Ghazal – रूठ लो…

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कुछ रास्तों की अपनी जुबां होती है,

कोई मोड़ चीखता है,

किसी कदम पर आह होती है…

——–

पूछे ज़माना कि इतने ज़माने क्या करते रहे?

ज़हरीले कुओं को राख से भरते रहे,

फर्ज़ी फकीरों के पैरों में पड़ते रहे,

गुजारिशों का ब्याज जमा करते रहे,

हारे वज़ीरों से लड़ते रहे…

और …खुद की ईजाद बीमारियों में खुद ही मरते रहे!

——–

रास्तों से अब बैर हो चला,

तो आगे बढ़ने से रुक जाएं क्या भला?

धीरे ही सही ज़िंदगी का जाम लेते हैं,

पगडण्डियों का हाथ थाम लेते हैं…

——–

अब कदमों में रफ़्तार नहीं तो न सही,

बरकत वाली नींद तो मिल रही,

बारूद की महक के पार देख तो सही…

नई सुबह की रौशनी तो खिल रही!

——–

सिर्फ उड़ना भर कामयाबी कैसे हो गई?

चलते हुए राह में कश्ती तो नहीं खो गई?

ज़मीन पर रूककर देख ज़रा तसल्ली मिले,

गुड़िया भरपेट चैन से सो तो गई…

——–

कुछ फैसलों की वफ़ा जान लो,

किस सोच से बने हैं…ये तुम मान लो,

कभी खुशफहमी में जो मिटा दिए…वो नाम लो!

——–

किसका क्या मतलब है…यह बरसात से पूछ लो,

धुली परतों से अपनों का पता पूछ लो…

अब जो बदले हो इसकी ख़ातिर,

अपने बीते कल से थोड़ा रूठ लो…

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#ज़हन

*Published – Ghazal Dhara (June 2019)

बूढ़े बरगद के पार (Hindi Story)

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संतुष्टि की कोई तय परिभाषा नहीं होती। बच्चा कुदरत में रोज़ दोहराये जाने वाली बात को अपने जीवन में पहली बार देख कर संतुष्ट हो सकता है, वहीं अवसाद से जूझ रहे प्रौढ़ को दुनिया की सबसे कीमती चीज़ भी बेमानी लगती है। नवीन के चाय बागान अच्छा मुनाफा दे रहे थे। इसके अलावा अच्छे भाग्य और सही समझ के साथ निवेश किये गए पैसों से वह देश के नामी अमीरों में था। एक ही पीढ़ी में इतनी बड़ी छलांग कम ही लोग लगा पाते हैं। हालांकि, नवीन संतुष्ट नहीं था। मन में एक कसक थी…उसके पिता हरिकमल।

जब नवीन संघर्ष कर रहा था तब उसके पिता हर कदम पर उसके साथ थे। वे अपने जीवन के अनुभव उससे बांटते, निराश होने पर उसे हौंसला देते और यहाँ तक कि उसके लिए कितनी भागदौड़ करते थे। ऐसा भी नहीं था कि ये कुछ सालों की बात थी। अब नवीन की उम्र 53 साल थी और उसके पिता करीब 82 साल के थे। आज जब जीवन स्थिर हुआ तो अलजाइमर के प्रभाव में वे पुराने हरिकमल जी कहीं गुम हो गए। नवीन के लिए बात केवल खोई याददाश्त की नहीं थी, मलाल था कि ऊपरवाला कुछ कम भी देता पर ऐसा समय देखने के लिए पिता को कुछ ठीक रखता।

“बरगद…”

हरिकमल अक्सर ये शब्द बुदबुदाते रहते थे। कसक का इलाज ढूंढ रहे नवीन ने इस शब्द पर ध्यान तो दिया पर कभी इसपर काम नहीं किया। एक दिन दिमाग को टटोलते हुए नवीन ने इस बरगद की जड़ तक जाने की ठान ली। कुछ पुराने परिजनों से और कुछ अपनी धुंधली यादों से तस्वीर बनाई। गांव में घर के पास बड़ा सा बरगद का पेड़। खेती-बाड़ी करने के बाद पिताजी उसकी छांव में बैठा करते थे। इसके अलावा हरिकमल कुछ और भी कहते रहते थे पर वह बात पूरा ध्यान देने पर भी समझ नहीं आती थी। ऐसा लगता था जैसे बरगद के बाद बोली बात उनके मन में तो है पर होंठो तक आते-आते बिखर जाती थी। क्या पता वह दूसरी बात अलजाइमर के प्रभाव में उन्हें याद न हो….या वे खुद बोलना न चाहते हों। अब अधूरी तस्वीर में एक पुराना बरगद था और बाकी यादों के कोहरे में छिपी कोई बात। चलो पूरी न सही एक सिरा ही सही।

