Colorblind Baalam Book

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एकसाथ दो किताबें… 🚁 “कलरब्लाइंड बालम” 🕺 Kahaniya और

FlyDreams Publications

की साझा पेशकश। ️🎊️🎉

पढ़ने के लिए क्लिक करें – https://www.kahaniya.com/s/colour-blind-balam-6eAP45

एप्लिकेशन डाउनलोड करने के लिए लिंक – https://play.google.com/store/apps/details?id=com.viven.android.kahaniyaofficial

#ज़हन

नया कहानी संग्रह – कुछ मीटर पर ज़िन्दगी (मोहित शर्मा ज़हन)

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नए जज़्बात – नई किताब: ‘कुछ मीटर पर ज़िन्दगी’ …उम्मीद करता हूं कि पहले की रचनाओं की तरह इसे भी आपका भरपूर प्यार मिलेगा। ई-संस्करण, एमेज़ॉन पर उपलब्ध –

https://amzn.to/3bXsGCW

#ज़हन

आगामी कहानी-संग्रह – कलरब्लाइंड बालम (मोहित शर्मा ज़हन)

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इस किताब में कुछ खास और अलग श्रेणियों की कहानियां रखी हैं। आशा है, हमेशा की तरह आप सबका स्नेह मिलता रहेगा।

Upcoming story collection Colorblind Balam (with FlyDreams Punlications)
Great work by cover artist Nishant Maurya.

Tanz (Hindi Story) #ज़हन

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तंज़

घरेलू बिजली उपकरण बनाने वाली कंपनी के बिक्री विभाग में लगे नदीम का समय अक्सर सफर में बीतता था। ट्रेन में समय काटने के लिए वह अक्सर आस-पास यात्रियों से बातों में मशगूल हो जाता। कभी उनकी सुनते और कभी अपनी कहते वक़्त आसानी से कट जाता। एक दिन नीचे चादर बिछा कर बैठे मज़दूर से उसकी जन्मपत्री मालूम करने के बाद नदीम ने अपना तीर छोड़ा।

“मौज तो तुम गरीब-लेबर क्लास और अमीरों की है। देश का सारा टैक्स तो मिडिल क्लास को देना पड़ता है। एक को सब्सिडी तो दूसरे को लूट माफ़ी।”

सहयात्रियों से “कौनसा स्टेशन आ गया?”, “बिजनौर में बारिश हो रही है क्या?” और “हरिया जी दुकान की गजक मस्त होती हैं!” जैसी बातों के बीच हालिया बजट से कुढ़ा नदीम व्हाट्सएप पर मिडिल क्लास के आत्मसम्मान को बचाती पंक्तियां मज़दूर पर फ़ेंक रहा था। वह मज़दूर कभी नदीम की बात समझने की कोशिश करता तो कभी मुस्कुरा कर रह जाता।

ऊपर अपने फ़ोन में मग्न गुरदीप से रहा नहीं गया।

“बड़े परेशान लग रहे हैं, भाई? अमीरों का पता नहीं पर देश के गरीब का जो हक है वह लेगा ही।”

नदीम को इतनी देर से बांधी गई भूमिका और अपनी बात कटती अच्छी नहीं लगी।

“अरे, लाल सलाम कामरेड! हा हा…मज़ाक कर रहा हूं। किस बात का हक? मुफ़्त की देन तो भीख हुई न?”

गुरदीप को ऐसे ही जवाब की उम्मीद थी।

“भाईसाहब! गरीब लोग तो जहां मिलें उनका शुक्रिया करो…ये गरीब-लेबर क्लास तो देश में सबसे ज़्यादा टैक्स देते हैं।”
यह अलग सा वाक्य सुनकर सब जैसे नींद से जागे और ऊपर से झांकते गुरदीप की ओर देखने लगे। इससे पहले कोई स्टेशन आ जाए या किसी का बच्चा चीख मार के ऐसा रोए कि 12-15 लोगों का ध्यान गुरदीप से हट जाए वह लगातार गरीबों के पक्ष में तर्क देने में लग गया।

