Horror-Educational Genre Mix: Samaj Levak (Freelance Talents)

00 (1)New experimental genre mix, समाज लेवक (Samaj Levak) – Social Leech (Educational-Horror Comic)

Illustrators: Anand Singh, Prakash Bhalavi (Bhagwant Bhalla), Author: Mohit Trendster, Colorist: Harendra Saini, Letterer: Youdhveer Singh

https://goo.gl/uqV8FV

https://goo.gl/2AuveV

https://goo.gl/euqPFu

https://goo.gl/VdrXy1

http://freelea.se/mohit-trendster/samaj-levak-horror-comic 

creditsAlso Available: Google Play, Google Books, Readwhere, Magzter, Dailyhunt, Ebook360 and other leading websites, mobile apps.

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इश्क़ बकलोल (उपन्यास) समीक्षा

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“इश्क़ बकलोल”, नाम पढ़कर आपको लगा होगा कि खुद में एक बड़ा बाज़ार बन चुकी फूहड़ता का फायदा उठाने को एक पुस्तक और लिख दी गयी। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। किसी रोलरकॉस्टर राइड सी भारतीय परिवेश में भावनाओं की गुत्थमगुत्था है इश्क़ बकलोल। 2012 में देवेन पाण्डेय जी ने अपने अनुभवों, इनके साथ घटी बातों पर लिखना शुरू किया तब लगा कि कई शौकिया लेखकों की तरह ये कुछ समय बाद लेखन को टाटा कर देंगे। नौकरी, पारिवारिक ज़िम्मेदारियां संभालते हुए इन्होने लेखन जारी रखा और कम समय में काफी सुधार किया। एक दिन इनका मैसेज आया कि इन्होने एक उपन्यास लिखा है और मैं उपन्यास की इंट्रो पोएम लिखूं। उपन्यास का संक्षिप्त आईडिया जो सुना उसके अनुसार एक नज़्म भेज दी। सूरज पॉकेट बुक्स के सौजन्य से इश्क़ बकलोल अब बाजार में उपलब्ध है, जिसकी अच्छी बिक्री हो रही है।

कवर पेज इंटरनेट से किसी स्टॉक तस्वीर को ना लेकर आकर्षक चित्रांकन रखा गया। सूरज पॉकेट बुक्स की ये पहल मुझे बढ़िया लगी। कहानी के विस्तार में ना जाकर इतना कहूँगा कि इसे रोमांटिक के बजाय एक सामाजिक उपन्यास कहना उचित होगा। भारतीय समाज के अंदर बसी विविधता को बड़ी सुंदरता से दर्शाया है। जीवन की घटनाओं – दुर्घटनाओं के बीच किस तरह हम बिना सोचे कितना कुछ कर जाते हैं (या असमंजस में कुछ नहीं करते) जिनके दूरगामी परिणाम जीवन की दिशा बदल देते हैं। कहानी के दौरान पात्रों की प्रवृत्ति -नज़रिये में आये बदलाव अच्छे लगे। अक्सर ज़बरदस्ती करैक्टर आर्क दिखाने के चक्कर में घटक जोड़ दिए जाते हैं वो यहाँ नहीं हुआ। मनोरंजन की दुनिया में मार्केटिंग जुमला बन चुके फ़र्जी देसीपन की जगह यहाँ किरदारों में असली देसीपन पढ़ने को मिला। कुछ जगह भाषा शैली, कथा के प्रवाह और दृश्य परिवर्तन में सुधार की सम्भावना है, जिसे पहले प्रयास के हिसाब से अनदेखा किया जा सकता है। ये देवेन जी का स्नेह है कि कहानी में एक किरदार मेरा भी है। मुझे पता चला कि मेरा किरदार बड़ा था पर कहानी के लिए उसे छोटा करना पड़ा (इस कारण रेटिंग में आधा अंक काट लेता हूँ….हाहा)। आशा है आगामी उपन्यास और भी धमाकेदार हो। शुभकामनाएं!

उपन्यास के संसार में देवेन पाण्डेय के पदार्पण को मैं रेट करता हूँ – 7.5/10

P.S. मुझे नहीं पता कि मैं रात के डेढ़ बजे अपनी रसोई में धूप का चश्मा लगाकर सेल्फी क्यों ले रहा हूँ।

प्रकृति और मानव की एक कहानी पर कॉमिक…

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New Comic: Pagli Prakriti – पगली प्रकृति (Vacuumed Sanctity), Hindi – 15 Pages. English version coming soon.

