राष्ट्र-रक्षक (कहानी)

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उफनते समुद्र से फामित देश के राष्ट्रपति और उनके परिवार को नौका में बचा कर लाते लाओस कोस्ट गार्ड (तटरक्षक) प्रमुख को उनकी टीम के सदस्य घृणा भाव से देख रहे थे। अब तक जिस व्यक्ति को उन्होंने अपना आदर्श माना, आज उसपर से उनका भरोसा उठ गया था। कुछ देर पहले प्रमुख को 2 आपातकाल संदेश आए थे और सीमित साधनों के साथ वो सिर्फ एक जगह जा सकते थे। अचानक ख़राब हुए मौसम में एक संदेश राष्ट्रपति की नाव से था और दूसरा विपरीत दिशा में डूब रहे एक छोटे जहाज़ से जिसमे लगभग 150 लोग थे। टीम राष्ट्रपति और उनके परिवार को तट पर पहुंचा कर उस जहाज़ की दिशा में गए और 120 में से 72 लोगो को बचा पाये। 48 लोगो की जान चली गयी पर सबको पता था कि तटरक्षक प्रमुख पर राष्ट्रपति की तरफ से इनामो की बौछार होने वाली है। सब कुछ निपटाने के बाद कोस्ट गार्ड प्रमुख ने अपना पक्ष बताने के लिए टीम मीटिंग रखी।

“मैं यहाँ सबकी आँखों में पढ़ सकता हूँ कि आप लोग मुझसे नाराज़ हैं। सबको लगता है की राष्ट्रपति की जान बचाने का फैसला मैंने पैसे, प्रोमोशन के लालच में लिया और 5 लोगो को बचाने में 48 लोगो की जान गंवा दी। फामित देश में नाम का लोकतंत्र हैं और राजनैतिक उथल-पुथल मची रहती है। राष्ट्रपति के कारण इतने समय बाद कुछ समय से देश में स्थिरता आई है। अगर ये मर जाते तो गृहयुद्ध निश्चित था, जिसमे हज़ारों-लाखों लोग मरते। गृहयुद्ध की स्थिति ना भी होती तो सिर्फ नए सिरे से चुनाव होने पर पहले ही मंदी के दबाव में झुके देश पर अरबों डॉलर का बोझ पड़ता। जिसका असर पूरे फामित के लाखो-करोडो लोगो के जीवन पर पड़ता और उनमे किस्मत के मारे हज़ारों लोग भुखमरी, आत्महत्या, बेरोज़गारी में मारे जाते। किसी ट्रैन ट्रैक पर अगर कोई जीवित व्यक्ति हो तो क्या ट्रैन का ड्राइवर उसकी जान बचाने के लिए ट्रैन पटरी से उतारने का जोखिम लेगा? मुझे उन लोगो की मौत का बहुत दुख है और शायद आज के बाद मुझे कभी चैन की नींद ना आये पर उस समय मैं 2 में से एक ही राह चुन सकता था।”

समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन

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Beta Testing Units (Indian Comics)

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नमस्ते! यह विचार काफी समय से मन में है और संजय गुप्ता जी से साझा कर चूका हूँ हालांकि उस समय विस्तार से समझा नहीं पाया था पर जितना उन्होंने सुना था उन्हें पसंद आया था। मित्रों, प्रो रसलिंग आप देखते होंगे या उसके बारे में थोड़ा बहुत अंदाज़ा होगा। वर्ल्ड रसलिंग एंटरटेनमेंट या डब्लू.डब्लू.ई. के अलावा अमेरिका और विश्व में कई छोटे-बड़े रसलिंग प्रोमोशन्स हैं। दक्षिण अमेरिका, जापान और यूरोप में कुछ राष्ट्र स्तर की कंपनी कई दशकों से लोगो का मनोरंजन कर रहीं हैं। इन बड़ी कंपनियों की सफलता इनके रोस्टर (इनके लिए काम करने वाले सभी रसलर) और इनकी शैली पर निर्भर करती है। अपने शोज़ में 2 लोगो के बीच में फ्यूड (रंजिश) बनाने के लिए लड़ाई के अलावा एक सीरियल की तरह यहाँ कई सेगमेंट वाली स्टोरीलाइन होती है, जिसमें रसलिंग के दांव-पेंच के साथ अभिनय, जनता में अपना पक्ष रखना जैसी बातें ज़रूरी होती हैं। इस सबकी मदद से व्यक्ति एक पहलवान से एक किरदार बनता है जो लोगो से अच्छी या बुरी चरम प्रतिक्रिया निकलवाता है। जिसे लोग जीतते हुए या बुरी तरह मार खाते हुए देखना चाहते हैं।

