Kubodh (Hindi Story) #zahan

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इंटरनेट क्रांति के बाद समान विचार, व्यवसाय और रुचियों वाले लोग काफी करीब आ गये थे। जहाँ किसी और दौर में अनमोल जैसे नये लेखक के लिए स्थापित साहित्यकारों से बात करना सपना होता वहीं अब सोशल मीडिया पर रोज़ बड़े नामों से बातचीत हो जाया करती थी। कुछ बातें लंबी खींच जाती तो कुछ थोड़े शब्दों में निपट जाती। कुछ बड़े नामों को सोशल मीडिया की लत लग गयी थी…पर समस्या यह थी कि वे बड़े नाम थे। अब पूरा दिन ऑनलाइन भी रहना था और आम जनता के लिए खुद को व्यस्त भी दिखाना था। उनकी प्रोफाइल व अक्सर साझा की गयी जानकारी बड़ी अच्छी लगती। ऐसा लगता जैसे हर बात, हर पोस्ट-अपडेट में बड़ा समय दिया गया है। ऐसे ही एक ‘कुछ बड़े’ सज्जन सुबोध दिखाते कि उन्हें अपनी ऑनलाइन छवि का कोई फर्क नहीं पड़ता पर नामचीन लोगों-कलाकारों के साथ उनकी तस्वीरें, उनको टैग करती लंबी पोस्ट्स देखकर लगता कि उनके सबसे बड़े राज़दार तो सुबोध साहब हैं। मानो अपने सोशल मीडिया के लिए उन्होंने अलग से पी.आर. (जनसंपर्क) अधिकारी रखा हुआ हो। सुबोध की ऑनलाइन जगमगाहट से आकर्षित अनमोल अक्सर उनकी तस्वीरों, बातों और पोस्ट्स पर अपने विचार रखता पर उसे कोई जवाब नहीं मिलता। जबकि सुबोध की बातों पर इतना मज़मा नहीं होता था कि वे कभी अनमोल से बात तक ना कर पायें। उनसे कहीं बड़े और व्यस्त लोग अनमोल की बातों से प्रभावित होकर उससे चर्चा करते रहते थे।

“व्यस्त लेखकों के पास कहाँ समय होता होगा कि सबको जवाब दें।”

ऐसा सोचकर अनमोल बात भूल गया। कई वर्षों तक गाहे बगाहे सुबोध की ऑनलाइन गतिविधि देखने के बाद अनमोल ने गौर किया कि सुबोध अपने साथ काम करने वालों और अपने स्तर से ऊपर के कलाकारों पर ही ध्यान देते हैं….या अगर कोई किसी कारणवश देश या विदेश की ख़बरों में आया हो। अनमोल जैसे बहुत से लोग सुबोध को दिखते नहीं थे।

अनमोल अपनी रिटेल नौकरी करते हुए लिखता रहा और उसके एकसाथ 3 उपन्यास प्रकाशित हुए। अनमोल जल्द ही बाजार में ‘बड़ा नाम’ बन गया और उसकी किताबों के अधिकार एक नामी फिल्म निर्माता ने खरीद लिए। खबर आते ही सुबोध का रडार गड़गड़ाया और उन्होंने अनमोल को टैग करते हुए उसकी मेहनत, लगन, फलाना-ढिमका पर ढाई किलोमीटर की पोस्ट कर दी। वह जनता को दिखा रहे थे कि “देखो, मैं एक और बड़े नाम -अनमोल को जानता हूँ।” अनमोल ने सुबोध की पोस्ट की बातें पढ़ी और “भक!” बोलकर…उन्हें ब्लॉक कर मन की शान्ति पायी।

समाप्त!
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Rikshaw waali Chachi (Hindi Story) #zahan

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“डॉक्टर ने तेरी चाची के लिए क्या बताया है?”

मनोरमा ने अपनी देवरानी सुभद्रा के बारे में अपनी 17 वर्षीय बेटी दिव्या से पूछा।

“मेजर डिप्रेशन बताया है।”

मनोरमा ने तंज कसा, “हाँ, उस झल्ली सी को ही हो सकता है ऐसा कुछ!”

