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क्रॉस कनेक्शन (लघुकथा) – मोहित ट्रेंडस्टर

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बगल के घर से आती आवाज़ों को सुन सुमेर सोच रहा था कि लोगो को उसके पडोसी मनसुख लाल की तरह नहीं होना चाहिए जो अपने परिवार की खातिर और कानून के डर से अपनी हिंसक बीवी सुशीला के हाथो पिटता रहे और कानो मे काँच सा घोलते तानो को ताउम्र सहता चला जाये। इधर शाम को आसमान को एकटक निहारते अपने पडोसी को देख कर मनसुख लाल सोचने लगा कि लोगो को सुमेर कुमार जैसा नहीं होना चाहिए जो पत्नी राधा के 2-4 तानो को अपनी मर्दानगी पर ले उसे दोमंज़िल से नीचे फ़ेंक दें और फिर हादसे का बहाना बना कर जीवन भर कोमा में पड़ी बीवी का बिल भरता रहे, ससुराल वालो से केस लड़ता रहे। तीसरे-चौथे पडोसी आपस में बातें कर रहे थे कि सुमेर की शादी सुशीला से होनी चाहिए थी और मनसुख का बंधन राधा से बंधना चाहिए था, तब कम से कम एक जोड़ा सुखी रहता और सुमेर -सुशीला के भी दिमाग ठिकाने रहते।
समाप्त!
टिप्पणी – जीवन में संतुलन हमेशा पूरा व्यक्तित्व बदल कर नहीं बल्कि अक्सर व्यक्ति में कुछ गुण, व्यवहार बदल कर भी लाया जा सकता है।
– मोहित शर्मा (ज़हन)
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कुछ पल और गुज़ार ले… | मोहित शर्मा (ज़हन)

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Artwork – Kinannti
रजनी का एक राष्ट्रीय चिकित्सीय प्रतियोगी परीक्षा का यह अंतिम अवसर था। रजनी की मेहनत घर में सबने देखी थी और डॉक्टर बनने का सपना भी लगनशील रजनी और उसके परिवार ने साथ देखा था। यह लगन ऐसी संक्रामक थी कि जीवन में कोई ध्येय ना लेकर चलने वाली, स्वभाव में विपरीत रजनी की जुड़वाँ बहन नव्या, सिर्फ उसके सहारे मेडिकल फील्ड लिए बैठी थी। यह रजनी की संगत का ही असर था जो पढाई में कमज़ोर नव्या ने अच्छे अंको से दसवी, बारहवीं पास की थी, यह नव्या भी इस राष्ट्रीय परीक्षा में अंतिम अवसर था। इंटरनेट पर परिणाम घोषित हुआ और एक बार फिर से रजनी बहुत कम अंतर से असफल हुयी। रजनी का जैसे पूरा संसार ही अंधकारमय हो गया। जब तक कोई कुछ समझाता, समझता उस से पहले ही रजनी ने आत्महत्या कर ली।
नव्या को पहले ही पता था कि वह सफल नहीं हो पाएगी और परिणाम ने उसके अंदेशे पर मोहर लगा दी पर खुद से ज़्यादा दुख नव्या को अपनी मेहनती बहन रजनी के लिए था। अब उसे लगा कि काश उसे थोड़ा समय मिल पाता अपनी बहन को समझाने का। माता-पिता अविश्वास से एकटक कहीं देखकर अपनी कल्पनाओ को सच्चाई पर हावी करने की हारी हुयी कोशिश कर रहे थे। कुछ समय बाद अपने परिवार के लिए नव्या ने स्वयं को संभाला और क्लीनिकल रिसर्च में 8 महीनो का कोर्स कर उसे अच्छे वेतन पर एक विदेशी कंपनी में नौकरी मिली। नव्या को पता था कि अगर उसकी जगह उसकी बहन होती तो अपने ज्ञान और मेहनत के दम पर उस से अच्छे स्थान पर होती, उस स्थान पर जो  उसे उस प्रतियोगी परीक्षा में सफल होने के बाद भी ना मिलता। कुछ समस्याएँ जो कभी जीवन को चारो और से घेरे ग्रहण लगाये सी प्रतीत होती है, जिनके कारण सुखद भविष्य की कल्पना असंभव लगती है, चंद महीनो बाद ऐसी समस्या का अस्तित्व तक नहीं रहता। थोड़ा और समय बीत जाने के बाद  तो दिमाग पर ज़ोर डालना पड़ता है कि ऐसी कोई दिक्कत थी भी जीवन में। नव्या अक्सर सपने में रजनी को समझाते हुए नम आँखें लिए जाग जाती है – “बहन! बस ये थोड़े लम्हें काट ले, जो इतना सहा…वो दर्द सहकर बस कुछ पल और गुज़ार ले….सवेरा होने को है…”
 समाप्त!
– मोहित शर्मा (ज़हन)
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बागेश्वरी पत्रिका # 05 (July 2015)

