New Podcast – Avchetan Mastishk Locha (Author Mohit Trendster)

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My latest comedy podcast after a log time, “Avchetan Mastishk Locha”. Do leave feedback!

Podcast link:

https://soundcloud.com/mohit-trendster/avchetan-mastiksh-locha-mohit-trendster

Also uploaded – Vocaroo, Clyp, Picosong, wordpress etc.

Aapke mastishk, mastiksh…. masshuhs…Massachusetts… Dimaag mey kya kya pada rehta hai jo life mey kabhi kaam nahi aata. Par jis detail k saath dil se ye sab yaad rehta hai lagta hai kisi janm mey kahin reh gayi secret tijori ka password hai. Aasha hai aapko ye prayas pasand aayega….

मोहित शर्मा ज़हन

Kuboolnama (Nazm) – Poet Mohit Sharma

कुबूलनामा (नज़्म)

 

एक दिलेर कश्ती जो कितने सैलाबों की महावत बनी,

दूजी वो पुरानी नज़्म उसे ज़ख्म दे गयी।

एक बरसो से घिसट रहा मुकदमा,

दूजी वो पागल बुढ़िया जो हर पेशी हाज़िरी लगाती रही।

मय से ग़म गलाते लोग घर गए,
ग़मो की आंच में तपता वहीँ रह गया साकी,
अपने लहज़े में गलत रास्ते पर बढ़ चले,
…..और रह गया कुछ राहों का हिसाब बाकी।

वीरानों में अक्सर हैरान करती जो घर सी खुशबू ,

आँचल में रखी इनायत घुल रही है परदेसी आबशार में…

मेरे गुनाह गिनाना शगल है जिसका,

फ़िर भी बैर नहीं करती लिपटी रोटी उस अखबार में।

रोज़ की शिकायत उनकी,

बेवजह पुराने सामान ने जगह घेर रखी….

काश अपनी नज़र से उन्हें दिखा पाता,

भारी यादें जमा उन चीज़ों पर धूल के अलावा।

उलट-सुलट उच्चारण के तेरे मंत्र-आरती चल गए,

रह गए हम प्रकांड पंडित फीके…

दुनियादारी ने चेहरों को झुलसा दिया,

उनमे उजले लगें नज़र के टीके।

समाप्त!

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Kubulnama (Nazm)

Ek diler kashti jo kitne sailaabo ki mahavat bani,

Dooji wo purani nazm jo use zakhm de gayi.

Ek barso ghisat raha mukadma,

Dooji wo pagal budhiya jo har peshi haziri lagati rahi.

Mayy se gham galaate log ghar gaye,

Ghamon ki aanch mein tapta wahin reh gaya saaki,
Apne lehze mein galat raaste par badh chale,
…..aur reh gaya kuch raahon ka hisaab baaki.

Veerano mein aksar hairaan karti jo ghar si khushboo,

Aanchal mein rakhi inayat ghul rahi pardesi aabshar mein…

Mere Gunaah ginana shagal hai jiska,

Phir bhi bair nahi karti lipti roti us akhbar mein.

Roz ki shikayat unki,

Bewajah puraane samaan ne jagah gher rakhi….

Kaash apni nazar se unhe dikha paata,

Bhaari yaaden jama un cheezon par dhool ke alawa.

Ulat-sulat uchchharan ke tere mantra-aarti chal gaye,

Reh gaye hum prakaand pandit pheeke…

Duniyadaari mein jhulse chehre,

Unme ujle lage nazar ke teeke….

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 बहुत समय बाद कुछ शायरी की है, वैसे निरंतर कुछ ना कुछ लिख रहा हूँ पर यह ब्लॉग कम अपडेट कर रहा हूँ। वैसे नेट पर मेरा पिछले कुछ महीनो का काफी काम मिलेगा।

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सबकी अनैतिक बढ़त – लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)

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अंतर्राष्ट्रीय साइकिल रेस के लिए चुना गया नेचुरल कोर्स शिव के लिए नया नहीं था। आखिर यही वह रास्ता था जहाँ वो वर्षो से प्रतिदिन अभ्यास करता था। उसके मित्रों और जानने वालो को पूरा विश्वास था कि यह रेस जीतकर शिव अंतर्राष्ट्रीय सितारा बन जाएगा। कॉलेज में कुछ हफ्ते पहले ही उसको यह दर्जा मिल गया था। शिव के कोच राजीव मेहरा मानकर बैठे थे कि अगर उस दिन कुछ ऊँच नीच हुयी, तब भी शिव शुरुआती कुछ रेसर्स में आकर बड़ी इनामी राशि अर्जित कर लेगा। स्थानीय कंपनियों में यह बात फैली तो उससे कुछ स्पोंसर्स जुड़ गये।

