सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा? (वीभत्स रस Poetry)

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अपने रचे पागलपन की दौड़ में परेशान समाज की कुत्सित मानसिकता “अच्छा-अच्छा मेरा, छी-छी बाकी दुनिया का” पर चोट करती ‘वीभत्स रस’ में लिखी नज़्म-काव्य। यह नज़्म आगामी कॉमिक ‘समाज लेवक’ में शामिल की है। –

सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?
सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?
बिजबिजाते कीड़ों को सहेगा,
कभी अपनी बुलंद तारीख़ों पर हँसेगा,
कभी खुद को खा रही ज़मीं पर ताने कसेगा।

जब सब मुझे छोड़ गये,
साथ सिर्फ कीड़े रह गये,
सड़ती शख्सियत को पचाते,
मेरी मौत में अपनी ज़िन्दगी घोल गये।

आज जिनसे मुँह चुराते हो,
कल वो तुम्हारा मुखौटा खायेंगे,
इस अकड़ का क्या मोल रहेगा?
सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?

लोथड़ों से बात करना सीख लो,
बंद कमरों में दिल की तसल्ली तक चीख लो!
सड़ता हुआ मांस सुन लेगा,
अगली दफ़ा तुम्हे चुन लेगा।

जिसे दिखाने का वायदा किया था हमसे,
वो गाँव तो हमारी लाश पर भी ना बसेगा।
खाल की परत फाड़ जब विषधर डसेगा,
सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?

जिसपर फिसले वो किसी का रक्त,
नाली में पैदा ही क्यों होते हैं ये कम्बख्त?
बाकी तो सब राम नाम सत!
उसपर मत रो…
सुर्ख़ से काला पड़ गया जो,
ये जहां तो ऐसा ही रहेगा,
सड़ता हुआ मांस कुछ नहीं कहेगा!
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#ज़हन

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Daraaren Darmiyan (Ishq Baklol Poetry)

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कल देवेन पाण्डेय जी की नॉवेल इश्क़ बकलोल की प्रति मिली। 🙂 किताब का अमेज़न हार्डकॉपी लिंक जल्द ही एक्टिव होगा। उपन्यास शुरू होने से पहले किताब के 2 पन्नो पर मेरी कलम है….

दरिया में तैरती बोतल में बंद खतों की,
पलकों से लड़ी बेहिसाब रातों की,
नम हिना की नदियों में बह रहे हाथों की,
फिर कभी सुनेंगे हालातों की…
…पहले बता तेरी आँखों की मानू या तेरी बातों की?
चाहे दरमियाँ दरारें सही!

ये दिल गिरवी कहीं,
ये शहर मेरा नहीं!
तेरे चेहरे के सहारे…अपना गुज़ारा यहीं।
जी लेंगे ठोकरों में…चाहे दरमियाँ दरारें सही!

नफ़रत का ध्यान बँटाना जिन आँखों ने सिखाया,
उनसे मिलने का पल मन ने जाने कितनी दफा दोहराया….
जिस राज़ को मरा समझ समंदर में फेंक दिया,
एक सैलाब उसे घर की चौखट तक ले आया….
फ़िजूल मुद्दों में लिपटी काम की बातें कही,
चाहे दरमियाँ दरारें सही!

किस इंतज़ार में नादान नज़रे पड़ी हैं?
कौन समझाये इन्हें वतन के अंदर भी सरहदें खींची हैं!
आज फिर एक पहर करवटों में बीत गया,
शायद समय पर तेरी यादों को डांटना रह गया।
बड-बड बड-बड करती ये दुनिया जाली,
कभी खाली नहीं बैठता जो…वो अंदर से कितना खाली।
माना ज़िद की ज़िम्मेदारी एकतरफा रही,
पर ज़िन्दगी काटने को चंद मुलाक़ात काफी नहीं….
ख्वाबों में आते उन गलियों के मोड़,
नींद से जगाता तेरी यादों का शोर।
मुश्किल नहीं उतारना कोई खुमार,
ध्यान बँटाने को कबसे बैठा जहान तैयार!
और हाँ…एक बात कहनी रह गयी…
काश दरमियाँ दरारें होती नहीं!
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#ज़हन

पैमाने के दायरों में रहना… (नज़्म) #ज़हन

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पैमाने के दायरों में रहना,
छलक जाओ तो फिर ना कहना…
जो जहां लकीरों की कद्र में पड़ा हो
उस से पंखों के ऊपर ना उलझना…
किन्ही मर्ज़ियों में बिना बहस झुक जाना,
तुम्हारी तक़दीर में है सिमटना…

पैमाने के दायरों में रहना,
छलक जाओ तो फिर ना कहना…
क्या करोगे इंक़िलाब लाकर?
आख़िर तो गिद्धों के बीच ही रहना…
नहीं मिलेगी आज़ाद ज़मीन,
तुम दरारों के बीच से बह लेना…

पैमाने के दायरों में रहना,
छलक जाओ तो फिर ना कहना…
जिस से हिसाब करने का है इरादा,
गिरवी रखा है उसपर माँ का गहना…
औरों की तरह तुम्हे आदत पड़ जाएगी,
इतना भी मुश्किल नहीं है चुपचाप सहना…

