रूहानी नाटक (कहानी) #ज़हन

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मेरा नाम कृष्णानंद है और लोग मुझे किशन कहकर बुलाते हैं। 9 साल की उम्र में अपने गांव से बिना सोचे लखनऊ आया, वैसे सोचकर भी क्या कर लेता…नौ साल का दिमाग क्या सलाह देता? सीखने में आम बच्चो जैसा नहीं था तो मुझे मंदबुद्धि कहा जाता था, सोने पे सुहागा यह कि मैं हकलाता था। शहर तो आ गया पर यहाँ रहने लायक कोई काम भी तो आना चाहिए था। एक थिएटर उस्ताद ने अपनी शरण में लिया और मैं उनके रंगमंच में साफ़-सफाई, कपड़ो-मंच का रखरखाव जैसे काम करने लगा। दूर से नाटक के कलाकारों को देखते हुए कई बार उनकी टोली में मिल जाने मन किया पर फिर अपनी कमियों को देखकर खुद को रोक लिया। अक्सर सबके जाने के बाद खाली थिएटर में पूरे मन के साथ घंटो अपने बनाये ‘शो’ करता। ऐसा करते हुए कितने साल बीत गए। आज जब किसी तरह हिम्मत कर के उस्ताद को यह बात बतानी चाही तो पूरी टोली मुझपर हँसने लगी। मेरे बात करने के लहज़े का ना जाने कितना मज़ाक उड़ाया गया। यकीन नहीं हुआ ये सब वही लोग हैं जो सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ने की बातें करते हैं, जागरूकता फैलाते हैं। अब और कितना संघर्ष करूँ? जीवन भर घिसट-घिसट के क्यों बिताऊं? क्या फायदा इन सबके बीच रहकर इस अधूरे जीवन को बिताने का? इस से बढ़िया तो मैं पैदा ही ना हुआ होता! अभी देर नहीं हुई है, मैं खुदखुशी कर लूँगा।

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“किस ख़ुशी में कर लोगे खुदख़ुशी? हम करने ही नहीं देंगे!”

(**सामने के नज़ारे से किशन की आवाज़ गुम हो गई इसलिए नैरेटर को टेकओवर करना पड़ रहा है।**)

छत के बाहर की ओर टांग लटकाये बैठे किशन को झटका लगा और वह अंदर आकर गिरा। उसके सामने अलग-अलग मानव आकृतियों वाले भूत खड़े थे। उनकी मुखिया एक सुन्दर परी सी आत्मा बोल रही थी। अचानक जैसे उसके मोनोलॉग को सुन रही काल्पनिक प्रकृति जागृत हो गयी। किशन डर से जड़ हो गया।

“डरो मत किशन! हम सब तुम्हे कुछ बातें बताने आएं हैं। कभी सोचा है रोज़ तुम आराम से उठते थे, हर दूसरे दिन तुम्हे लगता था कि आज तो तुम्हे पक्का देर हो जायेगी पर कभी ऐसा हुआ नहीं। तुम्हारे कमरे का किराया, बिजली-पानी का खर्च तुम्हारी मासिक आय से काट लें तो 50 रुपये बचते हैं…पर जब भी तुम्हारा मन कोई मिठाई, आइस क्रीम खाने को होता, किसी गरीब की मदद करने को होता तो तुम्हारी जेब से ज़रुरत भर के पैसे निकल आते। थिएटर टोली में सब कहते हैं कि किशन कभी बीमार नहीं पड़ता, सही कहते हैं। उन्हें यह नहीं पता कि तुम्हे कभी चोट भी नहीं लगती। तुम्हारे घर पर हर महीने माँ-बाप के खर्चे लायक मनी आर्डर जाता है….अरे वो तो छोडो, एक मित्र से तुम्हे ना कहने मे दिक्कत हुई और तुमने उस से जीवन बीमा पॉलिसी खरीद ली, फिर भूल गए। उस पॉलिसी का प्रीमियम ढाई साल से हर 3 महीने बिना नागा जमा हो रहा है। कभी सोचा है यह सब कैसे हो रहा है? कौन और क्यों कर रहा है?