दिव्या अपनी चाची के लिए ऐसे तानों, बातों से उलझन में पड़ जाती थी।

हर शाम छत पर टहलना दिव्या को पसंद था। पास में पार्क था पर शायद उसकी उम्र अब जा चुकी थी। छत पर उसकी फेवरेट निम्मी दीदी मिल जाती थी। वो दिव्या के संयुक्त परिवार से सटे पी.जी. में  रहकर स्थानीय कॉलेज में इतिहास की प्राध्यापक थी। अक्सर दिनचर्या से बोर होती निम्मी भी दिव्या के परिवार की बातों में रूचि लेती थी। घर के लगभग 2 दर्जन सदस्यों से ढंग से मिले बिना भी निम्मी को उनकीं कई आदतें, किस्से याद हो गये थे। सुभद्रा चाची के गंभीर अवसाद में आने की ख़बर से आज वो चर्चा का केंद्र बन गयीं।

दिव्या – “बड़ा बुरा लगता है चाची जी के लिए। बच्चा-बड़ा हर कोई उनसे ऐसे बर्ताव करता है…”

निम्मी ने गहरी सांस ली, “औरत की यही कहानी है।”

दिव्या – “अरे नहीं दीदी, यहाँ वो वाली बात नहीं है। सुभद्रा चाची से छोटी 2 चाचियाँ और हैं। मजाल है जो कोई उनको ऐसे बुला दे या उनके पति, दादा-दादी ज़रा ऊँची आवाज़ में हड़क दें। तुरंत कड़क आवाज़ में ऐसा जवाब आता है कि सुनाने वाले की बोलती बंद हो जाती है। किसी ताने या बहस में उनके सख्त हाव भाव….यूँ कूद के पड़ती हैं जैसे शहर की रामलीला में वीर हनुमान असुर वध वाली मुद्रा बनाते हैं। इस कारण उनकी बड़ी ग़लती पर ही उन्हें सुनाया जाता है बाकी बातों में पास मिल जाता है। वहीं सुभद्रा चाची को छोटी बातों तक में कोई भी सुनाकर चला जाता है। चाचा और दादी-दादा हाथ भी उठा लेते हैं। अब ऐसे में बड़ा डिप्रेशन कैसे ना हो?”

निम्मी ने हामी में सिर हिलाते कहा – “हम्म…यानी तुम्हारी सुभद्रा चाची घर की रिक्शावाली हैं।”

दिव्या चौंकी – “हैं? रिक्शेवाली चाची? नहीं समझ आया, दीदी।”

निम्मी – “अरे, समझाती हूँ बाबा! देखो, छोटी बात पर कार या बाइक से उतर कर रिक्शेवालों को थप्पड़ मारते, उन्हें पीटते लोग आम दृश्य है। ऐसे ही मज़दूर, अन्य छोटे कामगारों को पीटना आसान है और लोग अक्सर पीटते भी हैं। वहीं अगर कोई बड़ी बात ना हो तो बाकी लोगो को पीटना जैसे कोई कार में बैठा व्यापारी या बाइक चला रहा मध्यमवर्गीय इंजीनियर मुश्किल होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ‘बड़े लोगों’ की एक सीमा बन जाती है उनके हाव भाव, पहनावे, बातों से…यह सुरक्षा कवच ‘छोटे लोगों’ के पास नहीं होता। वो तो बेचारे सबके पंचिंग बैग होते हैं। अन्य लोगो के अहंकार को शांत करने वाला एक स्थाई पॉइंट। ऐसा ही कुछ सीधे लोगों के साथ उनके घर और बाहर होता है। कई बार तो सही होने के बाद भी ऐसे लोग बहस हार जाते हैं।”

दिव्या – “ओह! यानी अपनी बॉडी लैंग्वेज, भोली बातों से चाची ने बाकी सदस्यों को अपनी बेइज़्ज़ती करने और हाथ उठाने की छूट दे दी जो बाकी महिलाओं या किसी छोटे-बड़े सदस्य ने नहीं दी। अगर चाची भी औरों की तरह कुछ गुस्सा दिखातीं, अपने से छोटों को लताड़ दिया करती और खुद पर आने पे पूरी शिद्दत से बहस करती तो उन्हें इज़्ज़त मिलती। फ़िर वो डिप्रेस भी ना होती। दीदी, क्या चाची जैसी नेचर होना अभिशाप है?”

