Poster #1 – Kathputli (Short Film)

Interview with #comics Superfan Supratim Saha

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नागपुर में रह रहे सुप्रतिम साहा का नाम भारतीय कॉमिक्स प्रेमियों के लिए नया नहीं है। सुप्रतिम भारत के बड़े कॉमिक्स कलेक्टर्स में से एक हैं, जो अपने शौक के लिए जगह-जगह घूम चुके हैं। कहना अतिश्योक्ति नहीं, ऐसे सूपरफैंस की वजह से ही भारतीय कॉमिक्स उद्योग अभी तक चल रहा है। पहले कुछ कॉमिक कम्युनिटीज़ में इनका अभूतपूर्व योगदान रहा और समय के साथ ये अपने काम में व्यस्त हो गए। हालांकि, अब भी कुछ कॉमिक्स ग्रुप पर सुप्रतिम दिख जाते हैं। ये मृदुभाषी और सादा जीवन व्यतीत करने में विश्वास करते हैं, इनके बात करने और वाक्य गढ़ने का तरीका मुझे बहुत भाता है इसलिए साक्षात्कार के जवाब में मेल से भेजे इनके जवाबों को जस का तस रखा है।

अपने बारे में कुछ बताएं?

सुप्रतिम – 80 के दशक में भारत के पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में मेरा जनम हुआ। मैने अपनी स्कूलिंग अगरतला शहर से की। मैने इंजिनियरिंग की नागपुर शहर से और बॅंगलुर शहर मे कुछ टाइम जॉब करने के बाद मैने मास्टर्स की चेन्नई शहर मे, आज मैं नागपुर के एक कॉलेज मे वाइस प्रिन्सिपल के पद पे काम कर रहा हू. आज भी मैं रेगुलार कॉमिकस खरीदता हू और पढ़ता हु्। मुझे मालूम हैं मेरा यह जुड़ाव कॉमिक्स के साथ हमेशा  रहेगा. इस सफ़र मे मैं अपने कुछ दोस्तो का नाम लेना चाहूँगा जिन्होने हमेशा मेरा साथ निभाया, बंटी फ्रॉम कोलकाता, संजय आकाश  दिल्ली से, गुरप्रीत पटियाला से, और बहत सारे दोस्त, वरुण ,मोहित, महफूज़ ,ज़हीर,विनय,अजय ढिल्लों  जिन्हे मैं ऑनलाइन मिला और इन सब से भी मेरी काफ़ी अच्छी दोस्ती हैं। सबके नाम शायद मैं यहा लिख नही पाया पर  मैं सबका आभारी हूँ जिन्होने इस सफ़र पे मेरा साथ निभाया।

कॉमिक्स कलेक्शन का आपका सफर कैसे शुरू हुआ?

सुप्रतिम – मेरे कॉमिक्स पढ़ने की अगर बात करे तो ये शुरुवात हुई थी 1991-92 के आसपास। उन दिनों मैं क्वार्टर में रहता था और हर एक  घर से बटोर के जो कॉमिक्स मुझे मिलते थे उनमे से ज़्यादा तर या तो टिनटिन होते थे या फिर इंद्रजाल कॉमिक्स।  हिंदी कॉमिक इंडस्ट्री से मैं जुड़ा 1994 में जब मेरे एक राजस्थानी मित्र ने मुझे दो कॉमिक्स दी, वो दो कॉमिक्स थे डॉ नो और उड़ती मौत। राज कॉमिक्स और साथ ही अन्य हिंदी  कॉमिक्स के साथ मैं इन्ही दो कॉमिक्स की वजह से जुड़ा।

अब तक कॉमिक्स के लिए कहाँ-कहाँ घूम चुके हैं?

सुप्रतिम – कॉमिक्स के लिए ट्रेवल करना मैंने शुरू किया सन 2009 से, यह वो समय था जब मैं बैंगलोर में था.बैंगलोर के अनिल बुक शॉप से बहत सारी कॉमिक्स मैंने रिकलेक्ट की.इसको छोड़के मैंने सबसे ज़्यादा कॉमिक्स कलेक्ट की नागपुर से। इस शहर ने मुझे ऑलमोस्ट 1500 + कॉमिक्स दी जिनमे मैक्सिमम दुर्लभ कॉमिक्स थे। इन 8 सालो में मैंने दिल्ली, नागपुर, कोलकाता, हैदराबाद, बैंगलोर, चेन्नई, पटियाला, अम्बाला, अगरतला जैसे शहरो से भी कॉमिक्स ली। दिल्ली शहर में दरीबा कलां के गोडाउन  से भी मैंने 1000+ कॉमिक्स ली।  इन दो शहर को छोड़के हैदराबाद शहर में भी मुझे 300+ विंटेज डायमंड कॉमिक्स मिलें। ऐसी कॉमिक्स जो की 35 साल से भी अधिक पुराने हैं,जैसे की लंबू मोटू ,फौलादी सिंह ,महाबली शाका ,मामा भांजा और वॉर सीरीज वाली कॉमिक्स। इन सब को छोड़के मेरे पास बंगाली कॉमिक्स भी है भारी संख्या में, करीबन 500 ,जिनमे पिछले 60-80 साल पुराने कॉमिक्स भी हैं। मैं आज भीं रेगुलर कॉमिक्स लेता हु हिंदी बंगाली इंग्लिश में।

पहले के माहौल और अब में क्या अंतर दिखते हैं आपको?