“सबसे पहले तो गरीब कभी खाना-पीना और बाकी सामान एकसाथ नहीं लेते। 50 ग्राम तेल, 200 ग्राम आटा, कुछ ग्राम चावल और जीने के लिए ज़रूरी कई चीज़ें ये लोग अपनी रोज़ या हफ़्ते की कमाई के हिसाब से लेते हैं। अगर वही सामग्री ये लोग एकसाथ 5 किलो, डेढ़ किलो या ज़्यादा मात्रा में लें…जैसा हम मिडिल क्लास के लोग लेते हैं, तो इनकी 30 से 90 प्रतिशत तक बचत हो सकती है। ऐसा ये कर नहीं पाते क्योंकि एकसाथ कुछ भी उतना खरीदने के लिए इनके पास पैसे ही नहीं होते। सोचो इकॉनमी में ये करोड़ों लोग रोज़ कितना पैसा लगाते हैं।
पिछली पे कमीशन में मेरे पड़ोसी शर्मा जी को लाखों का पुराना बकाया एरियर और महीने की सैलरी में सीधे 8200 रुपए का फायदा हुआ था…अब इतने साल बाद नया पे कमीशन लगने वाला है। शर्मा जी को फिर से लाखों रुपए मिलेंगे और वेतन भी बढ़ेगा पर इस बीच के गुज़रे इतने सालों में मजाल है जो उनकी कामवाली बाई के इतना रो-पीटने के बाद भी कुल ढाई सौ रुपए महीना से ज़्यादा बढ़े हों।

आपका ये कहना की सरकारी अस्पताल “इनसे” भरे रहते हैं या सारी सुविधाओं, स्कीम पर ये लोग टूट कर पड़ते हैं भी गलत है। ये शहर की दूषित जगहों के पास बने घरों में रहते हैं…हर शहर की उस गंदगी का काफ़ी बड़ा स्रोत हम मिडिल क्लास लोग हैं। कम पैसों में शरीर ख़राब कर बीमारी देने वाले काम कर-कर के दुनियादारी का धुआं, धूल झेलकर तो इनका हक बनता है सरकारी सुविधाओं पर टूट पड़ना। मिडिल क्लास की यह कहानी है कि आपने 40-45 की उम्र तक ठीक बैंक बैलेंस, घर और गाड़ी जैसी चीज़ें जोड़ ली और अपने बच्चों के लिए उड़ने का प्लेटफॉर्म बना दिया, लेकिन इन्हें पता है कि इनमें से ज़्यादातर के बच्चे भी गरीबी का ऐसा ही दंश झेलेंगे। इस वजह से ये लाइन में लगकर ज़िंदगी से लड़ते हैं…”

नदीम कुछ कहने को हुआ तो वाइवा सा दे रहे गुरदीप की आवाज़ ने उसे दबा दिया।

“इस बेचारे को मेरी कोई बात समझ नहीं आई होगी पर ये वैसे ही मुस्कुरा रहा है जैसे आपके तानों पर मुस्कुरा रहा था। हम जीवन के वीडियो गेम की रोटी, कपड़ा और मकान वाली स्टेज से बहुत आगे निकल चुके हैं और इसका जीवन ही उनके पीछे भागना है। कार या तकियों पर बढ़े टैक्स की झुंझलाहट हर सांस में जीने का टैक्स देने वालों पर मत निकालो भाई।”

जिसका डर था वही हुआ…सामने महिला की गोद में खेल रहा बचा रो दिया और रेल की रफ़्तार में हिलते गुरदीप के विचारों की रेलगाड़ी का मोनोलॉग भी टूट गया। कुछ बातें कह दी, कई बातें रह गई! नदीम की सांस में सांस आई कि तभी गुरदीप ने कहा…

“एक बात और!”

सत्यानाश! नदीम की आँखें जैसे पूछ रही हों कि भाई नाली में लिटा-लिटा कर बुरी तरह पीट लिया अब…और भी कुछ बचा है?

“सही और गलत समझने के लिए और दूसरों के हक की बात करने के लिए लाल सलाम ब्रिगेड वाला होना ज़रूरी नहीं।”

नॉकआउट घूंसा पड़ चुका था और नदीम गृहशोभा पढ़ने की एक्टिंग करने लगा।

समाप्त!
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My latest Stats on Chess24 Website
829 Victories, 148 Losses, 144 Draws

Comedy Article in Junction Planet Magazine (January 2020 Issue)

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2-page ‘Comics Kaalchakra’ in January 2020 issue of Junction Planet.

