Bageshwari # 03 Magazine

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….in Bageshwari # 03 Magazine

Sunehri jo Meera (Poem) and Dhongi Filmkaaro ki jamaat (Article) published in May 2015 edition of Bageshwari Magazine.

Google Playstore Link – http://books.google.co.in/books/about?id=wTCzCAAAQBAJ&redir_esc=y

– Mohit Sharma (Trendster) #mohitness #mohit_trendster #trendy_baba #bageshwari #rajasthan #india

झोलाछाप टैलेंट – लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)

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मेरा नाम है रवि यादव….प्यार से लोग मुझे झोलाछाप लेखक बुलाते है।
कभी अपने सपनो का पीछा करते-करते मैं मुंबई आया था। रहने के लिए कमरा ढूँढ़ते हुए डीलर ने लोकेश गौतम से मिलवाया, मेरी तरह वह भी मुंबई एक बड़ा राइटर बनने आया था। बड़ा सभ्य और सभी से प्यार से मिलने वाला बंदा था। मैं जैसे तैसे एक अखबार में लगा पर उसका कुछ नहीं हो पाया। उसमे लेखक वाली बात जो नहीं थी, इधर-उधर जोड़कर बनायीं कहानियाँ, आइडियाज कहाँ चलते है? पर उसके मुँह पर यह बात बोलने की हिम्मत नहीं थी मुझमे। शायद इसलिए क्योकि कहीं ना कहीं लोकेश में मुझे अपने बड़े भईया दिखते थे।
कुछ समय बाद मुझे बेहतर तनख़्वाह पर एक मैगज़ीन में काम मिला तो अपनी जगह मैंने उसको काम पर लगवाया। एक दिन जब घर लौटा तो देखा मेरी कुछ अधूरी स्क्रिप्ट्स गायब थी और साथ ही लोकेश का भी कोई अता-पता नहीं था। लालच में उसने मेरी कहानियां अपने नाम से एक प्रोडक्शन हाउस को बेच दी। मेरी कहानियाँ राइटर्स एसोसिएशन में रजिस्टर्ड थी पर थोड़ा बहुत हेर-फेर कर नक़ल को असल बनाने में उसे महारथ थी इसलिए केस करने पर भी कुछ साबित नहीं होने वाला था। मैंने सोचा चार-पांच स्क्रिप्टस से कितने महीने जी लेगा? मेरा दिमाग तो नहीं चुराया उसने। आखिर टैलेंट के आगे तो नक़ल को हमेशा झुकना पड़ता है।
तबसे आज 12 बरस हो चुके है। आखिरकार मेरा संघर्ष रंग लाया, मुझे एक महान हस्ती के ऊपर बन रही बड़े बजट की बायोग्राफिकल फिल्म की स्क्रिप्ट लिखने का काम मिला है। वह महान शख्स जिसके ऊपर यह फिल्म बन रही है….लोकेश गौतम।
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– मोहित शर्मा (ज़हन)
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कही अनकही – लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)

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(Bidholi, Dehradun)

*) – अस्तित्व की लड़ाई

यह बात मेरे मन में लंबे समय से थी और आज लिखने का मौका मिल पाया है। बताते है ब्रिटिश साम्राज्य में कभी सूरज नहीं ढलता था, दुनिया भर के इतने देश जो उनके गुलाम थे। उनसे पहले जगह-जगह मुसलमान शासक रहे जिन्होंने भारत के एक बड़े हिस्से समेत अनेको प्रांतो, देशो में अपना राज्य स्थापित किया। अलग-अलग राज्यों की अपनी संस्कृतियों, तौर तरीको में हमेशा आक्रमण कर जीतने का तरीका नहीं चलता था और अगर चलता भी था तो बाहरी आक्रमणकारियों से जनता में असंतोष, असहयोग की भावना रहती जिस कारणवश ऐसे शासकों के पाँव थोड़े समय बाद उस धरती से उखड जाते। इस समस्या से पार पाने की जो योजना विदेशियों ने सदियों पहले सोची उसपर भारतवासियों ने आजतक अमल नहीं किया। हमारी प्रवृति में कहीं आक्रमण करना नहीं है। पर आजकल तुलनात्मक बातों में भारत, सनातन धर्म और लोगो के बारे में कई अफवाहें फैली हुई है जिस वजह से कई लोग हम लोगो से, हमारे धर्म से डरते है या हेय दृष्टि से देखते है। परिणामस्वरूप हर किसी को जैसे हमारी बेइज़्ज़ती करने का या मज़ाक उड़ाने का लाइसेंस मिला हुआ है।