रेस का दिन आया और रेस शुरू हुयी। पहले चरण में शिव काफी पीछे रहा, लोगो ने माना कि शायद वह अपनी ऊर्जा बचा रहा है या यह उसकी कोई रणनीति  है। पर रेस ख़त्म होने पर कुशल साइकिलिस्ट शिव औसत 17वें स्थान पर आया। स्थानीय लोगो और उसके करीबियों में अविश्वास और रोष था। जो रेस शुरू होने से पहले लाइमलाईट लेने में सबसे आगे थे, वही कोच और स्पोंसर्स रेस के बाद ताने देने वालो में सबसे आगे थे। जबकि एक शून्य में खोया शिव प्रतियोगिता की घोषणा के दिन से ही अलग उधेड़बुन में था।

माहौल शांत होने के बाद एक शाम अपने मित्र सुदीप्तो के सामने उसने अपना दिल खोला।

शिव – “मैंने खुद को बहुत समझाया पर मन को समझा नहीं पाया। मुझे लगा कि एक रास्ता जिसके हर मोड़, उंच-नीच यहाँ तक कि हवाओं की दिशा तक से मैं इतना करीब से परिचित हूँ पर मेरा जीतना अनैतिक होगा, एक चीटिंग होगी बाकी साइकिलिस्टस के साथ। धीरे-धीरे यह बातें मेरे दिमाग पर इतनी हावी हों गयी कि रेस के दिन वो बोझ मेरे पैरों, मेरे शरीर पर महसूस होने लगा और परिणाम तुम जानते ही हो।”

सुदीप्तो – “भाई, पहली बात तो ये कि दिमाग बड़ी कुत्ती चीज़ है, किसी मामले में बिलकुल परफेक्ट और कहीं-कहीं बिलकुल फ़िर जाता है। तो यह जो तुम्हारे साथ हुआ ये किसी के साथ भी हो सकता था। किसी बात में जब हमे सीधा लाभ मिलता है और हम किसी भी रूप में प्रतिस्पर्धा का हिस्सा होतें है तो कभी-कभी अपराधबोध लगता है कि हमे मिली यह बढ़त तो गलत है। पर इस बढ़त को एक मौके की तरह देखो जिसे पाकर तुम अपने और अपने आस-पास के लोगो के लिए एक बेहतर कल सुनिश्चित कर सकते हो। सोचो अगर यह रेस तुम जीतते तो अपने साथ-साथ कई लोगो का जीवन बदल देते और क्या पता आगे इस पूरे कस्बे की तस्वीर बदल देते। जहाँ तक अनैतिक बढ़त या चीटिंग की बात है वह तो तुम अब भी कर रहे हो, बल्कि हम सब करते है।”

शिव – “भला वो कैसे?”

सुदीप्तो – “तुम्हारे साधन-संपन्न माता-पिता है, क्या यह उन लोगो के साथ चीटिंग नहीं जो बचपन में ही अनाथ हो गए या जो किसी स्थिति के कारण गरीब है? तुम 6 फुट और एथलेटिक बॉडी वाले इंसान हों, क्या यह उन लोगो पर अनैतिक प्राकृतिक बढ़त नहीं जो अपाहिज है? तुम्हारे क्षेत्र में शान्ति है, क्या यह देश और दुनिया के उन लोगो पर बढ़त नहीं जिन्हे युद्ध के साये में जीवन काटना पड़ता है?”

शिव – “इस तरह तो मैंने कभी सोचा ही नहीं।”

सुदीप्तो – “इस तरह सोचोगे तो कभी जीवन में कोई मौका भुना नहीं पाओगे। ऐसे एंगल से सब सोचने लगे तो दुनिया के सारे काम उलट-पुलट जायेंगे। हाँ, हमे कुछ बातों में दूसरो पर प्राकृतिक या अन्य बढ़त हासिल है पर कुछ बातों में दूसरो को लाभ है। पते की बात यह है कि हम स्वयं को बेहतर बनाने में और अपने काम को अच्छे ढंग से करने पर ध्यान दें, अब अगली रेस कि तैयारी करो। गुड लक!”

