Interview with #comics Superfan Supratim Saha

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नागपुर में रह रहे सुप्रतिम साहा का नाम भारतीय कॉमिक्स प्रेमियों के लिए नया नहीं है। सुप्रतिम भारत के बड़े कॉमिक्स कलेक्टर्स में से एक हैं, जो अपने शौक के लिए जगह-जगह घूम चुके हैं। कहना अतिश्योक्ति नहीं, ऐसे सूपरफैंस की वजह से ही भारतीय कॉमिक्स उद्योग अभी तक चल रहा है। पहले कुछ कॉमिक कम्युनिटीज़ में इनका अभूतपूर्व योगदान रहा और समय के साथ ये अपने काम में व्यस्त हो गए। हालांकि, अब भी कुछ कॉमिक्स ग्रुप पर सुप्रतिम दिख जाते हैं। ये मृदुभाषी और सादा जीवन व्यतीत करने में विश्वास करते हैं, इनके बात करने और वाक्य गढ़ने का तरीका मुझे बहुत भाता है इसलिए साक्षात्कार के जवाब में मेल से भेजे इनके जवाबों को जस का तस रखा है।

अपने बारे में कुछ बताएं?

सुप्रतिम – 80 के दशक में भारत के पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में मेरा जनम हुआ। मैने अपनी स्कूलिंग अगरतला शहर से की। मैने इंजिनियरिंग की नागपुर शहर से और बॅंगलुर शहर मे कुछ टाइम जॉब करने के बाद मैने मास्टर्स की चेन्नई शहर मे, आज मैं नागपुर के एक कॉलेज मे वाइस प्रिन्सिपल के पद पे काम कर रहा हू. आज भी मैं रेगुलार कॉमिकस खरीदता हू और पढ़ता हु्। मुझे मालूम हैं मेरा यह जुड़ाव कॉमिक्स के साथ हमेशा  रहेगा. इस सफ़र मे मैं अपने कुछ दोस्तो का नाम लेना चाहूँगा जिन्होने हमेशा मेरा साथ निभाया, बंटी फ्रॉम कोलकाता, संजय आकाश  दिल्ली से, गुरप्रीत पटियाला से, और बहत सारे दोस्त, वरुण ,मोहित, महफूज़ ,ज़हीर,विनय,अजय ढिल्लों  जिन्हे मैं ऑनलाइन मिला और इन सब से भी मेरी काफ़ी अच्छी दोस्ती हैं। सबके नाम शायद मैं यहा लिख नही पाया पर  मैं सबका आभारी हूँ जिन्होने इस सफ़र पे मेरा साथ निभाया।

कॉमिक्स कलेक्शन का आपका सफर कैसे शुरू हुआ?

सुप्रतिम – मेरे कॉमिक्स पढ़ने की अगर बात करे तो ये शुरुवात हुई थी 1991-92 के आसपास। उन दिनों मैं क्वार्टर में रहता था और हर एक  घर से बटोर के जो कॉमिक्स मुझे मिलते थे उनमे से ज़्यादा तर या तो टिनटिन होते थे या फिर इंद्रजाल कॉमिक्स।  हिंदी कॉमिक इंडस्ट्री से मैं जुड़ा 1994 में जब मेरे एक राजस्थानी मित्र ने मुझे दो कॉमिक्स दी, वो दो कॉमिक्स थे डॉ नो और उड़ती मौत। राज कॉमिक्स और साथ ही अन्य हिंदी  कॉमिक्स के साथ मैं इन्ही दो कॉमिक्स की वजह से जुड़ा।

अब तक कॉमिक्स के लिए कहाँ-कहाँ घूम चुके हैं?

सुप्रतिम – कॉमिक्स के लिए ट्रेवल करना मैंने शुरू किया सन 2009 से, यह वो समय था जब मैं बैंगलोर में था.बैंगलोर के अनिल बुक शॉप से बहत सारी कॉमिक्स मैंने रिकलेक्ट की.इसको छोड़के मैंने सबसे ज़्यादा कॉमिक्स कलेक्ट की नागपुर से। इस शहर ने मुझे ऑलमोस्ट 1500 + कॉमिक्स दी जिनमे मैक्सिमम दुर्लभ कॉमिक्स थे। इन 8 सालो में मैंने दिल्ली, नागपुर, कोलकाता, हैदराबाद, बैंगलोर, चेन्नई, पटियाला, अम्बाला, अगरतला जैसे शहरो से भी कॉमिक्स ली। दिल्ली शहर में दरीबा कलां के गोडाउन  से भी मैंने 1000+ कॉमिक्स ली।  इन दो शहर को छोड़के हैदराबाद शहर में भी मुझे 300+ विंटेज डायमंड कॉमिक्स मिलें। ऐसी कॉमिक्स जो की 35 साल से भी अधिक पुराने हैं,जैसे की लंबू मोटू ,फौलादी सिंह ,महाबली शाका ,मामा भांजा और वॉर सीरीज वाली कॉमिक्स। इन सब को छोड़के मेरे पास बंगाली कॉमिक्स भी है भारी संख्या में, करीबन 500 ,जिनमे पिछले 60-80 साल पुराने कॉमिक्स भी हैं। मैं आज भीं रेगुलर कॉमिक्स लेता हु हिंदी बंगाली इंग्लिश में।

पहले के माहौल और अब में क्या अंतर दिखते हैं आपको?