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Thank you, Team! 🙂

Pages – 98
Language – Hindi
Editor – Upendra Raj
Co-Editor – Gaurav Shrivastav
Special Advisor – Balbinder Singh
Cover Art – Arjun Sharma “Arya”

#Update – Kuku FM 2020

Mohit Sharma

Among Kuku FM top contributors. I hope to break into Top 10 this year.

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In 2020, they are working towards bringing monetization for creators on their platform.
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Moral Story – कूक की ज़रूरत #zahan

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नीलिमा पीलीभीत में एक निजी स्कूल की शिक्षिका थी। खाली समय में वह अपने परिवार और सहकर्मियों के साथ “कूक” नाम की एक एनजीओ भी चलाती थी। इस स्वयंसेवी संस्था का मुख्य उद्देश्य उत्तर भारत में आने वाले प्रवासी पक्षियों और उनके अस्थायी ठिकानों का संरक्षण करना था। अब तक नीलिमा की जागरूकता सभाएं और सामग्री कई स्कूलों और दूर-दराज़ के इलाकों में पहुंचकर लोगों को नई जानकारी रहीं थी। नीलिमा अपने अभियान को बड़े स्तर पर करना चाहती थी। इसकी शुरुआत वह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भी एक बड़ी जागरूकता रैली निकलना चाहती थी, जिसके बाद वह कुछ सभाएं करती। उसने कुछ स्कूलों से संपर्क किया और धीरे-धीरे अच्छा समर्थन जुटाकर रैली करने के लिए छुट्टी का दिन चुना। अब बारी थी लखनऊ पुलिस कमिश्नर से रैली और सभाओं की अनुमति लेने की।

पहले तो इस आवेदन के साथ इस उस वरिष्ठ अधिकारी से मिलने में ही दो दिन लग गए। जब बारी आई तो उनका बर्ताव कुछ रूखा लगा…औपचारिकता बीतने के बाद नीलिमा से रहा नहीं गया।

“क्या हुआ, सर? क्या आवेदन में कोई कमी है?”

नीलिमा ने जैसे गुब्बारे को सुई लगा दी थी।

“कमी? कमी की बात बाद में…इस आवेदन की ज़रुरत ही क्या है?”

नीलिमा बड़े अधिकारी की डांट से कुछ असहज हुई पर उसने खुद को संभाला – “मैं समझी नहीं, सर?”

पुलिस कमिश्नर उसी ढंग में बोले – “इस शहर के हिसाब से आपकी रैली और सभाएं बड़ी नहीं है पर कुछ रास्ते खाली करवाने पड़ेंगे, कई सिपाहीयों के अहम घंटे बच्चों की लाइन लगवाने और उनके चारो तरफ घुमते बीतेंगे। क्यों? क्योंकि आपकी फैंसी, लीक से हटकर संस्था को पब्लिसिटी चाहिए।”

खुद पर बिना बात उठे सवालों से नीलिमा भी अपने स्वर में कुछ सख्ती लाई – “माफ़ी चाहती हूँ, सर, लेकिन मेरी ऐसी कोई मंशा नहीं है।

पुलिस कमिश्नर – “छुट्टी के दिन, यहां 36 तरीके के विरोध प्रदर्शन, धरना वगैरह चलते हैं! लूट, बलात्कार, हत्या, रंजिश, राजनीती जैसे ज़रूरी मुद्दों के बीच आपको चिड़ियों की पड़ी है? यहां लोग मर रहे हैं और आपको बैंगनी सारस, सतरंगी बुलबुल बचानी है? शर्म आनी चाहिए आपको!”

