सिर्फ मर्सिडीज़ ही चाहिए? (लेख) #मोहितपन

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जब से लेखन, कला, कॉमिक्स कम्युनिटीज़ में सक्रीय हूँ तो ऑनलाइन और असल जीवन में कई लेखकों, कलाकारों से मिलने का मौका मिला है। एक बात जो मैं नये रचनाकारों को अक्सर समझाता हूँ वो आज इस लेख में साझा कर रहा हूँ।

3-4 साल पहले एक युवा कवि/लेखक ने मेरे ब्लॉग्स पढ़कर मुझसे संपर्क किया और हम ऑनलाइन मित्र बन गये। कुछ समय तक उनके काव्य, कहानियां पढ़ने को मिली फिर वो गायब से हो गये। वो अकेले ऐसे उदाहरण नहीं हैं, पिछले 11 वर्षों में कई प्रतिभावान लेखक, कलाकार यूँ नज़र से ओझल हुए। निराशा होती है कि एक अच्छे कलाकार को पता नहीं क्या बात लील गयी….कहने को तो व्यक्ति के वश से बाहर जीवन में कई बातें उसे रचनात्मक पथ से दूर धकेल सकती हैं पर एक कारक है जिसके चलते कई हार मान चुके कलाकार अपना क्षेत्र छोड़ देते हैं। एक लेखक का उदाहरण देकर समझाता हूँ। मान लीजिए नये लेखक को ऑनलाइन मैगज़ीन के लिए लिखने का मौका मिला, उसने मना कर दिया। मैगज़ीन पेज पर 700 फॉलोवर और प्रति संस्करण 450 डाउनलोड वाली ऑनलाइन पत्रिका पर वह अपना समय और एक आईडिया क्यों बर्बाद करे? इस क्रम में लेखक ने कई वेबसाइट को ठेंगा दिखाया कि वो उसके स्तर की नहीं। चलो सही है, थोड़े समय बाद उसे एक स्थानीय प्रिंट मैगज़ीन या अखबार में कुछ भेजने को कहा गया फिर उसने समझाया – जो प्रकाशन 2-3 शहरों तक सीमित हो उसमे छपना भी क्या छपना। पब्लिश हो तो इस तरह कि दुनिया हिल जाए! हम्म…. कुछ अंतराल बाद इनके किसी मित्र को लेखन अच्छा लगा तो अपनी शार्ट फिल्म के लिए स्क्रिप्ट की बात करने आया। जवाब फिर से ना और मन में (“अबे हट! ऐसे वेल्ले लोगो की फिल्म थोड़े ही लिखूंगा, सीधा चेतन भगत की तरह एंट्री मारूंगा।”) और इस तरह मौके आते गये-जाते गये। अब ऐसे लेखक, कवि और कलाकार एक समय बाद भाग्य को दोष देकर हार मान लेते हैं और इनकी ऑनलाइन गिनी चुनी रचना पड़ी मिलती हैं और इनके मेल ड्राफ्ट्स में डेढ़-दो सौ आईडिया सेव होते हैं जो कभी दुनिया के सामने नहीं आते क्योकि इन्हे एक खुशफ़हमी होती है कि ये जन्मजात आम दुनिया से ऊपर पैदा हुए हैं तो आम दुनिया जैसी मज़दूरी किये बिना ये डायरेक्ट सलमान खान, ऋतिक रोशन के लिए फिल्म लिखेंगे या 90 के दशक के वेद प्रकाश शर्मा जी की तरह एक के बाद एक बेस्टसेलर किताबें बेचेंगे। मतलब खरीदेंगे तो सीधा मर्सिडीज़ बीच में साइकिल, बाइक, मारुती 800, वैगन आर, हौंडा सिटी लेने का मौका मिलेगा भी तो भाड़ में जाए….ऐसा नहीं करेंगे तो बादशाह सलामत की शान में गुस्ताखी हो जायेगी ना!

