Shehar ke Ped se Udaas Lagte ho… (Nazm)

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दबी जुबां में सही अपनी बात कहो,
सहते तो सब हैं…
…इसमें क्या नई बात भला!
जो दिन निकला है…हमेशा है ढला!
बड़ा बोझ सीने के पास रखते हो,
शहर के पेड़ से उदास लगते हो…

पलों को उड़ने दो उन्हें न रखना तोलकर,
लौट आयें जो परिंदों को यूँ ही रखना खोलकर।
पीले पन्नो की किताब कब तक रहेगी साथ भला,
नाकामियों का कश ले खुद का पुतला जला।
किसी पुराने चेहरे का नया सा नाम लगते हो,
शहर के पेड़ से उदास लगते हो…

साफ़ रखना है दामन और दुनियादारी भी चाहिए?
एक कोना पकड़िए तो दूजा गंवाइए…
खुशबू के पीछे भागना शौक नहीं,
इस उम्मीद में….
वो भीड़ में मिल जाए कहीं।
गुम चोट बने घूमों सराय में…
नींद में सच ही तो बकते हो,
शहर के पेड़ से उदास लगते हो…

फिर एक शाम ढ़ली,
नसीहतों की उम्र नहीं,
गली का मोड़ वही…
बंदिशों पर खुद जब बंदिश लगी,
ऐसे मौकों के लिए ही नक़ाब रखते हो?
शहर के पेड़ से उदास लगते हो…

बेदाग़ चेहरे पर मरती दुनिया क्या बात भला!
जिस्म के ज़ख्मों का इल्म उन्हें होने न दिया।
अब एक एहसान खुद पर कर दो,
चेहरा नोच कर जिस्म के निशान भर दो।
खुद से क्या खूब लड़ा करते हो,
शहर के पेड़ से उदास लगते हो…
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#ज़हन

Ullas ki Aawaz (Hindi Story) #Zahan

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जीव विज्ञानी डॉक्टर कोटल और उनके नेतृत्व में कुछ अनुसंधानकर्ताओं का दल प्रशांत महासागर स्थित एक दुर्गम द्वीपसमूह पर कई महीनों से टिका हुआ था। उनका उद्देश्य वहाँ रहने वाले कबीलों में बेहतर जीवन के लिए जागरूकता फैलाना था। स्थानीय धर्म सूमा के रीती-रिवाज़ों में हज़ारों कबीलेवासी अपनी सेहत और जान-माल से खिलवाड़ करते रहते थे। इतने कठिन और अजीब नियमों वाले सूमा धर्म में जागरूकता या बदलाव के लिए कोई स्थान नहीं था। अलग-अलग तरीकों से कबीले वालों को समझाना नाकाम हो रहा था। वीडियो व ऑडियो संदेश, कबीलों के पास खाद्य सामग्री या दवाई गिराना, रिमोट संचालित रोबॉट से संदेश आदि काम जंगलियों को जागरूक करने के बजाय भ्रमित कर रहे थे।

जब हर प्रयास निरर्थक लगने लगा तो डॉक्टर कोटल ने स्वयं जंगलियों के बीच जाकर उन्हें समझाने का फैसला किया। इस जोखिम भरे विचार पर दल के बाकी सदस्य पीछे हट गये। किसी तरह डॉक्टर केवल अनुवादक को अपने साथ रहने के लिए समझा पाये। बिना सुरक्षा के जंगली सीमा में घुसते ही दोनों को बंदी बना लिया गया। कुछ कबीलों की संयुक्त सभा में डॉक्टर और अनुवादक को एक खंबे से बाँध कर उनकी मंशा और पिछले कामों के बारे में पूछा गया।

डॉक्टर ने अपनी तरफ से भरसक कोशिश की, और अपनी बात इस तरह ख़त्म की – “….हम आपके दुश्मन नहीं हैं। बाहर की उन्नत दुनिया में यहाँ फैले कई रोगों के इलाज और परेशानियों के हल हैं। एक बार हमें मौका देकर देखिए।”

