दुश्मन मेहमान (कहानी) – मोहित शर्मा ज़हन

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वर्ष 1978
ब्रिटिश साम्राज्य से आज़ादी मिलने के बाद बने क्रोनेशिया और सर्बा पडोसी मुल्कों के बीच रिश्ते हमेशा तल्ख़ रहे। दशकों तक शीत युद्ध की स्थिति में दोनों देशो का एक बार भीषण युद्ध हो चुका था। अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद युद्ध समाप्त हुआ। युद्ध में कुछ टापू और समुद्री सीमा कब्ज़ाने वाले सर्बा को जीत मिली थी पर दोनों तरफ भारी नुक्सान हुआ था। युद्ध के बाद स्थिति काफी बदल गयी थी। अब क्रोनेशिया एक अच्छे-खासे रक्षा बजट के साथ आर्थिक रूप से सशक्त राष्ट्र था।

रिक स्मिथ नामक न्यूक्लियर साइंटिस्ट का नाम अक्सर किस्से-कहानियों में आता था। लोग कहते थे कि वह कोई किवदंती, क्रोनेशिया का काल्पनिक सिंबल है पर सर्बा की ख़ुफ़िया एजेंसी जानती थी कि रिक जो कई नाम और पहचानो से जाना जाता था सिर्फ वैज्ञानिक ना होकर एक काबिल सीक्रेट एजेंट भी था। उसने सर्बा के कुछ महत्वपूर्ण मिशन, व्यापारिक डील्स को नाकाम किया था और वह सर्बा व अन्य देशो की सहायक ख़ुफ़िया एजेंसियों के कई एजेंट्स की हत्या कर चुका था। सर्बा के दर्जनों जासूस सिर्फ उसको पकड़ने या मारने के लिए वर्षो से प्रयासरत थे।

सर्बा के टॉप एजेंट चीमा को रिक के नेपाल में देखे जाने की सूचना मिलती है। चीमा तुरंत अपने दल के साथ नेपाल रवाना होता है। तटस्थदेश में छद्म पहचानो के साथ गुप्त रूप से ही काम किया जा सकता था इसलिए चीमा की गतिविधियां सीमित और लक्ष्य पर केंद्रित थी। रिक के वहाँ होने का कारण ढूंढ रहा चीमा नेपाल की सीमाओं पर अपने सहायक नियुक्त करता है। क्या रिक ने किसी डील के लिए नेपाल आने का जोखिम लिया था या फिर वह कोई डील तोड़ने आया था? नेपाल में सर्बा दूतावास हर उपलब्ध जानकारी चीमा को दे रहा था। इन दस्तावेजों को देखते हुए चीमा का ध्यान एक कागज़ पर गया जहाँ कुछ सर्बाई लोगो के नाम थे। यह दल नेपाल की तरफ से माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाला था। दल के सदस्यों में देश के कुछ प्रमुख वैज्ञानिक थे। चीमा ने स्थानीय शेरपा से एवरेस्ट के बारे में जानकारी ली। शेरपा ने बताया की कई बार एवरेस्ट पर चढ़ते हुए लोग फिसल कर ऊंचाई से गिरकर गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं, अचानक हिमस्खलन में दब जाते हैं या शून्य से दर्जनों डिग्री नीचे तापमान को झेलते हुए 8000 मीटर से ऊपर “डेथ ज़ोन” में ऑक्सीजन की कमी के कारण चेतना, मानसिक संतुलन खोकर मारे जाते हैं। अक्षम, घायल या मरते हुए लोगो को नीचे लाने में जान का जोखिम होता है इसलिए इस पर्वत पर 250 से अधिक मृत पर्वतारोहियों के शरीर जस के तस पड़े हैं जिनमे हर साल कुछ लाशों का इज़ाफ़ा होता है। चीमा को उसकी शंकाओं का समाधान मिल गया था। बदली पहचान के साथ रिक इस दल को एवरेस्ट की ऊंचाई पर ख़त्म करने वाला था। बिना वक़्त बेकार कर चीमा अपनी टीम के साथ एवरेस्ट चढ़ाई पर निकल पड़ा। उसका पहला लक्ष्य था सर्बाई वैज्ञानिको को बचाना था और उस से भी महत्वपूर्ण रिक को मारना था। टीम को भरोसा था कि चढ़ते या उतरते हुए कभी न कभी तो रिक उनके हाथ लगेगा। कहीं रिक चीन की तरफ से न उतरे इसलिए चीमा ने एक अन्य दल को चीन की तरफ की चढाई की घेराबंदी पर लगाया। चेताने के लिए सर्बा दल को रेडियो संदेश भेजे गए जिनका जवाब नहीं आया। अपनी टीम और गाइड शेरपा को पछाड़ता चीमा रिकॉर्ड समय में 25000 फ़ीट तक पहुँच गया, एवरेस्ट के आखरी “कैंप 4” से उसे एक हेलीकॉप्टर उड़ता दिखाई दिया। इस ऊंचाई से ऊपर हवा की परत इतनी पतली थी की हेलीकॉप्टर सुरक्षित उड़ या उतर नहीं सकता था, नीचे जाते उस हेलीकॉप्टर में चीमा को रिक की एक झलक दिखी। चीमा जान गया था कि अब कोई वैज्ञानिक ज़िंदा नहीं होगा, कुछ मीटर चढ़ाई के बाद उसके अंदाज़े की पुष्टि वैज्ञानिको के निर्जीव शरीर देख कर हो गयी। अधूरी तैयारी की अपनी भूल पर गुस्से से फुफकारता चीमा दुनिया के शिखर, एवरेस्ट की छोटी से सिर्फ 250 मीटर से नीचे लौट आया।

