कैशलेस रिश्वत (Cashless Bribe)

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एक सरकारी दफ्तर में एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, सौरभ घुसता है। सौरभ अपना झोला लेकर अंदर आता है और अपने विभाग से जुड़े एक बाबू (क्लर्क) के बारे में पूछता है। उसकी डेस्क पर जाकर वो अपना दुखड़ा रखता है।

“सर मेरा कई सालों का ट्रेवल अलाउंस, पेट्रोल अलाउंस, नच बलिये अलाउंस कुछ नहीं आया है, अब आप ही कुछ कीजिये।”

बाबू – “कर तो दें पर उसके लिए आपको भी कुछ करना होगा ना। इस हाथ दे, उस हाथ ले….नहीं तो लात ले।”

सौरभ – “हाँ झोला वामपंथी फोटोशूट के लिए थोड़े ही लाया हूँ!” (सौरभ झोले में हाथ डालता है)

बाबू – “एक तो नाड़े को झोले की डोरी बना रखा है….जी कर रहा है इसी का फंदा सा बना के झूला दूँ तुझे बदतमीज़!”

सौरभ – “मैंने क्या किया? बदतमीज़ी का तो मौका ही नहीं मिला अभी तक 30 सेकंडस में?

बाबू – “अरे जब पूरा देश डिजिटल इंडिया के नारे लगा रहा है और तुम अभी तक झोले में घुसे हो। तुम जैसे लोगो की वजह से ही देश तरक्की नहीं कर पाता। भक! नहीं करनी तुमसे बात।”

सौरभ – “बात नहीं करनी? बाबू हो पर गर्लफ्रेंड की तरह क्यों बिहेव कर रहे हो? अच्छा तो आप ही कुछ उपाय बताओ।”

बाबू – “कैशलेस सरकाओ हौले से….”

सौरभ – “ओह! हाँ जी अपना मोबाइल नंबर दो।”

बाबू – “मेरी इस महीने की लिमिट पूरी हो गयी है।”

सौरभ – “तभी मूड ख़राब है आपका! तो क्या इस महीने काम नहीं होगा मेरा?”

बाबू – “अरे क्यों नहीं होगा, देश को आगे बढ़ने से रोकने वाले भला हम कौन होते हैं? मेरे चपरासी का नम्बर नोट करो। उसकी भी लिमिट हो गयी हो तो बाहर बैठे नत्थू भिखारी के मोबाइल में 15% उसकी कमीशन जोड़ के डाल देना। बड़ा ईमानदार बंदा है! पिछले महीने का एक ट्रांसक्शन मैं भूल गया था वो भी हिसाब के साथ देकर गया है लौंडा। सारा काम छोड़ के, जय हिन्द बोल के उसके माथे की चुम्मी ली मैंने तुरंत… ”

समाप्त!

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Comic Fan Fest # 03 (19 April, 2015)