अनजान भारी-भरकम शब्दों, बातों और उदाहरणों से हर कोई पीछे हटता है। तो छूटते ही अपने ग्रंथो, श्लोक, दंतकथाओं आदि के उदाहरण ना दें। कहीं भी अपने पाँव ज़माने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है उस जगह की संस्कृति, लोगो, भाषाओ आदि स्थानीय बातों की समझ बनाकर वहां जनता से संवाद बनाना, मैत्रीपूर्ण बंधन बनाना और फिर धीरे-धीरे अपनी संस्कृति, बातों से उन्हें अवगत कराते हुए उस संस्कृति का हिस्सा बनाना। परिस्थितियाँ अब आधी शताब्दी पहले जैसी नहीं है पर हमारे अस्तित्व की लड़ाई अब भी है। श्री श्री रविशंकर, बाबा रामदेव ने अपने तरीको से अच्छा प्रचार किया है (हालाँकि, देसी-विदेशी मीडिया उनका उपहास उड़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ता।) कोशिश यह होनी चाहिए कि हम बाहरी सकारात्मक बातों को अपनी संस्कृति में समाहित करें और अपनी संस्कृति की अनेको अच्छी बातों का समावेश विदेशों के तौर-तरीकों में करवायें। तो इंग्लिश या अन्य भाषाओँ, पहलुओं से भागें नहीं बल्कि उन्हें सीखें ताकि आगे चलकर आप अपने पहलु दूसरो को सिखा पायें क्योकि प्रकृति का नियम है – बड़ी मछली छोटी मछलियों को आहार बनाती है, इस समय धाराएँ प्रतिकूल है और कुछ बड़ी मछलियाँ छोटी-छोटी संस्कृतियों को निगल भी रही है, एक-आध सदी बाद यह नौबत हमपर ना आये तो सचेत हों जायें।
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*) – बातों-बातों में आप सुनते होंगे कि “मैं तो 50-55 तक जी लूँ एक्टिव लाइफ, क्योकि मुझे बुढ़ापे का दर्द नहीं झेलना।” उम्र के उस पड़ाव की काफी अहमियत है जिसको हम नज़रअंदाज़ कर देते है। सबसे पहले तो बूढ़े व्यक्ति एक सिंबल की तरह होते है, जिनका जीवन स्वयं में अनेको शिक्षाएं लिए होता है। जीवन के कई अनुभवों से वो परिवार के सक्रीय सदस्यों को सीख देते रहते है। साथ ही उनके रहते हुए आम तौर पर संतानो में शान्ति रहती है 12-15 साल। इस शान्ति का एक प्रमुख कारण संपत्ति होती है। ऐसी कुछ और बातें है पर वह बताने से पहले यहाँ मैं आप लोगो के इस विषय पर विचार जानना चाहूंगा।

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*) – ऐसे निष्कर्षों पर ना कूदें….