नीलिमा ने गुस्से में अपना आवेदन वापस खींच लिया – “आपसे मेरा 5 मिनट का अपॉइंटमेंट था। आपसे विनती है कि अंत के तीन मिनट मेरी बात सुन लीजिए…जागरूकता के लिए मैं रैली के बजाय कोई और माध्यम चुन लूंगी। उत्तर प्रदेश की जनसंख्या लगभग 24 करोड़ है और लक्षद्वीप की 95 हज़ार। तो क्या केवल आंकड़ों के आधार पर लक्षद्वीप में जो सरकारी अधिकारी और संसाधन लगे हैं उन्हें हटा लें और ज़्यादा ज़रूरी उत्तर प्रदेश में लगा दें? क्या लक्षद्वीप की दशमलव में ही सही पर कोई कीमत नहीं? अपराध, शिक्षा, महिला और बाल विकास, गरीबी आदि पर भारत में लाखों स्वयंसेवी संगठन काम कर रहे हैं। आप चाहते हैं उस भीड़ का हिस्सा बनके ’36 तरीके के विरोध प्रदर्शन, धरनों’ में शामिल हो जाऊं? क्या मेरे जुड़ने से उनमें चार चाँद लग जाएंगे?
आपके तर्क के हिसाब से तो जब आप छोटे बच्चे थे तभी देश की हालत की गंभीरता को देखते हुए…आपको साहित्य, गणित, काव्य की जगह लूट, बलात्कार और हत्या जैसे अपराधों की जघन्यता के बारे में बताया जाना शुरू कर देना चाहिए था? नहीं सर! ऐसे नहीं चलती दुनिया। कहीं हवा का ज़रा सा दबाव कम होता है और उसके असर से हुए चैन रिएक्शन से दूर कहीं प्राकृतिक आपदा आ जाती हैं…इसलिए बैंगनी सारस, सतरंगी बुलबुल भी इंसानों जितने ही अहम हैं। बस सामने दिखाई नहीं देता तो लगता है इनका कोई मतलब ही नहीं। यह बात आपको समझानी पड़ रही है तो सोचिए…आम इंसान और आने वाली पीढ़ी को इसे समझाना कितना ज़रूरी है।”

कुछ मिनट बाद नीलिमा, पुलिस कमिश्नर की शाबाशी और रैली-सभाओं के लिए स्वीकृति पत्र लेकर बाहर निकली।

समाप्त!
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#ज़हन

Hindi Story – भूत बाधा हवन बनाम एक्सोरसिस्म #zahan

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पुणे से कुछ दूर एक वीरान सी बस्ती में लगभग आधा दर्जन परिवार रहते थे। वहां दो पड़ोस के पुराने घरों में कई सालों से दो भूत रहते थे। एक का नाम था विनायक और दूसरी थी क्रिस्टीन। दोनों बड़े ही शांत किस्म के थे पर उनका थोड़ा-बहुत विचरण या कुछ हरकतें (जिनसे किसी को नुक्सान नहीं होता था) उन घरों में बाद में किराए पर रहने वाले लोगों को डरा दिया करती थी। हालांकि, थोड़े समय बाद इन घरों में रह रहे परिवारों को इनकी आदत पड़ जाती। इस तरह कुछ दशक बीते। जहां विनायक, भगवान गणेश का परम भक्त था वहीं क्रिस्टीन कट्टर कैथोलिक ईसाई।

मरने से पहले दोनों जितना एक दूसरे से बचते थे, मरने के बाद न चाहते हुए भी बातें करते-करते अच्छे दोस्त बन गए थे। ऐसा नहीं था कि मरने से पहले विनायक और क्रिस्टीन में कोई बात नहीं होती थी। दोनों के जीवनसाथी बहुत पहले दुनिया छोड़ चुके थे। बस्ती में पेड़ लगाना, बिजली की लाइन पाने के लिए धरना देना, बंजर ज़मीन पर सब बस्ती वालों की साझा खेती जैसे कामों में दोनों सबसे ज़्यादा बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे… इस वजह से दोनों मन ही मन एक दूसरे की इज़्ज़त भी करते थे पर जहाँ धर्म, त्यौहार आदि की बात आती थी तो विनायक और क्रिस्टीन उत्तर और दक्षिण ध्रुव बन जाते थे। अपने धर्म के प्रति इनका विश्वास इतना दृढ़ था कि मरने के बाद भी ये एक-दूसरे को अपना धर्म अपनाने के तर्क दिया करते थे।

किस्मत से विनायक के घर में एक ईसाई परिवार किराए पर आया और थोड़े समय बाद क्रिस्टीन के घर में एक गणेश भक्त परिवार। विनायक और क्रिस्टीन बड़ी उत्सुकता से उन परिवारों की दिनचर्या देखते और फिर एक दूसरे को बताते कि कैसे आजकल के तरीके और बच्चे पहले से अलग हो गए हैं, कैसे पुराना धीमापन नई तेज़ी से बेहतर था और कैसे किराए पर आये परिवार के सदस्य बहुत अच्छे हैं। अगर कभी-कभार उन्हें कुछ गलत या दूसरे के धर्म का उल्लंघन दिखता तो वे जानबूझ कर दूसरे को नहीं बताते। न चाहते हुए भी कुछ हरकतों, हल्की खटपट और दूसरी आवाज़ों की वजह से दोनों परिवारों का शक बढ़ने लगा कि इन घरों में भूतों का साया है। हिन्दू परिवार ने अपने घर का भूत (क्रिस्टीन) भगाने के लिए हवन रखा और उसी दिन ईसाई परिवार ने अपने घर से भूत (विनायक) निकालने के लिए बड़े पादरी से एक्सोरसिस्म की योजना बनाई। दोनों परिवार साबित करना चाहते थे कि भूत भगाने के लिए उनके धर्म का तरीका दूसरे धर्म से बेहतर और कारगर है।

