Update #Bulk

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*) – 3 upcoming comics Vacuumed Sanctity (with Abhilash Panda), Samaj Bhakshak (with Anand Singh), Untitled (Manabendra Majumder)PHOTO496e

*) – 6 new podcasts on lyrical comedy, noise pollution and art. – SoundCloud Profile

*) – Retired from MMO The Wrestling Game S3 World #39 (August 2017) 😦

*) – Kavya Comics series featured by Nazariya Now

*) – COP Interview

Part 1, Part 2

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*) – Selected as one of the top writers by Dawriter Website.

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*) – 815 Points now…Local Guides Program (Google Maps)

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जीवन में विलेन ढूँढने की आदत (लेख) #ज़हन

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कॉमिक्स लेखन में एक कहावत है, “विलेन भी अपनी नज़रों में हीरो होता है।” खलनायक अपनी छोटी भूल से लेकर जघन्य अपराधों तक का इतनी चपलता से स्पष्टीकरण देता है कि लगे उस स्थिति में सबसे ठीक विकल्प वही था। बचपन से हमें बुराई पर अच्छाई की जीत वाली कई गाथाओं का इस तरह रसपान करवाया जाता है तो कोई भी बुरा नहीं बनना चाहता। अब सवाल उठते हैं कि अगर कोई बुरा नहीं तो फिर समाज में फैली बुराई का स्रोत क्या है? दुनिया में सब अच्छे क्यों नहीं? जवाब उस कॉमिक विलेन वाला है, ‘अपनी पिक्चर में हर कोई नायक होता है।’ दुनिया में ना कोई पूरी तरह अच्छा है और ना ही कोई बुराई का पुतला है। फिर भी खलनायक ढूँढने, बनाने की आदत हम सबके अंदर है। ये आदत कहाँ से जन्मी? शायद मानव मन को एक सांत्वना सी मिल जाती है और अपनी बुराइयों, कमियों से ध्यान हट जाता है। कभी-कभार परिवेश और घटनाओं के आधार पर किसी को डीमनाइज़ करना समझा जा सकता है पर जब यह आदत लोग अपने निजी जीवन के हर पहलु में लगाने लगें तो समस्याओं का जाल बन जाता है।

*) – प्रकृति की कारस्तानी: नेचर का एक नियम होता है कि हर जैविक प्रजाति धरती पर हो रहे बदलाव के अनुसार खुद को ढालते हुए निश्चित विकास के साथ बढ़ती रहे। अब अगर सबसे विकसित दिमाग वाला प्राणी मनुष्य, बात बात पर अंतःकरण की आवाज़ सुनकर खुद पर सवाल करने लगेगा तो उस प्रजाति में अवसाद, हीन भावना आदि मानसिक समस्याओं का औसत काफी बढ़ जाएगा। ऐसा होने पर मानव प्रजाति के विकास में बाधा आ सकती है। इस कारण से आम इंसान का ध्यान बँटाने के लिए प्रकृति ने उसमे ऐसा तंत्र फिट किया है कि वह दुनियाभर की बुराई को मैग्नीफाई करके खुद को दिलासा देता रहता है कि “मैं तो फिर भी बहुत ठीक हूँ बाकियों से।” इस सोच को बढ़ावा देने में मीडिया का बड़ा योगदान है जिसे किसी नैरेटिव और मसाले के लिए लगभग हर कहानी में किसी ना किसी को खलनायक बनाने का शौक है।

*) – घटनाओं की नवीनता: …यानी रीसेन्सी ऑफ़ इवेंट्स का मतलब किसी व्यक्ति द्वारा अपनी सुविधानुसार पास की घटनाओं के हिसाब से मन बनाना। वहीं पहले हुई घटनाएँ जो उसकी याददाश्त के कम्फर्ट जोन से बाहर हों उन्हें सोच में शामिल ना करना। यहाँ सुविधा सिर्फ कुछ याद रखने के दायरे में ही नहीं बल्कि अपने एजेंडे के हिसाब से घटनाओं को रखने और हटाने में भी है। अक्सर सोशल मीडिया पर किसी राजनैतिक बहस पर आप ऐसा देख सकते हैं। किसी असत्यापित खबर पर हम इसी अनुसार सही और गलत पक्ष का निर्णय सुना देते हैं।