अपनी जान के लिए कांपते और डॉक्टर को कोसते अनुवादक ने तेज़ी से कोटल की बात को जंगलियों की भाषा में दोहराया।

जवाब में कबीलों के वरिष्ठ सदस्य ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। उन्होंने अनुवादक को बताया की सूमा धर्म सबसे उन्नत है और बाकी बातें व्यर्थ हैं। डॉक्टर कोटल को सूमा के ईश्वर ने उन सबकी परीक्षा लेने के लिए भेजा है।

अचानक अंतरिक्ष से गिरा एक विशालकाय पत्थर डॉक्टर कोटल और उनके अनुवादक पर बरसा और दोनों की मौके पर ही मृत्यु हो गयी। कोई बड़ी उल्का पृथ्वी का वायुमंडल पार करते हुए बड़े टुकड़ो में उस द्वीपसमूह पर बरसी थी।

इस घटना में कोई जंगली नहीं मरा। उन सबका विश्वास पक्का हुआ कि उनके धर्म से ना डिगने के कारण वो ज़िंदा रहे जबकि बाहरी अधर्मी लोग मारे गये। सभी उल्लास में “हुह-हुह-हुह…” की आवाज़ निकालकर नृत्य करने लगे।

जंगली नहीं देख पाये कि उल्का के कई टुकड़े सुप्त ज्वालामुखी में ऐसे कोण पर लगे की वह जाग्रत होकर फट गया। गर्म लावे का फव्वारा द्वीपसमूह पर आग की बारिश करने लगा। कुछ देर पहले तक सूमा धर्म के गुणगान गाते जंगली जान बचाकर भागने लगे। अधिकांश गर्म बरसात में मारे गये और जो ओट में बच गये उनकी तरफ आग की नदी तेज़ी से बढ़ रही थी। फिर भी अगर कोई बच गया तो उल्कापिंडो से समुद्र में उठी सुनामी कुछ मिनटों में दस्तक देने वाली थी। ज़मीनी सतह से काफी ढका होने के कारण दबाव में ज्वालामुखी भी उल्लास में “हुह-हुह-हुह…” की आवाज़ निकाल रहा था…शायद मन ही मन सूमा के ईश्वर का गुणगान और नृत्य भी कर रहा हो।

समाप्त!
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3 Hindi Moral Stories for Kids #Zahan

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बच्चों के लिए ये तीन कहानियां 2018 में नींव पत्रिका में प्रकाशित हुई .

1) – सामान्य जीवन

बीनू बंदर अपने घर में सबका लाडला था। उसकी हर तरह की ज़िद पूरी की जाती थी। उसका परिवार भारत के उत्तराखण्ड प्रदेश स्थित जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय पार्क में रहता था। जंगल में अन्य युवा बंदर ऊँचे से ऊँचे पेड़ों पर लटकने, चढ़ने का अभ्यास करते रहते थे। वहीं बीनू को यह सब रास नहीं आता था। किसी के टोकने पर बीनू कहता कि जंगल के बाकी जीवों की तरह हमें सामान्य जीवन जीना चाहिए। उनकी तरह धरती पर विचरण करना चाहिए। छोटा और गुस्सैल होने के कारण कोई उसे अधिक टोकता भी नहीं था। एक बार वर्षा ऋतु में जंगल के बड़े हिस्से में बाढ़ आ गयी।

बंदर समुदाय ने कई जीवों की जान बचायी जबकि बीनू मुश्किल से अपनी जान बचा पाया। बीनू निराश था कि वह अन्य बंदरों की तरह जंगल के जानवरों की मदद नहीं कर पा रहा था। बाढ़ का पानी सामान्य होने के बाद बीनू के माता-पिता ने उसे समझाया। हर जीव की कुछ प्रवृत्ति होती है, जो उसके अनुसार सामान्य होती है। संभव है अन्य जीवों के लिए जो सामान्य हो वह तुम्हारे लिए ना हो। इस घटना से बीनू को अपना सबक मिला और वह तन्मयता से पेड़ों पर चढ़ना और लटकना सीखने में लग गया।

