नया कहानी संग्रह – कुछ मीटर पर ज़िन्दगी (मोहित शर्मा ज़हन)

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नए जज़्बात – नई किताब: ‘कुछ मीटर पर ज़िन्दगी’ …उम्मीद करता हूं कि पहले की रचनाओं की तरह इसे भी आपका भरपूर प्यार मिलेगा। ई-संस्करण, एमेज़ॉन पर उपलब्ध –

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#ज़हन

Sahityik Samalochna ki Pustak mein…

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“किन्नर समाज – संदर्भ – तीसरी ताली” (साहित्यिक समालोचना) – वाणी प्रकाशन की किताब में मेरी कहानी “किन्नर माँ” को शामिल कर उसपर अपनी राय देने के लिए लेखिका पार्वती कुमारी जी का आभार। हर बार की तरह बस एक शिकायत कि मेरा काम या नाम कहीं आता है, तो उस समय लेखक, प्रकाशक आदि के बजाय कई महीनों या सालों बाद कोई मित्र, प्रशंसक जानकारी देता है। खैर, कोई बात नहीं पार्वती जी का लिटरेरी क्रिटिसिज़्म में ये प्रयास मुझे अच्छा लगा। उन्हें और टीम को बधाई! #ज़हन

#Update – Kuku FM 2020

Mohit Sharma

Among Kuku FM top contributors. I hope to break into Top 10 this year.

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In 2020, they are working towards bringing monetization for creators on their platform.
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Moral Story – कूक की ज़रूरत #zahan

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नीलिमा पीलीभीत में एक निजी स्कूल की शिक्षिका थी। खाली समय में वह अपने परिवार और सहकर्मियों के साथ “कूक” नाम की एक एनजीओ भी चलाती थी। इस स्वयंसेवी संस्था का मुख्य उद्देश्य उत्तर भारत में आने वाले प्रवासी पक्षियों और उनके अस्थायी ठिकानों का संरक्षण करना था। अब तक नीलिमा की जागरूकता सभाएं और सामग्री कई स्कूलों और दूर-दराज़ के इलाकों में पहुंचकर लोगों को नई जानकारी रहीं थी। नीलिमा अपने अभियान को बड़े स्तर पर करना चाहती थी। इसकी शुरुआत वह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भी एक बड़ी जागरूकता रैली निकलना चाहती थी, जिसके बाद वह कुछ सभाएं करती। उसने कुछ स्कूलों से संपर्क किया और धीरे-धीरे अच्छा समर्थन जुटाकर रैली करने के लिए छुट्टी का दिन चुना। अब बारी थी लखनऊ पुलिस कमिश्नर से रैली और सभाओं की अनुमति लेने की।

पहले तो इस आवेदन के साथ इस उस वरिष्ठ अधिकारी से मिलने में ही दो दिन लग गए। जब बारी आई तो उनका बर्ताव कुछ रूखा लगा…औपचारिकता बीतने के बाद नीलिमा से रहा नहीं गया।

“क्या हुआ, सर? क्या आवेदन में कोई कमी है?”

नीलिमा ने जैसे गुब्बारे को सुई लगा दी थी।

“कमी? कमी की बात बाद में…इस आवेदन की ज़रुरत ही क्या है?”

नीलिमा बड़े अधिकारी की डांट से कुछ असहज हुई पर उसने खुद को संभाला – “मैं समझी नहीं, सर?”

पुलिस कमिश्नर उसी ढंग में बोले – “इस शहर के हिसाब से आपकी रैली और सभाएं बड़ी नहीं है पर कुछ रास्ते खाली करवाने पड़ेंगे, कई सिपाहीयों के अहम घंटे बच्चों की लाइन लगवाने और उनके चारो तरफ घुमते बीतेंगे। क्यों? क्योंकि आपकी फैंसी, लीक से हटकर संस्था को पब्लिसिटी चाहिए।”

खुद पर बिना बात उठे सवालों से नीलिमा भी अपने स्वर में कुछ सख्ती लाई – “माफ़ी चाहती हूँ, सर, लेकिन मेरी ऐसी कोई मंशा नहीं है।

पुलिस कमिश्नर – “छुट्टी के दिन, यहां 36 तरीके के विरोध प्रदर्शन, धरना वगैरह चलते हैं! लूट, बलात्कार, हत्या, रंजिश, राजनीती जैसे ज़रूरी मुद्दों के बीच आपको चिड़ियों की पड़ी है? यहां लोग मर रहे हैं और आपको बैंगनी सारस, सतरंगी बुलबुल बचानी है? शर्म आनी चाहिए आपको!”

