खाना ठंडा हो रहा है…(काव्य) #ज़हन

20429639_325503421229443_6199327503917694762_n

साँसों का धुआं,
कोहरा घना,
अनजान फितरत में समां सना,
फिर भी मुस्काता सपना बुना,
हक़ीक़त में घुलता एक और अरमान खो रहा है…
…और खाना ठंडा हो रहा है।

तेरी बेफिक्री पर बेचैन करवटें मेरी,
बिस्तर की सलवटों में खुशबू तेरी,
डायन सी घूरे हर पल की देरी,
इंतज़ार में कबसे मुन्ना रो रहा है…
…और खाना ठंडा हो रहा है।

काश की आह नहीं उठेगी अक्सर,
आईने में राही को दिख जाए रहबर,
कुछ आदतें बदल जाएं तो बेहतर,
दिल से लगी तस्वीरों पर वक़्त का असर हो रहा है…
…और खाना ठंडा हो रहा है।

बालों में हाथ फिरवाने का फिरदौस,
झूठे ही रूठने का मेरा दोष,
ख्वाबों को बुनने में वक़्त लग गया,
उन सपनो के पकने का मौसम हो चला है…
…और खाना ठंडा हो रहा है।

तमाशा ना बनने पाए तो सहते रहोगे क्या?
नींद में शिकायतें कहते रहोगे क्या?
आज किसी ‘ज़रूरी’ बात को टाल जाना,
घर जैसे बहाने बाहर बना आना,
आँखों को बताने तो आओ कि बाकी जहां सो रहा है…
…और खाना ठंडा हो रहा है।

============
Thumbnail Artwork – Arpit Shankar‎
#मोहित_शर्मा_ज़हन #mohitness #mohit_trendster
*Second poem in Matlabi Mela (Kavya Comic Series)

अपना उधार ले जाना! (नज़्म) – मोहित शर्मा ज़हन

06-copy
अपना उधार ले जाना!
तेरी औकात पूछने वालो का जहां,
सीरत पर ज़ीनत रखने वाले रहते जहाँ,
अव्वल खूबसूरत होना तेरा गुनाह,
उसपर पंखो को फड़फड़ाना क्यों चुना?
अबकी आकर अपना उधार ले जाना!
 ======
पत्थर को पिघलाती ज़ख्मी आहें,
आँचल में बच्चो को सहलाती बाहें,
तेरे दामन के दाग का हिसाब माँगती वो चलती-फिरती लाशें।
किस हक़ से देखा उन्होंने कि चल रही हैं तेरी साँसे?
तसल्ली से उन सबको खरी-खोटी सुना आना,
अबकी आकर अपना उधार ले जाना!
माँ-पापा के मन को कुरेदती उसकी यादें धुँधली,
देखो कितनो पर कर्ज़ा छोड़ गई पगली।
ये सब तो ऐसे ही एहसानफरामोश रहेंगे,
पीठ पीछे-मिट्टी ऊपर बातें कहेंगे,
तेरी सादगी को बेवकूफी बताकर हँसेंगे,
बूढे होकर बोर ज़िन्दगी मरेंगे।
इनके कहे पर मत जाना,
अपनी दुनिया में खोई दुनिया को माफ़ कर देना,
अबकी आकर अपना उधार ले जाना!
 ==========
ख्वाबों ने कितना सिखाया,
और मौके पर आँखें ज़ुबां बन गयीं…
रात दीदार में बही,
हाय! कुछ बोलने चली तो सहरिश रह गई…
अब ख्वाब पूछते हैं….जिनको निकले अरसा हुआ,
उनकी राह तकती तू किस दौर में अटकी रह गई….
कितना सामान काम का नहीं कबसे,
उन यादों से चिपका जो दिल के पास हैं सबसे,
पुराने ठिकाने पर …ज़िन्दगी से चुरा कर कुछ दिन रखे होंगे,
दोबारा उन्हें चैन से जी लेना…
इस बार अपना जीवन अपने लिए जीना,
अबकी आकर अपना उधार ले जाना!
 ============
बेगैरत पति को छोडने पर पड़े थे जिनके ताने,
अखबारों में शहादत पढ़,
लगे बेशर्म तेरे किस्से गाने।
ज़रा से कंधो पर साढ़े तीन सौ लोग लाद लाई,
हम तेरे लायक नहीं,
फिर क्यों यहाँ पर आई?
जैसे कुछ लम्हो के लिए सारे मज़हब मिला दिए तूने,
किसी का बड़ा कर्म होगा जो फ़रिश्ते दुआ लगे सुनने….
छूटे सावन की मल्हार पूरी कर आना,
….और हाँ नीरजा! अबकी आकर अपना उधार ले जाना!
=====================
*नीरजा भनोट को नज़्म से श्रद्धांजलि*, कल प्रकाशित हुई ट्रिब्यूट कॉमिक “इंसानी परी” में यह नज़्म शामिल है।

