Shehar ke Ped se Udaas Lagte ho… (Nazm)

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दबी जुबां में सही अपनी बात कहो,
सहते तो सब हैं…
…इसमें क्या नई बात भला!
जो दिन निकला है…हमेशा है ढला!
बड़ा बोझ सीने के पास रखते हो,
शहर के पेड़ से उदास लगते हो…

पलों को उड़ने दो उन्हें न रखना तोलकर,
लौट आयें जो परिंदों को यूँ ही रखना खोलकर।
पीले पन्नो की किताब कब तक रहेगी साथ भला,
नाकामियों का कश ले खुद का पुतला जला।
किसी पुराने चेहरे का नया सा नाम लगते हो,
शहर के पेड़ से उदास लगते हो…

साफ़ रखना है दामन और दुनियादारी भी चाहिए?
एक कोना पकड़िए तो दूजा गंवाइए…
खुशबू के पीछे भागना शौक नहीं,
इस उम्मीद में….
वो भीड़ में मिल जाए कहीं।
गुम चोट बने घूमों सराय में…
नींद में सच ही तो बकते हो,
शहर के पेड़ से उदास लगते हो…

फिर एक शाम ढ़ली,
नसीहतों की उम्र नहीं,
गली का मोड़ वही…
बंदिशों पर खुद जब बंदिश लगी,
ऐसे मौकों के लिए ही नक़ाब रखते हो?
शहर के पेड़ से उदास लगते हो…

बेदाग़ चेहरे पर मरती दुनिया क्या बात भला!
जिस्म के ज़ख्मों का इल्म उन्हें होने न दिया।
अब एक एहसान खुद पर कर दो,
चेहरा नोच कर जिस्म के निशान भर दो।
खुद से क्या खूब लड़ा करते हो,
शहर के पेड़ से उदास लगते हो…
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#ज़हन

Abhiman se Apman (Story for Kids) in Anubhav Magazine July 2019

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सलोना भालू फुलवारी वन का एक प्रतिभावान खिलाड़ी था। किशोरावस्था में ही वह अपनी उम्र से बड़े और अनुभवी खिलाडियों को नाकों चने चबवा देता था। जल्द ही उसका नाम फुलवारी वन और उसके आस-पास के इलाकों में भी फ़ैल गया। केवल एक खेल नहीं बल्कि भाला फेंक, शॉट पुट, 400/800 मीटर दौड़ और तेज़ चाल में वह कमाल का प्रदर्शन करता था। स्थानीय व अंतर-जंगलीय प्रतियोगिताओं में सलोना शीर्ष पदक जीतने लगा। आगामी प्रतियोगिता जंगलों के सबसे बड़ी, सम्मान वाली प्रतियोगिता थी। इसका नाम था जंगल ओलम्पिक। सलोना भालू का यह पहला ओलम्पिक था। वह कई महीनों पहले से गंभीर तैयारी में जुट गया। खेलों का आयोजन पुष्पपुर जंगल कर रहा था। लंबी यात्रा कर वहाँ पहुँचे सलोना को पुष्पपुर की दृष्टि की सीमा से विस्तृत फूलों की वादियों ने मोहित कर लिया। कम समय में सलोना बहुत से वन क्षेत्रों की यात्रा कर चुका था और अलग-अलग प्रजातियों के जानवरों से मिल चुका था। हर तरफ अपने कौशल की तारीफ़ सुनकर सलोना में दंभ भर गया था।
एकसाथ 4 खेलों में अपने जंगल का प्रतिनिधित्व करने वाला सलोना अकेला एथलीट था। अपनी जीत को लेकर वह इतना आश्वस्त था कि उसने अभ्यास छोड़ पुष्पपुर जंगल में विचरण और प्रतिष्ठित जानवरों के साथ उठना-बैठना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं अपने अभिमान में वह अभ्यास कर रहे जानवरों का मज़ाक भी उड़ाता था। जब फुलवारी जंगल के अन्य खिलाडियों और प्रशिक्षक ने सलोना को समझाने की कोशिश की तो उसने उल्टा उन्हें अपना प्रदर्शन उसके बराबर लाने की चुनौती दे दी। इतने पदक जीत चुके सलोना को अधिक टोकने की हिम्मत किसी में भी नहीं थी। अगले सप्ताह खेल शुरू हुए और एक के बाद एक प्रतिस्पर्धा में सलोना भालू को हार मिलने लगी। शुरुआत में 800 मीटर दौड़ में कांस्य भी न मिला, उसके बाद शॉट पुट, भाला फेंक में भी सलोना प्रथम 5 स्थान में जगह नहीं बना पाया। पहले पहल भाग्य को दोष दे रहा सलोना अब अपनी 4 में से 3 प्रतिस्पर्धाओं में बिना पदक रह गया था। अंत में 20 किलोमीटर तेज़ चाल  प्रतिस्पर्धा में उतरते हुए सलोना में पहले का दंभ हार के डर में बदल गया था। परिणाम सबकी आशा अनुरूप ही था। सीमित तैयारी, बिगड़ी लय और खोये आत्मविश्वास के साथ सलोना ये प्रतिस्पर्धा भी हार गया। उस रात गुस्से में खिलाडियों, निर्णायकों और सहायक स्टाफ के लिए बने खेल गाँव में सलोना भालू ने खूब तोड़-फोड़ मचायी। उपद्रव मचाते हुए उसके वीडियो समाचारों की सुर्खियां बन गये। फुलवारी वन ने इस बार पदक तालिका में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया लेकिन जंगल की इस उपलब्धि को सलोना के हुड़दंग से हुई बदनामी ने फीका कर दिया। सलोना को अपनी भूल पर पछतावा देर से हुआ। फुलवारी जंगल खेल संघ ने सलोना के ऊपर स्थानीय या अंतर-जंगलीय किसी भी खेल खेलने पर 5 वर्ष का प्रतिबंध लगा दिया।
प्रतिबंध की अवधि पूरी करने के बाद सलोना भालू ने ज़बरदस्त वापसी की और अपने जंगल के लिए कई पदक अर्जित किये। हालांकि, सलोना को अक्सर एक मलाल रहता है। अपनी भूल के कारण उसने एक खिलाडी के रूप में अपने उत्कृष्ट वर्ष (जिनमें वह शारीरिक, मानसिक रूप से अपने चरम पर था) गँवा दिये, साथ ही इतने बड़े मंच पर अपने जंगल का नाम ख़राब किया।
समाप्त!
 
