुना था कि सपनो को साकार करने का कोई समय नहीं होता जब साधन, भाग्य साथ हों तब उन्हें पूरा कर उनका आनंद लीजिए। पर जीवन तमाम चुनौतियाँ, उबड़-खाबड़ रास्ते लेकर आता है जिसके चलते निरंतर कुछ न कुछ सोचता दिमाग उन बिन्दुओं से काफी आगे बढ़ चुका होता है।
अपना ही उदाहरण देता हूँ। मुझे बचपन से ही प्लेन में बैठने बड़ी इच्छा थी पर समस्या यह थी कि उस समय लगभग सभी करीबी रिश्तेदार दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड के सीमावर्ती शहरों में रहते थे जहाँ 100 से 600 किलोमीटर्स के दायरे में होने के कारण अगर कोई आपात्कालीन स्थिति ना हो तो वैसे शादी आदि समाहरोह में पहुँचने के लिए साधनो में एरोप्लेन से पहले वरीयता ट्रैन, बसों को मिलती है। ऊपर से मध्यमवर्गीय परिवार तो 90 के दशक में टीवी पर ही प्लेन देखकर खुश हो लेता था। (अब घरेलु यात्रा हवाई टिकटों के दामो में काफी कमी आयी है खासकर पहले बुक करने पर, कभी-कभी तो बहुत लम्बी दूरी की हवाई यात्रा ट्रैन यात्रा से सस्ती पड़ती है) तो स्थिति यह रही कि बचपन से किशोरावस्था आई, जिसमे हवाई यात्रा की प्रबल इच्छा बनी रही पर कभी ऐसा मौका नहीं बना। वर्तमान में जहाँ सक्रीय हूँ यानी मेरठ, दिल्ली इनकी दूरी 70-75 किलोमीटर्स है और अब तक प्लेन में नहीं “घूमा”।
पर अब वो सपना मर गया है, इच्छा कहीं गुम हो गयी जैसे उसकी एक्सपायरी डेट निकल गयी हो। किसी समय एक बच्चे की जो सबसे बड़ी विश होती थी जिसके लिए वो भगवान जी से प्रार्थना करता था, आज उसके पूरे होने ना होने से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। उल्टा चिढ होती है, बेवजह गुस्सा आता है इस ख्वाईश के कभी याद आने पर। अब अगर कभी हवाईजहाज़ में बैठने का अवसर मिलेगा तो मन किसी प्रौढ़ उधेड़बुन में लगा होगा, रूखी आँखों में उस बच्चे या किशोर की चंचलता नहीं होगी जो अक्सर सपनो में प्लेन में बैठकर दुनियाभर की सैर कर आता था।
कुछ सपनो का पूरा होना आपके हाथ में होता है और कुछ का भाग्य पर निर्भर। अपने बस में जो बातें हो उन्हें प्रगाढ़ता से पूरा करें ताकि इच्छाएँ मरने या बदलने से पहले….सपनो की एक्सपायरी डेट से पहले वो पूरे हो जायें।  🙂
 – मोहित शर्मा (ज़हन)
#mohitness #mohit_trendster #trendy_baba

Event Appearance…

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Expressed my views in a seminar on various Gender issues this year in an event organized jointly by regional NGOs. – Mohit Trendster #mohitness

New Podcasts from Comics Memories Series

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Comic Artist, Writer, Translator Bharat Negi ji Tribute Podcast

भरत नेगी जी को समर्पित यह पॉडकास्ट, मेरा निवेदन है ज़रूर सुने और शेयर करें।

कुछ ऐसी स्थिति थी रिकॉर्ड करते समय की ठंड में ठिठुरते हुए अटक-अटक कर पर एकबार में यह पॉडकास्ट पूरी की है, आशा है पसंद आएगी। #freelancetalents #bharatnegi#trendster #mohitness #podcast

https://soundcloud.com/mohit-trendster/remembering-artist-bharat-negi

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पनौती अटैक (Comics Memories Podcast # 05) – Mohit Trendster

Ek bachche ka panauti bhara din jisme aakhirkar usko comics aur nanhe samrat ka sahara mila. 10 Minutes ki yeh podcast aapki khidmat mey pesh hai….

#india #comics #mohitness #trendster #freelancetalents #podcast #hindi

https://soundcloud.com/mohit-trendster/panauti-attack-comics-memories

– Mohit Trendster #mohitness

Soundcloud Channel:

Comics Memories Podcast Series – Mohit Trendster

Part # 1 (3 Minutes)
कॉमिक्स से जुड़े 2 मज़ेदार किस्से – मोहित शर्मा (ट्रेंडस्टर) Podcast
https://soundcloud.com/mohit-trendster/comics-memories-mohitness
Comics Memories (Part # 2) – Parmanu vs. Jaaduman 12:10 Minutes (Timeline: 1997)
Comics Memories (Part # 3) 5 Minutes [Timeline 2002-2003]
 Yahan Agra, Lucknow mey hue kuch vaakye baant raha hun aap sabke saath. Aasha hai aap sabko ye podcast pasand aayegi.
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The Aryanist Journal 2013 & 2014 Editions

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1. The Aryanist Journal # 01, Language: Hindi, English, 40 Pages (Published – October 2013)

the aryanist

The Aryanist Journal # 02

Language: English, ISBN: 9781311414564, Pages – 79

Cover – Jyoti Singh, Publishing Partner – Freelance Talents, Archaeology Online

*) – Readwhere
http://www.readwhere.com/read/390991/The-Aryanist-02/The-Aryanist-Journal-2

*) – Smashwords
https://www.smashwords.com/books/view/499743

*) – Archives
http://document.li/41vf

*) – Snacktools
http://share.snacktools.com/96B7A85C5A8/bhnfw39h

*) – Doc Droid
http://docdroid.net/mlxn

*) – Doc Stoc
http://www.docstoc.com/docs/173230978/The-Aryanist-Journal-_-02-_Freelance-Talents_

*) – 4Shared
http://www.4shared.com/office/MahN_wWHba/The_Aryanist_Journal__02__Free.html

*) – Scribd
https://www.scribd.com/doc/249441617/The-Aryanist-Journal-02-Freelance-Talents

*) – Mediafire
http://www.mediafire.com/view/n8jsaq3ccdjgvry/The_Aryanist_Journal_#_02_(Freelance_Talents).pdf

Also available – ebook3000, ISSUU, Pothi, drive and allied networks.