Oct 2018 Updates #mohit_trendster

Freelance Talents nomination certificate India 5000 Best MSME Award 2018

Event – Sooraj Pocket Books: Baaten, Kitaben, Mulaqaten #2 (30 September 2018)

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Google Local Guides Level #06

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Event appearance News Dainik Jagran (October 2018) and Dainik Bhaskar (September 2018)

 

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Dawriter Top Writers list

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Chess24 stats

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Super Cricket Level 10

Interview with Author Ajay Kumar Singh (Part #01)

Interview (Part #02)

Ullas ki Aawaz (Hindi Story) #Zahan

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जीव विज्ञानी डॉक्टर कोटल और उनके नेतृत्व में कुछ अनुसंधानकर्ताओं का दल प्रशांत महासागर स्थित एक दुर्गम द्वीपसमूह पर कई महीनों से टिका हुआ था। उनका उद्देश्य वहाँ रहने वाले कबीलों में बेहतर जीवन के लिए जागरूकता फैलाना था। स्थानीय धर्म सूमा के रीती-रिवाज़ों में हज़ारों कबीलेवासी अपनी सेहत और जान-माल से खिलवाड़ करते रहते थे। इतने कठिन और अजीब नियमों वाले सूमा धर्म में जागरूकता या बदलाव के लिए कोई स्थान नहीं था। अलग-अलग तरीकों से कबीले वालों को समझाना नाकाम हो रहा था। वीडियो व ऑडियो संदेश, कबीलों के पास खाद्य सामग्री या दवाई गिराना, रिमोट संचालित रोबॉट से संदेश आदि काम जंगलियों को जागरूक करने के बजाय भ्रमित कर रहे थे।

जब हर प्रयास निरर्थक लगने लगा तो डॉक्टर कोटल ने स्वयं जंगलियों के बीच जाकर उन्हें समझाने का फैसला किया। इस जोखिम भरे विचार पर दल के बाकी सदस्य पीछे हट गये। किसी तरह डॉक्टर केवल अनुवादक को अपने साथ रहने के लिए समझा पाये। बिना सुरक्षा के जंगली सीमा में घुसते ही दोनों को बंदी बना लिया गया। कुछ कबीलों की संयुक्त सभा में डॉक्टर और अनुवादक को एक खंबे से बाँध कर उनकी मंशा और पिछले कामों के बारे में पूछा गया।

डॉक्टर ने अपनी तरफ से भरसक कोशिश की, और अपनी बात इस तरह ख़त्म की – “….हम आपके दुश्मन नहीं हैं। बाहर की उन्नत दुनिया में यहाँ फैले कई रोगों के इलाज और परेशानियों के हल हैं। एक बार हमें मौका देकर देखिए।”

अपनी जान के लिए कांपते और डॉक्टर को कोसते अनुवादक ने तेज़ी से कोटल की बात को जंगलियों की भाषा में दोहराया।

जवाब में कबीलों के वरिष्ठ सदस्य ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। उन्होंने अनुवादक को बताया की सूमा धर्म सबसे उन्नत है और बाकी बातें व्यर्थ हैं। डॉक्टर कोटल को सूमा के ईश्वर ने उन सबकी परीक्षा लेने के लिए भेजा है।

अचानक अंतरिक्ष से गिरा एक विशालकाय पत्थर डॉक्टर कोटल और उनके अनुवादक पर बरसा और दोनों की मौके पर ही मृत्यु हो गयी। कोई बड़ी उल्का पृथ्वी का वायुमंडल पार करते हुए बड़े टुकड़ो में उस द्वीपसमूह पर बरसी थी।

इस घटना में कोई जंगली नहीं मरा। उन सबका विश्वास पक्का हुआ कि उनके धर्म से ना डिगने के कारण वो ज़िंदा रहे जबकि बाहरी अधर्मी लोग मारे गये। सभी उल्लास में “हुह-हुह-हुह…” की आवाज़ निकालकर नृत्य करने लगे।

जंगली नहीं देख पाये कि उल्का के कई टुकड़े सुप्त ज्वालामुखी में ऐसे कोण पर लगे की वह जाग्रत होकर फट गया। गर्म लावे का फव्वारा द्वीपसमूह पर आग की बारिश करने लगा। कुछ देर पहले तक सूमा धर्म के गुणगान गाते जंगली जान बचाकर भागने लगे। अधिकांश गर्म बरसात में मारे गये और जो ओट में बच गये उनकी तरफ आग की नदी तेज़ी से बढ़ रही थी। फिर भी अगर कोई बच गया तो उल्कापिंडो से समुद्र में उठी सुनामी कुछ मिनटों में दस्तक देने वाली थी। ज़मीनी सतह से काफी ढका होने के कारण दबाव में ज्वालामुखी भी उल्लास में “हुह-हुह-हुह…” की आवाज़ निकाल रहा था…शायद मन ही मन सूमा के ईश्वर का गुणगान और नृत्य भी कर रहा हो।

समाप्त!
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March 2018 Updates

23 March Shaheed Diwas Poetry

*)  – बसंती चोला मैला ना हो…

…तो विदेशी लिबास में ढक लिया,

पीढ़ियों को आज़ाद करने…

अदने से पिंजरे का कश लिया!

