जीवन में विलेन ढूँढने की आदत (लेख) #ज़हन

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कॉमिक्स लेखन में एक कहावत है, “विलेन भी अपनी नज़रों में हीरो होता है।” खलनायक अपनी छोटी भूल से लेकर जघन्य अपराधों तक का इतनी चपलता से स्पष्टीकरण देता है कि लगे उस स्थिति में सबसे ठीक विकल्प वही था। बचपन से हमें बुराई पर अच्छाई की जीत वाली कई गाथाओं का इस तरह रसपान करवाया जाता है तो कोई भी बुरा नहीं बनना चाहता। अब सवाल उठते हैं कि अगर कोई बुरा नहीं तो फिर समाज में फैली बुराई का स्रोत क्या है? दुनिया में सब अच्छे क्यों नहीं? जवाब उस कॉमिक विलेन वाला है, ‘अपनी पिक्चर में हर कोई नायक होता है।’ दुनिया में ना कोई पूरी तरह अच्छा है और ना ही कोई बुराई का पुतला है। फिर भी खलनायक ढूँढने, बनाने की आदत हम सबके अंदर है। ये आदत कहाँ से जन्मी? शायद मानव मन को एक सांत्वना सी मिल जाती है और अपनी बुराइयों, कमियों से ध्यान हट जाता है। कभी-कभार परिवेश और घटनाओं के आधार पर किसी को डीमनाइज़ करना समझा जा सकता है पर जब यह आदत लोग अपने निजी जीवन के हर पहलु में लगाने लगें तो समस्याओं का जाल बन जाता है।

*) – प्रकृति की कारस्तानी: नेचर का एक नियम होता है कि हर जैविक प्रजाति धरती पर हो रहे बदलाव के अनुसार खुद को ढालते हुए निश्चित विकास के साथ बढ़ती रहे। अब अगर सबसे विकसित दिमाग वाला प्राणी मनुष्य, बात बात पर अंतःकरण की आवाज़ सुनकर खुद पर सवाल करने लगेगा तो उस प्रजाति में अवसाद, हीन भावना आदि मानसिक समस्याओं का औसत काफी बढ़ जाएगा। ऐसा होने पर मानव प्रजाति के विकास में बाधा आ सकती है। इस कारण से आम इंसान का ध्यान बँटाने के लिए प्रकृति ने उसमे ऐसा तंत्र फिट किया है कि वह दुनियाभर की बुराई को मैग्नीफाई करके खुद को दिलासा देता रहता है कि “मैं तो फिर भी बहुत ठीक हूँ बाकियों से।” इस सोच को बढ़ावा देने में मीडिया का बड़ा योगदान है जिसे किसी नैरेटिव और मसाले के लिए लगभग हर कहानी में किसी ना किसी को खलनायक बनाने का शौक है।

*) – घटनाओं की नवीनता: …यानी रीसेन्सी ऑफ़ इवेंट्स का मतलब किसी व्यक्ति द्वारा अपनी सुविधानुसार पास की घटनाओं के हिसाब से मन बनाना। वहीं पहले हुई घटनाएँ जो उसकी याददाश्त के कम्फर्ट जोन से बाहर हों उन्हें सोच में शामिल ना करना। यहाँ सुविधा सिर्फ कुछ याद रखने के दायरे में ही नहीं बल्कि अपने एजेंडे के हिसाब से घटनाओं को रखने और हटाने में भी है। अक्सर सोशल मीडिया पर किसी राजनैतिक बहस पर आप ऐसा देख सकते हैं। किसी असत्यापित खबर पर हम इसी अनुसार सही और गलत पक्ष का निर्णय सुना देते हैं।

*) – निजी जीवन: बाहरी घटक तो एक बार के लिए फिर भी संभाले जा सकते हैं पर अगर कोई इंसान अपने जीवन में अहम् किरदार लिए लोगो को डीमनाइज़ करना शुरू कर दे तब वह अनजाने में अपना ही नुक्सान करने लगता है। उसके पेशे, रिश्तों पर इसका बुरा असर पड़ता है। बिना किसी ठोस आधार के अपनी कल्पनाओं के अम्बार को आग लगाकर हम अपने जीवन के रावणो को ढूँढ लेते हैं। समय के साथ ये आदत प्रबल हो जाती है पर इतनी प्रत्यक्ष होकर भी हमें दिखाई नहीं देती।