बहुत से प्रयोग करने के बाद एक रचनाकार, फिल्मकार उस स्तर पर पहुँचता है जहाँ रचना गढ़ते (बनाते) समय उसके लिए उस रचना में प्रयुक्त जगहों, बातों, किरदारों का वर्गीकरण मायने नहीं रखता। उदाहरण स्वरुप अनुराग कश्यप को कुछ जगह नारी विरोधी बताया जाता है क्योकि उनकी फिल्मो में नेगेटिव किरदारों में महिलायें आती रहती है। पर यह नोट करने वाले समीक्षक, आलोचक और प्रशंषक भूल जाते कि उन्होंने अब तक उन किरदारों से कई गुना अधिक वैसे नकारात्मक गुणों वाले रोल्स में पुरुषों को कास्ट किया है। इतना सब काम करने के बाद वो किसी वर्ग के दोस्त अथवा दुश्मन नहीं होते बल्कि अपनी कहानी अनुसार किरदारों के दोस्त या दुश्मन बन जाते है। यथार्थवादी और प्रतिभावान व्यक्तियों के प्रयासों पर इतनी जल्दी ऐसे निष्कर्षों पर आना ना सिर्फ उनकी मेहनत का उपहास उड़ाना होगा बल्कि उन्हें बेवजह बदनाम करना भी होगा। अगर आपको एक ढर्रे पर चलने की आदत है और कोई उसपर नहीं चल रहा इसका मतलब यह नहीं की उसमे कोई कमी है।

एक बटन सा.. – मोहित शर्मा (ज़हन)

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एक बटन सा…(Laghu Katha)

#mohitness #mohit_trendster #trendy_baba #freelance_talents

छोटे शहर के एक बड़े साइकोलॉजिस्ट जाधव जी के खाली क्लीनिक में एक और आलसी शाम। 31 वर्षीय शिवांश कुमार को संतुष्टि मिली कि कोई अन्य मरीज़ ना होने के कारण “डॉक्टर” के साथ उसे अधिक समय का सेशन मिल जाएगा। कुछ औपचारिकता के बाद डॉक्टर के केबिन में….

शिवांश – “वैसे तो मैं आपके पास ना आता पर आपका इंटरव्यू पढ़ा जिसमे आपने सही कहा कि जब जिम जाने वालो को अपंग नहीं समझा जाता तो आपके पास आने वालो पर यह धब्बा क्यों लगाया जाता है कि वो मानसिक रूप से ठीक नहीं? आपके सेशंस को एक्सरसाइज की तरह लिया जाना चाहिए।”

जाधव जी – “धन्यवाद! छिट-पुट मानसिक परेशानी हर इंसान को होती है। मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ तो कोई नहीं होता। तो शुरू कीजिये, बताएँ समस्या क्या है?”

शिवांश – “डॉक्टर लाइफ मौज में कट रही थी, सब कुछ कितना साफ़-सरल था फिर पता नहीं कोई बटन सा दबा और मैं 2008 से सीधा 2015 में पहुँच गया। कुछ समझ नहीं आ रहा क्या करूँ। अब या तो लाइफ रिवर्स करने का उपाय बताएं या फिर इतना सुनिश्चित करवा दें कि आगे कभी ऐसा कोई बटन ना दबे जीवन में…. ”

– मोहित शर्मा (ज़हन)

Comic Fan Fest # 03 (19 April, 2015)

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Comic Fan Fest # 03 (19 April, 2015)
दिल्ली में आयोजित कॉमिक फैन फेस्ट अप्रैल 2015 धमाकेदार इवेंट का हिस्सा बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। एक के बाद एक इतना सब था इस इवेंट में कि समय का पता ही नहीं चला जिसके लिए एक बार फिर से दीपक चौहान, आकाश मोहनीश बधाई के पात्र है। बैज, केक, गिफ्ट्स आदि में काफी बारीकी से सोचा गया और सोच को मूर्त रूप देने के लिए हफ्तों की मेहनत की गयी। राज कॉमिक्स पर आकाश द्वारा बनायीं गयी एंड्राइड एप, मेहमान कलाकारों द्वारा बनाये गए चित्र बेहतरीन थे। प्रदीप शेरावत जी, जगदीश कुमार जी और जय खोहवाल भाई के अलावा इस बार ललित शर्मा जी ने आयोजन की रौनक बढ़ाई। मैं धनंजय, अभिमनु, आयुष और नितिन मुंजाल जी से पहली बार मिला। लोकेश, संजय और अयाज़ ने मुझे कॉमिक्स, किताबें और पोस्टर गिफ्ट में दिए । इस अवसर पर मेरी लिखी शार्ट फिल्म बावरी बेरोज़गारी भी आयोजको के सौजन्य से चली। शिवांक द्वारा विभिन्न हस्तियों की मिमिकरी और आयुष का एक्ट मनोरंजक थे। बीच में सभी के अलग-अलग मुद्दो पर गंभीर पर रोचक संवाद हुए। सदाबहार रवि भाई और शुभांकित बिना मंच पर आये ही अपनी बातों-कमेंट्स से सबका मनोरंजन कर रहे थे।
Ravi Yadav, Jai Khohwal and Pradeep Sherawat
अंत में यही कहूँगा कि यह आयोजन पिछले वर्ष दिसंबर कॉमिक फैन फेस्ट के आयोजन से बेहतर था, आगे यह उम्मीद करता हूँ कि कॉमिक फैन फेस्ट और बड़े स्तर पर पहुँचे, सदस्यों एवम आयोजको की मेहनत और योजनाएँ देखकर लगता है ऐसा ज़रूर होगा।
– मोहित शर्मा (ज़हन)

