Anik Planet Magazine (Feb 2017) Update

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…Wrote an article “Pyaar se Parhez” (Superheroes and their complicated love life) for Anik Planet #04 (February 2017 Issue), Publisher: Comics Our Passion Community

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अन-बेवकूफ (संवाद कहानी) – मोहित शर्मा ज़हन

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Mr. A – एक बात काफी सुनता हूँ मैं….”आज का यूथ जागरूक है, बेवकूफ नहीं है!”
मतलब कल या पहले के यूथ – तुम्हारे माँ-बाप-दादे बेवकूफ थे? जितने साधन उनके पास थे उस हिसाब से बहुत सही थे। शायद गूगल-इंटरनेट के सहारे टिके “यूथ” से कहीं बेहतर…

Miss B – …लेकिन गलतियां तो हुई हैं पहले लोगो से?

Mr. A – किसी पीढ़ी का आंकलन उस समय की परिस्थितियों को संज्ञान में लिए बिना नहीं करना चाहिए। एक जार में किसी तरह की अशुद्धियां डालिए और उस जार को हिलाइए, ऐसा होने पर बड़ी मात्रा में अशुद्धियां वापस तल पर जमने में समय लेंगी, जैसे आज़ादी और विभाजन के बाद भारतीय लोगो को नई स्थिति में जमने में सालों लग गए। साथ ही उस वक़्त अकाल, सूखा और अनाज की कमी के कारण लोग जीने के लिए आवश्यक मूलभूत बातों के लिए जूझ रहे थे। इसी दौरान भारत को तीन बड़े युद्धों को झेलना पड़ा, इन सबके बीच आम लोगो को आधारभूत (रोटी-कपड़ा-सर पर छत) सीढ़ी को चढ़ने में कुछ दशक लगे, जिसके चलते लोग अन्य मुद्दों तक जा नहीं पाए। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि अविकसित क्षेत्र में अगर कोई शक्ति पा जाए तो उसे हटाने में समय लगता ही है, जो लोग पहले गलत बातों का विरोध करते थे उनके पास आर्थिक, सामाजिक और जन-जन तक अपनी बात ले जाने का कोई सहारा नहीं होता था। वैसी स्थिति अगर आज के दौर में होती तो मुझे नहीं लगता आज की पीढ़ी कुछ बेहतर कर पाती।

Miss B – एक बात मैं भी जोड़ना चाहती हूँ, यह सुपिरियोरीटी कॉम्प्लेक्स भावना लगभग हर पीढ़ी में होती है…तो माफ की जा सकती है। धीरे-धीरे कई सामान्य लोगों में अपने आप दूसरों और उनकी स्थिति समझने की और तुलना ना करने की अक्ल आ जाती है।

समाप्त!

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Bageshwari # 11 (May – June 2016)

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Namastey! Bageshwari # 11 (May-June 2016), Story Published – “Udaar Prayog”

#Bageshwari #Mohitness

बस एक फोटो भगवान् जी…Only 1 !! #mohitness

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सेल्फी लेती अपनी टीनएजर कज़िन से जब पूछा इतनी सेल्फी क्यों ले रही हो। तो उसने कहा हर इवेंट या नयी जगह पर 20-30 सेल्फ़ीज़ लेती है और उनमे से बेस्ट 1-2 को अपने इंस्टाग्राम, ट्विटर, फेसबुक आदि सोशल मीडिया एकाउंट्स पर पोस्ट कर देती है। मुझे सेल्फी लेते हुए किशोरों से काफी जलन होती है। क्यों? यह बताता हूँ…