पूछें खुद से ये सवाल – उसकी जगह मैं होता तो क्या करता? क्या कोई ऐसी बात तो नहीं जो मुझसे अनदेखी रह गयी? कहीं मैं मन में गढ़ी बातों को असल बातों में मिला तो नहीं रहा? इस मसले पर बिना किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त व्यक्ति की क्या राय होती? मन के ध्यान बटाऊ टैक्टिस में फँसने के बजाय इन सवालों के ईमानदार जवाब कई मामलों में ग़लतफहमी दूर कर देंगे और शर्तिया 10 में से 8-9 बार आपकी कहानी में बिना बात कोई काल्पनिक खलनायक नहीं रहेगा।

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Read समूह वाली मानसिकता (लेख)

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तेज़ाबी आँखें (कहानी) #ज़हन

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**Warning: Contains Strong Language**

पिछले कुछ समय से सीतापुर स्थित एक स्वयंसेवी संस्था के संचालक अनिक कृष्णन देश और दुनिया की सुर्ख़ियों में छाये थे। एकतरफा प्यार और खुन्दक की वजह से हुए एसिड अटैक के बाद अपनी सूरत की रौनक खो चुकी लड़की रिद्धिमा की सीरत पर अनिक मोहित हो चुके थे। प्रेम परवान चढ़ने पर अनिक ने समाज से दुत्कारी गयी रिद्धिमा को अपने घर और मन में आसरा दिया। अब यह जोड़ा लिव-इन सम्बन्ध में साथ खुश था। किसी स्थानीय पत्रिका द्वारा खबर पकडे जाने पर जैसे गंध लेते हुए अनिक के पास मीडिया का जमावड़ा लगने लगा। हर किसी को अनिक से एक्सक्लूसिव बाईट चाहिए थी, सभी को उसके मन में झांकना था कि दुनिया के घूमने की उलटी दिशा में घूमना कैसा होता है। ऐसे ही एक विदेशी न्यूज़ चैनल के इंटरव्यू में सहजता से अनिक ने अपनी बात का समापन किया…

“…हम सब बाहरी आवरण के पीछे पागल हुए बैठे हैं जबकि आपका, मेरा और सबका जीवन तो अंदरूनी व्यक्तित्व पर टिका है। लोग पूछते हैं कि रिद्धिमा ही क्यों? उसमे ऐसा क्या ख़ास है? अरे झाँकने की हिम्मत तो करो…उस शरीर के 5-7 प्रतिशत जले-खुरदुरे हिस्से की परत के अलावा उसमे पूरी दुनिया समायी है। मेरे लिए रिद्धिमा दुनिया की सबसे सुन्दर लड़की है। जिसे उसकी ‘कमी’ जितनी बड़ी लगती है, उसके अंदर उतना ही ज़्यादा खोखलापन है।”

झंकझोर देने वाले शब्दों के बाद इंटरव्यू ले रहे अनुभवी एंकर के भी हाथ कांपने लगे और कमरे में उपस्थित सभी लोगो के रोंगटे खड़े हो गये। अनिक को तसल्ली हुई कि यह इंटरव्यू भी अच्छा निकला और उसकी बात प्रभावी ढंग से अधिक लोगो तक पहुँचेगी।

