सिर्फ मर्सिडीज़ ही चाहिए? (लेख) #मोहितपन

4631f387468449c89c1914f6d9cf0e24

जब से लेखन, कला, कॉमिक्स कम्युनिटीज़ में सक्रीय हूँ तो ऑनलाइन और असल जीवन में कई लेखकों, कलाकारों से मिलने का मौका मिला है। एक बात जो मैं नये रचनाकारों को अक्सर समझाता हूँ वो आज इस लेख में साझा कर रहा हूँ।

3-4 साल पहले एक युवा कवि/लेखक ने मेरे ब्लॉग्स पढ़कर मुझसे संपर्क किया और हम ऑनलाइन मित्र बन गये। कुछ समय तक उनके काव्य, कहानियां पढ़ने को मिली फिर वो गायब से हो गये। वो अकेले ऐसे उदाहरण नहीं हैं, पिछले 11 वर्षों में कई प्रतिभावान लेखक, कलाकार यूँ नज़र से ओझल हुए। निराशा होती है कि एक अच्छे कलाकार को पता नहीं क्या बात लील गयी….कहने को तो व्यक्ति के वश से बाहर जीवन में कई बातें उसे रचनात्मक पथ से दूर धकेल सकती हैं पर एक कारक है जिसके चलते कई हार मान चुके कलाकार अपना क्षेत्र छोड़ देते हैं। एक लेखक का उदाहरण देकर समझाता हूँ। मान लीजिए नये लेखक को ऑनलाइन मैगज़ीन के लिए लिखने का मौका मिला, उसने मना कर दिया। मैगज़ीन पेज पर 700 फॉलोवर और प्रति संस्करण 450 डाउनलोड वाली ऑनलाइन पत्रिका पर वह अपना समय और एक आईडिया क्यों बर्बाद करे? इस क्रम में लेखक ने कई वेबसाइट को ठेंगा दिखाया कि वो उसके स्तर की नहीं। चलो सही है, थोड़े समय बाद उसे एक स्थानीय प्रिंट मैगज़ीन या अखबार में कुछ भेजने को कहा गया फिर उसने समझाया – जो प्रकाशन 2-3 शहरों तक सीमित हो उसमे छपना भी क्या छपना। पब्लिश हो तो इस तरह कि दुनिया हिल जाए! हम्म…. कुछ अंतराल बाद इनके किसी मित्र को लेखन अच्छा लगा तो अपनी शार्ट फिल्म के लिए स्क्रिप्ट की बात करने आया। जवाब फिर से ना और मन में (“अबे हट! ऐसे वेल्ले लोगो की फिल्म थोड़े ही लिखूंगा, सीधा चेतन भगत की तरह एंट्री मारूंगा।”) और इस तरह मौके आते गये-जाते गये। अब ऐसे लेखक, कवि और कलाकार एक समय बाद भाग्य को दोष देकर हार मान लेते हैं और इनकी ऑनलाइन गिनी चुनी रचना पड़ी मिलती हैं और इनके मेल ड्राफ्ट्स में डेढ़-दो सौ आईडिया सेव होते हैं जो कभी दुनिया के सामने नहीं आते क्योकि इन्हे एक खुशफ़हमी होती है कि ये जन्मजात आम दुनिया से ऊपर पैदा हुए हैं तो आम दुनिया जैसी मज़दूरी किये बिना ये डायरेक्ट सलमान खान, ऋतिक रोशन के लिए फिल्म लिखेंगे या 90 के दशक के वेद प्रकाश शर्मा जी की तरह एक के बाद एक बेस्टसेलर किताबें बेचेंगे। मतलब खरीदेंगे तो सीधा मर्सिडीज़ बीच में साइकिल, बाइक, मारुती 800, वैगन आर, हौंडा सिटी लेने का मौका मिलेगा भी तो भाड़ में जाए….ऐसा नहीं करेंगे तो बादशाह सलामत की शान में गुस्ताखी हो जायेगी ना!

अरे! स्टेटस या अहं की बात बनाने के बजाए ऐसे छोटे मौकों को आगे मिलने वाले बड़े अवसरों के पायदान और अभ्यास की तरह लीजिए। अगर आप वाकई अपने जुनून के लिए कुछ रचनात्मक कर रहे हैं तो इन बातों का असर तो वैसे भी नहीं पड़ना चाहिए। मंज़िल के साथ-साथ यह ध्यान रखें कि आप सफर में धीमे ही सही पर आगे बढ़ रहे हैं या नहीं। आप कलात्मक क्षेत्र में जिन्हे भी अपना आदर्श मानते हैं उनकी जीवनी खंगालें, लगभग सभी का सफर ऐसे छोटे अवसरों से मिले धक्के से बड़े लक्ष्य तक पहुँचा मिलेगा। हाँ, अपनी प्राथमिकताएं सही रखें, ऐसा ना हो कि सामने कोई बड़ा अवसर मिले और आप किसी बेमतलब की चीज़ में प्रोक्रैसटीनेट कर रहे हों। संतुलन बिगड़ने मत दीजिये और खुद पर विश्वास बनाये रखें। गुड लक!

#ज़हन

Posted by Mohit Sharma

टीनएज ट्रकवाली (कहानी) #ज़हन

44e14862c5f1661fa38415d88d049c58

थाने में बैठा कमलू सिपाहियों, पत्रकारों और कुछ लोगो की भीड़ लगने का इंतज़ार कर रहा था ताकि अपनी कहानी ज़्यादा से ज़्यादा लोगो को सुना सके। पुलिस के बारे में उसने काफी उल्टा-सुल्टा सुन रखा था तो मन के दिलासे के लिए कुछ देर रुकना बेहतर समझा।