विनायक, स्वभाव के अच्छे ईसाई परिवार को नुक्सान नहीं पहुंचाना चाहता था। साथ ही, क्रिस्टीन आहत न हो इसलिए विनायक एक्सोरसिस्म से पहले की शाम घर छोड़कर जंगलों की तरफ उड़ गया। धर्म की छोटी बहस में इतने सालों की दोस्ती इस तरह ख़त्म कर देना उसे गवारा नहीं था। उसने सोचा कि अगर हिन्दू धर्म बेहतर होगा तो उसे खुद से कोई जतन करना ही नहीं पड़ेगा। उसके भूतिया मन में चल रहा था कि क्रिस्टीन क्या सोच रही होगी। पता नहीं वह उसका अचानक गायब होना समझ पाई होगी या नहीं।

जंगल आकर उसका सिर चकरा गया। शांति और लोगों से दूर जंगल के हर पेड़ पर भूतों ने डेरा जमा रखा था। कोई भी नए भूत-प्रेतों के लिए अपनी जगह छोड़ने को तैयार नहीं था।

“हे गणपति बप्पा! ऐसा तो नहीं सोचा था…आत्मा बनने के बाद भी घर के लिए भटकना पड़ेगा।”

कुछ देर भटकने के बाद, विनायक उस जान-पहचानी आवाज़ पर मुड़ा…

“किराए पर रहने के लिए जगह चाहिए…यह पेड़ छोटा है पर दो भूत एडजस्ट कर लेगा।”

विनायक ख़ुशी से फूल कर कुप्पा होके बोला – “क्रिस्टीन! तुम तो…”

क्रिस्टीन मुस्कुराकर बोली – “हाँ! गणपति बप्पा से पिटाई थोड़े ही खानी थी।”

उधर बस्ती में ज़ोर-शोर से बिना भूत वाले एक्सोरसिस्म और हवन चल रहे थे।

समाप्त!
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#ज़हन

Stories on KUKU FM #zahan

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Talented Kuku FM team is regularly creating audio stories, audio books on my stories and poems since July this year (Total 9 till date). 🤖 🥳
Kuku FM वेबसाइट और ऐप्लिकेशन पर सुनिए कई जॉनर में मेरी कहानियाँ और काव्य।
Dushman Mehmaan
Diljala Kutta
‘Aids Peedit Vampire’ now on Kuku FM. More audio stories soon.

#story बहस-नेटर: हर बहस का अंत

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प्रकाश अपनी सोशल मीडिया इमेज को लेकर बड़ा सजग रहता था। उसका मानना था कि जीवन में कोई भूल-चूक हो जाए तो चलता है पर इंटरनेट की आभासी दुनिया के प्रवासियों के सामने ज़रा सी भी कोताही नहीं। उसे कौनसे महान लोग या घटनाएं प्रेरणा देते हैं, कौनसी बातों और रुचियों को वह फॉलो करता है…सोशल मीडिया साइट्स पर सब नपा तुला दर्शाना। आभासी दुनिया के किसी मुद्दे पर अगर किसी दूसरे इंसान का मत उससे अलग हुआ प्रकाश झल्ला जाता था लेकिन अब सोशल मीडिया पर ‘बड़प्पन’ का नाटक भी करना है। इस कारण वह ऐसे दिखाता जैसे उसे फर्क नहीं पड़ा और वह इन बातों से ऊपर है। सामान्य बहस होने पर पहले वह कुछ ख़बरों, लेख वगैरह के लीक से हटकर और ढाई किलोमीटर लंबे लिंक लेकर आता। उसका मकसद सामने वाले इंसान को समझाने के बजाय तुरंत उसके हथियार डलवाना होता था ताकि उसका फैनबेस उसपर शंका न करे।
इस बीच प्रकाश के खास गुर्गे उसका गुणगान कर देते, टिप्पणियों पर पसंद और दिल चिपका देते, वहीं प्रकाश से अलग विचार वाले इंसान की टिप्पणियों पर मज़ाक उड़ाती बातें और इमोजी डाल देते। ऐसे में वह मुद्दा पढ़ने वाले लगभग सभी अपने-आप प्रकाश को सही और दूसरे व्यक्ति को बचकाना मान लेते। ऐसी सोशल इंजीनियरिंग का सहारा लेकर वह न जाने कितने लोगों को ब्रेनवाश करता।