अरे! स्टेटस या अहं की बात बनाने के बजाए ऐसे छोटे मौकों को आगे मिलने वाले बड़े अवसरों के पायदान और अभ्यास की तरह लीजिए। अगर आप वाकई अपने जुनून के लिए कुछ रचनात्मक कर रहे हैं तो इन बातों का असर तो वैसे भी नहीं पड़ना चाहिए। मंज़िल के साथ-साथ यह ध्यान रखें कि आप सफर में धीमे ही सही पर आगे बढ़ रहे हैं या नहीं। आप कलात्मक क्षेत्र में जिन्हे भी अपना आदर्श मानते हैं उनकी जीवनी खंगालें, लगभग सभी का सफर ऐसे छोटे अवसरों से मिले धक्के से बड़े लक्ष्य तक पहुँचा मिलेगा। हाँ, अपनी प्राथमिकताएं सही रखें, ऐसा ना हो कि सामने कोई बड़ा अवसर मिले और आप किसी बेमतलब की चीज़ में प्रोक्रैसटीनेट कर रहे हों। संतुलन बिगड़ने मत दीजिये और खुद पर विश्वास बनाये रखें। गुड लक!

#ज़हन

Posted by Mohit Sharma

जीत का समझौता (कहानी)

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इंटरकॉन्टिनेंटल कप के पहले दौर में हारकर बाहर होने के बाद पापुआ न्यू गिनी क्रिकेट खेमे के एक कोने में 2 खिलाडियों के बीच गंभीर वार्ता चल रही थी।

“आप जब खुद यह टीम नहीं छोड़ रहे हैं तो मुझसे ऐसा करने के लिए क्यों कह रहे हैं?” परेशान होकर मेज़ के कोने को मसलने की कोशिश करते क्रिकेटर पॉल ने अपने गुरु जैसे सीनियर जिम्मी से पूछा।

जिम्मी सोच रहा था कि किस तरह ऐसे वाक्य गढ़े जो पॉल की चिंता को कम करें। फिर अपने निर्णय का ध्यान करते हुए वह बोला – “मुझे पापुआ न्यू गिनी में क्रिकेट का भविष्य नहीं दिखता। बाहर निजी क्रिकेट लीग्स में तुम जैसे खिलाडियों को अच्छे अवसर मिलते हैं।”

पॉल – “आप मुझसे बेहतर क्रिकेट खेलते हैं। तो अकेले मेरे जाने का क्या मतलब?”

जिम्मी – “बात को समझो पॉल! तुम अभी से बाहर जाकर संघर्ष करोगे तब जाकर कुछ सालों बाद उसका फल मिलेगा। यहाँ से निकलने में जितनी देर करोगे उतना ही बाहर की लीग्स में सफल होने की सम्भावना कम हो जायेगी। दो साल बाद वर्ल्ड कप क्वालिफाइंग टूर्नामेंट है, जिसमे पापुआ न्यू गिनी के जीतने की और अपना एक दिवसीय दर्जा बचाने की ना के बराबर उम्मीद है। मैंने किशोरावस्था से 2 दशक से अधिक इस देश के क्रिकेट में लगाएं हैं। ना के बराबर ही सही पर दशमलव में कुछ उम्मीद तो है? बस उसी के लिए रुका हूँ…पर तुम्हे यह सलाह नहीं दूंगा।”

पॉल – “आप मेरे आदर्श रहे हैं…”

जिम्मी – “मुझे अपना आदर्श क्रिकेट मैदान के अंदर तक मानो, उसके बाहर अपनी स्थिति अनुसार बातों को समझो और करो। तुम देश के बाहर जाकर किसी विदेशी टीम में नाम कमाओगे तो भी इसी देश के वासी कहलाओगे, इस धरती का नाम रोशन करोगे, क्रिकेट के टैलेंट स्काउट्स तुम्हारे नाम का हवाला देकर यहाँ नए खिलाड़ी खोजने आयेंगे। हारे हुए संघर्ष से बेहतर जीता हुआ समझौता है।”

पॉल के झुके सिर को हामी में हिलता देख जिम्मी ने खुद को दिलासा दिया कि इस डूबते जहाज़ से उसने एक यात्री को बचा ही लिया।

समाप्त!

