दुग्गी ऑफ़ ऑल ट्रेड्स

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नमस्ते! 🙂 अक्सर किसी क्षेत्र में सफल या अच्छी जगह पहुंचे लोगो को किस्मत को कोसते, कहते देखता हूँ कि हम यहाँ तो सफल हैं पर इस चक्कर में जिस दूसरे क्षेत्र में भी रूचि थी उसमे कुछ न कर पाने या कम कर पाने का मलाल है। मतलब आपको विराट कोहली भी बनना है और सुनीता विलियम्स भी? या मोहम्मद अली तो बनेंगे ही पर साथ में नेताजी बोस वाला तमगा भी चाहिए? एक जगह समय दिया, मेहनत की तो फल भी उसी में मिलना चाहिए न? आपका ऐसा बोलना इन क्षेत्रों में कर्म की तपस्या से सफल हुए, अपना पूरा जीवन एक दिशा में लगा चुके लोगो का अपमान है। अंधो में काणा राजा होना और वाकई में विलक्षण प्रतिभा होना दो अलग बातें है। जैसे संभव है आप अपने परिवार और दोस्तों के बीच सबसे अच्छी स्केचिंग करते हों पर असल दुनिया में जिन्हे पेशेवर कहा जाता है वो लोग वर्षो-दशकों तक दिन पर दिन, तिल-तिल संघर्ष कर अपना हुनर निखारते हैं, तो अपने गाहे-बगाहे के काम पर ज़बरदस्ती की आहें न भरें।

अब या तो आप अरबों में एक हों और जन्मजात एक से अधिक क्षेत्रों में ख्याति पाने लायक हों (ज़्यादा खुश न हों अरबों में एक लिखा है…. चले गुलाबी मोर बनने :p) या आपने वाकई अपने मुख्य क्षेत्र के साथ-साथ अन्य क्षेत्रो में कई वर्षों या दशकों तक काम किया हो तब सोचा जा सकता है। उदाहरण के लिए किसी रचनाकार का यह कहना कि भगवान् ने इतना दिमाग दिया है, मैं चाहता तो ये आई.टी., कोडिंग फलाना क्या मुश्किल था मेरे लिए? क्या भैया? किसी की स्किल, कला, प्रतिभा का सम्मान करना इतना मुश्किल भी नहीं है! भाग्य, परिस्थिति और रूचि के चक्कर से अगर वह आपकी तरह किसी कलात्मक क्षेत्र में होता तो आपका डीम्ड पापा/मम्मी होता। आपके क्लोज सर्किल में लोगो ने तारीफ कर दी तो आप तो दिल पर ही ले बैठे। यह वेरीफाई ज़रूर करें कि आप मास्टर ऑफ़ ऑल ट्रेड्स हैं की जगह दुग्गी ऑफ़ ऑल ट्रेड्स तो नहीं हैं? ऐसा करने से आप खुद को कमाल आर. खान या वो एक्टर-डायरेक्टर-सिंगर-वाइब्रेटर बाबा जैसो की राह पर चलने से रोक सकते हैं।

इस स्थिति में एक अपवाद है अगर कोई अन्य विधा, स्किल आपके क्षेत्र से जुडी हो तो समय के साथ आप उसमे अच्छे हो सकते हैं। जैसे एक लेखक के लिए समीक्षक होना, किसी खेल के पूर्व खिलाडी के लिए उस खेल का कोच या रेफरी बन जाना थोड़ा आसान होता है। हालांकि, इस बदलाव के भी अच्छे होने की गारंटी नहीं है। जीवन में आपने जो राह चुनी है, जो निर्णय लिए हैं, उनकी अच्छी-बुरी बातें स्वीकार करें। साथ ही अपने चुनाव, निर्णय के सही होने पर जैसे कूद कर पूरा श्रेय आप लेते हैं उसी तरह गलत होने पर वैसे ही कूद कर नहीं आ सकते कोई बात नहीं पर, ज़िम्मेदारी लेने से न बचें। परिवार या अन्य किसी व्यक्ति, बात पर दोष डालना उचित नहीं क्योकि आप कोई 7 साल के बच्चे नहीं हैं!

