Nominee – StoryMirror Author of the Year Award 2019 #zahan

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I am really glad that I have been nominated for the biggest award & recognition in the digital literature & publishing field – StoryMirror Author of the Year Award – 2019 by StoryMirror (https://storymirror.com), which is India’s largest multilingual platform for readers & writers. Now I need your support to win the title. Please visit this link: https://awards.storymirror.com/author-of-the-year/bengali/author/6cbipr55 and click on the vote button. You will have to log in to StoryMirror to vote for me. Please Vote and help me to win this award!

Sahitya Chetna Samman 2019 #mohit_trendster

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आज साहित्य विचार संस्था, जोधपुर से साहित्य चेतना सम्मान 2019 का प्रमाणपत्र मिला। आप सभी को धन्यवाद!

कौवों का हमला Rap #ज़हन

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Wrote a promo rap for Ajay Kumar’s book

कांव कांव – धाँय धाँय,
इंसानों की हाय हाय!

सुन ले पक्की वार्निंग
नहीं है ये कोई जुमला
तेरी ऐसी तैसी करने प्रेज़ेंटिंग…
कौवों का हमला!
आजा तेरी एसयूवी का घमंड तोड़ दूँ,
बोनट पर अपनी बीट निचोड़ दूँ
कांव कांव – धाँय धाँय,
इंसानों की हाय हाय!

अपुन की तेज़ नज़र,
रखे हर बात की खबर,
साइज अपना छोटा…
पर दिल से गब्बर!
कैच मी इफ यू कैन,
उड़ा मैं फर्र-फर्र…
कांव कांव – धाँय धाँय,
इंसानों की हाय हाय!

कहे काग को चालू,
ये साला होमो सेपियन मक्खीचूस,
खुद गधे की शक्ल वाला,
मुझे कहे मनहूस!
कांव कांव – धाँय धाँय,
इंसानों की हाय हाय!

चिल करते ब्रोज़ को हुर्र हुररर कहके उड़ाये,
पितृ पक्ष में पूड़ी लेकर पीछे भागा आये।
क्रो गैंग से पंगा मत ले…
अपनी चोंच से जाने कितने टकले सुजाये।
कांव कांव – धाँय धाँय,
इंसानों की हाय हाय!

तोड़ेगा तेरी ईगो का गमला,
फ्रेश रापचिक कौवों का हमला।
तो सारे बोलो…
कांव कांव – धाँय धाँय,
इंसानों की हाय हाय!

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– मोहित शर्मा ज़हन

Khayaal…Ehsaas (Ghazal) #Zahan

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एक ही मेरा जिगरी यार,
तेरी चाल धीमी करने वाला बाज़ार…
मुखबिर एक और चोर,
तेरी गली का तीखा मोड़।
करवाये जो होश फ़ाख्ता,
तेरे दर का हसीं रास्ता…
कुचले रोज़ निगाहों के खत,
बैरी तेरे घर की चौखट।

दिखता नहीं जिसे मेरा प्यार,
पीठ किये खड़ी तेरी दीवार…
कभी दीदार कराती पर अक्सर देती झिड़की,
तेरे कमरे की ख़फा सी खिड़की।
शख्सियत को स्याह में समेटती हरजाई
मद्धम कमज़र्फ तेरी परछाई…
कुछ पल अक्स कैद कर कहता के तू जाए ना…
दूर टंगा आईना।
जाने किसे बचाने तुगलक बने तुर्क,
तेरे मोहल्ले के बड़े-बुज़ुर्ग।

…और इन सबके धंधे में देती दख़्ल,
काटे धड़कन की फसल,
मेरी हीर की शक्ल…
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March 2018 Updates

23 March Shaheed Diwas Poetry

*)  – बसंती चोला मैला ना हो…

…तो विदेशी लिबास में ढक लिया,

पीढ़ियों को आज़ाद करने…

अदने से पिंजरे का कश लिया!

गैरों की बिसात पर उसकी बात चल गयी….

कागज़ी धमाके से रानी की चमड़ी जल गयी

गर्म दल की आंच पर मुल्क का ठंडा खून उबालने वाला,

साढ़े तेईस बरस का भगत…गोरी हुक़ूमत पर साढ़े साती लाने वाला….

