Sketch Poster, Motion Poster of Short Film Kathputli (A Struggle for Control)

 Motion Poster
 Sketch Poster

आगामी शार्ट फिल्म कठपुतली का मोशन पोस्टर और स्केच पोस्टर, Team: Anuraag Tripathi, Ankerarchit Singh, Mohit Sharma Trendster, Ankita Tripathi, Ashutosh Saxena, Kamal Joshi #freelance_talents

Also available: Facebook, Vimeo, 4Shared, Tumblr, Mediafire etc.

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SPB Event Update

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।।बातें, किताबें और मुलाक़ातें।।

28 जनवरी 2018
नई दिल्ली में।

इवेंट डिटेल्स
https://goo.gl/CSrL92

Sooraj Pocket Books Event
Upcoming #event #Delhi ….Hope to see you there! 🙂

Kids magazine #update

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Hey everyone! 😀 I have recently started working as a voice-over artist and author (different age groups) for bilingual kids magazine Neev. नींव बाल पत्रिका के विभिन्न आयु वर्गों के लिए वॉइस-ओवर (ऑडियो) और लेखन शुरू किया।

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…also Co-judged Kalamkaar 2017 Contest (RD Magazine)#neev #mohitness #voicetalent #update #mohit_trendster

“काश मैं अमिताभ बच्चन का अंतर्मन होता…” (हास्य)

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मैंने एक कहानी लिखी और मेरा अपने अंतर्मन से वार्तालाप शुरू हो गया।

अंतर्मन – “छी! क्या है ये?”

मोहित – “कहानी है और क्या है?”

अंतर्मन – “ये सवाल जैसे जवाब देकर मेरा पैटर्न मत बिगाड़ा करों! 4/10 है ये…इस से तुम्हारा नाम जुड़ा हुआ है। पढ़ के लोग क्या कहेंगे?”

मोहित – “ठीक है, मैं कुछ चेंज करता हूँ।”

बार-बार बदलाव के बाद भी अंतर्मन पर कुछ ख़ास अंतर नहीं पड़ा…

अंतर्मन – “किसी सिद्ध मुनि का घुटना पड़ना चाहिए तुम्हारे खोपड़े पर तभी कुछ उम्मीद बनेगी। 4.75/10 हुआ अब!”

मोहित – “ये दशमलव की खेती का लाइसेंस कहाँ मिलता है? कहानी में सात बार बदलाव कर चुका हूँ। अब और शक्ति नहीं है।”

अंतर्मन – “हाँ तो मुझे क्यों बता रहे हो? कैप्सूल लो…जिसका एड पढ़ने में मज़ा आता है।”

मोहित – “मैं यही फाइनल कर रहा हूँ!”

अंतर्मन – “अरे यार तुम तो बिना बात गुस्सा हो जाते हो…रिलैक्स, अपना ही मन समझो! हमारा एक समझौता हुआ था। याद है? मैंने कहा था कि अगर मुझे कोई रचनात्मक काम 6/10 से नीचे लगेगा तो वो फाइनल नहीं होगा। तुमने लंबे समय तक माना भी वो नियम तो अब क्या दिक्कत है?”

मोहित – “इतनी टफ रेटिंग कौन करता है?”

अंतर्मन – “तेरे भले के लिए ही करता हूँ। तेरे नाम से जुड़े काम अच्छे लगें।”

मोहित – “भक! इस चक्कर में कितने आईडिया मारने पड़े मुझे पता है? आज से कोई नियम-समझौता नहीं!”

अंतर्मन – “काश मैं अमिताभ बच्चन का अंतर्मन होता।”

मोहित – “फिर पूरी ज़िन्दगी में 4 फिल्में करते अमिताभ साहब। इतना सर्व चूज़ी अंतर्मन लेके फँस जाते…कच्छों के डिज़ाइन तक में उलझ जाता है और बात अमित जी की करता है!”

