New Mini-Podcasts #ज़हन

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1) – Hindi Songs Funny Remix by Local DJs

2) – Accessories (Indian Songs)

3) – Doga 2008 Song Sample – Mohit Trendster

4) – Bollywood Pls (Dooba Dooba)

Also updated on Vimeo, Cylp, Soundcloud etc….

Link of my Youtube Channel 3 (FOR THE RECORDS :P)

#mohitness #mohit_trendster #ज़हन

Read Tezabi Aankhen (Story)

Poster #1 – Kathputli (Short Film)

मरणोपरांत आशीर्वाद (कहानी) #ज़हन

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पत्नी के देहांत के बाद रविन्दु सामंत गहरे अवसाद में चले गए थे। उनकी दिनचर्या अपने कमरे तक सीमित हो गयी थी। वहीं उनके तीन बच्चो की अब और इंतज़ार करने की इच्छा नहीं थी। एक शांत दिन उनके 3 बच्चो ने उन्हें बेहोशी की दवा सुंघा कर बेहोश किया और फिर पंखे से टांग कर उन्हें मार दिया गया, कुछ इस तरह कि पत्नी की मौत के शोक में उनकी मौत एक आत्महत्या लगे। उनकी लिखाई से मिलता-जुलता नोट रखने जा रहा उनका छोटा बेटा राजदीप कुछ देखकर ठिठक गया। पुलिस के सामने दी जाने वाली अपनी कहानी का रिहर्सल कर रहे उसके बड़े भाई-बहन ने कारण पूछा तो जवाब आया – “यहाँ तो पहले से एक नोट पड़ा है!”

“नोट है या ऐसे ही कोई रसीद-वसीद?”

राजदीप – “नोट ही है, लिखा है वो हम पर बोझ नहीं बनना चाहते थे और संपत्ति हम तीनो में बाँटकर आज रात पापा हमेशा के लिए ऋषिकेश के एक आश्रम जाने वाले थे।”

3-4 क्षण अवाक रहने के बाद तीनो बिना नज़रे मिलाये फिर अपने काम में लग गए। कुछ समय बाद पुलिस औपचारिकता निभा कर चली गई। एक हफ्ता बीतने के बाद रविन्दु सामंत के इंश्योरेंस एजेंट की शिकायत पर पुलिस का जांच दल दोबारा उनके घर आया। बीमा एजेंट के अनुसार रविन्दु सामंत के सुसाइड नोट की लिखावट उनकी राइटिंग से पूरी तरह नहीं मिलती थी। पुलिस टीम द्वारा जांच के लिए कुछ सामग्री जप्त की गयी और थोड़े दिन के बाद नतीजे की पुष्टि की बात हुई। तीनों भाई-बहन के चेहरे सफ़ेद पड़ गए और उन्हें जेल दिखने लगा। उन्हें यकीन था कि पुलिस के विशेषज्ञ लिखावट में अंतर पकड़ लेंगे। 5 दिनों बाद उन्हें सभी पत्र और जांच के लिए जप्त की गयी सामग्री वापस कर दी गयी। राजदीप अचंभित था कि आखिर कैसे दोनों लिखावट मिल गयीं और वो लोग बच गए? वह सारे पत्र देखने लगा और एक कागज़ देखकर उसे सांप सूँघ गया।  भाई ने कहा “चलो जान बची, पर तू सिर पकडे क्यों कांप रहा है? ठण्ड रख! अब कोई नहीं आ रहा हमें पकड़ने।”

राजदीप – “सुसाइड नोट की राइटिंग तो मैच हो गयी पापा की लिखावट से पर यह सुसाइड नोट वो नहीं जो मैंने लिखा था… “

समाप्त!

