सुविधानुसार न्यूक्लीयर परिवार (कहानी)

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अपने छोटे कस्बे से दूर सपनो के सागर में गोते लगाता एक रीमा और मनोज का जोड़ा बड़े शहर के कबूतरखाना स्टाइल अपार्टमेंट में आ बसा। जितना व्यक्ति ईश्वर से मांगता है उतना उसे कभी मिलता नहीं या यूँ कहें की अगर मिलता है तो माँगने वाले की नई इच्छाएं बढ़ जाती है। कुछ ऐसा ही इस दम्पति के साथ हुआ, सोचा कितना कुछ और हाथ आया ज़रा सा…वैसे यह ‘ज़रा सा’ भी करोडो के लिए किसी सपने जैसा होता पर कहता हैं ना 99 का फेर मौत तक पीछा नहीं छोड़ता।

दोनों को ही अपने बड़े संयुक्त परिवारों से परहेज था। तीज-त्यौहार पर घर जाना या घर से किसी का इनसे मिलने आना इन्हें हफ़्तों पहले ही चिंता में डाल देता था। मनोज के घर को दोनों सर्कस कहते थे और रीमा के घर को बाराबंकी बाजार। इन दोनों को लगता था कि परिवार के लोग इनके कभी काम नहीं आते जबकि ये हर महीने – महीने में उनका कोई छोटा-मोटा काम कर देते थे। जबकि ऐसा था नहीं, बस सुविधानुसार जब इनसे जुड़ा कोई काम जैसे मकान की रजिस्ट्री, गाडी फंसने पर थाने फ़ोन कर छुड़वाना आदि किसी घरवाले द्वारा किया जाता था तो ये दोनों उसे काम मानते ही नहीं थे।

ऑफिस की तरफ से वनकल वन्य अभयारण्य में घूम रहे रीमा-मनोज का उनके गाइड और ड्राइवर समेत एक उग्रवादी संघठन द्वारा अपहरण कर लिया जाता है। उस संघठन ने हाल ही में अपनी माँगो के लिए कुछ हत्याएं की थी। बंधक अपने भाग्य को कोस ही रहें होते हैं कि तभी एक आवाज़ आती है….

“अरे फूफा जी! चरण स्पर्श, कैसे हो आप?”
मनोज की फ्रीज़ मुद्रा अभी टूटने में समय लगता तो रीमा बोल पड़ी – “जीता रह कुन्नू बेटे! कितना बड़ा हो गया तू…16 साल का!”
कुन्नू – “आप लोग यहाँ कैसे?”
मनोज – “बेटा तेरी बुआ जी ने पता नहीं कौन सी सरिता-गृहशोभा में सेकंड हनीमून का पढ़ लिया तबसे मेरे कान खा लिए। फिर ऑफिस से यह टूर मिला तो आ गए। तू इस सब में….”

रीमा ने अपने पति को इतनी जोर की कोहनी मारी कि उसके मुँह से आगे की बात निकली ही नहीं। ज़्यादा बात होती उस से पहले ही वहाँ नक्सल विरोधी फ़ोर्स का हमला हो गया। डिप्टी कमांडर कुन्नू ने अपनी बुआ जी और फूफा जी को खतरे से अपनी जान पर खेल कर निकलवाया। इस गोलाबारी में रीमा घायल हो गयी, घायलो को लाया गया शहर के अस्पताल। यहाँ डॉक्टर मनोज के कजिन निकले जिस वजह से इलाज में रीमा को प्राथमिकता मिली। गोली के असर से रीमा की किडनी फेल हो गई और उसे नई किडनी की ज़रुरत थी। अब रीमा के ‘बाराबंकी बाजार’ से उसकी चाची जी काम आयीं और रीमा को समय पर किडनी मिल गयी।

एक दिन आराम से अपने कबूतरखाने की निन्नी सी बालकनी में चाय पीते हुए दोनों ने आँखों में ही एक-दूसरे से जैसे कहा हमारे ‘सर्कस’ या ‘बाराबंकी बाजार’ से हमे कितना कुछ मिलता है पर सुविधानुसार हम अपनी तरफ से किये गए काम याद रखते हैं और वहाँ से मिला सहारा हम कभी देखना ही नहीं चाहते। अब दोनों फिजियोथेरेपी और स्ट्रेस, डिप्रेशन कम करने के लिए साइकैट्री इलाज करवा रहें हैं….हाँ, वो डॉक्टर भी परिवार वाले या उनकी जान पहचान के निकल आये हैं।

समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन

Artwork by Kenwood J. Huh

Yasni Database

Micro Fiction Experiments – 4 & 5 #trendster

*) – कुछ खिलाडी असल रिकार्ड्स की जगह सिर्फ घरेलु, जूनियर्स लेवल और किवदंतियों का हिस्सा बनने के लिए दुनिया में आते है। हाँ…ये बात और है जिसने भी उन्हें खेलते देखा, वो उन्हें कभी भुला नहीं सका।

*) – जब फिटनेस थी तब अक़्ल का अकाल था। अब अक़्ल आयी तो शरीर पेट कटा ष सा हो लिया…भक!

*) – कहने को तो रजत पदक, कांस्य पदक से ऊपर माना जाता है पर मेडल सेरेमनी के बाद पता नहीं क्यों कांस्य पदक अर्जित करने वाले खिलाडी की नींद मिलीसेकेंड, आधे पॉइंट् को याद कर करवट बदलते रजत पदक जीतने वालो से गहरी होती है। सबसे बदतर स्थिति, सेमीफाइनल में आकर पदकरहित रहने वालों को तो भैया पूरे मोहल्ले की अनिद्रा एकसाथ लग जाती है।

*) – टीम के वर्ल्ड कप फाइनल में पहुँचने का ऐसा जश्न मनाया कि नाच-नाच में टीम के MVP का कंधा डिस्लोकेट हो गया और बाद में उसकी अनुपस्तिथि में कप हारे सो अलग। बन ली नचनियां?… ले ले कददू अब…हप!

*) – कल जो अपने प्रशंषको को अक्सर अपनी सिक्योरिटी से पिटवा दिया करता था, आज अपने धूमिल चर्चों के पुराने अख़बारों की कटिंग फेसबुक-ट्विटर पर बड़ी शिद्दत से स्कैन करके डालता है।

*) – एक औसत देश में पैदा हुआ विश्वस्तरीय खिलाडी अक्सर किसी विश्वस्तरीय (मापदंड देने वाले) देश में पैदा हुए औसत खिलाडी से हार जाया करता है।

*) – कुछ लोग अपने 5-7 प्रदर्शनों के बल पर सुपरस्टार्स बन जाते है जबकि कई पूरे करियर मज़दूरों की तरह तिनका-तिनका यश-सम्मान बटोरते है।

*) – इंसान के एक से अधिक पसंदीदा खेल होने चाहिए। अगर किसी खेल में निराशाजनक सीज़न चल रहा हो तो अन्य जगह से कुछ दिलासा सा मिल जावे।

*) – इस खेल में चोटिल होना आम बात है, पर बीच मैदान में उसकी चीत्कार बता रही थी कि वो चोट अलग थी। करियर का क़त्ल करने वाली विरल चोट!

*) – अगर वो 35 साल तक रिटायर होती तो महान खिलाडी कहलाती पर 42 वर्ष तक खेल को घसीट कर उसने अपने सर्वोत्तम रिकॉर्ड को साधारण बना डाला।

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Micro Fiction Experiment # 05 (सपने वाले अंकल जी)

एक रात वृद्ध अंकल जी को अचानक सपने दिखने लगे।

रंग-बिरंगे, प्रकृति के, खेल-खिलोनो के, बच्चो के, समुद्र के, युद्ध के, मौसम के, अश्लील वाले, यात्रा के और विभिन्न विजुअल्स।

सपने उन्हें आते थे कभी कबार पर इतने अधिक और इस तरह के रोलरकोस्टर दृष्टांत तो कतई नहीं।

अंदाज़ लगाया कि शायद ईश्वर ने उन्हें मरने से पहले अपने आस-पास मौजूद दूसरो के सपने देखने की शक्ति दी है, चलो इस बहाने रोज़ नींद में ही सही कुछ मनोरंजन हो जाएगा।

ध्यान केंद्रित कर उन्होंने किसी भी व्यक्ति के नये-पुराने सपने पढ़ने की शक्ति अर्जित कर ली, चलो इस बहाने संपत्ति का अधिक हिस्सा किसे दूँ यह निर्णय हो जाएगा।

पहले बेटे के सपने नीरस थे, हुंह जैसे ये कुछ नहीं बोलता वैसे ही इसके सपने भी बोगस। छोटे बेटे के सपने देखता हूँ, वो मुझे बहुत प्यार और सम्मान देता है।