Readwhere – https://goo.gl/r3snfZ

Google Play – https://goo.gl/Drp1Bs

Issuu – https://goo.gl/e7H8Hq

Nazariya Now – http://www.nazariyanow.com/2017/11/Vacuumed-Sanctity.html

Comics Our Passion – http://www.comicsourpassion.com/2017/11/vacuumed-sanctity.html

Also available: Dailyhunt App, Google Books, Slideshare, Scribd, Ebooks360 etc.Team – Abhilash Panda, Mohit Trendster, Shahab Khan, Amit Albert

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नादान मानव की छोटी चालों पर भारी पड़ती प्रकृति की ज़रा सी करवट की कहानी…

किसका भारत महान? (कहानी) #ज़हन

21369234_10155296195743393_8869409205061140518_nArtwork – Martin Nebelong

पैंतालीस वर्षों से दुनियाभर में समाजसेवा और निष्पक्ष खोजी पत्रकारिता कर रहे कनाडा के चार्ली हैस को नोबेल शांति पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई। नोबेल संस्था की आधिकारिक घोषणा के बाद से उनके निवास के बाहर पत्रकारों का तांता लगा था। अपनी दिनचर्या से समय निकाल कर उन्होंने एक प्रेस वार्ता और कुछ बड़े टीवी, रेडियो चैनल्स के ख़ास साक्षात्कार किये। दिन का अंतिम साक्षात्कार एशिया टीवी की पत्रकार सबीना पार्कर के साथ निश्चित हुआ। एशिया के अलग-अलग देशों में अपने जीवन का बड़ा हिस्सा बिताने वाले चार्ली खुश थे कि अब उन्हें पाश्चात्य पत्रकारों के एक जैसे सवालों से अलग कुछ बातें मिलेंगी।

काफी देर तक अलग-अलग मुद्दों पर चर्चा करने के बाद सबीना ने कुछ संकोच से पूछा। “मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि इतनी समस्याओं में आपने अभी तक भारत का नाम नहीं लिया?”

चार्ली – “क्या आप चाहती हैं कि मैं भारत का नाम लूँ?”

सबीना – “मेरा वो मतलब नहीं था। मैं कहना चाहती हूँ कि भारतीय समाज में इतनी विकृतियाँ सुनने में आती हैं, हर रोज़ इतने अपराध होते हैं….मुझे लगा आपके पास कहने को बहुत कुछ होगा।”

चार्ली – “बिल्कुल! भारतीय समाज में बहुत सी कमियाँ हैं, अक्सर अपराध सुर्खियाँ बनते हैं पर क्या आपको पता है 200 कुछ देशों की दुनिया में लगभग चौथाई देश ऐसे हैं जिनकी अधिकतर आपराधिक ख़बरें, सरकार की गलतियाँ, जनता का दुख सरकारी फ़िल्टर की वजह से वहाँ से बाहर दुनिया में नहीं जा पातीं…वहाँ की तुलना में भारत स्वर्ग है। उन देशों के अलावा कई देशों में शिक्षा और सामाजिक व्यवस्था ऐसी है कि बच्चो में अपने धर्म, देश की निंदा को हतोत्साहित किया जाता है और एक समय के बाद इस सामाजिक अनुकूलन (सोशल कंडीशनिंग) के कारण स्थानीय लोगो, मीडिया द्वारा बाहर के देशों में किसी बड़ी अप्रिय घटना के अलावा अपनी “सामान्य” या “अच्छी” छवि की रिपोर्ट्स भेजी जाती हैं। जबकि भारत में मैंने इस से उलट ट्रेंड देखा है।”

सबीना – “मैं आपकी बात समझी नहीं। कैसा उल्टा ट्रेंड?”

चार्ली – “मान लीजिये अगर दुनिया के किसी हिस्से में हुई त्रासदी में 3 दर्जन लोग मरते हैं, ये हुई पहली खबर और दूसरी खबर में भारत का कोई स्थानीय दर्जे का नेता एक रूढ़िवादी या बेवकूफाना बयान देता है। अब यहाँ ज़्यादा संभावना यह है कि भारत के नेता के गलत बयान वाली खबर, कहीं और हुई 36 लोगो की मौत वाली खबर से बड़ी बन जायेगी और दुनिया के कई हिस्सों में पहुँचेगी। इतना ही नहीं बाकायदा उस खबर का फॉलो अप भी होगा। जब लगातार किसी देश से जुडी नकारात्मक ख़बरें अंतरराष्ट्रीय मीडिया में जाती रहेंगी तो देश-दुनिया के लोगो में भारत की वैसी ही छवि बनेगी जैसी आपके मन में हैं। वर्तमान भारत अपने इतिहास के समय सा महान नहीं है पर दुनिया की नर्क सरीखी जगहों में भी नहीं है….यह देश कहीं बीच में है। किसी बात के औसत में सत्तरवें नंबर पर लटका है तो कहीं बत्तीसवां है, जो इतनी जनसँख्या और कदम-कदम पर दिखती सामाजिक विविधता में अचंभित करने वाली बात है। अब यह भारतीय लोगों पर है वो औसत से ऊपर जाते हैं या नीचे।”

सबीना – “…मतलब आप चाहते हैं भारतीय लोग और मीडिया अपनी कमियों पर बात करना छोड़ दें?”