समाप्त!

– मोहित शर्मा (ज़हन)

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कुछ पल और गुज़ार ले… | मोहित शर्मा (ज़हन)

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Artwork – Kinannti
रजनी का एक राष्ट्रीय चिकित्सीय प्रतियोगी परीक्षा का यह अंतिम अवसर था। रजनी की मेहनत घर में सबने देखी थी और डॉक्टर बनने का सपना भी लगनशील रजनी और उसके परिवार ने साथ देखा था। यह लगन ऐसी संक्रामक थी कि जीवन में कोई ध्येय ना लेकर चलने वाली, स्वभाव में विपरीत रजनी की जुड़वाँ बहन नव्या, सिर्फ उसके सहारे मेडिकल फील्ड लिए बैठी थी। यह रजनी की संगत का ही असर था जो पढाई में कमज़ोर नव्या ने अच्छे अंको से दसवी, बारहवीं पास की थी, यह नव्या भी इस राष्ट्रीय परीक्षा में अंतिम अवसर था। इंटरनेट पर परिणाम घोषित हुआ और एक बार फिर से रजनी बहुत कम अंतर से असफल हुयी। रजनी का जैसे पूरा संसार ही अंधकारमय हो गया। जब तक कोई कुछ समझाता, समझता उस से पहले ही रजनी ने आत्महत्या कर ली।
नव्या को पहले ही पता था कि वह सफल नहीं हो पाएगी और परिणाम ने उसके अंदेशे पर मोहर लगा दी पर खुद से ज़्यादा दुख नव्या को अपनी मेहनती बहन रजनी के लिए था। अब उसे लगा कि काश उसे थोड़ा समय मिल पाता अपनी बहन को समझाने का। माता-पिता अविश्वास से एकटक कहीं देखकर अपनी कल्पनाओ को सच्चाई पर हावी करने की हारी हुयी कोशिश कर रहे थे। कुछ समय बाद अपने परिवार के लिए नव्या ने स्वयं को संभाला और क्लीनिकल रिसर्च में 8 महीनो का कोर्स कर उसे अच्छे वेतन पर एक विदेशी कंपनी में नौकरी मिली। नव्या को पता था कि अगर उसकी जगह उसकी बहन होती तो अपने ज्ञान और मेहनत के दम पर उस से अच्छे स्थान पर होती, उस स्थान पर जो  उसे उस प्रतियोगी परीक्षा में सफल होने के बाद भी ना मिलता। कुछ समस्याएँ जो कभी जीवन को चारो और से घेरे ग्रहण लगाये सी प्रतीत होती है, जिनके कारण सुखद भविष्य की कल्पना असंभव लगती है, चंद महीनो बाद ऐसी समस्या का अस्तित्व तक नहीं रहता। थोड़ा और समय बीत जाने के बाद  तो दिमाग पर ज़ोर डालना पड़ता है कि ऐसी कोई दिक्कत थी भी जीवन में। नव्या अक्सर सपने में रजनी को समझाते हुए नम आँखें लिए जाग जाती है – “बहन! बस ये थोड़े लम्हें काट ले, जो इतना सहा…वो दर्द सहकर बस कुछ पल और गुज़ार ले….सवेरा होने को है…”
 समाप्त!
– मोहित शर्मा (ज़हन)
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भूरा हीरो बनाम ग्रीक गॉड – मोहित शर्मा (ज़हन)

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उम्र बढ़ने के साथ हम जीवन के विभिन्न पहलुओं में सामाजिक ढाँचे के अनुसार ढलते है और कभी-कभी ढाले जाते है। जैसे किसी देश में अगर मनोरंजन के किसी साधन या स्रोत पर पाबंदी है या प्रोत्साहन है वहाँ जनता की पसंद-टेस्ट उस अनुसार ढल जायेगी, यहाँ तक कि सामाजिक परिदृश्य को देखने में भी वैसा ही चश्मा पहना जाने लगेगा। दुनिया भर के मनोरंजन स्रोत देखने पर आप पाएंगे कि हर जगह कितना दूषितवर्गीकरण व्याप्त है साथ ही पश्चिमी देशो के गोरे वर्ण के लोगो को इतना अधिक इस तरह प्रोजेक्ट किया जाता है कि दुनिया में मानवजाति के वह सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। धीरे-धीरे समय के साथ हम बाकी किस्म के लोगो में भी वो मनोरंजन के साधन देखते-देखते यह बात और भावना घर कर जाती है। एक निश्चित सीमा और प्रारूप (format) के आदि हो जाने के कारण अगर उस से अलग या नया कुछ होता है तो कई लोग उसे सिरे से नकार देते है।