नवीन ने विशेषज्ञों का एक दल पिताजी के आधे-अधूरे वर्णनों को पकड़ने में लगा दिया।

“बरगद…”

यह शब्द और इसके अलावा जो कुछ भी हरिकमल कहते उसपर गहन चर्चाएं होती, कलाकारों से स्केच बनवाये जाते और कंप्यूटर की मदद से उन्हें असलियत के करीब लाया जाता। परिजनों और नवीन की यादों पर शोध कार्य हुए। अंत में नवीन के एक फार्म हाउस का बड़ा हिस्सा साफ़ करके उसमें गांव जैसा पुराना घर और दूसरे शहर से जड़ों के नीचे कई मीटर मिट्टी समेत विशाल, पुराने बरगद को लगाया गया। कच्चे मकान और बरगद की कटाई छटाई इस बारीकी से की गई थी कि वो सबकी यादों के आइनों के सामने खरे उतर सकें।

“बरगद…”

लो बरगद तो आ गया। नवीन, सारे परिजन और उसका अनोखा दल ‘बरगद’ पर हरिकमल जी की प्रतिक्रिया जानने को बेचैन था। हालांकि, डॉक्टरों ने किसी बड़े चमत्कार की उम्मीद रखने की सलाह नहीं दी थी। फिर भी ये अनोखा प्रयोग और इससे जुड़ी मेहनत, भावनाएं जैसे डॉक्टरों की सलाह को अनदेखा करने की अपनी ही सलाह दे रही थीं।

हरिकमल को फार्म हाउस लाया गया। इस बात का पूरा खयाल रखा गया कि उन्हें अचानक बड़ा झटका न लगे। बरगद को ढ़ककर रखा गया। धीरे-धीरे उन्हें पुराने घर से जुड़ी चीज़ें दिखाई गईं, वैसे तापमान और खेतों में कुछ दिनों तक रोज़ थोड़ी देर के लिए रखा गया। जब उनकी प्रतिक्रिया और सेहत सही बनी रही तो आख़िरकार पुराने बरगद से उनके मिलने की तारीख तय हुई।

“बरगद…”
वह दिन भी आया। हरिकमल से मिलने उनका ‘बरगद’ आया था। वे बरगद से किसी पुराने यार की तरह लिपट गए। बरगद से ही उनका लंबा एकालाप में लिपटा वार्तालाप चला। उनकी ख़ुशी और संतुष्टि देख कर सभी अपनी मेहनत सफल मान रहे थे। इतने में हरिकमल ज़मीन पर निढाल होकर रोने लगे। सब कुछ ठीक तो हो गया था? अब क्या रह गया?

सब सवालों से घिरे थे पर नवीन को जैसे जवाब पता था या शायद वह इस घटना का इंतज़ार कर रहा था। अपने दल और नौकरों को हरिकमल से दूर हटाकर नवीन उनसे लिपट गया।

“देख…बाबू…”

“बोलो पिता जी, क्या रह गया? क्यों परेशान हो…इतने सालों से। क्यों मुँह में मर जाती है बरगद के बाद दूसरी बात?”

दहाड़े मारते हरिकमल बोले – “बरगद तो आ गया…”

“बरगद तो आ गया…पर पुराना माहौल नहीं आया।”

समाप्त!
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कविता – जब क्रिकेट से मिलने बाकी खेल आए…#ज़हन

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एक दिन सब खेल क्रिकेट से मिलने आए,
मानो जैसे दशकों का गुस्सा समेट कर लाए।
क्रिकेट ने मुस्कुराकर सबको बिठाया,
भूखे खेलों को पाँच सितारा खाना खिलाया।

बड़ी दुविधा में खेल खुस-पुस कर बोले…
हम अदनों से इतनी बड़ी हस्ती का मान कैसे डोले?
आँखों की शिकायत मुँह से कैसे बोलें?
कैसे डालें क्रिकेट पर इल्ज़ामों के घेरे?
अपनी मुखिया हॉकी और कुश्ती तो खड़ी हैं मुँह फेरे…
हिम्मत कर हाथ थामे टेनिस, तीरंदाज़ी आए,
घिग्घी बंध गई, बातें भूलें, कुछ भी याद न आए…

“क…क्रिकेट साहब, आपने हमपर बड़े ज़ुल्म ढाए!”