नीलिमा ने गुस्से में अपना आवेदन वापस खींच लिया – “आपसे मेरा 5 मिनट का अपॉइंटमेंट था। आपसे विनती है कि अंत के तीन मिनट मेरी बात सुन लीजिए…जागरूकता के लिए मैं रैली के बजाय कोई और माध्यम चुन लूंगी। उत्तर प्रदेश की जनसंख्या लगभग 24 करोड़ है और लक्षद्वीप की 95 हज़ार। तो क्या केवल आंकड़ों के आधार पर लक्षद्वीप में जो सरकारी अधिकारी और संसाधन लगे हैं उन्हें हटा लें और ज़्यादा ज़रूरी उत्तर प्रदेश में लगा दें? क्या लक्षद्वीप की दशमलव में ही सही पर कोई कीमत नहीं? अपराध, शिक्षा, महिला और बाल विकास, गरीबी आदि पर भारत में लाखों स्वयंसेवी संगठन काम कर रहे हैं। आप चाहते हैं उस भीड़ का हिस्सा बनके ’36 तरीके के विरोध प्रदर्शन, धरनों’ में शामिल हो जाऊं? क्या मेरे जुड़ने से उनमें चार चाँद लग जाएंगे?
आपके तर्क के हिसाब से तो जब आप छोटे बच्चे थे तभी देश की हालत की गंभीरता को देखते हुए…आपको साहित्य, गणित, काव्य की जगह लूट, बलात्कार और हत्या जैसे अपराधों की जघन्यता के बारे में बताया जाना शुरू कर देना चाहिए था? नहीं सर! ऐसे नहीं चलती दुनिया। कहीं हवा का ज़रा सा दबाव कम होता है और उसके असर से हुए चैन रिएक्शन से दूर कहीं प्राकृतिक आपदा आ जाती हैं…इसलिए बैंगनी सारस, सतरंगी बुलबुल भी इंसानों जितने ही अहम हैं। बस सामने दिखाई नहीं देता तो लगता है इनका कोई मतलब ही नहीं। यह बात आपको समझानी पड़ रही है तो सोचिए…आम इंसान और आने वाली पीढ़ी को इसे समझाना कितना ज़रूरी है।”

कुछ मिनट बाद नीलिमा, पुलिस कमिश्नर की शाबाशी और रैली-सभाओं के लिए स्वीकृति पत्र लेकर बाहर निकली।

समाप्त!
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#ज़हन

Hindi Story – भूत बाधा हवन बनाम एक्सोरसिस्म #zahan

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पुणे से कुछ दूर एक वीरान सी बस्ती में लगभग आधा दर्जन परिवार रहते थे। वहां दो पड़ोस के पुराने घरों में कई सालों से दो भूत रहते थे। एक का नाम था विनायक और दूसरी थी क्रिस्टीन। दोनों बड़े ही शांत किस्म के थे पर उनका थोड़ा-बहुत विचरण या कुछ हरकतें (जिनसे किसी को नुक्सान नहीं होता था) उन घरों में बाद में किराए पर रहने वाले लोगों को डरा दिया करती थी। हालांकि, थोड़े समय बाद इन घरों में रह रहे परिवारों को इनकी आदत पड़ जाती। इस तरह कुछ दशक बीते। जहां विनायक, भगवान गणेश का परम भक्त था वहीं क्रिस्टीन कट्टर कैथोलिक ईसाई।

