किसका भारत महान? (कहानी) #ज़हन

21369234_10155296195743393_8869409205061140518_nArtwork – Martin Nebelong

पैंतालीस वर्षों से दुनियाभर में समाजसेवा और निष्पक्ष खोजी पत्रकारिता कर रहे कनाडा के चार्ली हैस को नोबेल शांति पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई। नोबेल संस्था की आधिकारिक घोषणा के बाद से उनके निवास के बाहर पत्रकारों का तांता लगा था। अपनी दिनचर्या से समय निकाल कर उन्होंने एक प्रेस वार्ता और कुछ बड़े टीवी, रेडियो चैनल्स के ख़ास साक्षात्कार किये। दिन का अंतिम साक्षात्कार एशिया टीवी की पत्रकार सबीना पार्कर के साथ निश्चित हुआ। एशिया के अलग-अलग देशों में अपने जीवन का बड़ा हिस्सा बिताने वाले चार्ली खुश थे कि अब उन्हें पाश्चात्य पत्रकारों के एक जैसे सवालों से अलग कुछ बातें मिलेंगी।

काफी देर तक अलग-अलग मुद्दों पर चर्चा करने के बाद सबीना ने कुछ संकोच से पूछा। “मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि इतनी समस्याओं में आपने अभी तक भारत का नाम नहीं लिया?”

चार्ली – “क्या आप चाहती हैं कि मैं भारत का नाम लूँ?”

सबीना – “मेरा वो मतलब नहीं था। मैं कहना चाहती हूँ कि भारतीय समाज में इतनी विकृतियाँ सुनने में आती हैं, हर रोज़ इतने अपराध होते हैं….मुझे लगा आपके पास कहने को बहुत कुछ होगा।”

चार्ली – “बिल्कुल! भारतीय समाज में बहुत सी कमियाँ हैं, अक्सर अपराध सुर्खियाँ बनते हैं पर क्या आपको पता है 200 कुछ देशों की दुनिया में लगभग चौथाई देश ऐसे हैं जिनकी अधिकतर आपराधिक ख़बरें, सरकार की गलतियाँ, जनता का दुख सरकारी फ़िल्टर की वजह से वहाँ से बाहर दुनिया में नहीं जा पातीं…वहाँ की तुलना में भारत स्वर्ग है। उन देशों के अलावा कई देशों में शिक्षा और सामाजिक व्यवस्था ऐसी है कि बच्चो में अपने धर्म, देश की निंदा को हतोत्साहित किया जाता है और एक समय के बाद इस सामाजिक अनुकूलन (सोशल कंडीशनिंग) के कारण स्थानीय लोगो, मीडिया द्वारा बाहर के देशों में किसी बड़ी अप्रिय घटना के अलावा अपनी “सामान्य” या “अच्छी” छवि की रिपोर्ट्स भेजी जाती हैं। जबकि भारत में मैंने इस से उलट ट्रेंड देखा है।”

सबीना – “मैं आपकी बात समझी नहीं। कैसा उल्टा ट्रेंड?”

चार्ली – “मान लीजिये अगर दुनिया के किसी हिस्से में हुई त्रासदी में 3 दर्जन लोग मरते हैं, ये हुई पहली खबर और दूसरी खबर में भारत का कोई स्थानीय दर्जे का नेता एक रूढ़िवादी या बेवकूफाना बयान देता है। अब यहाँ ज़्यादा संभावना यह है कि भारत के नेता के गलत बयान वाली खबर, कहीं और हुई 36 लोगो की मौत वाली खबर से बड़ी बन जायेगी और दुनिया के कई हिस्सों में पहुँचेगी। इतना ही नहीं बाकायदा उस खबर का फॉलो अप भी होगा। जब लगातार किसी देश से जुडी नकारात्मक ख़बरें अंतरराष्ट्रीय मीडिया में जाती रहेंगी तो देश-दुनिया के लोगो में भारत की वैसी ही छवि बनेगी जैसी आपके मन में हैं। वर्तमान भारत अपने इतिहास के समय सा महान नहीं है पर दुनिया की नर्क सरीखी जगहों में भी नहीं है….यह देश कहीं बीच में है। किसी बात के औसत में सत्तरवें नंबर पर लटका है तो कहीं बत्तीसवां है, जो इतनी जनसँख्या और कदम-कदम पर दिखती सामाजिक विविधता में अचंभित करने वाली बात है। अब यह भारतीय लोगों पर है वो औसत से ऊपर जाते हैं या नीचे।”

सबीना – “…मतलब आप चाहते हैं भारतीय लोग और मीडिया अपनी कमियों पर बात करना छोड़ दें?”

चार्ली – “मैं चाहता हूँ भारत के लोग, मीडिया अपनी कमियों पर बात करने और कमियों का स्पीकर युक्त ढोल बजाने में अंतर समझें। अगर ऐसा नहीं  होता है तो बाहरी देशों में भारत की छवि धूमिल होती जायेगी जिसका गहरा असर पर्यटन, व्यापर, कई देशों से द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ेगा। इतना ही नहीं भारतीय लोगो में एक-दूसरे के प्रति वैमनस्य की भावना बढ़ती जायेगी। फिर यह देश अपनी क्षमता से नीचे जाता रहेगा।”

अपनी असहजता मिटाने के लिए सबीना ने अन्य मुद्दों से जुड़े सवाल पूछने शुरू कर दिए।

समाप्त!

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Daraaren Darmiyan (Ishq Baklol Poetry)

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कल देवेन पाण्डेय जी की नॉवेल इश्क़ बकलोल की प्रति मिली। 🙂 किताब का अमेज़न हार्डकॉपी लिंक जल्द ही एक्टिव होगा। उपन्यास शुरू होने से पहले किताब के 2 पन्नो पर मेरी कलम है….

दरिया में तैरती बोतल में बंद खतों की,
पलकों से लड़ी बेहिसाब रातों की,
नम हिना की नदियों में बह रहे हाथों की,
फिर कभी सुनेंगे हालातों की…
…पहले बता तेरी आँखों की मानू या तेरी बातों की?
चाहे दरमियाँ दरारें सही!

ये दिल गिरवी कहीं,
ये शहर मेरा नहीं!
तेरे चेहरे के सहारे…अपना गुज़ारा यहीं।
जी लेंगे ठोकरों में…चाहे दरमियाँ दरारें सही!

नफ़रत का ध्यान बँटाना जिन आँखों ने सिखाया,
उनसे मिलने का पल मन ने जाने कितनी दफा दोहराया….
जिस राज़ को मरा समझ समंदर में फेंक दिया,
एक सैलाब उसे घर की चौखट तक ले आया….
फ़िजूल मुद्दों में लिपटी काम की बातें कही,
चाहे दरमियाँ दरारें सही!

