Kids magazine #update

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Hey everyone! 😀 I have recently started working as a voice-over artist and author (different age groups) for bilingual kids magazine Neev. नींव बाल पत्रिका के विभिन्न आयु वर्गों के लिए वॉइस-ओवर (ऑडियो) और लेखन शुरू किया।

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…also Co-judged Kalamkaar 2017 Contest (RD Magazine)#neev #mohitness #voicetalent #update #mohit_trendster

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“काश मैं अमिताभ बच्चन का अंतर्मन होता…” (हास्य)

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मैंने एक कहानी लिखी और मेरा अपने अंतर्मन से वार्तालाप शुरू हो गया।

अंतर्मन – “छी! क्या है ये?”

मोहित – “कहानी है और क्या है?”

अंतर्मन – “ये सवाल जैसे जवाब देकर मेरा पैटर्न मत बिगाड़ा करों! 4/10 है ये…इस से तुम्हारा नाम जुड़ा हुआ है। पढ़ के लोग क्या कहेंगे?”

मोहित – “ठीक है, मैं कुछ चेंज करता हूँ।”

बार-बार बदलाव के बाद भी अंतर्मन पर कुछ ख़ास अंतर नहीं पड़ा…

अंतर्मन – “किसी सिद्ध मुनि का घुटना पड़ना चाहिए तुम्हारे खोपड़े पर तभी कुछ उम्मीद बनेगी। 4.75/10 हुआ अब!”

मोहित – “ये दशमलव की खेती का लाइसेंस कहाँ मिलता है? कहानी में सात बार बदलाव कर चुका हूँ। अब और शक्ति नहीं है।”

अंतर्मन – “हाँ तो मुझे क्यों बता रहे हो? कैप्सूल लो…जिसका एड पढ़ने में मज़ा आता है।”

मोहित – “मैं यही फाइनल कर रहा हूँ!”

अंतर्मन – “अरे यार तुम तो बिना बात गुस्सा हो जाते हो…रिलैक्स, अपना ही मन समझो! हमारा एक समझौता हुआ था। याद है? मैंने कहा था कि अगर मुझे कोई रचनात्मक काम 6/10 से नीचे लगेगा तो वो फाइनल नहीं होगा। तुमने लंबे समय तक माना भी वो नियम तो अब क्या दिक्कत है?”

मोहित – “इतनी टफ रेटिंग कौन करता है?”

अंतर्मन – “तेरे भले के लिए ही करता हूँ। तेरे नाम से जुड़े काम अच्छे लगें।”

मोहित – “भक! इस चक्कर में कितने आईडिया मारने पड़े मुझे पता है? आज से कोई नियम-समझौता नहीं!”

अंतर्मन – “काश मैं अमिताभ बच्चन का अंतर्मन होता।”

मोहित – “फिर पूरी ज़िन्दगी में 4 फिल्में करते अमिताभ साहब। इतना सर्व चूज़ी अंतर्मन लेके फँस जाते…कच्छों के डिज़ाइन तक में उलझ जाता है और बात अमित जी की करता है!”

अंतर्मन – “मतलब ये कहानी फाइनल है?”

मोहित – “हाँ! हाँ! हाँ!”

अंतर्मन – “एक मिनट, बाहर की शादी के शोर में सुना नहीं मैंने। ये ‘हा हा हा’ किया या तीन बार हाँ बोला?”

गुस्से में मोहित के जबड़े भींच गये।

अंतर्मन – “अच्छा सुनो ना…”

मोहित – “हम्म?”

अंतर्मन – “6/10 हो सकता है। अंत में एक कविता जोड़ दो तो उसके ग्रेस मार्क्स मिलेंगे।”

मोहित – “इस कहानी के साथ काव्य का मतलब नहीं बनता और…”

अंतर्मन – “प्लीज ना जानू!”