फिर भी बात न बनती तो अंत में वह बह्रमास्त्र छोड़ता – “तुम इस फील्ड की बात कर रहे हो…क्या इस क्षेत्र से जुड़ी तुमने फलाना-फलाना कुछ किताबें पढ़ी भी हैं जो तुम ‘मुझसे’ (जिसको इतना ज्ञान है) से बहस करने की हिम्मत कर रहे हो?”

मुख्य विषयों और बातों की सबसे चर्चित कुछ दर्जन किताबें वह वाकई घोट कर पी चुका था। इनके अलावा दूसरी कई किताबों का सार पढ़ने में प्रकाश की गहरी रुचि थी। ज़ाहिर है सीखने के लिए कम और धौंस जमाने या आगे किसी बहस-‘शो ऑफ’ में स्टाइल झाड़ने के लिए ज़्यादा। सतही मेहनत के महल को पक्का बनाए रखने के लिए वह एक काम और करता। प्रकाश किसी से बहस या उसका मज़ाक उड़ाने से पहले जांच लेता था कि कहीं सामने वाला इस क्षेत्र का बड़ा ज्ञानी तो नहीं। अगर हाँ तो घुमा-फिरा कर और ध्यान बंटाकर विषय बदल देता या उस व्यक्ति को दूसरे क्षेत्र की बहस में लाने की कोशिश करता।

एक दिन प्रकाश की बहस इंजीनियरिंग कर रहे लड़के प्रवीण से हुई। बहस एक राज्य की राजनीती पर थी। प्रकाश को अपने जीतों की सूची में एक आसान जीत और दिख रही थी। लड़के ने प्रकाश की बात से अलग पक्ष रख उसकी शान में गुस्ताख़ी कर दी थी…सज़ा तो बनती थी। बात बढ़ती गई और प्रकाश ने अपने सारे पैंतरे आज़माए। कई लोग प्रकाश की तरफदारी करने आए और प्रवीण के कुछ साथी छात्रों ने उसका समर्थन किया। अंत में प्रकाश ने उस राज्य की राजनीती पर 5-7 मशहूर किताबों और कुछ शोध कार्यों का ज़िक्र किया। जवाब में प्रवीण ने अपनी पढ़ी, सुनी-देखी हुई सामग्री की बात कही….लेकिन असंगठित लेख आदि चाहे जितनी संख्या में हों…कहाँ मशहूर पुस्तकों के आगे टिक पाते। (ऐसा प्रकाश और आभासी दुनिया के कई लोगों का मानना था) अति आत्मविश्वास में प्रकाश ने यह भी स्वीकार लिया कि उस राज्य पर उसने इतना ही पढ़ा है और यह उन ‘बच्चों’ के सामने आई सामग्री से कहीं ज़्यादा महत्व रखता है।

“अच्छी बात है, सर। हाल ही में मद्रास यूनिवर्सिटी और कोंकण यूनिवर्सिटी के साझा प्रयास से सबके इस्तेमाल के लिए मुफ़्त ‘बहसनेटर’ नामक सॉफ्टवेयर तैयार किया गया है। इसमें दो या ज़्यादा पक्षों के तर्क के पीछे जानकारी के सभी स्रोतों की निष्पक्षता और जानकारी के स्तर की तुलना की जाती है।”

प्रकाश ने ऐसी उम्मीद नहीं की थी। उसने जवाब दिया – “ऐसा नहीं हो सकता…किसी भी क्षेत्र में ज्ञान और जानकारी की कोई सीमा नहीं होती। तो फिर कौन ज़्यादा और कौन कम?”