….बात नवंबर 2005 की है, मैं 12 क्लास में था और मार्च 2006 में इस स्कूल के चक्कर से छुट्टी मिल जानी थी। मेरी एक टीचर ने अचानक यूँ ही क्लास में कहा, “मोहित तुम्हे मॉडल बनना चाहिए।” क्लास में हूटिंग शुरू हो गयी और मुझे भी अच्छा लगा कि चलो फॉर ए चेंज कोई कॉम्पलिमेंट मिला। हाइट को लेकर लोग पहले से कॉम्पलिमेंट देते रहते थे पर उसका ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता था। यह कुछ नया था। कुछ समय पहले तक बहुत पतला था और क्लास 9-10 में लंबाई बढ़ने की वजह से लुक अजीब लगता था। अब शरीर थोड़ा अनुपात में ठीक हो रहा था तो दिखने में बेहतर हो रहा था। खैर, लोगो के कम्प्लीमेंट्स और अटेंशन की मुझे आदत नहीं थी पर अब यह सब अच्छा-खासा मिल रहा था। फिर स्कूल ख़त्म और कॉलेज, कंप्यूटर इंस्टीट्यूट, कैट की कोचिंग के चक्कर शुरू। कॉलेज में ड्रेस कोड नहीं था और ना ही अटेंडेंस का चक्कर पर दिक्कत ये थी की अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम्स को-एड नहीं थे, इसलिए कॉलेज का क्रेज कम हो गया … ही ही (पढ़ाई भी नाम की होती थी वैसे, बस एग्जाम से कुछ दिन पहले)। स्कूल की पाबंदियां ख़त्म हुयी तो बाल बढ़ाने और लुक पर ध्यान देने का शौक चढ़ा।

बस फिर तो हीरो बन गया। यह परफेक्ट टाइम 2007 के कुछ महीनो तक चला यानी कुल डेढ़-दो साल। उसके बाद धीरे-धीरे लुक और बॉडी बदलने लगी। हालांकि, उसके बाद कुछ सालो तक आउट ऑफ़ कंट्रोल कुछ नहीं हुआ पर कॉम्पलिमेंट पहले कम और धीरे-धीरे बंद हो गया….मतलब वो बात नहीं रही। फिर मेरा ध्यान भी पढाई, लेखन और दोस्तों में लग गया। उस समय की ख़ास बात यह भी है कि तब टेलीकॉम सेक्टर, मोबाइल बहुत विस्तार कर रहा था। फिर भी मोबाइल एक नोवेल्टी था, खासकर टीनएजर के लिए। मिडिल क्लास घर में पापा-मम्मी के पास मोबाइल फ़ोन होते थे, बाकी लोग घर के लैंडलाइन फ़ोन या पापा-मम्मी के मोबाइल से ही काम चलाते थे। हमे जो मोबाइल मिलते भी थे तो नोकिया के सांप के खेल वाले, बिना मल्टीमीडिया वाले बेसिक फ़ोन। मैन्युअल कैमरा कहीं दबा पड़ा होगा घर में, जिसको कभी इस्तेमाल किया नहीं। उस दौर में फोटोज कम खींची और जो खींची तो कभी मोबाइल की मेमोरी बचाने को डिलीट कर दी, कभी दोस्त की हार्डड्राइव क्रैश हो गयी तो कभी बात टल गयी। तब ऑनलाइन फोटो अपलोड करने का भी इतना ट्रेंड नहीं था। बस यह 1-2 सालों का ट्रांज़िशन समय था फिर तो मोबाइल लगभग सबके पास हो गए थे। अभी यह बातें अटपटी लगें पर उस समय टीनएज में रहे लोग समझ रहे होंगे।

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तो सार ये है कि उस समय का मेरा एक….योर हॉनर….एक भी फोटो नहीं है। फिर लुक या शरीर कभी प्राथमिकता नहीं रहे तो समय के साथ वज़न बढ़ा, रात में जगे रहने से चेहरा सूजा-सूजा सा लगने लगा, सोने पर सुहागे एक-दो चोट के निशान परमानेंट हो गए, 2-4 बच्चों के बाप का सा लुक आ गया। खैर, फिट तो मैं हो जाऊँगा…. अपनी उम्र के हिसाब से ठीक लगूंगा पर ये मलाल रहेगा कि लुक वाइज़ अपने प्राइम के, थोड़े शो ऑफ के लिए…अपने बच्चे-नाती-पोतों को दिखाने के लिए कुछ सही सा होगा नहीं। खैर, जो होता है अच्छे के लिए होता है। मॉडल किसी और जन्म में बन लूंगा। 🙂 :p

P.S. EK bike waali pic November 2007 ki hai aur ye khambe waali 2008 k end quarter mein kabhi…..
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लेखकों के लिए कुछ सुझाव