डब्लू.डब्लू.ई. जैसे बड़े प्रोमोशन नए या सीख रहे पहलवान को पहले अपनी डेवलपमेंटल टेरिटरी भेजते हैं। यहाँ सुरक्षित रसलिंग छोटे-छोटे गुर सीखने के अलावा रसलर अपनी क्षमता अनुसार यह जान पाता है कि वह क्या कर सकता है? कौन से किरदार उसपर बेहतर लगेंगे, क्या पहनावा होना चाहिए, बोलने की कौनसी शैली उसपर फब्ती है आदि। इतना ही नहीं अगर किसी अन्य कंपनी से कोई जाना-पहचाना सितारा आता है तो पहले उसे भी डेवलपमेंटल यूनिट में समय बिताना पड़ता है ताकि वो कंपनी के माहौल, शैली से सामंजस्य बिठा सके। अब आती है पते कि बात, अन्य क्षेत्रों की ट्रेनिंग से उलट यहाँ रसलर जनता के बीच और टेलीवजन पर शोज़ करते हैं, सीखते हैं। इसका मतलब मुख्य कंपनी के स्केल से छोटा दूसरे दर्जे का शो जिसमे लोग आते हैं, टेलीविजन पर प्रसारित होता है। डब्लू.डब्लू.ई. में NXT ऐसा शो है, जो कंपनी को काफी मुनाफा और पब्लिसिटी देता है। इन ट्रेनिंग यूनिट्स के कुछ फायदें हैं –

1. अगर ट्रेनिंग यूनिट अच्छा करती है तो मुख्य कंपनी श्रेय लेती है कि “आखिर यूनिट किसकी है?” और अगर यूनिट का प्रदर्शन अच्छा नहीं तो भी मुख्य कंपनी उसको दोयम दर्जे की ट्रेनिंग यूनिट बता कर पल्ला झाड़ लेती है कि ट्रेनिंग फेज में ऊंच-नीच चलती है।
2. इस माध्यम से बहुत से ऐसे प्रयोग किये जा सकते हैं जो मुख्य कंपनी के प्रारूप में संभव नहीं या जिनपर शक है कि यह प्रयोगात्मक आईडिया चलेगा या नहीं? फिर वही ऊपर लिखी बात प्रयोग सफल हुआ तो मुख्य कंपनी के चैनल में वाहवाही लो, नहीं हुआ तो आई-गयी बात!
3. यहाँ कई युवा, प्रतिभावान लोगो का काम देखने का मौका मिलता है। 2 या अधिक लोगो के साथ किये काम का अवलोकन किया जा सकता है कि क्या ये दोनों मुख्य रोस्टर में फिट बैठेंगे।
4. यूनिट अगर चल निकले तो अच्छा पैसा भी बनाया जा सकता है।

मेरा विचार यह था कि ऐसी डेवलपमेंटल यूनिट की तरह अगर बड़ी कॉमिक कंपनी जैसे राज कॉमिक्स, कैंपफायर उभरते कलाकारों, लेखकों के लिए ऐसा कुछ करें तो यह सबके लिए फायदे का सौदा होगा। जैसे युवा कलाकार, लेखक, इंकर और कलरिस्ट की कॉमिक्स को अपनी वेबसाइट, पेज पर जगह देना या अलग नाम से (जैसे RC Gen-Next, Campfire Yuva) साइट और पेज पर पोस्ट करना, प्रिंट ऑन डिमांड या सीमित संख्या में प्रकाशित करना। इस से कलाकारों को बड़ी कंपनी का बैनर मिलेगा, 2 सेट या इवेंट के बीच में जो लंबा गैप होता है वो भर जाएगा और यह माध्यम ज़्यादा लोगों तक कॉमिक्स को पहुंचाएगा।
यह विचार कितना व्यवहारिक है? आप लोगो को यह जंच रहा है ज़रूर बताएं! धन्यवाद!