Nazm : Ab Lagta Hai (अब लगता है…) | मोहित शर्मा ज़हन

pic 3

*) – अब लगता है….

मेरे पहरे में जो कितनी रातों जगी,
कब चेहरा झुकाए मुझे ठगने लगी,
पिछले लम्हे तक मेरी सगी,
जानी पहचानी नज़रें अब चुभने लगीं।
याद है हर लफ्ज़ जो तुमने कहा था
अब लगता है….
इश्क़ निभाना इतना भी मुश्किल न था….

अटके मसलात पर क़ाज़ी रस्म निभाए,
उम्मीदों में उलझा वो फिर कि…
…पुराने कागज़ों में वो ताज़ी खुशबू मिल जाए।
जाते-जाते एक खत सिरहाने रखा था,
अब लगता है….
इश्क़ निभाना इतना भी मुश्किल न था….

कागज़ों से याद आया कभी तालीम ली थी…..
कुछ वायदों के क़त्ल पर मिले रुपयों से…
….आसान कसमें पूरी की थी।
मासूमियत गिरवी रखकर दुनियादारी खरीदी थी…
यहाँ का हिसाब वगैरह यहीं निपटा कर मरना था,
अब लगता है….
इश्क़ निभाना इतना भी मुश्किल न था….

किसी का हाथ पकडे,
गलत राह पकड़ी,
पीछे जाने की कीमत नहीं,
उनसे नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं…
आगे जाने से इंकार करता मन बंजारा,
गलत सफर तो फिर भी राज़ी,
गलत मंज़िल इसे न गंवारा….

तो मरने तक यहीं किनारे बैठ जाता हूँ,
कोई भटका मुसाफिर आये तो उसे समझाता हूँ…
दूर राहगीर की परछाई में तेरी तस्वीर बना लेता था,
अब लगता है….
इश्क़ निभाना इतना भी मुश्किल न था….
================

*) – Ab lagta hai….

Mere pehre mey jo kitni raaton jagi,
Kab chehra jhukaye mujhe thagne lagi,
pichhle lamhe tak meri sagi,
Jaani pehchaani Nazren ab chubhne lagi….
Yaad hai har lafz jo tumne kaha tha,
Ab lagta hai….
Ishq nibhaana itna bhi mushkil na tha….

Atke maslaat par Qazi rasm nibhaye,
Ummeedon mey uljha wo phir ki,
Purane kagazon mey wo taazi khushboo mil jaaye,
Jaate-jaate ek khat sirhaane rakha tha….
Ab lagta hai….
Ishq nibhaana itna bhi mushkil na tha….

Kagazon se yaad aaya kabhi taleem li thi…..
Kuch vaaydo ke qatl par mile rupayon se….
….aasaan kasme poori ki thi,
Masoomiyat girvi rakhkar Duniyadaari khareedi thi….
Yahan ka hisaab wagehrah yahin nipta kar marna tha…
Ab lagta hai….
Ishq nibhaana itna bhi mushkil na tha….

Kisi ka haath pakde,
Galat raah pakdi,
Pichhe jaane ki keemat nahi,
Unse nazren milane ki himmat nahi…
Aage jaane se inkaar karta mann banjara,
Galat safar to phir bhi raazi,
Galat manzil ise na gawara….

To marne tak yahin kinare baith jaata hun,
Koi bhatka musafir aaye to usey samjhata hun…
Door raahgir ki parchaai mein teri tasveer bana leta tha….
Ab lagta hai….
Ishq nibhaana itna bhi mushkil na tha….

========
Kavya Comics FB Page

#mohitness #mohit_trendster #trendybaba #freelance_talents #freelancetalents