चार्ली – “मैं चाहता हूँ भारत के लोग, मीडिया अपनी कमियों पर बात करने और कमियों का स्पीकर युक्त ढोल बजाने में अंतर समझें। अगर ऐसा नहीं  होता है तो बाहरी देशों में भारत की छवि धूमिल होती जायेगी जिसका गहरा असर पर्यटन, व्यापर, कई देशों से द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ेगा। इतना ही नहीं भारतीय लोगो में एक-दूसरे के प्रति वैमनस्य की भावना बढ़ती जायेगी। फिर यह देश अपनी क्षमता से नीचे जाता रहेगा।”

अपनी असहजता मिटाने के लिए सबीना ने अन्य मुद्दों से जुड़े सवाल पूछने शुरू कर दिए।

समाप्त!

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#mohitness #मोहित_शर्मा_ज़हन #mohit_trendster #freelance_talents

Daraaren Darmiyan (Ishq Baklol Poetry)

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कल देवेन पाण्डेय जी की नॉवेल इश्क़ बकलोल की प्रति मिली। 🙂 किताब का अमेज़न हार्डकॉपी लिंक जल्द ही एक्टिव होगा। उपन्यास शुरू होने से पहले किताब के 2 पन्नो पर मेरी कलम है….

दरिया में तैरती बोतल में बंद खतों की,
पलकों से लड़ी बेहिसाब रातों की,
नम हिना की नदियों में बह रहे हाथों की,
फिर कभी सुनेंगे हालातों की…
…पहले बता तेरी आँखों की मानू या तेरी बातों की?
चाहे दरमियाँ दरारें सही!

ये दिल गिरवी कहीं,
ये शहर मेरा नहीं!
तेरे चेहरे के सहारे…अपना गुज़ारा यहीं।
जी लेंगे ठोकरों में…चाहे दरमियाँ दरारें सही!

नफ़रत का ध्यान बँटाना जिन आँखों ने सिखाया,
उनसे मिलने का पल मन ने जाने कितनी दफा दोहराया….
जिस राज़ को मरा समझ समंदर में फेंक दिया,
एक सैलाब उसे घर की चौखट तक ले आया….
फ़िजूल मुद्दों में लिपटी काम की बातें कही,
चाहे दरमियाँ दरारें सही!

किस इंतज़ार में नादान नज़रे पड़ी हैं?
कौन समझाये इन्हें वतन के अंदर भी सरहदें खींची हैं!
आज फिर एक पहर करवटों में बीत गया,
शायद समय पर तेरी यादों को डांटना रह गया।
बड-बड बड-बड करती ये दुनिया जाली,
कभी खाली नहीं बैठता जो…वो अंदर से कितना खाली।
माना ज़िद की ज़िम्मेदारी एकतरफा रही,
पर ज़िन्दगी काटने को चंद मुलाक़ात काफी नहीं….
ख्वाबों में आते उन गलियों के मोड़,
नींद से जगाता तेरी यादों का शोर।
मुश्किल नहीं उतारना कोई खुमार,
ध्यान बँटाने को कबसे बैठा जहान तैयार!
और हाँ…एक बात कहनी रह गयी…
काश दरमियाँ दरारें होती नहीं!
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#ज़हन

काव्य कॉमिक्स – मतलबी मेला (फ्रीलैंस टैलेंट्स)

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New poetry Comic “Matlabi Mela” published, based on my 2007 poem of the same name.
*Bonus* Added an extra poem “खाना ठंडा हो रहा है…” in the end.
Language: Hindi, Pages: 22
Illustration – Anuj Kumar
Poetry & Script – Mohit Trendster
Coloring & Calligraphy – Shahab Khan

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Available (Online read or download):
ISSUU, Freelease, Slideshare, Ebook Home, Archives, Readwhere, Scribd, Author Stream, Fliiby, Google Books, Play store, Daily Hunt, Smashwords, Pothi and Ebook Library etc.

हाँ पता है…(feat. जूता) – सामाजिक कहानी

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सज्जन – “मोहित जी आपको पता है फिलिस्तीन के लोगो पर इजराइल कितना ज़ुल्म कर रहा है? म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय का क्या हाल किया है वहाँ के बहुसंख्यक बौद्ध समाज ने?”

“हाँ जी! पता है…और मुझे नाइजीरिया में बोको हराम द्वारा सरकार से युद्ध और स्थानीय लोगो का नरसंहार पता है, दशकों से इराक़ और तुर्की द्वारा लगातार कुर्द, यज़ीदी समुदाय की एथनिक क्लेंज़िंग पता है, पाकिस्तान, ईरान के विरुद्ध बलूचिस्तान के लोगो संघर्ष पता है, अंगोला में चल रही कबीना लड़ाई पता है, रूस-चेचेन्या क्राइसिस पता है, रूस-यूक्रेन युद्ध पता है, इंडोनेशिया और पपुआ निवासियों के कुछ वर्गों की लड़ाई पता है, कोलंबिया, मेक्सिको और दक्षिण अमेरिकी देशों में नशे के व्यापार में चल रहे संघर्ष पता हैं, इतना ही नहीं माली, सूडान, दक्षिण सूडान, सीरिया, कांगो, सोमालिया, यमन, फिलीपींस, अफगानिस्तान, केंद्रीय अफ्रीका गणराज्य में चल रहे गृह युद्धों के बारे में पता है। बाकी दुनियाभर में कई छोटे-बड़े समुदाय आपस में या स्थानीय सरकारों से संघर्ष कर रहे हैं और अनेकों समुदाय संघर्ष करते-करते लुप्त हो गए।