*) – निजी जीवन: बाहरी घटक तो एक बार के लिए फिर भी संभाले जा सकते हैं पर अगर कोई इंसान अपने जीवन में अहम् किरदार लिए लोगो को डीमनाइज़ करना शुरू कर दे तब वह अनजाने में अपना ही नुक्सान करने लगता है। उसके पेशे, रिश्तों पर इसका बुरा असर पड़ता है। बिना किसी ठोस आधार के अपनी कल्पनाओं के अम्बार को आग लगाकर हम अपने जीवन के रावणो को ढूँढ लेते हैं। समय के साथ ये आदत प्रबल हो जाती है पर इतनी प्रत्यक्ष होकर भी हमें दिखाई नहीं देती।

पूछें खुद से ये सवाल – उसकी जगह मैं होता तो क्या करता? क्या कोई ऐसी बात तो नहीं जो मुझसे अनदेखी रह गयी? कहीं मैं मन में गढ़ी बातों को असल बातों में मिला तो नहीं रहा? इस मसले पर बिना किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त व्यक्ति की क्या राय होती? मन के ध्यान बटाऊ टैक्टिस में फँसने के बजाय इन सवालों के ईमानदार जवाब कई मामलों में ग़लतफहमी दूर कर देंगे और शर्तिया 10 में से 8-9 बार आपकी कहानी में बिना बात कोई काल्पनिक खलनायक नहीं रहेगा।

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Read समूह वाली मानसिकता (लेख)

किसका भारत महान? (कहानी) #ज़हन

21369234_10155296195743393_8869409205061140518_nArtwork – Martin Nebelong

पैंतालीस वर्षों से दुनियाभर में समाजसेवा और निष्पक्ष खोजी पत्रकारिता कर रहे कनाडा के चार्ली हैस को नोबेल शांति पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई। नोबेल संस्था की आधिकारिक घोषणा के बाद से उनके निवास के बाहर पत्रकारों का तांता लगा था। अपनी दिनचर्या से समय निकाल कर उन्होंने एक प्रेस वार्ता और कुछ बड़े टीवी, रेडियो चैनल्स के ख़ास साक्षात्कार किये। दिन का अंतिम साक्षात्कार एशिया टीवी की पत्रकार सबीना पार्कर के साथ निश्चित हुआ। एशिया के अलग-अलग देशों में अपने जीवन का बड़ा हिस्सा बिताने वाले चार्ली खुश थे कि अब उन्हें पाश्चात्य पत्रकारों के एक जैसे सवालों से अलग कुछ बातें मिलेंगी।

काफी देर तक अलग-अलग मुद्दों पर चर्चा करने के बाद सबीना ने कुछ संकोच से पूछा। “मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि इतनी समस्याओं में आपने अभी तक भारत का नाम नहीं लिया?”

चार्ली – “क्या आप चाहती हैं कि मैं भारत का नाम लूँ?”

सबीना – “मेरा वो मतलब नहीं था। मैं कहना चाहती हूँ कि भारतीय समाज में इतनी विकृतियाँ सुनने में आती हैं, हर रोज़ इतने अपराध होते हैं….मुझे लगा आपके पास कहने को बहुत कुछ होगा।”

चार्ली – “बिल्कुल! भारतीय समाज में बहुत सी कमियाँ हैं, अक्सर अपराध सुर्खियाँ बनते हैं पर क्या आपको पता है 200 कुछ देशों की दुनिया में लगभग चौथाई देश ऐसे हैं जिनकी अधिकतर आपराधिक ख़बरें, सरकार की गलतियाँ, जनता का दुख सरकारी फ़िल्टर की वजह से वहाँ से बाहर दुनिया में नहीं जा पातीं…वहाँ की तुलना में भारत स्वर्ग है। उन देशों के अलावा कई देशों में शिक्षा और सामाजिक व्यवस्था ऐसी है कि बच्चो में अपने धर्म, देश की निंदा को हतोत्साहित किया जाता है और एक समय के बाद इस सामाजिक अनुकूलन (सोशल कंडीशनिंग) के कारण स्थानीय लोगो, मीडिया द्वारा बाहर के देशों में किसी बड़ी अप्रिय घटना के अलावा अपनी “सामान्य” या “अच्छी” छवि की रिपोर्ट्स भेजी जाती हैं। जबकि भारत में मैंने इस से उलट ट्रेंड देखा है।”

सबीना – “मैं आपकी बात समझी नहीं। कैसा उल्टा ट्रेंड?”