कैसे सोचोगे? तुम बहुत भोले हो! तुम्हारी कला और मन में मिलावट नहीं है। किसी को दिखाने के लिए लोग जो आडम्बर ओढ़ते हैं उससे तुम कोसो दूर हो। हम सब हर रात तुम्हारे नाटक देखने आते हैं। अब तो बाहर के शहरों के भूत तक सिर्फ तुम्हारे लिए यहाँ आते हैं। जब तुम अपने सोचे नाटकों पर माइम करते हुए दर्जन किरदारों के स्वांग रचते हो तो तुम्हारे रचना संसार के आगे बाहर की दुनिया बहुत छोटी लगने लगती है। दिनभर जिस संकोच और शर्म के पीछे कुछ शब्द बोलने से डरते हो, रात में उतनी ही गहनता से हकलाते हुए जब संवाद बोलते हो तो फिर जन्म लेकर तुम्हारे साथ रहने का मन करता है। जिस जीवन को इतनी आसानी से छोड़ने की बात कर रहे हो उसके केवल कुछ क्षणों के लिए हम सब आत्माएं अतृप्त घूम रही हैं।”

किशन का मन हल्का हुआ कि उसकी कला के हज़ारों कद्रदान हैं। उसने फिर से शुरुआत की और कुछ समय बाद अपने रूहानी कद्रदानों की मदद से लखनऊ मे एक सरप्राइज थिएटर शो बुक किया। शो के अनोखे प्रचार से कई वहाँ पहुंचे, जिनमे किशन का उस्ताद और उसकी उत्सुक टोली भी शामिल थी। किशन की मेहनत रंग लाई और सबको अपनी प्रतिभा से चौंकाते हुए उसने एक हिट शो दिया। टोली को अपनी बड़ी भूल का एहसास हुआ और किशन के माइम, कहानी के अनुसार उन लोगो ने कुछ अलग नाटक रचे। अब वह थिएटर किशन के नाम से जाना जाता है। हाँ, आज भी अक्सर किशन रात में खाली फिर भी ‘भरे हुए’ थिएटर में अपनी नाट्य प्रस्तुति देता है।

समाप्त!

#मोहित_शर्मा_ज़हन #mohit_trendster

Indian Comics Fandom Magazine (Vol. 11)

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News, photos and Updates: Diamond Comics, Tinkle, Campfire Graphic Novels, Tamil Comics, Champak, Lot Pot, Jasoos Babloo, Red Streak Publications, Raj Comics, Amar Chitra Katha, Holy Cow Entertainment, Meta Desi Comics, TBS Planet Comics, Yali Dreams Creations, Anik Planet, Kavya Comics, Premeir Artfx Studio, Green Humor, MB Comics Studio.
Special: Artist-Author Akshay Dhar Interview, Late Writer Ved Prakash Sharma (Tribute), Artist Gaman Palem, ICF Awards 2016 Champions Corner
Contributors: Vipul Dixit, Vyom Dayal, Aakash Kumar, Mohit, Avyact, Youdhveer Singh, Rishabh Kurmi, Sanjay Singh
Editor: Mohit Trendster
Freelance Talents (March 2017)
भारतीय कॉमिक्स जगत से जुडी ख़बरें, जानकारी, चित्र, लेख, फैन फिक्शन, साक्षात्कार आदि!

छूटी डोर (कहानी)

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हिन्दी, अंग्रेजी साहित्य के बहुत बड़े समीक्षक-आलोचक, अनुवादक श्री अनूप चौबे का टी.वी. साक्षात्कार चल रहा था। साक्षात्कारकर्ता अनूप के पुराने मित्र नकुल प्रसाद थे। कुछ सवालो बाद नकुल को एक बात याद आ गई और अपने साथ लाये सवालो के बीच उन्होंने एक सवाल रखा।

“आपने पहले कई बार अपना उपन्यास, कथा/काव्य संग्रह लिखने की मंशा मुझसे साझा की थी। उस बारे में कुछ बताएं?”