– मोहित शर्मा ज़हन

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अच्छी नस्ल (लघुकथा) #trendster

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श्रीमती जी और श्रीमान जी एक टीवी चैनल के टॉक शो में अतिथि थे। जहाँ श्रीमती जी ने इस वाक्य के साथ अपनी बात ख़त्म की –

“लोगो को सुंदरता के बाहरी आवरण को हटाकर अपने जीवनसाथी का चयन करना चाहिए। केवल बाहरी रूप से किसी पर मोहित होना हमारी छोटी सोच दर्शाता है।” लोगो की तालियों के बीच श्रीमती-श्रीमान जी की मुस्कान दर्शा रही थी कि कॉलोनी और जान-पहचान वालो में कुछ समय तक शो ऑफ करने लायक मसौदा तैयार हो गया है।

घर पहुँच कर श्रीमती जी और श्रीमान जी अपने 2 बच्चों पर पिल पड़े। उनके गुस्से का कारण थे 2 देसी पिल्ले, जो उनके बच्चे पार्क से उठा लाये थे।

गुस्सा शांत होने पर बच्चों को समझाती हुई श्रीमती जी बोली, “बच्चों ये छी-छी वाले, गंदे सड़क के पिल्ले हैं। रोना नहीं, मैं अपने प्रिंस-प्रिंसेस के लिए सुंदर सा लैब्राडोर, गोल्डन रीट्रीवर या पग जो बोलोगे, वो लेकर आउंगी….अच्छी नस्ल के होते हैं ना वो।

समाप्त!

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अक्ल-मंद समर्थक (कहानी) – मोहित शर्मा #ट्रेंडस्टर

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Scene 1) – एक हिंसक गैंगवार के बाद एक छोटे कसबे के घायल नेता को उसके समर्थको की भीड़ द्वारा अस्पताल लाया गया। डॉक्टर्स ने जांच के बाद नेता जी को मृत घोषित कर दिया।

“अरे ऐसे कैसे हमारे मसीहा को मरा हुआ बता दिया?” समर्थको का गैंगवार से मन नहीं भरा था। …..उन्होंने डॉक्टर्स को ही पीट-पीट कर मृत घोषित कर दिया। घटना के बाद अस्पताल के मैनेजमेंट ने फैसला किया कि आगे से किसी नेता, दबंग या प्रभावशाली व्यक्ति की मौत होने पर भी उसे ज़िंदा बताकर दिल्ली या पास के किसी बड़े शहर के अस्पताल रेफर कर दिया जाएगा।

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Scene 2) – ऐसे ही गैंगवार में दूसरे गुट का गंभीर रूप से घायल नेता जब अस्पताल लाया गया तब ड्यूटी पर डॉक्टर एक ऑपरेशन में व्यस्त थे। समर्थको से डॉक्टर्स का इंकार और इंतज़ार बर्दाश्त नहीं हुआ। डॉक्टर्स को भीड़ ने पीट-पीट का लहूलुहान, बेहोश कर दिया।  जब तक डॉक्टर्स होश में आये तब तक ऑपरेशन वाला पहला मरीज़ और इंतज़ार कर रहे नेता जी दोनों त्वरित इलाज के अभाव में दुनिया को टाटा कर चुके थे। समझदारी का परिचय देते हुए यहाँ के डॉक्टर्स ने दूसरे नेता जी को लखनऊ के हॉस्पिटल रेफर कर दिया।

समाप्त!

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छद्म मुफ्तखोरी – लेखक मोहित शर्मा #ट्रेंडस्टर

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“जीवन में कुछ भी मुफ्त का खाने वाले मुझे बिलकुल नहीं पसंद ! अरे मेहनत करो, संघर्ष करो दुनिया में, अपनी पहचान बनाओ।” नीतू ने पिकनिक में लंच करते हुए, यूँ ही डिस्कशन कर रही मित्रमण्डली के सामने अपने विचार रखे।

माहौल हल्का करने के लिए उसकी पुरानी बेस्टी सरिता ने कहा – “देखो मैडम को मुफ्त का खाने वाले नहीं पसंद और बातों-बातों में परांठे के एक कौर में ढक कर मेरा आचार ही गायब कर दिया।”

सबके चेहरों पर मुस्कराहट आ गयी पर बातों को समझने में समय लगाने के कारण ग्रुप की ट्यूबलाइट कही जाने वाली लड़की रीमा अब भी नीतू की बात का विश्लेषण करते हुए बोली – “पर नीतू तुम खुद भी तो कितना मुफ्त का खाती हो! तो दूसरो से शिकायत क्यों?”

सरिता – “लो बहनजी ने सिग्नल लेट तो पकड़ा ही आज गलत भी पकड़ा। तेरा बॉयफ्रेंड निगल लिया क्या नीतू ने फ्री में?”