अंतर्मन – “मतलब ये कहानी फाइनल है?”

मोहित – “हाँ! हाँ! हाँ!”

अंतर्मन – “एक मिनट, बाहर की शादी के शोर में सुना नहीं मैंने। ये ‘हा हा हा’ किया या तीन बार हाँ बोला?”

गुस्से में मोहित के जबड़े भींच गये।

अंतर्मन – “अच्छा सुनो ना…”

मोहित – “हम्म?”

अंतर्मन – “6/10 हो सकता है। अंत में एक कविता जोड़ दो तो उसके ग्रेस मार्क्स मिलेंगे।”

मोहित – “इस कहानी के साथ काव्य का मतलब नहीं बनता और…”

अंतर्मन – “प्लीज ना जानू!”

मोहित – “अच्छा बाबा ठीक है। जाओ बाहर जाके खेलो और ज़्यादा दूर मत जाना।”

समाप्त!
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Art – Ester Conceiçao‎
#ज़हन

एक सीमान्त (लघुकथा) #laghukatha

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नम्रता को उसके गायक पति शिबू भोला ने डेढ़ घंटे बाद फ़ोन करने की बात कही थी। बेचैनी में उसने जैसे डेढ़ घंटे के 5400 सेकण्ड्स पूरे होते ही शिबू को फ़ोन मिलाया।

“हैलो!”

“हाँ हैलो…अभी गाड़ी में हूँ…”

…पर नम्रता को उस सब से कहाँ मतलब था। शिबू की आवाज़ से वो भांप भी चुकी थी कि कॉल जारी रखने से कोई परेशानी नहीं होगी।

“क्या रहा?”

“हाँ, मेरे साथ 2 रिकॉर्डिंग करेंगे ये लोग।”

नम्रता चहक उठी। काफी समय से खाली और परेशान चल रहे शिबू को एक बार फिर काम मिल गया था।

कुछ देर बाद शिबू की तेज़ आवाज़ सुनकर नम्रता बाहर आयी। शिबू अपनी बेल्ट से गेट के गार्ड को बुरी तरह पीट रहा था। गार्ड अपने रेडियो पर शिबू का ही मशहूर गाना सुन रहा था। नम्रता और ड्राइवर ने उसे रोका और अचानक इस गुस्से का कारण पूछा। शिबू भोला किसी बच्चे की तरह ज़मीन पर बैठकर रोने लगा।

शिबू – “7 एल्बम आ गयी हैं! लेकिन बारह साल से सब $@#&*# बस एक हिट “चाइना की चुन्नी” गाना सुने जा रहे हैं और हर जगह मुझसे गवाए जा रहे हैं। ढाई सौ गाने रिकॉर्ड रखे हैं, उन्हें कोई म्यूजिक प्रोडूसर नहीं खरीदता। आज भी चाइना की चुन्नी के 2 रीमिक्स की रिकॉर्डिंग की डील मिली है। 7 रीमिक्स पहले ही हो चुके हैं। मन किया सूअरों को वहीं मार दूँ। फ़िर याद आया तू जो झूठा हँसते हुए इन्वेस्टमेंट, कूपन-डिस्काउंट फलाना की बातें करती है ना…वो साल-दो साल पहले तक तुझे पता भी नहीं था क्या होते हैं। तेरी झूठी हँसी में ढका दर्द हर रात मेरे सीने पर आ जाता है, फिर मैं करवट तक नहीं ले पाता। आज से 50 साल बाद कोई कहेगा की एक-दो गानों पर पूरी ज़िन्दगी रोटी खा गया…गाने तो मैं हज़ार बनाता पर दुनिया ने उस एक-दो के आगे कुछ सुनना ही नहीं चाहा…“

समाप्त!
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Art – Felix Benjamin

#ज़हन

Jasoos Saas (Hasya Kahani)