“हज़ारो किलोमीटर लम्बा सफर करते हैं हम ट्रक वाले साहब! एक बार में पूरा देश नाप देते हैं। जगह-जगह रुकता हूँ, सब जानते हैं मुझे। आपके थाने में 4 ढाबे पड़ते हैं पर रात में केवल एक खुला मिलता है तो अक्सर यहाँ रुकना होता है। एक बार उसके अगले पेट्रोल पंप के बाहर बैठी एक लड़की देखी, यहाँ की नहीं लग रही थी और पता नहीं रात को वहाँ क्या कर रही थी…या शायद मुझे पता था पर मैं मानना नहीं चाहता था। अगली बार जब आया तो वह लड़की मरी आँखों वाली एक औरत  बन गई थी। सोचा ‘काश उस दिन रुक जाता! पर रुककर, कर भी क्या लेता…रुक के देख तो ले पगले…शायद कुछ हो जाए।’ लोगो और पुलिस की नज़रों से बचने के लिए पेट्रोल पंप वाला धंधे पर एक-दो लड़कियाँ ही रखता था, जब किसी की नज़र पड़ती भी थी तो उसपर पैसे डाल दिया करता। पहले आप लोगो को बताया तो मुझे बाहर से ही भगा दिया फिर अपने जमा रुपयों से ये लड़की खरीदी और हेल्पर हटाकर इसे रख लिया। कुछ हफ्तों बाद यहाँ से जाते हुए एक लड़की दिखी, आदत ऐसे थोड़े ही जाती है। मैंने पंप के मालिक को समझाने की बहुत कोशिश की पर वो नहीं माना, उल्टा मुझे बेची लड़की ज़बरदस्ती वापस लेने की बात करने लगा। किसी तरह वो लड़की भी खरीदी, अब मेरी 2 हेल्पर हो गयीं। फिर महीनेभर बाद के चक्कर में एक और…मैंने कह-कहा के अपने एक दोस्त की शादी उस से करवा दी। जब अगले चक्कर में नई लड़की खड़ी दिखी तो रहा नहीं गया। मोड़ दिया ट्रक पेट्रोल पम्प की ओर और कुचल दिए उसके मालिक और 3 नौकर। फिर एक्सिलरेटर दबा के कूद गया बाहर, ट्रक लड़ा पेट्रोल टंकी में और ब्लास्ट हो गया।”

एक पत्रकार ने पूछा, “यह सही रास्ता नहीं है….तुम्हारे पागलपन में 2 निर्दोष लोग मारे गए और कुछ घायल हुए उनका क्या?”

कमलू मुस्कुराकर बोला – “उनका कुछ नहीं….जैसे रोज़ सबके सामने बिकती इन लड़कियों का कुछ नहीं। सही रास्ते पर चलकर देख लिया बाबू! कहीं नहीं जाता, बस गोल-गोल घुमाते हो तुम लोग और आदमी थक-हार कर लड़ाई छोड़ देता है।”

वह पत्रकार साथी पत्रकारों के सामने अपनी इतनी आसान चेक-मेट कैसे मान लेता, “अब इन लड़कियों का क्या होगा? इतनी ही फ़िक्र थी इनकी तो यह काम करने से पहले इनका तो सोचा होता।”

कमलू – “बाकी 15-16 की हैं पर इनमे एक 19 साल की है, उसको थोड़ा सिखाया है और लाइसेंस दिलवा दिए हैं। अभी छोटे रुट पर ट्रक चलाएगी बाकियों को बैठाकर।”

पत्रकार – “लाइसेंस दिलवा दिए हैं मतलब ट्रक के अलावा और क्या चलाएगी?”

कमलू – “ज़रुरत पड़ने पर बंदूक भी चलाएगी….”

समाप्त!

#मोहित_शर्मा_ज़हन #mohit_trendster

शाकाहारी मनोज का मांसाहारी बदला (कहानी) #mohitness

12801403_794991193965356_5756148705062727974_n

Artwork – Kedar Naik

पंखे की आवाज़ से ध्यान हटाकर मनोज कुछ महीनो पहले की अपनी मनोस्थिति सोच रहा था। तब गाँव से शहर आकर पढाई और सरकारी नौकरियों की प्रतियोगी परीक्षाओं तैयारी करना मनोज को जितना कठिन लग रहा था, असल में उतना था नहीं। यहाँ बने घनिष्ठ मित्रों, शिक्षको के सहयोग से मनोज का सफर कुछ आसान हो गया था। हालांकि, कुछ बातों में उसका मत और पसंद अपने मित्रो के समूह से अलग होते थे। अक्सर उसके दोस्त उसे मांसाहार खाने की ज़िद करते पर वह हमेशा उन्हें टाल देता। जब मनोज कहता कि उसने बचपन से नहीं खाया इसलिए खाने का मन नहीं होता तो उसके मित्र कहते कि “जीवन में कभी ना कभी तो कोई चीज़ पहली बार करते ही हो, यह भी कर के देख लो।” एक बार मनोज के मुँह से निकल गया कि वह पंडित है तो सब हँसते हुए बोले कि “अरे! आजकल पंडित ही तो सबसे ज़्यादा खाते हैं।” बहस करने और उसमे जीतने की मनोज को आदत नहीं थी। ऐसी कोई स्थिति आने पर वह असहज होकर वहाँ से निकलने के बारे में सोचता रहता था।  उसके घर के माहौल और निजी मत के अनुसार मांसाहार वर्जित था। उसे यह बात खटकती थी कि जब वह अपने दोस्तों पर मांसाहार छोड़ने के लिए दबाव नहीं डालता तो वो लोग उसके पीछे क्यों पड़े रहते हैं?

एक दिन मनोज के मित्रों ने धोखे से उसे एक मांसाहार व्यंजन, पनीर-मशरूम की ख़ास डिश कहकर खिलाया। मनोज ने जब खाने के स्वाद की तारीफ़ की तो सबने उसका मज़ाक उड़ाया और बताया कि मांसाहार खाने के बाद भी वह इंसान ही है और उस में कुछ नहीं बदला। उस जैसे इंसान मांस खाते हैं और बिना किसी परेशानी के जीते हैं। मनोज को इस बात से बड़ी ठेस पहुंची और पर उसने मित्र मंडली के सामने अपनी निराशा नहीं जताई। समय बीतने के साथ सब आगामी एग्जाम की तैयारी मे जुट गए और एग्जाम होने के बाद मनोज ने सबको अपने कमरे पर आमंत्रित किया। मनोज तरह-तरह के व्यंजन लाया था और सबने बड़े चाव से दावत का मज़ा लिया। हालांकि, धोखे से मनोज मांसाहार खा चुका था पर उसने आज अपने लिए शाकाहार व्यंजन ही रखे। दावत ख़त्म होने के बाद मनोज बोला….

“बिरयानी के साथ कुत्ते का शोरबा, छिपकली की चटनी कैसी लगी?”