अरी मईया! पहले ही सपने में मेरी चिता जला कर उसके अराउंड शादी के फेरे ले रहा है। अब ना देने का इसे रुड़की वाला प्लाट।

छोटे बेटे के कई सपनो में बूढ़े अंकल ने अपनी मौत, पिटाई, बेइज़्ज़ती देखी।

वैसे तो बड़ा भी कुछ ख़ास नहीं पर लुच्चो की इस टक्कर में कुछ दशमलव अंको से मैं उसे जिताता हूँ। ज़्यादा संपत्ति बड़े को, बाकी थोड़ा बहुत हिस्सा राम गोपाल वर्मा के उस विकृत रूप, मेरे छोटे बेटे को।

अंकल ये भी हो सकता था कि आपके छोटे बेटे को मनोविज्ञान, अपराध, डार्क आदि विषयों में रूचि हो और आप उसके दिल के सबसे करीब होने के कारण उसके विकृत ख्वाबों में कहीं ना कहीं आ जाते हों। अंकल-अंकल….लो बिना ये विचार किये ही काल के ग्रास में समा गए अंकल !

– मोहित शर्मा (ज़हन)

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3 Micro Fiction Experiments (Author Mohit Trendster)

Mohit Trendster’s Micro Fiction Experiments (Youtube Playlist)

Micro Fiction Experiment # 01 – Theme: अपहरण (Kidnapping)*) – बाहरी लोग सही कहते थे जंगली लोग जादू-टोना करते है। दो महीनों तक घने जंगल की गुमनामी में बंधक बना पर्यटकों का दल आज उन्हें बचाने आये कमांडोज़ और उनके अपरहरणकर्ता कबीले वालों के बीच में ढाल बनकर खड़ा था। *) – बब्बन पाशा चिंतित था। बड़े गुटों के कुछ आत्मघाती, अपहरण मिशन फेल हुए तो बिल उसके गिरोह के नाम फाड़ दिया गया। अब भारी सुरक्षा से उसने एक विदेशी राजनयिक को अगवा किया तो कोई मान के नहीं दे रहा उल्टा उसके आतंकी संगठन से मिलते जुलते नाम वाले संगठन को श्रेय दिया जा है खबरों में। *) – क्रोध में बिलबिलाता पर कुछ करने में असमर्थ मोज़ेस ठगा सा महसूस कर रहा था क्योंकि एक तो वह नास्तिक था और तो राजनीती वगैहरह में नहीं पड़ता था। बेचारा बस एक टेनिस मैच देखने आया था, वो भी जीवन में पहली बार। अब किन्ही धर्मों की लड़ाई में उसको क्यों किडनैप कर लिया गया। *) – विभोर ने बंदूकें फिल्मों में ही देखी थी। उसका मन थर-थर काँप रहा था जबकि बाहर से उसका स्थिर-शांत तन तरह-तरह की भाव भंगिमाओं से अपनी 4 साल की बच्ची का समस्या से ध्यान बँटाने और सब ठीक हो जाने का दिलासा देने में लगा था। *) – किटकिटाते दांतों से खुद को गरियाने की कोशिश करती गरिमा सोच रही थी कि जहाँ भाग कर आयी उस वीराने में इस दन्त-कुड़कुड़िया सर्दी से बेहतर तो वो गुंडे ही रख रहे थे। *) – बंगले के बाहर जमा किडनैपर गुट का मकसद हत्या नहीं था, पर दंगों से उबर रहे शहर में अफवाहें ज़ोरो पर थी। दुछत्ती में छिपे परिवार के अन्य सदस्यों की जान बचाने के लिए माँ ने रो रहे नवजात का गला घोंट दिया। *) – अब उसे पता चला कि गिरोह के सरगना ने बंधक से आँखें मिलाने को क्यों मना किया था। जाने क्यों अपने किडनैपर को भी उम्मीदों से देख रहीं थी वो आँखें…कसम से अगर 2 क्षण उन आँखों में और देख लेता तो साइड बदल कर उन्ही का हो जाता। —————————————