रीमा ने सरिता को नज़रअंदाज़ करके नीतू से कहा – “देखो नीतू मैं हमेशा तुम्हे किसी समूह की ओट लिये देखती हूँ, उनकी सामूहिक साख या उनके इतिहास का सहारा लिए देखती हूँ। जैसे “मुझे गढ़वाली होने पर गर्व है”, “प्राउड टू बी ए गर्ल”, “ब्राउन पीपल आर द बेस्ट”, “पक्की ठाकुर लड़की हूँ” और भी बहुत कुछ। ऐसा अकेली तुम नहीं करती, ये आम आदत है लोगो में। यह सब क्या है? जिन बातों पर हमारा बस नहीं, केवल हमारे जन्म से हमसे जुड़ गयी…उनपर गर्व या शर्म करने का क्या मतलब? कुछ गिनाना है तो अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियाँ, प्रतिभा, मेहनत से मिली चीज़ें गिनाओ, ऐसे समूह की आड़ लेकर खुद को महान घोषित करना भी अव्वल दर्ज़े की मुफ्तखोरी है।

कुछ देर के लिए बगले झांकती सहेलियाँ आज “ट्यूबलाइट” की चमक में फ़ीकी पड़ गयीं।

समाप्त!

– मोहित शर्मा (ज़हन)
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जुग-जुग मरो बेटा! (कटाक्ष) – कवि मोहित शर्मा (ज़हन)

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जून 2015 में एक बार फिर महाराष्ट्र में ज़हरीली शराब पीने के बाद कई लोग मारे गए और कई अन्य अंधे हो गए व कुछ की आंतें फट गयी। परिजनों के विरोध के बाद राज्य सरकार ने मृतकों के परिजनों को 1 लाख रुपये देने की घोषणा की। पर जो अंधे हुए या जिसकी आँत फटी उनकी सहायता या पुनर्वास के लिए सरकार द्वारा कुछ नहीं किया गया। मृतकों के परिवारों से मेरी सहानुभूति है कि कुछ नियम, कानून और जागरूकता बढ़ा कर ये मौतें कम की जा सकती थी। इस विषय पर ये कटाक्ष काव्य। शब्द जानबूझ कर तीखें किये है, इनका बुरा मानें, इसको दिल पर ज़रूर लें – आवाज़ उठायें…..पर सही जगह!

जुग-जुग मरो बेटा!

रसमलाई क्या जलेबी भी लगे अब फीकी ,
जो शराब लखपति बनायें….
वो ज़हर नहीं अमृत सरीखी।
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मलाल है क़ि पूरी क़ि पूरी क्रिकेट टीम को खड़ा क्यों ना किया,
फालतू में “हम दो, हमारे दो” स्लोगन को इतना seriously ले लिया।
जबसे ट्रेजेडी का मुआवजा बँट गया,
तबसे साला हर शराबी चलती फिरती FD बन गया।
  ——
अजीब देश है, शहीदो की विधवाएं पैसो के लिए कितनी दौड़ लगातीं है,
जबकि शराबियों के घर सरकार खुद चेक लेकर आती है।
  ——
जब लोगो को लाख का चेक मिलते देखा,
चौल का हर बूढा आशीर्वाद देता फिरता – जुग-जुग मरो बेटा!
जनता में अचानक समाजसेवा की जगने लगी है इच्छा,
गोद लेना चाहते है लोग पियक्कड़ यतीम बच्चा।
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दहेज़ में कितना सामान मांग रहा है तेरा जीजा,
बिन आँखों के, फटी आँतों से Installment मे मत जी,
बाउजी कुछ पव्वे ब्लैक में लाएं है गटागट पीजा।
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किसी करमजले का पेट फटा,
तो कोई धरती का बोझ सूरदास बना,
असली सपूत सिर्फ वो,
जो पिके सीधा शहीद हुआ!
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– मोहित शर्मा (ज़हन)
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श्रीमान सुविधानुसार – मोहित शर्मा (ट्रेंडस्टर) #laghukatha

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श्रीमान सुविधानुसार…वैसे तो आमजन की तरह ही हर बात में अपनी सुविधा देखते थे पर दूसरो को शॉर्टकट मारते या कुछ गलत करते हुए देख, दुख और घृणा से बड़े कायदे में सर हिलाते या आपत्ति जताते थे। हाँ, स्वयं वैसा करने पर एक बार भी खुद को नहीं रोकते और पकडे जाने पर अनेक बहाने तैयार रखते। घर पर शनिवार के दिन प्याज जैसे तामसिक पदार्थ के भूलवश खाने में आ जाने पर श्रीमती जी को कानफाडू डेसीबल्स में डांट पिलाई। रोज़मर्रा में ऐसी माइक्रोस्कोपिक गलतियां कुत्ते की चपलता से ढूंढकर बिना वजह क्लेश करने में पेशेवर थे श्री सुविधानुसार जी। चाहे वो कुछ ना बोलें, अपने किसी काम  व्यस्त हों या सो रहे हो पर उनके घर में होने से श्रीमती जी का मंन परेशान ही रहता था कि ना जाने अब कौन सी बात पकड़ लें उनके पति।