सुप्रतिम – पहले के माहौल में कॉमिक्स एक कल्चर हुआ करता  था, आजकल कॉमिक्स तो दूर की बात हैं किताबों को पढ़ने के लिए भी पेरेंट्स बच्चो को प्रोत्साहित नहीं करते।  विडियो गेम्स केबल टीवी आदि तो मेरे बचपन में भी आराम से उपलब्ध थे ,पर इन सबके बावजूद अगर हर दिन खेलने नहीं गए, तैराकी नहीं की तो घर पे डांट पड़ती थी। आजकल कॉमिक्स,खासकर के कोई भी “रीजनल ” फ्लेवर की कॉमिकस को पढ़ना लोगो के सामने खुदको हास्यास्पद करने जैसा हैं। यही वजह हैं की सिर्फ वही लोग देसी कामिक्से पढ़ते हैं जिनमे रियल पैशन हैं, वरना मंगा और वेस्टर्न कॉमिक्स को ही सीरियस कॉमिक्स समझने और ज़ाहिर करने वालो की भी कमी नहीं हैं। एक कॉमिक बुक फैन होने के नाते मुझे सभी कामिक्से देसी  या विदेसी  अच्छे  लगते  है पर भाषा के नाम पे यह भेदभाव आज बहत ज़्यादा प्रभावशाली हैं।

अपने शहर के बारे में बताएं।

सुप्रतिम – मेरा जन्म भारत के पूर्वोत्तर मे स्थित अगरतला शहर मे हुआ। गौहाटी के बाद ये पूर्वोत्तर के सात राज्यो मे दूसरा प्रमुख शहर भी हैं। बॉर्डर से सटे होने की वजह से यहा बीएसएफ भी कार्यरत हैं जिनमे से काफ़ी लोग हिन्दी भाषी है। साथ ही साथ ओ एन जी सी होने के कारण से हिन्दी भाषी लोग काफ़ी मात्रा मे मौजूद भी है। ज़ाहिर सी बात हैं की इस वजह से हिन्दी कॉमिक्स शुरू से ही यहा रहते लोगो का मनोरंजन करती आ रही हैं. समय के साथ साथ हिन्दी कॉमिक्स का क्रेज़ यहा काफ़ी कम हो चुका हैं पर आज भी मैं घर जाता हू तो भूले भटके एक आधा दुकान मे कुछ दुर्लभ कॉमिकसे खोज ही निकलता हूँ।

आप अक्सर स्केच बनाते हैं, स्केचिंग का शौक कब लगा?

सुप्रतिम – स्केचिंग का  शौक  मुझे कॉमिक्स से नही  लगा। उन दिनो (1993) जुरासिक पार्क फिल्म का क्रेज़  सबके सिर चढ़के बोल रहा था , मेरे घर पे एक किताब थी जिसका नाम था “अतीत साक्षी फ़ॉसिल” उस किताब मे डाइनॉसॉर के बारे मे जानकारियाँ थी और अनूठे चित्र थे, मैं दिन भर उन्ही के चित्र कॉपी करने के कोशिश मे लगा रहता था। कुछ एक बार जब मेरे इन प्रयासो को लोगो ने मुर्गी,बतक के चित्र के रूप मे शिनाख्त की तो मैं फिर कॉमिक स्टार्स के चित्र बनाने लगा। बचपन मे सबसे ज़्यादा चित्र मैने भेड़िया के बनाए (प्री-1997) ,नागराज के चित्र बनाते हुए मैं काई बार पढ़ाई के वक़्त पकड़ा भी गया। आज कल समय मिलता नही हैं पर उत्सुकता पहले जैसी ही हैं।

आपके हिसाब से एक अच्छी कॉमिक्स के क्या मापदण्ड हैं? 

सुप्रतिम – एक अच्छी  कॉमिक्स का मापदंड किसी एक विषय पे निर्भर नहीं करता, पर पहला मापदंड यह हैं की उसके चित्र और कहानी में से कोई भी एक पहलु जोरदार होनि चाहिये। हालाकी चित्र अव्वल दर्जे का हो तो सबसे पहले ध्यान आकर्षित करता है। पर ऐसे कॉमिक भी होते हैं जिनमे चित्र का योगदान कम होता है और कहानी इतनी ज़बरदस्त होती है की दिल को छु जाती हैन.जैसे की “अधूरा प्रेम”.वैसे ही काफ़ी ऐसे कॉमिक्स भी होते हैं जिनके साधारण से कहानी कोचित्रकला के वजह से एक अलग ही आकर्षण मिलता हैन. मनु जी के द्वारा बनाए गये सभी परमाणु के कॉमिक्स इस श्रेणी मे आते हैं. आज भी अगर कॉमिक्स के क्वालिटी की बात आए तो आकर्षक चित्रकला ही वो प्रमुख माध्यम हैं जिससे आप एक कॉमिक्स से प्रभावित होते हैं।