हालाँकि, यह इंटरव्यू लाइव नहीं था पर चौबे जी असहज हो गए। कुछ संभलने के बाद उन्होंने फिर बोलना शुरू किया।

“वर्षो तक एक के बाद एक ना जाने कितनी कहानियों, कविताओं और उपन्यासों को पास से देखा। कई बार तो किसी रचना के लेखक, कवि से अधिक उस रचना के साथ समय बिताया। दूसरो के गढ़े काल्पनिक जगत में गलतियां, कमियां निकालने का जूनून पता नहीं कब आदत में बदल गया। एक समीक्षक की तरह लिखना या अनुवाद करना अलग है पर जब भी लेखक की तरह कुछ लिखता हूँ तो मेरी यह आदत किसी मीनिया की तरह मेरा पीछा करती है। अपनी कल्पना के कुछ वाक्य पूरे करते ही मन उनपर अपना नकारात्मक फरमान सुना देता है। अपना लिखा मेरी नज़र से कभी पास हो ही नहीं पाता है जो किसी और तक पहुँच पाये। कभी-कभी तो रात में उठकर पिछले दिन लिखे पन्ने फाड़े हैं ताकि चैन से सो सकूँ।”

नकुल प्रसाद – “ओह! क्षमा चाहता हूँ! मुझे यह स्थिति पता नहीं थी। आप चिंता मत कीजिये, मैं वो सवाल और आपकी प्रतिक्रिया एडिट करवा दूंगा।”

अनूप चौबे – “कोई बात नहीं…अगर मैंने यह क्षेत्र ना चुना होता तो शायद मैं अच्छा साहित्य लिख पाता क्योकि सच कहूँ तो रचना की अपूर्णता, उसकी कमियां ही उसका साज-श्रृंगार हैं। ऐसी बातें ही रचना की एक अलग छाप बनाती हैं। आपने देखा होगा कैसे कोई अपने चेहरे की कमी बताता है और उसकी वही चीज़ जिसे वह कमी मानता है अक्सर लोगो को पसंद आती है। सबसे बड़ी रचनाकार प्रकृति जो हमे मरते दम तक अपनी कलाकृतियों से विस्मित करती है, में पूर्णता से दूर अनगिनत छूटी डोर हैं। साहित्य में सामाजिक दायरे की फ्रीक्वेंसी पर सेट दिमागी पैमाने को संतुष्ट करना असंभव है। चलिए कोई बात नहीं, यह जन्म इस रोल में ही सही…”
समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन

Read सुविधानुसार न्यूक्लीयर परिवार (कहानी)

Jug Jug Maro # 1 – मुआवज़ा (काव्य कॉमिक)

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जुग जुग मरो सीरीज की पहली कविता और कॉमिक्स के संगम से बनी काव्य कॉमिक्स, “मुआवज़ा” शराबियों और सरकार पर कटाक्ष है, जो अपने-अपने नशे में चूर पड़े रहते हैं और जब तक उन्हें होश आता है तब कुछ किया नहीं जा सकता। अपना मन बहलाने के लिए कड़े कदम और राहत की मोक ड्रिल की जाते है और फिर सब पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं। मुश्किल सामने पड़ी चुनौतियाँ नहीं बल्कि उनसे निपटने की नियत रखने में है। समाज का एक तबका इतना व्यर्थ माना जाता है कि 10 जाएं या हज़ार मजाल है जो समाज ठिठक तक जाए।
मोहित शर्मा ज़हन की प्रतिलिपि प्रोफाइल
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नशेड़ी औरत (कविता) – मोहित शर्मा ज़हन

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कितने चेहरो में एक वो चेहरा था…

नशे में एक औरत ने कभी श्मशान का पता पूछा था…

आँखों की रौनक जाने कहाँ दे आई वो,

लड़खड़ाकर भी ठीक होने के जतन कर रही थी जो।

किस गम को शराब में गला रही वो,

आँसू लिए मुस्कुरा रही थी जो।

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अपनी शिकन देखने से डरता हूँ,

इस बेचारी को किस हक़ से समझाऊं?

झूठे रोष में उसे झिड़क दिया,

नज़रे चुराकर आगे बढ़ गया।

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आज फिर मेरा रास्ता रोके अपना रास्ता पूछ रही है….

ठीक कपड़ो को फिर ठीक कर रही है….

हिचकियां नशे की,

पगली कहीं की!

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“क्या मिलता है नशे में?”