Micro Fiction Experiment # 02 – Theme: Science
*) – कृतिम रूप से लैब में निर्मित चींटी, दल में घुसपैठ करने के बाद समझ नहीं पा रही थी कि उसकी प्राकृतिक बेवकूफ बहनो में मेहनत और अनुशासन की इतनी सनक क्यों सवार है।
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*) – रोज़ाना ज़िन्दगी से छोटे-बड़े समझौते करते हुए जिस प्रयोग में उसने अपना जीवन समर्पित कर दिया, जब वह लगभग पूर्णता पर था…तब खबर आयी कि वैसा ही प्रयोग दुनिया के किसी साधन-संपन्न वैज्ञानिक ने कर दिया है।
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*) – जो प्रजातियां प्रयोग के लिए चाहिए थी, असिस्टेंट उनके बजाये दिहाड़ी मज़दूर ले आया।
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*) – जेनेटिकली मॉडिफाइड क्रॉप्स (जनुकीय परावर्तित अन्न) फ़ल-सब्जी के सेवन पर व्रत में मनाही थी। सूखा ग्रस्त क्षेत्र में भी उस भोजन का आधार जीवाणु की कोशिका का मांसाहार अंश धर्म-भ्रष्ट करने को काफी थी।
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*) – जिस हथियार के आविष्कार से उसे विश्व में नाम, मान-सम्मान मिला…..बाद में उसे बनाने की ग्लानि में ही उसने अपनी जान ली।
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*) – आज को जिन युगों ने इतनी रफ़्तार दी, खैरात में मिली उन रफ्तारों के योग पर सवार यह पीढ़ी पुराने युगों की धीमी रफ्तारों का कितनी आसानी से मज़ाक बना लेती है!
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Micro Fiction Experiment # 03 (नासमझ इतिहास)

*) – अठारवीं सदी की बात है, दुनिया के सबसे दुर्गम नोलाम द्वीप पर तब तक कोई मानव नहीं पहुंचा था।
*) – बेहतर जहाज़ों और तकनीकों के बल पर दुनिया के तीन शक्तिशाली देशों में वहाँ सबसे पहले पहुँचने की होड़ लगी थी।
*) – एक देश द्वारा दल भेजे जाने की खबर के तुरंत बाद बाकी दोनों देशों ने भी आनन-फानन में अपने जहाज़ी दस्ते रवाना किये।
*) – देश A और देश C लगभग एकसाथ वहां पहुंचे। संचार का कोई माध्यम ना होने के कारण अब एक ही रास्ता बचा था।
*) – A और C के जहाज़ी दलों में एक दूसरे को समाप्त करने के विध्वंसक युद्ध छिड़ गया।
*) – कुछ घंटो बाद आखिरकार देश C के दल ने देश A के क्रू को ख़त्म करने के साथ-साथ उनका जहाज़ डुबो दिया।
*) – दल C के कप्तान और 4 सदस्य ज़िंदा बच पाए, तभी उन्हें देश B का जहाज़ आता दिखा।
*) – अब दुनियाभर  में इतिहास की किताबों में पढ़ाया जाता है कि दुर्गम नोलाम टापू पर सबसे पहले देश B के लोग पहुँचे।
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Kuboolnama (Nazm) – Poet Mohit Sharma

कुबूलनामा (नज़्म)

 

एक दिलेर कश्ती जो कितने सैलाबों की महावत बनी,

दूजी वो पुरानी नज़्म उसे ज़ख्म दे गयी।

एक बरसो से घिसट रहा मुकदमा,

दूजी वो पागल बुढ़िया जो हर पेशी हाज़िरी लगाती रही।

मय से ग़म गलाते लोग घर गए,
ग़मो की आंच में तपता वहीँ रह गया साकी,
अपने लहज़े में गलत रास्ते पर बढ़ चले,
…..और रह गया कुछ राहों का हिसाब बाकी।

वीरानों में अक्सर हैरान करती जो घर सी खुशबू ,

आँचल में रखी इनायत घुल रही है परदेसी आबशार में…

मेरे गुनाह गिनाना शगल है जिसका,

फ़िर भी बैर नहीं करती लिपटी रोटी उस अखबार में।

रोज़ की शिकायत उनकी,

बेवजह पुराने सामान ने जगह घेर रखी….

काश अपनी नज़र से उन्हें दिखा पाता,

भारी यादें जमा उन चीज़ों पर धूल के अलावा।

उलट-सुलट उच्चारण के तेरे मंत्र-आरती चल गए,

रह गए हम प्रकांड पंडित फीके…

दुनियादारी ने चेहरों को झुलसा दिया,

उनमे उजले लगें नज़र के टीके।

समाप्त!

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Kubulnama (Nazm)

Ek diler kashti jo kitne sailaabo ki mahavat bani,

Dooji wo purani nazm jo use zakhm de gayi.