किस इंतज़ार में नादान नज़रे पड़ी हैं?
कौन समझाये इन्हें वतन के अंदर भी सरहदें खींची हैं!
आज फिर एक पहर करवटों में बीत गया,
शायद समय पर तेरी यादों को डांटना रह गया।
बड-बड बड-बड करती ये दुनिया जाली,
कभी खाली नहीं बैठता जो…वो अंदर से कितना खाली।
माना ज़िद की ज़िम्मेदारी एकतरफा रही,
पर ज़िन्दगी काटने को चंद मुलाक़ात काफी नहीं….
ख्वाबों में आते उन गलियों के मोड़,
नींद से जगाता तेरी यादों का शोर।
मुश्किल नहीं उतारना कोई खुमार,
ध्यान बँटाने को कबसे बैठा जहान तैयार!
और हाँ…एक बात कहनी रह गयी…
काश दरमियाँ दरारें होती नहीं!
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#ज़हन

काव्य कॉमिक्स – मतलबी मेला (फ्रीलैंस टैलेंट्स)

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New poetry Comic “Matlabi Mela” published, based on my 2007 poem of the same name.
*Bonus* Added an extra poem “खाना ठंडा हो रहा है…” in the end.
Language: Hindi, Pages: 22
Illustration – Anuj Kumar
Poetry & Script – Mohit Trendster
Coloring & Calligraphy – Shahab Khan

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Available (Online read or download):
ISSUU, Freelease, Slideshare, Ebook Home, Archives, Readwhere, Scribd, Author Stream, Fliiby, Google Books, Play store, Daily Hunt, Smashwords, Pothi and Ebook Library etc.

हाँ पता है…(feat. जूता) – सामाजिक कहानी

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सज्जन – “मोहित जी आपको पता है फिलिस्तीन के लोगो पर इजराइल कितना ज़ुल्म कर रहा है? म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय का क्या हाल किया है वहाँ के बहुसंख्यक बौद्ध समाज ने?”

“हाँ जी! पता है…और मुझे नाइजीरिया में बोको हराम द्वारा सरकार से युद्ध और स्थानीय लोगो का नरसंहार पता है, दशकों से इराक़ और तुर्की द्वारा लगातार कुर्द, यज़ीदी समुदाय की एथनिक क्लेंज़िंग पता है, पाकिस्तान, ईरान के विरुद्ध बलूचिस्तान के लोगो संघर्ष पता है, अंगोला में चल रही कबीना लड़ाई पता है, रूस-चेचेन्या क्राइसिस पता है, रूस-यूक्रेन युद्ध पता है, इंडोनेशिया और पपुआ निवासियों के कुछ वर्गों की लड़ाई पता है, कोलंबिया, मेक्सिको और दक्षिण अमेरिकी देशों में नशे के व्यापार में चल रहे संघर्ष पता हैं, इतना ही नहीं माली, सूडान, दक्षिण सूडान, सीरिया, कांगो, सोमालिया, यमन, फिलीपींस, अफगानिस्तान, केंद्रीय अफ्रीका गणराज्य में चल रहे गृह युद्धों के बारे में पता है। बाकी दुनियाभर में कई छोटे-बड़े समुदाय आपस में या स्थानीय सरकारों से संघर्ष कर रहे हैं और अनेकों समुदाय संघर्ष करते-करते लुप्त हो गए।

मुझे एक बात और पता है, तुम मिडिल क्लास परिवार से हो जिनका जीवन खुद में एक जंग है। पहले अपनेआप को इतना काबिल बनाओ कि किसी गलत को सही कर सको, अपने परिवार से बाहर भी लोगो की मदद कर सको। अगर ऐसा ना कर पाओ तो गलत को गलत ज़रूर कहो पर फिर हर तरह के गलत को गलत कहो पर तुम तो मज़हब के हिसाब से ज़ुल्म देख रहे हो जो गलत है। अगर तुम्हे हर ज़ुल्म पर एक जैसा दर्द नहीं होता तो थू है तुम्हारी सोच पर! अब आगे क्या करना है पता है ना?”

सज्जन – “हाँ मोहित जी! मैं जूता उठाकर अपने मुँह पर मार लेता हूँ।”

“अरे नहीं भाई, मेरा मतलब था कि अब काम पर ध्यान दो और तरक्की करो…ताकि जिन बातों पर परेशान होते हो उन्हें बदलने की कोशिश करने लायक बन सको।”

कुछ देर बाद –
सज्जन – “समझ गया! मैं चलता हूँ।”

“रुको! मुँह इधर करो, जूता तो खाते जाओ।”

समाप्त!
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– #मोहित_शर्मा_ज़हन
Artwork – Neil Wilson
#mohitness #civilwars #crisis #selectiveoutrage #media

झुलसी दुआ (कहानी) #ट्रेंडस्टर

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सरकारी नौकरी की तैयारी में कई वर्ष बिताने के बाद सोमेश का चयन अग्निशमन कर्मी पद पर हुआ। जहाँ घरवालों में जोखिम भरी नौकरी को लेकर सवाल और चिंता थी वहीं सोमेश के तो जैसे मन की मुराद पूरी हो गयी थी। बचपन में वो सुपरहीरो बनना चाहता था, फ़िल्मी हीरो नहीं बल्कि लोगो की मदद करने वाला असली हीरो। बड़े होते-होते उसे दुनिया की ज़मीनी सच्चाई पता चली और उसने हीरो बनने का विचार तो छोड़ दिया पर लोगो की मदद करने वाले किसी क्षेत्र में जाने की बात ने उसके बचपन का सुपरहीरो फिर से जगा दिया। समाजसेवा के साथ-साथ जीविका कमाना और क्या चाहिए?

साधारण वेतन और जान के खतरे वाली नौकरी पर असमंजस में पड़े माँ-बाप और बड़ी बहन को किसी तरह मनाकर सोमेश ट्रेनिंग पर निकल गया। फायर फाइटिंग के अभ्यास में सोमेश अपने बैच में सबसे आगे था। उसके पास रहने से उसके साथी जोश, सकारात्मकता से भर जाते थे। सोमेश से पिछड़ने के बाद भी सभी उसे पसंद करते थे। ट्रेनिंग के बाद सोमेश की पहली नियुक्ति दिल्ली में हुई। उसके छोटे कस्बे की तुलना में दिल्ली जैसे पूरी दुनिया था। जहाँ उसे अपनी जगह का आराम पसंद था वहीं महानगर की चुनौती का अपना ही मज़ा था। जब उसने सुना कि दिल्ली के कुछ इलाकों में 1 वर्ग किलोमीटर में 12,000 तक लोग रहते हैं तो किसी छोटे बच्चे की आँखों जैसा अविश्वास भर गया उसमें। गर्मी के मौसम में शहर में ख़ासकर औद्योगिक क्षेत्रों में लगने वाली आग के मामले बढ़ने लगे थे। अपनी शिफ्ट में सोमेश की दमकल वैन रोज़ाना 2-3 जगह जा रही थी, शिफ्ट ख़त्म होने के बाद भी ज़रुरत पड़ने पर सोमेश पास के अपने कमरे से फायर स्टेशन पहुँच जाता था। अपनी ड्यूटी के समय से बाहर या अधिक काम करना उसके लिए इतना सामान्य हो गया था कि उसके सीनियर अधिकारीयों, सहकर्मियों ने यह बात नोट करनी तक बंद कर दी थी। उसके दोस्त हँसते थे कि दुनिया में सबसे पॉजिटिव इंसान सोमेश है, इतना ज़िंदादिल तो फिल्मों के हीरो तक नहीं होते। सोमेश वापस उन्हें कहता कि वो सब भी आशावान बनें, हमेशा अच्छा सोचें, अपने भगवान या उपरवाले पर भरोसा रखें क्योकि जिस भी जगह पर वह गया वहाँ लोग आग, भूकम्प आदि से घायल तो हुए पर किसी की जान नहीं गयी।