गैरों की बिसात पर उसकी बात चल गयी….

कागज़ी धमाके से रानी की चमड़ी जल गयी

गर्म दल की आंच पर मुल्क का ठंडा खून उबालने वाला,

साढ़े तेईस बरस का भगत…गोरी हुक़ूमत पर साढ़े साती लाने वाला….

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*) – आज़ादी की लहर में दोनों रुख के बंदे बहे,

जहाँ नर्म दल के सिपहसेलार बने खुदा…

और प्यादे तक बादशाह हो गये,

वही गर्म दल के शहीद अपने ही देश में…

क्रांतिकारियों से गुण्डे हो गये।

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को उनकी पुण्यतिथि पर नमन!

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Latest release – Kathputli: A Struggle for Control (Short Movie by Freelance Talents)

Available: Vimeo, 4Shared, Dailymotion, Tumblr etc.

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FTC Season 4 in association with Nazariya Now

Promo #01 – Bada Munh, Badi Baat: The Mohit Sharma Podcast Show

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Nazariya Now Presents : Bada Munh, Badi Baat

”The Mohit Sharma Podcast Show”

Hindi, English

Coming Soon….

नज़रिया नाउ के सौजन्य से एक ऑडियो-पॉडकास्ट शो शुरू कर रहा हूँ। इस पॉडकास्ट शो में सामाजिक, हास्य, कला, प्रेरणादायक विषयों पर बोलूँगा, कभी काव्य-कहानी भी होंगी। आशा है इस नये माध्यम से आप सबके मन में और अधिक जगह बना सकूँ।

Available: Vimeo, Soundcloud, 4Shared, Clyp, Dailymotion, Tumblr etc.

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काल्पनिक निष्पक्षता (कहानी) #hindi_kahani

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“जगह देख कर ठहाका लगाया करो, वर्णित! तुम्हारे चक्कर में मेरी भी हँसी छूट जाती है। आज उस इंटरव्यू में कितनी मुश्किल से संभाला मैंने…हा हा हा।”

मशहूर टीवी चैनल और मीडिया हाउस के मालिक शेखर सूद ने दफ़्तर में अपनी धुन में चल रहे अपने लड़के वर्णित को रोककर कहा।

वर्णित – “डैडी! आज हर इंटरव्यू में कैंडिडेट बोल रहे थे कि हमारे चैनल में वो इसलिए काम करना चाहते हैं क्योंकि हमारा चैनल निष्पक्ष है। उसपर आप जो धीर गंभीर भाव बनाते थे उन एक्सप्रेशंस को देख कर खुद को रोकना मुश्किल हो गया था।”

शेखर – “हप! मेरे हाथों पिटाई होगी तेरी किसी दिन। हा हा…”

पास ही कॉफ़ी ले रहा शेखर का छोटा लड़का शोभित समझ नहीं पा रहा था कि इसमें हँसने वाली क्या बात है। उसका चेहरा देख वर्णित ने उसे अपने केबिन में बुलाया।

वर्णित – “क्या छुटकू! जोक समझ नहीं आया?”

शोभित – “हाँ भाई, हम तो एथिक्स वाली सच्ची, निष्पक्ष पत्रकारिता का हिस्सा हैं ना? सब यही बोलते हैं और सिर्फ हमें दिखाने को नहीं…जो लोग नहीं भी जानते मैं कौन हूँ, उनसे भी यही फीडबैक मिला है। यहाँ तक की अंतरराष्ट्रीय एजेंसीज़, यूट्यूब – सोशल मीडिया हर तरफ अधिकतर लोग हमारे मीडिया हाउस को ऐसा ही बोलते हैं। आपको तो सब दिखाता ही रहता हूँ मैं अक्सर…”

वर्णित – “इस सब्जेक्ट पर मैं तुझे समझाने वाला था, मुझे लगा तू खुद समझ जाये तो बेहतर होगा। कोई बात नहीं, पहली बात निष्पक्ष पत्रकारिता, एथिक्स वाला मीडिया नाम की कोई चीज़ नहीं होती। बस के खाई में गिरने से 5 लोगों की मौत जैसी प्लेन ख़बरों के अलावा बयान, घटना, विवरण, निष्कर्ष सब इस बात पर निर्भर करते हैं कि किस मीडिया में पैसे का स्रोत क्या है और ऊपर के मैनेजमेंट से कौन लोग जुड़े हैं।”

शोभित – “….लेकिन हम तो हर तरह की खबर लोगो के सामने लाते हैं। हर राजनैतिक दल, विचारधारा की अच्छी-बुरी बातें प्रकाशित करते हैं।”