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लक्ष्मी कुमारी स्वेटर बुनने से तेज़ गति से अपनी बहु पर विचार बुन रही थीं।  वैसे उनकी बहु शताक्षी ठीक थी….बल्कि जैसी कुलक्षणी, कलमुँही बहुएं टीवी और अख़बारों में दिखती हैं उनके सामने तो शताक्षी ठीक होने की पराकाष्ठा ही समझो। फिर भी लक्ष्मी को एक बात परेशान करती थी। केवल उन्हें ही नहीं, कॉलोनी की कुछ और सास भी इस मुद्दे पर चिंतित थीं। कई घरों की 25 से लेकर 40 साल की महिलाएं आपस में अक्सर झुंड में घंटों पता नहीं क्या बतियाती रहती थीं। बाहर से लगता कि मानो चुगलियों की कितने पहाड़ चढ़ रही हैं। बड़ा और सभी कोण से ढका घर होने के कारण अक्सर दर्जन भर स्त्रियां शताक्षी के घर पर डेरा जमाती।

मोहल्ले की सासों से जब रहा नहीं गया और उनकी मिसमिसी का रौला-रप्पा हो गया तो सबने पैसे मिलाकर अच्छी क्वालिटी के माइक्रोफोन और कैमरे लक्ष्मी कुमारी के आँगन में लगवाये, जहाँ बहुओं की चुगलियों का गोरख धंधा चलता था। दो दिन बाद वीकेंड को बहुओं की मैराथन बैठक हुई। अगले दिन सत्संग का बहाना बनाकर वृद्ध जेम्स बांडनियाँ गुप्त अड्डे पर मिलीं। कॉलोनी की सासें अपनी साँसें थाम कर बहुओं की मीटिंग की फुटेज देखना शुरू करती हैं।

“दीदी, कल छुटकी की वजह से छोटा भीम हार गया। मैं तो दूध उबलने रखने जा रही थी कि मीनू ने बताया कि कालिया को जीत कर टाइटल मिल गया। इतनी झुंझलाहट हुई कि मैं कच्चा दूध ही पी गयी और मीनू की अभ्यास पुस्तिका फाड़ी सो अलग…”

“हाँ! इस वजह से कल पूरा दिन मेरा भी मूड ऑफ रहा। ऑफिस से लौटे पीकू के पापा पुच्ची करने को बढे तो ऐसी कोहनी मारी मैंने…नील पड़ गया उनके होंठों पर। हुँह! भला कालिया को जिताना कोई बात हुई?”

छोटा भीम पर गंभीर चर्चा के बीच शिवा कार्टून सीरीज की फैन शताक्षी बोली।

“…पेड़ाराम ने अपनी पड़ोसन के चक्कर में शिवा का फूफा जो किडनैप करवाया उस से मेरा दिल बैठ गया सच्ची। अरे! आपने सुना…शक्तिमान को दोबारा शुरू कर रहे हैं।”

उसके बाद मोटू पतलू, माइटी राजू, गली गली सिम सिम, डोरेमॉन, शिनचैन पर शिद्दत से चर्चा हुई। इतना ही नहीं बीच-बीच में महिलाओं ने कार्टून सीरियल्स के मंगल गीत…टाइटल सांग भी गुनगुनाये। गृहणियों को जब फुर्सत मिलती थी तब टीवी के सामने बच्चे होते, जो कोई और चैनल चलने ही नहीं देते थे। कोई विकल्प ना होने के कारण थोड़े समय बाद कार्टून्स, एनिमेशन में बच्चों की तरह महिलाओं को भी मौज आने लगी और देखते ही देखते यह कार्टून क्रान्ति महिला मोर्चा बन गया।

बहुओं की बुराई और गप्पों के लिए ब्रेड रोल, पकोड़े तल कर लायी एक सास निराशा में बोली।

“भक…”