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Comic Fan Fest # 03 (19 April, 2015)
दिल्ली में आयोजित कॉमिक फैन फेस्ट अप्रैल 2015 धमाकेदार इवेंट का हिस्सा बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। एक के बाद एक इतना सब था इस इवेंट में कि समय का पता ही नहीं चला जिसके लिए एक बार फिर से दीपक चौहान, आकाश मोहनीश बधाई के पात्र है। बैज, केक, गिफ्ट्स आदि में काफी बारीकी से सोचा गया और सोच को मूर्त रूप देने के लिए हफ्तों की मेहनत की गयी। राज कॉमिक्स पर आकाश द्वारा बनायीं गयी एंड्राइड एप, मेहमान कलाकारों द्वारा बनाये गए चित्र बेहतरीन थे। प्रदीप शेरावत जी, जगदीश कुमार जी और जय खोहवाल भाई के अलावा इस बार ललित शर्मा जी ने आयोजन की रौनक बढ़ाई। मैं धनंजय, अभिमनु, आयुष और नितिन मुंजाल जी से पहली बार मिला। लोकेश, संजय और अयाज़ ने मुझे कॉमिक्स, किताबें और पोस्टर गिफ्ट में दिए । इस अवसर पर मेरी लिखी शार्ट फिल्म बावरी बेरोज़गारी भी आयोजको के सौजन्य से चली। शिवांक द्वारा विभिन्न हस्तियों की मिमिकरी और आयुष का एक्ट मनोरंजक थे। बीच में सभी के अलग-अलग मुद्दो पर गंभीर पर रोचक संवाद हुए। सदाबहार रवि भाई और शुभांकित बिना मंच पर आये ही अपनी बातों-कमेंट्स से सबका मनोरंजन कर रहे थे।
Ravi Yadav, Jai Khohwal and Pradeep Sherawat
अंत में यही कहूँगा कि यह आयोजन पिछले वर्ष दिसंबर कॉमिक फैन फेस्ट के आयोजन से बेहतर था, आगे यह उम्मीद करता हूँ कि कॉमिक फैन फेस्ट और बड़े स्तर पर पहुँचे, सदस्यों एवम आयोजको की मेहनत और योजनाएँ देखकर लगता है ऐसा ज़रूर होगा।
– मोहित शर्मा (ज़हन)

परदे के पीछे (Laghu Katha) – मोहित शर्मा (ज़हन)

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…परदे के पीछे
प्रतिष्ठित टीवी चैनल के आगामी रिएलिटी शो के लिए बैठी कॉलेज से निकली उत्साहित इंटर्न टीम ने हज़ारों एंट्रीज़ में से काफी मशक्कत के बाद कुछ दर्जन योग्य लोग छांटें। तभी उनके सीनियर्स काम का अवलोकन करने पहुँचे।
इंटर्न – “मैडम! इन लोगो कि प्रोफाइल्स हमारे शो के प्रारूप से फिट बैठती है, अब इनमे से किसका चयन करें और किसका नहीं? सब लगभग बराबर से है।”
प्रबंधक मैडम – “इनमे से कोई भी नहीं चलेगा।”
इंटर्न – “ऐसा क्यों मैडम?”
प्रबंधक मैडम – “फिर से लिस्ट बनाओ और अनाथ, अपंग, अपराध या उत्पीड़न के शिकार लोगो को सेलेक्ट करो। उनकी कहानी बोरिंग हो तो उसमें और ड्रामा एलिमेंट्स जोड़ों। ऐसे ही किसी को भी सेलेक्ट मत किया करो….”
– मोहित शर्मा (ज़हन) ‪#‎mohitness‬ ‪#‎mohit_trendster‬

जीवनशैली में संतुलन – लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)

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Mohit Trendster @ Lucknow, 2010
 