अपनी पसंदीदा कॉमिक्स, लेखक, कलाकार और कॉमिक किरदारों के बारे में बताएं। 

सुप्रतिम – मेरी पसंदीदा कॉमिक्स, किरदार के हिसाब से देखा जायें तो  होंगे ग्रांड मास्टर रोबो, ख़ज़ाना सीरीज़, भूल गया डोगा, टक्कर, खरोंच, 48 घंटे सीरीज़, लाश कहा गयी, चमकमणी, महारावण सीरीज़, अग्नि मानव सीरीज़, प्रोफ शंकु सीरीज़ आदि। अनुपम सिन्हा जी ,सत्यजीत राय,संजय जी मेरे प्रिय लेखक मे से हैं। प्रताप जी,अनुपम जी, मनु जी, डिगवॉल जी, ललित शर्मा जी, चंदू जी, सुजोग ब्न्दोपध्यय जी, अभिषेक चटेर्ज़ी, मलसुनी जी, मयुख चौधरी जी,गौतम कर्मकारजी मेरे प्रिय कलाकार हैं।  ध्रुव, नागराज, परमाणु, डोगा, भेड़िया, प्रोफेसर शंकु, कौशिक, फेलूदा, महाबली शाका,फॅनटम, घनादा मेरे फ़ेवरेट क़िरदार हैं।

बचपन की कोई हास्यास्पद घटना, याद बांटिये। 

सुप्रतिम – बचपन मे मेरे एक राजस्थानी मित्र राकेश कुमार मीना ने मुझे पहली बार राज कॉमिक से अवगत कराया। उसीके साथ हुआ एक वाक़या मुझे याद हैं जिसे हास्यास्पद घटना कहा जा सकता हैं। राकेश और मेरे पास जितनी भी कॉमिकस थी, उनको हम एक्सचेंज करके पढ़ते थे। एक बार हुआ यह की मुझे उससे दो कॉमिक से लेनी थी, जिनमे से एक थी इंद्र की और दूसरी थी ताउजी कि, अब हुआ यह की यह दोनो कॉमिक आठ रुपये के थे। जब मैने उसे अपने दो कॉमिकसे दी तो उसने मुझे कहा की तेरे दो कॉमिक्सो का मूल्य पन्द्रह रुपये हैं तो मैं तुझे मेरे दो कॉमिक, जो की सोलह रुपये के हैं, तुझे नही दे सकता। उसके इस बिज़नेस माइंडनेस की जब भी कल्पना करता हू तो आज 22 साल बाद यह घटना हास्यास्पद ही लगता हैं। दूसरी घटना भी 1995 की ही हैं, मैं अपने फॅमिली के साथ जा रहा था बन्गलोर्, हम कलकत्ता  मे ठहरे हुए थे और मशहूर कॉलेज स्ट्रीट से होके गुज़र रहे थे की मुझे एक दुकान मे कॉमिकस दिखि। मेरे कहने पे पापा ने मुझे दो कॉमिकसे दिलवाई, एक थी “बौना शैतान” और दूसरी “ताजमहल की चोरिं “मुझे हैरत हुई जब दुकानदार ने पापा से 6 ही रुपये माँगे, और मुझे पहली बार मालूम पड़ा की सेकेंड हॅंड बुक्स किसे कहते है। बचपन के यह मासूम किससे सही मायने मे हास्यास्पद ना सही,होठों पे मुस्कान ज़रूर लाती हैं।
बदलते समय के अनुसार कॉमिक्स प्रकाशकों को क्या सलाह देना चाहेंगे?

सुप्रतिम – देसी कॉमिक्स के दौर को मैं कूछ किस्म मे बाँटना चाहूँगा. 1940-1970 के दशक मे बंगाल मे वीदेसी कॉमिक्स के अनुकरण मे काफ़ी विकसित कॉमिकस बनी, जिनमे सायबॉर्ग जैसे कॉन्सेप्ट्स काम मे लाए गये। 1970 से हिन्दी कॉमिक इंडस्ट्री मे भी सहज सरल चित्रो के साथ कॉमिकसे आई। 1980 से कॉमिकसे काफ़ी विकसित हो गई और 1990-2000 तक हिन्दी कॉमिक इंडस्ट्री का सुनेहरा दौर रहा। 2000 के बाद की बात करें तो डिजिटल फॉरमॅट्स के बदौलत हिन्दी कॉमिक इंडस्ट्री मे काफ़ी चेंजस आयें। आज भी कुछ कॉमिक्स मे जैसे की बंगाली कॉमिक्स इंडस्ट्री मे मैनुअल कलरिंग का प्रयोग बखूबी से किया जाता हैं। समय के साथ कुच्छ इंडस्ट्रीस बदल गये और कूछ ने अपना पुराना स्टाइल बरकरार रखा, पर एक अच्छी कॉमिक्स को आज भी फैंस जैसे  भाँप लेते है। बदलते समय में स्टाइल बदला होगा पर अच्छे कॉमिक्स का मापदंड वही हैं जो पहले से थे। प्रकशको से मेरी बीनति रहेगी की यह पॅशन ही हैं जो एक कॉमिक को आकर्षक बनाती हैं ना की नयी तकनीक. कॉमिक बनाते वक़्त उन मौलिकताओ का ध्यान रखे जिनकी वजह से कॉमिक्स ने हमारे बचपन को इतने रंगो मे रंगा।

कॉमिक्स पाठकों के लिए आपका क्या सन्देश है?