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2) – अवसर का लाभ

मीता को खेलों में बड़ी रूचि थी। वह बड़ी होकर किसी खेल की एक सफल खिलाडी बनना चाहती थी। एक बार मीता के स्कूल में जूनियर क्रिकेट कैंप का आयोजन तय हुआ। इस कैंप में जबलपुर, मध्य प्रदेश शहर के स्कूली लड़कों और लड़कियों की अलग प्रतियोगिता होनी थी। कैंप में अच्छा प्रदर्शन करने वाले बच्चों को भविष्य के लिए छात्रवृत्ति दी जाती। मीता ने सोचा कि क्रिकेट तो लड़कियों का खेल नहीं है। क्रिकेट में सिर्फ लड़कों का भविष्य है। उसने कैंप के लिए आवेदन नहीं दिया।

क्रिकेट कैंप के दौरान ही भारतीय महिला क्रिकेट टीम विश्व कप में उप-विजेता रही। इस खबर के बाद कैंप को अधिक प्रायोजक मिल गये। मीता की कक्षा की एक लड़की सौम्या को छात्रवृत्ति मिली और वह जूनियर स्तर की राष्ट्रीय क्रिकेट टीम में भी चुन ली गयी। अन्य खेलों में मीता हमेशा सौम्या से आगे रहती थी। अगर वह क्रिकेट कैंप में हिस्सा लेती तो निश्चित ही सौम्या की जगह सफलता पाती। मीता को सबक मिला कि जानकारी के अभाव में किसी अवसर को छोड़ देना गलत है। अगर किसी में प्रतिभा और लगन है तो किसी भी खेल में सफलता पायी जा सकती है। कोई खेल केवल लड़कों या लड़कियों के लिए नहीं बना है। मीता ने अब से हर अवसर का लाभ उठाने का निश्चय किया।

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3) – पर्यटन का महत्त्व (Fiction)

गुजरात स्थित गिर राष्ट्रीय उद्यान, वन्य अभ्यारण्य कई जीव-जन्तुओं को आश्रय देता है। वहाँ रहने वाले कुछ विद्वान जानवरों के बीच ज्ञान की होड़ थी। कोई किताबें पढता, कोई इंटरनेट पर खोजता तो कोई बड़े-बूढ़ों के साथ समय बिताता। हर विद्वान जानवर कई तरह से जानकारी हासिल करने की कोशिश में लगा रहता। हर वर्ष होने वाली विद्वानों की बैठक का समय था। सब विद्वान एक-दूसरे से अपना ज्ञान साझा करते और फिर सर्वसम्मति से विजेता की घोषणा की जाती थी। पिछले 12 वर्षों से भोला भालू सबसे बड़े विद्वान का खिताब जीत रहा था। इस बार भी विद्वानों की बैठक में भोला की जीत हुई। भोला मंच पर आया। उसने बताया कि वह इस प्रतियोगिता से संन्यास ले रहा है ताकि अन्य विद्वानों को अवसर मिल सके। साथ ही उसने अपनी जीत का राज बताया।

भोला – “जंगल के सभी विद्वान ज्ञान का भण्डार हैं। एक जैसे स्रोत होने के कारण सबकी जानकारी लगभग बराबर है। मेरी अतिरिक्त जानकारी और अनुभव के पीछे पर्यटन का हाथ है। मैं देश-विदेश के मनोरम स्थानों पर घूमने जाता हूँ। वहाँ रहने वाले जीवों से मिलता हूँ। उनका अलग रहन-सहन देखता हूँ। उनसे वहाँ प्रचलित कई बातें सीखता हूँ। इस तरह किताबी जानकारी के साथ मैं वास्तविक जीवन का अनुभव जोड़ता रहता हूँ। यही कारण है कि मैं इतने लम्बे समय से गिर का सबसे बड़ा विद्वान बन रहा था।”

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Horror-Educational Genre Mix: Samaj Levak (Freelance Talents)