वर्ष 1980
सर्बाई नौसेना, वासुसेना की घेराबंदी से क्रोनेशिया की तीनो सेनाओं की गतिविधियां सीमित हो गयी थी। चीमा को एक से अधिक इंटेल मिली कि 8 महीनो से क्रोनेशिया से बाहर मौजूद रिक को हर हाल में क्रोनेशिया लौटना था। बाहरी देशो द्वारा बहिष्कार करने के बाद देश के 2 नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र और परमाणु हथियारों बनाने का पूरा ज़िम्मा रिक और उसकी टीम पर आ गया था। चीमा के मार्गदर्शन में सर्बा की भारी घेराबंदी की वजह से रिक द्वारा क्रोनेशिया में घुसने की 2 कोशिशें नाकाम हो चुकी थी। क्रोनेशिया का तीन तरफ से सर्बा से घिरा होना रिक की परेशानी की सबसे बड़ी वजह थी। केवल समुद्र के रास्ते ही रिक अपने देश में जा सकता था, जिसके आस-पास सर्बाई नौसेना और एजेंट्स का जाल बिछा था।

2 यात्री विमान सर्बा के समुद्री क्षेत्र के ऊपर उड़ते हैं जिनको ट्रेस कर तुरंत सर्बाई लड़ाकू विमान भेजे जाते हैं। इन यात्री विमानों से संपर्क करने पर कोई जवाब नहीं आता। लड़ाकू विमान द्वारा चेतावनी के अन्य तरीके भी विफल हो जाते हैं। अचानक अंदर हुए धमाकों के साथ क्षतिग्रस्त विमान क्रैश होने लगते हैं। दोनों विमान समुद्र में क्रैश ना होकर सर्बा शासित दो टापुओं पर गिरते हैं। इन टापुओं पर सर्बा के 2 महत्वपूर्ण परमाणु संयंत्र थे जिनके कोर के पास गिरकर विमानों ने भारी तबाही मचाई। इन टापुओ और आस-पास के समुद्री क्षेत्र में विकिरण फ़ैल गया, जिस वजह से सर्बा को इन्हें क्वारंटाइन घोषित करना पड़ा। लड़ाकू विमान पायलट्स ने आँखों देखा हाल बताया पर क्रोनेशियाई सरकार और मीडिया ने खबर फैलाई कि किस तरह मासूम पर्यटकों से भरे विमानों को सर्बा वायुसेना द्वारा मार गिराया गया। टापू पर पड़े और समुद्र में तैरते मानव अवशेष इस बात की पुष्टि कर रहे थे। विदेशी मीडिया को मृत पर्यटको की तस्वीरें, लिस्ट बांटी गयी, उनके नाम पर स्मारक बनाये गए और मानवीय आधार पर सर्बा की विश्वभर में कड़ी निंदा हुई। इस घटना से सर्बा को दोहरा नुक्सान हुआ था उसके परमाणु संयंत्र तबाह हुए जिनसे फैले विकिरण के कारणउसको टापुओ पर से हटना पड़ा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किरकिरी होने के साथ कुछ प्रतिबंध भी लग गए। नुक्सान का जायज़ालेता और टापुओं पर से सामान समेटता चीमा जानता था कि इतने बड़े षडयंत्र के पीछे सिर्फ रिक हो सकता है। बाद में मानव अंशो की जांच और अपने सूत्रों से उसके पता चला कि दोनों यात्री विमानों के दोनों पायलट आत्मघाती मिशन पर थे और बड़ी चालाकी से उन्होंने अपने आपको दो टापुओं के संयंत्रो पर क्रैश किया। विमान के अंदर मौजूद यात्री पहले से ही मृत लोग थे, जिन्हें अलग-अलग मुर्दाघरों से लाया गया था और काल्पनिक पहचान दी गयी थी। चीमा का दिमाग घूम रहा था। वह उलझन में था कि क्या वह रिक की किसी और चाल को नाकाम करने का इंतज़ार करे या अपने तरीके से इन हमलो का जवाब दे। बार-बार के रक्षात्मक रवैये से चीमा परेशान हो चुका था। उसने ठाना कि जब रिक लोगो की जान, सही-गलत की परवाह नहीं करता तो उसे भी देशहित के लिए इतना नहीं सोचना चाहिए। अब उसने क्रोनेशिया को रिक के अंदाज़ में ही नुक्सान पहुंचाने के लिए कुछ योजनाएं बनानी शुरू की, जो काफी लंबे समय से उसकी रक्षात्मक योजनाओ के बिल्कुल उलट थीं। चीमा ने अपने नेटवर्क के ज़रिये क्रोनेशिया को भारी कीमत पर दोयम दर्जे की रक्षा पनडुब्बियां दिलवायी। कुछ समय बाद उसने क्रोनेशिया की एक छावनी में स्थित झील को विषाक्त कर दिया। क्रोनेशियाई सरकार और एजेंट्स सतर्क हो गए थे इसलिए कुछ समय के लिए सर्बा सरकार ने उसे फिर से रिक संबंधी टीम की ज़िम्मेदारी सौंप दी। चीमा दोबारा उस रक्षात्मक एजेंट पिंजरे में आ गया था जिससे वह नफरत करता था। अपने हर मिशन में जान लड़ाने के बाद भी चीमा की एक नज़र हमेशा पुराने दुश्मन रिक की ख़बरों पर बनी थी। वह जानता था कि अब तक रिक को क्रोनेशिया घुसने में सफलता नहीं मिल पाई है। चीमा यह किस्सा हमेशा के लिए ख़त्म कर देना चाहता था ताकि फिर कभी उसे इस भूमिका में ना बंधना पड़े। क्रोनेशिया सम्बंधित 2 छोटे पर सफल मिशन अंजाम देने के बाद चीमा का आत्मविश्वास बढ़ गया था। इस काम के लिए उसने अपनी टीम में 2 दर्जन जूनियर एजेंट्स जोड़ लिए थे। सर्बाई खेमे को सूचना मिली कि चीमा की सतर्कता से रिक महीनों से क्रोनेशिया में घुस नहीं पा रहा है, ऐसे में चीमा की जान को खतरा है।