– मोहित शर्मा ज़हन

Original Post – Indian Comics Fandom FB Page

एकल-युगल-पागल (कहानी) – मोहित शर्मा ज़हन

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“जी सर! मैंने चक्कू घोंप दिया ससुरे की टांगों में अब आपका जीतना पक्का।”

टेनिस एकल प्रतिस्पर्धा में स्टीव जो एक जाना-पहचाना नाम था, जिसके नाम कुछ टाइटल थे। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों के दौरान वह सफलता से दूर ही रहा। फिटनेस के हिसाब से उसमे 2-3 सीजन का खेल बचा था और इस बीच वह अधिक से अधिक टाइटल अर्जित करना चाहता था। सबसे पहले वह तुलनात्मक रूप से आसान और नीची रैंक के खिलाड़ियों से भरे टूर्नामेंट चुनता था ताकि उसके जीतने की सम्भावना बढ़े, किस्मत से वह एक नामी टूर्नामेंट के सेमीफाइनल में पहुंचा जहां उसका प्रतिद्वंदी दुनिया का नंबर एक खिलाड़ी था। इस खिलाड़ी से पार पाना स्टीव के बस की बात नहीं थी। स्टीव ने उस खिलाड़ी को घायल करवाने के लिए अपने एक जुनूनी देशवासी को ब्रेनवाश किया कि देश के नाम और सम्मान के लिए उसे वर्ल्ड नंबर वन को खिलाड़ी घायल करना है। पूरी रात पार्टी कर अगले दिन वॉकओवर मिलना सुनिश्चित मान स्टीव कोर्ट पर उतरा जहाँ फिट्टम-फिट दुनिया का नंबर एक खिलाड़ी उसका इंतज़ार कर रहा था। उसके पैरो तले ज़मीन और खोपड़े छज्जे आसमान खिसक गए। काश कल न्यूज़ में कन्फर्म कर लेता तो दारु तो ना पीता, अब तो 6-0, 6-0 पक्का! पता नहीं किस बेचारे के पैरों में चक्कू घोंप दिया गधे ने?

बगल के कोर्ट में इस प्रतियोगिता का युगल (डबल्स) टेनिस खेल रही एक टीम को वॉकओवर मिला क्योंकि उनकी विरोधी टीम के एक खिलाड़ी पर पिछली रात टांगलेवा हमला हुआ था, यह खिलाड़ी विश्व डबल्स टेनिस में नंबर एक रैंक पर था।

इस कहानी से शिक्षा मिलती है जुनूनी के साथ-साथ थोड़ी अक्ल वाले बंदे-बंदियों से ऐसे काम करवाने चाहिए।

समाप्त!

स्वर बंधन (लघुकथा) – मोहित शर्मा ज़हन

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आलीशान बंगले में एक अंधी महिला ने प्रवेश किया। स्टाफ मे नई सेविका ने उत्सुकतावश हेड से पूछा।

“ये कौन है?”

स्टाफ हेड – “मैडम के बच्चे चीकू की देखभाल के लिए…”

सेविका – “पर ये तो देख नहीं सकती? क्या मैडम या साहब को दया आ गई इस बेचारी पर और कहने भर को काम दे दिया?”

स्टाफ हेड – “तुझे साहब लोग धर्मशाला वाले लगते हैं? उनकी मजबूरी है इसलिए चला रहे हैं। ये औरत पहले से ही बच्चे की देखभाल करती थी, एक दुर्घटना में इसकी आँखें चली गईं, पर अब भी नन्हा चीकू इसकी लोरी, कहानियां सुने बिना नहीं सोता है। जब चीकू थोड़ा बड़ा होगा इस बेचारी का यहाँ आना बंद हो जाएगा।”

समाप्त!

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कला की डोर (लघुकथा) – मोहित शर्मा ज़हन

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रोज़ की तरह मंदिर के पास से घंटो भजन गा कर उठ रहे बुज़ुर्ग को पंडित जी ने रोका।

पंडित जी – “बाबा मैंने सुना आपकी पेंशन आपका नकारा लड़का और बहु खा रहे हैं। आप घर से सटे टीन शेड में सोते हो?”

बाबा – “हाँ, शायद अपने ही कर्म होंगे पहले के जो सामने आ रहे हैं।”

पंडित जी – “तो पड़ोसी-पुलिस-रिश्तेदार किसी से बात करो। ठीक से खाना भी नहीं देते वो लोग आपको…यहाँ छोटी सी जगह गाने आते रहोगे तो मर जाओगे किसी दिन।”

बाबा – “पंडित जी, ऐसी हालत में मर तो बहुत पहले जाना चाहिए था पर कलाकार जो ठहरा, कला की डोर पकड़े जीवन चला रहा हूँ…खाने का तो पता नहीं पर यहाँ न आया तब मर जाऊंगा।”

समाप्त!