मोहित – “अच्छा बाबा ठीक है। जाओ बाहर जाके खेलो और ज़्यादा दूर मत जाना।”

समाप्त!
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Art – Ester Conceiçao‎
#ज़हन

Jasoos Saas (Hasya Kahani)

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लक्ष्मी कुमारी स्वेटर बुनने से तेज़ गति से अपनी बहु पर विचार बुन रही थीं।  वैसे उनकी बहु शताक्षी ठीक थी….बल्कि जैसी कुलक्षणी, कलमुँही बहुएं टीवी और अख़बारों में दिखती हैं उनके सामने तो शताक्षी ठीक होने की पराकाष्ठा ही समझो। फिर भी लक्ष्मी को एक बात परेशान करती थी। केवल उन्हें ही नहीं, कॉलोनी की कुछ और सास भी इस मुद्दे पर चिंतित थीं। कई घरों की 25 से लेकर 40 साल की महिलाएं आपस में अक्सर झुंड में घंटों पता नहीं क्या बतियाती रहती थीं। बाहर से लगता कि मानो चुगलियों की कितने पहाड़ चढ़ रही हैं। बड़ा और सभी कोण से ढका घर होने के कारण अक्सर दर्जन भर स्त्रियां शताक्षी के घर पर डेरा जमाती।

मोहल्ले की सासों से जब रहा नहीं गया और उनकी मिसमिसी का रौला-रप्पा हो गया तो सबने पैसे मिलाकर अच्छी क्वालिटी के माइक्रोफोन और कैमरे लक्ष्मी कुमारी के आँगन में लगवाये, जहाँ बहुओं की चुगलियों का गोरख धंधा चलता था। दो दिन बाद वीकेंड को बहुओं की मैराथन बैठक हुई। अगले दिन सत्संग का बहाना बनाकर वृद्ध जेम्स बांडनियाँ गुप्त अड्डे पर मिलीं। कॉलोनी की सासें अपनी साँसें थाम कर बहुओं की मीटिंग की फुटेज देखना शुरू करती हैं।

“दीदी, कल छुटकी की वजह से छोटा भीम हार गया। मैं तो दूध उबलने रखने जा रही थी कि मीनू ने बताया कि कालिया को जीत कर टाइटल मिल गया। इतनी झुंझलाहट हुई कि मैं कच्चा दूध ही पी गयी और मीनू की अभ्यास पुस्तिका फाड़ी सो अलग…”

“हाँ! इस वजह से कल पूरा दिन मेरा भी मूड ऑफ रहा। ऑफिस से लौटे पीकू के पापा पुच्ची करने को बढे तो ऐसी कोहनी मारी मैंने…नील पड़ गया उनके होंठों पर। हुँह! भला कालिया को जिताना कोई बात हुई?”

छोटा भीम पर गंभीर चर्चा के बीच शिवा कार्टून सीरीज की फैन शताक्षी बोली।

“…पेड़ाराम ने अपनी पड़ोसन के चक्कर में शिवा का फूफा जो किडनैप करवाया उस से मेरा दिल बैठ गया सच्ची। अरे! आपने सुना…शक्तिमान को दोबारा शुरू कर रहे हैं।”

उसके बाद मोटू पतलू, माइटी राजू, गली गली सिम सिम, डोरेमॉन, शिनचैन पर शिद्दत से चर्चा हुई। इतना ही नहीं बीच-बीच में महिलाओं ने कार्टून सीरियल्स के मंगल गीत…टाइटल सांग भी गुनगुनाये। गृहणियों को जब फुर्सत मिलती थी तब टीवी के सामने बच्चे होते, जो कोई और चैनल चलने ही नहीं देते थे। कोई विकल्प ना होने के कारण थोड़े समय बाद कार्टून्स, एनिमेशन में बच्चों की तरह महिलाओं को भी मौज आने लगी और देखते ही देखते यह कार्टून क्रान्ति महिला मोर्चा बन गया।

बहुओं की बुराई और गप्पों के लिए ब्रेड रोल, पकोड़े तल कर लायी एक सास निराशा में बोली।

“भक…”

ये केवल एक ‘भक’ नहीं बल्कि ‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया’ वाली हार की स्वीकृति थी। गुप्त फुटेज देख रही सास मंडली के सारे अंदेशों का मुरब्बा बन चुका था। धूलधूसरित पहलवान की तरह सब अपने कार्टूनी सत्संग से घर लौट आयीं।

समाप्त! भक!
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Art – Sebastien K.
#ज़हन

Horror-Educational Genre Mix: Samaj Levak (Freelance Talents)

00 (1)New experimental genre mix, समाज लेवक (Samaj Levak) – Social Leech (Educational-Horror Comic)

Illustrators: Anand Singh, Prakash Bhalavi (Bhagwant Bhalla), Author: Mohit Trendster, Colorist: Harendra Saini, Letterer: Youdhveer Singh

https://goo.gl/uqV8FV

https://goo.gl/2AuveV

https://goo.gl/euqPFu

https://goo.gl/VdrXy1

http://freelea.se/mohit-trendster/samaj-levak-horror-comic 

creditsAlso Available: Google Play, Google Books, Readwhere, Magzter, Dailyhunt, Ebook360 and other leading websites, mobile apps.