#mohitness #mohit_trendster #मोहित_शर्मा_ज़हन

Read रंग का मोल (कहानी)

रूहानी नाटक (कहानी) #ज़हन

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मेरा नाम कृष्णानंद है और लोग मुझे किशन कहकर बुलाते हैं। 9 साल की उम्र में अपने गांव से बिना सोचे लखनऊ आया, वैसे सोचकर भी क्या कर लेता…नौ साल का दिमाग क्या सलाह देता? सीखने में आम बच्चो जैसा नहीं था तो मुझे मंदबुद्धि कहा जाता था, सोने पे सुहागा यह कि मैं हकलाता था। शहर तो आ गया पर यहाँ रहने लायक कोई काम भी तो आना चाहिए था। एक थिएटर उस्ताद ने अपनी शरण में लिया और मैं उनके रंगमंच में साफ़-सफाई, कपड़ो-मंच का रखरखाव जैसे काम करने लगा। दूर से नाटक के कलाकारों को देखते हुए कई बार उनकी टोली में मिल जाने मन किया पर फिर अपनी कमियों को देखकर खुद को रोक लिया। अक्सर सबके जाने के बाद खाली थिएटर में पूरे मन के साथ घंटो अपने बनाये ‘शो’ करता। ऐसा करते हुए कितने साल बीत गए। आज जब किसी तरह हिम्मत कर के उस्ताद को यह बात बतानी चाही तो पूरी टोली मुझपर हँसने लगी। मेरे बात करने के लहज़े का ना जाने कितना मज़ाक उड़ाया गया। यकीन नहीं हुआ ये सब वही लोग हैं जो सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ने की बातें करते हैं, जागरूकता फैलाते हैं। अब और कितना संघर्ष करूँ? जीवन भर घिसट-घिसट के क्यों बिताऊं? क्या फायदा इन सबके बीच रहकर इस अधूरे जीवन को बिताने का? इस से बढ़िया तो मैं पैदा ही ना हुआ होता! अभी देर नहीं हुई है, मैं खुदखुशी कर लूँगा।

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“किस ख़ुशी में कर लोगे खुदख़ुशी? हम करने ही नहीं देंगे!”

(**सामने के नज़ारे से किशन की आवाज़ गुम हो गई इसलिए नैरेटर को टेकओवर करना पड़ रहा है।**)

छत के बाहर की ओर टांग लटकाये बैठे किशन को झटका लगा और वह अंदर आकर गिरा। उसके सामने अलग-अलग मानव आकृतियों वाले भूत खड़े थे। उनकी मुखिया एक सुन्दर परी सी आत्मा बोल रही थी। अचानक जैसे उसके मोनोलॉग को सुन रही काल्पनिक प्रकृति जागृत हो गयी। किशन डर से जड़ हो गया।

“डरो मत किशन! हम सब तुम्हे कुछ बातें बताने आएं हैं। कभी सोचा है रोज़ तुम आराम से उठते थे, हर दूसरे दिन तुम्हे लगता था कि आज तो तुम्हे पक्का देर हो जायेगी पर कभी ऐसा हुआ नहीं। तुम्हारे कमरे का किराया, बिजली-पानी का खर्च तुम्हारी मासिक आय से काट लें तो 50 रुपये बचते हैं…पर जब भी तुम्हारा मन कोई मिठाई, आइस क्रीम खाने को होता, किसी गरीब की मदद करने को होता तो तुम्हारी जेब से ज़रुरत भर के पैसे निकल आते। थिएटर टोली में सब कहते हैं कि किशन कभी बीमार नहीं पड़ता, सही कहते हैं। उन्हें यह नहीं पता कि तुम्हे कभी चोट भी नहीं लगती। तुम्हारे घर पर हर महीने माँ-बाप के खर्चे लायक मनी आर्डर जाता है….अरे वो तो छोडो, एक मित्र से तुम्हे ना कहने मे दिक्कत हुई और तुमने उस से जीवन बीमा पॉलिसी खरीद ली, फिर भूल गए। उस पॉलिसी का प्रीमियम ढाई साल से हर 3 महीने बिना नागा जमा हो रहा है। कभी सोचा है यह सब कैसे हो रहा है? कौन और क्यों कर रहा है?