इतना सुनना था कि सबके कुत्ते वाले मुँह बन गए। पहले तो मित्रो ने विश्वास नहीं किया पर फिर मनोज की मुस्कराहट देख कर कोई उल्टी करने दौड़ा तो किसी ने मनोज का गिरेबान पकड़ लिया। मनोज ने अपने दोस्तों की टोन में जवाब दिया – “चिंता मत करो…कुत्ता या छिपकली चीन, म्यांमार, ताइपे देशो में इंसानो द्वारा खाये जाते हैं और इन्हें खाने के बाद भी तुम सब इंसान ही रहोगे, तुम्हारे अंदर कुछ नहीं बदलेगा।”

समाप्त!

#मोहित_शर्मा_ज़हन #mohitness

रंग का मोल (कहानी) #ज़हन

17352088_1574417092593143_5083255592469184670_n

आज भारत और नेपाल में हो रहीं 2 शादियों में एक अनोखा बंधन था।

दिव्यांशी अपने सांवले रंग को लेकर चिंतित रहती थी। सारे जतन करने बाद भी उसका रंग उसकी संतुष्टि लायक नहीं हुआ। दिव्यांशी का मीनिया इस हद तक पहुँच गया था कि वह अवसाद में चली गई। कुछ समय पहले एक नए इलाज के लिए एजेंट को अपना ब्लड ग्रुप, मेडिकल जानकारी देते समय दिव्यांशी के परिवार को ज़्यादा उम्मीद तो नहीं थी पर बच्ची की ज़िद और दिल की तसल्ली के लिए सेठ विभूतिचंद ने यह कदम उठाया।

फिर तुरंत ही पता चला कि दिव्यांशी के ब्लड ग्रुप से मिलती एक गोरी नेपाली लड़की राज़ी हुई है जिसकी पीठ और पेट से खाल निकाल कर दिव्यांशी के चेहरे, गर्दन और कुछ अन्य हिस्सो पर ग्राफ्ट की जा सकती है। नेपाली एजेंट को 2 लाख रुपये देकर, ऑपरेशन द्वारा दिव्यांशी के चेहरे, गर्दन, कंधो और हाथों-पैरों पर नेपाली लड़की की उजली खाल चढ़ा दी गयी। अपने अवसाद, हीनभावना और इस कदम के लिए दिव्यांशी और उसका परिवार आसानी से समाज को दोष दे सकता है और हर सुनने वाला उनकी हाँ में हाँ मिला देगा या ये लोग खुद को खंगाल कर अपना खोखलापन देख सकते हैं।

इस सौदे से बॉर्डर के इस तरफ ख़रीदे आत्मविश्वास से परिपूर्ण दिव्यांशी की शादी हो रही थी और उस तरफ नेपाली एजेंट की लड़की की शादी हो रही थी…और हाँ, अपनी खाल देने वाली नेपाली लड़की को भी 10 हज़ार रुपये मिल गए।

================

सपने दिखा कर सपनो का क़त्ल कर दिया,
दुनिया का वास्ता देकर दुनिया ने ठग लिया!
फिर किसी महफ़िल के शौक गिना दो,
रंग का मोल लगा लो,
उजली चमड़ी की बोली लगा दो,
फिर कुतर-कुतर खाल के टुकड़े खा लो,
बचे-खुचे शरीर पर हँसकर एक और गुड़िया का ज़मीर डिगा दो!

तेरा भी कहाँ पाला पड़ गया?
…या तो इनमे शामिल हो जाना,
या फिर कोई सही मुहूर्त देखकर आना…
ये लोग लाश की अंगीठी पर रोटी सेंकते हैं….
और रूह की जगह रंग देखते हैं।

समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन #mohitness

पुरुष आत्महत्या का सच (कहानी) #ज़हन

17191265_1913362525574663_179787429055192259_n

Art – L. Naik

पार्क में जॉगिंग करते हुए कर्नल शोभित सिंह अपने पडोसी लिपिक शिवा आर्यन से रोज़ की तरह बातें कर रहे थे। उनकी वार्ता में एक बात से दूसरी बात और एक विश्लेषण से कहीं और का मुद्दा ऐसे बदल जाते थे जैसे किशोर टीवी चैनल बदलते हैं। दोनों के लिए अपनी चिंता, मानसिक दबाव कम करने का इस से बेहतर साधन नहीं था। जॉगिंग के बाद जब दोनों बेंच पर बैठकर अखबार पढ़ने लगे तो एक रिपोर्ट ने उनका ध्यान खींचा।

शिवा आर्यन – “हम्म….औरतों की तुलना में मर्द क्यों दुगनी संख्या में सुसाईड करते हैं? इसका जवाब मुझे पता है।” (अखबार साइड में रखकर) अरे आप तो सीरियस हो गए…गलत टॉपिक छेड़ दिया लगता है। कल के क्रिकेट मैच से बात शुरू करनी चाहिए थी। चलो कोई नहीं, चिल्ल कर के बैठो सर! लोड मत लो, मैं यहाँ अपनी दुखभरी कहानी से आपको परेशान नहीं करने वाला। बस अपने उदाहरण से यह मुद्दा समझा रहा हूँ। मेरी लाइफ नार्मल है, बचपन से लेकर अब तक हर बात साधारण रही है। मैं, मेरा परिवार, मेरी क्लर्क की नौकरी, मेरी पत्नी, मेरा मकान, मेरा रूटीन….सब कुछ आर्डिनरी।