उसकी दिनभर की थकान नींद से कम बल्कि घरवालों से घंटे-आधा घंटे बातें कर ज़्यादा ख़त्म होती थी। अक्सर उसने कितने लोगो को कैसे बचाया, कैसे बीमारी में भी स्टेशन आने वालो में सबसे पहला वो था, कैसे घायल पीड़ित के परिजन उस से लिपट गए, कैसे ट्रैफिक में कुछ देर हो जाने पर उनपर भीड़ ने पत्थर बरसाए या उनकी पिटाई तक की।

“माँ! आज आप मानोगी नहीं। सीढ़ी पर से झूलकर बिल्डिंग से गिरता हुआ बच्चा पकड़ा मैंने, पूरे मोहल्ले ने आशीर्वाद दिया मुझे। कोई कपडे दे रहा था, कोई वैन में घर पर बनाई मिठाई ज़बरदस्ती रख गया। बच्चे की माँ तो अपना सोने का कड़ा उतार कर दे रही थी पर मैंने लिया नहीं। उसे देख कर आपकी याद आ गयी।”

माँ का मन करता था कि सोमेश बस बोलता रहे। उसकी आवाज़ में जो ख़ुशी झलकती थी वो ही माँ के लिए सबसे बड़ी दौलत थी।

“….फिर ना माँ ओखला में तुरंत दूसरी जगह जाना पड़ा। हम लोगो की गाडी ख़राब हो गई और पहुँचते-पहुँचते लेट हो गए। भीड़ ने घेर लिया और गुस्से में एक आंटी ने संजय के चप्पल बजा दी, बाकी लोग वैन की तरफ बढ़ने लगे तो मैंने माइक से समझाया कि देर हो गयी पर जो लोग फँसे हैं उन्हें बचा लेने दो फिर पीट लेना। राधे-कृष्ण की जो कृपा रही किसी को ज़्यादा चोट तक नहीं आई, सारे लोग बचा लिए।”

माँ बोली – “अपना ध्यान रखा कर। बेटा हर जगह ऐसे मत बढ़ा कर, कहीं लोग ना सुने… ”

सोमेश ने माँ को दिलासा दिया – “माँ भगवान आपकी और मेरी हर बात सुनते हैं। इतने महीने हो गए यहाँ मेरे सामने कोई नहीं मरा, ना मुझे कुछ हुआ। कुछेक  बार जलती बिल्डिंग, भूकंप से तहस-नहस घरों में फँसे लोग देखकर जब सबने उम्मीद छोड़ दी तब भगवान से माँगा बस बचा लो आपका सहारा है। जाने कैसे सबको बचा लाये हम लोग। तुम्हारे साथ-साथ दर्जनों लोगो का आशीर्वाद बटोरता हूँ रोज़। सब अच्छा होगा माँ, तुम चिंता मत किया करो।”

सोमेश पर भगवान की कृपा बनी रही और उसकी नौकरी का एक साल पूरा हुआ। एक दिन उसे शहर के बाहरी इलाके में स्थित अपार्टमेंट में लगी आग के मौके पर भेजा गया। अपार्टमेंट के आग के लिए पहले ही कुछ फायर वैन पहुँच चुकी थी पर भीषण आग बिल्डिंग से आस-पास मज़दूरों की बस्तियों में फ़ैल गयी थी। दूर-दराज़ के इलाके और तंग गलियों के कारण लोगो को बचाने में मुश्किलें आ रहीं थी। एक-एक सेकण्ड से लड़ते हुए दमकल कर्मियों के कुछ दल अलग-अलग स्थानों पर फ़ैल गए। सोमेश भगवान का नाम लेता हुआ बस्ती के अंदरूनी हिस्से में फँसे लोगो को बचाने लगा। कुछ देर में स्थिति काबू में आई पर घायलों के लिए इन अंदरूनी इलाकों तक एम्बुलेंस, अन्य मदद आने में काफी समय लगना।

तभी सोमेश की नज़र एक औरत के निर्जीव शरीर के पास खड़े 2 दमकलकर्मियों पर पड़ी। वो दोनों बहस कर रहे थे कि क्या यह औरत ज़िंदा है या नहीं। तेज़ धड़कनों के साथ जब सोमेश पास पहुँचा उसे एक पूरी तरह जल चुकी गर्भवती महिला दिखी। उस महिला ने किसी तरह हाथ की ज़रा सी हरकत से जैसे बहस कर रहे बचावकर्मियों को बताया कि अभी उसमे जान थी। तारकोल की तरह चौथी डिग्री के जले के निशानों के साथ उसका मांस जगह-जगह से उतर रहा था और चेहरे की जगह एक अधभुने मांस का चिथड़ा दिख रहा था। उसका एक हाथ पेट से जलकर पेट से चिपका हुआ था, शायद जलते हुए भी वो अपने बच्चे को दिलासा दे रही थी कि सब ठीक हो जाएगा। दर्द में उसका शरीर हल्की फड़कन कर रहा था। सोमेश ने उसको पानी पिलाने की कोशिश की पर पानी की बूंदों के मांस से छूने से भी वो दर्द से और तेज़ हिलने लगी। सोमेश को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसके साथ ऐसा कुछ हो सकता है। उसके साथ तो अंत में तो सब ठीक हो जाता था। एक सहकर्मी ने बताया कि इस औरत का पूरा परिवार मर चुका है। मदद आने में अभी बहुत समय था और पीड़ित औरत की हालत इतनी ख़राब थी कि सोमेश खुद को उस औरत के बचने की ज़रा सी उम्मीद का दिलासा तक नहीं दे सकता था। बेनाम औरत का दर्द सोमेश से देखा नहीं जा रहा था, नम आँखों से वह घुटनो के बल उसके पास बैठ गया। उसके हाथ बार-बार औरत की तरफ बढ़ते और उसे दर्द ना हो तो शरीर को छूने से पहले ही रुक जाते।

हमेशा हँसमुख, आशावादी रहने वाला, आज जीवन में पहली बार हार मान चुका सोमेश ऊपर देखते हुए रुंधे गले से बोला –  “भगवान बहुत दर्द सह लिया इसने, प्लीज़ इस औरत को मार दो भगवान। इसे अपने पास बुला लो…प्लीज़ इसे मार दो…“

शायद भगवान ने उसकी पुकार सुन ली थी। उस औरत की नब्ज़ चली गई और साँसों का उतार-चढ़ाव भी बंद हो गया। भारी मन से सोमेश बस्ती के अन्य हिस्सों की तरफ बढ़ गया।

समाप्त!
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Artwork – Alok Pawar #mohitness #mohit_trendster #freelancetalents