सुप्रतिम – पहले के माहौल में कॉमिक्स एक कल्चर हुआ करता  था, आजकल कॉमिक्स तो दूर की बात हैं किताबों को पढ़ने के लिए भी पेरेंट्स बच्चो को प्रोत्साहित नहीं करते।  विडियो गेम्स केबल टीवी आदि तो मेरे बचपन में भी आराम से उपलब्ध थे ,पर इन सबके बावजूद अगर हर दिन खेलने नहीं गए, तैराकी नहीं की तो घर पे डांट पड़ती थी। आजकल कॉमिक्स,खासकर के कोई भी “रीजनल ” फ्लेवर की कॉमिकस को पढ़ना लोगो के सामने खुदको हास्यास्पद करने जैसा हैं। यही वजह हैं की सिर्फ वही लोग देसी कामिक्से पढ़ते हैं जिनमे रियल पैशन हैं, वरना मंगा और वेस्टर्न कॉमिक्स को ही सीरियस कॉमिक्स समझने और ज़ाहिर करने वालो की भी कमी नहीं हैं। एक कॉमिक बुक फैन होने के नाते मुझे सभी कामिक्से देसी  या विदेसी  अच्छे  लगते  है पर भाषा के नाम पे यह भेदभाव आज बहत ज़्यादा प्रभावशाली हैं।

अपने शहर के बारे में बताएं।

सुप्रतिम – मेरा जन्म भारत के पूर्वोत्तर मे स्थित अगरतला शहर मे हुआ। गौहाटी के बाद ये पूर्वोत्तर के सात राज्यो मे दूसरा प्रमुख शहर भी हैं। बॉर्डर से सटे होने की वजह से यहा बीएसएफ भी कार्यरत हैं जिनमे से काफ़ी लोग हिन्दी भाषी है। साथ ही साथ ओ एन जी सी होने के कारण से हिन्दी भाषी लोग काफ़ी मात्रा मे मौजूद भी है। ज़ाहिर सी बात हैं की इस वजह से हिन्दी कॉमिक्स शुरू से ही यहा रहते लोगो का मनोरंजन करती आ रही हैं. समय के साथ साथ हिन्दी कॉमिक्स का क्रेज़ यहा काफ़ी कम हो चुका हैं पर आज भी मैं घर जाता हू तो भूले भटके एक आधा दुकान मे कुछ दुर्लभ कॉमिकसे खोज ही निकलता हूँ।

आप अक्सर स्केच बनाते हैं, स्केचिंग का शौक कब लगा?

सुप्रतिम – स्केचिंग का  शौक  मुझे कॉमिक्स से नही  लगा। उन दिनो (1993) जुरासिक पार्क फिल्म का क्रेज़  सबके सिर चढ़के बोल रहा था , मेरे घर पे एक किताब थी जिसका नाम था “अतीत साक्षी फ़ॉसिल” उस किताब मे डाइनॉसॉर के बारे मे जानकारियाँ थी और अनूठे चित्र थे, मैं दिन भर उन्ही के चित्र कॉपी करने के कोशिश मे लगा रहता था। कुछ एक बार जब मेरे इन प्रयासो को लोगो ने मुर्गी,बतक के चित्र के रूप मे शिनाख्त की तो मैं फिर कॉमिक स्टार्स के चित्र बनाने लगा। बचपन मे सबसे ज़्यादा चित्र मैने भेड़िया के बनाए (प्री-1997) ,नागराज के चित्र बनाते हुए मैं काई बार पढ़ाई के वक़्त पकड़ा भी गया। आज कल समय मिलता नही हैं पर उत्सुकता पहले जैसी ही हैं।

आपके हिसाब से एक अच्छी कॉमिक्स के क्या मापदण्ड हैं? 

सुप्रतिम – एक अच्छी  कॉमिक्स का मापदंड किसी एक विषय पे निर्भर नहीं करता, पर पहला मापदंड यह हैं की उसके चित्र और कहानी में से कोई भी एक पहलु जोरदार होनि चाहिये। हालाकी चित्र अव्वल दर्जे का हो तो सबसे पहले ध्यान आकर्षित करता है। पर ऐसे कॉमिक भी होते हैं जिनमे चित्र का योगदान कम होता है और कहानी इतनी ज़बरदस्त होती है की दिल को छु जाती हैन.जैसे की “अधूरा प्रेम”.वैसे ही काफ़ी ऐसे कॉमिक्स भी होते हैं जिनके साधारण से कहानी कोचित्रकला के वजह से एक अलग ही आकर्षण मिलता हैन. मनु जी के द्वारा बनाए गये सभी परमाणु के कॉमिक्स इस श्रेणी मे आते हैं. आज भी अगर कॉमिक्स के क्वालिटी की बात आए तो आकर्षक चित्रकला ही वो प्रमुख माध्यम हैं जिससे आप एक कॉमिक्स से प्रभावित होते हैं।