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“उसे रोज़ बुलाती,

थक जाने तक चिल्लाती,

नशे में वो मर गया,

मेरा जी खाली कर गया।

पीकर आवाज़ लगाने पर आता है,

मन भरने तक बतियाता है,

अब आप जाओ साहब!

मेरा पराये मरद से बात करना उसे नहीं भाता है।”

Painting – “Roots”

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Namastey! These days I am sharing some ideas with talented artist friend Jyoti Singh. She wants to create dozens of watercolor, oil and acrylic paintings for exhibitions,  art lovers before the first quarter of 2017. So, I am giving her inputs, visuals on a regular basis. I am loving this brainstorming exercise. This (Watercolor-A3) is one of the paintings based on my ideas. Title – Roots
What inferences did you make from this….
Peripheral Angel Painting

इंडी आर्टिस्ट का मतलब क्या है?

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Art – Thomas Lepine
Originally posted (COP Website)

किसी रचनात्मक क्षेत्र में किये गए स्वतंत्र काम को इंडी (Indie/Indy) यानी इंडिपेंडेंट रचना कहा जाता है। इंडी काम कई प्रकार और स्तर का हो सकता है, कभी न्यूनतम या बिना किसी निवेश के बनी रचना केवल कला के बल पर अनेक लोगो तक पहुंच सकती है और धन अर्जित कर सकती है, तो कभी कलाकार का काफी पैसा लगने के बाद भी असफल हो सकती है। किसी लेबल, कंपनी या प्रकाशक के ना होने के कारण इंडी रचनाओं में कलाकार पर उसके दिमाग में उपजे विचारों को बाजार के हिसाब से बदलने का दबाव कम हो जाता है। वहीं कभी-कभी अपनी मर्ज़ी चलने का घाटा यह होता है कि जनता कलाकार के विज़न को पूरी तरह समझ नही पाती। मुझे लगता है हर लेखक, कवि या कलाकार को इंडी चरण से गुज़ारना ही चाहिए, सीधे किसी बड़े लेबल से चिपकना भी अच्छा नहीं। अपनी कला के विकास के लिए तो स्वत्रंत रहकर अलग-अलग शैलियों, स्थितियों और अन्य कलाकारों के साथ प्रयोग करना बेहद आवश्यक है। ऐसा करने से व्यक्ति को पता चलता है कि उसे अपना समय किन बातों में देना चाहिए और किन बातों में उसकी मेहनत अधिक लगती है पर परिणाम कम आता है। जैसे लेखन में ही दर्जनों शैलियाँ हैं, कहने को तो लेखक सबमे लिख ले पर किनमें उसे सहजता है और किन शैलियों के संगम में वह कमाल करता है ये बातें धीरे-धीरे प्रयोग करते रहने से ही समझ आती है। कई मामलों में कम बजट वाली छोटी कंपनियों के लेबल के साथ प्रकाशित हुए काम को कम मुनाफे और पहुँच की वजह से इंडी श्रेणी में रखा जाता है।