विकिपीडिया और बिकाऊ मीडिया के पार की दुनिया (कहानी) – मोहित शर्मा ज़हन

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नाखून चबाती मशहूर अभिनेत्री मेघना कमल कमरे में इधर-उधर टहल रही थी। फ़ोन पर अपने मैनेजर पर चिल्लाती हुई वो टीवी न्यूज़ चैनल्स बदल-बदल कर खुद पर आ रही खबरों को देखने लगी। पिछली रात पास के अपार्टमेंट में से किसी ने उसकी एक वीडियो बनाई थी जिसमें वो एक पिल्ले को किक मारती हुई अपने बंगले से बाहर कर रही थी। शुरुआत में हरकत कर रहा पिल्ले का शरीर मेघना की 5-7 लातें खाने के बाद निर्जीव हो गया। विडिओ पर ना सिर्फ जानवर के अधिकारों वाली संस्थाओं की तीखी प्रतिक्रिया आ रही थी बल्कि देश-विदेश की जनता मेघना की इस हरकत से गुस्से में थी। बड़े निर्माताओं, निर्देशकों पर मेघना को अपनी फिल्मों से बाहर करने, कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने का दबाव बढ़ रहा था। कुछ ही देर में मेघना के घर के बाहर मीडिया का तांता लग गया।

मेघना ने अपने पिता और बीते ज़माने के सुपरस्टार अभिनेता हरीश कमल को फ़ोन किया।
“पापा…आई ऍम सॉरी, मेरी वजह से आपका नाम भी उछल रहा है। नशे में करियर बर्बाद कर लिया! सब ख़त्म हो गया!”

हरीश शांत स्वर में मेघना को समझाने लगे – “चिंता मत कर मेघू बेटे! ऐसे करियर बर्बाद होने लगते तो मैं कबका एक्टिंग छोड़ चुका होता। तेरा वीडियो मैंने देखा है। एक पार्सल भेजा है तुझे, बाकी फ़ोन पर नहीं समझाऊंगा। अपने मैनेजर और टीम को बुला ले उन्हें समझा दिया है, उनकी बात ध्यान से सुनकर वैसा ही करना… “

उस शाम मेघना ने अपने घर पर ही प्रेस कॉन्फ्रेंस रखी। कुछ सवालों के जवाब देने के बाद वह अपनी रिहर्स की हुई लाइनों पर आ गई।

“मैं जानती थी कि भारत के ज़्यादातर लोगो की जो मानसिकता हैं उनसे मुझे ऐसी ही प्रतिक्रिया मिलेगी। कल रात मैंने जानबूझ कर एक रोबोटिक खिलौने पप्पी को मारा, जो दूर से एकदम असली लगता है। यह देखिये इस पार्सल में उस से मिलता-जुलता खिलौना है। मेरा उद्देश्य लोगो में निरीह जानवरों के अधिकार, उनपर होने वाली हिंसा, मानव आबादी से कम होते जंगलों के लिए जागरूकता बढ़ाना था और देश क्या पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए इस स्टंट से बेहतर मुझे कोई उपाय नहीं लगा। इस बीच मुझे चुभने वाली एक सच्चाई का सामना करना पड़ा, एक लड़की के लिए चाहे वो एक सफल अभिनेत्री ही सही इस देश के लोग अपनी छोटी सोच दिखा ही देते हैं। भारत के लोगो और कई सेलेब्रिटीज़ की बातों ने मुझे आहत किया है।”

इतना कहते ही मेघना प्रेस वार्ता में रोने लगी। कैमरों की चमक से आँगन जगमगा उठा। हर ओर मेघना की तारीफ़ और चर्चे थे। इस घटना के बाद मेघना को कुछ अवार्ड मिले, तीन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने मेघना को अपना गुडविल एम्बेस्डर बनाया और वो बड़े बजट निर्माताओं की पहली पसंद बन गयी। एक दिन हरीश कमल ने मेघना को हँसते हुए बताया कि मेघना का किया कांड तो कुछ भी नहीं उन्होंने अपने समय में कितने कानून तोड़े, लोगो को गायब तक करवाया पर आज भी देश उन्हें पूजता है।

समाप्त!
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Image – Watercolor Painting by artist Shilpi Mathur
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Color Blind Saajan (Hindi Story)

autumn

“देखना ये सही शेड बना है? आना ज़रा…”

“मैं नहीं आ रही! जब कोई काम कर रही होती हूँ तभी तुम्हे बुलाना होता है।”

अपने कलाकार पति आशीष को ताना मारती हुई और दो पल पहले कही अपनी ही बात ना मानती हुई रूही, उसके कैनवास के पास आकर खड़ी हो गई।

रूही – “यहाँ नारंगी लगाना होगा तुम लाल सा कर रहे हो।”

आशीष छेड़ते हुए बोला – “किस चीज़ की लालसा?”

रूही – “इस लाल रंग ने नाक में दम कर रखा है। देखो! जब कोई बिजी, थका हुआ हो तो उसे और गुस्सा नहीं दिलवाना चाहिए। गैस बंद कर के आई हूँ।”

आशीष ने आँखों से माफ़ी मांगी और रूही मुस्कुराकर रंगो का संयोजन करवाने में लग गई। आशीष कलरब्लाइंड था, उसकी आँखें लाल और हरे रंग और उनके कई शेड्स में अंतर नहीं कर पाती थीं। उसे ये दोनों रंग भूरे, मटमैले से दिखते थे। इनके अलावा इन मूल रंगों से मिलकर बने अन्य रंग भी फीके से दिखाई देते थे। वर्णान्ध होने के बाद भी अपनी मेहनत के दम पर आशीष बहुत अच्छा पेंटर बन गया था। हालाँकि, अक्सर उसकी कलाकृतियों में रंगो का मेल या संयोजन ठीक नहीं बैठता था, इसलिए वह इस काम में रूही की मदद लेने लगा। रूही पास के प्राइमरी स्कूल में अध्यापिका थी और आशीष अपनी कलाकृतियों की कमाई पर निर्भर था। घर की आर्थिक स्थिति साधारण थी पर दोनों एक-दूसरे के प्रेम को पकड़े गृहस्थी की नैया खे रहे थे। रूही के परिजन, सहेलियां उसे इशारों या सीधे तानो से समझाते थे कि वो आशीष की कला छुड़वाकर किसी स्थिर नौकरी या काम पर लगने को कहे। रूही जानती थी उसके एक बार कहने पर आशीष ऐसा कर भी देगा पर वो उस आशीष को खोना नहीं चाहती थी जिसके प्रेम में उसने सब कुछ छोड़ा था। उसे दुनिया के रंग में घोल कर शायद वो फिर कभी खुद से नज़रे ना मिला पाती।

एक दिन स्कूल से घर लौटी रूही कमरे में आशीष के खाँसने की आवाज़ें आईं। कमरे में आशीष खून की उल्टियाँ कर रहा था। रूही को देखकर सामान्य होने की कोशिश करता आशीष लड़खड़ाकर ज़मीन पर गिर पड़ा और बात छुपाने लगा – “ये…ये लाल रंग बना है ना? देखो गलती से फ़ैल गया, मैं साफ़ कर दूँगा।”

उसका खून अधूरी पेंटिंग पर बिखर गया था। इधर आँसुओं से धुंधली नज़रों को पोंछती रूही दौड़कर आशीष के पास आई।

“तुम्हे झूठ बोलना नहीं आता तो क्यों कोशिश कर रहे हो? चलो हॉस्पिटल!”