सीख – छोटी उपलब्धियों से दंभ में आकर जीवन के बड़े लक्ष्यों से भटकना नहीं चाहिए और अपने क्षेत्र के अनुभवी लोगों की सलाह को कभी अनसुना नहीं करना चाहिए।

Contributor – Junction Planet Magazine

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2 contributions – An article on author Anurag Kumar Singh and a joint fan artwork with artist Yash Thakur, colorist Ajay Thapa published in Junction Planet e-zine by Comics Junction group (July 2019 issue).

Junction Planet Magazine - 01

Multiple articles in Junction Planet e-zine April 2019 (CFS)

Ghazal – रूठ लो…

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कुछ रास्तों की अपनी जुबां होती है,

कोई मोड़ चीखता है,

किसी कदम पर आह होती है…

——–

पूछे ज़माना कि इतने ज़माने क्या करते रहे?

ज़हरीले कुओं को राख से भरते रहे,

फर्ज़ी फकीरों के पैरों में पड़ते रहे,

गुजारिशों का ब्याज जमा करते रहे,

हारे वज़ीरों से लड़ते रहे…

और …खुद की ईजाद बीमारियों में खुद ही मरते रहे!

——–

रास्तों से अब बैर हो चला,

तो आगे बढ़ने से रुक जाएं क्या भला?

धीरे ही सही ज़िंदगी का जाम लेते हैं,

पगडण्डियों का हाथ थाम लेते हैं…

——–

अब कदमों में रफ़्तार नहीं तो न सही,

बरकत वाली नींद तो मिल रही,

बारूद की महक के पार देख तो सही…

नई सुबह की रौशनी तो खिल रही!

——–

सिर्फ उड़ना भर कामयाबी कैसे हो गई?

चलते हुए राह में कश्ती तो नहीं खो गई?

ज़मीन पर रूककर देख ज़रा तसल्ली मिले,

गुड़िया भरपेट चैन से सो तो गई…

——–

कुछ फैसलों की वफ़ा जान लो,

किस सोच से बने हैं…ये तुम मान लो,

कभी खुशफहमी में जो मिटा दिए…वो नाम लो!