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हर लेखक (या कवि) अपनी शैली और पसंद के अनुसार कुछ रचना-पद्धतियों (genres) में अच्छा होता है और कुछ में उसका हाथ तंग रह जाता है। यह कहना ज़्यादा ठीक होगा कि कुछ विधाओं में लेखक अधिक प्रयास नहीं करता। समय के साथ यह उसकी शैली का एक हिस्सा बन जाता है। अक्सर किसी अनछुई विधा को कोई लेखक पकड़ता भी है तो उसमे अनिश्चितता और असंतोष के भाव आ जाते है। सबसे बड़ा कारण लेखक ने इतने समय में स्वयं के लिए जो मापदंड बनाए होते हैं, उनपर इस नयी विधा की लेखनी खरी नहीं बैठती। ऐसा होने पर लेखक रही उम्मीद भी छोड़ कर वापस अपनी परचित विधाओं की तरफ वापस मुद जाता है। अपने अनुभव की बात करूँ तो मुझे हास्य, हॉरर, ट्रेजेडी, इतिहास, ड्रामा, सामाजिक संदेश जैसे विषयों पर लिखना अधिक सहज लगता है, जबकि रोमांटिक या साइंस फिक्शन जैसी थीम पर मैंने काफी कम लेखन किया है। नयी श्रेणियों में पैर ज़माने का प्रयास कर रहे लेखकों और कवियों के लिए कुछ सुझाव हैं।

*) – अपनी वर्तमान लेखन क्षमता, शैली और उसकी उसकी लोकप्रियता की तुलना नयी विधा में अपने लेखन से मत कीजिये। ऐसा करके आप नयी रचना-पद्धति में अपने विकास को शुरुआती चरण में रोक देते हैं। खुद को गलती करने दें और नए काम पर थोड़ी नर्मी बरतें। याद रखें बाकी लेखन शैलियों को विकसित करने में आपको कितना समय लगा था तो किसी अंजान शैली को अपना बनाने में थोड़ा समय तो लगेगा ही।

*) – शुरुआत में आसानी के लिए किसी परचित थीम के बाहुल्य के साथ अंजान थीम मिलाकर कुछ लिखें। इस से जिस थीम में महारत हासिल करने की आप इच्छा रखते हैं उसमे अलग-अलग, सही-गलत समीकरण पता चलेंगे। थोड़े अभ्यास के बाद परिचित थीम का सहारा भी ख़त्म किया जा सकता है।

*) – आदत अनुसार कहानी, लेख या कविता का अंत करने के बजाए उस थीम में वर्णन पर ध्यान दें। चाहे एक छोर से दूसरा छोर ना मिले या कोई अधूरी-दिशाहीन रचना बने फिर भी जारी रहें। इस अभ्यास से लेखन में अपरिचित घटक धीरे-धीरे लेखक के दायरे में आने लगते हैं।

*) – यह पहचाने की आपकी कहानी/रचना इनसाइड-आउट है या आउटसाइड-इन। इनसाइड-आउट यानी अंदर से बाहर जाती हुयी, मज़बूत किरदारों और उनकी आदतों, हरकतों के चारो तरफ बुनी रचना। आउटसाइड-इन मतलब दमदार आईडिया, कथा के अंदर उसके अनुसार रखे गए किरदार। वैसे हर कहानी एक हाइब्रिड होती है इन दोनों का पर कहानी में कौन सा तत्व ज़्यादा है यह जानकार आप नए क्षेत्र में अपनी लेखनी सुधार सकते हैं।

– मोहित शर्मा ज़हन

Read चनात्मक प्रयोगों से डरना क्यों?

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रचनात्मक प्रयोगों से डरना क्यों?

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एक कलाकार अपने जीवन में कई चरणों से गुज़रता है। कभी वह अपने काम से पूरी तरह संतुष्ट रहता है तो कभी कई महीने या कुछ साल तक वो खुद पर शक-सवाल करता है कि क्या वह वाकई में कलाकार है या बस खानापूर्ति की बात है। इस संघर्ष में गिरते-पड़ते उसकी कला को पसंद करने वालो की संख्या बढ़ती चली जाती है। अब यह कला लेखन, कैमरा, चित्रांकन, शिल्प आदि कुछ भी हो सकती है। अपनी कला को खंगालते, उसमे सम्भावनाएं तलाशते ये कलाकार अपनी कुछ शैलियाँ गढ़ते है। धीरे-धीरे इन शैलियों की आदत इनके प्रशंषको को पड़ जाती है। कलाकार की हर शैली प्रशंषको को अच्छी लगती है। अब अगर कोई नया व्यक्ति जो कलाकार से अंजान है, वह उसके काम का अवलोकन करता है तो वह उन रचनाओं, कलाकृतियों को पुराने प्रशंषको की तुलना में कम आंकता है। बल्कि उसकी निष्पक्ष नज़र को उन कामों में कुछ ऐसी कमियां दिख जाती है जो आम प्रशंषक नहीं देख पाते।