कुछ दिनों बाद तड़के सर्बा सुरक्षा राडारों पर चमकते एक बिंदु ने हड़कंप मचादिया। एक विशालकाय अज्ञात कार्गो विमान सर्बा की समुद्री सीमा के ऊपर उड़ रहा था जो कुछ ही देर में सर्बा में प्रवेश करने वाला था। पहले की तरह विमान को भेजे गए सभी संदेशो का कोई जवाब नहीं आया। चीमा समुद्री युद्ध पोत पर अपनी टीम के साथ सारे घटनाक्रम पर नज़र रखे था। एक फाइटर प्लेन कार्गो विमान को चेताने पहुंचा। चीमा के अनुसार सर्बा की सतर्कता के चलते क्रोनेशिया दोबारा विमान इच्छित स्थान पर क्रैश करने वाली हरकत नहीं कर सकता था, उसे मामला कुछ और ही लग रहा था। इस बार सर्बाई फाइटर प्लेन पहले से आधुनिक और कार्गो प्लेन को हवा में ही निष्क्रिय करने में सक्षम था। लड़ाकू विमान पायलट ने जब पास से कार्गो विमान के कॉकपिट को देखा तो उसमे दो मृत या बेहोश पायलट पड़े थे और कुछ महिलाएं मदद के लिए हाथ हिलाती दिख रही थी। पायलट ने उन्हें रेडियो गियर पहनने का इशारा किया। रेडियो पर महिलाओं ने बताया की कॉकपिट में हवा का दबाव कम होने के कारण दोनों पायलट बेहोश हो गए हैं, जिस वजह से विमान एक दिशा में उड़ा जा रहा है। फाइटर पायलट और ग्राउंड कण्ट्रोल ने उन महिलाओं को विमान को हवा में रखने के सीमित निर्देश दिए जो वो समझ सकें। सब सुनने के बाद चीमा का शक बना हुआ था, सर्बाई नौसेना अलर्ट पर थी। आखिरकार महिलाएं एक पायलट को होश में लाने में सफल रही लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। कार्गो विमान का ईंधन ख़त्म हो चूका था और विमान को समुद्र में क्रैश लैंडिंग करनी पड़ी। विमान पानी को छूते ही टुकड़ो में बिखर गया। लगभग 70 महिलाएं पैराशूट पहन कर पहले ही विमान के पिछले द्वार से कूद चुकी थी। चीमा को लग रहा था कि विमान में जैविक हथियार हो सकते हैं जो सर्बा के समुद्री क्षेत्र में तबाही मचा सकते हैं। विमान सर्बा के आखरी टापू बेस और क्रोनेशिया की समुद्री सीमा से कुछ मील दूर ही क्रैश हुआ था। चीमा ने युद्ध पोत के बजाए अन्य छोटे माध्यमो से जाने का फैसला लिया। जोखिम लेते हुए उसने कुछ स्टीमर और बड़ी नावों से मलबे और पानी में तैर रही महिलाओं को घेरा और बंदी बनाकर टापू के सैन्य बेस पर ले आया। सभी महिलाओं की तलाशी ली गयी। इतनी बड़ी घटना में रिक का हाथ हो सकता था जिस वजह से चीमा ने अपनी महिला सैनिको से ख़ास इस बात की पुष्टि करवाई कि क्या ये सभी महिलाएं ही हैं या इनमे कोई पुरुष, किन्नर भी छुपा है, सब महिलाएं थी। अब बारी थी गहन पूछताछ की, जिसके लिए अगर कड़ा टॉर्चर ज़रूरी हो तो उसके निर्देश थे। आश्चर्यजनक रूप से बंदी महिलाएं थोड़ी प्रताड़ना में ही बोलने लगी। उन्होंने बताया कि वह क्रोनेशिया की कॉलेज कैडेट्स हैं जो एक सहायक देश तोरमा में नर्सिंग की ट्रेनिंग ले कर लौट रही थी। पहले उनका विमान अंतरराष्ट्रीय मार्ग से उड़ रहा था पर अचानक कॉकपिट में दबाव कम होने से पायलट बेहोश हो गए और विमान सर्बा की सीमा में चला गया। चीमा के पास बैठे मनोवैज्ञानिको, वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों का यही मत था कि ये महिलाएं सैनिक या एजेंट नहीं थी। इन दलीलों का चीमा पर कोई असर नहीं पड़ रहा था और वह एक-एक कर सभी महिलाओं से पूछताछ करने लगा। घंटो बाद कोई निष्कर्ष ना निकलने पर चीमा को ऊपर से आदेश आया कि महिलाओं की संख्या अधिक है इसलिए उन्हें छोड़ दिया जाए। सर्बा फिर से अंतरराष्ट्रीय बहिष्कार, किरकिरी नहीं चाहता था। चीमा ने बातों में अनियमितता, उलझन दिखा रहीं 11 महिलाओं को रोककर बाकी को जाने दिया। हालांकि, इन महिलाओं को वह अब 48 घंटो से अधिक नहीं रोक सकता था पर उसे विश्वास था कि वह किसी ना किसी लीड तक ज़रूर पहुंचेगा।