सुप्रतिम – कॉमिक्स पाठक बंधुओ के लिए मैं यही बोलना चाहूँगा की आप मे से काफ़ी लोग अभी किसी कारणवश कॉमिक्स से दूर होते जा रहे हैं, कोशिश  करिए की अपने आनेवाले पीढ़ी को आप प्रोत्साहित करे कॉमिक्स पढ़ने के लिए और खुद भी पढ़ें और खरीदें।

– मोहित शर्मा ज़हन

Musical trip down memory lane (Audio Clips)

16864471_10155048229442210_9042635471382032482_nArtwork – Morgan Prost

3 short audio clips. #childhoodmemories

1) – Dimaag ki Faltu Lyrics (40 Seconds)

2) – 90s Doodh Advertisement Jingle (32 Seconds)

3) – Bollywood Music Just Kidding (54 Seconds)

Also available on Soundcloud, Clyp and Archiver.

दुश्मन मेहमान (कहानी) – मोहित शर्मा ज़हन

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वर्ष 1978
ब्रिटिश साम्राज्य से आज़ादी मिलने के बाद बने क्रोनेशिया और सर्बा पडोसी मुल्कों के बीच रिश्ते हमेशा तल्ख़ रहे। दशकों तक शीत युद्ध की स्थिति में दोनों देशो का एक बार भीषण युद्ध हो चुका था। अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद युद्ध समाप्त हुआ। युद्ध में कुछ टापू और समुद्री सीमा कब्ज़ाने वाले सर्बा को जीत मिली थी पर दोनों तरफ भारी नुक्सान हुआ था। युद्ध के बाद स्थिति काफी बदल गयी थी। अब क्रोनेशिया एक अच्छे-खासे रक्षा बजट के साथ आर्थिक रूप से सशक्त राष्ट्र था।

रिक स्मिथ नामक न्यूक्लियर साइंटिस्ट का नाम अक्सर किस्से-कहानियों में आता था। लोग कहते थे कि वह कोई किवदंती, क्रोनेशिया का काल्पनिक सिंबल है पर सर्बा की ख़ुफ़िया एजेंसी जानती थी कि रिक जो कई नाम और पहचानो से जाना जाता था सिर्फ वैज्ञानिक ना होकर एक काबिल सीक्रेट एजेंट भी था। उसने सर्बा के कुछ महत्वपूर्ण मिशन, व्यापारिक डील्स को नाकाम किया था और वह सर्बा व अन्य देशो की सहायक ख़ुफ़िया एजेंसियों के कई एजेंट्स की हत्या कर चुका था। सर्बा के दर्जनों जासूस सिर्फ उसको पकड़ने या मारने के लिए वर्षो से प्रयासरत थे।

सर्बा के टॉप एजेंट चीमा को रिक के नेपाल में देखे जाने की सूचना मिलती है। चीमा तुरंत अपने दल के साथ नेपाल रवाना होता है। तटस्थदेश में छद्म पहचानो के साथ गुप्त रूप से ही काम किया जा सकता था इसलिए चीमा की गतिविधियां सीमित और लक्ष्य पर केंद्रित थी। रिक के वहाँ होने का कारण ढूंढ रहा चीमा नेपाल की सीमाओं पर अपने सहायक नियुक्त करता है। क्या रिक ने किसी डील के लिए नेपाल आने का जोखिम लिया था या फिर वह कोई डील तोड़ने आया था? नेपाल में सर्बा दूतावास हर उपलब्ध जानकारी चीमा को दे रहा था। इन दस्तावेजों को देखते हुए चीमा का ध्यान एक कागज़ पर गया जहाँ कुछ सर्बाई लोगो के नाम थे। यह दल नेपाल की तरफ से माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाला था। दल के सदस्यों में देश के कुछ प्रमुख वैज्ञानिक थे। चीमा ने स्थानीय शेरपा से एवरेस्ट के बारे में जानकारी ली। शेरपा ने बताया की कई बार एवरेस्ट पर चढ़ते हुए लोग फिसल कर ऊंचाई से गिरकर गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं, अचानक हिमस्खलन में दब जाते हैं या शून्य से दर्जनों डिग्री नीचे तापमान को झेलते हुए 8000 मीटर से ऊपर “डेथ ज़ोन” में ऑक्सीजन की कमी के कारण चेतना, मानसिक संतुलन खोकर मारे जाते हैं। अक्षम, घायल या मरते हुए लोगो को नीचे लाने में जान का जोखिम होता है इसलिए इस पर्वत पर 250 से अधिक मृत पर्वतारोहियों के शरीर जस के तस पड़े हैं जिनमे हर साल कुछ लाशों का इज़ाफ़ा होता है। चीमा को उसकी शंकाओं का समाधान मिल गया था। बदली पहचान के साथ रिक इस दल को एवरेस्ट की ऊंचाई पर ख़त्म करने वाला था। बिना वक़्त बेकार कर चीमा अपनी टीम के साथ एवरेस्ट चढ़ाई पर निकल पड़ा। उसका पहला लक्ष्य था सर्बाई वैज्ञानिको को बचाना था और उस से भी महत्वपूर्ण रिक को मारना था। टीम को भरोसा था कि चढ़ते या उतरते हुए कभी न कभी तो रिक उनके हाथ लगेगा। कहीं रिक चीन की तरफ से न उतरे इसलिए चीमा ने एक अन्य दल को चीन की तरफ की चढाई की घेराबंदी पर लगाया। चेताने के लिए सर्बा दल को रेडियो संदेश भेजे गए जिनका जवाब नहीं आया। अपनी टीम और गाइड शेरपा को पछाड़ता चीमा रिकॉर्ड समय में 25000 फ़ीट तक पहुँच गया, एवरेस्ट के आखरी “कैंप 4” से उसे एक हेलीकॉप्टर उड़ता दिखाई दिया। इस ऊंचाई से ऊपर हवा की परत इतनी पतली थी की हेलीकॉप्टर सुरक्षित उड़ या उतर नहीं सकता था, नीचे जाते उस हेलीकॉप्टर में चीमा को रिक की एक झलक दिखी। चीमा जान गया था कि अब कोई वैज्ञानिक ज़िंदा नहीं होगा, कुछ मीटर चढ़ाई के बाद उसके अंदाज़े की पुष्टि वैज्ञानिको के निर्जीव शरीर देख कर हो गयी। अधूरी तैयारी की अपनी भूल पर गुस्से से फुफकारता चीमा दुनिया के शिखर, एवरेस्ट की छोटी से सिर्फ 250 मीटर से नीचे लौट आया।