निम्मी ने थोड़ा रूककर सिर ना में हिलाया पर उसका मन हाँ कह रहा था।

समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन

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Kyun kehte hain? (Laghukatha) #zahan

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क्यों कहते हैं? (लघुकथा) #ज़हन

चाय की दुकान पर नये-पुराने ग्राहकों के बीच एक ऐसा ग्राहक कुक्कू जिसे दोबारा कभी उस जगह नहीं आना था। कुक्कू के साथ उसकी रूसी गर्लफ्रेंड डेना भी थी।

कुक्कू – “ओए! 2 चाय, एक खस्ता बना।”

चाय वाला  – “ठीक है सर।”

कुक्कू – “….और सुन बे! अच्छी चाय ज़्यादा दूध वाली साथ में खस्ता बड़ा वाला एक्स्ट्रा चटनी के साथ।”

चाय वाला  – “अच्छा!”

इसके बाद दुकानदार खुद से बड़बड़ाया। – “क्यों? औरों से ज़्यादा पैसे दे रहे हो जो सब एक्स्ट्रा चाहिए?”

कुक्कू साहब ने बड़बड़ाहट में अपनी तौहीन सुन ली थी। तुरंत कुपोषित चाय वाले की रसीद काटने के लिए उसका कॉलर पकड़ लिया।

“हरामखोर! उतना बोल जितना है। इतना ग़लत कमाते हो तुम लोग….”

चाय वाला – “नहीं पीनी तो मत पियो, साब! गाली क्यों दे रहे हो? किसी भी सरकारी या प्राइवेट दफ्तर में चले जाओ….पूरी दुनिया ही ग़लत कमा रही है।”

कुछ हिन्दी और हाव-भाव समझ रही डेना ने कुक्कू से पूरी बात समझनी चाही।

जब कुक्कू ने बात समझायी तो डेना बोली -“चाय वाला सही तो कह रहा है। जैसा दाम, वैसा काम…या तो फिर सभी को हमारे जैसा सर्व करे या हमें सबके जैसी चाय और खस्ता परोसे।”

कुक्कू झुंझला कर बोला – “नहीं बेबी, तुम समझ नहीं रही हो। ऐसा यहाँ कहते हैं…”

डेना का मासूम सवाल – “क्यों कहते हैं?”

समाप्त!

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Art – Tina K.

4 stories in Horror Diaries #01 (Fiction Comics)

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Fiction Comics Set #01 (with Free Trading Cards and Poster), Congratulations Team FC and Thank you Sushant Panda ji, Basant Panda ji for selecting my stories “Stunt”, “Tap…Tap”, “Seema Samapt” and “Just Chill” for publication in Horror Diaries #1.

Sachcha Salute (Hindi Story) #Zahan

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सर्दी का एक शांत दिन। इस मौसम में तापमान और अपराध काफी कम हो गये थे। वार्सा जंगली देहात में नियुक्त हुए नये थानेदार बिमलेश शर्मा ने फाइलों में गुम दीवान से कहा – “इस बार सरकार सख्त है। आप भी कंप्यूटर सीख लो दीवान जी, नहीं तो 60 से पहले रिटायरमेंट पकड़ा देंगे कप्तान साहब।”

“4-5 साल बचे हैं सर। अब दिमाग खपा के क्या करेंगे? जब तक वो ऑडिट-शॉड़िंत करेंगे तब तक वैसे ही रिटायर होने का समय आ जाएगा।”

विमलेश – “अच्छा, थाने के आस-पास ये बुढ़िया कौन घूमती रहती है? इतना मन से सैल्यूट तो सिपाही नहीं मारते जितने मन से वो सैल्यूट करती है।”

दीवान – “अरे वो पागल है सर कुछ भी बड़बड़ाती रहती है। डेढ़ साल से तो मैं ही देख रहा हूँ और सिपाही तो बताते हैं कि मेरे आने से पहले से है। किसी को उसकी बात भी नहीं समझ आती। शायद बच्चा मर गया करके कुछ कहती रहती है। इसके अलावा कोई शब्द कभी, कोई कभी। पता नहीं चलता कि कौन है, कहाँ की है। बोली से यहाँ की तो लगती नहीं। छोड़ो सर, क्यों टाइम ख़राब करना।”