कैसे सोचोगे? तुम बहुत भोले हो! तुम्हारी कला और मन में मिलावट नहीं है। किसी को दिखाने के लिए लोग जो आडम्बर ओढ़ते हैं उससे तुम कोसो दूर हो। हम सब हर रात तुम्हारे नाटक देखने आते हैं। अब तो बाहर के शहरों के भूत तक सिर्फ तुम्हारे लिए यहाँ आते हैं। जब तुम अपने सोचे नाटकों पर माइम करते हुए दर्जन किरदारों के स्वांग रचते हो तो तुम्हारे रचना संसार के आगे बाहर की दुनिया बहुत छोटी लगने लगती है। दिनभर जिस संकोच और शर्म के पीछे कुछ शब्द बोलने से डरते हो, रात में उतनी ही गहनता से हकलाते हुए जब संवाद बोलते हो तो फिर जन्म लेकर तुम्हारे साथ रहने का मन करता है। जिस जीवन को इतनी आसानी से छोड़ने की बात कर रहे हो उसके केवल कुछ क्षणों के लिए हम सब आत्माएं अतृप्त घूम रही हैं।”

किशन का मन हल्का हुआ कि उसकी कला के हज़ारों कद्रदान हैं। उसने फिर से शुरुआत की और कुछ समय बाद अपने रूहानी कद्रदानों की मदद से लखनऊ मे एक सरप्राइज थिएटर शो बुक किया। शो के अनोखे प्रचार से कई वहाँ पहुंचे, जिनमे किशन का उस्ताद और उसकी उत्सुक टोली भी शामिल थी। किशन की मेहनत रंग लाई और सबको अपनी प्रतिभा से चौंकाते हुए उसने एक हिट शो दिया। टोली को अपनी बड़ी भूल का एहसास हुआ और किशन के माइम, कहानी के अनुसार उन लोगो ने कुछ अलग नाटक रचे। अब वह थिएटर किशन के नाम से जाना जाता है। हाँ, आज भी अक्सर किशन रात में खाली फिर भी ‘भरे हुए’ थिएटर में अपनी नाट्य प्रस्तुति देता है।

समाप्त!

#मोहित_शर्मा_ज़हन #mohit_trendster

कुपोषित संस्कार (व्यंग) #ज़हन

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वर्ष में एक बार होने वाले धार्मिक अनुष्ठान, हवन के बाद अपने अपार्टमेंट की छत पर चिड़ियों को पूड़ी-प्रसाद रखने गया तो 150 पूड़ियाँ देख के मन बैठ गया कि मेरी पूड़ी तो इतनी कुरकुरी भी नहीं लग रही जो बाकी डेढ़ सौ को छोड़ कर कोई कौवा या चिड़िया इसमें कुछ रूचि ले। फिर कुत्ते और गाय को नीचे ढूंढ़ने निकला ही था कि कुछ पडोसी मिल गए जो मेरी तरह प्रसाद लिए नीचे आ रहे थे। सोसाइटी के बाहर आवारा कुत्ते जो अपनी टाँगे ऊपर कर अलग-अलग कोण पर शवासन में पड़े थे, हम लोगो को देख कर दौड़ पड़े। उनका थुलथुल मुखिया जिसकी थूथन से लेकर पूँछ की नोक तक गोलकोण्डा छाप मेटीरियल से बनी थी, ऐसा भागा है ना भाईसाहब…जैसे पहले फिल्मों के क्लाइमेक्स में मौत के डर से अमरीश पुरी नहीं भागता था हांफता हुआ…वैसे! कुत्ते तो कुत्ते, पिल्लै तक हाथ नहीं आये। कोई ढलान पे लुढ़कता चला गया, कोई नाली में घिसट गया…पता नहीं किस बात की इतनी दहशत? हमने सोचा चलो गाय मिल जायेगी इनको बाद में देखते हैं। थोड़ा चले तो कुछ लोग पूड़ी लिए भाग रहे थे और उनके आगे कुत्तो वाली दहशत आँखों में लिए 2 गईया भागी जा रही थी। सामने अपार्टमेंट के अंकल जी अपना पेट पकडे बैठे थे। “कैसे हुआ?” पूछने पर पता चला कि जब ये ज़बरदस्ती कोशिश कर रहे थे तो गाय ने अपना कुंद सींग मार दिया। चलो ठीक ही हुआ इस बहाने इनका लिवर भी चेक हो जाएगा। अगले गेट पर एक गाय बेहोश पड़ी थी।