अपनी पसंदीदा कॉमिक्स, लेखक, कलाकार और कॉमिक किरदारों के बारे में बताएं। 

सुप्रतिम – मेरी पसंदीदा कॉमिक्स, किरदार के हिसाब से देखा जायें तो  होंगे ग्रांड मास्टर रोबो, ख़ज़ाना सीरीज़, भूल गया डोगा, टक्कर, खरोंच, 48 घंटे सीरीज़, लाश कहा गयी, चमकमणी, महारावण सीरीज़, अग्नि मानव सीरीज़, प्रोफ शंकु सीरीज़ आदि। अनुपम सिन्हा जी ,सत्यजीत राय,संजय जी मेरे प्रिय लेखक मे से हैं। प्रताप जी,अनुपम जी, मनु जी, डिगवॉल जी, ललित शर्मा जी, चंदू जी, सुजोग ब्न्दोपध्यय जी, अभिषेक चटेर्ज़ी, मलसुनी जी, मयुख चौधरी जी,गौतम कर्मकारजी मेरे प्रिय कलाकार हैं।  ध्रुव, नागराज, परमाणु, डोगा, भेड़िया, प्रोफेसर शंकु, कौशिक, फेलूदा, महाबली शाका,फॅनटम, घनादा मेरे फ़ेवरेट क़िरदार हैं।

बचपन की कोई हास्यास्पद घटना, याद बांटिये। 

सुप्रतिम – बचपन मे मेरे एक राजस्थानी मित्र राकेश कुमार मीना ने मुझे पहली बार राज कॉमिक से अवगत कराया। उसीके साथ हुआ एक वाक़या मुझे याद हैं जिसे हास्यास्पद घटना कहा जा सकता हैं। राकेश और मेरे पास जितनी भी कॉमिकस थी, उनको हम एक्सचेंज करके पढ़ते थे। एक बार हुआ यह की मुझे उससे दो कॉमिक से लेनी थी, जिनमे से एक थी इंद्र की और दूसरी थी ताउजी कि, अब हुआ यह की यह दोनो कॉमिक आठ रुपये के थे। जब मैने उसे अपने दो कॉमिकसे दी तो उसने मुझे कहा की तेरे दो कॉमिक्सो का मूल्य पन्द्रह रुपये हैं तो मैं तुझे मेरे दो कॉमिक, जो की सोलह रुपये के हैं, तुझे नही दे सकता। उसके इस बिज़नेस माइंडनेस की जब भी कल्पना करता हू तो आज 22 साल बाद यह घटना हास्यास्पद ही लगता हैं। दूसरी घटना भी 1995 की ही हैं, मैं अपने फॅमिली के साथ जा रहा था बन्गलोर्, हम कलकत्ता  मे ठहरे हुए थे और मशहूर कॉलेज स्ट्रीट से होके गुज़र रहे थे की मुझे एक दुकान मे कॉमिकस दिखि। मेरे कहने पे पापा ने मुझे दो कॉमिकसे दिलवाई, एक थी “बौना शैतान” और दूसरी “ताजमहल की चोरिं “मुझे हैरत हुई जब दुकानदार ने पापा से 6 ही रुपये माँगे, और मुझे पहली बार मालूम पड़ा की सेकेंड हॅंड बुक्स किसे कहते है। बचपन के यह मासूम किससे सही मायने मे हास्यास्पद ना सही,होठों पे मुस्कान ज़रूर लाती हैं।
बदलते समय के अनुसार कॉमिक्स प्रकाशकों को क्या सलाह देना चाहेंगे?

सुप्रतिम – देसी कॉमिक्स के दौर को मैं कूछ किस्म मे बाँटना चाहूँगा. 1940-1970 के दशक मे बंगाल मे वीदेसी कॉमिक्स के अनुकरण मे काफ़ी विकसित कॉमिकस बनी, जिनमे सायबॉर्ग जैसे कॉन्सेप्ट्स काम मे लाए गये। 1970 से हिन्दी कॉमिक इंडस्ट्री मे भी सहज सरल चित्रो के साथ कॉमिकसे आई। 1980 से कॉमिकसे काफ़ी विकसित हो गई और 1990-2000 तक हिन्दी कॉमिक इंडस्ट्री का सुनेहरा दौर रहा। 2000 के बाद की बात करें तो डिजिटल फॉरमॅट्स के बदौलत हिन्दी कॉमिक इंडस्ट्री मे काफ़ी चेंजस आयें। आज भी कुछ कॉमिक्स मे जैसे की बंगाली कॉमिक्स इंडस्ट्री मे मैनुअल कलरिंग का प्रयोग बखूबी से किया जाता हैं। समय के साथ कुच्छ इंडस्ट्रीस बदल गये और कूछ ने अपना पुराना स्टाइल बरकरार रखा, पर एक अच्छी कॉमिक्स को आज भी फैंस जैसे  भाँप लेते है। बदलते समय में स्टाइल बदला होगा पर अच्छे कॉमिक्स का मापदंड वही हैं जो पहले से थे। प्रकशको से मेरी बीनति रहेगी की यह पॅशन ही हैं जो एक कॉमिक को आकर्षक बनाती हैं ना की नयी तकनीक. कॉमिक बनाते वक़्त उन मौलिकताओ का ध्यान रखे जिनकी वजह से कॉमिक्स ने हमारे बचपन को इतने रंगो मे रंगा।

कॉमिक्स पाठकों के लिए आपका क्या सन्देश है?