00 (1)New experimental genre mix, समाज लेवक (Samaj Levak) – Social Leech (Educational-Horror Comic)

Illustrators: Anand Singh, Prakash Bhalavi (Bhagwant Bhalla), Author: Mohit Trendster, Colorist: Harendra Saini, Letterer: Youdhveer Singh

https://goo.gl/uqV8FV

https://goo.gl/2AuveV

https://goo.gl/euqPFu

https://goo.gl/VdrXy1

http://freelea.se/mohit-trendster/samaj-levak-horror-comic 

creditsAlso Available: Google Play, Google Books, Readwhere, Magzter, Dailyhunt, Ebook360 and other leading websites, mobile apps.

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सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा? (वीभत्स रस Poetry)

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अपने रचे पागलपन की दौड़ में परेशान समाज की कुत्सित मानसिकता “अच्छा-अच्छा मेरा, छी-छी बाकी दुनिया का” पर चोट करती ‘वीभत्स रस’ में लिखी नज़्म-काव्य। यह नज़्म आगामी कॉमिक ‘समाज लेवक’ में शामिल की है। –

सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?
सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?
बिजबिजाते कीड़ों को सहेगा,
कभी अपनी बुलंद तारीख़ों पर हँसेगा,
कभी खुद को खा रही ज़मीं पर ताने कसेगा।

जब सब मुझे छोड़ गये,
साथ सिर्फ कीड़े रह गये,
सड़ती शख्सियत को पचाते,
मेरी मौत में अपनी ज़िन्दगी घोल गये।

आज जिनसे मुँह चुराते हो,
कल वो तुम्हारा मुखौटा खायेंगे,
इस अकड़ का क्या मोल रहेगा?
सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?

लोथड़ों से बात करना सीख लो,
बंद कमरों में दिल की तसल्ली तक चीख लो!
सड़ता हुआ मांस सुन लेगा,
अगली दफ़ा तुम्हे चुन लेगा।

जिसे दिखाने का वायदा किया था हमसे,
वो गाँव तो हमारी लाश पर भी ना बसेगा।
खाल की परत फाड़ जब विषधर डसेगा,
सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?

जिसपर फिसले वो किसी का रक्त,
नाली में पैदा ही क्यों होते हैं ये कम्बख्त?
बाकी तो सब राम नाम सत!
उसपर मत रो…
सुर्ख़ से काला पड़ गया जो,
ये जहां तो ऐसा ही रहेगा,
सड़ता हुआ मांस कुछ नहीं कहेगा!
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#ज़हन

#Spotlight Artist Satya Pal Sonker

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“…और मैं अनूप जलोटा का सहपाठी भी था।”

*कलाकार श्री सत्यपाल सोनकर

पिछले शादी के सीज़न से ये आदत बनायी है कि पैसों के लिफाफे के साथ छोटी पेंटिंग उपहार में देता हूँ। पेंटिंग से मेरा मतलब फ्रेम हुआ प्रिंट पोस्टर या तस्वीर नहीं बल्कि हाथ से बनी कलाकृति है। पैसे अधिक खर्च होते हैं पर अच्छा लगता है कि किसी कलाकार को कुछ लाभ तो मिला। एक काम से घुमते हुए शहर की तंग गलियों में पहुँचा खरीदना कुछ था पर बिना बोर्ड की एक दुकान ने मेरा ध्यान खींचा जिसके अंदर कुछ कलाकृतियाँ और फ्रेम रखे हुए थे। सोचा पेंटिंग देख लेता हूँ। कुछ खरीदने से पहले एक बार ये ज़रूर देखता हूँ कि अभी जेब में कितने पैसे हैं या एटीएम कार्ड रखा है या नहीं। एक कॉन्फिडेंस सा रहता है कि चीज़ें कवर में हैं। किस्मत से जिस काम के लिए गया था उसको हटाकर जेब में 200-300 रुपये बचते और कार्ड भी नहीं था। अब पता नहीं इस तरफ कब आना हो। इस सोच में दुकान के बाहर जेब टटोल रहा था कि अंदर से एक बुज़ुर्ग आदमी ने मुझे बुलाया।