चीमा और उसके दल ने इन महिलाओं को और प्रताड़ना दी। चीमा के दिमाग में एक उलझन खटक रही थी कि कोई ऐसी बात है जो उसके दिमाग में नहीं आ रही है। कुछ तो छूट रहा है। आखिरकार कुछ कैडेट्स ने क्रोनेशिया से जुड़े कुछ नक़्शे, ख़ुफ़िया जानकारी दी। 48 घंटे पूरे होने के बाद बेजान सी हो चुकी कैडेट्स को क्रोनेशिया तटरक्षक नौका को सौंप दिया गया। नौका के आँखों से ओझल होते हुए चीमा विडियोगेम खेलने लगा, कुछ देर बाद उसके अवचेतन मस्तिष्क की एक छोटी सी जानकारी ने उसे झटका दिया। क्रोनेशिया में तो ऐसी कोई कैडेट ट्रेनिंग नहीं होती, ना ही वहां की किसी सेना में महिलाएं हैं। चीमा का दिमाग घूम गया, वह कुछ स्टीमर्स के साथ नौका के पीछे गया। अब दौड़ अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा से क्रोनेशियाई सीमा तक जाने की थी। अगर क्रोनेशिया तटरक्षक नाव अपनी सीमा में पहुँच जायेगी तो उसपर हमला करना समुद्री जंग छेड़ सकता था। जिसका डर था वही हुआ, वह नाव अपने देश के तट से कुछ ही दूर थी। निराश चीमा को लौट जाना पड़ा। उसे याद आया कि वह क्या चीज़ थी जो उसका दिमाग पकड़ नहीं पा रहा था। एक औरत का चेहरा जाना-पहचाना लग रहा था…बिलकुल रिक जैसा। जब अपने क्रोनेशिया में घुसने की कई कोशिशें नाकाम हो गयी तो देश सेवा के लिए रिक और उसकी टीम ने सेक्स चेंज ऑपरेशन और हॉर्मोन थेरेपी की मदद से अपना लिंग बदल लिया था। अब वो सब वाकई में महिला बन गए थे। यह कार्गो विमान का सारा ड्रामा रिक स्मिथ और उसकी टीम ने अपने देश में घुसने के लिए रचा था। मुस्कुराता हुआ चीमा मन ही मन अपने सबसे बड़े दुश्मन की तारीफ़ कर रहा था पर उसने अभी हार नहीं मानी थी, चीमा के मन में बदला लेने की भावना और प्रबल हो गयी थी।
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Anthology: Apne-Apne Kshitij (Lagukatha Sankalan)

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4 stories in the anthology, Book Launch: 8 January, 2017 – World Book Fair Delhi 🙂

अपने-अपने क्षितिज – लघुकथा संकलन (वनिका पब्लिकेशन्स)
56 लघुकथाकारों की चार-्चार लघुकथाओं का संकलन।
मुखावरण – चित्रकार कुंवर रविंद्र जी

विश्व पुस्तक मेले में 8 जनवरी 2017 को 11:30 बजे वनिका पब्लिकेशन्स के स्टैंड पर इस पुस्तक का विमोचन का कार्यक्रम है व, जिसमें आप सभी आमंत्रित हैं।

समय का उधार (कहानी) – मोहित शर्मा ज़हन

3

पणजी स्थित निजी पर्यटन कंपनी में सेल्स मैनेजर आनंद कुमार एक अरसे बाद कुछ दिनों की छुट्टियों पर अपने घर अलीगढ आया था। पहले कभी कॉलेज हॉस्टल से छुट्टियों में घर लौटकर जो हफ़्तों की बेफिक्री रहती थी वो इस अवकाश में नहीं थी। रास्ते में ही आनंद को काम में कुछ अधूरे प्रोजेक्ट्स की बेचैनी सता रही थी। माँ, पिता और छोटी बहन से मिलकर कुछ देर के लिए आनंद को सुकून मिला।

माँ देखते ही शिकायत करने लगी कि “रंग कितना गिर गया है, चेहरे पर निशान हो गए हैं। अपना बिल्कुल भी ख्याल नहीं रखता ये लड़का!”

घर अब पहले सा क्यों नहीं लग रहा? आनंद के मन में उथल-पुथल चल रही थी…. पहले मुझे अगले दिन तक की फ़िक्र नहीं रहती थी, आज इतनी चिंता क्यों है? माँ-बाप जो कभी खाली बैठना पसंद नहीं करते थे अब उम्र के असर से धीरे-धीरे चलते है और उन्हें बीमारी, जोड़ों के दर्द को सहते हुए काम करते देखकर तकलीफ होती है। माँ किचन में खाना बनाते हुए अपनी खांसी नहीं रोक पा रही थी, लंगड़ाते हुए जब वों खाना लेकर आयीं तो आनंद बड़ी मुश्किल से अपनी पीड़ा छुपा पाया। वह माँ जो उसे गोद में लेकर घंटो तक पार्क, मेलों में घुमा लाती थी, जिसका बीमार होना घर में किसी को कभी पता नहीं चलता था। आज उनमे मेरे प्रति उतना ही स्नेह था पर उनका शरीर साथ नहीं दे रहा था। अपनी सर्विस में 12-15 घंटे की शिफ्ट करने वाले पिता जी का स्वास्थ्य अब अक्सर ख़राब रहता। पढाई के साथ-साथ बहन को घर का काम करना पड़ता। घरवालो की इस हालात को देखकर मुझे खुद पर शर्म आई। कुछ समय पहले तक मैं सोच रहा था कि मेरे लगभग सभी दोस्तों की शादी हो गयी है और मैं 30 साल का हो चूका हूँ, मुझे भी पणजी में अपनी गृहस्थी बसानी चाहिए। अब घर की स्थिति देखकर लगता है कुछ पैसे और जोड़कर 3-4 साल बाद शादी करनी चाहिए।