Art – Jorgina Sweeney

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Author Note – कुछ रचनात्मक लोगो को सामान्य दृष्टि से अलग कामो से संतुष्टि मिलती है। ऐसे काम जो सामान्य लोगो द्वारा धन-सम्पत्ति-यश जुटाने की तरफ बढ़े कदमों से परे एक अलग दुनिया में काल्पनिक महल करने से प्रतीत होते हैं। दूर से उनको देखकर हँसी आती है पर अगर गलती से आप उनकी दुनिया में भटक जाएं तो आपको एक ऐसा शिल्पकार दिखेगा जो हर दिन-हर घंटे-हर मिनट अपनी कला में तल्लीन रहता है। सामान्य दुनिया में आने पर उसमे एक शून्यता, अनुपस्थिति सी दिखाई देती है यह उसकी कल्पना के बंधन होते हैं जो उसे बेचैन रखते हैं। तभी अक्सर ऐसे लोग आम दुनिया में पिछड़ जाते हैं और फिर भी कई आगे बढ़े लोगो से सुखी दिखाई पड़ते हैं।

शोबाज़ी (कहानी) – मोहित शर्मा ज़हन

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छात्रों के पास से गुज़रती प्रोफेसर के कानो में कुलदीप की एक बात पड़ी।

“हमारे पूर्वजो ने तुम्हे बचाया। तुम लोगो के घर-बार और तुम्हारी बहु-बेटियों की इज़्ज़त लुटने से बचाने वाले हम लोग ही थे। अगर हम न होते तो क्या होता तुम्हारे समुदाय का?”

प्रोफेसर के कदम थम गए, ऐसा वाक्य उन्होंने पहली बार नहीं सुना था। वो उन लड़को के समूह के पास गईं और बोलीं।

“तो क्या अपने पूर्वजो के कामो की अलग से रॉयल्टी चाहिए?”

प्रोफेसर को उग्र देख कुलदीप सहम कर बोला – “ऐसी बात नहीं है मैम…मैं तो बस…”

प्रोफेसर – “देखो कुलदीप, जिन समुदाय-लोगो की तुम बात कर रहे हो उनकी संख्या करोड़ो में थी और इतिहास देखोगे तो हर धर्म के लोगो ने अनेको बार एक दूसरे पर एहसान और अत्याचार किए हैं। यह संभव है जिन पूर्वजो की तुम बात कर रहे हो उनके पूर्वजो या उनसे भी पहले उस मज़हब के लिए किसी और समुदाय ने कुछ अच्छे काम किए हों जिनसे उनके जीवन मे सकारात्मक बदलाव आए हों। इतिहास जानना ज़रूरी है पर पुरखों से शान उधार लेकर अपने नाम पर लगाना गलत है। खुद समाज के लिए कुछ करो फिर यह शोबाज़ी जायज़ लगेगी…हाँ, माता-पिता या दादा आदि की संपत्ति, गुडविल, रॉयल्टी अलग बात है पर 1492 में कुलदीप से ऊपर 32वी पीढ़ी ने क्या तीर मारे वो किताबो तक ही रहने दो, उनका क्रेडिट तुम मत लो…क्योंकि ऐसे हिसाब करोगे तो फिर कभी हिसाब होगा ही नहीं।”

समाप्त!

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अन-बेवकूफ (संवाद कहानी) – मोहित शर्मा ज़हन

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Mr. A – एक बात काफी सुनता हूँ मैं….”आज का यूथ जागरूक है, बेवकूफ नहीं है!”
मतलब कल या पहले के यूथ – तुम्हारे माँ-बाप-दादे बेवकूफ थे? जितने साधन उनके पास थे उस हिसाब से बहुत सही थे। शायद गूगल-इंटरनेट के सहारे टिके “यूथ” से कहीं बेहतर…

Miss B – …लेकिन गलतियां तो हुई हैं पहले लोगो से?