#ज़हन

Jug Jug Maro #2 – Nashedi Aurat (Alcoholic Woman)

Cover

 जुग जुग मरो #2
नशे, दारु की लथ में अपना पति खो चुकी औरत नशे में ही उसे ढूँढ रही है और पूछ रही है ऐसी क्या ख़ास बात है नशे में जो कितनी आसानी से कितनी ज़िन्दगीयां लील लेता है। इस बार एक कविता और एक नज़्म के साथ पेश है – नशेड़ी औरत! (काव्य कॉमिक्स)
Illustrator – Amit Albert
Poet, Script – Mohit Trendster
Colorist – Harendra Saini
Letterer – Youdhveer Singh

Read or Download 
(Combined Part 1-2 Ecomic available on Google Play, Google Books, Readhwhere, Dailyhunt, Scribd, AuthorStream, ISSUU, Archives and other major ebook websites)

अंतर (लघु कहानी) #ज़हन

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पुलिस निरीक्षक शलभ कुमार को टी.ए. अलाउंस भरते देखे उनके साथी ने उन्हें टोका।

“क्या यार जब देखो कोई ना कोई फॉर्म भरते रहते हो या साहब के दफ्तर भागते रहते हो। साल भर के काम की रेटिंग में 2-4 नंबर ज़्यादा पा जाओगे तो कहाँ तीर मार लोगे। तुम भी यहीं उतनी दौड़-भाग कर रहे हो और बाकी तुम्हारे समकक्ष लोग भी। थोड़ा एन्जॉय करो लाइफ! अब तक 50 बार फॉर्म भरते देखा होगा तुम्हे जिसमे से सालों बाद कोई एक-दो अलाउंस मिला होगा डेढ़-दो हज़ार का, इस से बढ़िया रिलैक्स करते। सरकारी नौकरी है, सब सेट है और क्या चाहिए?”

शलभ ने हँस कर बात टाल दी। कुछ वर्षो बाद जब शलभ का बैच सेवानिवृत्त होने वाला था तब उसके साथ के सभी अधिकारी उस से एक या दो रैंक नीचे थे, साथ ही शलभ की पेंशन उनके कई साथियों से 15-20 हज़ार रुपये प्रति माह अधिक तय होने वाली थी। 37 वर्षों की नौकरी में हर वर्ष जो 2-3 नंबर, इंसेंटिव शलभ ने बिना कोताही जुटाये थे उसका फल उसे अब मिल रहा था। उस बैच के कुछ अफसर अपनी पेंशन 3-4 हज़ार बढ़वाने की उम्मीद में  नौकरी के अंतिम महीनो में रिकॉर्ड की नेगेटिव एंट्रीज़ हटाने की भाग-दौड़ में लगे हुए थे।

समाप्त!

#mohitness #mohit_trendster

माहौल बनाना (कहानी) #ज़हन

15578850_1199889026770473_6364765217519918854_nArt – Harikant Dubey

वृद्ध लेखक रंजीत शुक्ला की अपने पोते हरमन से बहुत जमती थी। जहाँ नयी पीढ़ी के पास अपनों के अलावा हर किसी के लिए समय होता है वहाँ हरमन का रोज़ अपने दादा जी के साथ समय बिताना जानने वालो के लिए एक सुखद आश्चर्य था। बातों से बातें निकलती और लंबी चर्चा खिंचती चली जाती। एक दिन हरमन ने रंजीत से पूछा कि उन्हें अपने जीवन में किस चीज़ का मलाल है।

रंजीत गंभीर मुद्रा में कुछ सोचकर बोले – “कठिन सवाल है! इतने वर्षो में जाने कितनी गलतियाँ की हैं जिनपर सोचता हूँ कि उस समय कोई और निर्णय लिया होता तो अबतक जीवन कितना अलग होता फिर सोचता हूँ कि जिन बातों पर पछता रहा हूँ अगर वो ना की होती तो क्या आज, अबतक ‘मैं’ वाकई ‘मैं’ रहता? एक राह चुनने पर दूसरी राहों को छोड़ने का मलाल स्वाभाविक है।”

हरमन – “यानी मलाल हैं भी और नहीं भी? बड़ी अजीब स्थिति हो गयी ये तो। मुझे लगा जीवन के इस पड़ाव पर आपका हर जवाब निश्चित हो गया होगा।”

रंजीत – “वैसे एक चीज़ और रह गई। अपनी ज़िन्दगी के एक बड़े हिस्से मेरी एक आदत के कारण मैंने अनेक अवसर गंवाएं होंगे। वो आदत थी, किसी भी काम को करने के लिए माहौल बनाने की आदत।”

हरमन – “मैं समझा नहीं! माहौल मतलब?”