बाहुबली मेरे कुछ जानने वालो को सिर्फ इसलिए पसंद नहीं आई क्योकि ऐसे एक्शन और स्टोरीलाइन में वो गोरे रंग के ग्रीक गॉड मॉडल जैसे हीरोज़ को देखते आये है और यह दक्षिण भारतीय नायक प्रभास उन्हें जमा नहीं। यह नायक उन्हें किसी बॉलीवुड या स्थानीय मसाला फॉर्मेट में ही जमता। ऐसा शायद इस फिल्म के समापन भाग में अभिनेत्री अनुष्का शेट्टी को भी सुनने को मिले जो तब युवा अवस्था के किरदार में दिखेंगी। क्या इतना कड़ा है यह फॉर्मेट की आदत पड़ जाने का बंधन जो हम सौइयों अन्य बातों को भूलकर सिर्फ वर्ण या स्थान का रोना रोने बैठ जाएँ? मेहनत और प्रयोगो को सराहना सीखें क्योकि दुनिया के आगे बढ़ने में इन दोनों बातों का महत्वपूर्ण योगदान है। किसी ने टोका कि यह तो लोमड़ी के अंगूर खट्टे वाली बात हो गयी, भारत में ऐसे लोग मिलेंगे ही नहीं जो फॉर्मेट में फिट बैठे तो उन्हें बता दूँ कि भारत आपकी सोच से कहीं अधिक विशाल है, रैंडम देश के 15 – 20 शहरों का दौरा करें आपको हर तरह के प्रारूप के अनेको लोग मिल जायेंगे।

एक सम्बंधित एक्सट्रीम उदाहरण और उसका परिणाम भी बताना चाहूंगा, पाकिस्तान और बांग्लादेश के अलग होने के पीछे भी यह भावना थी। वही भावना कि वह हमारे जैसे नहीं है तो हम में से एक कैसे होंगे? पाकिस्तानी नेतृत्व, भारत के दूसरी तरफ बसे अपने बंगाली भाग के नागरिको से दोयम दर्जे सा व्यवहार करता था (दोनों रीजन्स के विकास में बहुत अंतर था) और उनका मखौल सा उड़ाता था (regional, ethnic ego) जिस वजह से दोनों स्थानो में दरार बढ़ती चली गयी और बांग्लादेश अलग हुआ। अलग बातों, चीज़ों, लोगो के प्रति लचीला रवैया अपनाये, ज़रूरी नहीं कि अगर कोई प्रारूप अनदेखा है तो बेकार ही होगा।

– मोहित शर्मा (ज़हन)
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कही अनकही – लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)

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(Bidholi, Dehradun)

*) – अस्तित्व की लड़ाई

यह बात मेरे मन में लंबे समय से थी और आज लिखने का मौका मिल पाया है। बताते है ब्रिटिश साम्राज्य में कभी सूरज नहीं ढलता था, दुनिया भर के इतने देश जो उनके गुलाम थे। उनसे पहले जगह-जगह मुसलमान शासक रहे जिन्होंने भारत के एक बड़े हिस्से समेत अनेको प्रांतो, देशो में अपना राज्य स्थापित किया। अलग-अलग राज्यों की अपनी संस्कृतियों, तौर तरीको में हमेशा आक्रमण कर जीतने का तरीका नहीं चलता था और अगर चलता भी था तो बाहरी आक्रमणकारियों से जनता में असंतोष, असहयोग की भावना रहती जिस कारणवश ऐसे शासकों के पाँव थोड़े समय बाद उस धरती से उखड जाते। इस समस्या से पार पाने की जो योजना विदेशियों ने सदियों पहले सोची उसपर भारतवासियों ने आजतक अमल नहीं किया। हमारी प्रवृति में कहीं आक्रमण करना नहीं है। पर आजकल तुलनात्मक बातों में भारत, सनातन धर्म और लोगो के बारे में कई अफवाहें फैली हुई है जिस वजह से कई लोग हम लोगो से, हमारे धर्म से डरते है या हेय दृष्टि से देखते है। परिणामस्वरूप हर किसी को जैसे हमारी बेइज़्ज़ती करने का या मज़ाक उड़ाने का लाइसेंस मिला हुआ है।