Mr. A – किसी पीढ़ी का आंकलन उस समय की परिस्थितियों को संज्ञान में लिए बिना नहीं करना चाहिए। एक जार में किसी तरह की अशुद्धियां डालिए और उस जार को हिलाइए, ऐसा होने पर बड़ी मात्रा में अशुद्धियां वापस तल पर जमने में समय लेंगी, जैसे आज़ादी और विभाजन के बाद भारतीय लोगो को नई स्थिति में जमने में सालों लग गए। साथ ही उस वक़्त अकाल, सूखा और अनाज की कमी के कारण लोग जीने के लिए आवश्यक मूलभूत बातों के लिए जूझ रहे थे। इसी दौरान भारत को तीन बड़े युद्धों को झेलना पड़ा, इन सबके बीच आम लोगो को आधारभूत (रोटी-कपड़ा-सर पर छत) सीढ़ी को चढ़ने में कुछ दशक लगे, जिसके चलते लोग अन्य मुद्दों तक जा नहीं पाए। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि अविकसित क्षेत्र में अगर कोई शक्ति पा जाए तो उसे हटाने में समय लगता ही है, जो लोग पहले गलत बातों का विरोध करते थे उनके पास आर्थिक, सामाजिक और जन-जन तक अपनी बात ले जाने का कोई सहारा नहीं होता था। वैसी स्थिति अगर आज के दौर में होती तो मुझे नहीं लगता आज की पीढ़ी कुछ बेहतर कर पाती।

Miss B – एक बात मैं भी जोड़ना चाहती हूँ, यह सुपिरियोरीटी कॉम्प्लेक्स भावना लगभग हर पीढ़ी में होती है…तो माफ की जा सकती है। धीरे-धीरे कई सामान्य लोगों में अपने आप दूसरों और उनकी स्थिति समझने की और तुलना ना करने की अक्ल आ जाती है।

समाप्त!

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भूतनी बीवी (कहानी) – मोहित शर्मा ज़हन

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गर्मी और उमस से परेशान क्षितिज छत पर टहल रहा था तभी एक आवाज़ से वह ठिठका, जैसे किसी ने उसका नाम लिया हो। मन का वहम मान कर वह मुड़ा तो “हू!” उसकी पत्नी राधिका हँस रही थी। क्षितिज की घिग्घी बंध गई, राधिका को मरे 4 महीने हो गए थे। डर के मारे क्षितिज की लो फ्रीक्वेंसी चीख निकली जो इंसान तो नहीं पर शायद चमगादड़ सुन सकते थे। हँसते-हँसते पागल राधिका की आत्मा इस मोमेंट को भी एन्जॉय कर रही थी। फिर उसने क्षितिज को समझाया।

“डरो मत तुमसे मिलने आई हूँ बस, कुछ नहीं करुँगी।” क्षितिज ने खुद को सम्भाला, आत्मा होते हुए भी राधिका के चेहरे की वजह से डर की जगह उसके मन में पुरानी यादें चलने लगी।

क्षितिज – “क्या करती हो यार? अभी यहीं पजामे में ही सू-सू कर देता मैं! मुझे लगा तुम्हारा अकेले मन नहीं लग रहा तो मुझे मारने आई होगी।”

राधिका – “हा हा हा….तुम्हारा चेहरा देख कर इतनी हँसी आई कि मन तो था थोड़ा कायदे से डराऊं तुम्हे। फिर सोचा कहीं फ्री फण्ड में हार्ट अटैक न आ जाए।”

क्षितिज बोला – “…और यह बताओ तुम्हे हू करने की क्या ज़रुरत है तुम तो पहले से ही…“

कुछ देर ख़ामोशी में दोनों एक-दूसरे को देखते रहे जैसे आँखों को भी बातें करने का मौका दे रहें हों, फिर राधिका बोली। “बस तुम्हे देखने आई थी, दूर से देखकर जा रही थी पर मन नहीं माना। बस एक चीज़ देखने की इच्छा है, नहीं तो मेरी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी।”

क्षितिज आतुर होकर बोला – “क्या? जो बोलो वो लाकर दूँ, क्या करूँ?”

राधिका – “वो जो शॉर्ट्स में तुम चिकनी चमेली और बेबी डॉल में सोने की मैशअप पर डांस करते थे प्लीज वो दिखा दो….प्लीज प्लीज प्लीज!”