घर आकर वह एक महिला के साथ बैठकर बातें करने लगा। रिद्धिमा उन दोनों के लिए खाना लेकर आयी और नज़रे बचा कर कमरे से चली गयी। कुछ देर बाद अनिक ने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया। बंद कमरे में क्या होता था रिद्धिमा को पता था पर उसे दुनिया से अपना चेहरा और अनिक से अपनी नज़रे छुपाने की आदत पड़ चुकी थी। उसके सूट की चुन्नियों पर नाखूनों के कुरेदने से कितने ही पैटर्न बन गये थे। वैसे तो रोज़ का दर्द इतनी टीस नहीं देता पर आज रिद्धिमा के आँसू झर-झर बह रहे थे। 2 साल पहले आज ही के दिन वो अपने ‘सच्चे प्यार’ से मिली थी, बातें करते हुए बीच-बीच अनिक की भूरी आँखों पर जब पलकों का पर्दा गिरता तो आँखों में न झाँक पाने का मिलीसेकंड का ब्रेक भी रिद्धिमा को परेशान करता रहता। तब अनिक की गहरी आवाज़ और चेहरे में खोई रिद्धिमा अपने चेहरे का पर्दा भूल जाती थी। केवल एक वो ही तो था जो जला चेहरा देखकर अपने चेहरे पर दया, घृणा या परेशानी के भाव नहीं लाता था। अब साथ रहकर बाहरी और अंदरूनी का फर्क वो साफ़ देख सकती थी। कहना, सोचना आसान था कि यह नर्क छोड़ क्यों नहीं देती, पर अब उसमे और संघर्ष की शक्ति नहीं थी। अनाथालय से सामाजिक केंद्र में मौत के इंतज़ार से बेहतर झूठे ही सही अपने प्यार के काम आना। रिद्धिमा के कारण अनिक को देश-दुनिया में शोहरत ही नहीं बल्कि उसकी संस्था को सरकार, विदेशी संस्थाओं द्वारा आर्थिक मदद भी मिल रही थी। हालाँकि, संस्था को मिल रहे पैसे, मदद का अधिकांश हिस्सा अनिक अपने दोस्तों-रिश्तेदारों और अपने शौक पूरे करने में बहा दिया करता था। अक्सर उसे किसी सेमिनार, इवेंट में अथिति के रूप में बुलाया जाता जहाँ ना चाहते हुए भी उसे रिद्धिमा को अपने साथ ले जाना पड़ता। बाहर कहीं भी लोगो से घिरे होने पर अनिक की भूरी आँखों में अपनेआप दिखावटी भोलापन आ जाता था और उनमे फिर से डूबकर रिद्धिमा खुद पर मुस्कुरा देती। अनिक को प्यार से निहारती रिद्धिमा के अनेक फोटो दुनियाभर का दिल पिघला रहे थे।

रिद्धिमा की कोशिश रहती थी कि अनिक से बचकर वह कुछ पैसे, कपडे आदि ज़रूरतमंद लोगो को दे दिया करे ताकि उसकी वजह से कुछ लोगो को तो राहत मिले। जीते रहने का और आयोजनों में अनिक के साथ चहकते हुए फोटो खिंचवाने की यह एक बड़ी वजह थी। एक दिन रिद्धिमा को पैसे उठाते हुए अनिक ने पकड़ लिया और वो बुरी तरह उसकी पिटाई करने लगा।

“साली…हरामण शक तो मुझे पहले से था तुझपर आज पकड़ भी लिया। किस चीज़ की कमी है तुझे जो चोरी करती है? तेरे शौक पूरे नहीं होते? यार पाल लिए है तूने? बोल कुत्तिया किस अंधे के साथ रंगरलियां मना रही है? तेरा भी मन करता होगा ना मुझे देख कर? कहाँ जाती है पैसे लेकर, किसको देकर अपनी आग बुझाती है? शक्ल देख अपनी और तसल्ली ना मिले तो किसी छोटे बच्चे को अपना चेहरा दिखा आइयो, डर के मारे वहीं मूत देगा। थू साली हराम की औलाद! मेरे टुकड़ो पर जी रही है ये काफी नहीं है क्या! अभी किसी इवेंट जाने को बोलूंगा तो तबियत ख़राब हो जाती है कमीनी की। पैसा कितने हक़ से उठाती है…जी में आता है तेरा चुड़ैल सा मुँह नोच डालूं! रुक आज तेरी चमड़ी उधेड़ता हूँ।”