सुप्रतिम – कॉमिक्स पाठक बंधुओ के लिए मैं यही बोलना चाहूँगा की आप मे से काफ़ी लोग अभी किसी कारणवश कॉमिक्स से दूर होते जा रहे हैं, कोशिश  करिए की अपने आनेवाले पीढ़ी को आप प्रोत्साहित करे कॉमिक्स पढ़ने के लिए और खुद भी पढ़ें और खरीदें।

– मोहित शर्मा ज़हन

Indian Comics Fandom Magazine (Vol. 11)

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Download/Online Read-  ReadwhereISSUUScribdCalameoPDFSRArchives, SSAuthor StreamFliiby, PublitasFreelease, Pothi, Google Books, Google Play, 4Shared and allied websites/apps.
News, photos and Updates: Diamond Comics, Tinkle, Campfire Graphic Novels, Tamil Comics, Champak, Lot Pot, Jasoos Babloo, Red Streak Publications, Raj Comics, Amar Chitra Katha, Holy Cow Entertainment, Meta Desi Comics, TBS Planet Comics, Yali Dreams Creations, Anik Planet, Kavya Comics, Premeir Artfx Studio, Green Humor, MB Comics Studio.
Special: Artist-Author Akshay Dhar Interview, Late Writer Ved Prakash Sharma (Tribute), Artist Gaman Palem, ICF Awards 2016 Champions Corner
Contributors: Vipul Dixit, Vyom Dayal, Aakash Kumar, Mohit, Avyact, Youdhveer Singh, Rishabh Kurmi, Sanjay Singh
Editor: Mohit Trendster
Freelance Talents (March 2017)
भारतीय कॉमिक्स जगत से जुडी ख़बरें, जानकारी, चित्र, लेख, फैन फिक्शन, साक्षात्कार आदि!

कलाकार श्री सुरेश डिगवाल

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मेरे एक कलाकार-ग्राफ़िक डिज़ाइनर मित्र ने मुझसे शिकायत भरे लहज़े में कहा कि मैं अक्सर भारतीय कॉमिक्स कलाकारों, लेखकों के बारे में कम्युनिटीज़, ब्लॉग्स पर चर्चा करता रहता हूँ पर मैंने कभी सुरेश डिगवाल जी का नाम नहीं लिया। मैंने ही क्या अन्य कहीं भी उसने उनका नाम ना के बरारबर ही देखा होगा। वैसे बात में दम था, अगर एक-दो सीजन का मौसमी कलाकार-लेखक होता तो और बात थी पर सुरेश जी ने डोगा, परमाणु, एंथोनी जैसे किरदारों पर काफी समय तक काम किया। उसके बाद भी कैंपफायर ग्राफ़िक नोवेल्स, पेंगुइन रैंडम हाउस, अन्य कॉमिक्स, बच्चो की किताबों और विडियो गेम्स में उनका काम आता रहा। अब सुरेश जी गुड़गांव में जेनपैक्ट कंपनी में एक कॉर्पोरेट लाइफ जी रहे हैं।

जहाँ तक उनपर होने वाली इतनी कम चर्चा की बात है उसपर मेरी एक अलग थ्योरी है। जिसको तुलनात्मक स्मृति थ्योरी कहा जा सकता है। किसी एक समय में एक क्षेत्र में जनता ज़्यादा से ज़्यादा 4 नाम ही याद रख पाती है (बल्कि कई लोगो को सिर्फ इक्का-दुक्का नाम याद रहते हैं)। उन नामो के अलावा उस क्षेत्र में सक्रीय सभी लोग या तो लम्बे समय तक सक्रीय रहें या फिर उन नामो को नीचे धकेल कर उनकी जगह लें। भाग्य और अन्य कारको से अक्सर कई प्रतिभावान लोग उस स्थान पर नहीं आ पाते जिसके वह हक़दार होते हैं, ओलंपिक्स की तरह दशमलव अंको से छठवे, सातवे स्थान या और नीचे स्थान पर रह जाते है जहाँ आम जनता स्मृति पहुँच नहीं पाती। सुरेश जी का दुर्भाग्य रहा कि एक समय वह इतना सक्रीय रहते हुए भी प्रशंसको के मन में बड़ा प्रभाव नहीं छोड़ पाए।