मुझे एक बात और पता है, तुम मिडिल क्लास परिवार से हो जिनका जीवन खुद में एक जंग है। पहले अपनेआप को इतना काबिल बनाओ कि किसी गलत को सही कर सको, अपने परिवार से बाहर भी लोगो की मदद कर सको। अगर ऐसा ना कर पाओ तो गलत को गलत ज़रूर कहो पर फिर हर तरह के गलत को गलत कहो पर तुम तो मज़हब के हिसाब से ज़ुल्म देख रहे हो जो गलत है। अगर तुम्हे हर ज़ुल्म पर एक जैसा दर्द नहीं होता तो थू है तुम्हारी सोच पर! अब आगे क्या करना है पता है ना?”

सज्जन – “हाँ मोहित जी! मैं जूता उठाकर अपने मुँह पर मार लेता हूँ।”

“अरे नहीं भाई, मेरा मतलब था कि अब काम पर ध्यान दो और तरक्की करो…ताकि जिन बातों पर परेशान होते हो उन्हें बदलने की कोशिश करने लायक बन सको।”

कुछ देर बाद –
सज्जन – “समझ गया! मैं चलता हूँ।”

“रुको! मुँह इधर करो, जूता तो खाते जाओ।”

समाप्त!
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– #मोहित_शर्मा_ज़हन
Artwork – Neil Wilson
#mohitness #civilwars #crisis #selectiveoutrage #media

झुलसी दुआ (कहानी) #ट्रेंडस्टर

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सरकारी नौकरी की तैयारी में कई वर्ष बिताने के बाद सोमेश का चयन अग्निशमन कर्मी पद पर हुआ। जहाँ घरवालों में जोखिम भरी नौकरी को लेकर सवाल और चिंता थी वहीं सोमेश के तो जैसे मन की मुराद पूरी हो गयी थी। बचपन में वो सुपरहीरो बनना चाहता था, फ़िल्मी हीरो नहीं बल्कि लोगो की मदद करने वाला असली हीरो। बड़े होते-होते उसे दुनिया की ज़मीनी सच्चाई पता चली और उसने हीरो बनने का विचार तो छोड़ दिया पर लोगो की मदद करने वाले किसी क्षेत्र में जाने की बात ने उसके बचपन का सुपरहीरो फिर से जगा दिया। समाजसेवा के साथ-साथ जीविका कमाना और क्या चाहिए?

साधारण वेतन और जान के खतरे वाली नौकरी पर असमंजस में पड़े माँ-बाप और बड़ी बहन को किसी तरह मनाकर सोमेश ट्रेनिंग पर निकल गया। फायर फाइटिंग के अभ्यास में सोमेश अपने बैच में सबसे आगे था। उसके पास रहने से उसके साथी जोश, सकारात्मकता से भर जाते थे। सोमेश से पिछड़ने के बाद भी सभी उसे पसंद करते थे। ट्रेनिंग के बाद सोमेश की पहली नियुक्ति दिल्ली में हुई। उसके छोटे कस्बे की तुलना में दिल्ली जैसे पूरी दुनिया था। जहाँ उसे अपनी जगह का आराम पसंद था वहीं महानगर की चुनौती का अपना ही मज़ा था। जब उसने सुना कि दिल्ली के कुछ इलाकों में 1 वर्ग किलोमीटर में 12,000 तक लोग रहते हैं तो किसी छोटे बच्चे की आँखों जैसा अविश्वास भर गया उसमें। गर्मी के मौसम में शहर में ख़ासकर औद्योगिक क्षेत्रों में लगने वाली आग के मामले बढ़ने लगे थे। अपनी शिफ्ट में सोमेश की दमकल वैन रोज़ाना 2-3 जगह जा रही थी, शिफ्ट ख़त्म होने के बाद भी ज़रुरत पड़ने पर सोमेश पास के अपने कमरे से फायर स्टेशन पहुँच जाता था। अपनी ड्यूटी के समय से बाहर या अधिक काम करना उसके लिए इतना सामान्य हो गया था कि उसके सीनियर अधिकारीयों, सहकर्मियों ने यह बात नोट करनी तक बंद कर दी थी। उसके दोस्त हँसते थे कि दुनिया में सबसे पॉजिटिव इंसान सोमेश है, इतना ज़िंदादिल तो फिल्मों के हीरो तक नहीं होते। सोमेश वापस उन्हें कहता कि वो सब भी आशावान बनें, हमेशा अच्छा सोचें, अपने भगवान या उपरवाले पर भरोसा रखें क्योकि जिस भी जगह पर वह गया वहाँ लोग आग, भूकम्प आदि से घायल तो हुए पर किसी की जान नहीं गयी।