Ek barso ghisat raha mukadma,

Dooji wo pagal budhiya jo har peshi haziri lagati rahi.

Mayy se gham galaate log ghar gaye,

Ghamon ki aanch mein tapta wahin reh gaya saaki,
Apne lehze mein galat raaste par badh chale,
…..aur reh gaya kuch raahon ka hisaab baaki.

Veerano mein aksar hairaan karti jo ghar si khushboo,

Aanchal mein rakhi inayat ghul rahi pardesi aabshar mein…

Mere Gunaah ginana shagal hai jiska,

Phir bhi bair nahi karti lipti roti us akhbar mein.

Roz ki shikayat unki,

Bewajah puraane samaan ne jagah gher rakhi….

Kaash apni nazar se unhe dikha paata,

Bhaari yaaden jama un cheezon par dhool ke alawa.

Ulat-sulat uchchharan ke tere mantra-aarti chal gaye,

Reh gaye hum prakaand pandit pheeke…

Duniyadaari mein jhulse chehre,

Unme ujle lage nazar ke teeke….

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 बहुत समय बाद कुछ शायरी की है, वैसे निरंतर कुछ ना कुछ लिख रहा हूँ पर यह ब्लॉग कम अपडेट कर रहा हूँ। वैसे नेट पर मेरा पिछले कुछ महीनो का काफी काम मिलेगा।

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लालची मौत :: Deadly Deal, Horror Comic (Freelance Talents)

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Deadly Deal (Laalchi Maut) – Horror Comic by Comic Fan Fest in association with Freelance Talents. Author – Mohit Trendster, Illustrator – Kuldeep Babbar, Coloring – Harendra Saini, Calligraphy – Youdhveer Singh
Freelance Talents और Comic Fan Fest पेश करते है लालची मौत (हॉरर कॉमिक्स), कल स्वतंत्रता दिवस से रोज़ाना इस पेज पर।
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P.S. Delayed Release (Story – 2006, Artwork – 2011)

कही अनकही – लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)

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(Bidholi, Dehradun)

*) – अस्तित्व की लड़ाई

यह बात मेरे मन में लंबे समय से थी और आज लिखने का मौका मिल पाया है। बताते है ब्रिटिश साम्राज्य में कभी सूरज नहीं ढलता था, दुनिया भर के इतने देश जो उनके गुलाम थे। उनसे पहले जगह-जगह मुसलमान शासक रहे जिन्होंने भारत के एक बड़े हिस्से समेत अनेको प्रांतो, देशो में अपना राज्य स्थापित किया। अलग-अलग राज्यों की अपनी संस्कृतियों, तौर तरीको में हमेशा आक्रमण कर जीतने का तरीका नहीं चलता था और अगर चलता भी था तो बाहरी आक्रमणकारियों से जनता में असंतोष, असहयोग की भावना रहती जिस कारणवश ऐसे शासकों के पाँव थोड़े समय बाद उस धरती से उखड जाते। इस समस्या से पार पाने की जो योजना विदेशियों ने सदियों पहले सोची उसपर भारतवासियों ने आजतक अमल नहीं किया। हमारी प्रवृति में कहीं आक्रमण करना नहीं है। पर आजकल तुलनात्मक बातों में भारत, सनातन धर्म और लोगो के बारे में कई अफवाहें फैली हुई है जिस वजह से कई लोग हम लोगो से, हमारे धर्म से डरते है या हेय दृष्टि से देखते है। परिणामस्वरूप हर किसी को जैसे हमारी बेइज़्ज़ती करने का या मज़ाक उड़ाने का लाइसेंस मिला हुआ है।