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Bageshwari Magazine (July 2015 Issue), Roles – सह-संपादक, निर्णायक – लघुकथा प्रतियोगिता, पत्रिका में प्रकाशित 2 कथाओं का लेखन। (Publisher – Yogesh Amana Gurjar)

भूरा हीरो बनाम ग्रीक गॉड – मोहित शर्मा (ज़हन)

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उम्र बढ़ने के साथ हम जीवन के विभिन्न पहलुओं में सामाजिक ढाँचे के अनुसार ढलते है और कभी-कभी ढाले जाते है। जैसे किसी देश में अगर मनोरंजन के किसी साधन या स्रोत पर पाबंदी है या प्रोत्साहन है वहाँ जनता की पसंद-टेस्ट उस अनुसार ढल जायेगी, यहाँ तक कि सामाजिक परिदृश्य को देखने में भी वैसा ही चश्मा पहना जाने लगेगा। दुनिया भर के मनोरंजन स्रोत देखने पर आप पाएंगे कि हर जगह कितना दूषितवर्गीकरण व्याप्त है साथ ही पश्चिमी देशो के गोरे वर्ण के लोगो को इतना अधिक इस तरह प्रोजेक्ट किया जाता है कि दुनिया में मानवजाति के वह सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। धीरे-धीरे समय के साथ हम बाकी किस्म के लोगो में भी वो मनोरंजन के साधन देखते-देखते यह बात और भावना घर कर जाती है। एक निश्चित सीमा और प्रारूप (format) के आदि हो जाने के कारण अगर उस से अलग या नया कुछ होता है तो कई लोग उसे सिरे से नकार देते है।

बाहुबली मेरे कुछ जानने वालो को सिर्फ इसलिए पसंद नहीं आई क्योकि ऐसे एक्शन और स्टोरीलाइन में वो गोरे रंग के ग्रीक गॉड मॉडल जैसे हीरोज़ को देखते आये है और यह दक्षिण भारतीय नायक प्रभास उन्हें जमा नहीं। यह नायक उन्हें किसी बॉलीवुड या स्थानीय मसाला फॉर्मेट में ही जमता। ऐसा शायद इस फिल्म के समापन भाग में अभिनेत्री अनुष्का शेट्टी को भी सुनने को मिले जो तब युवा अवस्था के किरदार में दिखेंगी। क्या इतना कड़ा है यह फॉर्मेट की आदत पड़ जाने का बंधन जो हम सौइयों अन्य बातों को भूलकर सिर्फ वर्ण या स्थान का रोना रोने बैठ जाएँ? मेहनत और प्रयोगो को सराहना सीखें क्योकि दुनिया के आगे बढ़ने में इन दोनों बातों का महत्वपूर्ण योगदान है। किसी ने टोका कि यह तो लोमड़ी के अंगूर खट्टे वाली बात हो गयी, भारत में ऐसे लोग मिलेंगे ही नहीं जो फॉर्मेट में फिट बैठे तो उन्हें बता दूँ कि भारत आपकी सोच से कहीं अधिक विशाल है, रैंडम देश के 15 – 20 शहरों का दौरा करें आपको हर तरह के प्रारूप के अनेको लोग मिल जायेंगे।