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प्रतिक्रियाओं पर प्रतिक्रिया (हर कलाकार के लिए लेख) #ज़हन

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हर प्रकार के रचनात्मक कार्य, कला को देखने वाले व्यक्ति की प्रतिक्रिया अलग होती है। यह प्रतिक्रिया उस व्यक्ति की पसंद, माहौल, लालन-पालन जैसी बातों पर निर्भर करती है। आम जनता हर रचनात्मक काम को 3 श्रेणियों में रखती है – अच्छा, ठीक-ठाक और बेकार। हाँ, कभी-कभार कोई काम “बहुत बढ़िया / ज़बरदस्त” हो जाता है और कोई काम “क्या सोच कर बना दिया? / महाबकवास” हो जाता है। रचनाकार को अधिकतर ऐसे ही रिव्यू मिलते हैं।

इन रिव्यू से केवल ये पता लगाया जा सकता है कि फलाना श्रेणी का काम फलाना तरह के लोगों को पसंद या नापसंद आता है। उदाहरण – किसी निरक्षर व्यक्ति को गूढ़ वैज्ञानिक कमेंट्री वाला रोचक प्रोग्राम भी बेकार लगेगा या एक ख़ास अंदाज़ की कॉमेडी की आदत वाले दर्शकों को उस से अलग प्रयोगात्मक हास्य बेवकूफी लगेगा। कलाकार को ऐसे मत को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। अगर आप व्यावसायिक काम कर रहें हैं तो अपने दर्शकों-श्रोताओं-पाठकों की पसंद समझने में ये डेटा काम आ सकता है। प्रयोग करते रहना और सही प्रतिक्रियाओं के अनुसार काम का अवलोकन करना महत्वपूर्ण है। आम फीडबैक के बीच-बीच में कलाकार के लिए खज़ाना यानी कंस्ट्रक्टिव रिव्यू छुपे होते हैं। ऐसी प्रतिक्रियाओं-समीक्षाओं को पहचानना आसान काम है। ये रिव्यू कुछ बड़े होते हैं और इनमें आम जेनेरिक मत से अलग बातें लिखी होती हैं। (यहाँ अक्सर किसी वेबसाइट की सामग्री (कंटेंट) बनाने की खानापूर्ति वाले या पेड रिव्यू की बात नहीं हो रही है।) उन बातों का अवलोकन कर कलाकार जान सकता है कि जो समूह उसकी कला समझ रहे हैं, उन्हें कला में क्या कमी, संभावनाएं दिख रही हैं जो कलाकार की नज़रों से बच गयीं।

आमतौर पर प्रयोग को काफी नकारात्मक प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ता है। इसमें निराश होने वाली कोई बात नहीं है क्योकि प्रयोगों से ही हमें पता चलता है कि जितना ज्ञात संसार है उसके आगे क्या और कैसे किया जा सकता है। साथ ही निरंतर प्रयोग से कलाकार को अपनी खूबियों और कमियों का पता चलता है। अगली बार प्यार-मोहब्बत फीलगुड़, सास-बहु, लाइट एंटरटेनमेंट (इन श्रेणियों में भी कोई बुराई नहीं) की आदत वाली आम जनता को अगर उनकी आदत के अलावा कुछ परोसें तो सीमित अपेक्षा ही रखें। स्वयं से मुग्ध हुए बिना अपना अवलोकन करें, अगर आप ऐसा कर पाते हैं तो अपने सबसे सहायक समीक्षक आप खुद बन जाएंगे।

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Read Ishq Baklol Novel Short Review

सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा? (वीभत्स रस Poetry)

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अपने रचे पागलपन की दौड़ में परेशान समाज की कुत्सित मानसिकता “अच्छा-अच्छा मेरा, छी-छी बाकी दुनिया का” पर चोट करती ‘वीभत्स रस’ में लिखी नज़्म-काव्य। यह नज़्म आगामी कॉमिक ‘समाज लेवक’ में शामिल की है। –

सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?
सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?
बिजबिजाते कीड़ों को सहेगा,
कभी अपनी बुलंद तारीख़ों पर हँसेगा,
कभी खुद को खा रही ज़मीं पर ताने कसेगा।

जब सब मुझे छोड़ गये,
साथ सिर्फ कीड़े रह गये,
सड़ती शख्सियत को पचाते,
मेरी मौत में अपनी ज़िन्दगी घोल गये।

आज जिनसे मुँह चुराते हो,
कल वो तुम्हारा मुखौटा खायेंगे,
इस अकड़ का क्या मोल रहेगा?
सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?

लोथड़ों से बात करना सीख लो,
बंद कमरों में दिल की तसल्ली तक चीख लो!
सड़ता हुआ मांस सुन लेगा,
अगली दफ़ा तुम्हे चुन लेगा।

जिसे दिखाने का वायदा किया था हमसे,
वो गाँव तो हमारी लाश पर भी ना बसेगा।
खाल की परत फाड़ जब विषधर डसेगा,
सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?

जिसपर फिसले वो किसी का रक्त,
नाली में पैदा ही क्यों होते हैं ये कम्बख्त?
बाकी तो सब राम नाम सत!
उसपर मत रो…
सुर्ख़ से काला पड़ गया जो,
ये जहां तो ऐसा ही रहेगा,
सड़ता हुआ मांस कुछ नहीं कहेगा!
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#ज़हन

ख़बरों की ऊपरी सतह

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एक नामी कलाकार हैं जिनका नाम नहीं लूँगा, जिनका नाम उनके काम से ना होकर उनकी मार्केटिंग और ब्रांडिंग से हुआ है। थोड़े वर्ष पूर्व अपने क्षेत्र में उन्होंने कुछ व्यंगात्मक काम किये जो देश की व्यवस्था, सरकार पर कटाक्ष थे। ये काम काफी जेनेरिक नेचर के थे यानी आज़ादी के बाद से हर रोज़ देश भर में ऐसे कई व्यंग बनते हैं, चलते हैं, प्रकाशित होते हैं…पर पता नहीं कैसे उनकी ‘कला’ पर किसी की नज़र पड़ी और उन्हें गिरफ्तार कर कुछ दिनों के लिए जेल भेज दिया गया। छोटी बात पर ना किसी का ध्यान जाता है और ना आसानी से गिरफ्तारी होती है। हाँ, अगर किसी को स्टंट करके करोड़ों की भीड़ (जिनमें हज़ारों ऐसे भी हैं जो वैसी कला बल्कि बेहतर कला दशकों से कर रहें है) से बिना 20-25 वर्ष की मेहनत एक झटके में ऊपर आना है…तो अलग बात है। गिरफ्तारी हुई और उसके फोटो फैले बाकायदा ऐसे जैसे फोटोशूट चल रहा हो। छोटी बात की कुछ दिनों की सजा काट साहब बाहर आये और तब तक ये ख़बर अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया पकड़ चुका था। वहाँ के लोगों ने बिना दिमाग पर ज़ोर डाले इस बात को ‘तीसरी दुनिया’ के देशों की बर्बरता की श्रेणी में रख दिया और ये कलाकार स्टार बन गया। टीवी, रेडियो पर आने लगा। अच्छी बात है, अगर प्रतिभा नहीं है तो स्टंट के दम पर कुछ समय के लिए ही सुर्ख़ियों में रहा जा सकता है। जो अच्छी बात नहीं हैं वो इसके बाद की है। बात ठंडी होने के बाद इन्होने समाज सुधारक का तमगा ले लिया और उसके आधार पर इनसे जुडी संस्थाओं को फंड मिलने लगे, ऐसी जगहों, आयोजनों पर ये “वक्ता” बन जाने लगे जहाँ विशेषज्ञ भी सोच में पड़ जाये।

पहली आपत्ति – आम विचारों को स्टंट की आड़ में छुपाकर दार्शनिक बनना।

दूसरी आपत्ति – दशमलव हुनर लेकर 95-100 प्रतिशत स्तर पर मौजूद कलाकारों की जगह वाली इज़्जत पाना।