लाखों में इक्का-दुक्का कोई रिद्धिमा की तरह होता है जिसे भगवान दर्द सहने के असीम क्षमता देता है। दर्द महसूस ना करना या किसी योगी की तरह अपने ध्यान में दर्द से ध्यान हटा लेना। बेल्ट, चप्पल, हाथ-पैर खाती खूनमखून रिद्धिमा की सिसकियाँ बस सांस लेने का संघर्ष थी, उसे दर्द कहाँ हो रहा था! इतनी हिम्मत कहाँ थी दर्द में? जैसे सात जन्म की पीड़ा इन 5-7 वर्षों में सिमट गयी हो। वो आखरी बार तेज़ाब से जले अपने चेहरे के मवाद में बिलबिलाते कीड़ों को देखकर चीखी थी। उसके बाद तो बस किसी फ़िल्मी दर्शक की तरह वह अपनी कहानी जी और देख रही थी। इतना सब हो जाने के बाद भी वह समझ नहीं पाती थी कि लोग इतने बुरे कैसे हो सकते हैं?

तीन दिन बाद दिल्ली में आयोजित सेमिनार जब पत्रकारों के उसकी चोटों का कारण पूछा तो वह बोली – “अपनी लापरवाही में मेरी स्कूटी का एक्सीडेंट हो गया, वो तो वक़्त रहते अनिक ने मुझे बचा लिया। चेहरे के दूसरे हिस्से पर पड़े निशानों की वजह से उन्होंने 3 दिन से ठीक से खाना भी नहीं खाया है।”

स्क्रिप्ट पूरी करने के लिए रिद्धिमा अलग खड़ी हो गयी और अनिक मीडिया के सामने अपनी फिलॉसफी की बीन बजाने लगा। इधर आदत से मजबूर रिद्धिमा अनिक की आँखों में खोकर मुस्कुराने लगी…तेज़ाब फेंकती, झूठी लेकिन भूरी आँखें!

समाप्त!
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कुपोषित संस्कार (व्यंग) #ज़हन

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वर्ष में एक बार होने वाले धार्मिक अनुष्ठान, हवन के बाद अपने अपार्टमेंट की छत पर चिड़ियों को पूड़ी-प्रसाद रखने गया तो 150 पूड़ियाँ देख के मन बैठ गया कि मेरी पूड़ी तो इतनी कुरकुरी भी नहीं लग रही जो बाकी डेढ़ सौ को छोड़ कर कोई कौवा या चिड़िया इसमें कुछ रूचि ले। फिर कुत्ते और गाय को नीचे ढूंढ़ने निकला ही था कि कुछ पडोसी मिल गए जो मेरी तरह प्रसाद लिए नीचे आ रहे थे। सोसाइटी के बाहर आवारा कुत्ते जो अपनी टाँगे ऊपर कर अलग-अलग कोण पर शवासन में पड़े थे, हम लोगो को देख कर दौड़ पड़े। उनका थुलथुल मुखिया जिसकी थूथन से लेकर पूँछ की नोक तक गोलकोण्डा छाप मेटीरियल से बनी थी, ऐसा भागा है ना भाईसाहब…जैसे पहले फिल्मों के क्लाइमेक्स में मौत के डर से अमरीश पुरी नहीं भागता था हांफता हुआ…वैसे! कुत्ते तो कुत्ते, पिल्लै तक हाथ नहीं आये। कोई ढलान पे लुढ़कता चला गया, कोई नाली में घिसट गया…पता नहीं किस बात की इतनी दहशत? हमने सोचा चलो गाय मिल जायेगी इनको बाद में देखते हैं। थोड़ा चले तो कुछ लोग पूड़ी लिए भाग रहे थे और उनके आगे कुत्तो वाली दहशत आँखों में लिए 2 गईया भागी जा रही थी। सामने अपार्टमेंट के अंकल जी अपना पेट पकडे बैठे थे। “कैसे हुआ?” पूछने पर पता चला कि जब ये ज़बरदस्ती कोशिश कर रहे थे तो गाय ने अपना कुंद सींग मार दिया। चलो ठीक ही हुआ इस बहाने इनका लिवर भी चेक हो जाएगा। अगले गेट पर एक गाय बेहोश पड़ी थी।