इन शैलियों की आदत सिर्फ प्रशंषको को ही नहीं बल्कि खुद कलाकार को भी हो जाती है। इस कारण यह ज़रूरी है कि एक समय बाद अपनी विकसित शैलियों से संतुष्ट होकर कलाकार को प्रयोग बंद नहीं करने चाहिए। हाँ, जिन बातों में वह मज़बूत है अधिक समय लगाए पर अन्य शैलियों, प्रयोगों में कुछ समय ज़रूर दे। साथ ही हर रचना के बाद खुद से पूछे कि इस रचना को अगर कोई पुराना प्रशंषक देखे और कोई आपकी कला से अनभिज्ञ, निष्पक्ष व्यक्ति देखे तो दोनों के आंकलन, जांच और रेटिंग में अधिक अंतर तो नहीं होगा? ऐसा करने से आपकी कुछ रचनाओं औेर बातों में पुराने प्रशंषको को दिक्कत होगी पर दीर्घकालिक परिणामों और ज़्यादा से ज़्यादा लोगो तक अपनी रचनात्मकता, संदेश पहुँचाने के लिए ऐसा करना आवश्यक है।

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#Rants

Population of undivided India in 1947 was approx 390 million. After partition, there were 330 million (84.62%) people in India, 60 million (15.38%) in East-West Pakistan. Total area of Pakistan after partition was 943665 square kilometers – 22.3% of 4.23 Million square kilometers (area of undivided India before partition), 7% difference between population and area. Pak occupied Kashmir area – 13,297 km² further increases stats mismatch in favor of Pakistan….and then there is article 370 in Jammu & Kashmir….useless gangrene affected limb. This increased burden on India directly-indirectly affects our standard of living in general and kills millions of people annually. Collateral damage ki chinta kiye bina, “nationalism” k liye na sahi par lakho marte logo k liye, kuch karna chahiye. Kashmir chahiye-aazadi chahiye…udhaari leke ulta udhaar dene waale se sood maang rahe hain….Human rights dekho par phir poore context, anupaat k saath dekho….

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*) – शनि शिंगणापुर मामला

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हिन्दू धर्म / सनातन धर्म में कई बातें, रीती-रिवाज़ एकसार हैं, जबकि कुछ रिवाज़ स्थानीय मान्यताओं, लोगो के हिसाब से अलग-अलग होते हैं। जैसे कुछ स्थानों में विजयादशमी पर साधारण पूजा की जाती है, रावण दहन नहीं होता। उत्तरप्रदेश के एक कसबे में पुरुष होली नहीं खेल सकते, यहाँ रंगवाली होली सिर्फ महिलाओं द्वारा खेली जाती है। ऐसे ही अलग-अलग मान्यता, त्यौहार, रिवाज़ पर कुछ स्थानों पर थोड़े बदल जाते हैं। कुछ जगह पुरुषों को कुछ करने की मनाही है, तो कहीं महिलाओं को – तो कहीं पूरा का पूरा गांव त्यौहार नहीं मनाता। जिनका कारण वहां के बड़े बूढ़े विस्तार से बताते हैं। यह स्वतंत्रता – एक जैसे अधिकारों की बात है तो ठीक है, फिर सब जगह, धर्म, प्रांतो में एकसाथ लागू होनी चाहिए। क्या ऐसा होगा? या आज़ादी-दकियानूसी-खुली सोच एक धर्म को कोसने तक सीमित रह जायेगी? सबकी आज़ादी के पक्ष में हूँ, खुली सोच के पक्ष में हूँ पर फिर सबके लिए एकसाथ “आज़ादी” लागू करने के पक्ष में भी हूँ।