अंदर प्रिंट पोस्टर, फ्रेम किये हुए कंप्यूटर प्रिंट रखे थे और उनके बीच पारम्परिक कलाकृतियाँ रखी हुई थीं। पोस्टर, प्रिंट चमक रहे थे वहीं हाथ की बनी पेंटिंग्स इधर-उधर एक के ऊपर एक धूमिल पड़ी थी जैसे वक़्त की मार से परेशान होकर कह रही हों कि ‘देखो हम कितनी बदसूरत हो गयी हैं, अब हमें फ़ेंक दो या किसी कोने में छुपा कर रख दो…ऐसे नुमाइश पर मत लगाओ।’ मैंने उन्हें कहा की मुझे एक पेंटिंग चाहिए।

“मेरी ये पेंटिंग्स तो धुंधली लगती हैं बेटा! आप प्रिंट, पोस्टर ले जाओ।”

सुनने में लग रहा होगा कि इस वृद्ध कलाकार को अपनी कला पर विश्वास नहीं जो प्रिंट को कलाकृति के ऊपर तोल रहा है। जी नहीं! अगर उसे अपनी कला पर भरोसा ना होता तो वो कबका कला को छोड़ चुका। उसे कला पर विश्वास है पर शायद दुनिया पर नहीं। मैंने उन्हें अपनी मंशा समझायी और धीरे-धीरे अपने कामों में लगे उस व्यक्ति का पूरा ध्यान मुझपर आ गया। आँखों में चमक के साथ उन्होंने 2-3 पेंटिंग्स निकाली।

“बारिश, धूप में बाकी के रंग मंद पड़ गये हैं। अभी ये ही कुछ ठीक बची हैं जो किसी को तोहफे में दे सकते हैं।”

मेरे पास समय था और उसका सदुपयोग इस से बेहतर क्या होता कि मैं इस कलाकार, सत्यपाल सोनकर की कहानी सुन लेता।

1951 में चतुर्थ श्रेणी रेलवे कर्मचारी के यहाँ जन्म हुआ। सात बहनों के बाद हुए भाई और इनके बाद एक बहन, एक भाई और हुए। तब लोगो के इतने ही बच्चे हुआ करते थे। कला, रंग, संगीत में रुझान बचपन से था पर आस-पास कोई माहौल ही नहीं था। वो समय ऐसा था कि गुज़र-बसर करना ही एक हुनर था। कान्यकुब्ज कॉलेज (के.के.सी.) लखनऊ में कक्षा 6 में संगीत का कोर्स मिला जिसमें इनके सहपाठी थे मशहूर भजन, ग़ज़ल गायक श्री अनूप जलोटा। स्कूली और जिला स्तरीय आयोजनों, प्रतियोगिताओं में कभी अनूप आगे रहते तो कभी सत्यपाल। एक समय था जब शिक्षक कहते कि ये दोनों एक दिन बड़ा नाम करेंगे। उनकी कही आधी बात सच हुई और आधी नहीं। जहाँ अनूप जलोटा के सिर पर उनके पिता स्वर्गीय पुरुषोत्तम दास जलोटा का हाथ था, वहीं सत्यपाल जी की लगन ही उनकी मार्गनिर्देशक थी। पुरुषोत्तम दास जी अपने समय के प्रसिद्द शास्त्रीय संगीत गायक रहे जिन्होंने शास्त्रीय संगीत की कुछ विधाओं को भजन गायन में आज़माकर एक नया आयाम दिया। अनूप जलोटा ने संगीत की शिक्षा जारी रखते हुए लखनऊ के भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय से डिग्री पूरी की, फिर लाखो-करोड़ो कैसेट-रिकार्ड्स बिके, भजन सम्राट की उपाधि, पद्म श्री मिला, बॉलीवुड-टीवी, देश-विदेश में कंसर्ट्स….और सत्यपाल? घर की आर्थिक स्थिति के कारण वो अपनी दसवीं तक पूरी नहीं कर पाये। 1968 में कारपेंटरी का कोर्स कर दुनिया से लड़ने निकल गये, जो लड़ाई आजतक चल रही है। रोटी की लड़ाई में सत्य पाल ने कला को मरने नहीं दिया। उनकी कला उनसे 5-7 बरस ही छोटी होगी। फ्रेमिंग का काम करते हुए कलाकृतियाँ बनाते रहे और बच्चों को पेंटिंग सिखाते रहे।