ऑफिस के मित्रों संग श्रीमान गोलगप्पे खाने आये और जैसे बड़े-बुज़ुर्ग कहते है यहाँ किये गलत काम की सज़ा यहीं मिलती है। जो पहला आलू-प्याज-मसालों से भरा पानी बताशा स्वाद की लपलपाहट में श्रीमान जी ने हपक के चाबा, लाखो में एक गोलगप्पे की अतिसख्त सूजी की पापड़ी इनके तालु में ऐसे कोण पर घुसी की खून के स्वाद से भर गया इनका मुहँ। रात में इस घाव को भरने के लिए हल्दी का दूध पीने के लिए एक गिलास उठाते वक़्त वो रैक में काफी पीछे रखे गिलास पर लगी ज़रा सी बर्तन मांझने की साबुन पर श्रीमती जी को ऊँचे स्वर में कोसने लगे। फिर सुविधानुसार झूठा गिलास ज़रा सा उचक कर सिंक में रखने के बजाये रैक में ही रख दिया।

– मोहित शर्मा (ज़हन)

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मोहल्ले का (कु)तर्क गुम हो गया – मोहित शर्मा ज़हन

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लघुकथा 

“माना राजनीती में कुछ ऊँच-नीच हो जाती है, पर नेता जी हमारे लिए तो अच्छे है। हम लोगो से तो व्यवहार अच्छा है, छोटे-मोटे काम करवा देते है मोहल्ले के और क्या चाहिए? अब समाज का ठेका थोड़े ही ले रखा है हम लोगो ने!”

ऐसे तर्क होते थे वर्धा ब्लॉक मोहल्ले वालो के जब उन्हें शहर और उसके आस-पास के गाँव-देहात में उनके मोहल्ले की भव्य महलनुमा कोठी मे निवास कर रहे नेता जी एवम उनके गुर्गो की गुंडई, मनमानी के किस्से सुनने को मिलते थे। एक दिन नेता जी द्वारा दर्जनो व्यापारियों से की गयी मारपीट, वसूली के बाद शहर के हज़ारो उपद्रवी व्यापारियों और ऐसा कोई मौका ढूँढ रहे नेता जी के विरोधियों  ने मोहल्ले पर धावा बोल, भीड़ का फायदा उठाकर वहाँ के स्थानीय निवासियों से मारपीट, कई गाड़ियों एवम संपत्ति में आगजनी करते हुए  नेता जी के घर पर धावा बोल दिया जिसमे उनके कुछ समर्थको, परिवार समेत बर्बर हत्या कर दी गयी।

इस घटना में गंभीर रूप से घायल नेता जी के शुभचिंतक पडोसी सिंह साहब ठीक होने के बाद दिवंगत नेता जी के लिए कोई तर्क नहीं रखते। उनके दिमाग के उस हिस्से पर गहरी चोट आई जो तर्क समझता और प्रेषित करता है, इस कारण अब वो किसी भी तरह का तर्क नहीं रख पाते….बाकी मोहल्ले वालो के सर में चोटें नहीं आयीं….पर वो भी अब तर्कों को दूर से नमस्ते करते है!

– मोहित शर्मा ज़हन

आज़ादी Poetry – #मोहित_ज़हन‬

बिना शिकन वो पूछ रहे “देश बर्बाद है! किस बात की आज़ादी? कैसी आज़ादी?”
कि कॉन्फिडेंस से पूरी क्रिकेट टीम पैदा कर लो….
कि सालों-दशको-सदियों पुराने “बदलो” के हिसाब में लड़-मरलो….
कि कुतिया में परिवर्तित होकर औरों का हक़ मारने में उसेन बोल्ट का रिकॉर्ड हरलो…
और ज़िम्मेदारी निभाने में ‘पहले आप – पहले आप’ करलो…
कि न्यूज़ रिपोर्ट्स से देश को कोसते हुए AC में दूध ठंडा करलो….
अपने गिरेबां में झाँको तो पाओगे तुम हिन्द नहीं सोमालिया डिज़र्व करते हो सालो!
और अजब है अपना भारत भी…
जो इतने कमीनों के होते हुए भी 200 मुल्कों में डेढ़ सौ से बेहतर है अपनी “आज़ादी”
अनगिनत पाप की आज़ादी, आस्तीन के सांप की आज़ादी!
जय हिन्द! First deserve, then desire…
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P.S. Artwork from latest Kavya Comic “Desh Maange Mujhe”
— celebrating Indian Independence