आज़ादी से अबतक देखो कितने ओलम्पिक बीते,
इतनी आबादी के साथ भी हम देखो कितने पीछे!

माना समाज की उलझनों में देश के साधन रहे कम,
बचे-खुचे में बाकी खेल कुछ करते भी…तो आपने निकाला दम!

इनकी हिम्मत से टूटा सबकी झिझक का पहरा,
चैस जैसे बुज़ुर्ग से लेकर नवजात सेपक-टाकरा ने क्रिकेट को घेरा…

जाने कौनसे नशे से तूने जनता टुन्न की बहला फुसला,
जाने कितनी प्रतिभाओं का करियर अपने पैरों तले कुचला…

कब्बडी – “वर्ल्ड कप जीत कर भी मेरी लड़कियां रिक्शे से ट्रॉफी घर ले जाएं…
सात मैच खेला क्रिकेटर जेट में वोडका से भुजिया खाये?”

फुटबॉल – “पूरी दुनिया में पैर हैं मेरे…यहां हौंसला पस्त,
तेरी चमक-दमक ने कर दिया मुझे पोलियोग्रस्त।”

बैडमिंटन – “हम जैसे खेलों से जुड़ा अक्सर कोई बच्चा रोता है,
गलती से पदक जीत ले तो लोग बोलें…ऐसा भी कोई खेल होता है?”

धीरे-धीरे सब खेलों का हल्ला बढ़ गया,
किसी की लात…किसी का मुक्का क्रिकेट पर बरस पड़ा।

गोल्फ, बेसबॉल, बिलियर्ड वगैरह ने क्रिकेट को लतिआया,
तभी झुकी कमर वाले एथलेटिक्स बाबा ने सबको दूर हटाया…

“अपनी असफलता पर कुढ़ रहे हो…
क्यों अकेले क्रिकेट पर सारा दोष मढ़ रहे हो?
रोटी को जूझते घरों में इसे भी तानों की मिलती रही है जेल,
आखिर हम सबकी तरह…है तो ये भी एक खेल!
वाह, किस्मत हमारी,
यहाँ एक उम्र के बाद खेलना माना जाए बीमारी।
ये ऐसे लोग हैं जो पैकेज की दौड़ में पड़े हैं…
हाँ, वही लोग जो प्लेस्कूल से बच्चों का एक्सेंट “सुधारने” में लगे हैं।
ऐसों का एक ही रूटीन सुबह-शाम,
क्रिकेट के बहाने सही…कुछ तो लिया जाता है खेलों का नाम।

हाँ, भेड़चाल में इसके कई दीवाने,
पर एक दिन भेड़चाल के उस पार अपने करोड़ों कद्रदान भी मिल जाने!
जलो मत बराबरी की कोशिश करो,
क्रिकेट नहीं भारत की सोच को घेरो!

समाप्त!
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कई नाम हैं मेरे! (कहानी)