आनंद शहर में रह रहे अपने बचपन के स्कूली मित्रों के हाल-चाल लेने निकला। 5-6 मित्र जब साथ मिले तो लगा ही नहीं कि इतना समय अंतराल हुआ है, वही पुरानी बेफिक्री और हँसी-ठहाको का माहौल लौट आया। नुक्कड़ की गुमटी पर चाय के दौर में सबने अपने बीते वर्षों के किस्से बांटे। काफी समय बाद आनंद के माथे पर जो शिकन हमेशा बनी रहती थी, वो कुछ देर के लिए मिट गयी। फिर किसी दोस्त ने कहा – “सुना अंशु मैम गुज़र गयीं।” सभी चुप हो गए, उन्हें याद आया कि हरदम शैतानी करने वाले वो बच्चे कैसे अंशु मैम की क्लास में भोले, मासूम बन कर बैठ जाते थे। जो किसी विषय में ढंग से पढाई नहीं करते थे, काम पूरा नहीं करते थे, वो अंशु मैम के विषय सोशल स्टडीज़ में बाकी क्लास से बेहतर करते थे। मैम को क्या पसंद है, मैम का घर कहाँ है, घर में कितने लोग हैं, मैम का रूटीन क्या है आदि जैसी कई बातें आनंद और उसके गुट को रटी हुई थी। अंशु मैम उनका पहला क्रश थी, जिनके प्रति वो सब आकर्षित तो थे साथ ही सब उनका बहुत आदर करते थे। मैम को इम्प्रेस करने में आनंद सबसे अव्वल था। क्या क्लासवर्क, क्या होमवर्क वह तो कोर्स से बाहर की बातें तक याद करता था कि कहीं मैम के सामने स्टाइल मारने में काम आ जाएं। गुट का नेता होने के नाते बाकी मित्र थोड़ा दबे रहते थे। फिर सबको कहीं से खबर मिली कि अंशु मैम की शादी होने वाली है। मित्रों में मातम सा छा गया, काश मैम 10-12 साल इंतज़ार कर लेती हमारे सेटल होने तक, वैसे ये अपेक्षा तो सबको पता थी कि वास्तविक नहीं थी लेकिन मैम की शादी दूसरे शहर में हो रही थी यानी सबके मन में उनके स्कूल को छोड़कर जाने का दुख अधिक था। अंशु मैम की शादी का दिन आया और सभी मित्र घर पर कोई ना कोई बहाना बनाकर, 21  किलोमीटर साइकिल चला कर शहर के दूसरे छोर पर स्थित विवाह स्थल फार्महाउस पर पहुंचे। वहाँ स्कूल का कोई बच्चा नहीं आया था बल्कि इक्का-दुक्का ही शिक्षक पहुंचे थे। दुल्हन बनी अंशु मैम बहुत सुन्दर लग रहीं थी। उन्हें देखकर सबके चेहरे खिल गए। आनंद एंड पार्टी का शाम को इतनी दूर तक साइकिल चला कर आना जैसे सफल रहा। मैम बच्चो को देखकर चौंक गयीं, उन्होंने सबको अपने पास बुलाया। पूछने पर आनंद ने बताया की सब उसके दोस्त के बड़े भैया की कार में आएं हैं। मैम ने सबको धन्यवाद दिया और कहा कि “क्लास में सबको न्योता तो मैंने यूँ ही दे दिया था। मुझे लगा कोई बच्चा तो वैसे भी नहीं आने वाला, तुम सब आये मुझे बहुत अच्छा लगा। शाम को ज़्यादा देर तक मत रुकना और अच्छे से खाना खाकर जाना। बच्चो ने मैम को गुलदस्ता दिया और ऐसे कोने में चले गए जहाँ से मैम उन्हें देख या टोक ना सकें। इतनी मेहनत करने के बाद सबको तेज़ भूख लगी थी, खाने की तरफ बढ़ते उनके कदम स्टेज पर आते दूल्हे को देखकर रुक गए। आनंद गुट को दूल्हे का चेहरा देखकर जैसे सांप सूंघ गया। सबके भोले मन में एक बात थी कि हमारी परी जैसे मैडम का वर इतना मोटा-थुलथुल, बदसूरत कैसे हो सकता है? और तो और ऐसे व्यक्ति से शादी करने को मैम राजी कैसे हुई? मैम इतनी खुश कैसे हो सकती हैं? ज़रूर मैडम की ज़बरदस्ती शादी की जा रही है। इस मार्मिक आघात के बाद मित्र मण्डली की भूख मर गयी। नम आँखें लिए सब लोग अपने घर को चले, जितनी तेज़ी से विवाह स्थल पर आने को वो लोग पैडल मार रहे थे, अब वापसी में साइकिल चलाना उतना ही भारी हो गया था। दूल्हे और उसके खानदान को भला-बुरा सुनाते हुए सबने किसी तरह रास्ता काटा। आज 16-17 वर्षों बाद अंशु मैडम की मौत की खबर ने वो साड़ी यादें ताज़ा कर दी।

मित्रों में अपनी कहानी साझा करने की बारी आनंद की थी। उसने दोस्तों को याद दिलाया कि कैसे किशोरावस्था में वो सब आनंद के शरीर और चेहरे की वजह से उसको मॉडलिंग में जाने की सलाह देते थे पर वह पढाई में व्यस्त हो गया। स्कूल वाले आनंद से काफी सयाने हो चुके इस आनंद के लिए सब जानने वाले आश्वस्त थे कि वह कहीं अच्छी जगह जाएगा। मित्रों के साथ उसने पढाई शुरू की, समय के साथ बहुत कम लोग अपने इच्छित क्षेत्र में सफल हुए, कुछ लोगो ने अपने अभिभावकों की सम्पत्ति से दूकान या कोई व्यवसाय शुरू किया और कुछ तैयारी में लगे रहे। उसके कई प्रयासों बाद जब वह कोई सरकारी नौकरी पाने में सफल नहीं हुआ तो उसने कुछ जगह नौकरी का आवेदन दिया। ऐसा नहीं था कि आनंद में दिमाग या लगन की कमी थी पर भारत जैसे विशाल देश में आवेदको की इतनी भीड़ थी कि हर बार वह लिखित या साक्षात्कार में ज़रा से अंतर से रह जाता और यह सिर्फ आनंद की कहानी नहीं थी, उसके जैसे लाखो लोग इन दशमलव अंको से जीवन की दौड़ हार रहे थे।