अनजान भारी-भरकम शब्दों, बातों और उदाहरणों से हर कोई पीछे हटता है। तो छूटते ही अपने ग्रंथो, श्लोक, दंतकथाओं आदि के उदाहरण ना दें। कहीं भी अपने पाँव ज़माने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है उस जगह की संस्कृति, लोगो, भाषाओ आदि स्थानीय बातों की समझ बनाकर वहां जनता से संवाद बनाना, मैत्रीपूर्ण बंधन बनाना और फिर धीरे-धीरे अपनी संस्कृति, बातों से उन्हें अवगत कराते हुए उस संस्कृति का हिस्सा बनाना। परिस्थितियाँ अब आधी शताब्दी पहले जैसी नहीं है पर हमारे अस्तित्व की लड़ाई अब भी है। श्री श्री रविशंकर, बाबा रामदेव ने अपने तरीको से अच्छा प्रचार किया है (हालाँकि, देसी-विदेशी मीडिया उनका उपहास उड़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ता।) कोशिश यह होनी चाहिए कि हम बाहरी सकारात्मक बातों को अपनी संस्कृति में समाहित करें और अपनी संस्कृति की अनेको अच्छी बातों का समावेश विदेशों के तौर-तरीकों में करवायें। तो इंग्लिश या अन्य भाषाओँ, पहलुओं से भागें नहीं बल्कि उन्हें सीखें ताकि आगे चलकर आप अपने पहलु दूसरो को सिखा पायें क्योकि प्रकृति का नियम है – बड़ी मछली छोटी मछलियों को आहार बनाती है, इस समय धाराएँ प्रतिकूल है और कुछ बड़ी मछलियाँ छोटी-छोटी संस्कृतियों को निगल भी रही है, एक-आध सदी बाद यह नौबत हमपर ना आये तो सचेत हों जायें।
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*) – बातों-बातों में आप सुनते होंगे कि “मैं तो 50-55 तक जी लूँ एक्टिव लाइफ, क्योकि मुझे बुढ़ापे का दर्द नहीं झेलना।” उम्र के उस पड़ाव की काफी अहमियत है जिसको हम नज़रअंदाज़ कर देते है। सबसे पहले तो बूढ़े व्यक्ति एक सिंबल की तरह होते है, जिनका जीवन स्वयं में अनेको शिक्षाएं लिए होता है। जीवन के कई अनुभवों से वो परिवार के सक्रीय सदस्यों को सीख देते रहते है। साथ ही उनके रहते हुए आम तौर पर संतानो में शान्ति रहती है 12-15 साल। इस शान्ति का एक प्रमुख कारण संपत्ति होती है। ऐसी कुछ और बातें है पर वह बताने से पहले यहाँ मैं आप लोगो के इस विषय पर विचार जानना चाहूंगा।

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*) – ऐसे निष्कर्षों पर ना कूदें….

बहुत से प्रयोग करने के बाद एक रचनाकार, फिल्मकार उस स्तर पर पहुँचता है जहाँ रचना गढ़ते (बनाते) समय उसके लिए उस रचना में प्रयुक्त जगहों, बातों, किरदारों का वर्गीकरण मायने नहीं रखता। उदाहरण स्वरुप अनुराग कश्यप को कुछ जगह नारी विरोधी बताया जाता है क्योकि उनकी फिल्मो में नेगेटिव किरदारों में महिलायें आती रहती है। पर यह नोट करने वाले समीक्षक, आलोचक और प्रशंषक भूल जाते कि उन्होंने अब तक उन किरदारों से कई गुना अधिक वैसे नकारात्मक गुणों वाले रोल्स में पुरुषों को कास्ट किया है। इतना सब काम करने के बाद वो किसी वर्ग के दोस्त अथवा दुश्मन नहीं होते बल्कि अपनी कहानी अनुसार किरदारों के दोस्त या दुश्मन बन जाते है। यथार्थवादी और प्रतिभावान व्यक्तियों के प्रयासों पर इतनी जल्दी ऐसे निष्कर्षों पर आना ना सिर्फ उनकी मेहनत का उपहास उड़ाना होगा बल्कि उन्हें बेवजह बदनाम करना भी होगा। अगर आपको एक ढर्रे पर चलने की आदत है और कोई उसपर नहीं चल रहा इसका मतलब यह नहीं की उसमे कोई कमी है।

एक बटन सा.. – मोहित शर्मा (ज़हन)

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एक बटन सा…(Laghu Katha)

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छोटे शहर के एक बड़े साइकोलॉजिस्ट जाधव जी के खाली क्लीनिक में एक और आलसी शाम। 31 वर्षीय शिवांश कुमार को संतुष्टि मिली कि कोई अन्य मरीज़ ना होने के कारण “डॉक्टर” के साथ उसे अधिक समय का सेशन मिल जाएगा। कुछ औपचारिकता के बाद डॉक्टर के केबिन में….

शिवांश – “वैसे तो मैं आपके पास ना आता पर आपका इंटरव्यू पढ़ा जिसमे आपने सही कहा कि जब जिम जाने वालो को अपंग नहीं समझा जाता तो आपके पास आने वालो पर यह धब्बा क्यों लगाया जाता है कि वो मानसिक रूप से ठीक नहीं? आपके सेशंस को एक्सरसाइज की तरह लिया जाना चाहिए।”

जाधव जी – “धन्यवाद! छिट-पुट मानसिक परेशानी हर इंसान को होती है। मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ तो कोई नहीं होता। तो शुरू कीजिये, बताएँ समस्या क्या है?”