भारत में अक्सर लोग एक अच्छे सामाजिक आंदोलन की आड़ में खुद (या अपनी संस्था) के लिए फंडिंग और खुद को सेलेब्रटी बनाने का पिग्गीबैकिंग काम करते है। नारीवाद के साथ अक्सर ऐसा होता देखता हूँ। लोग अपने निजी मतलब के लिए “महिलाओं के अधिकारों, उत्थान” की बात करते है। मामूली कलाकार जो वैसे कुछ ना कर पाते अपने जीवन में बड़े ऊँचे स्थान पर पहुँच जाते है, (ध्यान रहे यह बात मैं सब एक्टिविस्ट के बारे में नहीं कह रहा)। किसी को गूगल पर पता चला कि इस मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है तो पहुँच वहां गए एक्टिविस्ट बनने। पता है इसके बाद देश-दुनिया में फ्री की पब्लिसिटी, अवार्ड्स और ज़िन्दगी भर की अच्छी फंडिंग मिलनी है। इस मामले में मुझे इस्लाम धर्म पसंद है, जो विरासत में मिला है वो मानो या रहने दो, बदलो मत। शाह बानो बेगम मामला इसकी एक मिसाल है, जहाँ सुप्रीम कोर्ट को धार्मिक मान्यताओं से नीचे माना गया।

तो मेरा यह निवेदन है आंदोलनकारियों, स्वयंसेवी संस्थाओं, कानून और सरकार से कि करिये तो सबके लिए करिये। सबको एक पैमाने पर रख कर करिये, जो आसान शिकार मिल गया, जहाँ बैकफायर होने का कोई चांस नहीं वहां नौटंकी ना बखारें। जाते-जाते आसान शिकार हिन्दुओ के बारे में बता दूँ। मतलबी और लालची लोग होते हैं अधिकतर। उन्हें खुद से मतलब है, उनके घर तक अगर कोई बात नहीं आ रही तो चाहे आप उनकी देवी माँ का इतिहास बदल कर राक्षस महिषासुर का महिमामंडन कर दो, इतिहास की किताबों से सबका सम्मान और खुद को हेय दृष्टि से देखने की आदत डलवा दो, अपराध को इतना त्राहि-त्राहि मोड में दिखाओ की 200 देशों में अपराध दर में कहीं बीच में मौजूद भारत सबको पहले स्थान पर दिखने लगे और अपने देश-देशवासियों से ही घृणा करवा दो। कुछ बैकफायर नहीं होना, उल्टा सेलिब्रिटी बनना पक्का!

‪#‎ज़हन‬

‪#‎शनि_शिंगणापुर‬ ‪#‎शनि‬ ‪#‎हिन्दू‬ ‪#‎भारत‬ ‪#‎सनातन‬ ‪#‎shani‬ ‪#‎shingnapur‬ ‪#‎india‬ ‪#‎bharat‬‪#‎shanishingnapur‬

3 Micro Fiction Experiments (Author Mohit Trendster)

Mohit Trendster’s Micro Fiction Experiments (Youtube Playlist)

Micro Fiction Experiment # 01 – Theme: अपहरण (Kidnapping)*) – बाहरी लोग सही कहते थे जंगली लोग जादू-टोना करते है। दो महीनों तक घने जंगल की गुमनामी में बंधक बना पर्यटकों का दल आज उन्हें बचाने आये कमांडोज़ और उनके अपरहरणकर्ता कबीले वालों के बीच में ढाल बनकर खड़ा था। *) – बब्बन पाशा चिंतित था। बड़े गुटों के कुछ आत्मघाती, अपहरण मिशन फेल हुए तो बिल उसके गिरोह के नाम फाड़ दिया गया। अब भारी सुरक्षा से उसने एक विदेशी राजनयिक को अगवा किया तो कोई मान के नहीं दे रहा उल्टा उसके आतंकी संगठन से मिलते जुलते नाम वाले संगठन को श्रेय दिया जा है खबरों में। *) – क्रोध में बिलबिलाता पर कुछ करने में असमर्थ मोज़ेस ठगा सा महसूस कर रहा था क्योंकि एक तो वह नास्तिक था और तो राजनीती वगैहरह में नहीं पड़ता था। बेचारा बस एक टेनिस मैच देखने आया था, वो भी जीवन में पहली बार। अब किन्ही धर्मों की लड़ाई में उसको क्यों किडनैप कर लिया गया। *) – विभोर ने बंदूकें फिल्मों में ही देखी थी। उसका मन थर-थर काँप रहा था जबकि बाहर से उसका स्थिर-शांत तन तरह-तरह की भाव भंगिमाओं से अपनी 4 साल की बच्ची का समस्या से ध्यान बँटाने और सब ठीक हो जाने का दिलासा देने में लगा था। *) – किटकिटाते दांतों से खुद को गरियाने की कोशिश करती गरिमा सोच रही थी कि जहाँ भाग कर आयी उस वीराने में इस दन्त-कुड़कुड़िया सर्दी से बेहतर तो वो गुंडे ही रख रहे थे। *) – बंगले के बाहर जमा किडनैपर गुट का मकसद हत्या नहीं था, पर दंगों से उबर रहे शहर में अफवाहें ज़ोरो पर थी। दुछत्ती में छिपे परिवार के अन्य सदस्यों की जान बचाने के लिए माँ ने रो रहे नवजात का गला घोंट दिया। *) – अब उसे पता चला कि गिरोह के सरगना ने बंधक से आँखें मिलाने को क्यों मना किया था। जाने क्यों अपने किडनैपर को भी उम्मीदों से देख रहीं थी वो आँखें…कसम से अगर 2 क्षण उन आँखों में और देख लेता तो साइड बदल कर उन्ही का हो जाता। —————————————