हद है! “आज हो क्या रहा है?” वैसे मैंने यह बात यूँ ही बोली थी, उस से पूछा तो नहीं था पर 4 लोगो के सामने गार्ड का बताने का / स्टाइल मारने का मन कर रहा होगा तो वो बोला – “सर! एकसाथ इतना खाने की आदत नहीं है ना बेचारी को, इसलिए महीने भर का नाश्ता खा के होश फाख्ता हो गए इसके। सोसाइटी में इतने अपार्टमेंट के चार-पांच सौ घरो से जो खाने की सुनामी आई है उसमे यहाँ के गिने-चुने कुपोषित गाय-कुत्ते बह गए हैं…कुछ तो ख़ुशी के मारे पागल ही हो गए हैं। कोई आधे घंटे से बजरी में लोट रहा है, कोई गरम तारकोल के कनस्टर में पीठ रगड़ रहा है, कोई ई-रिक्शा के पीछे की निन्नी सी जगह में बैठ के स्टेट बॉर्डर पार ही चला गया, किसी की मम्मी नाले के पाइप में फंस गयी हैं…ये सब जानवर ओवरवेल्म हो गए हैं और पक्षी लोग तो आते ही नहीं सर अब इस एरिया में। आप ऐसा करो, 26 किलोमीटर दूर राज्य का बॉर्डर पार कर के कुछ गांव शुरू होते हैं वहां मिल जायेंगे आपको सब जीव-जंतु…और जब जा ही रहे हो तो उस कुत्ते को ले आना जो ई-रिक्शा में बैठा चला गया, रात में जगा रहता है कम से कम…”

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*आप सभी से निवेदन है कि अपनी क्षमता अनुसार आस-पास के जीवो का ध्यान रखें, किसी विशेष अवसर, उपलक्ष्य की प्रतीक्षा में न रहें।*

समाप्त!

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Read लालच का अंकुर (कहानी)

#मोहित_शर्मा_ज़हन #mohitness #mohit_trendster

अंतर (लघु कहानी) #ज़हन

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पुलिस निरीक्षक शलभ कुमार को टी.ए. अलाउंस भरते देखे उनके साथी ने उन्हें टोका।

“क्या यार जब देखो कोई ना कोई फॉर्म भरते रहते हो या साहब के दफ्तर भागते रहते हो। साल भर के काम की रेटिंग में 2-4 नंबर ज़्यादा पा जाओगे तो कहाँ तीर मार लोगे। तुम भी यहीं उतनी दौड़-भाग कर रहे हो और बाकी तुम्हारे समकक्ष लोग भी। थोड़ा एन्जॉय करो लाइफ! अब तक 50 बार फॉर्म भरते देखा होगा तुम्हे जिसमे से सालों बाद कोई एक-दो अलाउंस मिला होगा डेढ़-दो हज़ार का, इस से बढ़िया रिलैक्स करते। सरकारी नौकरी है, सब सेट है और क्या चाहिए?”

शलभ ने हँस कर बात टाल दी। कुछ वर्षो बाद जब शलभ का बैच सेवानिवृत्त होने वाला था तब उसके साथ के सभी अधिकारी उस से एक या दो रैंक नीचे थे, साथ ही शलभ की पेंशन उनके कई साथियों से 15-20 हज़ार रुपये प्रति माह अधिक तय होने वाली थी। 37 वर्षों की नौकरी में हर वर्ष जो 2-3 नंबर, इंसेंटिव शलभ ने बिना कोताही जुटाये थे उसका फल उसे अब मिल रहा था। उस बैच के कुछ अफसर अपनी पेंशन 3-4 हज़ार बढ़वाने की उम्मीद में  नौकरी के अंतिम महीनो में रिकॉर्ड की नेगेटिव एंट्रीज़ हटाने की भाग-दौड़ में लगे हुए थे।

समाप्त!

#mohitness #mohit_trendster

Acid Attack Painting with Artist Jyoti Singh

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Painting Theme: Acid Attack with Artist Jyoti Singh, 30×30 inch, Oil on Canvas. #concept #art #painting #brainstorming #acidattacks #canvas #oilpainting

Indian Comics Fandom Magazine (Vol. 11)