इस से आगे सवाल करना “सामान्य दुनिया” के लिए बचकाना माना जाता है इसलिए जिज्ञासा होते हुए भी विमलेश चुप हो गया। थाने में जीप से आते जाते हुए बुढ़िया का दिल से किया हुआ सैल्यूट विमलेश का दिल चीर देता था और उन भोली, सच्ची सी आँखों में झाँकने की तो जैसे उसमे हिम्मत ही नहीं थी। नज़रें फेर कर विमलेश ड्राइवर से बात करने या फ़ोन पर व्यस्त होने का नाटक करता। आखिर सिपाहियों और जूनियर अफसरों के सामने उसे खुद को बचकाना थोड़े ही दिखाना था।

शहर से दूर स्थित इस जंगली क्षेत्र में सरकार और निजी कंपनियों के विस्तार से वन संपदा नष्ट हो रही थी। जंगल की जनजातियों का निवासस्थान और भोजन के स्रोत कम होते जा रहे थे। बड़े शहरों के न्यायालयों में अंट-शंट विस्तारीकरण तोलना आसान है। पहले तो वहाँ पहुँचते-पहुँचते जंगलों की आवाज़ गुम हो जाती है…उसपर बड़े लोगो के पास अपने अनुसार परिष्कृत चिकनी-चुपड़ी भाषा में न्याय की देवी को बरगलाने का पुराना अनुभव है। आदिवासी रोष का फूलता गुब्बारा फोड़ने के लिए एक दुर्घटना काफी थी। दुर्भाग्य से वो बहुत जल्द हो गयी। निर्माणाधीन बांध का हिंसा टूटने से बहे गाँव से आदिवासियों में बहुत गुस्सा भर गया। उन्होंने आस-पास के सरकारी और निजी संस्थानों को घेरकर तोड़फोड़, आगजनी और वहाँ नियुक्त कर्मचारियों को मारना शुरू कर दिया। दंगे जैसी स्थिति में वार्सा थाना भी चपेट में आ गया। थाने के कुछ सिपाही और सीमित संसाधन आदिवासी फ़ौज के सामने पर्याप्त नहीं थे। बाढ़ से अस्त-व्यस्त हुए रास्तों और बाहर से कट चुके वार्सा की भौगोलिक स्थिति के कारण मदद आने में समय लगता। ऊपर से हिंसा बड़े क्षेत्र में फैली थी इसलिए कुछ दिनों तक वहाँ नियुक्त पुलिस बल को खुद ही जूझना था…पर क्या उनके पास कुछ घंटे भी थे या नहीं?

भीड़ ने थाने के आस-पास आग लगा दी और धीरे-धीरे अपने और ढाई दर्जन पुलिस बल के बीच दूरी कम करने लगे। स्थानीय लोगों और आदिवासी कर्मचारियों को बक्शा जा रहा था बाकी सभी ‘शहरी दानवों’ को ख़त्म किया जा रहा था। डाकघर, बांध, नरेगा दफ्तर आदि कार्यालयों को पहले ही स्वाहा कर चुके आदिवासीयों का सामना पहली बार बंदूकधारी ‘दुश्मन’ से था। हवाई फायरिंग बेअसर रही। कुछ सिपाही जंगलों में भागे और कुछ लड़ते हुए मारे गये। पीछे से उड़ती ईंट लगने के बाद विमलेश बेहोश हो गया। बंद होती आँखों को ये एहसास था कि शायद अब वो दोबारा नहीं खुल पायेंगी।

आँखें दोबारा खुलीं…सूरज की किरणों को रोकता बुढ़िया का मुस्काता चेहरा विमलेश को देख रहा था। जब उसकी आँखें रौशनी के हिसाब से देखने लायक हुई तो बुढ़िया वापस सैल्यूट की मुद्रा में आ गयी। विमलेश को बीते चार दिनों की कुछ बातें याद आ रही थी। इन 4-5 दिनों में बुढ़िया ने झाड़ियों में टिन-प्लास्टिक के सहारे बने अपने छोटे से बसेरे में विमलेश को आदिवासियों की नज़रों से बचा कर रखा था। उस दिन धुएँ, ऊहापोह के बीच बुढ़िया भगदड़ में जगह-जगह से चोटिल, बेहोश थानेदार को खून के प्यासे आदिवासियों के बीच से घसीट लायी थी। बुखार में तपते, कभी होश में आते तो कभी बेसुध होते विमलेश को बुढ़िया अपने गुज़ारे वाला चीनी का पानी और अपने मुँह से चबाये चने खिला रही थी।