रंजीत – “मतलब हर बड़े काम को करने या महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले सभी बातें मेरे अनुकूल बनाने या उनके अनुकूल होने का इंतज़ार करना। मान लो मुझे कार खरीदनी है। तो कभी मार्किट के ठीक होने का इंतज़ार करना, कभी नौकरी बदलने या प्रमोशन की बाट जोहना, कभी सोचना इस शहर के हिसाब से मेरी पसंद की गाडी ठीक नहीं…एक बात को इतना टाल देना कि या तो वो साकार ही ना हो पाए या उसके पूरे होने पर मज़ा ना आये, एक अधूरापन लगे। इसी तरह किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में, घर लेने के निर्णय में, कोई किताब शुरू करने से पहले या निवेश में सभी आंतरिक और बाहरी घटकों के मेरे हिसाब से हो जाने का इंतज़ार करना। कभी कभार ऐसा करना गलत नहीं पर इसे एक आदत बना लेने से हम अपनी मेहनत से अधिक अपने भाग्य के भरोसे बैठ जाते हैं क्योकि जो बस के बाहर है उस स्थिति पर मन मसोस कर रह जाना सही नहीं।”

हरमन – “चलिए, मैं आज यह शपथ लेता हूँ कि पार्टी के अलावा कहीं माहौल नहीं बनाऊंगा…हा हा हा।”

समाप्त!

#mohitness #mohit_trendster

Acid Attack Painting with Artist Jyoti Singh

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Painting Theme: Acid Attack with Artist Jyoti Singh, 30×30 inch, Oil on Canvas. #concept #art #painting #brainstorming #acidattacks #canvas #oilpainting

रंग का मोल (कहानी) #ज़हन

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आज भारत और नेपाल में हो रहीं 2 शादियों में एक अनोखा बंधन था।

दिव्यांशी अपने सांवले रंग को लेकर चिंतित रहती थी। सारे जतन करने बाद भी उसका रंग उसकी संतुष्टि लायक नहीं हुआ। दिव्यांशी का मीनिया इस हद तक पहुँच गया था कि वह अवसाद में चली गई। कुछ समय पहले एक नए इलाज के लिए एजेंट को अपना ब्लड ग्रुप, मेडिकल जानकारी देते समय दिव्यांशी के परिवार को ज़्यादा उम्मीद तो नहीं थी पर बच्ची की ज़िद और दिल की तसल्ली के लिए सेठ विभूतिचंद ने यह कदम उठाया।

फिर तुरंत ही पता चला कि दिव्यांशी के ब्लड ग्रुप से मिलती एक गोरी नेपाली लड़की राज़ी हुई है जिसकी पीठ और पेट से खाल निकाल कर दिव्यांशी के चेहरे, गर्दन और कुछ अन्य हिस्सो पर ग्राफ्ट की जा सकती है। नेपाली एजेंट को 2 लाख रुपये देकर, ऑपरेशन द्वारा दिव्यांशी के चेहरे, गर्दन, कंधो और हाथों-पैरों पर नेपाली लड़की की उजली खाल चढ़ा दी गयी। अपने अवसाद, हीनभावना और इस कदम के लिए दिव्यांशी और उसका परिवार आसानी से समाज को दोष दे सकता है और हर सुनने वाला उनकी हाँ में हाँ मिला देगा या ये लोग खुद को खंगाल कर अपना खोखलापन देख सकते हैं।

इस सौदे से बॉर्डर के इस तरफ ख़रीदे आत्मविश्वास से परिपूर्ण दिव्यांशी की शादी हो रही थी और उस तरफ नेपाली एजेंट की लड़की की शादी हो रही थी…और हाँ, अपनी खाल देने वाली नेपाली लड़की को भी 10 हज़ार रुपये मिल गए।

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सपने दिखा कर सपनो का क़त्ल कर दिया,
दुनिया का वास्ता देकर दुनिया ने ठग लिया!
फिर किसी महफ़िल के शौक गिना दो,
रंग का मोल लगा लो,
उजली चमड़ी की बोली लगा दो,
फिर कुतर-कुतर खाल के टुकड़े खा लो,
बचे-खुचे शरीर पर हँसकर एक और गुड़िया का ज़मीर डिगा दो!