ये केवल एक ‘भक’ नहीं बल्कि ‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया’ वाली हार की स्वीकृति थी। गुप्त फुटेज देख रही सास मंडली के सारे अंदेशों का मुरब्बा बन चुका था। धूलधूसरित पहलवान की तरह सब अपने कार्टूनी सत्संग से घर लौट आयीं।

समाप्त! भक!
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Art – Sebastien K.
#ज़हन

काल्पनिक निष्पक्षता (कहानी) #hindi_kahani

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“जगह देख कर ठहाका लगाया करो, वर्णित! तुम्हारे चक्कर में मेरी भी हँसी छूट जाती है। आज उस इंटरव्यू में कितनी मुश्किल से संभाला मैंने…हा हा हा।”

मशहूर टीवी चैनल और मीडिया हाउस के मालिक शेखर सूद ने दफ़्तर में अपनी धुन में चल रहे अपने लड़के वर्णित को रोककर कहा।

वर्णित – “डैडी! आज हर इंटरव्यू में कैंडिडेट बोल रहे थे कि हमारे चैनल में वो इसलिए काम करना चाहते हैं क्योंकि हमारा चैनल निष्पक्ष है। उसपर आप जो धीर गंभीर भाव बनाते थे उन एक्सप्रेशंस को देख कर खुद को रोकना मुश्किल हो गया था।”

शेखर – “हप! मेरे हाथों पिटाई होगी तेरी किसी दिन। हा हा…”

पास ही कॉफ़ी ले रहा शेखर का छोटा लड़का शोभित समझ नहीं पा रहा था कि इसमें हँसने वाली क्या बात है। उसका चेहरा देख वर्णित ने उसे अपने केबिन में बुलाया।

वर्णित – “क्या छुटकू! जोक समझ नहीं आया?”

शोभित – “हाँ भाई, हम तो एथिक्स वाली सच्ची, निष्पक्ष पत्रकारिता का हिस्सा हैं ना? सब यही बोलते हैं और सिर्फ हमें दिखाने को नहीं…जो लोग नहीं भी जानते मैं कौन हूँ, उनसे भी यही फीडबैक मिला है। यहाँ तक की अंतरराष्ट्रीय एजेंसीज़, यूट्यूब – सोशल मीडिया हर तरफ अधिकतर लोग हमारे मीडिया हाउस को ऐसा ही बोलते हैं। आपको तो सब दिखाता ही रहता हूँ मैं अक्सर…”

वर्णित – “इस सब्जेक्ट पर मैं तुझे समझाने वाला था, मुझे लगा तू खुद समझ जाये तो बेहतर होगा। कोई बात नहीं, पहली बात निष्पक्ष पत्रकारिता, एथिक्स वाला मीडिया नाम की कोई चीज़ नहीं होती। बस के खाई में गिरने से 5 लोगों की मौत जैसी प्लेन ख़बरों के अलावा बयान, घटना, विवरण, निष्कर्ष सब इस बात पर निर्भर करते हैं कि किस मीडिया में पैसे का स्रोत क्या है और ऊपर के मैनेजमेंट से कौन लोग जुड़े हैं।”

शोभित – “….लेकिन हम तो हर तरह की खबर लोगो के सामने लाते हैं। हर राजनैतिक दल, विचारधारा की अच्छी-बुरी बातें प्रकाशित करते हैं।”

वर्णित – “अरे भोले मानुस, ऐसा तुम्हें और जनता को लगता है बल्कि ऐसा हम ‘लगवाते’ हैं। किस पक्ष का कितना पॉजिटिव, कितना नेगेटिव सामने रखते हैं ये भी मायने रखता है। हमारा एक मॉडल है वो समझाता हूँ। हमारी प्रिंट न्यूज़ और टीवी चैनल का एक बड़ा हिस्सा न्यूट्रल, फील गुड़ या किसी सामाजिक कल्याण वाली बातों से जुड़ा होता है ताकि एक बड़ा वर्ग हमें देखे, खरीदे और उनके मन में हमारी अच्छी छवि बने। दूसरा भाग राजनीति, विचारधारा….सीधा बोलें तो लोगों में ‘तेरा-मेरा’ वाली बातें। अब अंदर की बात से समझो, शब्दी दल अपनी याड़ी पार्टी है और जो अपनेआप हमें उनकी विरोधी पार्टी महाक्रांति दल का एंटी बना देती है।”