वर्ष 1980
सर्बाई नौसेना, वासुसेना की घेराबंदी से क्रोनेशिया की तीनो सेनाओं की गतिविधियां सीमित हो गयी थी। चीमा को एक से अधिक इंटेल मिली कि 8 महीनो से क्रोनेशिया से बाहर मौजूद रिक को हर हाल में क्रोनेशिया लौटना था। बाहरी देशो द्वारा बहिष्कार करने के बाद देश के 2 नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र और परमाणु हथियारों बनाने का पूरा ज़िम्मा रिक और उसकी टीम पर आ गया था। चीमा के मार्गदर्शन में सर्बा की भारी घेराबंदी की वजह से रिक द्वारा क्रोनेशिया में घुसने की 2 कोशिशें नाकाम हो चुकी थी। क्रोनेशिया का तीन तरफ से सर्बा से घिरा होना रिक की परेशानी की सबसे बड़ी वजह थी। केवल समुद्र के रास्ते ही रिक अपने देश में जा सकता था, जिसके आस-पास सर्बाई नौसेना और एजेंट्स का जाल बिछा था।

2 यात्री विमान सर्बा के समुद्री क्षेत्र के ऊपर उड़ते हैं जिनको ट्रेस कर तुरंत सर्बाई लड़ाकू विमान भेजे जाते हैं। इन यात्री विमानों से संपर्क करने पर कोई जवाब नहीं आता। लड़ाकू विमान द्वारा चेतावनी के अन्य तरीके भी विफल हो जाते हैं। अचानक अंदर हुए धमाकों के साथ क्षतिग्रस्त विमान क्रैश होने लगते हैं। दोनों विमान समुद्र में क्रैश ना होकर सर्बा शासित दो टापुओं पर गिरते हैं। इन टापुओं पर सर्बा के 2 महत्वपूर्ण परमाणु संयंत्र थे जिनके कोर के पास गिरकर विमानों ने भारी तबाही मचाई। इन टापुओ और आस-पास के समुद्री क्षेत्र में विकिरण फ़ैल गया, जिस वजह से सर्बा को इन्हें क्वारंटाइन घोषित करना पड़ा। लड़ाकू विमान पायलट्स ने आँखों देखा हाल बताया पर क्रोनेशियाई सरकार और मीडिया ने खबर फैलाई कि किस तरह मासूम पर्यटकों से भरे विमानों को सर्बा वायुसेना द्वारा मार गिराया गया। टापू पर पड़े और समुद्र में तैरते मानव अवशेष इस बात की पुष्टि कर रहे थे। विदेशी मीडिया को मृत पर्यटको की तस्वीरें, लिस्ट बांटी गयी, उनके नाम पर स्मारक बनाये गए और मानवीय आधार पर सर्बा की विश्वभर में कड़ी निंदा हुई। इस घटना से सर्बा को दोहरा नुक्सान हुआ था उसके परमाणु संयंत्र तबाह हुए जिनसे फैले विकिरण के कारणउसको टापुओ पर से हटना पड़ा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किरकिरी होने के साथ कुछ प्रतिबंध भी लग गए। नुक्सान का जायज़ालेता और टापुओं पर से सामान समेटता चीमा जानता था कि इतने बड़े षडयंत्र के पीछे सिर्फ रिक हो सकता है। बाद में मानव अंशो की जांच और अपने सूत्रों से उसके पता चला कि दोनों यात्री विमानों के दोनों पायलट आत्मघाती मिशन पर थे और बड़ी चालाकी से उन्होंने अपने आपको दो टापुओं के संयंत्रो पर क्रैश किया। विमान के अंदर मौजूद यात्री पहले से ही मृत लोग थे, जिन्हें अलग-अलग मुर्दाघरों से लाया गया था और काल्पनिक पहचान दी गयी थी। चीमा का दिमाग घूम रहा था। वह उलझन में था कि क्या वह रिक की किसी और चाल को नाकाम करने का इंतज़ार करे या अपने तरीके से इन हमलो का जवाब दे। बार-बार के रक्षात्मक रवैये से चीमा परेशान हो चुका था। उसने ठाना कि जब रिक लोगो की जान, सही-गलत की परवाह नहीं करता तो उसे भी देशहित के लिए इतना नहीं सोचना चाहिए। अब उसने क्रोनेशिया को रिक के अंदाज़ में ही नुक्सान पहुंचाने के लिए कुछ योजनाएं बनानी शुरू की, जो काफी लंबे समय से उसकी रक्षात्मक योजनाओ के बिल्कुल उलट थीं। चीमा ने अपने नेटवर्क के ज़रिये क्रोनेशिया को भारी कीमत पर दोयम दर्जे की रक्षा पनडुब्बियां दिलवायी। कुछ समय बाद उसने क्रोनेशिया की एक छावनी में स्थित झील को विषाक्त कर दिया। क्रोनेशियाई सरकार और एजेंट्स सतर्क हो गए थे इसलिए कुछ समय के लिए सर्बा सरकार ने उसे फिर से रिक संबंधी टीम की ज़िम्मेदारी सौंप दी। चीमा दोबारा उस रक्षात्मक एजेंट पिंजरे में आ गया था जिससे वह नफरत करता था। अपने हर मिशन में जान लड़ाने के बाद भी चीमा की एक नज़र हमेशा पुराने दुश्मन रिक की ख़बरों पर बनी थी। वह जानता था कि अब तक रिक को क्रोनेशिया घुसने में सफलता नहीं मिल पाई है। चीमा यह किस्सा हमेशा के लिए ख़त्म कर देना चाहता था ताकि फिर कभी उसे इस भूमिका में ना बंधना पड़े। क्रोनेशिया सम्बंधित 2 छोटे पर सफल मिशन अंजाम देने के बाद चीमा का आत्मविश्वास बढ़ गया था। इस काम के लिए उसने अपनी टीम में 2 दर्जन जूनियर एजेंट्स जोड़ लिए थे। सर्बाई खेमे को सूचना मिली कि चीमा की सतर्कता से रिक महीनों से क्रोनेशिया में घुस नहीं पा रहा है, ऐसे में चीमा की जान को खतरा है।