Meri Aazadi ka Ruab (Kavya Comics)

Meri Aazadi ka Ruab (Kavya Comics) exclusively at Fenil Comics website and social media pages. by yours truly, Yash (Harish Atharv) Thakur, Soumendra Majumder, Ajay Thapa and Manabendra Majumder. – Mohit Trendster

Meri Azadi ka Ruab

Short Film – Bawri Berozgari (Freelance Talents)

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Short film by Pune based Theatrix Group & yours ‪#‎Trendster‬ “Bawri Berozgari” received mostly positive reviews @ Comic Fan Fest April 2015
https://www.youtube.com/watch?v=a0pc6Tustrg
– Mohit Trendster

नवीन रंजिश – मोहित शर्मा (ज़हन) #mohit_trendster

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यह कहानी है दो खानदानों के बीच पीढ़ियों से चली आ रही रंजिश की, जिसका अंत देखने सुनने वालो को असंभव लगता था। बदले ज़माने के नये परिवेश में भी राणा और वर्मा परिवारों की दुश्मनी बरकरार थी, और होती भी क्यों ना? इनके पुरखों ने ना जाने कितनी आहुतियाँ दे डाली थी अब तक इन झगड़ों में। सीधे ढर्रे पर चलते जीवन में जैसे सुर्ख रंग की मिलावट की आदत पड़ गयी थी इन्हे।
आज बरसो बाद एक बार फिर से दोनों परिवार आमने सामने थे। क्या पुरुष – क्या महिला, सबकी आँखों में बरसों का रोष झलक रहा था। एक तरफ वर्मा परिवार के मुखिया भानु वर्मा, जिन्हे अपनी पीएचडी डिग्री का गुमान और दूसरी तरफ राणा परिवार के सर्वेसर्वा संग्राम राणा जिन्होंने अपने पुरखों की शान में अपनी मूँछे नहीं कटाई। पर यह ऊपरी आडम्बर किसकी तसल्ली के लिए गढ़े जा रहे थे इसका जवाब किसी के पास नहीं था?
क्या इतिहास खुद को आज दोहराने वाला था? तो क्या कहानी का एक और पन्ना खून के रंग में रंगने वाला था? जानते हैं भानु वर्मा की शान, उनके अनुज बलिदान वर्मा कि ज़ुबानी।
“अरे कुछ ना हुआ भैया जी….मैं पहले ही कह रहा था कि बात सुलटा लो पर दोनों तरफ इतने कलमुँहे, कुल्टा लोग भरे पड़े है कि नहीं जी चाहे मकान-दुकान चले जायें पर आन-बान-शान ना चली जाये। और सब लड़ने को तैयार, मेरी भी मती मारी गयी थी जो जोश में आकर अपने भईया से भी आगे कूद के आगे आ गया। वही बात है कि जब एड्रिनलिन पम्प करता है तो आदमी जम्प करता है। तेज़ बहस, ललकारों को सुनकर मुफ्त की लड़ाई देखने की आस में भीड़ इखट्टा हो गयी, जिनको देखकर पास के स्कूल से हटकर चूरन-चाट वालो ने हमारे आस-पास ठेले लगा लिए। दोनों साइड जो कुछ एक लड़ना नहीं चाह रहे थे उन्हें लगा कि इतनी भीड़ और ठेले लग गये है उन्हें निराश घर नहीं भेजना चाहिए।
जंग का आगाज़ हुआ और……आई मम्मी इतनी ज़ोर का सरिया लगा ना मेरे खोपड़े पे कि डेढ़ सेकंड में गिव-अप कर दिया मैंने और चुस्की वाले की रेहड़ी की टेक लेके बैठ गया। लड़ाई शुरू होती इस से पहले ही गली के अपार्टमेंट की एक बालकनी जहाँ पूरी नवीन किराना स्टोर जॉइंट फैमिली संडे मूवी का प्लान कैंसल कर के हमारे युद्ध के एंटरटेनमेंट से अपने पैसे बचाने के मूड में थी, छज्जे समेत हम सबके ऊपर डह गयी।
संग्राम राणा परं ईंटो की बरसात हो गयी, जिसमे से एक ईंट ने घिसट कर उसकी मूँछ को नेस्तोनाबूद कर दिया। मेरे बड़े भ्राता भानु के खोपड़े पर नवीन किराना वालो कि नववधु का घुटना ऐसा लगा कि वह पीएचडी डॉक्टर से सीधा सातवी कक्षा वाले हो गए। ऊपर किसी कि गंदी नाली का पाइप चोक था वो टूटकर हमारी बहु-बेटियों का मेकअप धो गया।
किसकी टांग कौनसी है, किसकी कोहनी किसके पेट में चुभ रही है….कुछ पता नहीं। दुश्मनो के जो मुँह एक दूसरे को देखना तक पसंद नहीं करते थे वो मलबे के नीचे कामुक मुद्राओं दबे अनचाहे आपस में कहाँ-कहाँ चुंबन ले रहे थे। ताऊ जी जो मिलने आये थे और मज़े-मज़े में साथ आ गए और नवीन किराने वालो के कुत्ते के मुँह इस तरह मलबे में आमने-सामने पोज़ीशण्ड थे कि मदद आने तक कुत्ते से मुँह चटवाने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं था। ये जो रायता फैला इसके साफ़ होने के बाद पता चला दोनों पार्टीज की नानीयां, दादियां टकली हो गयी है। फिर किसी ने बताया की बुढ़िया के बाल वाले के कस्टमर ज़्यादा हो गए थे इसलिए उसने…..”
अंत में अस्पताल में ही सुलह हुई और दोनों परिवारो को यह बात समझ आई कि पुरानी रंजिशों को चलाते रहने में समझदारी नहीं है। अब दोनों परिवारो कि नयी रंजिश शुरू हुयी……नवीन किराना स्टोर फैमिली से।
– मोहित शर्मा (ज़हन) #mohitness #mohit_trendster #freelance_talents

Nyctophobia Struggle…. #mohit_trendster

Nyctophobia Struggle….