अनजान भारी-भरकम शब्दों, बातों और उदाहरणों से हर कोई पीछे हटता है। तो छूटते ही अपने ग्रंथो, श्लोक, दंतकथाओं आदि के उदाहरण ना दें। कहीं भी अपने पाँव ज़माने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है उस जगह की संस्कृति, लोगो, भाषाओ आदि स्थानीय बातों की समझ बनाकर वहां जनता से संवाद बनाना, मैत्रीपूर्ण बंधन बनाना और फिर धीरे-धीरे अपनी संस्कृति, बातों से उन्हें अवगत कराते हुए उस संस्कृति का हिस्सा बनाना। परिस्थितियाँ अब आधी शताब्दी पहले जैसी नहीं है पर हमारे अस्तित्व की लड़ाई अब भी है। श्री श्री रविशंकर, बाबा रामदेव ने अपने तरीको से अच्छा प्रचार किया है (हालाँकि, देसी-विदेशी मीडिया उनका उपहास उड़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ता।) कोशिश यह होनी चाहिए कि हम बाहरी सकारात्मक बातों को अपनी संस्कृति में समाहित करें और अपनी संस्कृति की अनेको अच्छी बातों का समावेश विदेशों के तौर-तरीकों में करवायें। तो इंग्लिश या अन्य भाषाओँ, पहलुओं से भागें नहीं बल्कि उन्हें सीखें ताकि आगे चलकर आप अपने पहलु दूसरो को सिखा पायें क्योकि प्रकृति का नियम है – बड़ी मछली छोटी मछलियों को आहार बनाती है, इस समय धाराएँ प्रतिकूल है और कुछ बड़ी मछलियाँ छोटी-छोटी संस्कृतियों को निगल भी रही है, एक-आध सदी बाद यह नौबत हमपर ना आये तो सचेत हों जायें।
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*) – बातों-बातों में आप सुनते होंगे कि “मैं तो 50-55 तक जी लूँ एक्टिव लाइफ, क्योकि मुझे बुढ़ापे का दर्द नहीं झेलना।” उम्र के उस पड़ाव की काफी अहमियत है जिसको हम नज़रअंदाज़ कर देते है। सबसे पहले तो बूढ़े व्यक्ति एक सिंबल की तरह होते है, जिनका जीवन स्वयं में अनेको शिक्षाएं लिए होता है। जीवन के कई अनुभवों से वो परिवार के सक्रीय सदस्यों को सीख देते रहते है। साथ ही उनके रहते हुए आम तौर पर संतानो में शान्ति रहती है 12-15 साल। इस शान्ति का एक प्रमुख कारण संपत्ति होती है। ऐसी कुछ और बातें है पर वह बताने से पहले यहाँ मैं आप लोगो के इस विषय पर विचार जानना चाहूंगा।

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*) – ऐसे निष्कर्षों पर ना कूदें….

बहुत से प्रयोग करने के बाद एक रचनाकार, फिल्मकार उस स्तर पर पहुँचता है जहाँ रचना गढ़ते (बनाते) समय उसके लिए उस रचना में प्रयुक्त जगहों, बातों, किरदारों का वर्गीकरण मायने नहीं रखता। उदाहरण स्वरुप अनुराग कश्यप को कुछ जगह नारी विरोधी बताया जाता है क्योकि उनकी फिल्मो में नेगेटिव किरदारों में महिलायें आती रहती है। पर यह नोट करने वाले समीक्षक, आलोचक और प्रशंषक भूल जाते कि उन्होंने अब तक उन किरदारों से कई गुना अधिक वैसे नकारात्मक गुणों वाले रोल्स में पुरुषों को कास्ट किया है। इतना सब काम करने के बाद वो किसी वर्ग के दोस्त अथवा दुश्मन नहीं होते बल्कि अपनी कहानी अनुसार किरदारों के दोस्त या दुश्मन बन जाते है। यथार्थवादी और प्रतिभावान व्यक्तियों के प्रयासों पर इतनी जल्दी ऐसे निष्कर्षों पर आना ना सिर्फ उनकी मेहनत का उपहास उड़ाना होगा बल्कि उन्हें बेवजह बदनाम करना भी होगा। अगर आपको एक ढर्रे पर चलने की आदत है और कोई उसपर नहीं चल रहा इसका मतलब यह नहीं की उसमे कोई कमी है।