आखिरकार एक सिलाई मशीन और मिक्सी की कंपनी में उसे सेल्समैन की नौकरी मिल गयी। कभी ऐसी नौकरियों पर वह हँसता था और कमिश्नर, बैंक पीओ बनने के सपने देखता था। मशीन बेचने जाते हुए वह हमेशा यह प्रार्थना करता कि कहीं कोई जान-पहचान वाला ना देख ले और उसकी बेइज़्ज़ती ना हो जाए।   जब उसने यह काम शुरू किया तब आनंद के मन में फील्ड वर्क करने वाले लोगो के लिए उसके मन में सम्मान बढ़ा। जीवन के बहुमूल्य वर्ष वह तैयारी में निकाल चुका था इसलिए वह अपनी नौकरी पूरी लगन से करने लगा। जो माँ का दुलारा हुआ  था और धूप में बाहर निकलने में नखरे किया करता था वह अब मौसम की परवाह किये बिना अपने सेल्स टारगेट को पूरा करने में लगा रहता था। काम से उसकी त्वचा काली और धब्बेदार हो गयी, अनियमित खान-पान से उसका शरीर बेडोल हो गया। कुछ वर्ष पहले जिसे मॉडल बनने के सुझाव मिलते थे, अब कोई पुराना मित्र उसे देख कर पहचान नहीं सकता था। खैर मेहनत रंग लायी और उसे पणजी में अच्छे वेतन और बेहतर पद पर नौकरी मिल गयी। अब आनंद का लक्ष्य पैसे जुटाकर घरवालो का संघर्ष कुछ कम करना था। पणजी में काम करते हुए उसे 4-5 वर्ष हो चुके थे। उसकी कहानी सुन एक मित्र ने दिलासा दिया कि आनंद अकेला नहीं है देश की भीड़ में हर दूसरा व्यक्ति ऐसा ही संघर्ष करने को मजबूर है।

अपनी छुट्टी यादों में गोते लगाते हुए पूरी करने के बाद आनंद पूरे जोश के साथ नौकरी में जुट गया। उसकी मेहनत के सब कायल हो गए, 5 वर्षो में वह सीनियर मैनेजर, जोनल मैनेजर के पद से दक्षिण भारत में उस कंपनी का डिप्टी हेड बन गया। अब उसकी मासिक आय लाखों में हो गयी। माँ-बाप के लिए एक नया घर खरीदने और छोटी बहन की शादी करने के बाद 35 वर्ष की आयु में उसने शादी करने का मन बनाया। किस्मत से उसकी शादी एक सुशील व सुन्दर लड़की मधु से हुई, जिसने आनंद का संघर्ष देखा था और इसी वजह से वह आनंद की बहुत इज़्ज़त करती थी।

विवाह दिवस आया और आनंद स्टेज पर आया। ख़ुशी के अवसर पर परिवार के चेहरे खिले हुए थे, माता-पिता अपने बच्चे की मेहनत और तरक्की से खुश थे। उसकी मित्र मण्डली जश्न में डूबी थी, उनका हीरो, उनका लीडर आज घोड़ी चढ़ रहा था। फिर मेहमानों की भीड़ में आनंद की नज़र कई अनजान चेहरों पर पड़ी। कुछ लोगो की आँखों में अविश्वास था, तो कुछ उसका मज़ाक उड़ा रहे थे। मधु भी एक शिक्षिका थी और आखिरकार मधु के कुछ छात्र भी शादी में आये। सबकी प्रतिक्रिया वैसी ही थी जैसी 21-22 साल पहले अंशु मैम की शादी में उनके दूल्हे को देख कर आनंद और उसके मित्रों की थी। हर किसी की नज़रें जैसे कह रहीं हो कि परियों सी मधु मैडम का पति इतना मोटा, दाग-धब्बेदार, बदसूरत कैसे हो सकता है और मधु मैम इस शादी से इतनी खुश क्यों हैं? किसी को भी सालों तक बाहर भागने से धूप में जली आनंद की खाल, काम की जल्दी में हुई दुर्घटना से हुए निशान, समय की ठोकरो एवम व्यस्तता के चलते अनियमित खाने-पीने से बिगड़े-बेडोल शरीर, आँखों पर चश्मे की हकीकत नहीं पता थी। ना ही किसी ने पता करने की ज़हमत उठायी। नम आँखों के साथ आज आनंद (और उसके दोस्त) अन्य लोगो की नज़रों में अपने पुराने रूप को देख रहा था और अंशु मैम से माफ़ी मांग रहा था कि “मैडम! आपने गलत निर्णय नहीं लिया था, आपने सही इंसान को अपना जीवनसाथी चुना था।”

समाप्त!

Art – Ihor Pasternak

Kaddu le lo (Secular Audio Story)#mohitness

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Kaddu le lo (Secular Audio Story), कद्दू ले लो (धर्मनिरपेक्ष कहानी) Social Message

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*) – Vimeo: http://goo.gl/uaQ4Ih

Duration – 5 Minutes 28 Seconds

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53 stories and poems, Paperback: 152 pages, Hindi

ISBN: 9781618133922

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अर्द्धअच्छा काम (कहानी)

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दिनेश ऑफिस से थका हारा घर पहुंचा। उसकी पत्नी रूपाली जो 1 महीने बाद अपने मायके से लौटी थी, उसके पास आकर बैठी। दोनों बीते महीने की बातें करने लगे। फिर दिनेश ने महीने की बातों के अंत के लिए एक किस्सा बचा कर रखा था। “परसो एक आदमी फ़ोन पर बात कर रहा था। जल्दबाज़ी में ऑफिस के बाहर बैग छोड़ गया, मैंने फिर वापस किया…नहीं तो काफी नुक्सान हो जाता बेचारे का।”

रूपाली – “अरे वाह…प्राउड ऑफ़ यू! आखिर पति किसके हो! पर इसमें क्या ख़ास बात है जो बताने से पहले इतना हाइप बना रहे थे?”

दिनेश – “पहले मैंने बैग चेक किया। उसमे वीडियो कैमरा, डाक्यूमेंट्स, 75 हज़ार रुपये, घडी-कपडे टाइप सामान था। तो 17 हज़ार रुपये निकाले, बाकी सामान एक बंदे से उसके पते पर छुड़वा दिया।”

रुपाली – “हौ! चोर! ऐसा क्यों किया? गलत बात!”