हॉस्पिटल में हुई जांच में रूही को पता चला कि आशीष को झूठ बोलना आता है। वो कई महीनों से छोटा मर्ज़ मान कर अपने फेफड़ों के कैंसर के लक्षण छुपा रहा था, जो अब बढ़ कर अन्य अंगो में फैल कर अंतिम लाइलाज चरण में आ गया था। अब आशीष के पास कुछ महीनों का वक़्त बचा था। दोनों अस्पताल से लौट आये। अक्सर बुरी खबर का झटका तुरंत महसूस नहीं होता। पहले तो मन ही झुठला देता है कि कम से कम हमारे साथ तो ऐसा नहीं हो सकता। फिर फालतू की छोटी यादें जो किसी तीसरे को सुनाओ तो वो कहेगा कि “इसमें क्या ख़ास है? यह तो आम बात है।” पर वो भी कैसे समझेगा आम बात अगर किसी ख़ास के साथ हो तो उस ख़ास की वजह से ऐसी बातें आम नहीं रहती।

रात के वक़्त आशीष से उलटी तरफ करवट लिए, तकिये पर मुँह सटाये सिसक रही रूही को उसके जीवन का सबसे बड़े ग़म का झटका लगा था। मन के ज्वार-भाटे में बहते कब सुबह हुई पता ही नहीं चला। इस सुबह रूही ने फैसला किया कि दुनिया में आशीष के बचे हुए दिनों को वो रो कर खराब नहीं करेगी और ना ही आशीष को करने देगी। उधर आशीष ने जैसे रूही के मन में जासूस बिठा रखे थे, उसने भी अपना बचा समय अपने जीवन की दो खुशियों को यानी रूही और पेंटिंग्स को देने का निर्णय लिया। एक-एक लम्हा निचोड़ कर जीने में दिन बड़ी जल्दी गुज़रते हैं। टिक-टिक करती घडी पर कैनवास डाल कर, लाल-हरे-भूरे रंग के फर्क पर हँसते दोनों का समय कट रहा था। एक दिन आशीष ने रूही को एक फाइल पकड़ाई जिसमे उसके बीमा, अकाउंट आदि के कागज़ और जानकारी थी। फाइल के अलावा एक पन्नी में लगभग तीन लाख रुपये थे।

“इतने पैसे?” रूही ने चौंक कर पूछा।

आशीष – “हाँ, 2-3 आर्ट गैलेरी वालों पर काफी पैसा बकाया था। पूरा तो नहीं मिला पर पीछे पड़ कर और कैंसर की रिपोर्ट दिखा के रो-पीट कर इतना मिल गया कि कुछ समय तो तुम्हारा काम चल ही जाए। तुम वहाँ होती तो मेरी एक्टिंग देख कर फ्लैट हो जाती।”

रूही – “मुझे नहीं होना फ्लैट, मैं कर्वी ही ठीक हूँ।”

दोनों हँसते-हँसते लोटपोट हो गए और एक बार फ़िर सतह की ख़ुशी की परत में दुखों को लपेट लिया। इस सतह की परत में एक कमी होती है, पूरे शरीर पर अच्छे से चढ़ जाती है पर आँखों को ढकने में हमेशा आनाकानी करती है। कुछ दिनों बाद रूही के नाम एक कुरियर आया और आशीष के पूछने पर रूही ने बताया कि उसने आशीष के लिए ख़ास इनक्रोमा चश्मा खरीदा है। इस चश्मे को लगाकर कलरब्लाइंड लोग भी बाकी लोगो की तरह सभी रंग देख सकते हैं और मूल रंगों में अंतर कर सकते हैं। इस चश्मे के बारे में आशीष को पता था और उसे यह भी पता था कि ये प्रोडक्ट बहुत महंगा और कुछ ही देशो तक सीमित था। कीमत जानकर उसने अपना सिर पीट लिया।

आशीष बिफर पड़ा – “3 लाख! अरे पागल क्या पता तीन दिन में मर जाऊं। इस से बढ़िया तो उन गैलरी वालों पर एहसान ही चढ़ा रहने देता। क्या करूँगा बेकार चश्में का?”

रूही – “तुम्हे मुझपर भरोसा नहीं है? रह लूँगी तुम्हारे बिना। नहीं चाहिए तुम्हारा एहसान। मुझे हरा रंग देखना है, लाल रंग देखना है, जामुनी रंग में जो हल्की मैरून की झलक आती है वो देखनी है, जो तुम्हे कभी समझ नहीं आता तुम्हारी आँखों से मुझे वो कमीना लाल रंग देखना है।”

इतने दिनों से जो ख़ुशी की परत थी वो धीरे-धीरे हट रही थी।

रूही – “अब ये चश्मा पहनो, आँखों को एडजस्ट करने में कुछ मिनट का टाइम लगता है इसलिए सामने नीली दीवार को देखो और आराम करो। बस अभी  तुम्हारा कैनवास और कलर्स लेकर आती हूँ।”

रूही बिना कैनवास और रंग लिए लौटी। दुल्हन के श्रृंगार और लाल जोड़ें में रूही आशीष के सामने थी।

लाल रंग देखकर आशीष उस रंग से पुरानी  दुश्मनी भूल मंत्रमुग्ध होकर बोला – “ये….ये…लाल…”

हामी में सिर हिलाती रूही आशीष से लिपट गयी। दोनों की आँखों से बहते पानी ने झूठी ख़ुशी की परत धोकर सुकून की नयी परत चढ़ा दी। रूही ने घाटे का सौदा नहीं किया था, उसने तीन लाख देकर अपनी ज़िन्दगी का सबसे अनमोल पल खरीदा था।

समाप्त!
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बोगस परग्रही (कहानी) #ज़हन

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बोगस परग्रही सीरीज़ में आपका स्वागत है। यहाँ हर एपिसोड में हम कवर करेंगे भौजीकसम ग्रह के दो खोजी-टोही वैज्ञानिक कुच्चु सिंह और पुच्चु सिंह के रोमांचक कारनामे।

ब्रह्माण्ड में तैरते अनगिनत पत्थरों में से उन दोनों को पृथ्वी की खोजबीन और जांच की जिम्मेदारी मिली थी। उनके उन्नत यान में सदियों तक ईंधन और आहार की कमी नहीं होने वाली थी। पृथ्वी के इतना पास होते हुए भी मानवो के अंतरिक्ष स्टेशन, अन्य यंत्र उन्हें नहीं देख पाते थे। कुच्चु-पुच्चु बुद्धिमान तो थे पर अव्वल दर्जे के आलसी भी थे। उनका साढ़े तीन फ़ीट का कद भौजीकसम ग्रह पर औसत से 4-5 इंच ऊपर था, जिसका उन्हें घमंड था पर पृथ्वी की जानकारी, तस्वीरें और वीडियो देख कर उनका मुँह पार्थिव पटेल से भी छोटा बन गया। भौजीकसम का एक वर्ष पृथ्वी के 26 वर्षो के बराबर था और उन्हें 15 भौजीकसम वर्षों में अपने कई मिशन निपटाने थे। उनके पास 390 वर्ष हैं, इस जानकारी के बाद दोनों और ज़्यादा आराम में आ गए। पहले कुछ वर्ष सुस्ताने के बाद अपने मिशन की शुरुआत के लिए उन्होंने धरती का सबसे विविध देश भारत चुना। कुछ असफल मिशन और कई सालों बाद एक मिशन की तैयारी करते हुए दोनों बात कर रहे थे।