जब किसी घर में लड़का पैदा होता है तो माँ-बाप की आँखों में ढेर सारे सपने पलने लगते हैं कि हमारा लाडला पता नहीं कौनसी तोप उखाड़ेगा, कलेक्टर बनेगा, दुनिया बदल देगा फलाना-ढिमका। बच्चे के बड़े होने के साथ कुछ सपने मर जाते हैं और कुछ ज़बरदस्ती उसपर थोप दिए जाते हैं कि कम से कम इतना तो करना ही पड़ेगा। उन सपनो को बस्ते में ढोकर वो बच्चा अपने जैसे करोड़ो बच्चों से रेस लगता है। तब उसे पता चलता है कि सपनो को ज़िंदा रखने के लिए करोड़ो में सिर्फ अच्छा होना काफी नहीं बल्कि असाधारण होना पड़ता है। इस रेस में करोड़ो बच्चो को हराकर और करोड़ो से हारकर वो बच्चा मेरे जैसी साधारण ज़िन्दगी वाली स्थिति में पहुँच जाता है। पहले माँ-बाप के सपने मरते देखता हूँ, फिर शादी के बाद मेरी पत्नी की आँखों के सपनो मुझे सोने नहीं देते थे। ऐसा नहीं कि मैं मेहनत नहीं करता, अक्सर ओवरटाइम करता हूँ – टाइम पर बोनस पाता हूँ पर 19-20 मेरी नौकरी की एक रेंज है, आगे भी रहेगी और वो रेंज मेरे अपनों के सपनो की रेंज से बहुत नीचे है। समय के साथ मेरी तरह सबने एडजस्ट करना सीख लिया। सबने सिवाय मेरी नन्ही गुड़िया ने! उसके लिए मैं टीवी पर आने वाले सुपरहीरोज़ से बढ़कर था जो दुनिया में कुछ भी कर सकता है। एक ऐसा हीरो जिसके इर्द-गिर्द उसकी छोटी सी दुनिया बसी थी। जैसे-जैसे गुड़िया बड़ी हो रही है, दुनिया के आईने में उसका सुपरहीरो पापा हर दिन छोटा होता जा रहा है। अब मुझसे उसकी आँखों में मर रहे सपने देखे नहीं जाते। सबसे आँखें चुरा सकता हूँ पर अपनी गुड़िया से ऐसी आदत डालने में बहुत दर्द होगा, ऐसा दर्द जो किसी से बाँट भी नहीं सकता। यह घरेलु हिंसा की तरह दिखने वाले ज़ख्म नहीं है, अंदर घुट-घुट कर कलेजा छलनी करने वाले घाव हैं। मैं आत्महत्या नहीं करूँगा…साला हिम्मत के मामले में भी आर्डिनरी हूँ। पर समझ सकता हूँ कुछ आर्डिनरी लोगो की घुटन, अंदर के ज़ख्म इतना दर्द देते होंगे कि उन्हें सुसाइड के अलावा कोई रास्ता नहीं दिखता होगा।

इसका मतलब ये मत लगाना कि सपने मार दो। बस अपने बाप, भाई, पति, प्रेमी को सपनो से हारने मत दो, उसको बताओ कि चाहे जो हो – आपके जीवन की पिक्चर का हीरो वो है और रहेगा। एक सपना मरेगा तो 10 नए आ जाएंगे पर कहीं किसी गुड़िया का हीरो चला जाएगा तो वो किसके कंधो पर चढ़कर सपने देखेगी…वो तो सपनो से ही डरने लगेगी।”

समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन

#mohitness #mohit_trendster

कुत्ते ने काट लिया! (हास्य कहानी) #ज़हन

tumblr_static_tumblr_static_ip4cblc989sgsok0w04c0o8s_640

दिलजला कुत्ता

कुत्ते के काटने और गोली लगने में तुलना की जा सकती है। जैसे कुत्ता काटकर निकल ले, उसके दाँतों और आपके शरीर का कोण सही ना बैठे या आप तुरंत छुड़ा लें, तो उसे गोली शरीर से छूकर निकलना कहा जा सकता है, फिर दूसरा होता है कि कुत्ता तसल्ली से शरीर के किसी हिस्से को हपक के काटे और कुछ सेकंड चिचोड़े भी तो इसे कहेंगे गोली लगना। अभी रुकिए! तीसरा गोलियों से छलनी होना नहीं सुना? या जो फिल्मों में विलेन बोलते हैं, “गोलियों से भून डालो इसे!” वो तब होता है जब कुत्ता पगला जाए और व्यक्ति को जगह-जगह काटे, मारने-पीटने पर भी न छोड़े और जान छुड़ानी भारी पड़ जाए। ये कहानी एक ऐसे ही पागल कुत्ते की है….प्यार में पागल कुत्ते की।

सच्चे प्यार की फ्रीक्वेंसी जन्मजन्मांतर तक सेट होती है। पिछले जन्म में ये कुत्ता जी सूर्य शर्मा नामक इंसान हुआ करते थे। सुन्दर, सुशील और दयावान, मतलब इतने गुणी की इनके गुणों की संख्या से लोग जलते थे। इन्हें अपने मोहल्ले की युवती सुलोचना पर क्रश था। कई महीनो तक शर्मा जी शर्माते-शर्माते, तरह-तरह के जतन करते आखिरकार अपना प्रेम अभिव्यक्त करने में सफल रहे और शुरू हुई एक इंटर-लाइफ लव स्टोरी! सूर्य और सुलोचना एक दूसरे को इतनी अच्छी तरह समझते थे कि चेहरे के भाव देख कर समझ जाते थे कि उनके प्रीतम के मन में धूम मच रही है या कुछ देर पहले खाये गोलगप्पे ज़्यादा तीखें हैं।

प्रेमी जोड़े में बुद्धिमत्ता बहुत थी तो बिना किसी जानकार को भनक लगे किसी गुप्तचर की चपलता से दोनों लगभग रोज़ ही मिल लेते थे। सुलोचना की रूचि फैशन डिजाइनिंग में थी और वह एक प्रतिष्ठित यूरोपीय संस्थान में पढाई की स्कॉलरशिप का सपना देख रही थी। उस छात्रवृत्ति के लिए सुलोचना को फैशन डिप्लोमा की आवश्यकता थी जिसकी फीस लाखो में थी। सूर्य को जब यह बात पता चली तो उसने अपने सभी संसाधन सुलोचना के डिप्लोमा की तरफ केंद्रित किये। अपनी दूकान बेचकर उसने किसी तरह सुलोचना की फीस भरी। घर पर इन घटनाओं और हरकतों के लिए दोनों अब भी बहाने बना रहे थे। जैसे सुलोचना ने अपने घरवालो को बताया था कि उसे स्थानीय संस्थान द्वारा मिली छात्रवृति से उसकी कोई फीस नहीं लग रही है। भाग्य से डिप्लोमा हो जाने के बाद प्रतिभावान सुलोचना का चयन स्कालरशिप के लिए हो गया और वह फिनलैंड के प्रतिष्ठित फैशन संस्थान में पढ़ने चली गई। सूर्य को अपना हर बलिदान सार्थक लगा और वह आतुरता से सुलोचना के लौटने के दिन-हफ्ते-महीने गिनने लगा।