हद है! “आज हो क्या रहा है?” वैसे मैंने यह बात यूँ ही बोली थी, उस से पूछा तो नहीं था पर 4 लोगो के सामने गार्ड का बताने का / स्टाइल मारने का मन कर रहा होगा तो वो बोला – “सर! एकसाथ इतना खाने की आदत नहीं है ना बेचारी को, इसलिए महीने भर का नाश्ता खा के होश फाख्ता हो गए इसके। सोसाइटी में इतने अपार्टमेंट के चार-पांच सौ घरो से जो खाने की सुनामी आई है उसमे यहाँ के गिने-चुने कुपोषित गाय-कुत्ते बह गए हैं…कुछ तो ख़ुशी के मारे पागल ही हो गए हैं। कोई आधे घंटे से बजरी में लोट रहा है, कोई गरम तारकोल के कनस्टर में पीठ रगड़ रहा है, कोई ई-रिक्शा के पीछे की निन्नी सी जगह में बैठ के स्टेट बॉर्डर पार ही चला गया, किसी की मम्मी नाले के पाइप में फंस गयी हैं…ये सब जानवर ओवरवेल्म हो गए हैं और पक्षी लोग तो आते ही नहीं सर अब इस एरिया में। आप ऐसा करो, 26 किलोमीटर दूर राज्य का बॉर्डर पार कर के कुछ गांव शुरू होते हैं वहां मिल जायेंगे आपको सब जीव-जंतु…और जब जा ही रहे हो तो उस कुत्ते को ले आना जो ई-रिक्शा में बैठा चला गया, रात में जगा रहता है कम से कम…”

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*आप सभी से निवेदन है कि अपनी क्षमता अनुसार आस-पास के जीवो का ध्यान रखें, किसी विशेष अवसर, उपलक्ष्य की प्रतीक्षा में न रहें।*

समाप्त!

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Read लालच का अंकुर (कहानी)

#मोहित_शर्मा_ज़हन #mohitness #mohit_trendster

रंग का मोल (कहानी) #ज़हन

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आज भारत और नेपाल में हो रहीं 2 शादियों में एक अनोखा बंधन था।

दिव्यांशी अपने सांवले रंग को लेकर चिंतित रहती थी। सारे जतन करने बाद भी उसका रंग उसकी संतुष्टि लायक नहीं हुआ। दिव्यांशी का मीनिया इस हद तक पहुँच गया था कि वह अवसाद में चली गई। कुछ समय पहले एक नए इलाज के लिए एजेंट को अपना ब्लड ग्रुप, मेडिकल जानकारी देते समय दिव्यांशी के परिवार को ज़्यादा उम्मीद तो नहीं थी पर बच्ची की ज़िद और दिल की तसल्ली के लिए सेठ विभूतिचंद ने यह कदम उठाया।

फिर तुरंत ही पता चला कि दिव्यांशी के ब्लड ग्रुप से मिलती एक गोरी नेपाली लड़की राज़ी हुई है जिसकी पीठ और पेट से खाल निकाल कर दिव्यांशी के चेहरे, गर्दन और कुछ अन्य हिस्सो पर ग्राफ्ट की जा सकती है। नेपाली एजेंट को 2 लाख रुपये देकर, ऑपरेशन द्वारा दिव्यांशी के चेहरे, गर्दन, कंधो और हाथों-पैरों पर नेपाली लड़की की उजली खाल चढ़ा दी गयी। अपने अवसाद, हीनभावना और इस कदम के लिए दिव्यांशी और उसका परिवार आसानी से समाज को दोष दे सकता है और हर सुनने वाला उनकी हाँ में हाँ मिला देगा या ये लोग खुद को खंगाल कर अपना खोखलापन देख सकते हैं।

इस सौदे से बॉर्डर के इस तरफ ख़रीदे आत्मविश्वास से परिपूर्ण दिव्यांशी की शादी हो रही थी और उस तरफ नेपाली एजेंट की लड़की की शादी हो रही थी…और हाँ, अपनी खाल देने वाली नेपाली लड़की को भी 10 हज़ार रुपये मिल गए।

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सपने दिखा कर सपनो का क़त्ल कर दिया,
दुनिया का वास्ता देकर दुनिया ने ठग लिया!
फिर किसी महफ़िल के शौक गिना दो,
रंग का मोल लगा लो,
उजली चमड़ी की बोली लगा दो,
फिर कुतर-कुतर खाल के टुकड़े खा लो,
बचे-खुचे शरीर पर हँसकर एक और गुड़िया का ज़मीर डिगा दो!