तेरा भी कहाँ पाला पड़ गया?
…या तो इनमे शामिल हो जाना,
या फिर कोई सही मुहूर्त देखकर आना…
ये लोग लाश की अंगीठी पर रोटी सेंकते हैं….
और रूह की जगह रंग देखते हैं।

समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन #mohitness

दूजी कोख में ‘अपना’ बच्चा (कहानी)#mohit_trendster

16996194_1615098958500151_2594940295463977680_nArtwork – Kishore Ghosh

“यह सर राजस्थान कहाँ पैसे भेज रहे हैं पिछले कुछ समय से? किसी कोर्ट केस में फँस गए क्या? इतने सालो से विदित सर के साथ हूँ, ऐसा कुछ छुपाते तो नहीं हैं वो मुझसे।” स्टील व कपडा उद्योगपति पंकज जाधव के अकाउंटेंट सुमंत ने उनके सेक्रेटरी कुणाल से पूछा।

कुणाल को तो जैसे यह बात बाँटने का बहाना चाहिए था। “एक औरत ब्लैकमेल कर रही है सर को…”

सुमंत ने उत्साह में कुणाल की बात काट कर उसका आधा वाक्य खा लिया।

सुमंत – “ओह! अपने सर भी गलत आदमी निकले! यह समझ नहीं आया कि मुझसे इनकी ये आदत अबतक छुपी कैसे रही?”

कुणाल – “सुमंत के बच्चे, बात तो पूरी करने दिया कर। वो औरत सर और रुचिका मैम दोनों को ब्लैकमेल कर रही है। सरोगेसी का मामला है।”

सुमंत – “सॉरी भाई, बात ऐसी थी कि रहा नहीं गया। सरोगेसी यानी किसी और औरत की कोख से अपना बच्चा करवाना? बेचारी रुचिका मैडम…”

कुणाल – “बेचारी नहीं हैं तभी तो ब्लैकमेल किया जा रहा है। मैंने इनकी बातें सुनी हैं, पंकज सर और मैम दोनों पूरी तरह ठीक हैं और बच्चा कर सकते थे पर मैडम 9 महीनो की टेंशन और बच्चा जनने का दर्द नहीं सहना चाहती थी। बच्चे के बाद बिगड़ने वाले फिगर की भी रुचिका मैम को चिंता थी, तो दोनों ने IVF तकनीक से अपने शुक्राणु-अंडाणु से बना भ्रूण एक राजस्थानी औरत की किराये पर खरीदी कोख में रखवा दिया। 9 महीने बाद प्राकृतिक रूप से इनके अंश का बच्चा, दोनों के डीएनए के गुण लेकर जन्म लेता जिसका जन्म देने वाली सरोगेट माँ से कोई नाता नहीं होता। इस काम में जिस एजेंट ने इनकी मदद की थी जब उसको पंकज सर के बड़े बिज़नस के बारे में पता चला तो उसने उस औरत को भड़काया कि ‘देख देश का इतना बड़ा व्यापारी 9 महीने के कष्ट के कितने कम पैसे दे रहा है तुझे’, फिर उस औरत ने इन्हें कोर्ट, मीडिया में जाने की धमकी दी। अब बच्चा होने में 2 महीने हैं, बात बाहर निकलेगी तो जनता में इनकी इमेज धूमिल हो जाएगी। दूर के ही सही नाते-रिश्तेदारो को जो रुचिका मैम की झूठी प्रेगनेंसी की बात बता रखी है उसपर दर्जनों बाते होंगी सो अलग, इसलिए हर हफ्ते लाखो रूपया भेजा जा रहा है।”

सुमंत – “इतना झंझट करने की ज़रुरत ही क्या थी? इस से अच्छा तो किसी बेचारे अनाथ बच्चे या बच्ची को गोद ले लेते।”

कुणाल – “तू बहुत भोला है यार! वो अनाथ बच्चा इनका ‘अपना’ थोड़े ही होता।”

समाप्त!

#मोहित_शर्मा_ज़हन

Read Parallel (Terminal Tributaries) – Vibhuti Dabral, Mohit Trendster

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छूटी डोर (कहानी)

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हिन्दी, अंग्रेजी साहित्य के बहुत बड़े समीक्षक-आलोचक, अनुवादक श्री अनूप चौबे का टी.वी. साक्षात्कार चल रहा था। साक्षात्कारकर्ता अनूप के पुराने मित्र नकुल प्रसाद थे। कुछ सवालो बाद नकुल को एक बात याद आ गई और अपने साथ लाये सवालो के बीच उन्होंने एक सवाल रखा।

“आपने पहले कई बार अपना उपन्यास, कथा/काव्य संग्रह लिखने की मंशा मुझसे साझा की थी। उस बारे में कुछ बताएं?”