“आप पेंटिंग सिखाने के कितने पैसे लेते हैं?”

“एक महीने का पांच सौ और मटेरियल बच्चे अलग से लाते हैं। जिनमें लगन है पर पैसे नहीं दे सकते उनसे कुछ नहीं लिया।”

कभी एक सतह पर खड़े दो लोग, आज एक के लिए अलग से प्राइवेट जेट तक आते हैं और एक खुले पैसे गिनने में हुई देर से टेम्पों वाले की चार बातें सुनता  है। कला के सानिध्य में संतुष्ट तो दोनों है पर एक दुनियादारी नाग के फन पर सवार है और एक उसका दंश झेल रहा है। सत्यपाल जी की संतोष वाली मुस्कराहट ही संतोष देती है। क्या ख्याल आया? पागल है जो मुस्कुरा रहा है? पागल नहीं है जीवन, कला और उन बड़ी बातों के प्यार में है जिनके इस छोटी सोच वाली दुनिया में कोई मायने नहीं है। क्या सत्यपाल हार गये? नहीं! वो पिछले 49 सालों से जीत रहे हैं और जी रहे हैं। अपने शिष्यों की कला में जाने कबतक जीते रहेंगे।

ओह, बातों-बातों में इनकी चाय पी ली और समय भी खा लिया। अब दो-ढाई सौ रुपये में कौनसी ओरिजिनल पेंटिंग मिलेगी? एटीएम कार्ड लाना चाहिए था। कुछ संकोच से पेंटिंग का दाम पूछा।

“75 रुपये!”

अरे मेरे भगवान! धरती फट जा और मुझे खुद में समा ले। क्या-क्या सोच रहा था मैं? सत्यपाल जी ने तो मेरी हर सोच तक को दो शब्दों से पस्त कर दिया। क्या बोलूँ, अब तो शब्द ही नहीं बचे। आज पहली बार मोल-भाव में पैसे बढ़ाने की कोशिश कर रहा था। मैंने कोशिश की पर उन्होंने एक पैसा नहीं बढ़ाया। मैंने बचे हुए पैसो की एक और थोड़ी बड़ी पेंटिंग खरीदी और वहाँ आते रहने का वायदा किया। आप सबसे निवेदन है कि डिजिटल, ट्रेडिशनल आदि किसी भी तरह और क्षेत्र के कलाकार से अगर आपका सामना हों तो अपने स्तर पर उनकी मदद करने की कोशिश करें। विवाह, जन्मदिन और बड़े अवसरों पर कलाकृति, हस्तशिल्प उपहार में देकर नया ट्रेंड शुरू करें।

नशे से नज़र ना हटवा सके…
उन ज़ख्मों पर खाली वक़्त में हँस लेता हूँ,
मुफ़लिसी पर चंद तंज कस देता हूँ…
बरसों से एक नाव पर सवार हूँ,
शोर ज़्यादा करती है दुनिया जब…
उसकी ओट में सर रख सोता हूँ। 

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#ज़हन

Hindi Laghukatha – Yaadon ki Tasveer

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आज रश्मि के घर उसके कॉलेज की सहेलियों का जमावड़ा था। हर 15-20 दिनों में किसी एक सहेली के घर समय बिताना इस समूह का नियम था। आज रश्मि की माँ, सुमित्रा से 15 साल बड़ी मौसी भी घर में थीं।