My entry for Red Streak Publications Fire for Fear Contest.
Entry #4
from meerut
डर हर किसी के जीवन का अंग है, बस उसके कारक अलग-अलग हो सकते है पर डर का अनुभवकभी ना कभी हम सभी करते है। अपने अनुभव से मैंने यह सीखा है कि डर को टाल कर हम उसे अपनी आदत में आने का और बड़ा होने का अवसर दे देते है जबकि उसका सामना कर उसको हराना उतना मुश्किल नहीं जितना हम समझते है। जीत कभी तुरंत मिल जाती है और कभी धीरे-धीरे भय को मारा जाता है।
मेरा डर अँधेरे से था। वजह तो पता नहीं पर बस यही एक बात थी जिस से मुझे बेचैनी होती थी। बचपन तो मम्मी-पापा के बीच में राजा की तरह सोकर कट गया पर टीनएजर होने पर बड़े भैया और दीदी के अलग शहरों में जाने के बाद अपना कमरा मिला तो रात में लाइट ऑफ करना मेरे लिए एक संघर्ष बन गया। जैसा मैंने कहा कि इसका कारण मुझे याद नहीं पर अवचेतन मन में शायद कोई बचपन में सुनी कहानी घर कर गयी थी या मैंने खुद ही कोई अनजान अनुभव गढ़ लिया था। धीरे-धीरे घरवालो ने इस आदत के लिए टोकना शुरू किया पर हमेशा मेरे पास कुछ ना कुछ बहाने रहते थे लाइट जली छोड़ने के। शायद समय के साथ मेरे पिता जी जान चुके थे पर मुझे बुरा ना लगे इसलिए उन्होंने कभी ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया इस बात पर मेरे बड़े होने के बाद भी।
यह भय केवल अंधकार का नहीं था बल्कि उसमे गढ़ी अज्ञात बातों, काल्पनिक भूत-प्रेतों, जीवों का भी भय था। जब भी लाइट ऑफ कर सोने की कोशिश करता तो ऐसा लगता जैसे कोई कमरे में बैठा मुझे देख रहा है। उस ओर पीठ कर सोने को होता तो लगता कि वह और पास आ गया है। वैसे अंधेरे में कहीं बाहर टहलने में, किसी अँधेरी जगह जाने में यह डर शायद इसलिए नहीं लगता था क्योकि मन को गाड़ियों-लोगो कि आवाज़ों से यह तस्सली रहती थी कि आस-पास कोई है और कुछ अनहोनी होने पर मैं दौड़ कर उनके पास पहुँच सकता हूँ। पर रात को ना लोगो कि आवाज़े रहती और ना ही मैं परिवार के सदस्यों को परेशान करना चाहता था इसलिए चाहे-अनचाहे मुझे अपने कमरे में मुझे घूरते अनजान जीवों के साथ रहना पड़ता।
इन्वर्टर आम होने के ज़माने से पहले लाइट जाने पर रात में अगर मेरी नींद खुलती तो 15-20 मिनट्स तक करवटें बदलने तक अगर लाइट वापस नहीं आती तो मुझे बरामदे में टहलना पड़ता जहाँ दूर की स्ट्रीट लाइट्स से, घरों से थोड़ी बहुत रौशनी रहती थी। वैसे तो टोर्च भी थी पर घुप्प अँधेरे में टोर्च की रौशनी घरवालो का ध्यान खींच सकती थी और उसे किसी तरह ढकने या एंगल बदलने पर फायदा ना होता। पूरी कोशिश रहती थी की मेरे परिवार पर यह बात ज़ाहिर ना हो इसलिए रात में कम से कम हरकते करता था। एक बार तो सरकारी मकान में अपने कमरे कि खिड़की के कोने में अच्छा-खासा छेद कर दिया जिस से लाइट जाने पर भी दूर अलग फेज़ की स्ट्रीट लाइट की बीम से कमरे में थोड़ा उजाला रहे।