क्षितिज – “सत्यानाश जाए तेरा करमजली चुड़ैल! हे भगवान….किसी को भेजो इसको ऊपर लाने के लिए।”

फिर क्षितिज ने शॉर्ट्स में इन आइटम सांग्स पर अपने अंदाज़ मे डांस किया और राधिका के ठहाके गूंजने लगे। जब गाने ख़त्म हुए तब नम हुयी आँखों को क्षितिज ने पोंछा पर अब राधिका वहां नहीं थी।

समाप्त!
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माँ को माफ़ कर दो…(मोहित शर्मा ज़हन)

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बीच सड़क पर चिल्ला रहे, ज़मीन पीट रहे, खुद को खुजा रहे और दिशाभ्रमित भिखारी से लगने वाले आदमी को भीड़ घेरे खड़ी थी। लोगो की आवाज़, गाड़ियों के हॉर्न से उसे तकलीफ हो रही थी। शाम के धुंधलके में हर दिशा से आड़ी-तिरछी रौशनी की चमक जैसे उसकी आँखों को भेद रहीं थी। जिस कार ने उसे टक्कर मारी थी वो कबकी जा चुकी थी। कुछ सेकण्ड्स में ही लोगो का सब्र जवाब देने लगा।

“अरे हटाओ इस पागल को !!” एक साहब अपनी गाडी से उतरे और घसीट कर घायल को किनारे ले आये। खरीददारी कर रिक्शे से घर लौट रही रत्ना घायल व्यक्ति के लक्षण समझ रहीं थी। एकसाथ आवाज़, चमक की ओवरडोज़ से ऑटिज़्म या एस्पेरगर्स ग्रस्त वह व्यक्ति बहुत परेशान हो गया था और ऐसा बर्ताव कर रहा था। भाग्य से उसे ज़्यादा चोट नहीं आई थी।

“रोते नहीं, आओ मेरे साथ आओ।” रत्ना उस आदमी को बड़ी मुश्किल से अपने साथ एक शांत पार्क में लाई और उसे चुप कराने की कोशिश करने लगी। “भूख लगी है? लो जूस पियो-चिप्स खाओ।” फिर न जाने कब रत्ना उस प्रौढ़ पुरुष को अपने सीने से लगाकर सिसकने लगी। पार्क में इवनिंग वाक कर रहे लोगो के लिए यह एक अजीब, भद्दा नज़ारा था। उनमे कुछ लोग व्हाट्सप्प, फेसबुक आदि साइट्स पर अपने अंक बनाने के लिए रत्ना की तस्वीरें और वीडियों बनाने लगे…पर रत्ना सब भूल चुकी थी, उसके दिमाग में चल रहा था…“काश कई साल पहले उस दिन, मेरी छोटी सोच और परिवार के दबाव में तीव्र ऑटिज़्म से पीड़ित अपने बच्चे को मैं स्टेशन पर सोता छोड़ कर न आती।”

समाप्त!

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Art – Frederic Belaubre

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बाज़ीगरनी (लघुकथा) – लेखक मोहित शर्मा ट्रेंडस्टर

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अक्सर सही होकर भी बहस में हार जाना दीपा की आदत तो नहीं थी, पर उसका बोलने का ढंग, शारीरिक भाषा ऐसी डरी-दबी-कुचली सी थी कि सही होकर भी उसपर ही दोष आ जाता था। जब वह गलत होती तब तो बिना लड़े ही हथियार डाल देती। आज उसकी एफ.डी. तुड़वा कर शेयर में पैसा लगाने जा रहे पति से हो रही उसकी बहस में उसके पास दमदार तर्क थे।

“आप…आपने पहले ही कितना पैसा गंवाया है शेयर्स में! ये एफ.डी. इमरजेंसी के लिए रख लेते हैं ना? वो…आप दोबारा जोड़ कर लगा लेना पैसे शेयर में।”

“अरे चुप! पति एकसाथ तरक्की चाह रहा है और तू वही चिंदी चोरी जोड़ने में लगी रहियों। तेरी वजह से मेरी अक्ल पर भी पत्थर पड़ जाते हैं!”

“मेरी वजह से? मैंने…क्या किया? मैंने कुछ नहीं किया!”

…और इस तरह दीपा ने एक बार फिर से जीत के मुंह से हार छीन ली। अपनी आदत उसे पता थी और इस बार उसे हार नहीं माननी थी।

कुछ देर बाद पति पैसे लेकर बाहर निकला तो 2 नकाबपोश बाइक सवार उसका झोला झपट के चले गए। पति ओवरलोडेड इंजन की तरह आवाज़ निकालता थाने गया और वो 2 बाइक सवार दीपा को झोला पकड़ा कर चले गए। दीपा ने अपने भाई को सारी बात बताई और भाई ने अपने दोस्त भेज कर दीपा को हार कर भी जीतने वाली बाज़ीगर बनवाई।

समाप्त!

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