वर्णित – “अरे भोले मानुस, ऐसा तुम्हें और जनता को लगता है बल्कि ऐसा हम ‘लगवाते’ हैं। किस पक्ष का कितना पॉजिटिव, कितना नेगेटिव सामने रखते हैं ये भी मायने रखता है। हमारा एक मॉडल है वो समझाता हूँ। हमारी प्रिंट न्यूज़ और टीवी चैनल का एक बड़ा हिस्सा न्यूट्रल, फील गुड़ या किसी सामाजिक कल्याण वाली बातों से जुड़ा होता है ताकि एक बड़ा वर्ग हमें देखे, खरीदे और उनके मन में हमारी अच्छी छवि बने। दूसरा भाग राजनीति, विचारधारा….सीधा बोलें तो लोगों में ‘तेरा-मेरा’ वाली बातें। अब अंदर की बात से समझो, शब्दी दल अपनी याड़ी पार्टी है और जो अपनेआप हमें उनकी विरोधी पार्टी महाक्रांति दल का एंटी बना देती है।”

शोभित – “पर…”

वर्णित – “ये लेकिन-पर को सर्जरी करवाकर निकलवा क्यों नहीं लेता तू? बार-बार का टंटा ख़त्म हो। सुन, अब हम क्या करते हैं, न्यूट्रल ख़बरों के बीच में अप्रत्यक्ष विश्लेषण और ख़बरों को काट-छांट कर शब्दी दल की सकारात्मक प्रेस और महाक्रांति की रेड़ मारती प्रेस। रिकॉर्ड के लिए इतना अनुपात ज़रूर रखते हैं कि कहने को हो सके कि देखो हम तो शब्दी दल की निंदा, उनपर सवाल उठाती न्यूज़ भी प्रकाश में लाते हैं। मैंने एक सॉफ्टवेयर बनवाया है अपनी वेबसाइट और चैनल के लिए। यह सॉफ्टवेयर समय और ख़बरों की संख्या के हिसाब से बताता है कि किस तरह खबरों के बीच में अपने एजेंडे वाली ख़बरें परोसनी हैं। लंबे समय तक ऐसा होने पर लोगों के मन में एक विचारधारा के प्रति पूर्वाग्रह, गलत बातें बैठ जाती हैं और दूसरे खेमे को बेनिफिट ऑफ़ डाउट मिलता रहता है। काम की बात ये है कि अपना पैसा और नाम बनता रहता है।”

यह सब सुनकर शोभित को तो जैसे अपना जीवन ही झूठ लगने लगा था। उसे आश्चर्य हुआ कि सम्मानित होते समय, लोगों से तारीफें सुनते हुए उसके पिता और बड़े भाई सीधा चेहरा कैसे रख लेते हैं। उसके विचारों को वर्णित के धक्के ने तोडा।

वर्णित – “अच्छा अब तू कोई हीरो वाला स्टंट करने की तो नहीं सोच रहा ना? हमारा मीडिया हाउस सुधारने के लिए कैंपेन। मत सोचना! वो सब फिल्मों में होता है। यहाँ करेगा तो पापा तेरा वेज मंचूरियन बनवा देंगे।”

शोभित में अभी इतनी हिम्मत ही कहाँ थी? “शायद कुछ सालों बाद…” इतना सोच नज़रे झुकाकर शोभित अपने केबिन की तरफ बढ़ गया।

समाप्त!
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#ज़हन

Art – Eigeiter H.

 

प्रतिक्रियाओं पर प्रतिक्रिया (हर कलाकार के लिए लेख) #ज़हन

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हर प्रकार के रचनात्मक कार्य, कला को देखने वाले व्यक्ति की प्रतिक्रिया अलग होती है। यह प्रतिक्रिया उस व्यक्ति की पसंद, माहौल, लालन-पालन जैसी बातों पर निर्भर करती है। आम जनता हर रचनात्मक काम को 3 श्रेणियों में रखती है – अच्छा, ठीक-ठाक और बेकार। हाँ, कभी-कभार कोई काम “बहुत बढ़िया / ज़बरदस्त” हो जाता है और कोई काम “क्या सोच कर बना दिया? / महाबकवास” हो जाता है। रचनाकार को अधिकतर ऐसे ही रिव्यू मिलते हैं।