समय के साथ चीज़ें बदली पर यह आदत जैसे मेरे रूटीन में आ गयी। अगर मैं कहीं किसी के यहाँ कुछ दिनों के लिए बाहर जाता या किसी फंक्शन आदि वजह से कोई मेरे कमरे में सोता तब मुझे ऐसा कोई डर नहीं लगता था। पर यह बात 25 साल के हो जाने के बाद भी जारी रहने पर मुझे परेशान करने लगी। जब भी मैं लाइट बंद कर सोने की कोशिश करता तो कुछ ही देर में इतनी बेचैनी हो जाती कि उठकर स्विच ऑन करना पड़ता। अब खुद पर गुस्सा बढ़ने लगा था। पहले तो 6 फ़ीट से ऊपर अपने शरीर को देख कर लगता था कि ऐसा क्यों करता हूँ मैं, फ़िर इस बात को बचपन से अब तक घसीटते जाने पर। एक यह सोचने पर हँसी और रोष दोनों आते थे कि बचपन से अब तक मैं कितनी लाइट वेस्ट कर चुका हूँ इस डर के चक्कर में।
समस्या पर गौर करने पर मैंने पाया कि अब तक मैं सिर्फ इसको अनदेखा कर रहा था, टालते हुए बच रहा था पर असल में मैंने कभी इसका सामना तो किया ही नहीं। सबसे पहले तो मैंने पाया की मेरा शरीर और मेरी आँखें रात में रौशनी की इतनी अभ्यस्त हो चुकी थी कि उजाला कम या बंद होने पर अपने आप मेरी नींद टूट जाती थी, शायद तभी कहते है कि बहुत लम्बे समय तक बुरी आदत के साथ रहने पर उस से पीछा छुड़ाना लगभग नामुमकिन सा हो जाता है। फिर मैंने अपने कमरे में रात के लिए अलग से ज़ीरो वॉट का बल्ब लगाया और कुछ हफ्ते उसमे सोया। जब मुझे कुछ अंतर महसूस हुआ तो समय था डर से सीधे उसके इलाके में युद्ध करने का। मैंने एक रात वह बल्ब भी ऑफ कर दिया पर पूरी रात सो नहीं पाया, पसीने से लथपथ बेचैनी का यह सिलसिला कुछ दिनों तक चला। फिर मैंने ध्यान बटाऊ टैक्टिक्स सोचे जैसे सोने से पहले खुद को अलग-अलग विचारों में डुबा देना, एक्सरसाइज से बहुत थका लेना, भगवान जी का स्मरण करते रहना, म्यूजिक सुनना आदि जिस से फायदा हुआ पर लगा कि यह भी भय को टालना हुआ, उसका सामना करने के बजाए।
अब मैंने बिना सहारे के सीधा मुकाबला करने की ठानी। मैं कमरे में हर उस तरफ उन काल्पनिक आँखों में देखता रहता जब तक मुझे नींद नहीं आती। अंतर लग रहा था, मैं बेहतर महसूस कर रहा था। कुछ दिन बाद अपने रूटीन में मैंने बिस्तर से तुरंत उठ कर कमरे के उन कोनो, जगहों पर जाकर घूरना शुरू कर दिया जहाँ मुझे लगता कोई मुझे बैठा/खड़ा घूर रहा है। इस बात कि घूरने वाले/वाली को शायद आदत नहीं थी, अब मैं भी अंधेरे के उन काल्पनिक लोगो को वैसे ही परेशान कर रहा था जैसे होश संभालने के बाद से अब तक उन्होंने मेरी नींद हराम कि थी (और मेरे पापा का बिजली का बिल बढ़वाया था)। आखिरकार मैंने इस डर को खुद से अलग कर लिया था और जैसे एक भ्रम को राख कर मन से एक भारी बोझ कम कर लिया। मैं चैन से सोने के लिए अब उजाले पर निर्भर नहीं। अब कभी कभी वह घूरने वाला कमरे मे आता है तो उस तरफ मुस्कुरा कर आराम से सो जाता हूँ।
– Mohit Sharma (Trendster) from Meerut, U.P. #fireforfear