उनकी इंकिंग, कलरिंग जोड़ियों पर टिप्पणी नहीं करूँगा पर मुझे उनकी शैली पसंद थी। मुझे लगता है अगर वह कुछ और प्रयोग करते, कुछ भाग्य का साथ मिल जाता तो आज मुझे अलग से उनका नाम याद ना करवाना पड़ता। एक वजह यह है कि बहुत से कलाकारों को अपना प्रोमोशन करना अच्छा नहीं लगता, इन्टरनेट-सोशल मीडिया की दुनिया से दूरी बनाकर वो अपनी कला में तल्लीन रहते हैं। खैर, कॉमिक्स के बाहर एक बहुत बड़ी दुनिया है जहाँ सुरेश डिगवाल जी कला निर्देशन, एनिमेशन, चित्रांकन, विडियो गेम्स, ग्राफ़िक डिजाईन और शिक्षा में अपना योगदान दे रहे हैं। आशा है आगे हम सबको उनका काम निरंतर देखने को मिलता रहेगा।
अधिक जानकारी के लिए इन्टरनेट पर सुरेश जी की ये मुख्य प्रोफाइल्स और पोर्टफोलियो हैं –
https://www.behance.net/yogmaya
http://www.coroflot.com/Yogmaya/portfolio
https://www.linkedin.com/in/sureshdigwal

NWCP Championship and ICF Awards 2016 Winner

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*) – Thrilled to have won the inaugural ‘War of Kalam’ contest by New World Comics Publication – NWCP….I was impressed with the talent of the young writers and their hunger for genres like horror, comedy, adventure, superheroes and crime fiction.Congratulations to finalists Abhishek, Fahad and Himanshu. Special Mention – Ankur, Rishav and Rajneesh.

Performance Breakdown (NWCP WOK: 20 September 2016 – 10 October 2016)
Round 1 – Rank #05/29 (Theme: General)

Round 2 – Rank #01/09 (5-theme mix – Horror, Comedy, Crime fiction etc)

Round 3 (Final) – Rank #01/04 (Create a Character Universe)

….will soon share the stories.

#NWCP #WOK #warofkalam #mohitness #mohit_trendster #trendybaba #ज़हन

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*) – Comics Memories Podcast Series and Kavya Comics Series won Bronze Position (Best Fan work of the year) and Silver Position (Best Webcomic) respectively in Poll based 4th Annual Indian Comics Fandom Awards 2016 #ICF_2016.

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#ICFA_2016 Results (Indian Comics Fandom Awards 2016)

List of ICF Awards 2016 winners (8 Poll based award categories)
 
Winners (Gold Positions)
*) – Best Cartoonist: Mrinal Rai
*) – Best Fan Artist: Anuj Kumar
*) – Best Blogger-Reviewer: Youdhveer Singh
*) – Best Fan Work: Doga Song (Warwan Band)
*) – Best Fanfiction Writer: Adesh Sharma
*) – Best Comic Collector: Sagar Jung Rana
*) – Best Webcomic: The Beast Legion (Jazyl Homavazir)
*) – Best Colorist (2) – Naval Thanawala, Nishant Maurya
Silver Positions (Runner-ups)
*) – Best Cartoonist: Jazyl Homavazir
*) – Best Fan Artist: Amitabh Singh
*) – Best Blogger-Reviewer: Jagmeet Sidhu
*) – Best Fan Work: Shaktimaan is Back Video (DK Films, 60 Hertz Studios)
*) – Best Fanfiction Writer: Bramha Patel
*) – Best Comic Collector: Manoj Pandey
*) – Best Webcomic: Kavya Comics (Mohit Trendster)
*) – Best Colorist – Harendra Saini
Bronze Positions (Rank #03)
*) – Best Cartoonist: Neerad
*) – Best Fan Artist: Anand Singh
*) – Best Blogger-Reviewer: Ashwani Dwivedi
*) – Best Fan Work (2): Comics Memories Podcast Series ( Mohit Trendster), Roar of Indian Superheores Series (PK Brothers)
*) – Best Fanfiction Writer: Navneet Singh
*) – Best Comic Collector: Heera Lal Bhardwaj
*) – Best Webcomic: The Last Ancients (Akshay Katnaur)
*) – Best Colorist: Manabendra Majumder
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Indian Comics Fandom Awards 2016 Album 
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#Update Indian Comics Fandom Awards 2016

Nominations are now being accepted for the Indian Comics Fandom Awards 2016 in order to recognize the efforts, achievements of Indian Comic fans and creatives.

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*) – Best Blogger

*) – Best Cartoonist

*) – Best Colorist

*) – Best Reviewer

*) – Best Comics Collector

*) – Best Fanfiction Writer

*) – Best Fan Artist

*) – Best Fan Work (Comic, Video, Music etc)

*) – Best Webcomic

*) – Best Cosplayer

भारतीय कॉमिक्स फैन के प्रकार (भाग #1)

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किसी व्यक्ति, उत्पाद या उद्योग के प्रशंसक कई प्रकार के होते हैं और अनेको लोगो की रोज़ी-रोटी फैन्स पर निर्भर होती है। हर जगह की तरह फैन के पॉजिटिव/नेगेटिव पहलु होते हैं। आज हम भारतीय कॉमिक्स के तरह-तरह के प्रशंसकों के बारे में बात करेंगे। संभव है कि फैन्स खुद को एक से अधिक श्रेणी में पाएं, तो शुरू करते हैं।

Original Post (Culturepopcorn Website)