इन रिव्यू से केवल ये पता लगाया जा सकता है कि फलाना श्रेणी का काम फलाना तरह के लोगों को पसंद या नापसंद आता है। उदाहरण – किसी निरक्षर व्यक्ति को गूढ़ वैज्ञानिक कमेंट्री वाला रोचक प्रोग्राम भी बेकार लगेगा या एक ख़ास अंदाज़ की कॉमेडी की आदत वाले दर्शकों को उस से अलग प्रयोगात्मक हास्य बेवकूफी लगेगा। कलाकार को ऐसे मत को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। अगर आप व्यावसायिक काम कर रहें हैं तो अपने दर्शकों-श्रोताओं-पाठकों की पसंद समझने में ये डेटा काम आ सकता है। प्रयोग करते रहना और सही प्रतिक्रियाओं के अनुसार काम का अवलोकन करना महत्वपूर्ण है। आम फीडबैक के बीच-बीच में कलाकार के लिए खज़ाना यानी कंस्ट्रक्टिव रिव्यू छुपे होते हैं। ऐसी प्रतिक्रियाओं-समीक्षाओं को पहचानना आसान काम है। ये रिव्यू कुछ बड़े होते हैं और इनमें आम जेनेरिक मत से अलग बातें लिखी होती हैं। (यहाँ अक्सर किसी वेबसाइट की सामग्री (कंटेंट) बनाने की खानापूर्ति वाले या पेड रिव्यू की बात नहीं हो रही है।) उन बातों का अवलोकन कर कलाकार जान सकता है कि जो समूह उसकी कला समझ रहे हैं, उन्हें कला में क्या कमी, संभावनाएं दिख रही हैं जो कलाकार की नज़रों से बच गयीं।

आमतौर पर प्रयोग को काफी नकारात्मक प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ता है। इसमें निराश होने वाली कोई बात नहीं है क्योकि प्रयोगों से ही हमें पता चलता है कि जितना ज्ञात संसार है उसके आगे क्या और कैसे किया जा सकता है। साथ ही निरंतर प्रयोग से कलाकार को अपनी खूबियों और कमियों का पता चलता है। अगली बार प्यार-मोहब्बत फीलगुड़, सास-बहु, लाइट एंटरटेनमेंट (इन श्रेणियों में भी कोई बुराई नहीं) की आदत वाली आम जनता को अगर उनकी आदत के अलावा कुछ परोसें तो सीमित अपेक्षा ही रखें। स्वयं से मुग्ध हुए बिना अपना अवलोकन करें, अगर आप ऐसा कर पाते हैं तो अपने सबसे सहायक समीक्षक आप खुद बन जाएंगे।

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Read Ishq Baklol Novel Short Review

Update #Bulk

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*) – 3 upcoming comics Vacuumed Sanctity (with Abhilash Panda), Samaj Bhakshak (with Anand Singh), Untitled (Manabendra Majumder)PHOTO496e

*) – 6 new podcasts on lyrical comedy, noise pollution and art. – SoundCloud Profile

*) – Retired from MMO The Wrestling Game S3 World #39 (August 2017) 😦

*) – Kavya Comics series featured by Nazariya Now

*) – COP Interview

Part 1, Part 2

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*) – Selected as one of the top writers by Dawriter Website.

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*) – 815 Points now…Local Guides Program (Google Maps)

हाँ पता है…(feat. जूता) – सामाजिक कहानी

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सज्जन – “मोहित जी आपको पता है फिलिस्तीन के लोगो पर इजराइल कितना ज़ुल्म कर रहा है? म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय का क्या हाल किया है वहाँ के बहुसंख्यक बौद्ध समाज ने?”

“हाँ जी! पता है…और मुझे नाइजीरिया में बोको हराम द्वारा सरकार से युद्ध और स्थानीय लोगो का नरसंहार पता है, दशकों से इराक़ और तुर्की द्वारा लगातार कुर्द, यज़ीदी समुदाय की एथनिक क्लेंज़िंग पता है, पाकिस्तान, ईरान के विरुद्ध बलूचिस्तान के लोगो संघर्ष पता है, अंगोला में चल रही कबीना लड़ाई पता है, रूस-चेचेन्या क्राइसिस पता है, रूस-यूक्रेन युद्ध पता है, इंडोनेशिया और पपुआ निवासियों के कुछ वर्गों की लड़ाई पता है, कोलंबिया, मेक्सिको और दक्षिण अमेरिकी देशों में नशे के व्यापार में चल रहे संघर्ष पता हैं, इतना ही नहीं माली, सूडान, दक्षिण सूडान, सीरिया, कांगो, सोमालिया, यमन, फिलीपींस, अफगानिस्तान, केंद्रीय अफ्रीका गणराज्य में चल रहे गृह युद्धों के बारे में पता है। बाकी दुनियाभर में कई छोटे-बड़े समुदाय आपस में या स्थानीय सरकारों से संघर्ष कर रहे हैं और अनेकों समुदाय संघर्ष करते-करते लुप्त हो गए।

मुझे एक बात और पता है, तुम मिडिल क्लास परिवार से हो जिनका जीवन खुद में एक जंग है। पहले अपनेआप को इतना काबिल बनाओ कि किसी गलत को सही कर सको, अपने परिवार से बाहर भी लोगो की मदद कर सको। अगर ऐसा ना कर पाओ तो गलत को गलत ज़रूर कहो पर फिर हर तरह के गलत को गलत कहो पर तुम तो मज़हब के हिसाब से ज़ुल्म देख रहे हो जो गलत है। अगर तुम्हे हर ज़ुल्म पर एक जैसा दर्द नहीं होता तो थू है तुम्हारी सोच पर! अब आगे क्या करना है पता है ना?”