पर्यटन के स्वरुप में बड़े बदलाव आयें है। सदियों तक जो पर्यटन स्थल दुनियाभर में मशहूर थे, जिन्हे सिर्फ देखना लाखो-करोडो की दिली ख्वाइश होती थी….अब वहाँ जाने वाले नयी पीढ़ी के बहुत से लोग उन्हें बोरिंग बताते है, वहाँ घूम कर आने के बाद वो सवाल करते है कि आखिर क्या ख़ास है इन जगहों में? इतना हव्वा किस बात का बनाया जाता है इनपर? कारण जानने से पहले इस बात पर ध्यान दें कि हम लोग ट्रांज़िशन दौर का हिस्सा रहे जिसमे तकनीक बड़ी तेज़ी से बदली, और हमे समाज के दोनों छोर देखने-जीने को मिले। अब आप कहेंगे की बदलाव तो हर पीढ़ी देखती है, तो इस दौर से जुडी पीढ़ियों पर यह टिप्पणी क्यों? सोचिये आप सन 1828 में जी रहे है और एकदम से आपको 1850 में भेजा जाए तो आपको  बदली बातें, चीज़ें समझने में अधिक कठिनाई नहीं आयेगी पर यह कठिनाई 1970 से सीधे 1990 जाने पर बढ़ेगी और 1992 से अगर कोई 2015 में आयेगा उसको आजकल की दिनचर्या में कई बदलाव दिखेंगे जिनकी उसे आदत नहीं होगी।
इस बदलाव के बाद हम जैसे मनोरंजन और जानकारी के अनेको मल्टीमीडिया साधनो से घिर गये। ग्राफिक्स, एनीमेशन, विडीयोज़ में दुनिया का क्या से क्या खंगाल डाला, जिस वजह से किसी चीज़ का क्रेज़ क्या होता है यह लगभग भूल गए। अनुभवों के लिए सिर्फ डिजिटल साधनो पर निर्भर हो चुके है और इनके इतर दुनिया जो भी है उस से कटने लगे। शायद जो लोग ऐतिहासिक इमारतों, जगहों को बोरिंग बता रहे थे वो उस जगह को देखने, उसकी कहानी जानने के अलावा यह भी अपेक्षा रख रहे थे कि वो ईमारत ब्रेक डांस करेगी, टूट कर फिर अपने आप बन जायेगी, या टूरिस्ट गाइड की जगह खुद अपना इतिहास बताएगी।
अब बच्चे-युवा और बड़े भी जो शहरी जीवन के आदि हो चुके है उन्हें 2 दिन गाँव में बिताने भारी पड़ जाते है और बातों से ज़्यादा हम मोबाइल टेक्स्ट्स, मैसेजेस से वार्तालाप करते है। इस लेख से मैं आपको वर्तमान तौर-तरीके छोड़ कर वापस इतिहास में जाने की सलाह नहीं दे रहा, बस एक संतुलन बनाने की बात बता रहा हूँ। कुछ समय स्वयं को, अपनों को और प्रकृति को दें – डिजिटल प्रारूपों में औरों से अनुभव लेने के साथ-साथ ज़िन्दगी में खुद अपने अनुभव बटोरें। एक जीवनशैली की अधिकता से स्वयं को एक मशीन में ना बदलने दें। बैलेंस बनाना मुश्किल ज़रूर है पर ज़माना कितना भी आगे बढ़ जाये कई मूलभूत बातें जस की तस रहती है, बस उन्ही के सिरे पकड़ते हुए शुरुआत करें।
– मोहित शर्मा (ज़हन)
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सपनो की एक्सपायरी डेट – मोहित शर्मा (ज़हन)