स्थिति अब काबू में थी और अर्धसैनिक बल, आपातकालीन दल क्षेत्र में फ़ैल चुके थे। बूढी अम्मा के सहारे घिसटता हुआ वह किसी तरह अपने स्टेशन तक पहुँचा। विमलेश पागल बुढ़िया को माँ की तरह अपनाकर उसकी देखभाल करने का फैसला कर चुका था। एम्बुलेंस का इंतेज़ार करते स्ट्रेचर पर पड़े विमलेश की नज़रें बूढी अम्मा को ढूँढ रही थीं, जो लोगो की भीड़ में जाने कहाँ गायब हो गयी थी? मन में कुछ आशंका जन्मीं – “कहीं किसी ने उसे दुत्कार कर भगा तो नहीं दिया? भीड़ देखकर वो दूर तो नहीं चली गयी? नहीं-नहीं!” इतने में भीड़ को किनारे करती बुढ़िया विमलेश को पिलाने अपनी चीनी के पानी वाली पन्नी लेकर आयी। झर-झर बहती आँखों से विमलेश स्ट्रेचर पर लड़खड़ा कर खड़ा हुआ…और  बुढ़िया को सैल्यूट करने लगा।

समाप्त!
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Artwork – Nicola S.

Comics Theory (Issue #01)

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Comics Theory’s Ghosts of India Issue 1, released now! (Anthology includes 1 short comic by me and Harendra Saini) Recent event – Indie Comix Fest 13 May 2018, Noida/Delhi.
#comics #horror #india #mohitness #comicstheory #anthology

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Special Edition

Tan-Mann ka Vaham #zahan

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एक अंधेरे गलियारे में विजय बेचैनी से घूम रहा था। दूर अपनी पत्नी जीवा की परछाई देख उसकी उलझन कुछ कम हुई।
“बड़ी देर लगा दी इस बार?”

जीवा – “हाँ, अमीर लोगों में रिश्तेदार तो कम होते हैं पर उनके चेले-चपाटो की भीड़ इतनी रहती है कि समय लग गया।”

जीवा अपनी पहचान बदल कर एक निजी अस्पताल से जुड़वाँ बच्चे चोरी कर लायी थी। दोनों की अपेक्षा से उलट काम जल्दी और आसानी से हो गया। कुछ दिन शांत रहने के बाद डीलर से एकसाथ दो बच्चों का बढ़िया दाम मिलने की उम्मीद थी।

उसी रात जीवा ने विजय को जगाया।

“सुनो मेरा मन कुछ अजीब सा हो रहा है। तबियत ख़राब लग रही है। तुम्हे पूरे शरीर में खुजली नहीं हो रही?”

विजय – “हाँ, हरारत सी तो लग रही है। मैं तुझसे पूछने ही वाला था।”

जीवा ने संकोच से पूछा – “कहीं किसी ने बददुआ तो नहीं दे दी? कोई छाया-प्रेत ना छोड़ दिया हो…”

विजय – “हाँ! 2 दर्जन बच्चे उठाने के बाद तो जैसे तुझे बड़ी दुआएं मिली होंगी। शायद मौसम बदलने का असर होगा। अभी गोली ले लेते हैं…सुबह देखेंगे।”

सुबह दोनों के हाल ख़राब हो गये थे। जगह-जगह चकत्ते पड़ गये थे, तेज़ बुखार और हरी-नीली नसें बाहर आने को थी।

जीवा – “देखो मैंने कहा था ये किसी ऊपरी आत्मा का प्रकोप है। दोनों बच्चे एकदम ठीक हैं। अभी भी समय है, हम बच्चे लौटाकर माफ़ी मांग आते हैं।”