सज्जन – “हाँ मोहित जी! मैं जूता उठाकर अपने मुँह पर मार लेता हूँ।”

“अरे नहीं भाई, मेरा मतलब था कि अब काम पर ध्यान दो और तरक्की करो…ताकि जिन बातों पर परेशान होते हो उन्हें बदलने की कोशिश करने लायक बन सको।”

कुछ देर बाद –
सज्जन – “समझ गया! मैं चलता हूँ।”

“रुको! मुँह इधर करो, जूता तो खाते जाओ।”

समाप्त!
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– #मोहित_शर्मा_ज़हन
Artwork – Neil Wilson
#mohitness #civilwars #crisis #selectiveoutrage #media

झुलसी दुआ (कहानी) #ट्रेंडस्टर

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सरकारी नौकरी की तैयारी में कई वर्ष बिताने के बाद सोमेश का चयन अग्निशमन कर्मी पद पर हुआ। जहाँ घरवालों में जोखिम भरी नौकरी को लेकर सवाल और चिंता थी वहीं सोमेश के तो जैसे मन की मुराद पूरी हो गयी थी। बचपन में वो सुपरहीरो बनना चाहता था, फ़िल्मी हीरो नहीं बल्कि लोगो की मदद करने वाला असली हीरो। बड़े होते-होते उसे दुनिया की ज़मीनी सच्चाई पता चली और उसने हीरो बनने का विचार तो छोड़ दिया पर लोगो की मदद करने वाले किसी क्षेत्र में जाने की बात ने उसके बचपन का सुपरहीरो फिर से जगा दिया। समाजसेवा के साथ-साथ जीविका कमाना और क्या चाहिए?

साधारण वेतन और जान के खतरे वाली नौकरी पर असमंजस में पड़े माँ-बाप और बड़ी बहन को किसी तरह मनाकर सोमेश ट्रेनिंग पर निकल गया। फायर फाइटिंग के अभ्यास में सोमेश अपने बैच में सबसे आगे था। उसके पास रहने से उसके साथी जोश, सकारात्मकता से भर जाते थे। सोमेश से पिछड़ने के बाद भी सभी उसे पसंद करते थे। ट्रेनिंग के बाद सोमेश की पहली नियुक्ति दिल्ली में हुई। उसके छोटे कस्बे की तुलना में दिल्ली जैसे पूरी दुनिया था। जहाँ उसे अपनी जगह का आराम पसंद था वहीं महानगर की चुनौती का अपना ही मज़ा था। जब उसने सुना कि दिल्ली के कुछ इलाकों में 1 वर्ग किलोमीटर में 12,000 तक लोग रहते हैं तो किसी छोटे बच्चे की आँखों जैसा अविश्वास भर गया उसमें। गर्मी के मौसम में शहर में ख़ासकर औद्योगिक क्षेत्रों में लगने वाली आग के मामले बढ़ने लगे थे। अपनी शिफ्ट में सोमेश की दमकल वैन रोज़ाना 2-3 जगह जा रही थी, शिफ्ट ख़त्म होने के बाद भी ज़रुरत पड़ने पर सोमेश पास के अपने कमरे से फायर स्टेशन पहुँच जाता था। अपनी ड्यूटी के समय से बाहर या अधिक काम करना उसके लिए इतना सामान्य हो गया था कि उसके सीनियर अधिकारीयों, सहकर्मियों ने यह बात नोट करनी तक बंद कर दी थी। उसके दोस्त हँसते थे कि दुनिया में सबसे पॉजिटिव इंसान सोमेश है, इतना ज़िंदादिल तो फिल्मों के हीरो तक नहीं होते। सोमेश वापस उन्हें कहता कि वो सब भी आशावान बनें, हमेशा अच्छा सोचें, अपने भगवान या उपरवाले पर भरोसा रखें क्योकि जिस भी जगह पर वह गया वहाँ लोग आग, भूकम्प आदि से घायल तो हुए पर किसी की जान नहीं गयी।

उसकी दिनभर की थकान नींद से कम बल्कि घरवालों से घंटे-आधा घंटे बातें कर ज़्यादा ख़त्म होती थी। अक्सर उसने कितने लोगो को कैसे बचाया, कैसे बीमारी में भी स्टेशन आने वालो में सबसे पहला वो था, कैसे घायल पीड़ित के परिजन उस से लिपट गए, कैसे ट्रैफिक में कुछ देर हो जाने पर उनपर भीड़ ने पत्थर बरसाए या उनकी पिटाई तक की।