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*) – आज़ादी की लहर में दोनों रुख के बंदे बहे,

जहाँ नर्म दल के सिपहसेलार बने खुदा…

और प्यादे तक बादशाह हो गये,

वही गर्म दल के शहीद अपने ही देश में…

क्रांतिकारियों से गुण्डे हो गये।

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को उनकी पुण्यतिथि पर नमन!

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Latest release – Kathputli: A Struggle for Control (Short Movie by Freelance Talents)

Available: Vimeo, 4Shared, Dailymotion, Tumblr etc.

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FTC Season 4 in association with Nazariya Now

सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा? (वीभत्स रस Poetry)

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अपने रचे पागलपन की दौड़ में परेशान समाज की कुत्सित मानसिकता “अच्छा-अच्छा मेरा, छी-छी बाकी दुनिया का” पर चोट करती ‘वीभत्स रस’ में लिखी नज़्म-काव्य। यह नज़्म आगामी कॉमिक ‘समाज लेवक’ में शामिल की है। –

सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?
सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?
बिजबिजाते कीड़ों को सहेगा,
कभी अपनी बुलंद तारीख़ों पर हँसेगा,
कभी खुद को खा रही ज़मीं पर ताने कसेगा।

जब सब मुझे छोड़ गये,
साथ सिर्फ कीड़े रह गये,
सड़ती शख्सियत को पचाते,
मेरी मौत में अपनी ज़िन्दगी घोल गये।

आज जिनसे मुँह चुराते हो,
कल वो तुम्हारा मुखौटा खायेंगे,
इस अकड़ का क्या मोल रहेगा?
सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?

लोथड़ों से बात करना सीख लो,
बंद कमरों में दिल की तसल्ली तक चीख लो!
सड़ता हुआ मांस सुन लेगा,
अगली दफ़ा तुम्हे चुन लेगा।

जिसे दिखाने का वायदा किया था हमसे,
वो गाँव तो हमारी लाश पर भी ना बसेगा।
खाल की परत फाड़ जब विषधर डसेगा,
सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?

जिसपर फिसले वो किसी का रक्त,
नाली में पैदा ही क्यों होते हैं ये कम्बख्त?
बाकी तो सब राम नाम सत!
उसपर मत रो…
सुर्ख़ से काला पड़ गया जो,
ये जहां तो ऐसा ही रहेगा,
सड़ता हुआ मांस कुछ नहीं कहेगा!
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#ज़हन

Khauff ki khaal (Nazm Poetry) – Pagli Prakriti: Vacuumed Sanctity Comic

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Art and Poetry: Pagli Prakriti – Vacuumed Sanctity Comic

खौफ की खाल उतारनी रह गयी,
…और नदी अपनों को बहा कर ले गयी!
बहानों के फसाने चल गये,
ज़मानों के ज़माने ढल गये…
रुक गये कुछ जड़ों के वास्ते,
बाकी शहर कमाने चल दिये।

खौफ की खाल उतारनी रह गयी,
गुड़िया फ़िर भूखे पेट सो गयी…
समझाना कहाँ था मुश्किल,
क्यों समीर को मान बैठे साहिल?
तिनकों को बिखरने दिया,
साये को बिछड़ने दिया?

खौफ की खाल उतारनी रह गयी,
रुदाली अपनी बोली कह गयी…
रौनक कहाँ खो गयी?
तानो को सह लिया,
बानो को बुन लिया।
कमरे के कोने में खुस-पुस शिकवों को गिन लिया।

खौफ की खाल उतार दो ना…
तानाशाहों के खेल बिगड़ दो ना!
शायद उतरी खाल देख दुनिया रंग बदले,
एक दुकान में गिरवी रखा हमारा सावन…
शायद उस दुकान का निज़ाम बदले!
घिसटती ज़िन्दगी में जो ख्वाहिशें आधी रह गयीं,
कुछ पल जीकर उन्हें सुधार दो ना!
खौफ की खाल उतार दो ना…
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खाना ठंडा हो रहा है…(काव्य) #ज़हन

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साँसों का धुआं,
कोहरा घना,
अनजान फितरत में समां सना,
फिर भी मुस्काता सपना बुना,
हक़ीक़त में घुलता एक और अरमान खो रहा है…
…और खाना ठंडा हो रहा है।