एक सम्बंधित एक्सट्रीम उदाहरण और उसका परिणाम भी बताना चाहूंगा, पाकिस्तान और बांग्लादेश के अलग होने के पीछे भी यह भावना थी। वही भावना कि वह हमारे जैसे नहीं है तो हम में से एक कैसे होंगे? पाकिस्तानी नेतृत्व, भारत के दूसरी तरफ बसे अपने बंगाली भाग के नागरिको से दोयम दर्जे सा व्यवहार करता था (दोनों रीजन्स के विकास में बहुत अंतर था) और उनका मखौल सा उड़ाता था (regional, ethnic ego) जिस वजह से दोनों स्थानो में दरार बढ़ती चली गयी और बांग्लादेश अलग हुआ। अलग बातों, चीज़ों, लोगो के प्रति लचीला रवैया अपनाये, ज़रूरी नहीं कि अगर कोई प्रारूप अनदेखा है तो बेकार ही होगा।

– मोहित शर्मा (ज़हन)
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*) – सच्चाई की सज़ा (कहानी)

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खोजी पत्रकार जैकी डेरून और उनके सहयोगी रॉजर वॉटसन के अथक प्रयासों के बाद उन्हें पिछड़े एशियाई एवम अफ़्रीकी देशो में संसाधनो के लालच में विकसित देशो और प्रभावी बहुराष्ट्रीय सरकारी-निजी संस्थाओं द्वारा बड़े स्तर पर किये गए अपराधो, नरसंहारों के पुख्ता सबूत और रिकॉर्डिंग्स मिले थे। उनके इस अभियान के कारण उनके पीछे कुछ गुप्त संस्थाओं के जासूस और हत्यारे लग गए थे। चूहे-बिल्ली के इस खेल में कुछ हफ्तों से जैकी और रॉजर किसी तरह अपनी जान बचा रहे थे, आखिरकार वह दोनों ऑस्ट्रेलिया के पास एक मानवरहित द्वीप पर फँस गये।
रॉजर – “हमारे पास अब आधा घंटा भी नहीं है, किसी भी पल कोई युद्धपोत या विमान हमारे परखच्चे उड़ा देगा। क्या हमने इस दिन के लिए की थी इतने वर्षो मेहनत?”
जैकी – “इतना भी नकारात्मक मत सोचो, रॉजर। मैंने अपने कुछ जर्नलिस्ट दोस्तों को कई दस्तावेज़, तस्वीरें और सबूत मेल कर दी है। आज यहाँ आने से पहले मैंने दुनियाभर की दर्जनो वेबसाइट्स पर अपने डाक्यूमेंट्स अपलोड भी कर दिए है।”
4-5 मिनट्स बाद कोई युद्धपोत या लड़ाकू विमान नहीं बल्कि कुछ मोटरबोट्स में सोइयों कमांडोज़ आये।
जैकी (एक ख़ुफ़िया जासूस के पास आने पर) – “कोई फायदा नहीं हमने अपने कंप्यूटरस और गैजेट्स जला दिए है।”
जासूस – “दिमाग के पक्के हो पर तकनीक में कच्चे हो! अब टेक्नोलॉजी इतनी विकसित है कि केवल सिग्नल्स के बल पर हमने दुनियाभर में बैठे तुम्हारे 11 पत्रकार मित्र जिनको तुमने मेल्स भेजे को “प्राकृतिक मौत” मार दिया, लगभग वो सभी 150 वेबसाइट्स बंद करवाई या वो वेबपेजेस डिलीट किये जहाँ तुमने कुछ भी अपलोड किया था, वह भी सिर्फ 5 घंटो के अंदर।
रॉजर – “जब सब कुछ ख़त्म कर दिया, तो हमे ज़िंदा पकड़ने का क्या मतलब?”
मतलब बंदी रॉजर और जैकी को अगले दिन प्रेस कांफ्रेंस में पता चला।
“लक्ज़मबर्ग निवासी पत्रकार जैकी डेरून और उनके सहयोगी रॉजर वॉटसन को ऑस्ट्रेलिया में आदिवासी इलाके क़ि महिलाओं के यौन उत्पीड़न का दोषी पाया गया है। इस खुलासे के बाद दुनियाभर से 7 अन्य महिलाओं ने इन दोनों पर यौन हिंसा के आरोप लगाएं है।”
प्रेस कांफ्रेंस पूरी होने से पहले ही दोनों के विरुद्ध आक्रोशित भीड़ के नारे लगने लगे। कुछ-एक प्रदर्शनकारी तो पुलिस बैरियर तोड़ कर उन्हें पीटने लगे। दुनियाभर से उन्हें मृत्युदंड देने की मांग उठने लगी। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि किस तरह बड़ी संस्थाएं, सरकारें अपने खिलाफ उठी आवाज़ों का इतनी क्रूरता से दमन करती है। उन्हें इस स्कैंडल में इसलिए डाला गया ताकि बाद में कभी अगर उनके नाम से कोई बचा हुआ दस्तावेज़, बात आदि कुछ उभरे तो लोगो में उनकी अपराधिक छवि के पूर्वाग्रह का फायदा उठाते हुए उन बचे-खुचे सबूतों को आसानी से नष्ट किया जा सके। अपना बाकी जीवन जैकी और रॉजर ने अमरीका की एक गुप्त जेल में अमानवीय यातनाएं सहते हुए काटा।
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*) – पुलिस बनाम जनता (लघुकथा)