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News, photos and Updates: Diamond Comics, Tinkle, Campfire Graphic Novels, Tamil Comics, Champak, Lot Pot, Jasoos Babloo, Red Streak Publications, Raj Comics, Amar Chitra Katha, Holy Cow Entertainment, Meta Desi Comics, TBS Planet Comics, Yali Dreams Creations, Anik Planet, Kavya Comics, Premeir Artfx Studio, Green Humor, MB Comics Studio.
Special: Artist-Author Akshay Dhar Interview, Late Writer Ved Prakash Sharma (Tribute), Artist Gaman Palem, ICF Awards 2016 Champions Corner
Contributors: Vipul Dixit, Vyom Dayal, Aakash Kumar, Mohit, Avyact, Youdhveer Singh, Rishabh Kurmi, Sanjay Singh
Editor: Mohit Trendster
Freelance Talents (March 2017)
भारतीय कॉमिक्स जगत से जुडी ख़बरें, जानकारी, चित्र, लेख, फैन फिक्शन, साक्षात्कार आदि!

छूटी डोर (कहानी)

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हिन्दी, अंग्रेजी साहित्य के बहुत बड़े समीक्षक-आलोचक, अनुवादक श्री अनूप चौबे का टी.वी. साक्षात्कार चल रहा था। साक्षात्कारकर्ता अनूप के पुराने मित्र नकुल प्रसाद थे। कुछ सवालो बाद नकुल को एक बात याद आ गई और अपने साथ लाये सवालो के बीच उन्होंने एक सवाल रखा।

“आपने पहले कई बार अपना उपन्यास, कथा/काव्य संग्रह लिखने की मंशा मुझसे साझा की थी। उस बारे में कुछ बताएं?”

हालाँकि, यह इंटरव्यू लाइव नहीं था पर चौबे जी असहज हो गए। कुछ संभलने के बाद उन्होंने फिर बोलना शुरू किया।

“वर्षो तक एक के बाद एक ना जाने कितनी कहानियों, कविताओं और उपन्यासों को पास से देखा। कई बार तो किसी रचना के लेखक, कवि से अधिक उस रचना के साथ समय बिताया। दूसरो के गढ़े काल्पनिक जगत में गलतियां, कमियां निकालने का जूनून पता नहीं कब आदत में बदल गया। एक समीक्षक की तरह लिखना या अनुवाद करना अलग है पर जब भी लेखक की तरह कुछ लिखता हूँ तो मेरी यह आदत किसी मीनिया की तरह मेरा पीछा करती है। अपनी कल्पना के कुछ वाक्य पूरे करते ही मन उनपर अपना नकारात्मक फरमान सुना देता है। अपना लिखा मेरी नज़र से कभी पास हो ही नहीं पाता है जो किसी और तक पहुँच पाये। कभी-कभी तो रात में उठकर पिछले दिन लिखे पन्ने फाड़े हैं ताकि चैन से सो सकूँ।”

नकुल प्रसाद – “ओह! क्षमा चाहता हूँ! मुझे यह स्थिति पता नहीं थी। आप चिंता मत कीजिये, मैं वो सवाल और आपकी प्रतिक्रिया एडिट करवा दूंगा।”

अनूप चौबे – “कोई बात नहीं…अगर मैंने यह क्षेत्र ना चुना होता तो शायद मैं अच्छा साहित्य लिख पाता क्योकि सच कहूँ तो रचना की अपूर्णता, उसकी कमियां ही उसका साज-श्रृंगार हैं। ऐसी बातें ही रचना की एक अलग छाप बनाती हैं। आपने देखा होगा कैसे कोई अपने चेहरे की कमी बताता है और उसकी वही चीज़ जिसे वह कमी मानता है अक्सर लोगो को पसंद आती है। सबसे बड़ी रचनाकार प्रकृति जो हमे मरते दम तक अपनी कलाकृतियों से विस्मित करती है, में पूर्णता से दूर अनगिनत छूटी डोर हैं। साहित्य में सामाजिक दायरे की फ्रीक्वेंसी पर सेट दिमागी पैमाने को संतुष्ट करना असंभव है। चलिए कोई बात नहीं, यह जन्म इस रोल में ही सही…”
समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन

Read सुविधानुसार न्यूक्लीयर परिवार (कहानी)

रिया के मम्मी-पापा (डार्क कहानी)

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*कमज़ोर दिल के लोग यह कहानी न पढ़ें।*