“माँ! आज आप मानोगी नहीं। सीढ़ी पर से झूलकर बिल्डिंग से गिरता हुआ बच्चा पकड़ा मैंने, पूरे मोहल्ले ने आशीर्वाद दिया मुझे। कोई कपडे दे रहा था, कोई वैन में घर पर बनाई मिठाई ज़बरदस्ती रख गया। बच्चे की माँ तो अपना सोने का कड़ा उतार कर दे रही थी पर मैंने लिया नहीं। उसे देख कर आपकी याद आ गयी।”

माँ का मन करता था कि सोमेश बस बोलता रहे। उसकी आवाज़ में जो ख़ुशी झलकती थी वो ही माँ के लिए सबसे बड़ी दौलत थी।

“….फिर ना माँ ओखला में तुरंत दूसरी जगह जाना पड़ा। हम लोगो की गाडी ख़राब हो गई और पहुँचते-पहुँचते लेट हो गए। भीड़ ने घेर लिया और गुस्से में एक आंटी ने संजय के चप्पल बजा दी, बाकी लोग वैन की तरफ बढ़ने लगे तो मैंने माइक से समझाया कि देर हो गयी पर जो लोग फँसे हैं उन्हें बचा लेने दो फिर पीट लेना। राधे-कृष्ण की जो कृपा रही किसी को ज़्यादा चोट तक नहीं आई, सारे लोग बचा लिए।”

माँ बोली – “अपना ध्यान रखा कर। बेटा हर जगह ऐसे मत बढ़ा कर, कहीं लोग ना सुने… ”

सोमेश ने माँ को दिलासा दिया – “माँ भगवान आपकी और मेरी हर बात सुनते हैं। इतने महीने हो गए यहाँ मेरे सामने कोई नहीं मरा, ना मुझे कुछ हुआ। कुछेक  बार जलती बिल्डिंग, भूकंप से तहस-नहस घरों में फँसे लोग देखकर जब सबने उम्मीद छोड़ दी तब भगवान से माँगा बस बचा लो आपका सहारा है। जाने कैसे सबको बचा लाये हम लोग। तुम्हारे साथ-साथ दर्जनों लोगो का आशीर्वाद बटोरता हूँ रोज़। सब अच्छा होगा माँ, तुम चिंता मत किया करो।”

सोमेश पर भगवान की कृपा बनी रही और उसकी नौकरी का एक साल पूरा हुआ। एक दिन उसे शहर के बाहरी इलाके में स्थित अपार्टमेंट में लगी आग के मौके पर भेजा गया। अपार्टमेंट के आग के लिए पहले ही कुछ फायर वैन पहुँच चुकी थी पर भीषण आग बिल्डिंग से आस-पास मज़दूरों की बस्तियों में फ़ैल गयी थी। दूर-दराज़ के इलाके और तंग गलियों के कारण लोगो को बचाने में मुश्किलें आ रहीं थी। एक-एक सेकण्ड से लड़ते हुए दमकल कर्मियों के कुछ दल अलग-अलग स्थानों पर फ़ैल गए। सोमेश भगवान का नाम लेता हुआ बस्ती के अंदरूनी हिस्से में फँसे लोगो को बचाने लगा। कुछ देर में स्थिति काबू में आई पर घायलों के लिए इन अंदरूनी इलाकों तक एम्बुलेंस, अन्य मदद आने में काफी समय लगना।

तभी सोमेश की नज़र एक औरत के निर्जीव शरीर के पास खड़े 2 दमकलकर्मियों पर पड़ी। वो दोनों बहस कर रहे थे कि क्या यह औरत ज़िंदा है या नहीं। तेज़ धड़कनों के साथ जब सोमेश पास पहुँचा उसे एक पूरी तरह जल चुकी गर्भवती महिला दिखी। उस महिला ने किसी तरह हाथ की ज़रा सी हरकत से जैसे बहस कर रहे बचावकर्मियों को बताया कि अभी उसमे जान थी। तारकोल की तरह चौथी डिग्री के जले के निशानों के साथ उसका मांस जगह-जगह से उतर रहा था और चेहरे की जगह एक अधभुने मांस का चिथड़ा दिख रहा था। उसका एक हाथ पेट से जलकर पेट से चिपका हुआ था, शायद जलते हुए भी वो अपने बच्चे को दिलासा दे रही थी कि सब ठीक हो जाएगा। दर्द में उसका शरीर हल्की फड़कन कर रहा था। सोमेश ने उसको पानी पिलाने की कोशिश की पर पानी की बूंदों के मांस से छूने से भी वो दर्द से और तेज़ हिलने लगी। सोमेश को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसके साथ ऐसा कुछ हो सकता है। उसके साथ तो अंत में तो सब ठीक हो जाता था। एक सहकर्मी ने बताया कि इस औरत का पूरा परिवार मर चुका है। मदद आने में अभी बहुत समय था और पीड़ित औरत की हालत इतनी ख़राब थी कि सोमेश खुद को उस औरत के बचने की ज़रा सी उम्मीद का दिलासा तक नहीं दे सकता था। बेनाम औरत का दर्द सोमेश से देखा नहीं जा रहा था, नम आँखों से वह घुटनो के बल उसके पास बैठ गया। उसके हाथ बार-बार औरत की तरफ बढ़ते और उसे दर्द ना हो तो शरीर को छूने से पहले ही रुक जाते।