उसकी दिनभर की थकान नींद से कम बल्कि घरवालों से घंटे-आधा घंटे बातें कर ज़्यादा ख़त्म होती थी। अक्सर उसने कितने लोगो को कैसे बचाया, कैसे बीमारी में भी स्टेशन आने वालो में सबसे पहला वो था, कैसे घायल पीड़ित के परिजन उस से लिपट गए, कैसे ट्रैफिक में कुछ देर हो जाने पर उनपर भीड़ ने पत्थर बरसाए या उनकी पिटाई तक की।

“माँ! आज आप मानोगी नहीं। सीढ़ी पर से झूलकर बिल्डिंग से गिरता हुआ बच्चा पकड़ा मैंने, पूरे मोहल्ले ने आशीर्वाद दिया मुझे। कोई कपडे दे रहा था, कोई वैन में घर पर बनाई मिठाई ज़बरदस्ती रख गया। बच्चे की माँ तो अपना सोने का कड़ा उतार कर दे रही थी पर मैंने लिया नहीं। उसे देख कर आपकी याद आ गयी।”

माँ का मन करता था कि सोमेश बस बोलता रहे। उसकी आवाज़ में जो ख़ुशी झलकती थी वो ही माँ के लिए सबसे बड़ी दौलत थी।

“….फिर ना माँ ओखला में तुरंत दूसरी जगह जाना पड़ा। हम लोगो की गाडी ख़राब हो गई और पहुँचते-पहुँचते लेट हो गए। भीड़ ने घेर लिया और गुस्से में एक आंटी ने संजय के चप्पल बजा दी, बाकी लोग वैन की तरफ बढ़ने लगे तो मैंने माइक से समझाया कि देर हो गयी पर जो लोग फँसे हैं उन्हें बचा लेने दो फिर पीट लेना। राधे-कृष्ण की जो कृपा रही किसी को ज़्यादा चोट तक नहीं आई, सारे लोग बचा लिए।”

माँ बोली – “अपना ध्यान रखा कर। बेटा हर जगह ऐसे मत बढ़ा कर, कहीं लोग ना सुने… ”

सोमेश ने माँ को दिलासा दिया – “माँ भगवान आपकी और मेरी हर बात सुनते हैं। इतने महीने हो गए यहाँ मेरे सामने कोई नहीं मरा, ना मुझे कुछ हुआ। कुछेक  बार जलती बिल्डिंग, भूकंप से तहस-नहस घरों में फँसे लोग देखकर जब सबने उम्मीद छोड़ दी तब भगवान से माँगा बस बचा लो आपका सहारा है। जाने कैसे सबको बचा लाये हम लोग। तुम्हारे साथ-साथ दर्जनों लोगो का आशीर्वाद बटोरता हूँ रोज़। सब अच्छा होगा माँ, तुम चिंता मत किया करो।”

सोमेश पर भगवान की कृपा बनी रही और उसकी नौकरी का एक साल पूरा हुआ। एक दिन उसे शहर के बाहरी इलाके में स्थित अपार्टमेंट में लगी आग के मौके पर भेजा गया। अपार्टमेंट के आग के लिए पहले ही कुछ फायर वैन पहुँच चुकी थी पर भीषण आग बिल्डिंग से आस-पास मज़दूरों की बस्तियों में फ़ैल गयी थी। दूर-दराज़ के इलाके और तंग गलियों के कारण लोगो को बचाने में मुश्किलें आ रहीं थी। एक-एक सेकण्ड से लड़ते हुए दमकल कर्मियों के कुछ दल अलग-अलग स्थानों पर फ़ैल गए। सोमेश भगवान का नाम लेता हुआ बस्ती के अंदरूनी हिस्से में फँसे लोगो को बचाने लगा। कुछ देर में स्थिति काबू में आई पर घायलों के लिए इन अंदरूनी इलाकों तक एम्बुलेंस, अन्य मदद आने में काफी समय लगना।

तभी सोमेश की नज़र एक औरत के निर्जीव शरीर के पास खड़े 2 दमकलकर्मियों पर पड़ी। वो दोनों बहस कर रहे थे कि क्या यह औरत ज़िंदा है या नहीं। तेज़ धड़कनों के साथ जब सोमेश पास पहुँचा उसे एक पूरी तरह जल चुकी गर्भवती महिला दिखी। उस महिला ने किसी तरह हाथ की ज़रा सी हरकत से जैसे बहस कर रहे बचावकर्मियों को बताया कि अभी उसमे जान थी। तारकोल की तरह चौथी डिग्री के जले के निशानों के साथ उसका मांस जगह-जगह से उतर रहा था और चेहरे की जगह एक अधभुने मांस का चिथड़ा दिख रहा था। उसका एक हाथ पेट से जलकर पेट से चिपका हुआ था, शायद जलते हुए भी वो अपने बच्चे को दिलासा दे रही थी कि सब ठीक हो जाएगा। दर्द में उसका शरीर हल्की फड़कन कर रहा था। सोमेश ने उसको पानी पिलाने की कोशिश की पर पानी की बूंदों के मांस से छूने से भी वो दर्द से और तेज़ हिलने लगी। सोमेश को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसके साथ ऐसा कुछ हो सकता है। उसके साथ तो अंत में तो सब ठीक हो जाता था। एक सहकर्मी ने बताया कि इस औरत का पूरा परिवार मर चुका है। मदद आने में अभी बहुत समय था और पीड़ित औरत की हालत इतनी ख़राब थी कि सोमेश खुद को उस औरत के बचने की ज़रा सी उम्मीद का दिलासा तक नहीं दे सकता था। बेनाम औरत का दर्द सोमेश से देखा नहीं जा रहा था, नम आँखों से वह घुटनो के बल उसके पास बैठ गया। उसके हाथ बार-बार औरत की तरफ बढ़ते और उसे दर्द ना हो तो शरीर को छूने से पहले ही रुक जाते।