रश्मि – “देख कृतिका…तू ब्लैक-ब्लैक बताती रहती है मेरे बाल…धूप में पता चलता है। ये ब्राउन सा शेड नहीं आ रहा बालों में? इनका रंग नेचुरल ब्राउन है।”

कृतिका – ” नहीं जी! इतना तो धूप में सभी के बालों का रंग लगता है।”

सुमित्रा बोली – “शायद दीदी से आया हो। इनके तो बिना धूप में देखे अंग्रेज़ों जैसे भूरे बाल थे। रंग भी एकदम दूध सा! आजकल वो कौनसी हीरोइन आती है…लंदन वाली? वैसी! “

जगह-जगह गंजेपन को छुपाते मौसी के सफ़ेद बाल और चेचक के निशानों से भरा धुंधला चेहरा माँ की बतायी तस्वीर से बहुत दूर थे। रश्मि का अपनी माँ और मौसी से इतना प्यार था कि वो रुकी नहीं… “क्या मम्मी आपकी दीदी हैं तो कुछ भी?” रश्मि की हँसी में उसकी सहेलियों की दबी हँसी मिल गयी।

झेंप मिटाने को अपनी उम्रदराज़ बहन की आँखों में देख मुस्कुराती सुमित्रा जानती थी कि उसकी कही तस्वीर एकदम सही थी पर सिर्फ उसकी यादों में थी।

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#ज़हन Artwork – Chuby M Art

Hindi Quotes #mohit_trendster

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*) – अपने अनुभव, प्रतिभा और जो भी जीवन में अर्जित किया उसका मोल समझें पर आत्ममुग्धता से बचें। सामने वाले व्यक्ति को परसों पैदा हुआ ना मानें।

*) – निष्पक्ष होना दुनिया की सबसे कठिन कला है।

*) – किसी की सहनशीलता को उसकी कमज़ोरी मत समझें। इलास्टिक को इतना खींचने की आदत ना डालें कि वो ऐसी घड़ी में टूटे जब आपको उसकी सबसे ज़्यादा ज़रुरत हो।

*) – इतिहास कभी एक नहीं होता। इतिहास नदी की धाराओं सा इधर-उधर बह जाता है और लोग अपनी विचारधारा के हिसाब से उन धाराओं को पकड़ कर अपना-अपना इतिहास चुन लेते हैं। जो मानना है मानो पर मानने से पहले सारी धाराओं का पानी ज़रूर पीकर देखना….जिस पानी की आदत नहीं उसे पीकर शायद तबियत बिगड़ जाए पर दिमाग सही हो जाएगा।

*) – सुरक्षित राह पर जीवन को तीन से पौने चार बनाने में बाल सफ़ेद हो जाते हैं और कोई दांव लगाकर तीन से तेईस हो जाता है। अब पौने चार से शून्य दूर होता है या तेईस?

*) – सही, सकारात्मक और बिना किसी विचारधारा के प्रभाव में आकर किये गए सामाजिक अनुकूलन से समाज की अनेकों कुरीतियों से छुटकारा पाया जा सकता है।

*) – अक्सर भूल जाने लायक छोटी जीतों के गुमान में लोग याद रखने लायक बड़ी बाज़ी हार जाते हैं।

*) – कला के क्षेत्र में केवल यह सोचकर खुद को रोक लेना सही नहीं कि ऐसा पहले हो चुका होगा। शायद हो चुका हो….पर आपके नज़रिये और अंदाज़ से तो नहीं हुआ ना!