कुछ दिनों बाद तड़के सर्बा सुरक्षा राडारों पर चमकते एक बिंदु ने हड़कंप मचादिया। एक विशालकाय अज्ञात कार्गो विमान सर्बा की समुद्री सीमा के ऊपर उड़ रहा था जो कुछ ही देर में सर्बा में प्रवेश करने वाला था। पहले की तरह विमान को भेजे गए सभी संदेशो का कोई जवाब नहीं आया। चीमा समुद्री युद्ध पोत पर अपनी टीम के साथ सारे घटनाक्रम पर नज़र रखे था। एक फाइटर प्लेन कार्गो विमान को चेताने पहुंचा। चीमा के अनुसार सर्बा की सतर्कता के चलते क्रोनेशिया दोबारा विमान इच्छित स्थान पर क्रैश करने वाली हरकत नहीं कर सकता था, उसे मामला कुछ और ही लग रहा था। इस बार सर्बाई फाइटर प्लेन पहले से आधुनिक और कार्गो प्लेन को हवा में ही निष्क्रिय करने में सक्षम था। लड़ाकू विमान पायलट ने जब पास से कार्गो विमान के कॉकपिट को देखा तो उसमे दो मृत या बेहोश पायलट पड़े थे और कुछ महिलाएं मदद के लिए हाथ हिलाती दिख रही थी। पायलट ने उन्हें रेडियो गियर पहनने का इशारा किया। रेडियो पर महिलाओं ने बताया की कॉकपिट में हवा का दबाव कम होने के कारण दोनों पायलट बेहोश हो गए हैं, जिस वजह से विमान एक दिशा में उड़ा जा रहा है। फाइटर पायलट और ग्राउंड कण्ट्रोल ने उन महिलाओं को विमान को हवा में रखने के सीमित निर्देश दिए जो वो समझ सकें। सब सुनने के बाद चीमा का शक बना हुआ था, सर्बाई नौसेना अलर्ट पर थी। आखिरकार महिलाएं एक पायलट को होश में लाने में सफल रही लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। कार्गो विमान का ईंधन ख़त्म हो चूका था और विमान को समुद्र में क्रैश लैंडिंग करनी पड़ी। विमान पानी को छूते ही टुकड़ो में बिखर गया। लगभग 70 महिलाएं पैराशूट पहन कर पहले ही विमान के पिछले द्वार से कूद चुकी थी। चीमा को लग रहा था कि विमान में जैविक हथियार हो सकते हैं जो सर्बा के समुद्री क्षेत्र में तबाही मचा सकते हैं। विमान सर्बा के आखरी टापू बेस और क्रोनेशिया की समुद्री सीमा से कुछ मील दूर ही क्रैश हुआ था। चीमा ने युद्ध पोत के बजाए अन्य छोटे माध्यमो से जाने का फैसला लिया। जोखिम लेते हुए उसने कुछ स्टीमर और बड़ी नावों से मलबे और पानी में तैर रही महिलाओं को घेरा और बंदी बनाकर टापू के सैन्य बेस पर ले आया। सभी महिलाओं की तलाशी ली गयी। इतनी बड़ी घटना में रिक का हाथ हो सकता था जिस वजह से चीमा ने अपनी महिला सैनिको से ख़ास इस बात की पुष्टि करवाई कि क्या ये सभी महिलाएं ही हैं या इनमे कोई पुरुष, किन्नर भी छुपा है, सब महिलाएं थी। अब बारी थी गहन पूछताछ की, जिसके लिए अगर कड़ा टॉर्चर ज़रूरी हो तो उसके निर्देश थे। आश्चर्यजनक रूप से बंदी महिलाएं थोड़ी प्रताड़ना में ही बोलने लगी। उन्होंने बताया कि वह क्रोनेशिया की कॉलेज कैडेट्स हैं जो एक सहायक देश तोरमा में नर्सिंग की ट्रेनिंग ले कर लौट रही थी। पहले उनका विमान अंतरराष्ट्रीय मार्ग से उड़ रहा था पर अचानक कॉकपिट में दबाव कम होने से पायलट बेहोश हो गए और विमान सर्बा