हमेशा हँसमुख, आशावादी रहने वाला, आज जीवन में पहली बार हार मान चुका सोमेश ऊपर देखते हुए रुंधे गले से बोला –  “भगवान बहुत दर्द सह लिया इसने, प्लीज़ इस औरत को मार दो भगवान। इसे अपने पास बुला लो…प्लीज़ इसे मार दो…“

शायद भगवान ने उसकी पुकार सुन ली थी। उस औरत की नब्ज़ चली गई और साँसों का उतार-चढ़ाव भी बंद हो गया। भारी मन से सोमेश बस्ती के अन्य हिस्सों की तरफ बढ़ गया।

समाप्त!
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My SoundCloud Profile

Artwork – Alok Pawar #mohitness #mohit_trendster #freelancetalents

विकिपीडिया और बिकाऊ मीडिया के पार की दुनिया (कहानी) – मोहित शर्मा ज़हन

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नाखून चबाती मशहूर अभिनेत्री मेघना कमल कमरे में इधर-उधर टहल रही थी। फ़ोन पर अपने मैनेजर पर चिल्लाती हुई वो टीवी न्यूज़ चैनल्स बदल-बदल कर खुद पर आ रही खबरों को देखने लगी। पिछली रात पास के अपार्टमेंट में से किसी ने उसकी एक वीडियो बनाई थी जिसमें वो एक पिल्ले को किक मारती हुई अपने बंगले से बाहर कर रही थी। शुरुआत में हरकत कर रहा पिल्ले का शरीर मेघना की 5-7 लातें खाने के बाद निर्जीव हो गया। विडिओ पर ना सिर्फ जानवर के अधिकारों वाली संस्थाओं की तीखी प्रतिक्रिया आ रही थी बल्कि देश-विदेश की जनता मेघना की इस हरकत से गुस्से में थी। बड़े निर्माताओं, निर्देशकों पर मेघना को अपनी फिल्मों से बाहर करने, कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने का दबाव बढ़ रहा था। कुछ ही देर में मेघना के घर के बाहर मीडिया का तांता लग गया।

मेघना ने अपने पिता और बीते ज़माने के सुपरस्टार अभिनेता हरीश कमल को फ़ोन किया।
“पापा…आई ऍम सॉरी, मेरी वजह से आपका नाम भी उछल रहा है। नशे में करियर बर्बाद कर लिया! सब ख़त्म हो गया!”

हरीश शांत स्वर में मेघना को समझाने लगे – “चिंता मत कर मेघू बेटे! ऐसे करियर बर्बाद होने लगते तो मैं कबका एक्टिंग छोड़ चुका होता। तेरा वीडियो मैंने देखा है। एक पार्सल भेजा है तुझे, बाकी फ़ोन पर नहीं समझाऊंगा। अपने मैनेजर और टीम को बुला ले उन्हें समझा दिया है, उनकी बात ध्यान से सुनकर वैसा ही करना… “

उस शाम मेघना ने अपने घर पर ही प्रेस कॉन्फ्रेंस रखी। कुछ सवालों के जवाब देने के बाद वह अपनी रिहर्स की हुई लाइनों पर आ गई।

“मैं जानती थी कि भारत के ज़्यादातर लोगो की जो मानसिकता हैं उनसे मुझे ऐसी ही प्रतिक्रिया मिलेगी। कल रात मैंने जानबूझ कर एक रोबोटिक खिलौने पप्पी को मारा, जो दूर से एकदम असली लगता है। यह देखिये इस पार्सल में उस से मिलता-जुलता खिलौना है। मेरा उद्देश्य लोगो में निरीह जानवरों के अधिकार, उनपर होने वाली हिंसा, मानव आबादी से कम होते जंगलों के लिए जागरूकता बढ़ाना था और देश क्या पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए इस स्टंट से बेहतर मुझे कोई उपाय नहीं लगा। इस बीच मुझे चुभने वाली एक सच्चाई का सामना करना पड़ा, एक लड़की के लिए चाहे वो एक सफल अभिनेत्री ही सही इस देश के लोग अपनी छोटी सोच दिखा ही देते हैं। भारत के लोगो और कई सेलेब्रिटीज़ की बातों ने मुझे आहत किया है।”