कल मेरा चेहरा और मेरी लिखी एक बात इंटरनेट पर वायरल हो गई। इतने सालों में ऐसा पहली बार हुआ है कि मुझे भी इतने लोगों ने जाना है। वायरल हुई बात बताने से पहले अपने बारे में थोड़ा बताता चलूं।
समाज के कायदे-कानून को बकवास बताने वालों को भी उन कायदों में रहकर अपने फायदे देखने पड़ते हैं। जो इन नियमों को नहीं मानते या मजबूरी में मान नहीं पाते उनकी किसी न किसी तरह से शामत पक्की है। 10-12 घंटे की नौकरी, 3-4 घंटे का आना-जाना बाकी नींद, खाने के अलावा क्या किया याद ही नहीं रहा। घर से दूर अजनबी शहर में पुराने यार भी छूट गए। ऐसी जीवनशैली के कद्दूकस में घिसकर जैसे सेहत, जवानी और दिमाग हर बीतते पल के साथ ख़त्म हो रहे थे। बचे समय में दिमागी संतुलन बचाने में सिर्फ़ इंटरनेट, सोशल मीडिया की आभासी दुनिया का सहारा था। यहाँ मैं भी कई लोगों की तरह अपने नीरस जीवन को चमकीली पन्नी में लपेट कर दिखाने में माहिर हो गया था। इस बीच बहुत से आभासी दोस्त भी बन गए। उन्ही में जीतता, उन्ही को जताता इस लत के सहारे जीता रहा।
उस मनहूस दिन मेरी माँ चल बसीं। कितना कुछ सोच रखा था उनके लिए! क्या-क्या करके उनका कर्ज़ उतारूंगा। अपनी औसत ज़िन्दगी में बेचारी का ज़्यादा कर्ज़ चुका नहीं पाया। मुझे घुटन हो रही थी कि अभी तो समय था, अभी मेरी सोची हुई बातें परवान चढ़नी थी…मेरे साथ ऐसा नहीं हो सकता! जब घुटन का कहीं कोई इलाज नहीं मिला तो माँ की तस्वीरों के साथ कुछ बातें लिख दीं। कलेजा से कुछ बोझ कम हुआ। अपने दर्द में मैं यह देख न पाया कि उन तस्वीरों में एक तस्वीर माँ के पार्थिव शरीर की भी अपलोड हो गई। जब तक वह तस्वीर हटाई तब तक वह कई जगह साझा हो चुकी थी। बस फिर क्या था सोशल मीडिया से वीडियो वेबसाइटों तक सब मेरा मज़ाक उड़ाने लगे, मुझ पर थूकने लगे कि कुछ लाइक्स, टिप्पणियों और लोगों का ध्यान खींचने के लिए मैं अपनी मरी माँ का सहारा ले रहा था। किसी ने ये तक कहा कि लड़कियों की सहानुभूति और उनसे दोस्ती बढ़ाने के लिए मैंने ऐसी गिरी हुई हरकत की। उन्हें क्या बताता…मेरी यह आदत अब मेरी बीमारी बन चुकी थी। न मेरे पास किसी करीबी दोस्त का कंधा था और न गला पकड़ती इस घुटन का कोई और त्वरित इलाज। मुझे माफ़ कर दो माँ!
मेरा नाम…कई नाम हैं मेरे! नहीं-नहीं भगवान नहीं हूँ। बस अपनी फ्रेंडलिस्ट में तो देखो एक बार, मैंने कहा ना…कई नाम हैं मेरे!
समाप्त!

New Comic Published!

Maut Neeti and Flight 279 in Horror Diaries 3.2 (Fiction Comics)
Cover page
Maut Neeti (Page 1)
Artist – Neeshu Chauhan
Only one tiny issue, these old scripts were in Hinglish and typist (…and editor) converting Hinglish to Devnagri font missed-mixed few spellings. Anyways, one more comic in print. Yay!

March ’19 Updates

Gift from Google #LocalGuides
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New story published – Anubhav Magazine (March 2019) Yatra Visheshank
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Kind words by artist-author Shambhu Nath Mahto
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TWG Game Final Stats and Hall of Fame Entry
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Successful Event: Indian Comics Fandom Awards 2018
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Poetry session, Lucknow
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News mentions, appearances…

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Great minds think alike… Langoor Peace Accord 1994, Sikandra (Akbar’s Tomb)

 Memories
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February 2019 Chess24 stats
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New job, new city (Noida).
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Seasonal flowers – Home Garden

Prayas (Hindi Story)

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Story ‘Prayas’ in Anubhav Patrika

कौवों का हमला Rap #ज़हन

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Wrote a promo rap for Ajay Kumar’s book

कांव कांव – धाँय धाँय,
इंसानों की हाय हाय!

सुन ले पक्की वार्निंग
नहीं है ये कोई जुमला
तेरी ऐसी तैसी करने प्रेज़ेंटिंग…
कौवों का हमला!
आजा तेरी एसयूवी का घमंड तोड़ दूँ,
बोनट पर अपनी बीट निचोड़ दूँ
कांव कांव – धाँय धाँय,
इंसानों की हाय हाय!