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टीनएज ट्रकवाली (कहानी) #ज़हन

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थाने में बैठा कमलू सिपाहियों, पत्रकारों और कुछ लोगो की भीड़ लगने का इंतज़ार कर रहा था ताकि अपनी कहानी ज़्यादा से ज़्यादा लोगो को सुना सके। पुलिस के बारे में उसने काफी उल्टा-सुल्टा सुन रखा था तो मन के दिलासे के लिए कुछ देर रुकना बेहतर समझा।

“हज़ारो किलोमीटर लम्बा सफर करते हैं हम ट्रक वाले साहब! एक बार में पूरा देश नाप देते हैं। जगह-जगह रुकता हूँ, सब जानते हैं मुझे। आपके थाने में 4 ढाबे पड़ते हैं पर रात में केवल एक खुला मिलता है तो अक्सर यहाँ रुकना होता है। एक बार उसके अगले पेट्रोल पंप के बाहर बैठी एक लड़की देखी, यहाँ की नहीं लग रही थी और पता नहीं रात को वहाँ क्या कर रही थी…या शायद मुझे पता था पर मैं मानना नहीं चाहता था। अगली बार जब आया तो वह लड़की मरी आँखों वाली एक औरत  बन गई थी। सोचा ‘काश उस दिन रुक जाता! पर रुककर, कर भी क्या लेता…रुक के देख तो ले पगले…शायद कुछ हो जाए।’ लोगो और पुलिस की नज़रों से बचने के लिए पेट्रोल पंप वाला धंधे पर एक-दो लड़कियाँ ही रखता था, जब किसी की नज़र पड़ती भी थी तो उसपर पैसे डाल दिया करता। पहले आप लोगो को बताया तो मुझे बाहर से ही भगा दिया फिर अपने जमा रुपयों से ये लड़की खरीदी और हेल्पर हटाकर इसे रख लिया। कुछ हफ्तों बाद यहाँ से जाते हुए एक लड़की दिखी, आदत ऐसे थोड़े ही जाती है। मैंने पंप के मालिक को समझाने की बहुत कोशिश की पर वो नहीं माना, उल्टा मुझे बेची लड़की ज़बरदस्ती वापस लेने की बात करने लगा। किसी तरह वो लड़की भी खरीदी, अब मेरी 2 हेल्पर हो गयीं। फिर महीनेभर बाद के चक्कर में एक और…मैंने कह-कहा के अपने एक दोस्त की शादी उस से करवा दी। जब अगले चक्कर में नई लड़की खड़ी दिखी तो रहा नहीं गया। मोड़ दिया ट्रक पेट्रोल पम्प की ओर और कुचल दिए उसके मालिक और 3 नौकर। फिर एक्सिलरेटर दबा के कूद गया बाहर, ट्रक लड़ा पेट्रोल टंकी में और ब्लास्ट हो गया।”

एक पत्रकार ने पूछा, “यह सही रास्ता नहीं है….तुम्हारे पागलपन में 2 निर्दोष लोग मारे गए और कुछ घायल हुए उनका क्या?”

कमलू मुस्कुराकर बोला – “उनका कुछ नहीं….जैसे रोज़ सबके सामने बिकती इन लड़कियों का कुछ नहीं। सही रास्ते पर चलकर देख लिया बाबू! कहीं नहीं जाता, बस गोल-गोल घुमाते हो तुम लोग और आदमी थक-हार कर लड़ाई छोड़ देता है।”

वह पत्रकार साथी पत्रकारों के सामने अपनी इतनी आसान चेक-मेट कैसे मान लेता, “अब इन लड़कियों का क्या होगा? इतनी ही फ़िक्र थी इनकी तो यह काम करने से पहले इनका तो सोचा होता।”

कमलू – “बाकी 15-16 की हैं पर इनमे एक 19 साल की है, उसको थोड़ा सिखाया है और लाइसेंस दिलवा दिए हैं। अभी छोटे रुट पर ट्रक चलाएगी बाकियों को बैठाकर।”

पत्रकार – “लाइसेंस दिलवा दिए हैं मतलब ट्रक के अलावा और क्या चलाएगी?”

कमलू – “ज़रुरत पड़ने पर बंदूक भी चलाएगी….”

समाप्त!

#मोहित_शर्मा_ज़हन #mohit_trendster

Acid Attack Painting with Artist Jyoti Singh

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Painting Theme: Acid Attack with Artist Jyoti Singh, 30×30 inch, Oil on Canvas. #concept #art #painting #brainstorming #acidattacks #canvas #oilpainting

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