तेरी बेफिक्री पर बेचैन करवटें मेरी,
बिस्तर की सलवटों में खुशबू तेरी,
डायन सी घूरे हर पल की देरी,
इंतज़ार में कबसे मुन्ना रो रहा है…
…और खाना ठंडा हो रहा है।

काश की आह नहीं उठेगी अक्सर,
आईने में राही को दिख जाए रहबर,
कुछ आदतें बदल जाएं तो बेहतर,
दिल से लगी तस्वीरों पर वक़्त का असर हो रहा है…
…और खाना ठंडा हो रहा है।

बालों में हाथ फिरवाने का फिरदौस,
झूठे ही रूठने का मेरा दोष,
ख्वाबों को बुनने में वक़्त लग गया,
उन सपनो के पकने का मौसम हो चला है…
…और खाना ठंडा हो रहा है।

तमाशा ना बनने पाए तो सहते रहोगे क्या?
नींद में शिकायतें कहते रहोगे क्या?
आज किसी ‘ज़रूरी’ बात को टाल जाना,
घर जैसे बहाने बाहर बना आना,
आँखों को बताने तो आओ कि बाकी जहां सो रहा है…
…और खाना ठंडा हो रहा है।

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Thumbnail Artwork – Arpit Shankar‎
#मोहित_शर्मा_ज़हन #mohitness #mohit_trendster
*Second poem in Matlabi Mela (Kavya Comic Series)

पैमाने के दायरों में रहना… (नज़्म) #ज़हन

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पैमाने के दायरों में रहना,
छलक जाओ तो फिर ना कहना…
जो जहां लकीरों की कद्र में पड़ा हो
उस से पंखों के ऊपर ना उलझना…
किन्ही मर्ज़ियों में बिना बहस झुक जाना,
तुम्हारी तक़दीर में है सिमटना…

पैमाने के दायरों में रहना,
छलक जाओ तो फिर ना कहना…
क्या करोगे इंक़िलाब लाकर?
आख़िर तो गिद्धों के बीच ही रहना…
नहीं मिलेगी आज़ाद ज़मीन,
तुम दरारों के बीच से बह लेना…

पैमाने के दायरों में रहना,
छलक जाओ तो फिर ना कहना…
जिस से हिसाब करने का है इरादा,
गिरवी रखा है उसपर माँ का गहना…
औरों की तरह तुम्हे आदत पड़ जाएगी,
इतना भी मुश्किल नहीं है चुपचाप सहना…

पैमाने के दायरों में रहना,
छलक जाओ तो फिर ना कहना…
साँसों की धुंध का लालच सबको,
पाप है इस दौर में हक़ के लिए लड़ना…
अपनी शर्तों पर कहीं लहलहा ज़रूर लोगे,
फ़िर किसी गोदाम में सड़ना…

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– मोहित शर्मा ज़हन
#mohitness #mohit_trendster #freelance_talents #trendyaba

Read बहाव के विरुद्ध (कहानी) #ज़हन

तेरे प्यार के बही-खाते…(नज़्म) #ज़हन

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जुबां का वायदा किया तूने
कच्चा हिसाब मान लिया मैंने,
कहाँ है बातों से जादू टोना करने वाले?
तेरी कमली का मज़ाक उड़ा रहे दुनियावाले…
रोज़ लानत देकर जाते,
तेरे प्यार के बही-खाते…

तेरी राख के बदले समंदर से सीपी मोल ली,
सुकून की एक नींद को अपनी 3 यादें तोल दी।
इस से अच्छा तो बेवफा हो जाते,
कहीं ज़िंदा होने के मिल जाते दिलासे।
जाने पहचाने रस्ते पर लुक्का-छिपी खिलाते,
तेरे प्यार के बही-खाते…

फिर तेरे हाथ पकड़ आँगन से आसमान तक लकीरें मिला लूँ,
दिल पर चेहरा लगा कर नम नज़रों से तेरा सीना सींच दूँ…
पीठ पीछे हँसने वालो के मुँह पर मंगल गा लूँ,
इस दफा फ़रिश्ते लेने आयें…तो पीछे से टोक लगा दूँ।
काश अगले जन्म तक बढ़ पाते,
तेरे प्यार के बही-खाते…

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Last Nazm in Kavya Comic Jug Jug Maro

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