तीसरी आपत्ति – एक स्टंट के बल पर जीवन भर मुफ्त की खाना।

चौथी आपत्ति – बाद में पैसे के दम पर ‘ऑन रिकॉर्ड’ काम के मामले में जाने कितने पहाड़ उखाड़ने वाले की तरह पहचाने जाना।

पांचवी आपत्ति – इस सफलता के बाद बहुत से लोग इस तरह के शॉर्टकट लेने को प्रेरित होंगे।

किसी विषय पर मन बनाने से पहले ख़बरों की ऊपरी सतह को हटाकर ज़रूर देखें।

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प्रकृति और मानव की एक कहानी पर कॉमिक…

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New Comic: Pagli Prakriti – पगली प्रकृति (Vacuumed Sanctity), Hindi – 15 Pages. English version coming soon.

Readwhere – https://goo.gl/r3snfZ

Google Play – https://goo.gl/Drp1Bs

Issuu – https://goo.gl/e7H8Hq

Nazariya Now – http://www.nazariyanow.com/2017/11/Vacuumed-Sanctity.html

Comics Our Passion – http://www.comicsourpassion.com/2017/11/vacuumed-sanctity.html

Also available: Dailyhunt App, Google Books, Slideshare, Scribd, Ebooks360 etc.Team – Abhilash Panda, Mohit Trendster, Shahab Khan, Amit Albert

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01 Cover (2)

नादान मानव की छोटी चालों पर भारी पड़ती प्रकृति की ज़रा सी करवट की कहानी…

Hindi Quotes #mohit_trendster

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*) – अपने अनुभव, प्रतिभा और जो भी जीवन में अर्जित किया उसका मोल समझें पर आत्ममुग्धता से बचें। सामने वाले व्यक्ति को परसों पैदा हुआ ना मानें।

*) – निष्पक्ष होना दुनिया की सबसे कठिन कला है।

*) – किसी की सहनशीलता को उसकी कमज़ोरी मत समझें। इलास्टिक को इतना खींचने की आदत ना डालें कि वो ऐसी घड़ी में टूटे जब आपको उसकी सबसे ज़्यादा ज़रुरत हो।

*) – इतिहास कभी एक नहीं होता। इतिहास नदी की धाराओं सा इधर-उधर बह जाता है और लोग अपनी विचारधारा के हिसाब से उन धाराओं को पकड़ कर अपना-अपना इतिहास चुन लेते हैं। जो मानना है मानो पर मानने से पहले सारी धाराओं का पानी ज़रूर पीकर देखना….जिस पानी की आदत नहीं उसे पीकर शायद तबियत बिगड़ जाए पर दिमाग सही हो जाएगा।

*) – सुरक्षित राह पर जीवन को तीन से पौने चार बनाने में बाल सफ़ेद हो जाते हैं और कोई दांव लगाकर तीन से तेईस हो जाता है। अब पौने चार से शून्य दूर होता है या तेईस?

*) – सही, सकारात्मक और बिना किसी विचारधारा के प्रभाव में आकर किये गए सामाजिक अनुकूलन से समाज की अनेकों कुरीतियों से छुटकारा पाया जा सकता है।

*) – अक्सर भूल जाने लायक छोटी जीतों के गुमान में लोग याद रखने लायक बड़ी बाज़ी हार जाते हैं।

*) – कला के क्षेत्र में केवल यह सोचकर खुद को रोक लेना सही नहीं कि ऐसा पहले हो चुका होगा। शायद हो चुका हो….पर आपके नज़रिये और अंदाज़ से तो नहीं हुआ ना!

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काव्य कॉमिक्स – मतलबी मेला (फ्रीलैंस टैलेंट्स)

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New poetry Comic “Matlabi Mela” published, based on my 2007 poem of the same name.
*Bonus* Added an extra poem “खाना ठंडा हो रहा है…” in the end.
Language: Hindi, Pages: 22
Illustration – Anuj Kumar
Poetry & Script – Mohit Trendster
Coloring & Calligraphy – Shahab Khan

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Available (Online read or download):
ISSUU, Freelease, Slideshare, Ebook Home, Archives, Readwhere, Scribd, Author Stream, Fliiby, Google Books, Play store, Daily Hunt, Smashwords, Pothi and Ebook Library etc.

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