लंबे इंतज़ार के बाद सुलोचना लौटी पर वही एक व्यक्ति से शादी करने के बाद। सूर्य का जैसे संसार उजड़ गया। कहाँ उसने आगे के एक-एक वर्ष की योजना बना रखी थी और कहाँ उसका अब बीत रहा हर क्षण कटीले पहाड़ चढ़ने जैसा था। सूर्य ने अपनी पुरानी प्रेयसी का सामना किया तो उखड़े मन से सुलोचना ने उस से कन्नी काट ली और कहा किशोरावस्था का प्यार असली प्यार नहीं होता। “यह ज्ञान की गंगा मेरी दूकान बिकने से पहले बहा देती कलमुँही।”

अब सूर्य को लगा कि इस मैटीरियलिस्टिक दुनिया में फिलोसॉफी और मोरल साइंस की किताबो वाले जीवन का कोई फायदा नहीं। उसने अपने व्यवहार के सभी गुणों को चुन-चुन कर अवगुण बनाया और इस भौतिक दुनिया से बदला लेने की ठानी। झूठ बोलना, छल करना, पैसा गबन करने से लेकर  छोटे पाप जैसे सोते हुए पिल्लो को लात मारना, पहले मीठा गिराकर चींटीयों का मेला लगाना और फिर उस स्थान पर खौलता हुआ पानी डालना या कड़े सोल वाले जूते पहनकर डांस करना, गरीबो के घर में कलह बढ़ाने के लिए मुफ्त में शराब बाँटना, बाजार में तरह-तरह की अफवाह फैलाना आदि। जब तक वह दिन में ऐसी कुछ हरकतें ना कर लेता उसके कलेजे को ठंडक नहीं मिलती थी। कुछ वर्षो बाद उसकी अकाल मृत्यु हो गयी और उसके खाते में लिखे हज़ारो-लाखो अपराधों के कारण उसने कुत्ते की योनि में जन्म लिया। भाग्य फिर उसे अपने पिछले जन्म की प्रेमिका के घर के बाहर ले आया। अब सुलोचना एक प्रौढ़ औरत, 6 साल के बच्चे की माँ थी। उसके घर के बाहर निरीह पिल्ले (सूर्य) की आवाज़ों से सुलोचना के बच्चे प्रणव का मन पिघल गया और वह अपने माता-पिता की अनुमति से उसे अपने घर ले आया। इस पिल्ले का नाम सूरज रखा गया। किसी कारणवश सूर्य (सूरज) में अब भी अपने पिछले जन्म की स्मृतियाँ प्रबल थी। उसे कुलोचना (जो वह सुलोचना को मन में बुलाता था) का धोखा, उसकी बातें, पेड़ की आड़ में ली गई पप्पियां तक याद थी। वह उस घर में रहना तो नहीं चाहता था पर सड़क के कुत्तो के बदहाल जीवन की अपेक्षा ऐसा पालतू जीवन बेहतर था। उसने देखा कैसे सुलोचना के बड़े हो रहे लड़के प्रणव की 3 गर्ल फ्रेंड्स हैं और सोचा (“बिलकुल माँ पे गया है नासपिटा”). सुलोचना का अपना भव्य बुटीक और एक स्थानीय ज़री कला के कपड़ो की दुकान थी। अपना व्यापार बढ़ाने और बड़े स्तर पर प्रचार के लिए उसे कुछ निवेशकों की आवश्यकता थी। उसके शहर में घूमने आ रहे कुछ विश्वप्रसिद्द फैशन डिज़ाइनर, व्यापारियों का प्रतिनिधिमंडल एक अच्छा अवसर था। उसे डर था कि उस से पहले कोई और प्रतिद्वन्दी बाज़ी ना मार ले जाए। आनन-फानन में उसने अपने घर के पर्दे, कालीन, गमले, नहाने की बाल्टी तक बदल दी। उसका पुराना आशिक कुत्ता सूरज ये ट्रेंड भांप चुका था। रात को उसने छुपकर कुलोचना और उसके पति पल्लव की बातें सुनी।

“ऐसे कैसे सूरज की जगह क्यूट सा पग ले आयें। 3-4 साल से घर में है, प्रणव नाराज़ नहीं होगा?”
कुलोचना – “विदेशी मेहमानों के लिए घर का इतना सब बदलवाया है, अब उनके आगे देसी कुत्ते से अच्छा इम्प्रैशन नहीं जमेगा। परसो वो लोग आ रहे हैं, कल रात प्रणव के सोने के बाद, सूरज को कार से कहीं दूर छोड़ आएंगे।”

गुस्से मे कुंकारते सूरज ने गमले में ज़ोर से अपनी थूथन मारी और नया गमला चटक गया। दर्द तो हुआ पर उसे तसल्ली हुई की कुलक्षणी का ढाई सौ रुपये वाला  एक गमला तो चटकाया। अगली रात प्लान के अनुसार सूरज को घर से बाहर निकालने के लिए पल्लव, सुलोचना जब बालकनी से सटे डॉग हाउस पर पहुंचे तो सूरज वहाँ से नदारद था। पूरे घर में और आस-पास आधा घंटे ढूंढने के बाद भी जब उन्हें कुछ न मिला तो दोनों ने सुबह सूरज को देखने की बात सोची। सुबह भी सूरज कहीं नहीं दिखा। दोनों ने सोचा चलो अच्छा हुआ, सूरज अपने आप ही गायब हो गया और हमारे हाथो से पाप होने से बच गया। सुलोचना अपनी मासिक कमाई के आधे खर्च पर एक फैंसी पग कुत्ता ले आयी। अगले दिन सुलोचना के न्योते पर विदेशी प्रतिनिधिमंडल का आना तय हुआ। सभी बातें सुनियोजित चल रही थी, आखिर सुलोचना और पल्लव ने एक-एक बात का रिहर्सल कर रखा था। मेहमान घर में पधारे और उनके स्वागत सत्कार के बाद नाश्ता शुरू हुआ। इधर अपने मिशन के तहत गली के सभी कुत्तो के साथ सूरज पहले ही छुपकर घर की छत पर पहुँच चुका था। वो उस शाम घर से निकल कर पास की खाली ईमारत में छुप गया था। वैसे तो सड़क के आवारा कुत्ते पालतू कुत्तो से चिढ़ते हैं पर सूरज की दर्द, धोखे वाली प्रेम कहानी सुनकर सबका दिल पसीज गया और उन्होंने सूरज की मदद करने की शपथ ली। अपनी योजना पर रिहर्सल सूरज एंड पार्टी ने भी किया था। मेहमान अभी बैठे ही थे कि अचानक उनपर छत से उतरे  दर्जनों कुत्तो का सरप्राइज अटैक हुआ। सूरज अपनी कुत्ती भाषा में अपनी टुकड़ी का मार्गनिर्देशन करने लगा जो वहाँ मौजूद इंसानो को केवल “भौ भौ”, “वुफ़-वुफ़” सुनाई दे रही थी।