बरसाती फैन: ऐसे फैन हाल की किसी घटना, फिल्म, टीवी सीरीज से प्रेरित होकर कॉमिक्स कम्युनिटी में जोश के साथ आते हैं। बड़े उत्साह के साथ “तिरंगा कैप्टन अमेरिका की कॉपी है”, “डायमंड कॉमिक्स में डीसी वाली बात नहीं”, जैसे स्टेटमेंट देते हैं। फिर अचरच में पड़ते हैं कि रेस्पॉन्स क्यों नहीं मिल रहा। यहाँ जमे Indian Comics के पुराने फैन्स इस अचरच में होते हैं कि 2 दशक पहले याहू चैट, रैडिफ मेल से चले आ रहे सवाल कुकुरमुत्ता प्रशंषको को नए कैसे लग सकते हैं? खैर अक्सर कम्युनिटी, ग्रुप्स के अन्य सदस्यों से बॉन्डिंग न होने के कारण ऐसे मित्र 1 हफ्ते से लेकर 6 महीनो के अंदर हमेशा के लिए संन्यास ले लेते हैं। इस बीच इनके सोशल मीडिया पर कुछ कॉमिक्स प्रेमी मित्रों का जुड़ना इनके लिए बोनस है।

आई, मी और मैं फैन: ओहो भाई साहब! ये लोग किसी के फैन हों ना हों अपने सबसे बड़े फैन होते है। इनके शरीर में आत्ममुग्धता का हॉर्मोन अलग से सीक्रीट होता है। कम्युनिटी, ग्रुप या असल जीवन में ये लोग बस अपने बारे में बातें और अपना प्रमोशन करने में लगे रहते हैं। देखो मेरा गोपीनाथ मुंडे, भैंस के लुंडे हार्डकवर कलेक्शन, देखो मैं उल्टा आइस क्रीम कोन खा रहा, देखो मेरा दादी माँ के नुस्खे वाला पेज (जिसका कॉमिक से कोई सरोकार नहीं पर ढाई सौ रुपये देकर हज़ार लाइक करवा लिए हैं तुम्हे जलाने को), देखो मुझे बैंगनी कुतिया ने काट लिया, हम किन्नौर के शहज़ादे अभी फॉलो करो। कॉमिक्स से जुडी कोई अपडेट इनसे ना के बराबर गलती से निकलती है या तब निकलती है जब इन्हें अपना कुछ प्रमोट करना हो।

वेटरन फैन: ये फैन बरसाती फैन्स के विलोम होते हैं। व्हाट्सएप्प, फेसबुक, ट्विटर फलाना हर जगह अगर कॉमिक से जुड़ा कोई समुदाय बनता है तो इन्हें बाय डिफ़ॉल्ट उसमे शामिल कर लिया जाता है। हालांकि, वर्षों से सक्रीय रहने की वजह से इनमें पहले की तरह भयंकर जज़्बा तो नहीं रहता पर फिर भी इनकी एक्टिविटी दिख जाती है। कुछ प्रशंसक कॉमिक्स कम्युनिटी को बढ़ाने और अन्य जुडी बातों में इतना योगदान दे डालते हैं कि एक समय बाद इन्हें किसी क्रिएटिव जैसी इज्जत मिलने लगती है। ये जब किसी कॉमिक इवेंट में जाते है तो कई लोग इन्हें आसानी से पहचान लेते हैं। समय के साथ कई वेटरन सन्यासी हो जाते हैं पर फिर भी इनके काम की वॉल्यूम इतनी होती है कि इनका नाम गाहे-बगाहे आता ही रहता है।

नकली वेटरन फैन: वैसे इनके खाते में बड़ा योगदान या कोई नोटेबल काम नहीं होता फिर भी इनका बहुत नाम होता है। आम जनता इन्हें वेटरन सा ही सम्मान देती है। ये फैन्स कभी बरसाती हुआ करते थे जिन्होंने संन्यास तो नहीं लिया पर अब 4 महीनो में एक बार कॉमिक्स पर डेढ़ पैराग्राफ वाला कमेंट या अपडेट मार कर समझ लेते हैं कि इनका धर्म निभ गया। इस Recurring डेढ़ पैराग्राफ और कभी-कभार के लाइक से धीरे-धीरे कम्युनिटी को इनका नाम याद हो जाता है और ये बड़े कॉन्फिडेंस से वेटरन श्रेणी की सीट झपट लेते हैं। कुछ ग्रुप के तो ये गुडविल एम्बेसडर तक बन जाते हैं फ्री-फण्ड में।

येड़ा बनके पेड़ा खाने वाले फैन: कुछ लोग मृदुभाषी, “भोले-भाले मगर गज़ब के चालाक फाइटर दोस्त” होते हैं। उदाहरण के तौर पर बड़ी कम्युनिटी के कई सदस्यों से छोटे-छोटे फेवर लेते हुए अपना बड़ा करना…कलेक्शन! ताकि किसी पर बोझ भी ना पड़े और हमारा छप्पर भी फट जाए। इतना ही नहीं अपनी बातों से कलाकारों, प्रकाशकों पर डालडा की इतनी परत चुपड़ देते हैं कि समय-समय पर इन्हें कुछ ख़ास गिफ्ट्स, प्राइज आदि स्पेशल ट्रीटमेंट मिलते रहते हैं। समय बीतने के साथ ये लोग अपने किरदार में टाइपकास्ट और कॉमिक कम्युनिटी में बदनाम हो जाते हैं इसलिए नए शिकार पकड़ते हैं।

कॉमिक प्रशंसकों की कुछ और श्रेणीयां अगले भाग में….