एक बटन सा.. – मोहित शर्मा (ज़हन)

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एक बटन सा…(Laghu Katha)

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छोटे शहर के एक बड़े साइकोलॉजिस्ट जाधव जी के खाली क्लीनिक में एक और आलसी शाम। 31 वर्षीय शिवांश कुमार को संतुष्टि मिली कि कोई अन्य मरीज़ ना होने के कारण “डॉक्टर” के साथ उसे अधिक समय का सेशन मिल जाएगा। कुछ औपचारिकता के बाद डॉक्टर के केबिन में….

शिवांश – “वैसे तो मैं आपके पास ना आता पर आपका इंटरव्यू पढ़ा जिसमे आपने सही कहा कि जब जिम जाने वालो को अपंग नहीं समझा जाता तो आपके पास आने वालो पर यह धब्बा क्यों लगाया जाता है कि वो मानसिक रूप से ठीक नहीं? आपके सेशंस को एक्सरसाइज की तरह लिया जाना चाहिए।”

जाधव जी – “धन्यवाद! छिट-पुट मानसिक परेशानी हर इंसान को होती है। मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ तो कोई नहीं होता। तो शुरू कीजिये, बताएँ समस्या क्या है?”

शिवांश – “डॉक्टर लाइफ मौज में कट रही थी, सब कुछ कितना साफ़-सरल था फिर पता नहीं कोई बटन सा दबा और मैं 2008 से सीधा 2015 में पहुँच गया। कुछ समझ नहीं आ रहा क्या करूँ। अब या तो लाइफ रिवर्स करने का उपाय बताएं या फिर इतना सुनिश्चित करवा दें कि आगे कभी ऐसा कोई बटन ना दबे जीवन में…. ”

– मोहित शर्मा (ज़हन)

Short Film – Bawri Berozgari (Freelance Talents)

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Short film by Pune based Theatrix Group & yours ‪#‎Trendster‬ “Bawri Berozgari” received mostly positive reviews @ Comic Fan Fest April 2015
https://www.youtube.com/watch?v=a0pc6Tustrg
– Mohit Trendster

परदे के पीछे (Laghu Katha) – मोहित शर्मा (ज़हन)

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…परदे के पीछे
प्रतिष्ठित टीवी चैनल के आगामी रिएलिटी शो के लिए बैठी कॉलेज से निकली उत्साहित इंटर्न टीम ने हज़ारों एंट्रीज़ में से काफी मशक्कत के बाद कुछ दर्जन योग्य लोग छांटें। तभी उनके सीनियर्स काम का अवलोकन करने पहुँचे।
इंटर्न – “मैडम! इन लोगो कि प्रोफाइल्स हमारे शो के प्रारूप से फिट बैठती है, अब इनमे से किसका चयन करें और किसका नहीं? सब लगभग बराबर से है।”
प्रबंधक मैडम – “इनमे से कोई भी नहीं चलेगा।”
इंटर्न – “ऐसा क्यों मैडम?”
प्रबंधक मैडम – “फिर से लिस्ट बनाओ और अनाथ, अपंग, अपराध या उत्पीड़न के शिकार लोगो को सेलेक्ट करो। उनकी कहानी बोरिंग हो तो उसमें और ड्रामा एलिमेंट्स जोड़ों। ऐसे ही किसी को भी सेलेक्ट मत किया करो….”
– मोहित शर्मा (ज़हन) ‪#‎mohitness‬ ‪#‎mohit_trendster‬

Hara-Aam ki Pillii | Horror Short Film (Hindi)

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Hara-Aam ki Pillii | Horror Short Film (Hindi) – Prince Ayush, Mohit Trendster & Snath Mahto. ‪#‎freelance_talents‬

https://www.youtube.com/watch?v=8RPEOPQyR3U

*NSFW, Contains stong language.

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