सूरज (कुत्ती भाषा में) – “साथियों दबोच लो सबको, रास्ते ब्लॉक कर दो! आज इन सबका ऐसा अतिथि देवो भवः करके भेजना है कि आगे भारत का नाम सुनके आत्मा खनक जाए इन लोगो की। अपनी-अपनी थूथन रगड़ दो इन सबके मुँह, शरीरों पर… लिसलिसा दो एक-एक को! शरीद के डेढ़ मीटर दूर से ‘हाउ क्यूट’, ‘लवली कहके’ उठाते हैं और फिर 4 बार हाथ धोते हैं। जरमोफोब कहीं के! दिखाओ इन्हें भारतीय कीटाणुओं की देशभक्ति। लोटा दो ज़मीन पे चिचोड़-चिचोड़ के! चाहे कोई हुश करे या डंडा मारे पर दन्त ऐसे गड़ाने हैं कि सबकी खाल में परमानेंट हलंत के निशान पड़ जाए। नेस्तोनाबूद कर दो ये घर…सोफे फाड़ दो, फर्नीचर तोड़ दो, राशन नाली में बहा दो, बस वो बाद के लिए चॉकलेट केक सरका लेना कोने में और रुक तू कुलोचना की बच्ची….रात से मैंने सू-सू रोक रखा है ताकि तेरा ढाई लाख का नीता लुल्ला डिजाईन लहंगा ख़राब कर सकूँ। ना-ना कुल्टा मुझे पुचकारने या दूध में भीगी ब्रेड जैसे लोलू लालच देने की कोशिश मत कर सनम बेवफा क्योकि जब प्यार की आग का बदला दिल में धधकता हैं ना जान-ए-तमन्ना तो ये संसार भुला देता है। बाल इतने लंबे  कैसे हो गए तेरे 2 दिनों में? ओह! नकली एक्सटेंशन बालों वाला जूड़ा….”

तभी किसी कुत्ते ने गलती से रेडियो चला दिया जिसपर लक्खा सिंह की भक्ति भेंटे चल रहे थे।
सूरज – “आहा! किसने घड़ा? किसने घड़ा निराला माँ का रंगला चूड़ा….हो रंगला चूड़ा….मैंने नोच खाया कुलोचना का नकली एक्सटेंशन वाला जूड़ा हो नकली जूड़ा….

….और ये बोटॉक्स के इंजेक्शन लगाकर चेहरा बड़ा टाइट कर लिया है इसपर एक काटी तो बनती है। हाँ…गिड़गिड़ा, रो, माफ़ी मांग…मैं भी बहुत तड़पा हूँ कुत्ती! वो भी 2 जन्म। कहाँ है तेरा फिरंगी पग, देख तू उसकी तस्करी नाले पार वाली कॉलोनी मे करवाता हूँ और वो पल्लव वजन की वजह से लंगड़ा के चलता है ना, उसके दूसरे पैर में काट लेता हूँ फिर बैलेंस चलेगा।”

सिर पर कफ़न बाँध कर आये कुत्ते अपनी मिसमिसाहट दूर कर, आखिरकार सूरज के कहने पर वहाँ से दूसरे मोहल्लों के लिए निकल गए। सूरज नगर पालिका की वैन आने तक मोर्चे पर डटकर आतंक मचाता रहा। उसके बंदी बनाये जाने के बाद सुलोचना के घर का दृश्य किसी भूकंप के बाद जैसा था और वहाँ उपस्थित सभी पीड़ित किसी बम ब्लास्ट में जीवित बचे लोगो से लग रहे थे। नाक से अधिक मुँह से सांस लेते विदेशी मेहमान तुरंत भारत की सीमा से बाहर निकलने की बुकिंग करने लगे। सदमे में गमलो की मिट्टी और कुत्तो की लार का उबटन लगाए फ्रिज के नीचे दबी सुलोचना सोच रही थी कि आखिर उसे किस जन्म के पापो की सज़ा मिल रही है।

समाप्त!

#मोहित_शर्मा_ज़हन #Mohitness

Kavya Comics – काव्य कॉमिक्स | Facebook

छूटी डोर (कहानी)

coffee-comfort-paper-pen-tea-favim-com-262186

हिन्दी, अंग्रेजी साहित्य के बहुत बड़े समीक्षक-आलोचक, अनुवादक श्री अनूप चौबे का टी.वी. साक्षात्कार चल रहा था। साक्षात्कारकर्ता अनूप के पुराने मित्र नकुल प्रसाद थे। कुछ सवालो बाद नकुल को एक बात याद आ गई और अपने साथ लाये सवालो के बीच उन्होंने एक सवाल रखा।

“आपने पहले कई बार अपना उपन्यास, कथा/काव्य संग्रह लिखने की मंशा मुझसे साझा की थी। उस बारे में कुछ बताएं?”

हालाँकि, यह इंटरव्यू लाइव नहीं था पर चौबे जी असहज हो गए। कुछ संभलने के बाद उन्होंने फिर बोलना शुरू किया।

“वर्षो तक एक के बाद एक ना जाने कितनी कहानियों, कविताओं और उपन्यासों को पास से देखा। कई बार तो किसी रचना के लेखक, कवि से अधिक उस रचना के साथ समय बिताया। दूसरो के गढ़े काल्पनिक जगत में गलतियां, कमियां निकालने का जूनून पता नहीं कब आदत में बदल गया। एक समीक्षक की तरह लिखना या अनुवाद करना अलग है पर जब भी लेखक की तरह कुछ लिखता हूँ तो मेरी यह आदत किसी मीनिया की तरह मेरा पीछा करती है। अपनी कल्पना के कुछ वाक्य पूरे करते ही मन उनपर अपना नकारात्मक फरमान सुना देता है। अपना लिखा मेरी नज़र से कभी पास हो ही नहीं पाता है जो किसी और तक पहुँच पाये। कभी-कभी तो रात में उठकर पिछले दिन लिखे पन्ने फाड़े हैं ताकि चैन से सो सकूँ।”