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अपने सपनो के लिए जगदोजहद, मेहनत करते लोगो को देखना प्रेरणादायक होता है। एक ऐसा आकर्षण जिसकी वजह से हम फिल्मो, टीवी सीरियल्स से बंधे रहते है, उनके किरदारों में अपने जीवन को देखते है, ऐसा आकर्षण जिसके कारण कठिन समय में हम खुद को दिलासा देते है कि यह सब झेलने के बाद, यह वक़्त गुजरने के बाद हमे अपना सपना मिल जायेगा या उस से दूरी और कम हो जायेगी। कुछ ख्वाबो का महत्व इतना होता है कि उनके पूरे या ना पूरे होने पर जीवन की दिशा बदल जाती है, जबकि कुछ सपने बस किसी तरह अपनी जगह आपके ज़हन में बना लेते है – बाहर से देखने पर यह सपने बचकाने लगते है पर फिर भी अक्सर यह आपको परेशान करते है।
व्यक्ति की आयु, परिस्थिति अनुसार सपने बदलते है, नए सपने इतने बड़े हो जाते है जो किसी उम्र के अधूरे-पुराने सपनो के आड़े आकर धुँधला कर देते है। मैंने कहीं सुना था कि सपनो को साकार करने का कोई समय नहीं होता जब साधन, भाग्य साथ हों तब उन्हें पूरा कर उनका आनंद लीजिए। पर जीवन तमाम चुनौतियाँ, उबड़-खाबड़ रास्ते लेकर आता है जिसके चलते निरंतर कुछ न कुछ सोचता दिमाग उन बिन्दुओं से काफी आगे बढ़ चुका होता है।
अपना ही उदाहरण देता हूँ। मुझे बचपन से ही प्लेन में बैठने बड़ी इच्छा थी पर समस्या यह थी कि उस समय लगभग सभी करीबी रिश्तेदार दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड के सीमावर्ती शहरों में रहते थे जहाँ 100 से 600 किलोमीटर्स के दायरे में होने के कारण अगर कोई आपात्कालीन स्थिति ना हो तो वैसे शादी आदि समाहरोह में पहुँचने के लिए साधनो में एरोप्लेन से पहले वरीयता ट्रैन, बसों को मिलती है। ऊपर से मध्यमवर्गीय परिवार तो 90 के दशक में टीवी पर ही प्लेन देखकर खुश हो लेता था। (अब घरेलु यात्रा हवाई टिकटों के दामो में काफी कमी आयी है खासकर पहले बुक करने पर, कभी-कभी तो बहुत लम्बी दूरी की हवाई यात्रा ट्रैन यात्रा से सस्ती पड़ती है) तो स्थिति यह रही कि बचपन से किशोरावस्था आई, जिसमे हवाई यात्रा की प्रबल इच्छा बनी रही पर कभी ऐसा मौका नहीं बना। वर्तमान में जहाँ सक्रीय हूँ यानी मेरठ, दिल्ली इनकी दूरी 70-75 किलोमीटर्स है और अब तक प्लेन में नहीं “घूमा”।
पर अब वो सपना मर गया है, इच्छा कहीं गुम हो गयी जैसे उसकी एक्सपायरी डेट निकल गयी हो। किसी समय एक बच्चे की जो सबसे बड़ी विश होती थी जिसके लिए वो भगवान जी से प्रार्थना करता था, आज उसके पूरे होने ना होने से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। उल्टा चिढ होती है, बेवजह गुस्सा आता है इस ख्वाईश के कभी याद आने पर। अब अगर कभी हवाईजहाज़ में बैठने का अवसर मिलेगा तो मन किसी प्रौढ़ उधेड़बुन में लगा होगा, रूखी आँखों में उस बच्चे या किशोर की चंचलता नहीं होगी जो अक्सर सपनो में प्लेन में बैठकर दुनियाभर की सैर कर आता था।
कुछ सपनो का पूरा होना आपके हाथ में होता है और कुछ का भाग्य पर निर्भर। अपने बस में जो बातें हो उन्हें प्रगाढ़ता से पूरा करें ताकि इच्छाएँ मरने या बदलने से पहले….सपनो की एक्सपायरी डेट से पहले वो पूरे हो जायें।  🙂
 – मोहित शर्मा (ज़हन)
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विलेन वकील – लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)