शिवांश – “डॉक्टर लाइफ मौज में कट रही थी, सब कुछ कितना साफ़-सरल था फिर पता नहीं कोई बटन सा दबा और मैं 2008 से सीधा 2015 में पहुँच गया। कुछ समझ नहीं आ रहा क्या करूँ। अब या तो लाइफ रिवर्स करने का उपाय बताएं या फिर इतना सुनिश्चित करवा दें कि आगे कभी ऐसा कोई बटन ना दबे जीवन में…. ”

– मोहित शर्मा (ज़हन)

सरफिरा अनशन (लघुकथा) – लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)

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पत्रकार – “आप किस के खिलाफ आमरण अनशन पर बैठे है?”
युवक – “आप लोगो के…”
पत्रकार – “क्यों ऐसा क्या कर दिया हम मीडिया वालो ने?”
युवक – “पिछले साल मेरी सहकर्मी ने एक लड़ाई के बाद मुझ पर बलात्कार का आरोप लगाया। आप लोगो ने बिना जांच किये पहले पन्ने पर वो खबर छापी। फैसला आने से पहले मैं दोषी हो गया, आपके सौजन्य से मेरे खिलाफ कैंडल मार्च होने लगे और आप लोगो ने उस खबर का फॉलोअप किया जब तक…
…जब तक किसी अनजान जनूनी का पत्थर मेरे पिता जी के सर पर लगकर उन्हें पागल नहीं कर गया, जब तक माँ ने सल्फास की गोलियाँ खाकर अपनी जान नहीं ले ली। पर अब जब यह साबित हुआ कि मैं निर्दोष हूँ तो पहले पेज पर वह खबर क्यों नहीं? दोषियों का फॉलोअप क्यों नहीं? अपनी गलती मानते लेख क्यों नहीं? दूसरों के साँस लेने, पलकें झपकाने तक में खामी निकाल देने वाले अपनी गलतियों की ज़िम्मेदारी लेने में घोंघे क्यों बन जाते हो?”
अगले दिन अखबार की हेडलाइन! –
“सरफिरे युवक के सड़क पर बैठ जाने से शहर की नयी सड़क पर यातायात व्यवस्था में अवरोध। 3 घंटे तक यात्रियों का हाल बेहाल।”
– मोहित शर्मा (ज़हन) #mohitness #mohit_trendster #trendy_baba

मासूम ममता (Bonsai Kathayen) – लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)

Bonsai Kathayen (2013) katha sangrah ki pehli laghu katha.
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मासूम ममता
“हद है यार … कुतिया ने परेशान करके रखा है। अभी सिंधी साहब ने अपने बागीचे से इसको भगाया, ज़रा सी देर को मैंने फ्यूज़ बदलने के लिए गेट खोला होगा और ये मेरे आँगन मे घुस आई।”
“हाँ! गर्ग भाई साहब! आदत जो बिगड़ गयी है इसकी, रोटी-बिस्कुट खा-खा कर बिलकुल सर पर ही चढ़े जा रही है। कल से नोट कर लो आप और मै जब भाभी जी लौटकर आएँगी उन्हें भी बता दूँगी इसको अब से कुछ नहीं देना है।”

कुतिया अब भी मासूम नज़रों से पूँछ हिलाती हुई और लगातार कूं-कूं करती मिस्टर गर्ग को देख रही थी।

एक पल को तो गर्ग जी मासूमियत  से हिप्नोटाइज से हुए पर फिर कुतिया को रोष से घूरती हुई सिंधी  भाभी की भाव-भंगिमाओं से सहमति जताते हुए गर्ग जी ने कुतिया के मुँह पर एक लात रसीद की।

“सही किया भाई साहब! अब से दरवाज़े पर डंडा रखूंगी।”

सिंधी मेमसाब तो जैसे दर्द से सिसकारी मारती कुतिया को डपटते हुए बोलीं।

रात मे गली मे कुत्तो के भोकने-गुर्राने और लड़ने की तेज़ आवाजों ने पूरे मोहल्ले को जगा दिया।

पर इस बार अपने घरो से पहले बाहर निकलने वाले थे श्रीमती गर्ग और श्रीमान सिंधी

“क्या हुआ गर्ग भाभी?”