——–

किसका क्या मतलब है…यह बरसात से पूछ लो,

धुली परतों से अपनों का पता पूछ लो…

अब जो बदले हो इसकी ख़ातिर,

अपने बीते कल से थोड़ा रूठ लो…

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#ज़हन

*Published – Ghazal Dhara (June 2019)

March ’19 Updates

Gift from Google #LocalGuides
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New story published – Anubhav Magazine (March 2019) Yatra Visheshank
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Kind words by artist-author Shambhu Nath Mahto
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TWG Game Final Stats and Hall of Fame Entry
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Successful Event: Indian Comics Fandom Awards 2018
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Poetry session, Lucknow
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News mentions, appearances…

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Great minds think alike… Langoor Peace Accord 1994, Sikandra (Akbar’s Tomb)

 Memories
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February 2019 Chess24 stats
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New job, new city (Noida).
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Seasonal flowers – Home Garden

Prayas (Hindi Story)

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Story ‘Prayas’ in Anubhav Patrika

कौवों का हमला Rap #ज़हन

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Wrote a promo rap for Ajay Kumar’s book

कांव कांव – धाँय धाँय,
इंसानों की हाय हाय!

सुन ले पक्की वार्निंग
नहीं है ये कोई जुमला
तेरी ऐसी तैसी करने प्रेज़ेंटिंग…
कौवों का हमला!
आजा तेरी एसयूवी का घमंड तोड़ दूँ,
बोनट पर अपनी बीट निचोड़ दूँ
कांव कांव – धाँय धाँय,
इंसानों की हाय हाय!

अपुन की तेज़ नज़र,
रखे हर बात की खबर,
साइज अपना छोटा…
पर दिल से गब्बर!
कैच मी इफ यू कैन,
उड़ा मैं फर्र-फर्र…
कांव कांव – धाँय धाँय,
इंसानों की हाय हाय!

कहे काग को चालू,
ये साला होमो सेपियन मक्खीचूस,
खुद गधे की शक्ल वाला,
मुझे कहे मनहूस!
कांव कांव – धाँय धाँय,
इंसानों की हाय हाय!

चिल करते ब्रोज़ को हुर्र हुररर कहके उड़ाये,
पितृ पक्ष में पूड़ी लेकर पीछे भागा आये।
क्रो गैंग से पंगा मत ले…
अपनी चोंच से जाने कितने टकले सुजाये।
कांव कांव – धाँय धाँय,
इंसानों की हाय हाय!

तोड़ेगा तेरी ईगो का गमला,
फ्रेश रापचिक कौवों का हमला।
तो सारे बोलो…
कांव कांव – धाँय धाँय,
इंसानों की हाय हाय!

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– मोहित शर्मा ज़हन

Oct 2018 Updates #mohit_trendster

Freelance Talents nomination certificate India 5000 Best MSME Award 2018

Event – Sooraj Pocket Books: Baaten, Kitaben, Mulaqaten #2 (30 September 2018)

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Google Local Guides Level #06

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Event appearance News Dainik Jagran (October 2018) and Dainik Bhaskar (September 2018)

 

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Dawriter Top Writers list

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Chess24 stats

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Super Cricket Level 10

Interview with Author Ajay Kumar Singh (Part #01)

Interview (Part #02)

गृहणी को इज़्ज़त की भीख (कहानी) #zahan

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सरकारी बैंक में प्रबंधक कार्तिक आज कई हफ़्तों बाद अपने अंतरिक्ष विज्ञानी दोस्त सतबीर के घर आया हुआ था। सतबीर के घर रात के खाने के बाद बाहर फिल्म देखने का कार्यक्रम था। खाना तैयार होने में कुछ समय था तो दोनों गृहणियाँ पतियों को बैठक में छोड़ अपनी बातों में लग गयीं। इधर कुछ बातों बाद कार्तिक ने मनोरंजन बढ़ाने के लिए कहा –

“कितनी बचकानी, बेवकूफ़ी भरी बातें करती रहती हैं ये लेडीज़ लोग।”

अपनी बात पर मनचाही सहमति नहीं मिलने और लंबी होती ख़ामोशी तोड़ने के लिए कार्तिक बोला –
“…मेरा मतलब यहाँ हम दोनों अगर अंगोला के गृह युद्ध की बात कर रहे होंगे तो वहाँ दोनों चचिया ससुर की उनके पड़ोसी से लड़ाई पर बतिया रही होंगी, यहाँ हिमाचल में हुयी उल्का-वृष्टि पर बात होगी तो वहाँ बुआ जी के सिर में पड़े गुमड़े की, इधर भारत की विदेश नीति तो उधर चुन्नी और समीज का कलर कॉम्बिनेशन मिलाया जा रहा होगा। मतलब हद है!”