एक समाचार वार्ता, खबर विश्लेषण प्रोग्राम में विचारकों, समाज सेवको, विशेषज्ञों, जनता और न्यूज़ एंकर ने वहाँ उपस्थित पुलिस अधीक्षक पर सवालो, कटाक्ष और पुलिस की आलोचना करती हुयी बातों की वर्षा कर दी। अपनी सफाई देने के लिए या योजनाएं-उपलब्धियां बताने के लिए वो जैसे ही होते तभी कहीं से तीखे शब्दों के तेज़ बाण वार्ता का रुख अपनी ओर कर लेते। कुछ ही देर में अधीक्षक महोदय अपनी लाचारी से खीज गये, और जवाब देने की आतुरता खोकर सबकी बातें सुनने लगे। अलग लोगो कि बातें अलग पर उन्होंने एक ट्रेंड गौर किया सबकी बातों मे जो मुख्यतः ये थी –
“इस लचर व्यवस्था पर क्या कहना चाहेंगे आप?”, “इस मेट्रो शहर में हर रोज़ होते अपराधो पर है कोई जवाब आपके पास?”, “कैसी बेदम और भ्रष्ट है यह पुलिस?”
अंततः उन्हें कार्यक्रम के अंत से ज़रा पहले औपचारिकता के लिए अपनी सफाई देने के लिए कहा गया तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ कि कोई वाकई में उनकी बात सुनने में इच्छुक है। अब तक वो अपनी रिपोर्ट्स के अंक-निष्कर्ष, भावी योजनाओ का सारांश आदि भूल चुके थे। इसलिए उन्होंने अपनी सफाई कम शब्दों में दी।
पुलिस अधीक्षक – “टैक्स-बिजली-अनाज चोरी से लेकर खून खराबे, दंगो तक खुद जनता को सारे कलयुगी काम करने है और पुलिस उन्हें सतयुग से उतरी चाहिए! पुलिसवाले अमावस की रात स्पेसशिप से उतरे एलियंस नहीं होते, इसी समाज से निकले लोग होते है….जैसी जनता – वैसी पुलिस….सिंपल!…बल्कि इस पैमाने के आधार पर तो जैसी जनता है उस हिसाब से यहाँ पुलिस काफी बेहतर है।”
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*) – झेल ले बिटिया…फिर तो राज करेगी
हर संयुक्त परिवार में सूरज बड़जात्या की “हम साथ साथ है” जैसी फिल्मो की तरह सतयुग सा माहौल होता है, यह भ्रम था कीर्ति और उसके परिवार को जो कीर्ति की शादी होते ही टूट गया। ससुराल में 5 भाइयों में कीर्ति तीसरे नंबर के भाई विनोद कि वधु बनी। कीर्ति अपनी ससुराल में खुश नहीं थी, जैसे सपने देखे थे वैसा कुछ नहीं