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वैसे तो भीड़ हर पेशे में है और बढ़ रही है पर कुछ पेशों में भीड़ के दुष्परिणाम बड़े व चिंताजनक होते है। ऐसा ही एक वर्ग है वकीलों का जो सीमित न्यायालयों में हर वर्ष तेज़ी से बढ़ते जा रहे है। इस बात में कोई दोराय नहीं कि हर जगह की तरह यहाँ अच्छे-बुरे दोनों तरह के लोग होते है। पब्लिक इंटरैक्शन यहाँ काफी होता है आम व्यवसायों के मुकाबले और किन्ही वजहों से उपद्रवी तत्वो की संख्या भी बाकी जगहों से ज़्यादा होती है। तो इस व्यावसायिक समुदाय में लोग आपस में प्रतियोगी तो होते है पर क्लाइंट्स के लिए इन्हे अपना एक बड़ा समूह बनाना पड़ता है। अब दिक्कत यह होती है कि लोगो कि मदद करने वाले कुछ अच्छे समूह होते है पर कई असामाजिक तत्व भी एक जैसी प्रवृति के कारण साथ आ जाते है। फिर अदालतों के साथ-साथ ऐसे तत्व स्थानीय शैक्षणिक संस्थानों, सरकारी दफ्तरों में सक्रीय होकर दबदबा बनाते हुए मनमानी करते है जो इनकी कमाई का प्रमुख साधन भी बनते है। बड़ी विडंबना है की जिन्हे कानून की धाराओं का सबसे अधिक ज्ञान है वो ही अपने तरीकों से उन्हें तोड़ने में लगे रहते है। न्यायालयों में इनमे से कई वकील बूढ़े, अनपढ़ लोगो को जो किन्ही केसेज में फ़से होते है उन्हें बेवजह दौड़ाते रहते है।
फिर आते है कभी जाने-अनजाने इनसे`उलझने वाले अफसर, दुकानदार, ट्रांसपोर्ट चालक, पुलिस, आम जनता की हालत पर। लड़ाई किसी की होगी पर झुण्ड 32 का तुरंत बन जायेगा और बिना स्थिति जाने सब यह मान कर बैठते है कि अगर दो पक्षों का विवाद है और उनमे से एक वकील है तो वही सही होगा। ऐसी स्थितयों में अक्सर दूसरे पक्ष के लोगो की जमकर पिटाई होती है और कभी-कबार घायलों की मृत्यु होती है। अब अगर मार खाने वाला पक्ष वकील/वकीलों का है (जो काफी कम होता है) तब आप अगले दिन आप सुर्खियां पढ़ेंगे कि “फलाना शहर के अधिवक्ताओं की अनिश्चितकालीन हड़ताल।” मतलब अगर आपका इनसे विवाद है और आप सही है तो आप कि ऐसी की तैसी निश्चित।  भगवान ना करें कि बात अधिक बढे नहीं तो आप पर कुछ भारी मुक़दमे दर्ज हो जायेंगे जिनको निपटाने में आपका काफी समय एवम धन व्यर्थ होगा। गज़ब की बात है कि स्थानीय मीडिया सदैव इनके पक्ष में रहता है, शायद काम पड़ता रहता होगा इसलिए दोस्ती निभायी जाती है। तो कोशिश करिये कि किसी मामले में पड़ने पर अच्छी जाँच के बाद अपना वकील चुने। यह भी ध्यान रखें की कहीं भी इनसे डील, इंटरैक्शन करते समय धैर्य, सावधानी से काम लें। सार्वजानिक स्थल पर किसी भी वजह से हुए विवाद को बातों से निपटाने की कोशिश करें। सरकारों के रवैये और कानून में भी कुछ बड़े बदलावों की आवश्यकता है ताकि नासमझी, मनमानी और गुंडागर्दी में कमी आये। लखनऊ, मेरठ, भोपाल और दिल्ली में अपने अनुभव के आधार पर यह लेख।
– मोहित शर्मा (ज़हन) #mohitness #mohit_trendster

लेखक मोहित शर्मा (ज़हन) – February 2015 Update

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*) – 1 poem and 1 story in inaugural issue of Bageshwari magazine (Editor – Mr. Yogesh Amana Gurjar)
*) – Randomiya and Zambo Zet Zahaaz ki Zustzoo webcomics continue….
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*) – Columns for local daily Dainik Prabhat and First News news channel continue.
*) – Cover story and Article for Roobaru Duniya (March 2015) issue.
*) – Couple of new podcasts @ Soundcloud.
….and few delayed projects. 😦
– Mohit Trendster #मोहित_शर्मा_ज़हन
#mohitness #mohit_trendster #trendy_baba #freelance_talents

झूठ की नोक पर बंदी भारत – मोहित शर्मा (ज़हन)