शोभित – “पर…”

वर्णित – “ये लेकिन-पर को सर्जरी करवाकर निकलवा क्यों नहीं लेता तू? बार-बार का टंटा ख़त्म हो। सुन, अब हम क्या करते हैं, न्यूट्रल ख़बरों के बीच में अप्रत्यक्ष विश्लेषण और ख़बरों को काट-छांट कर शब्दी दल की सकारात्मक प्रेस और महाक्रांति की रेड़ मारती प्रेस। रिकॉर्ड के लिए इतना अनुपात ज़रूर रखते हैं कि कहने को हो सके कि देखो हम तो शब्दी दल की निंदा, उनपर सवाल उठाती न्यूज़ भी प्रकाश में लाते हैं। मैंने एक सॉफ्टवेयर बनवाया है अपनी वेबसाइट और चैनल के लिए। यह सॉफ्टवेयर समय और ख़बरों की संख्या के हिसाब से बताता है कि किस तरह खबरों के बीच में अपने एजेंडे वाली ख़बरें परोसनी हैं। लंबे समय तक ऐसा होने पर लोगों के मन में एक विचारधारा के प्रति पूर्वाग्रह, गलत बातें बैठ जाती हैं और दूसरे खेमे को बेनिफिट ऑफ़ डाउट मिलता रहता है। काम की बात ये है कि अपना पैसा और नाम बनता रहता है।”

यह सब सुनकर शोभित को तो जैसे अपना जीवन ही झूठ लगने लगा था। उसे आश्चर्य हुआ कि सम्मानित होते समय, लोगों से तारीफें सुनते हुए उसके पिता और बड़े भाई सीधा चेहरा कैसे रख लेते हैं। उसके विचारों को वर्णित के धक्के ने तोडा।

वर्णित – “अच्छा अब तू कोई हीरो वाला स्टंट करने की तो नहीं सोच रहा ना? हमारा मीडिया हाउस सुधारने के लिए कैंपेन। मत सोचना! वो सब फिल्मों में होता है। यहाँ करेगा तो पापा तेरा वेज मंचूरियन बनवा देंगे।”

शोभित में अभी इतनी हिम्मत ही कहाँ थी? “शायद कुछ सालों बाद…” इतना सोच नज़रे झुकाकर शोभित अपने केबिन की तरफ बढ़ गया।

समाप्त!
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#ज़हन

Art – Eigeiter H.

 

Anthology #update

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#update Completed a short comic script “Saadhe 4 Feet” for Ghosts of India Anthology Project (Comic Theory) 🙂 #mohitness #comictheory #art

Details: https://www.facebook.com/comicstheory/

25354050_2147516511932613_8811983481419168357_nComics Theory founder Mr. SNath Mahto presented artworks (by artist Harendra Saini on my script) in 8th Comic Fan Fest, 17 December 2017

Horror-Educational Genre Mix: Samaj Levak (Freelance Talents)

00 (1)New experimental genre mix, समाज लेवक (Samaj Levak) – Social Leech (Educational-Horror Comic)

Illustrators: Anand Singh, Prakash Bhalavi (Bhagwant Bhalla), Author: Mohit Trendster, Colorist: Harendra Saini, Letterer: Youdhveer Singh

https://goo.gl/uqV8FV

https://goo.gl/2AuveV

https://goo.gl/euqPFu

https://goo.gl/VdrXy1

http://freelea.se/mohit-trendster/samaj-levak-horror-comic 

creditsAlso Available: Google Play, Google Books, Readwhere, Magzter, Dailyhunt, Ebook360 and other leading websites, mobile apps.