पैमाने के दायरों में रहना,
छलक जाओ तो फिर ना कहना…
साँसों की धुंध का लालच सबको,
पाप है इस दौर में हक़ के लिए लड़ना…
अपनी शर्तों पर कहीं लहलहा ज़रूर लोगे,
फ़िर किसी गोदाम में सड़ना…

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– मोहित शर्मा ज़हन
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Read बहाव के विरुद्ध (कहानी) #ज़हन

तेरे प्यार के बही-खाते…(नज़्म) #ज़हन

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जुबां का वायदा किया तूने
कच्चा हिसाब मान लिया मैंने,
कहाँ है बातों से जादू टोना करने वाले?
तेरी कमली का मज़ाक उड़ा रहे दुनियावाले…
रोज़ लानत देकर जाते,
तेरे प्यार के बही-खाते…

तेरी राख के बदले समंदर से सीपी मोल ली,
सुकून की एक नींद को अपनी 3 यादें तोल दी।
इस से अच्छा तो बेवफा हो जाते,
कहीं ज़िंदा होने के मिल जाते दिलासे।
जाने पहचाने रस्ते पर लुक्का-छिपी खिलाते,
तेरे प्यार के बही-खाते…

फिर तेरे हाथ पकड़ आँगन से आसमान तक लकीरें मिला लूँ,
दिल पर चेहरा लगा कर नम नज़रों से तेरा सीना सींच दूँ…
पीठ पीछे हँसने वालो के मुँह पर मंगल गा लूँ,
इस दफा फ़रिश्ते लेने आयें…तो पीछे से टोक लगा दूँ।
काश अगले जन्म तक बढ़ पाते,
तेरे प्यार के बही-खाते…

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Nazm : Ab Lagta Hai (अब लगता है…) | मोहित शर्मा ज़हन

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*) – अब लगता है….

मेरे पहरे में जो कितनी रातों जगी,
कब चेहरा झुकाए मुझे ठगने लगी,
पिछले लम्हे तक मेरी सगी,
जानी पहचानी नज़रें अब चुभने लगीं।
याद है हर लफ्ज़ जो तुमने कहा था
अब लगता है….
इश्क़ निभाना इतना भी मुश्किल न था….

अटके मसलात पर क़ाज़ी रस्म निभाए,
उम्मीदों में उलझा वो फिर कि…
…पुराने कागज़ों में वो ताज़ी खुशबू मिल जाए।
जाते-जाते एक खत सिरहाने रखा था,
अब लगता है….
इश्क़ निभाना इतना भी मुश्किल न था….

कागज़ों से याद आया कभी तालीम ली थी…..
कुछ वायदों के क़त्ल पर मिले रुपयों से…
….आसान कसमें पूरी की थी।
मासूमियत गिरवी रखकर दुनियादारी खरीदी थी…
यहाँ का हिसाब वगैरह यहीं निपटा कर मरना था,
अब लगता है….
इश्क़ निभाना इतना भी मुश्किल न था….

किसी का हाथ पकडे,
गलत राह पकड़ी,
पीछे जाने की कीमत नहीं,
उनसे नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं…
आगे जाने से इंकार करता मन बंजारा,
गलत सफर तो फिर भी राज़ी,
गलत मंज़िल इसे न गंवारा….

तो मरने तक यहीं किनारे बैठ जाता हूँ,
कोई भटका मुसाफिर आये तो उसे समझाता हूँ…
दूर राहगीर की परछाई में तेरी तस्वीर बना लेता था,
अब लगता है….
इश्क़ निभाना इतना भी मुश्किल न था….
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*) – Ab lagta hai….

Mere pehre mey jo kitni raaton jagi,
Kab chehra jhukaye mujhe thagne lagi,
pichhle lamhe tak meri sagi,
Jaani pehchaani Nazren ab chubhne lagi….
Yaad hai har lafz jo tumne kaha tha,
Ab lagta hai….
Ishq nibhaana itna bhi mushkil na tha….

Atke maslaat par Qazi rasm nibhaye,
Ummeedon mey uljha wo phir ki,
Purane kagazon mey wo taazi khushboo mil jaaye,
Jaate-jaate ek khat sirhaane rakha tha….
Ab lagta hai….
Ishq nibhaana itna bhi mushkil na tha….

Kagazon se yaad aaya kabhi taleem li thi…..
Kuch vaaydo ke qatl par mile rupayon se….
….aasaan kasme poori ki thi,
Masoomiyat girvi rakhkar Duniyadaari khareedi thi….
Yahan ka hisaab wagehrah yahin nipta kar marna tha…
Ab lagta hai….
Ishq nibhaana itna bhi mushkil na tha….

Kisi ka haath pakde,
Galat raah pakdi,
Pichhe jaane ki keemat nahi,
Unse nazren milane ki himmat nahi…
Aage jaane se inkaar karta mann banjara,
Galat safar to phir bhi raazi,
Galat manzil ise na gawara….

To marne tak yahin kinare baith jaata hun,
Koi bhatka musafir aaye to usey samjhata hun…
Door raahgir ki parchaai mein teri tasveer bana leta tha….
Ab lagta hai….
Ishq nibhaana itna bhi mushkil na tha….

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