दिनेश – “देखो जैसा लोग काम करते हैं, वैसा उन्हें फल मिलता है, लापरवाही करोगे तो कुछ सज़ा मिलनी चाहिए ना? मुझे तो भगवान ने बस साधन बनाया। अब उस आदमी को सबक मिलेगा।”

रुपाली – “ये देखो गीता पढ़ कर भगवान कृष्ण के दूत बनेंगे सर। अरे लौटा दो बेचारे के पैसे।”

दिनेश – “नहीं हो सकता, ये देखो।”

रुपाली – “यह क्या है?”

दिनेश – “जो फ़ोन तुम्हे गिफ्ट किया उसकी रसीद। 16990 रुपये का है, अब 10 रुपये लौटाने क्या जाऊं। इसकी एक-एक ऑरेंज चुस्की खा लेते हैं।”

रुपाली – “यू आर सच ए…”

दिनेश – “आखिर पति किसका हूँ?”

समाप्त!

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– मोहित शर्मा ज़हन

टप…टप…टप…(हॉरर कहानी)

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चन्द्रप्रकाश को पानी बहने से चिढ थी और पानी बहना तो वो सह लेता था पर कहीं से धीमे-धीमे पानी का रिसना या नल से पानी टपकना…

टप…टप…टप…

जैसे हर टपकती बूँद उसके मस्तिष्क पर गहरे वार करती थी। जब तक चन्द्रप्रकाश पानी का टपकना बंद न कर देता तब तक वह किसी बात पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता था। कभी भी 1 मिनट से ज़्यादा नहीं हुआ होगा जो वह पानी बहने पर दौड़कर नल बंद करे न गया हुआ। अगर कुछ ही सेकण्ड्स में कोई बात सिर में दर्द करने लगे तो किसी की भी प्रतिक्रिया ऐसी ही होगी।

टप…टप…टप…

एक छुट्टी के दिन वह घर में अकेला था और बाथरूम की टंकी बहने लगी। वह अपनी धुन में तुरंत उसे बंद कर आया। फिर एक-एक कर के घर के सभी नल बहते और वह खीज कर उन्हें बंद कर आता। एक-दो बार उसे भ्रम हुआ की बाथरूम में या बाहर के नल के पास उसने किसी परछाई को देखा पर मोबाइल पर व्यस्त उसने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया।

टप…टप…टप…

लो हद ही हो गयी, अब रसोई का नल चलने लगा। चन्द्रप्रकाश के सिर में दर्द शुरू हो चुका था, उसने रसोई की टंकी कसकर बंद की और मुँह उठाया तो देखा दीवार से चिपकी चिथड़े हुए शरीर और सफ़ेद रक्तरहित चेहरे वाली लड़की उसको घूर रही है। डर के झटके से चन्द्रप्रकाश पीछे जाकर गिरा। लड़की ने हल्की मुस्कान के साथ नल थोड़ा सा घुमाया…

टप…टप…टप…

अब चन्द्रप्रकाश का दिमागी मीनिया और सामने दीवार पर लटकी लड़की का डर आपस में जूझने लगे। अपनी स्थिति में जड़ हाथ बढ़ाये वह खुद से ही संघर्ष कर रहा था।

टप…टप…टप…

हर टपकती बूँद लावे की तरह सीधे उसके दिमाग पर पड रही थी। कुछ ही देर में उसका शरीर काफी ऊर्जा व्यय कर चुका था।

टप…टप…टप…

किसी तरह घिसटते चन्द्रप्रकाश ने लड़की से नज़रें बचाते हुए टंकी बंद की और निढाल होकर गिर गया। अचानक लड़की गायब हो गयी, चन्द्रप्रकाश को लगा कि उसने अपने डर पर विजय पा ली लेकिन तभी पानी बहने की आवाज़ आने लगी और अत्यधिक मानसिक-शारीरिक दबाव में चन्द्रप्रकाश के दिमाग की नस फटने से उसकी मौत हो गयी। अपने जीवन के आखरी क्षणों में उसने जो पानी की आवाज़ सुनी वो बाहर शुरू हुई बारिश की थी पर कमज़ोरी के कारण उस आवाज़ में उसका दिमाग अंतर नहीं कर पाया।

नल से पानी फिर टपकने लगा।

टप…टप…टप…

समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन

राष्ट्र-रक्षक (कहानी)

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उफनते समुद्र से फामित देश के राष्ट्रपति और उनके परिवार को नौका में बचा कर लाते लाओस कोस्ट गार्ड (तटरक्षक) प्रमुख को उनकी टीम के सदस्य घृणा भाव से देख रहे थे। अब तक जिस व्यक्ति को उन्होंने अपना आदर्श माना, आज उसपर से उनका भरोसा उठ गया था। कुछ देर पहले प्रमुख को 2 आपातकाल संदेश आए थे और सीमित साधनों के साथ वो सिर्फ एक जगह जा सकते थे। अचानक ख़राब हुए मौसम में एक संदेश राष्ट्रपति की नाव से था और दूसरा विपरीत दिशा में डूब रहे एक छोटे जहाज़ से जिसमे लगभग 150 लोग थे। टीम राष्ट्रपति और उनके परिवार को तट पर पहुंचा कर उस जहाज़ की दिशा में गए और 120 में से 72 लोगो को बचा पाये। 48 लोगो की जान चली गयी पर सबको पता था कि तटरक्षक प्रमुख पर राष्ट्रपति की तरफ से इनामो की बौछार होने वाली है। सब कुछ निपटाने के बाद कोस्ट गार्ड प्रमुख ने अपना पक्ष बताने के लिए टीम मीटिंग रखी।