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#horror #comics #art #educational #india #mohitness #anandsingh #mohit_trendster #freelancetalents #harendrasaini #trendybaba #youdhveersingh #ज़हन #आनंदसिंह #मोहित #prakashbhalavi #freelance_talents #indiancomics

इश्क़ बकलोल (उपन्यास) समीक्षा

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“इश्क़ बकलोल”, नाम पढ़कर आपको लगा होगा कि खुद में एक बड़ा बाज़ार बन चुकी फूहड़ता का फायदा उठाने को एक पुस्तक और लिख दी गयी। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। किसी रोलरकॉस्टर राइड सी भारतीय परिवेश में भावनाओं की गुत्थमगुत्था है इश्क़ बकलोल। 2012 में देवेन पाण्डेय जी ने अपने अनुभवों, इनके साथ घटी बातों पर लिखना शुरू किया तब लगा कि कई शौकिया लेखकों की तरह ये कुछ समय बाद लेखन को टाटा कर देंगे। नौकरी, पारिवारिक ज़िम्मेदारियां संभालते हुए इन्होने लेखन जारी रखा और कम समय में काफी सुधार किया। एक दिन इनका मैसेज आया कि इन्होने एक उपन्यास लिखा है और मैं उपन्यास की इंट्रो पोएम लिखूं। उपन्यास का संक्षिप्त आईडिया जो सुना उसके अनुसार एक नज़्म भेज दी। सूरज पॉकेट बुक्स के सौजन्य से इश्क़ बकलोल अब बाजार में उपलब्ध है, जिसकी अच्छी बिक्री हो रही है।

कवर पेज इंटरनेट से किसी स्टॉक तस्वीर को ना लेकर आकर्षक चित्रांकन रखा गया। सूरज पॉकेट बुक्स की ये पहल मुझे बढ़िया लगी। कहानी के विस्तार में ना जाकर इतना कहूँगा कि इसे रोमांटिक के बजाय एक सामाजिक उपन्यास कहना उचित होगा। भारतीय समाज के अंदर बसी विविधता को बड़ी सुंदरता से दर्शाया है। जीवन की घटनाओं – दुर्घटनाओं के बीच किस तरह हम बिना सोचे कितना कुछ कर जाते हैं (या असमंजस में कुछ नहीं करते) जिनके दूरगामी परिणाम जीवन की दिशा बदल देते हैं। कहानी के दौरान पात्रों की प्रवृत्ति -नज़रिये में आये बदलाव अच्छे लगे। अक्सर ज़बरदस्ती करैक्टर आर्क दिखाने के चक्कर में घटक जोड़ दिए जाते हैं वो यहाँ नहीं हुआ। मनोरंजन की दुनिया में मार्केटिंग जुमला बन चुके फ़र्जी देसीपन की जगह यहाँ किरदारों में असली देसीपन पढ़ने को मिला। कुछ जगह भाषा शैली, कथा के प्रवाह और दृश्य परिवर्तन में सुधार की सम्भावना है, जिसे पहले प्रयास के हिसाब से अनदेखा किया जा सकता है। ये देवेन जी का स्नेह है कि कहानी में एक किरदार मेरा भी है। मुझे पता चला कि मेरा किरदार बड़ा था पर कहानी के लिए उसे छोटा करना पड़ा (इस कारण रेटिंग में आधा अंक काट लेता हूँ….हाहा)। आशा है आगामी उपन्यास और भी धमाकेदार हो। शुभकामनाएं!

उपन्यास के संसार में देवेन पाण्डेय के पदार्पण को मैं रेट करता हूँ – 7.5/10

P.S. मुझे नहीं पता कि मैं रात के डेढ़ बजे अपनी रसोई में धूप का चश्मा लगाकर सेल्फी क्यों ले रहा हूँ।

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