कुच्चु – “पुच्चु यार पहले की तरह नहीं करना है, देश के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों को उठाना था तो तुम न्यूज़ साइट्स के भरोसे निर्मल बाबा, राखी सावंत, मीका सिंह, के.आर.के. को उठा लाये थे। फिर सबकी मेमोरी एडजस्ट करनी पड़ी थी, उनके दिमागों में इतना कचरा भरा था हमारे सिस्टम क्रैश होते-होते बचे।”

पुच्चु – “नहीं इस बार आलस नहीं होगा। कॉम्प्रिहेन्सिव विक्ट्री होगी इस बार! जय सोहनी महिवाल।”

कुच्चु – “सोहनी महिवाल? दुनिया का इतिहास कम देख, रोज़ अलग लव स्टोरी पढ़के डिप्रेस हो जाता है। रात में तकिये में मुंह घुसाये मीरा को छोड़ दो राणा जी, उसे कृष्णा में रम जाने दो, ज़हर मत पिलाओ…चिल्लाते हुए सुबक रहा था।”

तभी उनका यान चक्करघिन्नी बन जाता है। दोनों कंट्रोल्स सँभालने की कोशिश करते हैं पर तेज़ी से घूमते दिशाहीन यान में कुच्चु किचन में जा गिरता है और उसका मुँह ओवन में फँस जाता है, वहीं पुच्चु खोपड़े पर लगे आघात के बाद अचेत हो जाता है। सब सामान्य होने के बाद उन्हें अपने यान में एक घायल परग्रही मिलता है।

पुच्चु – “ऐ छी-छी सी शक्ल वाले भईया ! कौन हो तुम?”

परग्रही – “हाँ तेरी शक्ल बड़ी मिस यूनिवर्स वाली है! लोलू सिंह! सुनो मेरे पास ज़्यादा समय नहीं है। बड़ी ऊर्जा लगानी पड़ी तुम्हारे यान के अंदर आने में… “

कुच्चु – “तो कहीं भी घुस आओगे? हम नहीं दे रहे अपना समय उधार। जाओ आगे बढ़ो!”

परग्रही – “ऐसा ज़ोर का घुसंड मारूंगा कि षठकोण जैसे मुँह के आठों कोण पिचक जाएंगे।”

कुच्चु – ” षठकोण….उसमे तो 6 कोण होते हैं ना?”

परग्रही – “टेक्निकेलिटीज़ में ही मर जाना दोनों सरऊ! हमारे ग्रह पर 8 होते हैं। सुनो इस बार टोक मत देना, मर जाओगे। टोही यंत्रों से मुझे तुम दोनों के बारे में सब पता चल गया है। तुम्हारी बकवास भाषा भी यूँ चुटकी में सीख ली। मेरा नाम सोनपपड़ा है, मैं तुमसे कई प्रकाश वर्ष दूर डॉयबिटीज़ ग्रह से उसी काम के लिए आया था जो तुम दोनों कर रहे हो यानी पृथ्वी की रिसर्च फलाना। हम जैसे और भी कुछ परग्रही गुप्त अनुसंधान यान पृथ्वी के आस-पास अदृश्य घूम रहे हैं। मेरे शरीर पर बदला बम बंधा है, अगर फट गया तो यान और तुम दोनों का नामोनिशान नहीं मिलेगा। तुम्हे पृथ्वी पर जाकर मेरा एक बदला लेना होगा…”

पुच्चु – “भक! तुम किसी लाला के ज़ुल्म से पीड़ित हमारी बिछड़ी मम्मी हो जो तुम्हारे बिहाफ पर बदला लें?”

सोनपपड़ा ने एक हल्का ऊर्जा वार किया और पुच्चु के होंठ गलत प्लास्टिक सर्जरी के बाद सूजे होंठ जैसे हो गये।

सोनपपड़ा – “आया मज़ा? या और मस्त माहौल में जीना है?”

कुच्चु – “नहीं…नहीं अंकल जी! हम समझ गये। किस तरह का बदला लेना है आपको? आप घायल कैसे हो गये? लाइए आपके चरणों की चुम्मी ले लूँ…”

सोनपपड़ा खुश होते हुए बोला – “नहीं, इट्स ओके! मेरी परी जैसी गर्लफ्रेंड परिया को कुकिंग का बहुत शौक है। मेरे बर्थडे पर मुझे सरप्राइज़ देने के लिए उसने धरती से कुछ सामान बटोर कर आलू पकोड़े बनाये। मैं तो बाहर का सारा सामान यान के अनुसार चेक करके लाता था पर सरप्राइज के चक्कर में वो आलू उठा लायी। हमारे यान के मेटीरियल में पता नहीं क्या रिएक्शन हुआ और एक तेज़ धमाके में यान तहस-नहस हो गया। विशेष सूट के कारण धमाके की वेव में हम लोग तुरंत नहीं मरे पर घायल अंतरिक्ष में जा गिरे। बेचारी परिया तो पूरी चुड़ैलिया बन गयी, आलू को गाली देती हुई जाने कहाँ भाग गयी। इधर मेरे शरीर के मिनरल जा चुके हैं, मैं अब कुछ देर का मेहमान हूँ। उस से पहले मैंने अपने मन में बदला बम एक्टिवेट कर लिया है।”

पुच्चु – “किस से बदला? पृथ्वी से?”

सोनपपड़ा – “नहीं! आलू से बदला। ये तरल तुम किसी भी आलू की फसल पर डाल आओ। उस आलू के आंतरिक गुण के अनुसार इस तरल का एक चैन रिएक्शन शुरू होगा, जिसकी किरणों से धरती के सारे आलू लुप्त हो जायेंगे, चाहे उनके खेत एक-दूसरे से हज़ारो किलोमीटर्स दूर ही क्यों ना हों।”

कुच्चु – “…पर आलू जैसी महत्वपूर्ण फसल लुप्त होने से तो धरती का पारितंत्र (इकोसिस्टम) बिगड़ जायेगा? इस से तो पृथ्वी की कई प्रजातियों पर बुरा असर पड़ेगा, कुछ तो शायद लुप्त जाएं। पृथ्वी पर त्राहि-त्राहि मच जायेगी।”

सोनपपड़ा – “ये ब्रैकेट में इकोसिस्टम बताने की ज़रुरत नहीं थी, मुझे भी पता है पारितंत्र का मतलब और प्रजातियां लुप्त हों या चपातियां मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। बदला इज़ बदला! अगर नहीं माने तो बम फोड़ दूँगा। दोनों में से कोई एक जाओ यह तरल लेकर, अगर तुम्हारे आने से पहले मैं मर गया तो भी बम फूट जाएगा और ऑबवियस्ली तुम्हारा साथी, यान स्पेस डस्ट बन जायेंगे। जब तक तुम मुझे नष्ट हुए आलू के सैंपल नहीं लाकर दिखाते तब तक मुझे चैन नहीं मिलेगा। मेरे मन की तसल्ली ही इस बम को डिफ्यूज कर सकती है।”