अब भाग्य के फेर से कुछ लोग इंडी चरण में कुछ समय के लिए नाम को आते हैं और सीधा बड़ा टिकेट पाते हैं। जबकि कई इक्का-दुक्का मौको को छोड़ कर जीवनभर इंडी रह जाते हैं। कला का स्तर और कीमत सामने खड़े व्यक्ति के नज़रिये पर निर्भर करता है, फिर भी अगर 100 में से 70 से अधिक लोग किसी चीज़ पर एक राय रखते हैं तो उसको एक मापदंड माना जा सकता है। मापदंड ये कि यह कलाकृतियां, रचनाएं क्या पैसा कमा पाएंगी या नहीं। यह सवाल कई कलाकारों को दुख देता है लेकिन इसका सामना सबको करना पड़ता है बशर्ते आपकी पैतृक संपत्ति भयंकर हो या आप मनमौजी कलाकार हो, जो एक के बाद एक रचना निर्माण में मगन रहता है। पैसा आये तो अच्छा, पैसा ना आये तो खाना तो मिल ही रहा है! मनमौजी कलाकारों को भगवान् तेज़ स्मृति देते हैं जो सारी की सारी वो अपने काम में लगा देते हैं। उन्हें आस-पास की दुनिया में हुए पिछले क्षण चाहे याद ना हों पर 11 वर्ष पहले अगर उन्होंने कोई आईडिया कहीं इस्तेमाल किया तो उसमे क्या दिमागी दांव-पेंच हुए और क्या परिणाम आया सब याद रहेगा। अक्सर पैसों और मार्गदर्शन के अभाव में कई आर्टिस्ट संघर्ष के शुरुआती वर्षों में ही कोई और राह चुन लेते हैं, फिर कुछ ऐसे हैं जो कला से संन्यास तो नहीं होते पर सेमी-रिटायर होकर कभी-कभार कुछ काम दिखा देते हैं। ये कलाकार अपने जैसे अन्य कलाकारों, लेखको को पसंद करते हैं पर अपने क्षेत्र और हरदम मस्तिष्क के रचनात्मक जाल में उलझे होने के कारण ढंग से प्रोत्साहित नहीं कर पाते हैं। स्वयं पर निर्भर होने के कारण सफलता मिलने में अधिक समय लगता है। जो लोग पैसे को प्राथमिकताओं में नही रखते उनके लिए रास्ता मुश्किल है। धन से आप अपनी रचनाओं की पहुंच परिवर्धित कर सकते हैं, पैसे के साथ आप सिर्फ अपनी कला पर ध्यान लगा सकते हैं, नही तो एक बार का दाल-पेट्रोल का भाव नापने में आपके 4 आईडिया सुसाइड कर लेंगे। अपने कलात्मक सफर के बीच-बीच में एक नज़र आर्थिक पहलुओं पर रखना फायदे का सौदा है।

आप सभी से निवेदन है कि अपनी रूचि के विषयों में सक्रीय इंडी लेखको, कलाकारों के बारे में अधिक से अधिक जानकारी जुटाएं, उस जानकारी के आधार पर उनकी रचना, किताबें, कलाकृतियां खरीदकर, खरीदने में सक्षम नही तो अन्य लोगो को बताकर इन कलाकारों के विकास में अपना सहयोग दें।

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कॉमिक्स फैन फिक्शन लेखकों के लिए कुछ सुझाव – मोहित शर्मा ज़हन

New Comic: 3 Run ka Sauda (Mohit Trendster, Amit Albert)

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Comic 3 Run ka Sauda now available on Culture Popcorn, Dailyhunt, Google Play-Books, Readhwere, Comics Our Passion, Ebooks Now, Smashwords, Author Stream, Pothi and many other ebook websites.

 CulPop intro – “3 रन का सौदा – भारतीय क्रिकेट में राजनीति और पैसे के खेल से बर्बाद हुए अनेक कैरियर्स की दास्ताँ। सुनहरी दुनिया की रौनक के पीछे के मटमैले धब्बो को दर्शाती अमित अल्बर्ट की कला और मोहित शर्मा की लेखनी से सुसज्जित एक यादगार कॉमिक।”
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Artist: Amit Albert, Writer-Editor: Mohit Sharma

Colorist: Harendra Saini, Letterer: Youdhveer Singh

भारतीय कॉमिक्स फैन के प्रकार (भाग #1)

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किसी व्यक्ति, उत्पाद या उद्योग के प्रशंसक कई प्रकार के होते हैं और अनेको लोगो की रोज़ी-रोटी फैन्स पर निर्भर होती है। हर जगह की तरह फैन के पॉजिटिव/नेगेटिव पहलु होते हैं। आज हम भारतीय कॉमिक्स के तरह-तरह के प्रशंसकों के बारे में बात करेंगे। संभव है कि फैन्स खुद को एक से अधिक श्रेणी में पाएं, तो शुरू करते हैं।

Original Post (Culturepopcorn Website)