मरने से पहले दोनों जितना एक दूसरे से बचते थे, मरने के बाद न चाहते हुए भी बातें करते-करते अच्छे दोस्त बन गए थे। ऐसा नहीं था कि मरने से पहले विनायक और क्रिस्टीन में कोई बात नहीं होती थी। दोनों के जीवनसाथी बहुत पहले दुनिया छोड़ चुके थे। बस्ती में पेड़ लगाना, बिजली की लाइन पाने के लिए धरना देना, बंजर ज़मीन पर सब बस्ती वालों की साझा खेती जैसे कामों में दोनों सबसे ज़्यादा बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे… इस वजह से दोनों मन ही मन एक दूसरे की इज़्ज़त भी करते थे पर जहाँ धर्म, त्यौहार आदि की बात आती थी तो विनायक और क्रिस्टीन उत्तर और दक्षिण ध्रुव बन जाते थे। अपने धर्म के प्रति इनका विश्वास इतना दृढ़ था कि मरने के बाद भी ये एक-दूसरे को अपना धर्म अपनाने के तर्क दिया करते थे।

किस्मत से विनायक के घर में एक ईसाई परिवार किराए पर आया और थोड़े समय बाद क्रिस्टीन के घर में एक गणेश भक्त परिवार। विनायक और क्रिस्टीन बड़ी उत्सुकता से उन परिवारों की दिनचर्या देखते और फिर एक दूसरे को बताते कि कैसे आजकल के तरीके और बच्चे पहले से अलग हो गए हैं, कैसे पुराना धीमापन नई तेज़ी से बेहतर था और कैसे किराए पर आये परिवार के सदस्य बहुत अच्छे हैं। अगर कभी-कभार उन्हें कुछ गलत या दूसरे के धर्म का उल्लंघन दिखता तो वे जानबूझ कर दूसरे को नहीं बताते। न चाहते हुए भी कुछ हरकतों, हल्की खटपट और दूसरी आवाज़ों की वजह से दोनों परिवारों का शक बढ़ने लगा कि इन घरों में भूतों का साया है। हिन्दू परिवार ने अपने घर का भूत (क्रिस्टीन) भगाने के लिए हवन रखा और उसी दिन ईसाई परिवार ने अपने घर से भूत (विनायक) निकालने के लिए बड़े पादरी से एक्सोरसिस्म की योजना बनाई। दोनों परिवार साबित करना चाहते थे कि भूत भगाने के लिए उनके धर्म का तरीका दूसरे धर्म से बेहतर और कारगर है।

विनायक, स्वभाव के अच्छे ईसाई परिवार को नुक्सान नहीं पहुंचाना चाहता था। साथ ही, क्रिस्टीन आहत न हो इसलिए विनायक एक्सोरसिस्म से पहले की शाम घर छोड़कर जंगलों की तरफ उड़ गया। धर्म की छोटी बहस में इतने सालों की दोस्ती इस तरह ख़त्म कर देना उसे गवारा नहीं था। उसने सोचा कि अगर हिन्दू धर्म बेहतर होगा तो उसे खुद से कोई जतन करना ही नहीं पड़ेगा। उसके भूतिया मन में चल रहा था कि क्रिस्टीन क्या सोच रही होगी। पता नहीं वह उसका अचानक गायब होना समझ पाई होगी या नहीं।

जंगल आकर उसका सिर चकरा गया। शांति और लोगों से दूर जंगल के हर पेड़ पर भूतों ने डेरा जमा रखा था। कोई भी नए भूत-प्रेतों के लिए अपनी जगह छोड़ने को तैयार नहीं था।

“हे गणपति बप्पा! ऐसा तो नहीं सोचा था…आत्मा बनने के बाद भी घर के लिए भटकना पड़ेगा।”

कुछ देर भटकने के बाद, विनायक उस जान-पहचानी आवाज़ पर मुड़ा…

“किराए पर रहने के लिए जगह चाहिए…यह पेड़ छोटा है पर दो भूत एडजस्ट कर लेगा।”