नकुल प्रसाद – “ओह! क्षमा चाहता हूँ! मुझे यह स्थिति पता नहीं थी। आप चिंता मत कीजिये, मैं वो सवाल और आपकी प्रतिक्रिया एडिट करवा दूंगा।”

अनूप चौबे – “कोई बात नहीं…अगर मैंने यह क्षेत्र ना चुना होता तो शायद मैं अच्छा साहित्य लिख पाता क्योकि सच कहूँ तो रचना की अपूर्णता, उसकी कमियां ही उसका साज-श्रृंगार हैं। ऐसी बातें ही रचना की एक अलग छाप बनाती हैं। आपने देखा होगा कैसे कोई अपने चेहरे की कमी बताता है और उसकी वही चीज़ जिसे वह कमी मानता है अक्सर लोगो को पसंद आती है। सबसे बड़ी रचनाकार प्रकृति जो हमे मरते दम तक अपनी कलाकृतियों से विस्मित करती है, में पूर्णता से दूर अनगिनत छूटी डोर हैं। साहित्य में सामाजिक दायरे की फ्रीक्वेंसी पर सेट दिमागी पैमाने को संतुष्ट करना असंभव है। चलिए कोई बात नहीं, यह जन्म इस रोल में ही सही…”
समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन

Read सुविधानुसार न्यूक्लीयर परिवार (कहानी)

लेख: सेलेब्रिटी पी.आर. का घपला (मोहित शर्मा ज़हन)

14925302_1235529103206857_8598406039823181883_n

पैसा और सफलता अक्सर अपने साथ कुछ बुरी आदते लाते हैं। कुछ लोग इनसे पार पाकर अपने क्षेत्र में और समाज में ज़बरदस्त योगदान देते हैं वहीं कई शुरुआती सफलता के बाद भटक जाते हैं। एक बड़े स्तर पर आने के बाद प्रतिष्ठित व्यक्ति पर इमेज, ब्रांड मैनेजमेंट की ज़िम्मेदारी आ जाती है लोगो पर, अब या तो आप मेहनत और साफ़-सुथरे तरीके से ये काम करे या फिर अपनी मन-मर्ज़ी का जीवन जीते हुए बाद मे अपने कृत्यों को सही ठहराने की कोशिश करें। इन्ही में कुछ विख्यात लोग लोकप्रियता बढ़ाने के लिए अपने पीआर एजेंट या नेटवर्क का सहारा लेते हैं। जैसे अगर कोई सेलिब्रिटी कोई गलत बात, काम करता पकड़ा जाए या उसकी वजह से जनता, समाज को कोई नुक्सान हो तो अपनी टीम की मदद से वो ये बातें प्रचारित करने की कोशिश करेगा कि उसका ये मतलब नहीं था वो तो इस काम से समाज की मानसिकता दिखाना चाहता/चाहती थी या उसे सेलिब्रिटी होने की सज़ा मिल रही है। ये सही है….सेलिब्रिटी होने के मज़े तक सब ठीक पर उस लाइफ में एडजस्ट करने वाले हिस्सो में शिकायत करो।

उदाहरण के लिए किसी सेलिब्रिटी ने एक मुद्दे पर बिना जानकारी के कोई बेवकूफी भरी बात कही अब उसका सोशल मीडिया आदि जगह मज़ाक उड़ा। तो उसकी बेवकूफी गयी एक तरफ और उसने निकाल लिया अपने अल्पसंख्यक, महिला या किसी अन्य मजबूरी का कार्ड, फिर क्या मीडिया, जनता का ध्यान कहीं और गया। यानी अगर उस बात की तारीफ़ होती तब कोई दिक्कत नहीं थी, जहाँ एक वर्ग ने मज़ाक उडा दिया तो घुमा-फिरा कर बात अपने ऊपर मत आने दो।

साथ ही ये लोग समय, स्थिति के अनुसार नए-नए स्टंट सोचते हैं। जैसे अपने बीते जीवन में किसी दुखद काल्पनिक घटना को जोड़ देना या किसी बीमारी (खासकर मानसिक) से जूझकर उस से जीतना दिखाना। क्या यार….आपके एक जीवन में घटनाओ का घनत्व कुछ अधिक नहीं हो गया? मैं यह नहीं कह रहा कि सब बड़े लोग ऐसा दिखावा करते है पर ऐसा करने वाले लोगो का अनुपात बहुत ज़्यादा है। आम जन – ख़ास लोग सबका जीवन चुनौतियों, संघर्षो वाला होता है पर ज़बरदस्ती के पीआर स्टंट कर के कम से कम खुद से झूठ मत बोलिये। इस नौटंकी के बिना भी आप लोकप्रिय और महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों पर जनता का ध्यान ला सकते हैं (बशर्ते आप वैसा करना चाहें ना की केवल अपनी पब्लिसिटी के चक्कर में पड़े रहे)। हालांकि, पैसे के पीछे भागते मीडिया को नैतिक-अनैतिक से कोई मतलब नहीं होता। हर दिन कुछ नया वायरल करने की होड़ में मीडिया के लिए कुछ नैतिकता की सोचना पाप है। वैसे व्यक्ति के बारे में थोड़ी रिसर्च और पहले का रिकॉर्ड देख कर आप जान सकते हैं कि कौन सही दावा कर रहा है और कौन पीआर के रथ पर सवार है।

जो पाठक सोच रहे है कि क्या फर्क पड़ता है? बेकार में मुद्दा बनाया जा रहा है! अगर ऐसा करने से किसी को नुक्सान नहीं पहुँच रहा तो क्या गलत है? उन मित्रो से मेरा यह कहना है कि कभी-कभी किसी वर्ग को लंबे समय से छद्म रूप से हो रहा नुक्सान सीधे नुक्सान से बड़ा होता है। जिन लोगो को वाकई मीडिया, जनता के ध्यान-पैसे की आवश्यकता है वो बेचारे तरसते रह जाते हैं और उनका हिस्सा, उनकी फुटेज गलत संस्थाएं, लोग खा लेते हैं। मुश्किल है पर सबसे निवेदन है कि अपरंपरागत न्यूज़ सोर्सेज पर ध्यान दें, सही लोगो-संस्थाओ को आगे बढ़ने मे हर संभव मदद करें। छोटे बदलाव से धीरे-धीरे ही सही पर बड़ा असर पड़ेगा।

============

My We Heart It Profile

Posted by Mohit Sharma at 1:40 AM

3 new communities #update

cp
cr

*) – Articles, short comics, stories and random collaborations with Culture POPcorn [http://www.culturepopcorn.com/] and Comics Reel team [http://comicsreel.com/] (since May 2016)

cop

*) – Author, mentor: Comics Our Passion【COP】community
[http://www.comicsourpassion.com/]
[https://www.facebook.com/comicsourpassion]

इंडी आर्टिस्ट का मतलब क्या है?