हर पल बिगड़ती हालत में विजय और जीवा को यही सबसे सही उपाय लगा। बच्चा चोर व्यापार चैन के दोनों मज़दूर, बच्चों को लेकर अस्पताल गये। जल्द ही पुलिस के साथ बच्चों के घरवाले आ गये। जीवा और विजय बच्चों के अभिभावकों से अपने कर्मों की माफ़ी मांगने लगे और खुद से ऊपरी छाया हटाने की विनती करने लगे। तब हवलदार ने उन्हें बताया – “तुमपर कोई प्रेत-व्रत नहीं है। यह युगल अफ्रीका के देश घाना से लौटा हैं। जहाँ से लौटते हुए इन्हे वहाँ फैल रहा रोटोला रोग हो गया है। स्त्री के गर्भवती होने, शुरुआती लक्षण गंभीर होने के कारण दंपत्ति इस अस्पताल में भर्ती हो गया और संयोग से उसी दिन ये दो बच्चे हो गये। माँ से यह संक्रमण बच्चों में आ गया। अगले दिन रोटोला के सही इलाज के लिए इन्हे शहर के बड़े हॉस्पिटल भेजा जाना था कि उस से पहले ही तुमने बच्चे उठा लिये।”

विजय ने अपनी चुसी हुई काया की शक्ति जुटाकर पूछा – “…तो ये बच्चे कैसे ठीक थे?”

हवलदार – “ठीक नहीं थे, उनपर दवाई की भारी डोज़ का असर था इसलिए पूरे लक्षण पता नहीं चल रहे थे।”

वैसे गलती दोनों की थी पर खीजते विजय का मन जीवा को थप्पड़ मारने का था…उसमें अब शक्ति कहाँ थी।

समाप्त!
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Art – Azika H.

Adrenalin Rush waali Jhurjhuri (Hindi Story) #zahan

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दिलीप ने चलती गाड़ी से शराब की बोतल सड़क पर पटकी। नशे में कार चला रहे उसके दोस्त हफ़ीज़ ने उसे टोका।
“ऐसे बोतल नहीं फेंकनी चाहिए! जानवरों और लोगों के पैरों में कांच चुभ सकता है। दुपहिया वालों का एक्सीडेंट हो सकता है।”
दिलीप ने उसे झिड़का – “साले! पापा को मत सीखा और कार भी नशे में नहीं चलानी चाहिए….लोग मर सकते हैं। फ़िर भी चला रहा है ना तू?”

हफ़ीज़ का मूड़ ठीक करने के लिए दिलीप दार्शनिक स्टाइल में आ गया।
“शराब, चरस में टुन्न रहना ही नशा नहीं है। भाई जीवन जी, मौज कर….एड्रनलिन रश को समझ! यूँ बिना देखे कार घुमा देना, बिना सोचे बोतल से लेकर किसी बेवक़ूफ़ की हड्डी तोड़ देना इस सब से जो झुरझुरी मचती है शरीर में उसे महसूस कर। भाड़ में गयी दुनिया!”

हफ़ीज़ की आशंका सच हो गयी और बोतल का बड़ा टुकड़ा अँधेरे में सड़क पार करती एक महिला माया की चप्पल चीरता हुआ उसके पैर में घुस गया। चोट के कारण अगले दिन माया जिस घर की सफाई और बर्तन करने जाती थी वहाँ जाने में लेट हो गयी। इधर सुबह-सुबह दिलीप को अचानक खांसी का दौरा उठा और शराब-गांजे के नशे में उसके मुँह और सांस की नली में उल्टी भर गयी। घर के बाकी सदस्य नींद में होने और माया के देर से आने के कारण जीवन के लिए दिलीप के संघर्ष को कोई सुन नहीं पाया। दिलीप उसी दुनिया में सांस लेने को तड़प रहा था जिसे अक्सर भाड़ में भेजकर उसे एड्रनलिन रश वाली झुरझुरी मिलती थी। कुछ ही समय में उसकी मौत हो गयी।

अपने बिगड़ैल बेटे को खोकर बिलख रहे परिवार के बीच माया सिसक रही थी। काम के बहाने खाली कमरे की आड़ में आकर उसकी सिसकारी हल्की हँसी में बदल गयी। आखिर एड्रनलिन रश की झुरझुरी पर केवल अमीरों का हक़ थोड़े ही है।

समाप्त!
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झूठी भावना पर सच्चा आशीर्वाद (कहानी) #ज़हन