चार्ली – “मान लीजिये अगर दुनिया के किसी हिस्से में हुई त्रासदी में 3 दर्जन लोग मरते हैं, ये हुई पहली खबर और दूसरी खबर में भारत का कोई स्थानीय दर्जे का नेता एक रूढ़िवादी या बेवकूफाना बयान देता है। अब यहाँ ज़्यादा संभावना यह है कि भारत के नेता के गलत बयान वाली खबर, कहीं और हुई 36 लोगो की मौत वाली खबर से बड़ी बन जायेगी और दुनिया के कई हिस्सों में पहुँचेगी। इतना ही नहीं बाकायदा उस खबर का फॉलो अप भी होगा। जब लगातार किसी देश से जुडी नकारात्मक ख़बरें अंतरराष्ट्रीय मीडिया में जाती रहेंगी तो देश-दुनिया के लोगो में भारत की वैसी ही छवि बनेगी जैसी आपके मन में हैं। वर्तमान भारत अपने इतिहास के समय सा महान नहीं है पर दुनिया की नर्क सरीखी जगहों में भी नहीं है….यह देश कहीं बीच में है। किसी बात के औसत में सत्तरवें नंबर पर लटका है तो कहीं बत्तीसवां है, जो इतनी जनसँख्या और कदम-कदम पर दिखती सामाजिक विविधता में अचंभित करने वाली बात है। अब यह भारतीय लोगों पर है वो औसत से ऊपर जाते हैं या नीचे।”

सबीना – “…मतलब आप चाहते हैं भारतीय लोग और मीडिया अपनी कमियों पर बात करना छोड़ दें?”

चार्ली – “मैं चाहता हूँ भारत के लोग, मीडिया अपनी कमियों पर बात करने और कमियों का स्पीकर युक्त ढोल बजाने में अंतर समझें। अगर ऐसा नहीं  होता है तो बाहरी देशों में भारत की छवि धूमिल होती जायेगी जिसका गहरा असर पर्यटन, व्यापर, कई देशों से द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ेगा। इतना ही नहीं भारतीय लोगो में एक-दूसरे के प्रति वैमनस्य की भावना बढ़ती जायेगी। फिर यह देश अपनी क्षमता से नीचे जाता रहेगा।”

अपनी असहजता मिटाने के लिए सबीना ने अन्य मुद्दों से जुड़े सवाल पूछने शुरू कर दिए।

समाप्त!

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Read Hindi Quotes Trendster Archives

#mohitness #मोहित_शर्मा_ज़हन #mohit_trendster #freelance_talents

खाना ठंडा हो रहा है…(काव्य) #ज़हन

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साँसों का धुआं,
कोहरा घना,
अनजान फितरत में समां सना,
फिर भी मुस्काता सपना बुना,
हक़ीक़त में घुलता एक और अरमान खो रहा है…
…और खाना ठंडा हो रहा है।

तेरी बेफिक्री पर बेचैन करवटें मेरी,
बिस्तर की सलवटों में खुशबू तेरी,
डायन सी घूरे हर पल की देरी,
इंतज़ार में कबसे मुन्ना रो रहा है…
…और खाना ठंडा हो रहा है।

काश की आह नहीं उठेगी अक्सर,
आईने में राही को दिख जाए रहबर,
कुछ आदतें बदल जाएं तो बेहतर,
दिल से लगी तस्वीरों पर वक़्त का असर हो रहा है…
…और खाना ठंडा हो रहा है।

बालों में हाथ फिरवाने का फिरदौस,
झूठे ही रूठने का मेरा दोष,
ख्वाबों को बुनने में वक़्त लग गया,
उन सपनो के पकने का मौसम हो चला है…
…और खाना ठंडा हो रहा है।

तमाशा ना बनने पाए तो सहते रहोगे क्या?
नींद में शिकायतें कहते रहोगे क्या?
आज किसी ‘ज़रूरी’ बात को टाल जाना,
घर जैसे बहाने बाहर बना आना,
आँखों को बताने तो आओ कि बाकी जहां सो रहा है…
…और खाना ठंडा हो रहा है।