14572136_10210976324948642_1698863325918017497_n
Art – Thomas Lepine
Originally posted (COP Website)

किसी रचनात्मक क्षेत्र में किये गए स्वतंत्र काम को इंडी (Indie/Indy) यानी इंडिपेंडेंट रचना कहा जाता है। इंडी काम कई प्रकार और स्तर का हो सकता है, कभी न्यूनतम या बिना किसी निवेश के बनी रचना केवल कला के बल पर अनेक लोगो तक पहुंच सकती है और धन अर्जित कर सकती है, तो कभी कलाकार का काफी पैसा लगने के बाद भी असफल हो सकती है। किसी लेबल, कंपनी या प्रकाशक के ना होने के कारण इंडी रचनाओं में कलाकार पर उसके दिमाग में उपजे विचारों को बाजार के हिसाब से बदलने का दबाव कम हो जाता है। वहीं कभी-कभी अपनी मर्ज़ी चलने का घाटा यह होता है कि जनता कलाकार के विज़न को पूरी तरह समझ नही पाती। मुझे लगता है हर लेखक, कवि या कलाकार को इंडी चरण से गुज़ारना ही चाहिए, सीधे किसी बड़े लेबल से चिपकना भी अच्छा नहीं। अपनी कला के विकास के लिए तो स्वत्रंत रहकर अलग-अलग शैलियों, स्थितियों और अन्य कलाकारों के साथ प्रयोग करना बेहद आवश्यक है। ऐसा करने से व्यक्ति को पता चलता है कि उसे अपना समय किन बातों में देना चाहिए और किन बातों में उसकी मेहनत अधिक लगती है पर परिणाम कम आता है। जैसे लेखन में ही दर्जनों शैलियाँ हैं, कहने को तो लेखक सबमे लिख ले पर किनमें उसे सहजता है और किन शैलियों के संगम में वह कमाल करता है ये बातें धीरे-धीरे प्रयोग करते रहने से ही समझ आती है। कई मामलों में कम बजट वाली छोटी कंपनियों के लेबल के साथ प्रकाशित हुए काम को कम मुनाफे और पहुँच की वजह से इंडी श्रेणी में रखा जाता है।

अब भाग्य के फेर से कुछ लोग इंडी चरण में कुछ समय के लिए नाम को आते हैं और सीधा बड़ा टिकेट पाते हैं। जबकि कई इक्का-दुक्का मौको को छोड़ कर जीवनभर इंडी रह जाते हैं। कला का स्तर और कीमत सामने खड़े व्यक्ति के नज़रिये पर निर्भर करता है, फिर भी अगर 100 में से 70 से अधिक लोग किसी चीज़ पर एक राय रखते हैं तो उसको एक मापदंड माना जा सकता है। मापदंड ये कि यह कलाकृतियां, रचनाएं क्या पैसा कमा पाएंगी या नहीं। यह सवाल कई कलाकारों को दुख देता है लेकिन इसका सामना सबको करना पड़ता है बशर्ते आपकी पैतृक संपत्ति भयंकर हो या आप मनमौजी कलाकार हो, जो एक के बाद एक रचना निर्माण में मगन रहता है। पैसा आये तो अच्छा, पैसा ना आये तो खाना तो मिल ही रहा है! मनमौजी कलाकारों को भगवान् तेज़ स्मृति देते हैं जो सारी की सारी वो अपने काम में लगा देते हैं। उन्हें आस-पास की दुनिया में हुए पिछले क्षण चाहे याद ना हों पर 11 वर्ष पहले अगर उन्होंने कोई आईडिया कहीं इस्तेमाल किया तो उसमे क्या दिमागी दांव-पेंच हुए और क्या परिणाम आया सब याद रहेगा। अक्सर पैसों और मार्गदर्शन के अभाव में कई आर्टिस्ट संघर्ष के शुरुआती वर्षों में ही कोई और राह चुन लेते हैं, फिर कुछ ऐसे हैं जो कला से संन्यास तो नहीं होते पर सेमी-रिटायर होकर कभी-कभार कुछ काम दिखा देते हैं। ये कलाकार अपने जैसे अन्य कलाकारों, लेखको को पसंद करते हैं पर अपने क्षेत्र और हरदम मस्तिष्क के रचनात्मक जाल में उलझे होने के कारण ढंग से प्रोत्साहित नहीं कर पाते हैं। स्वयं पर निर्भर होने के कारण सफलता मिलने में अधिक समय लगता है। जो लोग पैसे को प्राथमिकताओं में नही रखते उनके लिए रास्ता मुश्किल है। धन से आप अपनी रचनाओं की पहुंच परिवर्धित कर सकते हैं, पैसे के साथ आप सिर्फ अपनी कला पर ध्यान लगा सकते हैं, नही तो एक बार का दाल-पेट्रोल का भाव नापने में आपके 4 आईडिया सुसाइड कर लेंगे। अपने कलात्मक सफर के बीच-बीच में एक नज़र आर्थिक पहलुओं पर रखना फायदे का सौदा है।

आप सभी से निवेदन है कि अपनी रूचि के विषयों में सक्रीय इंडी लेखको, कलाकारों के बारे में अधिक से अधिक जानकारी जुटाएं, उस जानकारी के आधार पर उनकी रचना, किताबें, कलाकृतियां खरीदकर, खरीदने में सक्षम नही तो अन्य लोगो को बताकर इन कलाकारों के विकास में अपना सहयोग दें।

============

कॉमिक्स फैन फिक्शन लेखकों के लिए कुछ सुझाव – मोहित शर्मा ज़हन

« Older entries