Note – वैसे तो आर्टिकल में मीडिया की आलोचना है पर आशय मुख्यधारा, बहुसंख्य मीडिया से है। इस क्षेत्र में भी हर जगह की तरह अच्छे, ईमानदार लोग, संस्थायें भी है।
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क्या भारत दुनिया के सबसे अच्छे राष्ट्रों में है? नहीं! क्या भारत दुनिया के सबसे बुरे देशो में है? नहीं! भारत लगभग हर पक्ष में कहीं बीच में है। तकनीक, पर्यटन, विकास, खेल, अपराध सब में। फिर कैसे हमे हिंसक अपराधो, महिला के विरुद्ध अपराधों, घोटालो जैसे मुद्दों में सबसे शीर्ष पर आ जाते है? कैसे पूरे विश्व की कैपिटल बन जाते है इन आपराधिक, अनैतिक मामलो में? मैं मानता हूँ कि अपराध से, बुराई से लड़ाई तेज़ होनी चाहिए और भारत में बहुत से सुधारों की आवश्यकता है पर हर पक्ष में योजनाबद्ध तरीके से, “कोसनाबद्ध” तरीके से नहीं।
भारतीय मीडिया के बहुसंख्य हिस्से में एक ट्रेंड चला है पिछले कुछ वर्षो से जो मुझे चिंतित कर रहा है। हैरतअंगेज, होश उड़ा देने वाली, घृणित कर देने वाली ख़बरों को वरीयता
देना। साथ ही देश और उस से जुडी बातों को कोसना। बाकी नियमित स्तर पर इतने विशाल देश से आयी सामान्य-अच्छी ख़बरें, उपलब्धियाँ इन “चौंका” देने वाले खुलासों में कहीं खो जाती है। परेशानी यहीं ख़त्म नहीं होती अक्सर घटनाओं से अधिक कवरेज बड़े लोगों के बयानों को मिलती है की फलाना ने फलाना बोलकर फलाना मानसिकता दर्शायी। देश में विचारों को व्यक्त करने की आज़ादी है और अगर वो बयान किसी के प्रति हिंसा नहीं फैला रहे (जो अधिकतर होता है) तो आप क्यों ठेकेदार बन रहे हो किसी के एक बयान के बल पर उसका पूरा व्यक्तित्व नापने वाले? आप जो खुद कॉर्पोरेट्स आदि निजी हितों से प्रायोजित ख़बरें दिखाते फिरते हो। वह भी एक इंसान है और कम से कम असली इंसान की हर मामले में नपी-तुली राय हो ही नहीं सकती।
दूसरी बात जो मैं अक्सर दोहराता हूँ की लगभग 130 करोड़ के देश मे दशमलव प्रतिशत अपराध भी बाकी छोटे देशो के मुकाबले बड़े लगेंगे पर इसका मतलब यह नहीं की अपराधों के मामले में भारत पहले नंबर पर है। दुनिया के 200 कुछ देशों में अपराध दर में भारत कहीं बीच में है, 147 देशो के उपलब्ध डाटा में भारत का स्थान 72वां था, अगर सभी देशो से रिकार्ड्स आते तो भारत 100 की संख्या पार कर जाता, यानी भारत से अधिक अपराध दर वाले दर्जनो देश है। पर खबर पहले दिखाने का, सेन्शेसनलाइज़ करने का ऐसा भूत सवार है न्यूज़ चैनल्स, प्रिंट न्यूज़ मीडिया को कि ख़बरें वेरीफाई करना तो दूर, ख़बरें ईजाद तक कर दी जाती है। दिक्कत खबरें देने से नहीं है, दिक्कत है एक आपातकाल, मुसीबत का माहौल दिखाते रहने कि है। जिस से आम जन में पूर्वाग्रह बनने के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक असर बैठता है, देश और लोगो के लिए हिकारत की भावना आती है की “मैं तो अच्छा/अच्छी हूँ, दुनिया बुरी है, और ऐसे लोग के साथ ऐसा ही होना चाहिए।” तो पहली बात देश, समाज उतना बुरा नहीं है जितना समय के साथ आपके मन में बैठा दिया गया है। हमारे विशालकाय देश का 2-3 प्रतिशत ही ऑस्ट्रेलिया की जनसँख्या से अधिक है, बाकी आप खुद समझदार है। तो अगली बार कोई संख्या देख कर पूरी जाँच कीजिये हल्ला काटने से पहले।