पुच्चु और कुच्चु धर्मसंकट में फँस गये। यह एक काम करने से उनके कई आगामी मिशन बर्बाद हो सकते थे। दोनों मन ही मन अपने आलस्य को कोस रहे थे कि अगर मेहनत से काम किया होता तो अबतक कितने मिशन, अनुसंधान आदि पूरे हो चुके होते। टिक टिक गुज़रते समय के बीच, दिल पर पत्थर रखकर और पुच्चु को पुच्ची देकर कुच्चु पृथ्वी की ओर कूच कर गया। जल्द ही वह आधे गुलगुले, आधे राख हो चुके आलू के सैंपल लाया, जिन्हे वह एक भारतीय खेत में तरल डालने के बाद लाया था। नष्ट हुए आलू को देखकर सोनपपड़ा के दिल को करार आया और वह परिया को याद करते हुए हमेशा की निन्नी सो गया।

पुच्चु – “माफ़ करना भाई! मेरी जान बचाने के लिए तुम्हे आलू ख़त्म करने पड़े। श्री अक्षय कुमार जी की कोट ख़राब कर दी कि जब तक रहेगा समोसे में आलू… “

कुच्चु – “अबे रिलैक्स! कुछ नहीं हुआ। इसकी आड़ में हमारा एक मिशन और पूरा हो गया। इस सोहनहलवे का दिया तरल मैं एक भारतीय प्रयोगशाला के खेत में डाल कर आया हूँ। वहाँ जेनेटिकली मॉडिफाइड आलू (आनुवांशिक रूप से रूपांतरित फसल) उग रहे थे। उस खेत में एक लुप्तप्राय बैक्टीरिया और आलू के अंश से बड़े आलू उगाने पर टेस्ट चल रहा था। अब उस तरल से निकली किरणों से सिर्फ उस खेत और 2-3 जगह उस जैसे आंतरिक गुण लिए मॉडिफाइड आलू ही लुप्त हुए बाकी सारी पृथ्वी के आलू बच गए क्योकि सिर्फ उस खेत के आलूओं के गुणों के अनुसार बनी तरल की घातक किरणे बाकी आलू की फसल को पकड़ ही नहीं पाई।”

पुच्चु – “वाह भाई! आज तूने मेरी जान, हमारे भौजीकसम ग्रह की लाज और पृथ्वी बचा ली। आज से दोनों टाइम का खाना मैं बनाऊँगा…
…एक हफ्ते तक।”

समाप्त!
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तेज़ाबी आँखें (कहानी) #ज़हन

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**Warning: Contains Strong Language**

पिछले कुछ समय से सीतापुर स्थित एक स्वयंसेवी संस्था के संचालक अनिक कृष्णन देश और दुनिया की सुर्ख़ियों में छाये थे। एकतरफा प्यार और खुन्दक की वजह से हुए एसिड अटैक के बाद अपनी सूरत की रौनक खो चुकी लड़की रिद्धिमा की सीरत पर अनिक मोहित हो चुके थे। प्रेम परवान चढ़ने पर अनिक ने समाज से दुत्कारी गयी रिद्धिमा को अपने घर और मन में आसरा दिया। अब यह जोड़ा लिव-इन सम्बन्ध में साथ खुश था। किसी स्थानीय पत्रिका द्वारा खबर पकडे जाने पर जैसे गंध लेते हुए अनिक के पास मीडिया का जमावड़ा लगने लगा। हर किसी को अनिक से एक्सक्लूसिव बाईट चाहिए थी, सभी को उसके मन में झांकना था कि दुनिया के घूमने की उलटी दिशा में घूमना कैसा होता है। ऐसे ही एक विदेशी न्यूज़ चैनल के इंटरव्यू में सहजता से अनिक ने अपनी बात का समापन किया…

“…हम सब बाहरी आवरण के पीछे पागल हुए बैठे हैं जबकि आपका, मेरा और सबका जीवन तो अंदरूनी व्यक्तित्व पर टिका है। लोग पूछते हैं कि रिद्धिमा ही क्यों? उसमे ऐसा क्या ख़ास है? अरे झाँकने की हिम्मत तो करो…उस शरीर के 5-7 प्रतिशत जले-खुरदुरे हिस्से की परत के अलावा उसमे पूरी दुनिया समायी है। मेरे लिए रिद्धिमा दुनिया की सबसे सुन्दर लड़की है। जिसे उसकी ‘कमी’ जितनी बड़ी लगती है, उसके अंदर उतना ही ज़्यादा खोखलापन है।”

झंकझोर देने वाले शब्दों के बाद इंटरव्यू ले रहे अनुभवी एंकर के भी हाथ कांपने लगे और कमरे में उपस्थित सभी लोगो के रोंगटे खड़े हो गये। अनिक को तसल्ली हुई कि यह इंटरव्यू भी अच्छा निकला और उसकी बात प्रभावी ढंग से अधिक लोगो तक पहुँचेगी।

घर आकर वह एक महिला के साथ बैठकर बातें करने लगा। रिद्धिमा उन दोनों के लिए खाना लेकर आयी और नज़रे बचा कर कमरे से चली गयी। कुछ देर बाद अनिक ने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया। बंद कमरे में क्या होता था रिद्धिमा को पता था पर उसे दुनिया से अपना चेहरा और अनिक से अपनी नज़रे छुपाने की आदत पड़ चुकी थी। उसके सूट की चुन्नियों पर नाखूनों के कुरेदने से कितने ही पैटर्न बन गये थे। वैसे तो रोज़ का दर्द इतनी टीस नहीं देता पर आज रिद्धिमा के आँसू झर-झर बह रहे थे। 2 साल पहले आज ही के दिन वो अपने ‘सच्चे प्यार’ से मिली थी, बातें करते हुए बीच-बीच अनिक की भूरी आँखों पर जब पलकों का पर्दा गिरता तो आँखों में न झाँक पाने का मिलीसेकंड का ब्रेक भी रिद्धिमा को परेशान करता रहता। तब अनिक की गहरी आवाज़ और चेहरे में खोई रिद्धिमा अपने चेहरे का पर्दा भूल जाती थी। केवल एक वो ही तो था जो जला चेहरा देखकर अपने चेहरे पर दया, घृणा या परेशानी के भाव नहीं लाता था। अब साथ रहकर बाहरी और अंदरूनी का फर्क वो साफ़ देख सकती थी। कहना, सोचना आसान था कि यह नर्क छोड़ क्यों नहीं देती, पर अब उसमे और संघर्ष की शक्ति नहीं थी। अनाथालय से सामाजिक केंद्र में मौत के इंतज़ार से बेहतर झूठे ही सही अपने प्यार के काम आना। रिद्धिमा के कारण अनिक को देश-दुनिया में शोहरत ही नहीं बल्कि उसकी संस्था को सरकार, विदेशी संस्थाओं द्वारा आर्थिक मदद भी मिल रही थी। हालाँकि, संस्था को मिल रहे पैसे, मदद का अधिकांश हिस्सा अनिक अपने दोस्तों-रिश्तेदारों और अपने शौक पूरे करने में बहा दिया करता था। अक्सर उसे किसी सेमिनार, इवेंट में अथिति के रूप में बुलाया जाता जहाँ ना चाहते हुए भी उसे रिद्धिमा को अपने साथ ले जाना पड़ता। बाहर कहीं भी लोगो से घिरे होने पर अनिक की भूरी आँखों में अपनेआप दिखावटी भोलापन आ जाता था और उनमे फिर से डूबकर रिद्धिमा खुद पर मुस्कुरा देती। अनिक को प्यार से निहारती रिद्धिमा के अनेक फोटो दुनियाभर का दिल पिघला रहे थे।