था। वैसे एक प्यार करने वाला पति, चुपचाप बैठे ससुर जी और जेठ-देवर थे पर समस्या सासू माँ से थी। जो कीर्ति और उसकी 2 जेठानियों के लिए एक सास कम हिटलर ज़्यादा थी। बुज़ुर्ग होते हुए भी किसी बिगड़ैल किशोर सा अहंकार, बहुओं पर तरह-तरह की पाबंदियां, काम सही होने पर भी ताने और गलती होने पर तो बहुओं से ऐसा बर्ताव होता था जैसे उनकी वजह से दुनिया में प्रलय आ गयी। अब कीर्ति को पछतावा हो रहा था कि काश उसने शादी से पहले जेठानियों से किसी तरह बात कर ली होती। शादी के तुरंत बाद जब कीर्ति ने अपनी व्यथा अपने मायके में सुनाई तो माँ-बाप ने दिलासा देते हुए समझाया कि 4-5 साल सहन कर लो उसके बाद सास वैसे ही उम्रदराज़ होकर या तो अक्षम सी हो जायेंगी या परलोक सिधार जायेंगी। फिर तू अपने घर में राज करना।
22 वर्ष बाद सभी भाइयों की शादी हो चुकी है, सबके स्कूल-कॉलिज में पढ़ रहे बड़े बच्चे है। सास की दिनचर्या पहले की तरह सीमा पर तैनात एक सैनिक की तरह है, उनका स्वास्थ्य स्थिर है। कीर्ति के ससुर जी और माता-पिता स्वयं परलोक जा चुके है। कीर्ति के बड़े जेठ-जेठानी कुछ महीनो पहले लम्बी बीमारियों के बाद छोटे अंतराल में नहीं रहे। अब वह अपनी दूसरी जेठानी की तेरहवी में रिश्तेदारो और पंडितों को संभाल रही है, पीछे से सासू माँ का कोसना, टोकना, धक्का देना अनवरत जारी है।
दूर के कुछ रिश्तेदार आपस में बात कर रहे है।
“सेठ जी का पोता (सबसे बड़े लड़के का बेटा) जल्दी नौकरी पर लग गया, अपनी दीपाली के लिए अच्छा रहेगा।”
“पर सुना है सेठानी जी कुछ सनकी है। चौबीसो घंटे बहुओं के पीछे पड़ी रहती है। “
“जल्दी देख लो बाउजी, कहीं लड़का हाथ से निकल ना जाये।… अब मुश्किल से दो-चार बरस का जीवन है इनका, फिर आराम से रहेगी दीपाली।”
उनकी बात सुन रही, पास खड़ी कीर्ति ठहाके मारकर ज़मीन पर लोट गयी।
“….सदमा लगा है बेचारी को, जेठानी-देवरानी नहीं थी ये दोनों तो सहेलियों जैसी थी सच्ची….बहुत बुरा हुआ।”
समाप्त!
– मोहित शर्मा (ज़हन) ‪#‎mohitness‬ ‪#‎mohit_trendster‬ ‪#‎freelance_talents‬