तेरा भी कहाँ पाला पड़ गया?
…या तो इनमे शामिल हो जाना,
या फिर कोई सही मुहूर्त देखकर आना…
ये लोग लाश की अंगीठी पर रोटी सेंकते हैं….
और रूह की जगह रंग देखते हैं।

समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन #mohitness

छूटी डोर (कहानी)

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हिन्दी, अंग्रेजी साहित्य के बहुत बड़े समीक्षक-आलोचक, अनुवादक श्री अनूप चौबे का टी.वी. साक्षात्कार चल रहा था। साक्षात्कारकर्ता अनूप के पुराने मित्र नकुल प्रसाद थे। कुछ सवालो बाद नकुल को एक बात याद आ गई और अपने साथ लाये सवालो के बीच उन्होंने एक सवाल रखा।

“आपने पहले कई बार अपना उपन्यास, कथा/काव्य संग्रह लिखने की मंशा मुझसे साझा की थी। उस बारे में कुछ बताएं?”

हालाँकि, यह इंटरव्यू लाइव नहीं था पर चौबे जी असहज हो गए। कुछ संभलने के बाद उन्होंने फिर बोलना शुरू किया।

“वर्षो तक एक के बाद एक ना जाने कितनी कहानियों, कविताओं और उपन्यासों को पास से देखा। कई बार तो किसी रचना के लेखक, कवि से अधिक उस रचना के साथ समय बिताया। दूसरो के गढ़े काल्पनिक जगत में गलतियां, कमियां निकालने का जूनून पता नहीं कब आदत में बदल गया। एक समीक्षक की तरह लिखना या अनुवाद करना अलग है पर जब भी लेखक की तरह कुछ लिखता हूँ तो मेरी यह आदत किसी मीनिया की तरह मेरा पीछा करती है। अपनी कल्पना के कुछ वाक्य पूरे करते ही मन उनपर अपना नकारात्मक फरमान सुना देता है। अपना लिखा मेरी नज़र से कभी पास हो ही नहीं पाता है जो किसी और तक पहुँच पाये। कभी-कभी तो रात में उठकर पिछले दिन लिखे पन्ने फाड़े हैं ताकि चैन से सो सकूँ।”

नकुल प्रसाद – “ओह! क्षमा चाहता हूँ! मुझे यह स्थिति पता नहीं थी। आप चिंता मत कीजिये, मैं वो सवाल और आपकी प्रतिक्रिया एडिट करवा दूंगा।”

अनूप चौबे – “कोई बात नहीं…अगर मैंने यह क्षेत्र ना चुना होता तो शायद मैं अच्छा साहित्य लिख पाता क्योकि सच कहूँ तो रचना की अपूर्णता, उसकी कमियां ही उसका साज-श्रृंगार हैं। ऐसी बातें ही रचना की एक अलग छाप बनाती हैं। आपने देखा होगा कैसे कोई अपने चेहरे की कमी बताता है और उसकी वही चीज़ जिसे वह कमी मानता है अक्सर लोगो को पसंद आती है। सबसे बड़ी रचनाकार प्रकृति जो हमे मरते दम तक अपनी कलाकृतियों से विस्मित करती है, में पूर्णता से दूर अनगिनत छूटी डोर हैं। साहित्य में सामाजिक दायरे की फ्रीक्वेंसी पर सेट दिमागी पैमाने को संतुष्ट करना असंभव है। चलिए कोई बात नहीं, यह जन्म इस रोल में ही सही…”
समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन

Read सुविधानुसार न्यूक्लीयर परिवार (कहानी)

Jug Jug Maro # 1 – मुआवज़ा (काव्य कॉमिक)