रिद्धिमा की कोशिश रहती थी कि अनिक से बचकर वह कुछ पैसे, कपडे आदि ज़रूरतमंद लोगो को दे दिया करे ताकि उसकी वजह से कुछ लोगो को तो राहत मिले। जीते रहने का और आयोजनों में अनिक के साथ चहकते हुए फोटो खिंचवाने की यह एक बड़ी वजह थी। एक दिन रिद्धिमा को पैसे उठाते हुए अनिक ने पकड़ लिया और वो बुरी तरह उसकी पिटाई करने लगा।

“साली…हरामण शक तो मुझे पहले से था तुझपर आज पकड़ भी लिया। किस चीज़ की कमी है तुझे जो चोरी करती है? तेरे शौक पूरे नहीं होते? यार पाल लिए है तूने? बोल कुत्तिया किस अंधे के साथ रंगरलियां मना रही है? तेरा भी मन करता होगा ना मुझे देख कर? कहाँ जाती है पैसे लेकर, किसको देकर अपनी आग बुझाती है? शक्ल देख अपनी और तसल्ली ना मिले तो किसी छोटे बच्चे को अपना चेहरा दिखा आइयो, डर के मारे वहीं मूत देगा। थू साली हराम की औलाद! मेरे टुकड़ो पर जी रही है ये काफी नहीं है क्या! अभी किसी इवेंट जाने को बोलूंगा तो तबियत ख़राब हो जाती है कमीनी की। पैसा कितने हक़ से उठाती है…जी में आता है तेरा चुड़ैल सा मुँह नोच डालूं! रुक आज तेरी चमड़ी उधेड़ता हूँ।”

लाखों में इक्का-दुक्का कोई रिद्धिमा की तरह होता है जिसे भगवान दर्द सहने के असीम क्षमता देता है। दर्द महसूस ना करना या किसी योगी की तरह अपने ध्यान में दर्द से ध्यान हटा लेना। बेल्ट, चप्पल, हाथ-पैर खाती खूनमखून रिद्धिमा की सिसकियाँ बस सांस लेने का संघर्ष थी, उसे दर्द कहाँ हो रहा था! इतनी हिम्मत कहाँ थी दर्द में? जैसे सात जन्म की पीड़ा इन 5-7 वर्षों में सिमट गयी हो। वो आखरी बार तेज़ाब से जले अपने चेहरे के मवाद में बिलबिलाते कीड़ों को देखकर चीखी थी। उसके बाद तो बस किसी फ़िल्मी दर्शक की तरह वह अपनी कहानी जी और देख रही थी। इतना सब हो जाने के बाद भी वह समझ नहीं पाती थी कि लोग इतने बुरे कैसे हो सकते हैं?

तीन दिन बाद दिल्ली में आयोजित सेमिनार जब पत्रकारों के उसकी चोटों का कारण पूछा तो वह बोली – “अपनी लापरवाही में मेरी स्कूटी का एक्सीडेंट हो गया, वो तो वक़्त रहते अनिक ने मुझे बचा लिया। चेहरे के दूसरे हिस्से पर पड़े निशानों की वजह से उन्होंने 3 दिन से ठीक से खाना भी नहीं खाया है।”

स्क्रिप्ट पूरी करने के लिए रिद्धिमा अलग खड़ी हो गयी और अनिक मीडिया के सामने अपनी फिलॉसफी की बीन बजाने लगा। इधर आदत से मजबूर रिद्धिमा अनिक की आँखों में खोकर मुस्कुराने लगी…तेज़ाब फेंकती, झूठी लेकिन भूरी आँखें!

समाप्त!
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मरणोपरांत आशीर्वाद (कहानी) #ज़हन

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पत्नी के देहांत के बाद रविन्दु सामंत गहरे अवसाद में चले गए थे। उनकी दिनचर्या अपने कमरे तक सीमित हो गयी थी। वहीं उनके तीन बच्चो की अब और इंतज़ार करने की इच्छा नहीं थी। एक शांत दिन उनके 3 बच्चो ने उन्हें बेहोशी की दवा सुंघा कर बेहोश किया और फिर पंखे से टांग कर उन्हें मार दिया गया, कुछ इस तरह कि पत्नी की मौत के शोक में उनकी मौत एक आत्महत्या लगे। उनकी लिखाई से मिलता-जुलता नोट रखने जा रहा उनका छोटा बेटा राजदीप कुछ देखकर ठिठक गया। पुलिस के सामने दी जाने वाली अपनी कहानी का रिहर्सल कर रहे उसके बड़े भाई-बहन ने कारण पूछा तो जवाब आया – “यहाँ तो पहले से एक नोट पड़ा है!”

“नोट है या ऐसे ही कोई रसीद-वसीद?”

राजदीप – “नोट ही है, लिखा है वो हम पर बोझ नहीं बनना चाहते थे और संपत्ति हम तीनो में बाँटकर आज रात पापा हमेशा के लिए ऋषिकेश के एक आश्रम जाने वाले थे।”

3-4 क्षण अवाक रहने के बाद तीनो बिना नज़रे मिलाये फिर अपने काम में लग गए। कुछ समय बाद पुलिस औपचारिकता निभा कर चली गई। एक हफ्ता बीतने के बाद रविन्दु सामंत के इंश्योरेंस एजेंट की शिकायत पर पुलिस का जांच दल दोबारा उनके घर आया। बीमा एजेंट के अनुसार रविन्दु सामंत के सुसाइड नोट की लिखावट उनकी राइटिंग से पूरी तरह नहीं मिलती थी। पुलिस टीम द्वारा जांच के लिए कुछ सामग्री जप्त की गयी और थोड़े दिन के बाद नतीजे की पुष्टि की बात हुई। तीनों भाई-बहन के चेहरे सफ़ेद पड़ गए और उन्हें जेल दिखने लगा। उन्हें यकीन था कि पुलिस के विशेषज्ञ लिखावट में अंतर पकड़ लेंगे। 5 दिनों बाद उन्हें सभी पत्र और जांच के लिए जप्त की गयी सामग्री वापस कर दी गयी। राजदीप अचंभित था कि आखिर कैसे दोनों लिखावट मिल गयीं और वो लोग बच गए? वह सारे पत्र देखने लगा और एक कागज़ देखकर उसे सांप सूँघ गया।  भाई ने कहा “चलो जान बची, पर तू सिर पकडे क्यों कांप रहा है? ठण्ड रख! अब कोई नहीं आ रहा हमें पकड़ने।”

राजदीप – “सुसाइड नोट की राइटिंग तो मैच हो गयी पापा की लिखावट से पर यह सुसाइड नोट वो नहीं जो मैंने लिखा था… “

समाप्त!

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