की सीमा में चला गया। चीमा के पास बैठे मनोवैज्ञानिको, वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों का यही मत था कि ये महिलाएं सैनिक या एजेंट नहीं थी। इन दलीलों का चीमा पर कोई असर नहीं पड़ रहा था और वह एक-एक कर सभी महिलाओं से पूछताछ करने लगा। घंटो बाद कोई निष्कर्ष ना निकलने पर चीमा को ऊपर से आदेश आया कि महिलाओं की संख्या अधिक है इसलिए उन्हें छोड़ दिया जाए। सर्बा फिर से अंतरराष्ट्रीय बहिष्कार, किरकिरी नहीं चाहता था। चीमा ने बातों में अनियमितता, उलझन दिखा रहीं 11 महिलाओं को रोककर बाकी को जाने दिया। हालांकि, इन महिलाओं को वह अब 48 घंटो से अधिक नहीं रोक सकता था पर उसे विश्वास था कि वह किसी ना किसी लीड तक ज़रूर पहुंचेगा।

चीमा और उसके दल ने इन महिलाओं को और प्रताड़ना दी। चीमा के दिमाग में एक उलझन खटक रही थी कि कोई ऐसी बात है जो उसके दिमाग में नहीं आ रही है। कुछ तो छूट रहा है। आखिरकार कुछ कैडेट्स ने क्रोनेशिया से जुड़े कुछ नक़्शे, ख़ुफ़िया जानकारी दी। 48 घंटे पूरे होने के बाद बेजान सी हो चुकी कैडेट्स को क्रोनेशिया तटरक्षक नौका को सौंप दिया गया। नौका के आँखों से ओझल होते हुए चीमा विडियोगेम खेलने लगा, कुछ देर बाद उसके अवचेतन मस्तिष्क की एक छोटी सी जानकारी ने उसे झटका दिया। क्रोनेशिया में तो ऐसी कोई कैडेट ट्रेनिंग नहीं होती, ना ही वहां की किसी सेना में महिलाएं हैं। चीमा का दिमाग घूम गया, वह कुछ स्टीमर्स के साथ नौका के पीछे गया। अब दौड़ अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा से क्रोनेशियाई सीमा तक जाने की थी। अगर क्रोनेशिया तटरक्षक नाव अपनी सीमा में पहुँच जायेगी तो उसपर हमला करना समुद्री जंग छेड़ सकता था। जिसका डर था वही हुआ, वह नाव अपने देश के तट से कुछ ही दूर थी। निराश चीमा को लौट जाना पड़ा। उसे याद आया कि वह क्या चीज़ थी जो उसका दिमाग पकड़ नहीं पा रहा था। एक औरत का चेहरा जाना-पहचाना लग रहा था…बिलकुल रिक जैसा। जब अपने क्रोनेशिया में घुसने की कई कोशिशें नाकाम हो गयी तो देश सेवा के लिए रिक और उसकी टीम ने सेक्स चेंज ऑपरेशन और हॉर्मोन थेरेपी की मदद से अपना लिंग बदल लिया था। अब वो सब वाकई में महिला बन गए थे। यह कार्गो विमान का सारा ड्रामा रिक स्मिथ और उसकी टीम ने अपने देश में घुसने के लिए रचा था। मुस्कुराता हुआ चीमा मन ही मन अपने सबसे बड़े दुश्मन की तारीफ़ कर रहा था पर उसने अभी हार नहीं मानी थी, चीमा के मन में बदला लेने की भावना और प्रबल हो गयी थी।
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New Comic: 3 Run ka Sauda (Mohit Trendster, Amit Albert)

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Comic 3 Run ka Sauda now available on Culture Popcorn, Dailyhunt, Google Play-Books, Readhwere, Comics Our Passion, Ebooks Now, Smashwords, Author Stream, Pothi and many other ebook websites.