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जुग जुग मरो सीरीज की पहली कविता और कॉमिक्स के संगम से बनी काव्य कॉमिक्स, “मुआवज़ा” शराबियों और सरकार पर कटाक्ष है, जो अपने-अपने नशे में चूर पड़े रहते हैं और जब तक उन्हें होश आता है तब कुछ किया नहीं जा सकता। अपना मन बहलाने के लिए कड़े कदम और राहत की मोक ड्रिल की जाते है और फिर सब पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं। मुश्किल सामने पड़ी चुनौतियाँ नहीं बल्कि उनसे निपटने की नियत रखने में है। समाज का एक तबका इतना व्यर्थ माना जाता है कि 10 जाएं या हज़ार मजाल है जो समाज ठिठक तक जाए।
मोहित शर्मा ज़हन की प्रतिलिपि प्रोफाइल
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कैशलेस रिश्वत (Cashless Bribe)

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एक सरकारी दफ्तर में एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, सौरभ घुसता है। सौरभ अपना झोला लेकर अंदर आता है और अपने विभाग से जुड़े एक बाबू (क्लर्क) के बारे में पूछता है। उसकी डेस्क पर जाकर वो अपना दुखड़ा रखता है।

“सर मेरा कई सालों का ट्रेवल अलाउंस, पेट्रोल अलाउंस, नच बलिये अलाउंस कुछ नहीं आया है, अब आप ही कुछ कीजिये।”

बाबू – “कर तो दें पर उसके लिए आपको भी कुछ करना होगा ना। इस हाथ दे, उस हाथ ले….नहीं तो लात ले।”

सौरभ – “हाँ झोला वामपंथी फोटोशूट के लिए थोड़े ही लाया हूँ!” (सौरभ झोले में हाथ डालता है)

बाबू – “एक तो नाड़े को झोले की डोरी बना रखा है….जी कर रहा है इसी का फंदा सा बना के झूला दूँ तुझे बदतमीज़!”

सौरभ – “मैंने क्या किया? बदतमीज़ी का तो मौका ही नहीं मिला अभी तक 30 सेकंडस में?

बाबू – “अरे जब पूरा देश डिजिटल इंडिया के नारे लगा रहा है और तुम अभी तक झोले में घुसे हो। तुम जैसे लोगो की वजह से ही देश तरक्की नहीं कर पाता। भक! नहीं करनी तुमसे बात।”

सौरभ – “बात नहीं करनी? बाबू हो पर गर्लफ्रेंड की तरह क्यों बिहेव कर रहे हो? अच्छा तो आप ही कुछ उपाय बताओ।”

बाबू – “कैशलेस सरकाओ हौले से….”

सौरभ – “ओह! हाँ जी अपना मोबाइल नंबर दो।”

बाबू – “मेरी इस महीने की लिमिट पूरी हो गयी है।”

सौरभ – “तभी मूड ख़राब है आपका! तो क्या इस महीने काम नहीं होगा मेरा?”

बाबू – “अरे क्यों नहीं होगा, देश को आगे बढ़ने से रोकने वाले भला हम कौन होते हैं? मेरे चपरासी का नम्बर नोट करो। उसकी भी लिमिट हो गयी हो तो बाहर बैठे नत्थू भिखारी के मोबाइल में 15% उसकी कमीशन जोड़ के डाल देना। बड़ा ईमानदार बंदा है! पिछले महीने का एक ट्रांसक्शन मैं भूल गया था वो भी हिसाब के साथ देकर गया है लौंडा। सारा काम छोड़ के, जय हिन्द बोल के उसके माथे की चुम्मी ली मैंने तुरंत… ”

समाप्त!

Anthology: Apne-Apne Kshitij (Lagukatha Sankalan)

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4 stories in the anthology, Book Launch: 8 January, 2017 – World Book Fair Delhi 🙂

अपने-अपने क्षितिज – लघुकथा संकलन (वनिका पब्लिकेशन्स)
56 लघुकथाकारों की चार-्चार लघुकथाओं का संकलन।
मुखावरण – चित्रकार कुंवर रविंद्र जी

विश्व पुस्तक मेले में 8 जनवरी 2017 को 11:30 बजे वनिका पब्लिकेशन्स के स्टैंड पर इस पुस्तक का विमोचन का कार्यक्रम है व, जिसमें आप सभी आमंत्रित हैं।