“गली की कुतिया ने सामने नाले किनारे बच्चे दे दिए और साथ की गली वाले कुत्तों बच्चो को मार कर उठा ले गए। थोड़ी देर कुतिया सबसे लडती रही जब तक उन्हें कॉलोनी वालो ने भगाया तब तक तो उन्होंने इसका भी आधा सर खा ही लिया …..लगता है ये भी नहीं बचेगी।

अब तक आँखें मॉल रहे श्रीमान गर्ग और श्रीमती सिंधी की मामला समझ आने पर नज़रें मिली और दोनों ने ही तड़पती कुतिया को देख कर अपनी गलती की मोन स्वीकृति दी।

समाप्त!
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जीवनशैली में संतुलन – लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)

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Mohit Trendster @ Lucknow, 2010
 
पर्यटन के स्वरुप में बड़े बदलाव आयें है। सदियों तक जो पर्यटन स्थल दुनियाभर में मशहूर थे, जिन्हे सिर्फ देखना लाखो-करोडो की दिली ख्वाइश होती थी….अब वहाँ जाने वाले नयी पीढ़ी के बहुत से लोग उन्हें बोरिंग बताते है, वहाँ घूम कर आने के बाद वो सवाल करते है कि आखिर क्या ख़ास है इन जगहों में? इतना हव्वा किस बात का बनाया जाता है इनपर? कारण जानने से पहले इस बात पर ध्यान दें कि हम लोग ट्रांज़िशन दौर का हिस्सा रहे जिसमे तकनीक बड़ी तेज़ी से बदली, और हमे समाज के दोनों छोर देखने-जीने को मिले। अब आप कहेंगे की बदलाव तो हर पीढ़ी देखती है, तो इस दौर से जुडी पीढ़ियों पर यह टिप्पणी क्यों? सोचिये आप सन 1828 में जी रहे है और एकदम से आपको 1850 में भेजा जाए तो आपको  बदली बातें, चीज़ें समझने में अधिक कठिनाई नहीं आयेगी पर यह कठिनाई 1970 से सीधे 1990 जाने पर बढ़ेगी और 1992 से अगर कोई 2015 में आयेगा उसको आजकल की दिनचर्या में कई बदलाव दिखेंगे जिनकी उसे आदत नहीं होगी।
इस बदलाव के बाद हम जैसे मनोरंजन और जानकारी के अनेको मल्टीमीडिया साधनो से घिर गये। ग्राफिक्स, एनीमेशन, विडीयोज़ में दुनिया का क्या से क्या खंगाल डाला, जिस वजह से किसी चीज़ का क्रेज़ क्या होता है यह लगभग भूल गए। अनुभवों के लिए सिर्फ डिजिटल साधनो पर निर्भर हो चुके है और इनके इतर दुनिया जो भी है उस से कटने लगे। शायद जो लोग ऐतिहासिक इमारतों, जगहों को बोरिंग बता रहे थे वो उस जगह को देखने, उसकी कहानी जानने के अलावा यह भी अपेक्षा रख रहे थे कि वो ईमारत ब्रेक डांस करेगी, टूट कर फिर अपने आप बन जायेगी, या टूरिस्ट गाइड की जगह खुद अपना इतिहास बताएगी।
अब बच्चे-युवा और बड़े भी जो शहरी जीवन के आदि हो चुके है उन्हें 2 दिन गाँव में बिताने भारी पड़ जाते है और बातों से ज़्यादा हम मोबाइल टेक्स्ट्स, मैसेजेस से वार्तालाप करते है। इस लेख से मैं आपको वर्तमान तौर-तरीके छोड़ कर वापस इतिहास में जाने की सलाह नहीं दे रहा, बस एक संतुलन बनाने की बात बता रहा हूँ। कुछ समय स्वयं को, अपनों को और प्रकृति को दें – डिजिटल प्रारूपों में औरों से अनुभव लेने के साथ-साथ ज़िन्दगी में खुद अपने अनुभव बटोरें। एक जीवनशैली की अधिकता से स्वयं को एक मशीन में ना बदलने दें। बैलेंस बनाना मुश्किल ज़रूर है पर ज़माना कितना भी आगे बढ़ जाये कई मूलभूत बातें जस की तस रहती है, बस उन्ही के सिरे पकड़ते हुए शुरुआत करें।
– मोहित शर्मा (ज़हन)
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