बरसाती फैन: ऐसे फैन हाल की किसी घटना, फिल्म, टीवी सीरीज से प्रेरित होकर कॉमिक्स कम्युनिटी में जोश के साथ आते हैं। बड़े उत्साह के साथ “तिरंगा कैप्टन अमेरिका की कॉपी है”, “डायमंड कॉमिक्स में डीसी वाली बात नहीं”, जैसे स्टेटमेंट देते हैं। फिर अचरच में पड़ते हैं कि रेस्पॉन्स क्यों नहीं मिल रहा। यहाँ जमे Indian Comics के पुराने फैन्स इस अचरच में होते हैं कि 2 दशक पहले याहू चैट, रैडिफ मेल से चले आ रहे सवाल कुकुरमुत्ता प्रशंषको को नए कैसे लग सकते हैं? खैर अक्सर कम्युनिटी, ग्रुप्स के अन्य सदस्यों से बॉन्डिंग न होने के कारण ऐसे मित्र 1 हफ्ते से लेकर 6 महीनो के अंदर हमेशा के लिए संन्यास ले लेते हैं। इस बीच इनके सोशल मीडिया पर कुछ कॉमिक्स प्रेमी मित्रों का जुड़ना इनके लिए बोनस है।

आई, मी और मैं फैन: ओहो भाई साहब! ये लोग किसी के फैन हों ना हों अपने सबसे बड़े फैन होते है। इनके शरीर में आत्ममुग्धता का हॉर्मोन अलग से सीक्रीट होता है। कम्युनिटी, ग्रुप या असल जीवन में ये लोग बस अपने बारे में बातें और अपना प्रमोशन करने में लगे रहते हैं। देखो मेरा गोपीनाथ मुंडे, भैंस के लुंडे हार्डकवर कलेक्शन, देखो मैं उल्टा आइस क्रीम कोन खा रहा, देखो मेरा दादी माँ के नुस्खे वाला पेज (जिसका कॉमिक से कोई सरोकार नहीं पर ढाई सौ रुपये देकर हज़ार लाइक करवा लिए हैं तुम्हे जलाने को), देखो मुझे बैंगनी कुतिया ने काट लिया, हम किन्नौर के शहज़ादे अभी फॉलो करो। कॉमिक्स से जुडी कोई अपडेट इनसे ना के बराबर गलती से निकलती है या तब निकलती है जब इन्हें अपना कुछ प्रमोट करना हो।

वेटरन फैन: ये फैन बरसाती फैन्स के विलोम होते हैं। व्हाट्सएप्प, फेसबुक, ट्विटर फलाना हर जगह अगर कॉमिक से जुड़ा कोई समुदाय बनता है तो इन्हें बाय डिफ़ॉल्ट उसमे शामिल कर लिया जाता है। हालांकि, वर्षों से सक्रीय रहने की वजह से इनमें पहले की तरह भयंकर जज़्बा तो नहीं रहता पर फिर भी इनकी एक्टिविटी दिख जाती है। कुछ प्रशंसक कॉमिक्स कम्युनिटी को बढ़ाने और अन्य जुडी बातों में इतना योगदान दे डालते हैं कि एक समय बाद इन्हें किसी क्रिएटिव जैसी इज्जत मिलने लगती है। ये जब किसी कॉमिक इवेंट में जाते है तो कई लोग इन्हें आसानी से पहचान लेते हैं। समय के साथ कई वेटरन सन्यासी हो जाते हैं पर फिर भी इनके काम की वॉल्यूम इतनी होती है कि इनका नाम गाहे-बगाहे आता ही रहता है।

नकली वेटरन फैन: वैसे इनके खाते में बड़ा योगदान या कोई नोटेबल काम नहीं होता फिर भी इनका बहुत नाम होता है। आम जनता इन्हें वेटरन सा ही सम्मान देती है। ये फैन्स कभी बरसाती हुआ करते थे जिन्होंने संन्यास तो नहीं लिया पर अब 4 महीनो में एक बार कॉमिक्स पर डेढ़ पैराग्राफ वाला कमेंट या अपडेट मार कर समझ लेते हैं कि इनका धर्म निभ गया। इस Recurring डेढ़ पैराग्राफ और कभी-कभार के लाइक से धीरे-धीरे कम्युनिटी को इनका नाम याद हो जाता है और ये बड़े कॉन्फिडेंस से वेटरन श्रेणी की सीट झपट लेते हैं। कुछ ग्रुप के तो ये गुडविल एम्बेसडर तक बन जाते हैं फ्री-फण्ड में।