हमेशा हँसमुख, आशावादी रहने वाला, आज जीवन में पहली बार हार मान चुका सोमेश ऊपर देखते हुए रुंधे गले से बोला –  “भगवान बहुत दर्द सह लिया इसने, प्लीज़ इस औरत को मार दो भगवान। इसे अपने पास बुला लो…प्लीज़ इसे मार दो…“

शायद भगवान ने उसकी पुकार सुन ली थी। उस औरत की नब्ज़ चली गई और साँसों का उतार-चढ़ाव भी बंद हो गया। भारी मन से सोमेश बस्ती के अन्य हिस्सों की तरफ बढ़ गया।

समाप्त!
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Artwork – Alok Pawar #mohitness #mohit_trendster #freelancetalents

तेज़ाबी आँखें (कहानी) #ज़हन

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**Warning: Contains Strong Language**

पिछले कुछ समय से सीतापुर स्थित एक स्वयंसेवी संस्था के संचालक अनिक कृष्णन देश और दुनिया की सुर्ख़ियों में छाये थे। एकतरफा प्यार और खुन्दक की वजह से हुए एसिड अटैक के बाद अपनी सूरत की रौनक खो चुकी लड़की रिद्धिमा की सीरत पर अनिक मोहित हो चुके थे। प्रेम परवान चढ़ने पर अनिक ने समाज से दुत्कारी गयी रिद्धिमा को अपने घर और मन में आसरा दिया। अब यह जोड़ा लिव-इन सम्बन्ध में साथ खुश था। किसी स्थानीय पत्रिका द्वारा खबर पकडे जाने पर जैसे गंध लेते हुए अनिक के पास मीडिया का जमावड़ा लगने लगा। हर किसी को अनिक से एक्सक्लूसिव बाईट चाहिए थी, सभी को उसके मन में झांकना था कि दुनिया के घूमने की उलटी दिशा में घूमना कैसा होता है। ऐसे ही एक विदेशी न्यूज़ चैनल के इंटरव्यू में सहजता से अनिक ने अपनी बात का समापन किया…

“…हम सब बाहरी आवरण के पीछे पागल हुए बैठे हैं जबकि आपका, मेरा और सबका जीवन तो अंदरूनी व्यक्तित्व पर टिका है। लोग पूछते हैं कि रिद्धिमा ही क्यों? उसमे ऐसा क्या ख़ास है? अरे झाँकने की हिम्मत तो करो…उस शरीर के 5-7 प्रतिशत जले-खुरदुरे हिस्से की परत के अलावा उसमे पूरी दुनिया समायी है। मेरे लिए रिद्धिमा दुनिया की सबसे सुन्दर लड़की है। जिसे उसकी ‘कमी’ जितनी बड़ी लगती है, उसके अंदर उतना ही ज़्यादा खोखलापन है।”

झंकझोर देने वाले शब्दों के बाद इंटरव्यू ले रहे अनुभवी एंकर के भी हाथ कांपने लगे और कमरे में उपस्थित सभी लोगो के रोंगटे खड़े हो गये। अनिक को तसल्ली हुई कि यह इंटरव्यू भी अच्छा निकला और उसकी बात प्रभावी ढंग से अधिक लोगो तक पहुँचेगी।

घर आकर वह एक महिला के साथ बैठकर बातें करने लगा। रिद्धिमा उन दोनों के लिए खाना लेकर आयी और नज़रे बचा कर कमरे से चली गयी। कुछ देर बाद अनिक ने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया। बंद कमरे में क्या होता था रिद्धिमा को पता था पर उसे दुनिया से अपना चेहरा और अनिक से अपनी नज़रे छुपाने की आदत पड़ चुकी थी। उसके सूट की चुन्नियों पर नाखूनों के कुरेदने से कितने ही पैटर्न बन गये थे। वैसे तो रोज़ का दर्द इतनी टीस नहीं देता पर आज रिद्धिमा के आँसू झर-झर बह रहे थे। 2 साल पहले आज ही के दिन वो अपने ‘सच्चे प्यार’ से मिली थी, बातें करते हुए बीच-बीच अनिक की भूरी आँखों पर जब पलकों का पर्दा गिरता तो आँखों में न झाँक पाने का मिलीसेकंड का ब्रेक भी रिद्धिमा को परेशान करता रहता। तब अनिक की गहरी आवाज़ और चेहरे में खोई रिद्धिमा अपने चेहरे का पर्दा भूल जाती थी। केवल एक वो ही तो था जो जला चेहरा देखकर अपने चेहरे पर दया, घृणा या परेशानी के भाव नहीं लाता था। अब साथ रहकर बाहरी और अंदरूनी का फर्क वो साफ़ देख सकती थी। कहना, सोचना आसान था कि यह नर्क छोड़ क्यों नहीं देती, पर अब उसमे और संघर्ष की शक्ति नहीं थी। अनाथालय से सामाजिक केंद्र में मौत के इंतज़ार से बेहतर झूठे ही सही अपने प्यार के काम आना। रिद्धिमा के कारण अनिक को देश-दुनिया में शोहरत ही नहीं बल्कि उसकी संस्था को सरकार, विदेशी संस्थाओं द्वारा आर्थिक मदद भी मिल रही थी। हालाँकि, संस्था को मिल रहे पैसे, मदद का अधिकांश हिस्सा अनिक अपने दोस्तों-रिश्तेदारों और अपने शौक पूरे करने में बहा दिया करता था। अक्सर उसे किसी सेमिनार, इवेंट में अथिति के रूप में बुलाया जाता जहाँ ना चाहते हुए भी उसे रिद्धिमा को अपने साथ ले जाना पड़ता। बाहर कहीं भी लोगो से घिरे होने पर अनिक की भूरी आँखों में अपनेआप दिखावटी भोलापन आ जाता था और उनमे फिर से डूबकर रिद्धिमा खुद पर मुस्कुरा देती। अनिक को प्यार से निहारती रिद्धिमा के अनेक फोटो दुनियाभर का दिल पिघला रहे थे।