Micro Fiction Experiment # 02 – Theme: Science
*) – कृतिम रूप से लैब में निर्मित चींटी, दल में घुसपैठ करने के बाद समझ नहीं पा रही थी कि उसकी प्राकृतिक बेवकूफ बहनो में मेहनत और अनुशासन की इतनी सनक क्यों सवार है।
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*) – रोज़ाना ज़िन्दगी से छोटे-बड़े समझौते करते हुए जिस प्रयोग में उसने अपना जीवन समर्पित कर दिया, जब वह लगभग पूर्णता पर था…तब खबर आयी कि वैसा ही प्रयोग दुनिया के किसी साधन-संपन्न वैज्ञानिक ने कर दिया है।
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*) – जो प्रजातियां प्रयोग के लिए चाहिए थी, असिस्टेंट उनके बजाये दिहाड़ी मज़दूर ले आया।
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*) – जेनेटिकली मॉडिफाइड क्रॉप्स (जनुकीय परावर्तित अन्न) फ़ल-सब्जी के सेवन पर व्रत में मनाही थी। सूखा ग्रस्त क्षेत्र में भी उस भोजन का आधार जीवाणु की कोशिका का मांसाहार अंश धर्म-भ्रष्ट करने को काफी थी।
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*) – जिस हथियार के आविष्कार से उसे विश्व में नाम, मान-सम्मान मिला…..बाद में उसे बनाने की ग्लानि में ही उसने अपनी जान ली।
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*) – आज को जिन युगों ने इतनी रफ़्तार दी, खैरात में मिली उन रफ्तारों के योग पर सवार यह पीढ़ी पुराने युगों की धीमी रफ्तारों का कितनी आसानी से मज़ाक बना लेती है!
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Micro Fiction Experiment # 03 (नासमझ इतिहास)

*) – अठारवीं सदी की बात है, दुनिया के सबसे दुर्गम नोलाम द्वीप पर तब तक कोई मानव नहीं पहुंचा था।
*) – बेहतर जहाज़ों और तकनीकों के बल पर दुनिया के तीन शक्तिशाली देशों में वहाँ सबसे पहले पहुँचने की होड़ लगी थी।
*) – एक देश द्वारा दल भेजे जाने की खबर के तुरंत बाद बाकी दोनों देशों ने भी आनन-फानन में अपने जहाज़ी दस्ते रवाना किये।
*) – देश A और देश C लगभग एकसाथ वहां पहुंचे। संचार का कोई माध्यम ना होने के कारण अब एक ही रास्ता बचा था।
*) – A और C के जहाज़ी दलों में एक दूसरे को समाप्त करने के विध्वंसक युद्ध छिड़ गया।
*) – कुछ घंटो बाद आखिरकार देश C के दल ने देश A के क्रू को ख़त्म करने के साथ-साथ उनका जहाज़ डुबो दिया।
*) – दल C के कप्तान और 4 सदस्य ज़िंदा बच पाए, तभी उन्हें देश B का जहाज़ आता दिखा।
*) – अब दुनियाभर  में इतिहास की किताबों में पढ़ाया जाता है कि दुर्गम नोलाम टापू पर सबसे पहले देश B के लोग पहुँचे।
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Bageshwari (Nov – Dec 2015)

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Namastey! 🙂 New story published, Bageshwari Magazine (November – December)

#Bageshwari #mohitness

लालची मौत (Deadly Deal) Editorial

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Horror Letter – लालची मौत (Deadly Deal) – Freelance Talents (Mohit Trendster, Kuldeep Babbar, Harendra Saini and Youdhveer Singh)

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