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Thumbnail Artwork – Arpit Shankar‎
#मोहित_शर्मा_ज़हन #mohitness #mohit_trendster
*Second poem in Matlabi Mela (Kavya Comic Series)

विकिपीडिया और बिकाऊ मीडिया के पार की दुनिया (कहानी) – मोहित शर्मा ज़हन

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नाखून चबाती मशहूर अभिनेत्री मेघना कमल कमरे में इधर-उधर टहल रही थी। फ़ोन पर अपने मैनेजर पर चिल्लाती हुई वो टीवी न्यूज़ चैनल्स बदल-बदल कर खुद पर आ रही खबरों को देखने लगी। पिछली रात पास के अपार्टमेंट में से किसी ने उसकी एक वीडियो बनाई थी जिसमें वो एक पिल्ले को किक मारती हुई अपने बंगले से बाहर कर रही थी। शुरुआत में हरकत कर रहा पिल्ले का शरीर मेघना की 5-7 लातें खाने के बाद निर्जीव हो गया। विडिओ पर ना सिर्फ जानवर के अधिकारों वाली संस्थाओं की तीखी प्रतिक्रिया आ रही थी बल्कि देश-विदेश की जनता मेघना की इस हरकत से गुस्से में थी। बड़े निर्माताओं, निर्देशकों पर मेघना को अपनी फिल्मों से बाहर करने, कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने का दबाव बढ़ रहा था। कुछ ही देर में मेघना के घर के बाहर मीडिया का तांता लग गया।

मेघना ने अपने पिता और बीते ज़माने के सुपरस्टार अभिनेता हरीश कमल को फ़ोन किया।
“पापा…आई ऍम सॉरी, मेरी वजह से आपका नाम भी उछल रहा है। नशे में करियर बर्बाद कर लिया! सब ख़त्म हो गया!”

हरीश शांत स्वर में मेघना को समझाने लगे – “चिंता मत कर मेघू बेटे! ऐसे करियर बर्बाद होने लगते तो मैं कबका एक्टिंग छोड़ चुका होता। तेरा वीडियो मैंने देखा है। एक पार्सल भेजा है तुझे, बाकी फ़ोन पर नहीं समझाऊंगा। अपने मैनेजर और टीम को बुला ले उन्हें समझा दिया है, उनकी बात ध्यान से सुनकर वैसा ही करना… “

उस शाम मेघना ने अपने घर पर ही प्रेस कॉन्फ्रेंस रखी। कुछ सवालों के जवाब देने के बाद वह अपनी रिहर्स की हुई लाइनों पर आ गई।

“मैं जानती थी कि भारत के ज़्यादातर लोगो की जो मानसिकता हैं उनसे मुझे ऐसी ही प्रतिक्रिया मिलेगी। कल रात मैंने जानबूझ कर एक रोबोटिक खिलौने पप्पी को मारा, जो दूर से एकदम असली लगता है। यह देखिये इस पार्सल में उस से मिलता-जुलता खिलौना है। मेरा उद्देश्य लोगो में निरीह जानवरों के अधिकार, उनपर होने वाली हिंसा, मानव आबादी से कम होते जंगलों के लिए जागरूकता बढ़ाना था और देश क्या पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए इस स्टंट से बेहतर मुझे कोई उपाय नहीं लगा। इस बीच मुझे चुभने वाली एक सच्चाई का सामना करना पड़ा, एक लड़की के लिए चाहे वो एक सफल अभिनेत्री ही सही इस देश के लोग अपनी छोटी सोच दिखा ही देते हैं। भारत के लोगो और कई सेलेब्रिटीज़ की बातों ने मुझे आहत किया है।”

इतना कहते ही मेघना प्रेस वार्ता में रोने लगी। कैमरों की चमक से आँगन जगमगा उठा। हर ओर मेघना की तारीफ़ और चर्चे थे। इस घटना के बाद मेघना को कुछ अवार्ड मिले, तीन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने मेघना को अपना गुडविल एम्बेस्डर बनाया और वो बड़े बजट निर्माताओं की पहली पसंद बन गयी। एक दिन हरीश कमल ने मेघना को हँसते हुए बताया कि मेघना का किया कांड तो कुछ भी नहीं उन्होंने अपने समय में कितने कानून तोड़े, लोगो को गायब तक करवाया पर आज भी देश उन्हें पूजता है।