रिद्धिमा की कोशिश रहती थी कि अनिक से बचकर वह कुछ पैसे, कपडे आदि ज़रूरतमंद लोगो को दे दिया करे ताकि उसकी वजह से कुछ लोगो को तो राहत मिले। जीते रहने का और आयोजनों में अनिक के साथ चहकते हुए फोटो खिंचवाने की यह एक बड़ी वजह थी। एक दिन रिद्धिमा को पैसे उठाते हुए अनिक ने पकड़ लिया और वो बुरी तरह उसकी पिटाई करने लगा।

“साली…हरामण शक तो मुझे पहले से था तुझपर आज पकड़ भी लिया। किस चीज़ की कमी है तुझे जो चोरी करती है? तेरे शौक पूरे नहीं होते? यार पाल लिए है तूने? बोल कुत्तिया किस अंधे के साथ रंगरलियां मना रही है? तेरा भी मन करता होगा ना मुझे देख कर? कहाँ जाती है पैसे लेकर, किसको देकर अपनी आग बुझाती है? शक्ल देख अपनी और तसल्ली ना मिले तो किसी छोटे बच्चे को अपना चेहरा दिखा आइयो, डर के मारे वहीं मूत देगा। थू साली हराम की औलाद! मेरे टुकड़ो पर जी रही है ये काफी नहीं है क्या! अभी किसी इवेंट जाने को बोलूंगा तो तबियत ख़राब हो जाती है कमीनी की। पैसा कितने हक़ से उठाती है…जी में आता है तेरा चुड़ैल सा मुँह नोच डालूं! रुक आज तेरी चमड़ी उधेड़ता हूँ।”

लाखों में इक्का-दुक्का कोई रिद्धिमा की तरह होता है जिसे भगवान दर्द सहने के असीम क्षमता देता है। दर्द महसूस ना करना या किसी योगी की तरह अपने ध्यान में दर्द से ध्यान हटा लेना। बेल्ट, चप्पल, हाथ-पैर खाती खूनमखून रिद्धिमा की सिसकियाँ बस सांस लेने का संघर्ष थी, उसे दर्द कहाँ हो रहा था! इतनी हिम्मत कहाँ थी दर्द में? जैसे सात जन्म की पीड़ा इन 5-7 वर्षों में सिमट गयी हो। वो आखरी बार तेज़ाब से जले अपने चेहरे के मवाद में बिलबिलाते कीड़ों को देखकर चीखी थी। उसके बाद तो बस किसी फ़िल्मी दर्शक की तरह वह अपनी कहानी जी और देख रही थी। इतना सब हो जाने के बाद भी वह समझ नहीं पाती थी कि लोग इतने बुरे कैसे हो सकते हैं?

तीन दिन बाद दिल्ली में आयोजित सेमिनार जब पत्रकारों के उसकी चोटों का कारण पूछा तो वह बोली – “अपनी लापरवाही में मेरी स्कूटी का एक्सीडेंट हो गया, वो तो वक़्त रहते अनिक ने मुझे बचा लिया। चेहरे के दूसरे हिस्से पर पड़े निशानों की वजह से उन्होंने 3 दिन से ठीक से खाना भी नहीं खाया है।”

स्क्रिप्ट पूरी करने के लिए रिद्धिमा अलग खड़ी हो गयी और अनिक मीडिया के सामने अपनी फिलॉसफी की बीन बजाने लगा। इधर आदत से मजबूर रिद्धिमा अनिक की आँखों में खोकर मुस्कुराने लगी…तेज़ाब फेंकती, झूठी लेकिन भूरी आँखें!

समाप्त!
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