सतबीर ने कुछ सोच कर कहा – “हाँ, हद तो है…”

कार्तिक ने सहमति पाकर कुछ राहत की सांस ही थी कि…“

सतबीर – “हद है हमारे नज़रिये की! ग़लती से ही सही ठीक किया था सरकार ने जब जनगणना में गृहणियों का कॉलम भिखारियों के पास लगा दिया था। बेचारी अपना सब कुछ दे देती हैं और बदले में इज़्ज़त की चिल्लर तक नहीं मिलती। बराबर के मौके और परवरिश की बात छोड़ देता हूँ….यह बता ये लोग जैसी हैं वैसी ना होतीं तो क्या आज हम लोग ऐसे होते?”

कार्तिक – “भाई, मैं समझा नहीं?”

सतबीर – “मतलब ये लेडीज़ लोग भी विदेश नीति, आर्थिक मंदी, अंतरिक्ष विज्ञान फलाना में हम जैसी रूचि लेती तो क्या हम दोनों के घर उतने आराम से चल पाते जैसे अब चलते हैं? घर की कितनी टेंशन तो ये लोग हम तक आने ही नहीं देती और उसी वजह से हम अपने पेशों में इतना लग कर काम कर पाते हैं और बाहर की सोच पाते हैं। जहाँ हम प्रमोशन, वेतन, अवार्ड आदि में उपलब्धि ढूँढ़ते हैं….ये तो बस पति और परिवार में ही अपने सपने घोल देती हैं। अगर ये लोग अपने सपने हमसे अलग कर लें तो बहुत संभव है कि ये तो बेहतर मकाम पा लें पर हमारी ऐसी तैसी हो जाये। इस तरह आराम से बैठ कर दुनियादारी की बात करना मुश्किल हो जायेगा, ईगो की लंका लगेगी सो अलग! हा हा…ये तो हम जैसे करोड़ों का लाइफ सपोर्ट सिस्टम हैं जिनके बिना हमारा जीवन कोमा में चला जाये। तो गृहणियाँ ऐसी ही सम्पूर्ण और बहुत अच्छी हैं! इनसे बैटमैन बनने की उम्मीद मत लगा वो तू खुद भी नहीं हो सकता। इन्हें भीख सी इज़्ज़त मिले तो लानत है हमपर!”

कार्तिक – “हाँ, हाँ…सतबीर के बच्चे सांस ले ले, मैं समझ गया। आज तो गूगली फेंक दी मेरे भाई ने….”

सतबीर – “रुक अभी ख़त्म नहीं हुआ लेक्चर! एक बात और बता ज़रा…इतनी दुनिया भर की बातें करता है मुझसे, यहाँ तक की ब्रह्माण्ड तक नहीं छोड़ता। अपने प्रोफेशन के बाहर कितनी तोपें उखाड़ी हैं तूने? शर्ट प्रेस करनी आती नहीं है और अंगोला के गृहयुद्ध रुकवा लो इस से…”

हँसते हुए कार्तिक को आज अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण लेक्चर मिला था।

समाप्त!
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Daanv (Shayari) #ghazal #zahan

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रोटी के रेशों में चेहरा दिखेगा,
उजली सहर में रंग गहरा दिखेगा।
सच्चे किस्सों पर झूठा मोल मिलेगा,
बीते दिनों का रास्ता गोल मिलेगा।

किसको मनाने के ख्वाब लेकर आये हो?
घर पर इस बार क्या बहाना बनाये हो?
रहने दो और बातें बढ़ेंगी,
पहरेदार की त्योरियां चढेगीं।
चलो हम कठपुतली बनकर देखें,
जलते समाज से आँखें सेंके।

हाथों की लकीरों में उलझ जाएगा,
हमें बचाने भी कोई हमसा ही आएगा।
फिर ना निकले कोई सिरफिरा,
तमाशबीनों का मज़ा किरकिरा।

कुछ तो मन बनाना पड़ेगा,
नहीं तो अपना कर्ज़ा बढ़ेगा।
चाल चलकर देख ही लो…
हाथ तो दोनों सूरत में मलना पड़ेगा।
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#ज़हन

One of the Introductory poems by yours truly – Ibadat Ishq ki (Book) by Vikas Durga Mahto

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