समाप्त!
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Image – Watercolor Painting by artist Shilpi Mathur
#mohitness #mohit_trendster

Ramblings of a Madman Vol. 1 (Book Review)

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#Trendster_Approves Ramblings of a Madman Vol. 1 by Siddhant Shekhar
Amazon India Link – https://goo.gl/zm1Ih4

Review on Goodreadshttps://www.goodreads.com/review/show/2021686435
P.S. Upcoming Book – Wife-beater ka Love letter

Cover Art – Ajitesh Bohra

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Siddhant Shekhar’s story collection has been 4 years coming – and is every bit worth the wait. Ramblings of a Madman offers humor, tragedy, raves-rants and interesting human interactions in experimental backdrops in a language that is factual, playful and profound. Author’s experience in science, music, literature and procrastination is a lethal mix to create extraordinary story plots. He reminds me of legend artist-author Mr. Bharat Negi. As a result of variety and vibrancy of these 13 tales, one would be hard-pushed to find an underlying theme…from 1984 anti-sikh pogroms to after death dimensions, from uber AI Robots to Mata Parvati, each of the stories collected here explore the boundaries of imagined realities. In fact, it would be ablative to seek a common subject in a book whose major accomplishments involve the awesomesauce spread of topics, dialogues and characters. This is a truly impressive collection, and will entertain and ‘enlighten’ in equal measure.

Rating – 9/10

Poster #1 – Kathputli (Short Film)

लालच का अंकुर (कहानी) #ज़हन

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वास्तु वन्य अभयारण्य की खासियत उसके तरह-तरह के पशु, पक्षी थे। इतने कम क्षेत्रफल में इतनी अधिक विविधता पर्यटकों को लुभाती थी क्योंकि उन्हें पता था कि यहाँ आने पर उन्हें कई जंगली और लुप्तप्राय जानवर ज़रूर दिखेंगे। वास्तु अभयारण्य की दुर्गम स्थिति और अच्छी सुरक्षा के कारण अभी तक यह स्थान तस्करों, शिकारियों से बचा हुआ था। अभयारण्य के पास ही हाथी-महावतों की बस्ती थी जो पर्यटकों और वन अधिकारीयों को अनुज्ञप्त जंगली क्षेत्र में घुमाते थे। 12 महीने मेहनत के बाद भी मुश्किल से सभी महावत परिवारों का गुज़ारा चलता था। अपने पशु साथियों से महावतों का प्रेम ऐसा था कि चाहे अपने लिए कुछ कम पड़ जाए पर हाथियों को कोई कमी नहीं होनी चाहिए। एक बार किसी महावत ने लालचवश हाथीदांत के लिए तस्कर से संपर्क किया, जब यह बात बस्ती में फैली तो उसे वन अधिकारीयों के हवाले कर दिया गया और उसके परिवार को बस्ती से निकाल दिया गया।

बस्ती का कोई मुखिया नहीं था पर 2-3 वृद्ध महावतों की बात सब मानते थे, जिनमे से एक का नाम था सुमंकुट्टी। जंगल में कुछ चेक पोस्ट्स का निर्माण कार्य चल रहा था, जिसके शोर से उनके 2 हाथी भटक गए और उनमे से एक का शरीर बिजली के तार से छू गया। तेज़ करंट लगने से वो हाथी मरणासन्न अवस्था में पहुँच गया। उसके चारो ओर बैठे डेढ़ दर्जन महावत और उनके परिवार शोक में डूबे थे। कुछ देर बाद सुमंकुट्टी के लड़के सूर्यकुट्टी ने उनके कान मे कुछ कहा। अपने लड़के की बात सुनकर वो आगबबूला हो गए और छड़ी से सूर्यकुट्टी की पिटाई करने लगे। लोगो के पूछने पर उन्होंने बताया कि उनका पुत्र मरने वाले हाथी के दांत तस्करो को बेचने की बात कर रहा है ताकि कुछ पैसे आ सकें।