विनायक ख़ुशी से फूल कर कुप्पा होके बोला – “क्रिस्टीन! तुम तो…”

क्रिस्टीन मुस्कुराकर बोली – “हाँ! गणपति बप्पा से पिटाई थोड़े ही खानी थी।”

उधर बस्ती में ज़ोर-शोर से बिना भूत वाले एक्सोरसिस्म और हवन चल रहे थे।

समाप्त!
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#ज़हन

Stories on KUKU FM #zahan

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Talented Kuku FM team is regularly creating audio stories, audio books on my stories and poems since July this year (Total 9 till date). 🤖 🥳
Kuku FM वेबसाइट और ऐप्लिकेशन पर सुनिए कई जॉनर में मेरी कहानियाँ और काव्य।
Dushman Mehmaan
Diljala Kutta
‘Aids Peedit Vampire’ now on Kuku FM. More audio stories soon.

English Translation of my story: Colorblind Beloved – कलरब्लाइंड साजन

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‘Colorblind Beloved’, English translation of my story ‘कलरब्लाइंड साजन’. Translator – Swarajya. PC – Art Corgi
कभी कोई किसी रचना पर ऑडियो बना देता है, कोई अनुवाद कर देता है पर रचनाकार को कोई नहीं बताता! 😠

झूठी शान (Hindi Moral Story for Kids) #zahan

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बच्चों के लिए शिक्षाप्रद कहानी – झूठी शान
पीडीएफ के अलावा ड्राफ्ट मिल नहीं रहा। वहाँ से कहानी यहाँ लाने पर corrupt characters/font दिख रहे हैं. इस वजह से स्क्रीनशॉट साझा कर रहा हूँ। कहानी गौरी अर्द्धवार्षिक पत्रिका में प्रकाशित।

बूढ़े बरगद के पार (Hindi Story)

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संतुष्टि की कोई तय परिभाषा नहीं होती। बच्चा कुदरत में रोज़ दोहराये जाने वाली बात को अपने जीवन में पहली बार देख कर संतुष्ट हो सकता है, वहीं अवसाद से जूझ रहे प्रौढ़ को दुनिया की सबसे कीमती चीज़ भी बेमानी लगती है। नवीन के चाय बागान अच्छा मुनाफा दे रहे थे। इसके अलावा अच्छे भाग्य और सही समझ के साथ निवेश किये गए पैसों से वह देश के नामी अमीरों में था। एक ही पीढ़ी में इतनी बड़ी छलांग कम ही लोग लगा पाते हैं। हालांकि, नवीन संतुष्ट नहीं था। मन में एक कसक थी…उसके पिता हरिकमल।

जब नवीन संघर्ष कर रहा था तब उसके पिता हर कदम पर उसके साथ थे। वे अपने जीवन के अनुभव उससे बांटते, निराश होने पर उसे हौंसला देते और यहाँ तक कि उसके लिए कितनी भागदौड़ करते थे। ऐसा भी नहीं था कि ये कुछ सालों की बात थी। अब नवीन की उम्र 53 साल थी और उसके पिता करीब 82 साल के थे। आज जब जीवन स्थिर हुआ तो अलजाइमर के प्रभाव में वे पुराने हरिकमल जी कहीं गुम हो गए। नवीन के लिए बात केवल खोई याददाश्त की नहीं थी, मलाल था कि ऊपरवाला कुछ कम भी देता पर ऐसा समय देखने के लिए पिता को कुछ ठीक रखता।

“बरगद…”