प्रवीण को ऐसे सवाल की ही उम्मीद थी – “सहमत हूँ, वैसे तो किसी भी क्षेत्र में जानकारी की कोई सीमा नहीं पर किसी विषय पर दो पक्षों को तुलनात्मक रूप से कितनी जानकारी पता है और उसमें से कितनी सही, गलत या विवाद करने लायक है का एक अंदाज़ा लगता है, नतीजे में 5-10 प्रतिशत का अंतर हो सकता है पर ज़्यादा नहीं।”

प्रकाश का धैर्य टूट रहा था – “हाँ, तो यह सब मुझे क्यों बता रहे हो?”

प्रवीण – “आपकी बताई किताबों, शोध आदि को एक पक्ष में रखा और हमारे बताए गए लेख, वीडियो आदि सामग्री दूसरे पक्ष में…सॉफ्टवेयर से मिला रिजल्ट यह है कि इस विषय पर आपके पक्ष की तुलना में हमारे पक्ष के पास 79.2% ज़्यादा जानकारी है। हाँ, संभव है कि इस सॉफ्टवेयर में कमियां हों पर यहाँ 20-30 नहीं बल्कि लगभग 80% का अंतर दिख रहा है। आपको बाकी विषयों की जानकारी होगी पर यहाँ तो कम से कम चुप ही रहें।

एक आखिरी बात और क्योंकि मैंने आपका ऑनलाइन ढोंग काफी समय से देखा है। मुझे पता है इसके बाद आप मेरा और मेरे दोस्तों का मज़ाक उड़ाएंगे, इस सॉफ्टवेयर को हवाई बताएंगे और अपने खलिहर फॉलोअर्स से हमें बुली करवाएंगे। आप यहाँ ही नहीं रुकेंगे कुछ दिन बाद आप इस विषय पर अपनी बात को सही साबित करते हुए लंबी पोस्ट लिखेंगे और उसके फॉलो-अप में बातें लिखते रहेंगे क्योंकि आप तो कभी गलत नहीं हो सकते। आप तो फ़रिश्ते पैदा हुए हो जो आज तक किसी भी विषय में कमतर या गलत साबित नहीं हुआ। किताबें पढ़ना अच्छी बात है पर उसके बाद आप जो ओछी हरकतें करते हैं वह सब गुड़ गोबर कर देती हैं। मेरी बस एक सलाह है, खुद को सही मानें पर फालतू की आत्ममुग्धता से बचें। सामने वाला इंसान कुछ कह रहा है तो पहले उसकी बात को समझें। कोई विपरीत पक्ष आने पर आप उस इंसान की बात को ऐसे नकारते हैं जैसे वह परसों पैदा हुआ हो। जिन वेबसाइट जैसे रेडिट, क्वोरा आदि का हमनें हवाला दिया है वहां अनगिनत मुद्दों पर तो करोड़ो शब्दों की सामग्री पड़ी है जिसमें से सब नहीं तो लाखों शब्द काम के हैं और दर्जनों किताबों के बराबर हैं। किसी ने अगर असंगठित जगहों से थोड़ी-थोड़ी जानकारी ली है तो इसका यह मतलब नहीं कि उसे ‘कुछ’ पता ही नहीं। हो सकता है उसके थोड़े-थोड़े दशमलव जुड़कर आपके एक जगह के चौके-छक्के से कहीं ज़्यादा हो जाएं। मैं देखना चाहूंगा कि बहसनेटर पर आप और सोशल मीडिया पर ज्ञान की दुकान खोले बैठे कई लोग बाकी विषयों में कितने पानी में हैं। आपकी प्रोफाइल मैंने हैक कर ली है…घबराएं नहीं कोई गलत इस्तेमाल नहीं करूंगा पर पिछले कुछ महीनों के आपके स्टंट बहसनेटर पर तोलकर आपकी सभी सोशल मीडिया प्रोफाइलों पर आपके नाम से ही डाल रहा हूँ। आगे दोबारा नौटंकी की कोशिश की तो फिर से प्रोफाइल हैक करके ऐसा करूंगा। पुलिस को ज़रूर बताएं…मुझे आपके इनबॉक्स में मिली सामग्री की कसम आपसे कम ही सज़ा होगी। इस बहस से जुड़े और बाकी ‘काम के’ सारे स्क्रीनशॉट ले लिए हैं। धन्यवाद!”

प्रकाश का उसी के खेल में शिकार हो चुका था। उसका आभासी स्टारडम और दिमाग अपनी जगह पर आ गए।

समाप्त!

#ज़हन

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