अपुन की तेज़ नज़र,
रखे हर बात की खबर,
साइज अपना छोटा…
पर दिल से गब्बर!
कैच मी इफ यू कैन,
उड़ा मैं फर्र-फर्र…
कांव कांव – धाँय धाँय,
इंसानों की हाय हाय!

कहे काग को चालू,
ये साला होमो सेपियन मक्खीचूस,
खुद गधे की शक्ल वाला,
मुझे कहे मनहूस!
कांव कांव – धाँय धाँय,
इंसानों की हाय हाय!

चिल करते ब्रोज़ को हुर्र हुररर कहके उड़ाये,
पितृ पक्ष में पूड़ी लेकर पीछे भागा आये।
क्रो गैंग से पंगा मत ले…
अपनी चोंच से जाने कितने टकले सुजाये।
कांव कांव – धाँय धाँय,
इंसानों की हाय हाय!

तोड़ेगा तेरी ईगो का गमला,
फ्रेश रापचिक कौवों का हमला।
तो सारे बोलो…
कांव कांव – धाँय धाँय,
इंसानों की हाय हाय!

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– मोहित शर्मा ज़हन

Winners of Indian Comics Fandom Awards 2018 #ICFA_2018

Total Winners – 29 (9 Categories)

Hall of Fame 2018 Inductees – 6

Honorable Mentions – 4

2

Best Blogger-Reviewer

Prabhat Kumar Singh (Gold), Rahul Raj (Silver), Himanshu Khatri (Bronze)

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Best Cartoonist 

Sushant Panda (Gold), Husain Zamin (Silver), Samir Narayan (Bronze)

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Best Colorist

Aditya Kishore (Gold), Pasang Amrit Lama (Silver), Vibhav Pandey (Bronze)

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1

Best Comics Collector

Prahlad Dubey (Gold), Shalu Gupta (Silver), Gopal Sharma (Bronze)

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Best Fanfiction Writer

Hukum Mahendra (Gold), Balbinder Singh (Silver), Talha Faran and Samvart Harshit [Tie] (Bronze)

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Best Fan Artist 

Himmat Singh (Gold), Baljinder Singh Korwa (Silver), Dheeraj Anand and Hemant Dhawal [Tie](Bronze)

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1

Best Fan Work (Comic, Video, Music etc)

Apocalypse – FMC (Gold), Toon Tales: Hasgulle (Silver), Sarpvan ka Pishach (Bronze)

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Best Webcomic

Green Humour (Gold),  Delicate Desi – Akoodles (Silver), TaccoMacco (Bronze)

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1

Best Cosplay 

Rudra Rajpoot (Gold), Nikhil Verma (Silver), Agam Sharma (Bronze)

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3

Hall of Fame 

Mohan Sharma, Aabid Surti, Bharath Murthy, Shambhu Nath Mahto, Arun Prasad, Akshay Dhar

4

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Honorable Mention

*) – Emerging Publications – Fiction Comics, Comix Theory

*) – Best Community – Indian Comics Universe Fan Club (ICUFC)

*) – Best Magazine – Nanhe Samrat

Nominate your Favorite: Indian Comics Fandom Awards 2018 #ICFA_2018

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Nominations for the Indian Comics Fandom Awards 2018 are now open.

ICFA 2018 Categories

*) – Best Blogger-Reviewer

*) – Best Cartoonist

*) – Best Colorist

*) – Best Comics Collector

*) – Best Fanfiction Writer

*) – Best Fan Artist

*) – Best Fan Work (Comic, Video, Music etc)

*) – Best Webcomic

*) – Best Cosplay

*) – Hall of Fame

ICF Awards 2018 results to be calculated based on previous awards polls, nominations. No category-wise separate polls this year. However, you can still nominate a fan or artist in these categories. Your nomination mail/message equals to one vote. Email nominee’s name, category (maximum 3 category nominations for 1 person) – letsmohit@gmail.com or inbox us (Indian Comics Fandom), Deadline is 5 PM Sunday, 30 December 2018

#freelance_talents #icfawards #indiancomics #indiancomicsfandom #ICFA_2018 #freelancetalents #comics #art

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