इतना कहते ही मेघना प्रेस वार्ता में रोने लगी। कैमरों की चमक से आँगन जगमगा उठा। हर ओर मेघना की तारीफ़ और चर्चे थे। इस घटना के बाद मेघना को कुछ अवार्ड मिले, तीन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने मेघना को अपना गुडविल एम्बेस्डर बनाया और वो बड़े बजट निर्माताओं की पहली पसंद बन गयी। एक दिन हरीश कमल ने मेघना को हँसते हुए बताया कि मेघना का किया कांड तो कुछ भी नहीं उन्होंने अपने समय में कितने कानून तोड़े, लोगो को गायब तक करवाया पर आज भी देश उन्हें पूजता है।

समाप्त!
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Image – Watercolor Painting by artist Shilpi Mathur
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Color Blind Saajan (Hindi Story)

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“देखना ये सही शेड बना है? आना ज़रा…”

“मैं नहीं आ रही! जब कोई काम कर रही होती हूँ तभी तुम्हे बुलाना होता है।”

अपने कलाकार पति आशीष को ताना मारती हुई और दो पल पहले कही अपनी ही बात ना मानती हुई रूही, उसके कैनवास के पास आकर खड़ी हो गई।

रूही – “यहाँ नारंगी लगाना होगा तुम लाल सा कर रहे हो।”

आशीष छेड़ते हुए बोला – “किस चीज़ की लालसा?”

रूही – “इस लाल रंग ने नाक में दम कर रखा है। देखो! जब कोई बिजी, थका हुआ हो तो उसे और गुस्सा नहीं दिलवाना चाहिए। गैस बंद कर के आई हूँ।”

आशीष ने आँखों से माफ़ी मांगी और रूही मुस्कुराकर रंगो का संयोजन करवाने में लग गई। आशीष कलरब्लाइंड था, उसकी आँखें लाल और हरे रंग और उनके कई शेड्स में अंतर नहीं कर पाती थीं। उसे ये दोनों रंग भूरे, मटमैले से दिखते थे। इनके अलावा इन मूल रंगों से मिलकर बने अन्य रंग भी फीके से दिखाई देते थे। वर्णान्ध होने के बाद भी अपनी मेहनत के दम पर आशीष बहुत अच्छा पेंटर बन गया था। हालाँकि, अक्सर उसकी कलाकृतियों में रंगो का मेल या संयोजन ठीक नहीं बैठता था, इसलिए वह इस काम में रूही की मदद लेने लगा। रूही पास के प्राइमरी स्कूल में अध्यापिका थी और आशीष अपनी कलाकृतियों की कमाई पर निर्भर था। घर की आर्थिक स्थिति साधारण थी पर दोनों एक-दूसरे के प्रेम को पकड़े गृहस्थी की नैया खे रहे थे। रूही के परिजन, सहेलियां उसे इशारों या सीधे तानो से समझाते थे कि वो आशीष की कला छुड़वाकर किसी स्थिर नौकरी या काम पर लगने को कहे। रूही जानती थी उसके एक बार कहने पर आशीष ऐसा कर भी देगा पर वो उस आशीष को खोना नहीं चाहती थी जिसके प्रेम में उसने सब कुछ छोड़ा था। उसे दुनिया के रंग में घोल कर शायद वो फिर कभी खुद से नज़रे ना मिला पाती।

एक दिन स्कूल से घर लौटी रूही कमरे में आशीष के खाँसने की आवाज़ें आईं। कमरे में आशीष खून की उल्टियाँ कर रहा था। रूही को देखकर सामान्य होने की कोशिश करता आशीष लड़खड़ाकर ज़मीन पर गिर पड़ा और बात छुपाने लगा – “ये…ये लाल रंग बना है ना? देखो गलती से फ़ैल गया, मैं साफ़ कर दूँगा।”

उसका खून अधूरी पेंटिंग पर बिखर गया था। इधर आँसुओं से धुंधली नज़रों को पोंछती रूही दौड़कर आशीष के पास आई।

“तुम्हे झूठ बोलना नहीं आता तो क्यों कोशिश कर रहे हो? चलो हॉस्पिटल!”