हालाँकि, यह इंटरव्यू लाइव नहीं था पर चौबे जी असहज हो गए। कुछ संभलने के बाद उन्होंने फिर बोलना शुरू किया।

“वर्षो तक एक के बाद एक ना जाने कितनी कहानियों, कविताओं और उपन्यासों को पास से देखा। कई बार तो किसी रचना के लेखक, कवि से अधिक उस रचना के साथ समय बिताया। दूसरो के गढ़े काल्पनिक जगत में गलतियां, कमियां निकालने का जूनून पता नहीं कब आदत में बदल गया। एक समीक्षक की तरह लिखना या अनुवाद करना अलग है पर जब भी लेखक की तरह कुछ लिखता हूँ तो मेरी यह आदत किसी मीनिया की तरह मेरा पीछा करती है। अपनी कल्पना के कुछ वाक्य पूरे करते ही मन उनपर अपना नकारात्मक फरमान सुना देता है। अपना लिखा मेरी नज़र से कभी पास हो ही नहीं पाता है जो किसी और तक पहुँच पाये। कभी-कभी तो रात में उठकर पिछले दिन लिखे पन्ने फाड़े हैं ताकि चैन से सो सकूँ।”

नकुल प्रसाद – “ओह! क्षमा चाहता हूँ! मुझे यह स्थिति पता नहीं थी। आप चिंता मत कीजिये, मैं वो सवाल और आपकी प्रतिक्रिया एडिट करवा दूंगा।”

अनूप चौबे – “कोई बात नहीं…अगर मैंने यह क्षेत्र ना चुना होता तो शायद मैं अच्छा साहित्य लिख पाता क्योकि सच कहूँ तो रचना की अपूर्णता, उसकी कमियां ही उसका साज-श्रृंगार हैं। ऐसी बातें ही रचना की एक अलग छाप बनाती हैं। आपने देखा होगा कैसे कोई अपने चेहरे की कमी बताता है और उसकी वही चीज़ जिसे वह कमी मानता है अक्सर लोगो को पसंद आती है। सबसे बड़ी रचनाकार प्रकृति जो हमे मरते दम तक अपनी कलाकृतियों से विस्मित करती है, में पूर्णता से दूर अनगिनत छूटी डोर हैं। साहित्य में सामाजिक दायरे की फ्रीक्वेंसी पर सेट दिमागी पैमाने को संतुष्ट करना असंभव है। चलिए कोई बात नहीं, यह जन्म इस रोल में ही सही…”
समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन

Read सुविधानुसार न्यूक्लीयर परिवार (कहानी)

Kavya Comic #12 – Kadr (कद्र)

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Deepjoy Subba (Illustrator), Mohit Sharma (Writer-Poet), Harendra Saini (Colorist), Youdhveer Singh (Letterer), Cover Artist – James Boswell

Intro Poem (2016), Comic Poem (2007), Cover Art (1939)

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बेटा जब बड़े हो जाओगे….
बेटा जब बड़े हो जाओगे ना…
…और कभी अपना प्रयास निरर्थक लगें,
तो मुरझाये पत्तो की रेखाओं से चटख रंग का महत्त्व मांग लेना।
जब जीवन कुछ सरल लगे,
तो बरसात की तैयारी में मगन कीड़ो से चिंता जान लेना।

बेटा जब बड़े हो जाओगे ना…
…और कभी दुख का पहाड़ टूट पड़े,
तो कड़ी धूप में कूकती कोयल में उम्मीद सुन लेना।
जब सामने कोई बड़ी चुनौती मिले,
तो युद्ध में घायल सैनिक से साँसों की कीमत जांच लेना।

बेटा जब बड़े हो जाओगे ना…
…और कभी अहंकार का दंश चुभे,
तो सागर का एक छोर नाप लेना।
जब कहीं विश्वास डिगने लगे,
तो कुत्ते की आँखों से वफादारी नेक लेना।
कभी दुनिया का मोल पता ना चले,
गुरु की चिता पर बिलखते शिष्य में कद्र सीख लेना।

बेटा जब मेरी याद आये…
…तो अपने बच्चे को छाँव देती किसी भी माँ में मुझे देख लेना।

#ज़हन
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कद्र (काव्य कॉमिक) अब Culture POPcorn वेबसाइट, Google Books-Play, Archives, Issuu, Ebooks Daily, Comicverse आदि पर उपलब्ध।

http://www.culturepopcorn.com/kadr-kavya-comic-web-comic/

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