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सोशल मीडिया स्टार रूपल के पास कोई ख़ास हुनर नहीं था। अपनी तस्वीरें, निजी ज़िंदगी इंटरनेट के माध्यम से दुनिया को परोसने के बदले में कुछ नाम और पैसा मिल जाया करता था। वैसे उसके कई हज़ार फॉलोवर्स थे पर यहाँ “कुछ” का मतलब उसके जैसी बिना हुनर वाली बड़ी हस्तियों के मुक़ाबले काफी कम। फिर भी स्थानीय स्तर पर उसका अच्छा काम चल जाता था। भावनात्मक मुद्दों पर इंटरनेट से काट-छांट कर बनी उसकी बातें, कई सामाजिक कैंपेन की आड़ लेकर अपने पब्लिसिटी कैंपेन चलाना आदि रूपल की खूबी थी। रूपल की माँ श्रीमती सुनैना लिवर कैंसर से पीड़ित थी। पिछले कई हफ़्तों से वह इस लिवर कैंसर की पोस्ट्स से लोगो की सहानुभूति का लिवरेज ले रही थी। ऐसी भावनात्मक बातों पर आम बातों, फोटोज़ से कहीं ज़्यादा प्रतिक्रिया आती थी। इस वजह से आभासी दुनिया में रूपल के “प्रशंसकों” की संख्या तेज़ी से बढ़ रही थी। रूपल को जब पता चला कि उसकी माँ की बीमारी गंभीर हो चली है और वें अब कुछ ही दिनों की मेहमान हैं तो वह चिंता में पड़ गयी। इधर सुनैना अपनी बच्ची को दिलासा दे रहीं थी कि उनके बिना भी इतना कुछ है दुनिया में वह किसी बात की चिंता ना करे। यहाँ रूपल की चिंता सुनैना की सोच से कुछ अलग थी।

दो दिन बाद ही सुनैना ने नींद में दुनिया छोड़ दी पर शायद उनकी आत्मा में दुनियादारी का मोह बचा था। इस कारण अपने परिजनों को देखने और उनके मन में झाँकने को रुक गयीं। सब जगह से अच्छी-बुरी यादें, अपनों के मन की बातें टटोल कर आखिर में सुनैना की आत्मा रूपल के पास पहुँची।

“रो नहीं रही है? ज़रूर सदमा लग गया है बेचारी को! हे भगवान! मेरी लाली ने गुम चोट की तरह अपने ग़म को मन में दबा लिया। ज़रा मन में तो झाँकू इसके…”

रूपल के मन में दंगे चल रहे थे….

“क्या यार! थोड़े दिन बाद नहीं जा सकती थी मम्मी? इतना मटेरियल जमा कर रखा था मैंने….थोड़ा-थोड़ा करके ऑनलाइन डालती। अब खुद उनकी डेथ की अपडेट नहीं कर सकती…सब कहेंगे मातम की जगह नौटंकी कर रही हूँ। काश रश्मि, प्रियंका लोग आ जायें तो वो तो अपनी फोटोज़, अपडेट्स में टैग-मैंशन कर ही देंगी…उनकी फॉलोइंग भी अच्छी है।”

बेटी की नादानी पर सुनैना मुस्कुरा उठी। किसी माँ को अपने बच्चों पर गुस्सा आता ही कहाँ है? जाते-जाते माँ ने रूपल की इच्छा पूरी कर दी…समूह में रूपल की माँ की मौत वाली खबर फैलने से 2-4 नहीं बल्कि दर्जनों रूपल जैसी सोशल मीडिया हस्तियां ‘सांत्वना’ की कैंडी लेकर उसके घर पहुँची। उस दिन सौइयों फोटो में दिख रही रूपल और उसके दुख की सुनामी में इंटरनेट बह गया। एक घटना से रूपल के इंटरनेट वाले आभासी जानकारों की गिनती लाखों-करोड़ों में पहुँच गयी…माँ का आशीर्वाद जो साथ था।

समाप्त!
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Sketch Poster, Motion Poster of Short Film Kathputli (A Struggle for Control)

 Motion Poster
 Sketch Poster

आगामी शार्ट फिल्म कठपुतली का मोशन पोस्टर और स्केच पोस्टर, Team: Anuraag Tripathi, Ankerarchit Singh, Mohit Sharma Trendster, Ankita Tripathi, Ashutosh Saxena, Kamal Joshi #freelance_talents

Also available: Facebook, Vimeo, 4Shared, Tumblr, Mediafire etc.

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