हरिकमल अक्सर ये शब्द बुदबुदाते रहते थे। कसक का इलाज ढूंढ रहे नवीन ने इस शब्द पर ध्यान तो दिया पर कभी इसपर काम नहीं किया। एक दिन दिमाग को टटोलते हुए नवीन ने इस बरगद की जड़ तक जाने की ठान ली। कुछ पुराने परिजनों से और कुछ अपनी धुंधली यादों से तस्वीर बनाई। गांव में घर के पास बड़ा सा बरगद का पेड़। खेती-बाड़ी करने के बाद पिताजी उसकी छांव में बैठा करते थे। इसके अलावा हरिकमल कुछ और भी कहते रहते थे पर वह बात पूरा ध्यान देने पर भी समझ नहीं आती थी। ऐसा लगता था जैसे बरगद के बाद बोली बात उनके मन में तो है पर होंठो तक आते-आते बिखर जाती थी। क्या पता वह दूसरी बात अलजाइमर के प्रभाव में उन्हें याद न हो….या वे खुद बोलना न चाहते हों। अब अधूरी तस्वीर में एक पुराना बरगद था और बाकी यादों के कोहरे में छिपी कोई बात। चलो पूरी न सही एक सिरा ही सही।

नवीन ने विशेषज्ञों का एक दल पिताजी के आधे-अधूरे वर्णनों को पकड़ने में लगा दिया।

“बरगद…”

यह शब्द और इसके अलावा जो कुछ भी हरिकमल कहते उसपर गहन चर्चाएं होती, कलाकारों से स्केच बनवाये जाते और कंप्यूटर की मदद से उन्हें असलियत के करीब लाया जाता। परिजनों और नवीन की यादों पर शोध कार्य हुए। अंत में नवीन के एक फार्म हाउस का बड़ा हिस्सा साफ़ करके उसमें गांव जैसा पुराना घर और दूसरे शहर से जड़ों के नीचे कई मीटर मिट्टी समेत विशाल, पुराने बरगद को लगाया गया। कच्चे मकान और बरगद की कटाई छटाई इस बारीकी से की गई थी कि वो सबकी यादों के आइनों के सामने खरे उतर सकें।

“बरगद…”

लो बरगद तो आ गया। नवीन, सारे परिजन और उसका अनोखा दल ‘बरगद’ पर हरिकमल जी की प्रतिक्रिया जानने को बेचैन था। हालांकि, डॉक्टरों ने किसी बड़े चमत्कार की उम्मीद रखने की सलाह नहीं दी थी। फिर भी ये अनोखा प्रयोग और इससे जुड़ी मेहनत, भावनाएं जैसे डॉक्टरों की सलाह को अनदेखा करने की अपनी ही सलाह दे रही थीं।

हरिकमल को फार्म हाउस लाया गया। इस बात का पूरा खयाल रखा गया कि उन्हें अचानक बड़ा झटका न लगे। बरगद को ढ़ककर रखा गया। धीरे-धीरे उन्हें पुराने घर से जुड़ी चीज़ें दिखाई गईं, वैसे तापमान और खेतों में कुछ दिनों तक रोज़ थोड़ी देर के लिए रखा गया। जब उनकी प्रतिक्रिया और सेहत सही बनी रही तो आख़िरकार पुराने बरगद से उनके मिलने की तारीख तय हुई।

“बरगद…”
वह दिन भी आया। हरिकमल से मिलने उनका ‘बरगद’ आया था। वे बरगद से किसी पुराने यार की तरह लिपट गए। बरगद से ही उनका लंबा एकालाप में लिपटा वार्तालाप चला। उनकी ख़ुशी और संतुष्टि देख कर सभी अपनी मेहनत सफल मान रहे थे। इतने में हरिकमल ज़मीन पर निढाल होकर रोने लगे। सब कुछ ठीक तो हो गया था? अब क्या रह गया?

सब सवालों से घिरे थे पर नवीन को जैसे जवाब पता था या शायद वह इस घटना का इंतज़ार कर रहा था। अपने दल और नौकरों को हरिकमल से दूर हटाकर नवीन उनसे लिपट गया।

“देख…बाबू…”

“बोलो पिता जी, क्या रह गया? क्यों परेशान हो…इतने सालों से। क्यों मुँह में मर जाती है बरगद के बाद दूसरी बात?”

दहाड़े मारते हरिकमल बोले – “बरगद तो आ गया…”

“बरगद तो आ गया…पर पुराना माहौल नहीं आया।”

समाप्त!
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Prayas (Hindi Story)

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Story ‘Prayas’ in Anubhav Patrika

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