परदे के पीछे (Laghu Katha) – मोहित शर्मा (ज़हन)

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…परदे के पीछे
प्रतिष्ठित टीवी चैनल के आगामी रिएलिटी शो के लिए बैठी कॉलेज से निकली उत्साहित इंटर्न टीम ने हज़ारों एंट्रीज़ में से काफी मशक्कत के बाद कुछ दर्जन योग्य लोग छांटें। तभी उनके सीनियर्स काम का अवलोकन करने पहुँचे।
इंटर्न – “मैडम! इन लोगो कि प्रोफाइल्स हमारे शो के प्रारूप से फिट बैठती है, अब इनमे से किसका चयन करें और किसका नहीं? सब लगभग बराबर से है।”
प्रबंधक मैडम – “इनमे से कोई भी नहीं चलेगा।”
इंटर्न – “ऐसा क्यों मैडम?”
प्रबंधक मैडम – “फिर से लिस्ट बनाओ और अनाथ, अपंग, अपराध या उत्पीड़न के शिकार लोगो को सेलेक्ट करो। उनकी कहानी बोरिंग हो तो उसमें और ड्रामा एलिमेंट्स जोड़ों। ऐसे ही किसी को भी सेलेक्ट मत किया करो….”
– मोहित शर्मा (ज़हन) ‪#‎mohitness‬ ‪#‎mohit_trendster‬

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