Kavya Comic #12 – Kadr (कद्र)

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Deepjoy Subba (Illustrator), Mohit Sharma (Writer-Poet), Harendra Saini (Colorist), Youdhveer Singh (Letterer), Cover Artist – James Boswell

Intro Poem (2016), Comic Poem (2007), Cover Art (1939)

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बेटा जब बड़े हो जाओगे….
बेटा जब बड़े हो जाओगे ना…
…और कभी अपना प्रयास निरर्थक लगें,
तो मुरझाये पत्तो की रेखाओं से चटख रंग का महत्त्व मांग लेना।
जब जीवन कुछ सरल लगे,
तो बरसात की तैयारी में मगन कीड़ो से चिंता जान लेना।

बेटा जब बड़े हो जाओगे ना…
…और कभी दुख का पहाड़ टूट पड़े,
तो कड़ी धूप में कूकती कोयल में उम्मीद सुन लेना।
जब सामने कोई बड़ी चुनौती मिले,
तो युद्ध में घायल सैनिक से साँसों की कीमत जांच लेना।

बेटा जब बड़े हो जाओगे ना…
…और कभी अहंकार का दंश चुभे,
तो सागर का एक छोर नाप लेना।
जब कहीं विश्वास डिगने लगे,
तो कुत्ते की आँखों से वफादारी नेक लेना।
कभी दुनिया का मोल पता ना चले,
गुरु की चिता पर बिलखते शिष्य में कद्र सीख लेना।

बेटा जब मेरी याद आये…
…तो अपने बच्चे को छाँव देती किसी भी माँ में मुझे देख लेना।

#ज़हन
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कद्र (काव्य कॉमिक) अब Culture POPcorn वेबसाइट, Google Books-Play, Archives, Issuu, Ebooks Daily, Comicverse आदि पर उपलब्ध।

http://www.culturepopcorn.com/kadr-kavya-comic-web-comic/

इंसानी परी – Peripheral Angel Comic (Freelance Talents)

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Tribute Comic 

This short biographical Hindi comic is based on the true life story of Neerja Bhanot (7 September, 1963-5 September, 1986), a flight purser with Pan Am Airlines. She worked as a model, and later as a flight purser, but her private life was far from glamorous. She had an early arranged marriage, which was marred by spousal abuse with frequent demands for dowry and even forced starvation. Fed up with the constant mental and physical abuse, she left her husband. Later on, she applied for a job as flight purser at Pan Am. She got selected, trained, and took the job.

On 5 Sep, 1986, the ill-fated Pan Am Flight 73, on which she was on board staff, was hijacked by terrorists affiliated with Abu Nidal Organisation, in Karachi, where it landed. The terrorists asked the flight staff to collect the passports of the passengers on board so that they could identify the Americans whom they intended to kill. Neerja managed to hide the passports of 41 Americans on board, and thus saved their lives. A few hours later, when the terrorists got tired with the whole operation, they decided to kill everyone on the plane. Neerja succeeded in slipping off a few passengers and the pilots through the emergency exit, while she herself died of bullet wounds whilst trying to save some children. She deliberately chose not to escape, even when she had her chance, just so that she could save others. She was only 22 when she died. She received India’s highest civilian gallantry award, Ashok Chakra, Tamgha -eInsaniyat, from Pakistan and Special Courage Award (United States Department of Justice) posthumously. Her murderers were captured and sentenced, some of whom succeeded in escaping.

This comic does not focus on the aftermath of her death in the hijacking event. It only tries to depict the inspirational story of Neerja as a graphic narrative, in particular her struggles, and the events which happened during the hijacking incident.

Available (Online read or download):

Readwhere, Scribd, Author Stream, ISSUU, Freelease, Slideshare, Archives, Fliiby, Google Books, Play store, Daily Hunt, Smashwords, Pothi and Ebook Library etc.

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Illustrator – Tadam Gyadu (PencilDude) Author – Mohit Sharma (Trendster) Colorist – Harendra Saini Cover Colorist – Dheeraj Dkboss Kumar Calligrapher – Youdhveer Singh

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