अपने संगी-साथियों की शंका भरी नज़रों को भांप कर सुमंकुट्टी बोले, “आप लोगो ने पहले इक्का-दुक्का हाथीयों के मरने पर भी ऐसे सवाल किये हैं कि जब हाथी मर गया तो उसके दांत को बेचें या ना बेचें क्या फर्क पड़ता है, जो तब मैंने टाल दिए या सही से सबको समझा नहीं पाया। बात मृत हाथी या जीवित हाथी की नहीं है। एक बार तस्कर उद्योग रुपी शेर के मुँह में खून लग गया तो हमारे हाथी और यह पूरा अभयारण्य उनकी नज़र में आ जाएगा, वो नये हथकंडे, लालच लेकर आयेंगे और फिर यह वास्तु पशु विहार केवल नाम का अभयारण्य रह जाएगा…हमारे अलावा सरकार क्या करती है उसपर हमारा बस नहीं पर अपने से जितना ज़्यादा हो सके उतना अच्छा इसलिए लालच का अंकुर फूटने से पहले ही बीज हटाना बेहतर है। “

समाप्त!

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Other Titles: अन-अंकुरित, अन-अंकुरण 
#मोहित_शर्मा_ज़हन #mohitness #mohit_trendster

काश में दबी आह! (कहानी) #ज़हन

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स्कूल जाने को तैयार होती शिक्षिका सुरभि पड़ोस के टीवी पर चलता एक गाना सुनकर ठिठक गई। पहले इक्का-दुक्का बार उसे जो भ्रम हुआ था आज तेज़ गाने की आवाज़ ने वो दूर कर दिया। जाने कब वो सब भूलकर सुनते-सुनते उस गाने के बोल पड़ोस के घर के गेट से सटकर गुनगुनाने लगी। अपनी धुन में मगन सुरभि का ध्यान पडोसी की 4 साल की बेटी पीहू के अवाक चेहरे पर गया और वह मुस्कुराते हुए सामान्य होकर वहाँ से स्कूल की तरफ बढ़ चली। आज स्कूल में सुरभि का मन नहीं लग रहा था, वो तो यादों के सागर में गोते लगा रही थी। किस तरह वह अपने गायक, गिटारिस्ट बॉयफ्रेंड घनश्याम के गानों, रियाज़ को घंटो सुना करती थी। उसके दर्जनों गानों के बोल सुरभि को आज भी याद थे।

ज़िन्दगी को सुलझाते हुए जाने कब दोनों का रिश्ता उलझ गया और अपने सपनो का पीछा करता घनश्याम सुरभि से अलग हो गया। सुरभि में अपने परिवार से बग़ावत करने की हिम्मत नहीं थी। दूर जाने का दर्द तो दोनों को बहुत था पर अक्सर चल रहे पल इंसान के सामने कुछ ऐसे दांव रखते हैं कि बीते लम्हों की याद आने में काफी समय लग जाता है। कभी दो जिस्म, एक जान यह जोड़ा अब एकल जीवन में व्यस्त एक-दूसरे के संपर्क में भी नहीं था।  दोनों का लगा शायद वक़्त एक मौका और देगा पर कुछ सालों बाद सुरभि की शादी हो गई। आज वो खुश थी कि देर से सही पर कम से कम उसके पूर्व प्रेमी को अपनी मंज़िल तो मिली। शाम को लौटकर सबसे पहले उसने इंटरनेट पर इन गानों और घनश्याम का नाम ढूँढा। सुरभि हैरान थी कि इन गानों के साथ घनश्याम का नाम कहीं नहीं था। उसे लगा शायद घनश्याम ने मायानगरी जाकर अपना नाम बदल लिया हो पर गायको, म्यूजिक टीम की तस्वीरों, वीडिओज़ में घनश्याम कहीं नहीं था। सुरभि के आँसुओं की धारा में एक से अधिक दुख बह रहे थे। प्यार को जलाकर रिश्ते की आँच पर जो सपने पकायें थे उनके व्यर्थ जाने का दुख, घनश्याम की तरह हिम्मत ना दिखाने का दुख, उसका प्रेमी ज़िंदा भी है या नहीं यह तक ना जान पाने की टीस…

उधर लालगंज से दूर फ़िरोज़ाबाद में चूड़ी की दूकान पर खरीददार महिला को कंगन पहनाते घनश्याम के कानो पर रेडियो में किसी और द्वारा गाये अपने गानों का कोई असर नहीं पड़ रहा था। उसकी आँखों की तरह उसकी बातें भी पत्थर बन चुकी थीं।

समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन

टीनएज ट्रकवाली (कहानी) #ज़हन

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थाने में बैठा कमलू सिपाहियों, पत्रकारों और कुछ लोगो की भीड़ लगने का इंतज़ार कर रहा था ताकि अपनी कहानी ज़्यादा से ज़्यादा लोगो को सुना सके। पुलिस के बारे में उसने काफी उल्टा-सुल्टा सुन रखा था तो मन के दिलासे के लिए कुछ देर रुकना बेहतर समझा।

“हज़ारो किलोमीटर लम्बा सफर करते हैं हम ट्रक वाले साहब! एक बार में पूरा देश नाप देते हैं। जगह-जगह रुकता हूँ, सब जानते हैं मुझे। आपके थाने में 4 ढाबे पड़ते हैं पर रात में केवल एक खुला मिलता है तो अक्सर यहाँ रुकना होता है। एक बार उसके अगले पेट्रोल पंप के बाहर बैठी एक लड़की देखी, यहाँ की नहीं लग रही थी और पता नहीं रात को वहाँ क्या कर रही थी…या शायद मुझे पता था पर मैं मानना नहीं चाहता था। अगली बार जब आया तो वह लड़की मरी आँखों वाली एक औरत  बन गई थी। सोचा ‘काश उस दिन रुक जाता! पर रुककर, कर भी क्या लेता…रुक के देख तो ले पगले…शायद कुछ हो जाए।’ लोगो और पुलिस की नज़रों से बचने के लिए पेट्रोल पंप वाला धंधे पर एक-दो लड़कियाँ ही रखता था, जब किसी की नज़र पड़ती भी थी तो उसपर पैसे डाल दिया करता। पहले आप लोगो को बताया तो मुझे बाहर से ही भगा दिया फिर अपने जमा रुपयों से ये लड़की खरीदी और हेल्पर हटाकर इसे रख लिया। कुछ हफ्तों बाद यहाँ से जाते हुए एक लड़की दिखी, आदत ऐसे थोड़े ही जाती है। मैंने पंप के मालिक को समझाने की बहुत कोशिश की पर वो नहीं माना, उल्टा मुझे बेची लड़की ज़बरदस्ती वापस लेने की बात करने लगा। किसी तरह वो लड़की भी खरीदी, अब मेरी 2 हेल्पर हो गयीं। फिर महीनेभर बाद के चक्कर में एक और…मैंने कह-कहा के अपने एक दोस्त की शादी उस से करवा दी। जब अगले चक्कर में नई लड़की खड़ी दिखी तो रहा नहीं गया। मोड़ दिया ट्रक पेट्रोल पम्प की ओर और कुचल दिए उसके मालिक और 3 नौकर। फिर एक्सिलरेटर दबा के कूद गया बाहर, ट्रक लड़ा पेट्रोल टंकी में और ब्लास्ट हो गया।”

एक पत्रकार ने पूछा, “यह सही रास्ता नहीं है….तुम्हारे पागलपन में 2 निर्दोष लोग मारे गए और कुछ घायल हुए उनका क्या?”

कमलू मुस्कुराकर बोला – “उनका कुछ नहीं….जैसे रोज़ सबके सामने बिकती इन लड़कियों का कुछ नहीं। सही रास्ते पर चलकर देख लिया बाबू! कहीं नहीं जाता, बस गोल-गोल घुमाते हो तुम लोग और आदमी थक-हार कर लड़ाई छोड़ देता है।”

वह पत्रकार साथी पत्रकारों के सामने अपनी इतनी आसान चेक-मेट कैसे मान लेता, “अब इन लड़कियों का क्या होगा? इतनी ही फ़िक्र थी इनकी तो यह काम करने से पहले इनका तो सोचा होता।”

कमलू – “बाकी 15-16 की हैं पर इनमे एक 19 साल की है, उसको थोड़ा सिखाया है और लाइसेंस दिलवा दिए हैं। अभी छोटे रुट पर ट्रक चलाएगी बाकियों को बैठाकर।”

पत्रकार – “लाइसेंस दिलवा दिए हैं मतलब ट्रक के अलावा और क्या चलाएगी?”

कमलू – “ज़रुरत पड़ने पर बंदूक भी चलाएगी….”

समाप्त!

#मोहित_शर्मा_ज़हन #mohit_trendster

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