 CulPop intro – “3 रन का सौदा – भारतीय क्रिकेट में राजनीति और पैसे के खेल से बर्बाद हुए अनेक कैरियर्स की दास्ताँ। सुनहरी दुनिया की रौनक के पीछे के मटमैले धब्बो को दर्शाती अमित अल्बर्ट की कला और मोहित शर्मा की लेखनी से सुसज्जित एक यादगार कॉमिक।”
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Comic Advert

Artist: Amit Albert, Writer-Editor: Mohit Sharma

Colorist: Harendra Saini, Letterer: Youdhveer Singh

Art (Peripheral Angel Comic)

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Special artwork for Peripheral Angel (Neerja) Comic. Artist – Jyoti Singh, Theme-Details by yours truly, Watercolour on A3 paper

बागेश्वरी #13 पत्रिका अपडेट

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बागेश्वरी पत्रिका के नए अंक #13 (सितंबर-अक्टूबर 2016) में मेरी हॉरर कहानी, रचना प्रकाशित हुई। प्रकाशक योगेश जी को धन्यवाद!

Kaddu le lo (Secular Audio Story)#mohitness

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Kaddu le lo (Secular Audio Story), कद्दू ले लो (धर्मनिरपेक्ष कहानी) Social Message

*) – Youtube: http://goo.gl/AeI1Bv

*) – SoundCloud: http://goo.gl/klCe7H 

*) – Vimeo: http://goo.gl/uaQ4Ih

Duration – 5 Minutes 28 Seconds

#message #social #mohitness #mohit_trendster #freelancetalents #freelance_talents #religion #fiction #debate #dark #humor #satire #ज़हन #ज़हनजोरी

#Update Indian Comics Fandom Awards 2016

Nominations are now being accepted for the Indian Comics Fandom Awards 2016 in order to recognize the efforts, achievements of Indian Comic fans and creatives.

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*) – Best Blogger

*) – Best Cartoonist

*) – Best Colorist

*) – Best Reviewer

*) – Best Comics Collector

*) – Best Fanfiction Writer

*) – Best Fan Artist

*) – Best Fan Work (Comic, Video, Music etc)

*) – Best Webcomic

*) – Best Cosplayer

99 का फेर (कहानी) #trendster

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एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत हितेश कंपनी की तरफ से मिले टूर पर अपने माता-पिता को यूरोप के कुछ देश घुमाने लाया था। टूर के दूसरे दिन उसके अभिभावक सूरज कुमार और वीणा गहन विषय पर चिंतन कर रहे थे।

सूरज कुमार – “टूर तो कंपनी का है पर फिर भी यहाँ घूमने-फिरने में काफी खर्चा हो जाएगा।”
वीणा – “हाँ! कल लंच का बिल देखा आपने? ऐसे तो इन 15 दिनों के टूर में हितेश 2-3 लाख खर्च कर देगा। आज से कम से कम लंच का खर्च तो बचा ही लेंगे हम…तुम्हे पता नहीं मैं घर से क्या लायी हूँ?”

कुछ देर बाद हितेश के कमरे के बाहर होटल स्टाफ के कुछ लोग खड़े थे। वीणा ने लंच बचाने के लिए कमरे में ही मैगी नूडल बनाने का प्रयास किया, जिसकी गंध और धुआं आने पर हाउसकीपिंग ने होटल मैनेजर को रिपोर्ट किया। मैनेजर को भारी-भरकम जुर्माना चुका कर हितेश सहमे हुए माँ बाप के पास पहुंचा।

हितेश – “किसके लिए बचा रहें है आप लोग पैसा और कब तक बचाते रहेंगे? बिना पैसे का बोझ रखे सांस लेना कितना मुश्किल है? लाखो में कमाता हूँ और अगर निठल्ला होता तब भी बैठ कर खाता पूरी ज़िन्दगी, इतना पैसा-प्रॉपर्टी सब जोड़ रखा है आप दोनों ने! कम से कम जीवन के एक पड़ाव में तो इस निन्यानवें के फेर से निकलिए। मैं आपका बच्चा हूँ और मुझे यह बात बतानी पड़ रही है आपको जबकि उल्टा होना चाहिए। आपको पता है यह होटल, घूमना, प्लेन की टिकट सब मैंने खरीदा क्योकि मुझे पता था अगर टूर कंपनी की तरफ से न बताता तो आप लोग कोई न कोई बहाना बना देते।”

फिर हितेश और उसके माता-पिता ने पिन ड्राप साइलेंस में मैगी खायी।

समाप्त!

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मोहित शर्मा ज़हन

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