हॉस्पिटल में हुई जांच में रूही को पता चला कि आशीष को झूठ बोलना आता है। वो कई महीनों से छोटा मर्ज़ मान कर अपने फेफड़ों के कैंसर के लक्षण छुपा रहा था, जो अब बढ़ कर अन्य अंगो में फैल कर अंतिम लाइलाज चरण में आ गया था। अब आशीष के पास कुछ महीनों का वक़्त बचा था। दोनों अस्पताल से लौट आये। अक्सर बुरी खबर का झटका तुरंत महसूस नहीं होता। पहले तो मन ही झुठला देता है कि कम से कम हमारे साथ तो ऐसा नहीं हो सकता। फिर फालतू की छोटी यादें जो किसी तीसरे को सुनाओ तो वो कहेगा कि “इसमें क्या ख़ास है? यह तो आम बात है।” पर वो भी कैसे समझेगा आम बात अगर किसी ख़ास के साथ हो तो उस ख़ास की वजह से ऐसी बातें आम नहीं रहती।

रात के वक़्त आशीष से उलटी तरफ करवट लिए, तकिये पर मुँह सटाये सिसक रही रूही को उसके जीवन का सबसे बड़े ग़म का झटका लगा था। मन के ज्वार-भाटे में बहते कब सुबह हुई पता ही नहीं चला। इस सुबह रूही ने फैसला किया कि दुनिया में आशीष के बचे हुए दिनों को वो रो कर खराब नहीं करेगी और ना ही आशीष को करने देगी। उधर आशीष ने जैसे रूही के मन में जासूस बिठा रखे थे, उसने भी अपना बचा समय अपने जीवन की दो खुशियों को यानी रूही और पेंटिंग्स को देने का निर्णय लिया। एक-एक लम्हा निचोड़ कर जीने में दिन बड़ी जल्दी गुज़रते हैं। टिक-टिक करती घडी पर कैनवास डाल कर, लाल-हरे-भूरे रंग के फर्क पर हँसते दोनों का समय कट रहा था। एक दिन आशीष ने रूही को एक फाइल पकड़ाई जिसमे उसके बीमा, अकाउंट आदि के कागज़ और जानकारी थी। फाइल के अलावा एक पन्नी में लगभग तीन लाख रुपये थे।

“इतने पैसे?” रूही ने चौंक कर पूछा।

आशीष – “हाँ, 2-3 आर्ट गैलेरी वालों पर काफी पैसा बकाया था। पूरा तो नहीं मिला पर पीछे पड़ कर और कैंसर की रिपोर्ट दिखा के रो-पीट कर इतना मिल गया कि कुछ समय तो तुम्हारा काम चल ही जाए। तुम वहाँ होती तो मेरी एक्टिंग देख कर फ्लैट हो जाती।”

रूही – “मुझे नहीं होना फ्लैट, मैं कर्वी ही ठीक हूँ।”

दोनों हँसते-हँसते लोटपोट हो गए और एक बार फ़िर सतह की ख़ुशी की परत में दुखों को लपेट लिया। इस सतह की परत में एक कमी होती है, पूरे शरीर पर अच्छे से चढ़ जाती है पर आँखों को ढकने में हमेशा आनाकानी करती है। कुछ दिनों बाद रूही के नाम एक कुरियर आया और आशीष के पूछने पर रूही ने बताया कि उसने आशीष के लिए ख़ास इनक्रोमा चश्मा खरीदा है। इस चश्मे को लगाकर कलरब्लाइंड लोग भी बाकी लोगो की तरह सभी रंग देख सकते हैं और मूल रंगों में अंतर कर सकते हैं। इस चश्मे के बारे में आशीष को पता था और उसे यह भी पता था कि ये प्रोडक्ट बहुत महंगा और कुछ ही देशो तक सीमित था। कीमत जानकर उसने अपना सिर पीट लिया।

आशीष बिफर पड़ा – “3 लाख! अरे पागल क्या पता तीन दिन में मर जाऊं। इस से बढ़िया तो उन गैलरी वालों पर एहसान ही चढ़ा रहने देता। क्या करूँगा बेकार चश्में का?”

रूही – “तुम्हे मुझपर भरोसा नहीं है? रह लूँगी तुम्हारे बिना। नहीं चाहिए तुम्हारा एहसान। मुझे हरा रंग देखना है, लाल रंग देखना है, जामुनी रंग में जो हल्की मैरून की झलक आती है वो देखनी है, जो तुम्हे कभी समझ नहीं आता तुम्हारी आँखों से मुझे वो कमीना लाल रंग देखना है।”

इतने दिनों से जो ख़ुशी की परत थी वो धीरे-धीरे हट रही थी।

रूही – “अब ये चश्मा पहनो, आँखों को एडजस्ट करने में कुछ मिनट का टाइम लगता है इसलिए सामने नीली दीवार को देखो और आराम करो। बस अभी  तुम्हारा कैनवास और कलर्स लेकर आती हूँ।”

रूही बिना कैनवास और रंग लिए लौटी। दुल्हन के श्रृंगार और लाल जोड़ें में रूही आशीष के सामने थी।

लाल रंग देखकर आशीष उस रंग से पुरानी  दुश्मनी भूल मंत्रमुग्ध होकर बोला – “ये….ये…लाल…”

हामी में सिर हिलाती रूही आशीष से लिपट गयी। दोनों की आँखों से बहते पानी ने झूठी ख़ुशी की परत धोकर सुकून की नयी परत चढ़ा दी। रूही ने घाटे का सौदा नहीं किया था, उसने तीन लाख देकर अपनी ज़िन्दगी का सबसे अनमोल पल खरीदा था।

समाप्त!
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