अब इस एमरजेंसी के माहौल का पहला नुक्सान विदेशों में यह ट्रेंड कम है तो जब कोई देश खुद ही अपनी खिल्ली उड़ाए तो कंटेंट और वैरायटी के लिए यहाँ का “कोसना” वहाँ स्थानांतरित हो जाता है। तभी जिन देशो में भारत से ऊँची अपराध दर है वो तक हमारे ऊपर डॉक्यूमैंटरीज़, स्टोरीज, कार्टून्स, न्यूज़ रिपोर्ट्स दिखा कर अपनी जनता का ध्यान बँटाकर, अपनी सरकाओं की मदद करते है।
दूसरा घाटा…कानून, संविधान, नीतियों के गलत बनने से होता है क्योकि समय के साथ लगातार ऐसी ख़बरों से गलत दबाव बनता है सिस्टम पर। फिर जल्दबाज़ी में गठित कानून, संवैधानिक बदलाव एक बड़े वर्ग को नुक्सान पहुँचाने लगते है। साथ ही वर्गों, स्थानो, लोगो के बीच पूर्वाग्रह, नकारात्मक वर्गीकरण बढ़ने लगता है I जिसमे वो अधपकी, अधूरी जानकारी के आधार पर फैसला सुनाकर पब्लिक ट्रायल से दबाव बनाते है।
पर प्रोपोगंडा नहीं होगा, हल्ला नहीं होगा तो चैनल्स को दर्शक, विज्ञापन और स्पोंसर्स कैसे मिलेंगे? कागज़ पर चलने वाली या खानापूर्ति को स्टोर रूम में ऑफिस खोले हज़ारो स्वयंसेवी संस्थाओं को जनता, सरकार और विदेशी डोनेशन, ग्रांट्स कैसे मिलेंगी? विनती कुछ गलत होने पर हल्ला ना करने की नहीं है, बल्कि जितनी बात है उस स्तर का हल्ला करने की है। अपराध, अनैतिकता के खिलाफ आवाज़ और एक्शन दोनों ज़रूरी है पर कायदे में। अपने प्रतिद्वंदीयों को हराने की होड़ में देश की छवि तो धूमिल ना करें। मुझे गर्व है कि मैं समृद्ध विरासत वाले विविध देश भारत का नागरिक हूँ और सामान्य जीवन जीने वाले उन देशवासियों कि मेजोरिटी का हिस्सा हूँ जो खबरों के मामले में आपके मानको पर बोरिंग बैठते है, पर उनको दिखाये बिना भारत में त्राहि-त्राहि की तस्वीर दुनिया पर प्रोजेक्ट करना मेरे लिए किसी जघन्य अपराध से कम नहीं क्योकि क्योकि एक भारतीय होने पर गर्व की बात या भारत से जुडी कोई भी बात जिसमे अपराध का ज़िक्र ना हो सुनते ही बिना आगे कुछ सुने लोग हँसने लगते है या मुँह मोड़ लेते है। बाकी चीज़ों में तो पता नहीं पर देश को कोसने और हल्ला काटने में हम नंबर एक है।
– मोहित शर्मा (ज़हन) #mohitness #mohitsharma #mohit_trendster

Poem “Trapped Demon” by Mohit Sharma (Trendy Baba)

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Indian Fanfic Podcast by Mohit Sharma (Trendy Baba)

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