– मोहित शर्मा ज़हन

Beta Testing Units (Indian Comics)

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नमस्ते! यह विचार काफी समय से मन में है और संजय गुप्ता जी से साझा कर चूका हूँ हालांकि उस समय विस्तार से समझा नहीं पाया था पर जितना उन्होंने सुना था उन्हें पसंद आया था। मित्रों, प्रो रसलिंग आप देखते होंगे या उसके बारे में थोड़ा बहुत अंदाज़ा होगा। वर्ल्ड रसलिंग एंटरटेनमेंट या डब्लू.डब्लू.ई. के अलावा अमेरिका और विश्व में कई छोटे-बड़े रसलिंग प्रोमोशन्स हैं। दक्षिण अमेरिका, जापान और यूरोप में कुछ राष्ट्र स्तर की कंपनी कई दशकों से लोगो का मनोरंजन कर रहीं हैं। इन बड़ी कंपनियों की सफलता इनके रोस्टर (इनके लिए काम करने वाले सभी रसलर) और इनकी शैली पर निर्भर करती है। अपने शोज़ में 2 लोगो के बीच में फ्यूड (रंजिश) बनाने के लिए लड़ाई के अलावा एक सीरियल की तरह यहाँ कई सेगमेंट वाली स्टोरीलाइन होती है, जिसमें रसलिंग के दांव-पेंच के साथ अभिनय, जनता में अपना पक्ष रखना जैसी बातें ज़रूरी होती हैं। इस सबकी मदद से व्यक्ति एक पहलवान से एक किरदार बनता है जो लोगो से अच्छी या बुरी चरम प्रतिक्रिया निकलवाता है। जिसे लोग जीतते हुए या बुरी तरह मार खाते हुए देखना चाहते हैं।

डब्लू.डब्लू.ई. जैसे बड़े प्रोमोशन नए या सीख रहे पहलवान को पहले अपनी डेवलपमेंटल टेरिटरी भेजते हैं। यहाँ सुरक्षित रसलिंग छोटे-छोटे गुर सीखने के अलावा रसलर अपनी क्षमता अनुसार यह जान पाता है कि वह क्या कर सकता है? कौन से किरदार उसपर बेहतर लगेंगे, क्या पहनावा होना चाहिए, बोलने की कौनसी शैली उसपर फब्ती है आदि। इतना ही नहीं अगर किसी अन्य कंपनी से कोई जाना-पहचाना सितारा आता है तो पहले उसे भी डेवलपमेंटल यूनिट में समय बिताना पड़ता है ताकि वो कंपनी के माहौल, शैली से सामंजस्य बिठा सके। अब आती है पते कि बात, अन्य क्षेत्रों की ट्रेनिंग से उलट यहाँ रसलर जनता के बीच और टेलीवजन पर शोज़ करते हैं, सीखते हैं। इसका मतलब मुख्य कंपनी के स्केल से छोटा दूसरे दर्जे का शो जिसमे लोग आते हैं, टेलीविजन पर प्रसारित होता है। डब्लू.डब्लू.ई. में NXT ऐसा शो है, जो कंपनी को काफी मुनाफा और पब्लिसिटी देता है। इन ट्रेनिंग यूनिट्स के कुछ फायदें हैं –

1. अगर ट्रेनिंग यूनिट अच्छा करती है तो मुख्य कंपनी श्रेय लेती है कि “आखिर यूनिट किसकी है?” और अगर यूनिट का प्रदर्शन अच्छा नहीं तो भी मुख्य कंपनी उसको दोयम दर्जे की ट्रेनिंग यूनिट बता कर पल्ला झाड़ लेती है कि ट्रेनिंग फेज में ऊंच-नीच चलती है।
2. इस माध्यम से बहुत से ऐसे प्रयोग किये जा सकते हैं जो मुख्य कंपनी के प्रारूप में संभव नहीं या जिनपर शक है कि यह प्रयोगात्मक आईडिया चलेगा या नहीं? फिर वही ऊपर लिखी बात प्रयोग सफल हुआ तो मुख्य कंपनी के चैनल में वाहवाही लो, नहीं हुआ तो आई-गयी बात!
3. यहाँ कई युवा, प्रतिभावान लोगो का काम देखने का मौका मिलता है। 2 या अधिक लोगो के साथ किये काम का अवलोकन किया जा सकता है कि क्या ये दोनों मुख्य रोस्टर में फिट बैठेंगे।
4. यूनिट अगर चल निकले तो अच्छा पैसा भी बनाया जा सकता है।

मेरा विचार यह था कि ऐसी डेवलपमेंटल यूनिट की तरह अगर बड़ी कॉमिक कंपनी जैसे राज कॉमिक्स, कैंपफायर उभरते कलाकारों, लेखकों के लिए ऐसा कुछ करें तो यह सबके लिए फायदे का सौदा होगा। जैसे युवा कलाकार, लेखक, इंकर और कलरिस्ट की कॉमिक्स को अपनी वेबसाइट, पेज पर जगह देना या अलग नाम से (जैसे RC Gen-Next, Campfire Yuva) साइट और पेज पर पोस्ट करना, प्रिंट ऑन डिमांड या सीमित संख्या में प्रकाशित करना। इस से कलाकारों को बड़ी कंपनी का बैनर मिलेगा, 2 सेट या इवेंट के बीच में जो लंबा गैप होता है वो भर जाएगा और यह माध्यम ज़्यादा लोगों तक कॉमिक्स को पहुंचाएगा।
यह विचार कितना व्यवहारिक है? आप लोगो को यह जंच रहा है ज़रूर बताएं! धन्यवाद!