येड़ा बनके पेड़ा खाने वाले फैन: कुछ लोग मृदुभाषी, “भोले-भाले मगर गज़ब के चालाक फाइटर दोस्त” होते हैं। उदाहरण के तौर पर बड़ी कम्युनिटी के कई सदस्यों से छोटे-छोटे फेवर लेते हुए अपना बड़ा करना…कलेक्शन! ताकि किसी पर बोझ भी ना पड़े और हमारा छप्पर भी फट जाए। इतना ही नहीं अपनी बातों से कलाकारों, प्रकाशकों पर डालडा की इतनी परत चुपड़ देते हैं कि समय-समय पर इन्हें कुछ ख़ास गिफ्ट्स, प्राइज आदि स्पेशल ट्रीटमेंट मिलते रहते हैं। समय बीतने के साथ ये लोग अपने किरदार में टाइपकास्ट और कॉमिक कम्युनिटी में बदनाम हो जाते हैं इसलिए नए शिकार पकड़ते हैं।

कॉमिक प्रशंसकों की कुछ और श्रेणीयां अगले भाग में….

– मोहित शर्मा ज़हन

जीवन दण्ड (कहानी) – Mohit Trendster

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ढेरी नामक तटीय क्षेत्र के जंगल में मानव सभ्यता से दूर टोमस जंगली प्रजाति रहती थी। अब तक दुनिया में ऐसी गिनी-चुनी प्रजातियां रह गयीं थी जिनका मानव सभ्यता से कोई संपर्क नहीं हुआ हो। किसी भी संपर्क की कोशिश पर टोमस जंगली बेहद आक्रामक हो जाते और इनकी सुरक्षा के लिए सरकार या सेना को पीछे हटना पड़ता। समय के साथ प्रगति करते देश में विदेशी निवेशकों और उद्योगपतियों का प्रभाव बढ़ने लगा। कुछ वर्षों बाद एक प्रभावशाली उद्योगपति की नज़र उस जंगल और तटीय क्षेत्र पर पड़ी। वहाँ मिलने वाले कुछ खनिजों का उत्खनन उसकी संपत्ति कई गुना बढ़ा सकता था पर उसके रास्ते में थी टोमस प्रजाति। समय के साथ सरकार का रुख बदला और उद्योगपति ने छद्म रूप से टोमस जंगलियों को खत्म करवाना शुरू किया। साम-दाम-दण्ड-भेद के बल पर 1-2 वर्षों में टोमस प्रजाति के सौइयों लोगो को मारा गया और बाकी बचे जंगलियों ने अपनी सुरक्षा के लिए आस-पास के क्षेत्रों में प्रवास कर लिया।

अपनी सफलता पर इतराता वह कॉर्पोरेट माफिया उस क्षेत्र में बहुत सा निवेश ले आया और जंगल के बड़े हिस्से की कटाई के साथ खनन कार्य शुरू किया। गाहे-बगाहे उसे, उसकी टीम या मज़दूरों को वो जंगली दिख जाते तो जंगली घूरते हुए कुछ मंत्र पढ़ देते। ये लोग ऐसे जंगलियों को हँसी में टाल जाते। कुछ महीनों बाद 8 रिक्टर स्केल का भूकंप और सुनामी आई जिस से खनन के लिए हुआ सारा इंतेज़ाम तहस-नहस हो गया और उत्खनन कार्य मे लगे कई लोग मारे गए। बड़े भौगोलिक परिवर्तन में उस तटीय क्षेत्र और जंगल का एक बड़ा हिस्सा जलमग्न हो गया और साथ ही उस उद्योगपति का सारा निवेश डूब कर उसे कंगाल बना गया। कर्जदारों से बचने के लिए उसने आत्महत्या करने की ठान ली पर अपने हाथों से अपनी जान लेने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। अपराधबोध-ग्लानि से भरे उस व्यक्ति ने प्रजाति के प्रमुख के सामने समर्पण कर दिया कि वो तो उसे मार ही देगा। प्रमुख ने उसे ज़िंदा छोड़ दिया और अब वह कॉर्पोरेट किंग अपने अपराधों के बोझ ढोता जंगलों में भटकता है…शायद मरने के बाद भी भटकेगा।

समाप्त!

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