रिया की मम्मी – “मैं और मेरे पति सामान्य जीवन व्यतीत कर रहे हैं…कम से कम बाहर से कोई मिले या देखता होगा, वह तो यही कहेगा। कुछ महीने पहले हमारी एकलौती बेटी रिया ने आत्महत्या कर ली। उसका वज़न सामान्य से अधिक था, बस इतनी सी बात थी। भला यह भी कोई बात हुई? काश एक बार मुझसे या अपने पिता से अपना जी बाँट लेती। समाज की यही तो रीत है – हर चीज़ में सामान्य होने की एक सीमा/रेंज है। जैसे शादी इतने साल से इतने साल तक हुई तो ठीक इसके बाहर तो बर्बाद, इतना शरीर सामान्य, इसके ऊपर या नीचे बर्बाद, इतनी पढाई ठीक….इसके नीचे बर्बाद! अब हम बड़े तो एकबार सुनकर फिर अपने-अपने काम में लग जाते हैं पर बेचारे बच्चे कहाँ तक समझे और कितना सहें? उनके जीवन में ध्यान बँटाने वाली ज़िम्मेदारियां नहीं होती ना!

बच्ची की कमी न महसूस हो इसलिए रिया के पापा उसके साथ की तीन और बच्चियाँ उठा लाये। आखिर बाप का दिल है, मैं भी क्या समझाती इन्हें? ये 3 वही लड़कियां हैं जो रिया के मोटापे का मज़ाक बनाती रहती थी। इतना कोमल मन था मेरी बच्ची का, किसी का दर्द नहीं देख पाती थी पर जाने कितने महीने अपना दर्द अनदेखा कर छुपाती रही। उसे लगा होगा कि कभी न कभी ये लड़कियां उसके व्यक्तित्व को सराहेंगी, पेंटिंग, डांस, गायन जैसे उसके हुनर शायद उसको सबकी खासकर इन तीनो की “सामान्य रेंज” में ले आएं। ओह! मैं ज़रा खाना देख आऊं, अंदर तीनो बच्ची लोग भूखी होंगी बाकी आगे रिया के पापा बताएंगे।”

रिया के पापा – “आप कहोगे क्या दरिंदे हो गए हैं हम पति-पत्नी? इन लड़कियों को क्यों प्रताड़ित कर रहे हैं? अरे किसी चीज़ की कमी नहीं है इन्हें यहाँ। अच्छे कपडे, किताबें, टी.वी. और खाना! मोटापा कम करने के लिए लाइपोसक्शन नाम का एक ऑपरेशन होता है। इस ऑपरेशन में व्यक्ति के शरीर से अतिरिक्त वसा (फैट) निकाला जाता है। रिया 18 साल की होती और एक बार कहती तो तुरंत उसका यह ऑपरेशन करवा देता पर अभी उसमे 2 साल थे। फिर भी मैंने शहर के 2 ऐसे अस्पतालों के चपरासियों से सेटिंग कर ली है। उन दोनों से मुझे हर हफ्ते शहर में कुछ लोगो के लाइपोसक्शन से निकला 25-30 किलो फैट मिल जाता है। उसी को कच्चा या उसके पकवान बना कर इन्हें बड़े प्यार से खिलाते हैं हम दोनों। बताओ कोई अपने बच्चो के लिए भी करेगा इतना? लो बन गया खाना। इन्हें रिया की चौथी फ्रेंड के बारे में नहीं बताया?”

रिया की मम्मी – “अरे हाँ! तीन नहीं चार थी ये ग्रुप में। तभी हफ्ते का इतना फैट कम पड़ जाता था। वो तो अच्छा हुआ इनमे से एक स्टोर रूम से भागने की कोशिश में रिया के पापा के हाथ आ गई। फिर मैंने और इन्होंने उस लड़की को फैट के कनस्तर में डाला….फिल्मो, सीरियलों में जैसे दलदल में डूबते दिखाते हैं लोगो को वैसे धीरे-धीरे डूबी वो लड़की। ठीक ही हुआ! वो लड़की ही सबसे ज़्यादा चींचां और उल्टियाँ करती थी बाकी तीन तो शांत हैं बेचारी। ये सब छोडो आप अपनी सुनाओ? इस बार खाना खाये बिना नहीं जाने देंगे आपको…”

समाप्त!

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