– मोहित शर्मा ज़हन

Original Post – Indian Comics Fandom FB Page

Interview With Comics Artist Tadam Gyadu (Comics Reel)

tadam

Tadam Gyadu is a self learnt young emerging comics artist from Arunachal Pradesh, one of the north-eastern states of India. His second comics Brahmaand Vikhandan released this month, previously he was credited in Adrishya Shadyantra earlier this year, both comics of Nagraj by Raj Comics. He has been a part of many independent comics and freelance works in past and goes by the pseudonym PencilDude. In an exclusive interview with Mohit Sharma, Tadam talks about his art and inspirations.

Q) – Who inspired you to become an artist & how old were you when you started sketching/art?

Tadam – I always had a keen interest in art. When I was in kindergarten, long before comics came into my life, I used to copy the illustrations from my textbooks. Apples, bananas, planes and stuff, We also had some “life of the Buddha” books in our home, I copied their illustrations too. later, when passed to class three, i got my first comic book- So Ja Nagraj – illustrated by Anupam Sinha sir. i instantly fell in love with comics. And started copying those illustrations. I think I was 9 or 10 years old when I first started drawing comic heroes.

Q) – What is the story behind your pseudonym PencilDude?

Tadam – Actually there is no story behind my pseudonym. I know some great artists and writers like munshi premchand , artgerm, manu sir etc who use pseudonyms and I find it kinda cool to have one. So I did some brainstorming and came up with my very own alias – pencildude.

Q) – Were you involved in any creative, extra curricular activities in school?

Tadam – I used to sing, dance, draw and write at school. We had some good extra- curricular activities in school and I took part in most of them except sports, I am terrible at it.

Q) – What is/are your favorite genre(s)?

Tadam – My favorite genres are fantasy and sci-fi with some philosophy.

Q) – Other hobbies and pastimes besides art? 

Tadam – Other than art, I like to enjoy music, movies and books.

Q) – Tell us more about your upcoming projects?

Tadam – As of now, I am not involved in any project. I am focusing on honing my skills. So I am taking some time off. I will be back pretty soon.

Q) – Who are your role models or people you look up to in art & life (and why)?

Tadam – In art, there is not a particular one whom I consider my role model. Anupam sir, who drove me into comics art. Sir David finch, from whose tutorial videos I learnt a lot of technical things of comic art. Dheeraj dkboss kumar, Lalit Sharma, Sumit kumar, abhishek malsuni sir are some who taught me many things. In short, I follow whoever is good and try to use their plus points into my own style. In life, my mother and my Grandpa are my role models. They inspire me to do whatever I do and I would not have been I, if they were not with me.

Q) – Where do you see yourself 10 years from now?

Tadam – I see myself practicing to make myself better.

Q) – What advice would you give to young artists who want to pursue art as career?

Tadam – Well, I am an amateur myself, so I don’t have anything of my own to say. But I would like to pass on something, which the great Mukesh singh had said in an interview for the newcomers : be the first __________. (fill your name on the blank).

Q) – Your best artwork till date?

Tadam – I can’t decide which is the best artwork I did till date because whichever artwork I do, at first it seems pleasing but when I look at it after few days then I laugh at myself, seeing so many silly mistakes. So, I guess that best artwork is yet to come.

Q) – Tell us more about Arunachal’s art scene.

Tadam – As I said already, there is not much scope for an artist in Arunachal. There are no good art colleges, neither are there any publishing houses or production houses which would hire artists. The aspiring artists, who do not have much knowledge about the carriers they can pursue in art, either get interested in other things or become sign board painters, because there is nobody who can guide them. I hope people will get aware soon.

Q) – Share some interesting items from your ‘Bucketlist’ & few random facts about yourself?

Tadam – Let me share them one by one.  (a) I myself came to know about art as a carrier after I passed out class 10 and went out for further studies in Assam. (b) Once I was planning to be an Engineer. Thank God, I wasn’t that Good in studies. © I don’t like living in cities, maybe because I lived most of my life in village. I think that’s all in my mind right now.

Interview by Mohit Trendster

Domuha Aakrman – दोमुँहा आक्रमण (Freelance Talents)

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Illustrator – Tadam Gyadu (PencilDude)

Author – Mohit Sharma (Trendster)

Colorists – Harendra Saini, Dheeraj Dkboss Kumar

Calligraphy – Youdhveer Singh

Pages – 13, Symbolism-Historic Fiction Comic

Available – Dailyhunt, Readwhere, ISSUU, Comics Reel and allied websites/portals.

#freelance_talents

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