“मैं यहाँ सबकी आँखों में पढ़ सकता हूँ कि आप लोग मुझसे नाराज़ हैं। सबको लगता है की राष्ट्रपति की जान बचाने का फैसला मैंने पैसे, प्रोमोशन के लालच में लिया और 5 लोगो को बचाने में 48 लोगो की जान गंवा दी। फामित देश में नाम का लोकतंत्र हैं और राजनैतिक उथल-पुथल मची रहती है। राष्ट्रपति के कारण इतने समय बाद कुछ समय से देश में स्थिरता आई है। अगर ये मर जाते तो गृहयुद्ध निश्चित था, जिसमे हज़ारों-लाखों लोग मरते। गृहयुद्ध की स्थिति ना भी होती तो सिर्फ नए सिरे से चुनाव होने पर पहले ही मंदी के दबाव में झुके देश पर अरबों डॉलर का बोझ पड़ता। जिसका असर पूरे फामित के लाखो-करोडो लोगो के जीवन पर पड़ता और उनमे किस्मत के मारे हज़ारों लोग भुखमरी, आत्महत्या, बेरोज़गारी में मारे जाते। किसी ट्रैन ट्रैक पर अगर कोई जीवित व्यक्ति हो तो क्या ट्रैन का ड्राइवर उसकी जान बचाने के लिए ट्रैन पटरी से उतारने का जोखिम लेगा? मुझे उन लोगो की मौत का बहुत दुख है और शायद आज के बाद मुझे कभी चैन की नींद ना आये पर उस समय मैं 2 में से एक ही राह चुन सकता था।”

समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन

स्वर्ण बड़ा या पीतल? (कहानी)

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शीतकालीन ओलम्पिक खेलों की स्पीड स्केटिंग प्रतिस्पर्धा में उदयभान भारत के लिए पदक (कांस्य पदक) जीतने वाले पहले व्यक्ति बने। यह पदक इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योकि भारत में शीतकालीन खेलों के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी। मौसम के साथ देने पर हिमांचल, कश्मीर जैसे राज्यों में कुछ लोग शौकिया इन खेलों को खेल लेते थे। भारत लौटने पर उदयभान का राजा की तरह स्वागत हुआ। राज्य और केंद्र सरकार की तरफ से उन्हें 35 लाख रुपये का इनाम मिला। साथ ही स्थानीय समितियों द्वारा छोटे-बड़े पुरस्कार मिले। जीत से उत्साहित मीडिया और सरकार का ध्यान इन खेलों की तरफ गया और चुने गए राज्यों में कैंप, इंडोर स्टेडियम आदि की व्यवस्था की गयी। खेल मंत्रालय में शीतकालीन खेलों के लिए अलग समिति बनी। इस मेहनत और प्रोत्साहन का परिणाम अगले शीतकालीन ओलम्पिक खेलों में देखने को मिला जब उदयभान समेत भारत के 11 खिलाडियों ने अपने नाम पदक किये। उदयभान ने अपना प्रदर्शन पहले से बेहतर करते हुए स्वर्ण पदक जीता।

जब मीडियाकर्मी, उदयभान के घर पहुंचने पर उनका और परिवार का साक्षात्कार लेने आये तो उदयभान के माता-पिता कुछ खुश नहीं दिखे। कारण –

“रे लाला ने इतनी मेहनत की! पहले से जादा लगा रहा…गोल्ड जित्ता, फेर भी पहले से चौथाई पैसा न दिया सरकारों ने। यो के बात हुई? इस सोने से बढ़िया तो वो पीतल वाला मैडल था।”

उदयभान के साथ सभी मीडियाकर्मियों में मुस्कराहट फ़ैल गयी। पहले स्पॉटलाइट में उदयभान पहला और अकेला था…अब उसका पहला होना रिकॉर्ड बुक में रह गया और उसके साथ 10 खिलाडी और खड़े थे। जिस वजह से उसे पहले के कांस्य जीतने पर जितने अवार्ड और पैसे मिले थे, उतने इस बार स्वर्ण जीतने पर नहीं मिले।

समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन
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परिवार बहुजन (कहानी)

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एक छोटे कस्बे की आबाद कॉलोनी में औरतों की मंडली बातों में मग्न थी। “बताओ आंगनबाड़ी की दीदी जी, बच्चों के स्कूल की टीचर लोग हम बाइस-पच्चीस साल वाली औरतों को समझाती फिरती हैं कि आज के समय में एक-दो बच्चे बहुत हैं और यहाँ 48 साल की मुनिया काकी पेट फुलाए घूम रहीं हैं। घोर कलियुग है!”

“मैं तो सुने रही के 45 तक जन सकत हैं औरत लोग?”

“नहीं कुछ औरतों में रजोनिवृत्ति जल्दी हो जाती है और कुछ में 4-5 साल लग जाते हैं। फिर भी, क्या ज़रुरत थी काका-काकी को इस उम्र में यह सब सोचने की?”

यह बात सुनकर पास से गुज़रती उस दम्पति की पडोसी बोली।

“अरे! उन कुछ बेचारों की तरफ से भी सोच कर देखो। आज इस कॉलोनी में कितने बूढ़े जोड़ों के साथ उनके बच्चे रहते हैं? इनके भी दोनों बच्चे बाहर हैं जो तीज-त्योहारों पर खानापूर्ति को आते हैं। अब इनकी बाकी उम्र होने वाले शिशु को पाल-पोस कर काबिल बनाने में कट ही जायेगी। घर में पैसे की तंगी नहीं है तो इनमे से किसी एक को या दोनों को कुछ होता भी है तो बच्चे का काम चल जाएगा।”

बात फैली और आस-पास के इलाके के आर्थिक रूप से ठीक दम्पति  प्राकृतिक या टेस्ट ट्यूब विधि से उम्र के इस पड़ाव में संतान करने लगे। पैसों और संपत्ति के लालच में कई बच्चे माँ-बाप का अधिक ध्यान रखने लगे कि कहीं उनके अभिभावक दुनिया में उनके छोटे भाई-बहन न ले आएं।

समाप्त!

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 – मोहित शर्मा ज़हन

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