SPB Event Update

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।।बातें, किताबें और मुलाक़ातें।।

28 जनवरी 2018
नई दिल्ली में।

इवेंट डिटेल्स
https://goo.gl/CSrL92

Sooraj Pocket Books Event
Upcoming #event #Delhi ….Hope to see you there! 🙂
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Horror-Educational Genre Mix: Samaj Levak (Freelance Talents)

00 (1)New experimental genre mix, समाज लेवक (Samaj Levak) – Social Leech (Educational-Horror Comic)

Illustrators: Anand Singh, Prakash Bhalavi (Bhagwant Bhalla), Author: Mohit Trendster, Colorist: Harendra Saini, Letterer: Youdhveer Singh

https://goo.gl/uqV8FV

https://goo.gl/2AuveV

https://goo.gl/euqPFu

https://goo.gl/VdrXy1

http://freelea.se/mohit-trendster/samaj-levak-horror-comic 

creditsAlso Available: Google Play, Google Books, Readwhere, Magzter, Dailyhunt, Ebook360 and other leading websites, mobile apps.

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#horror #comics #art #educational #india #mohitness #anandsingh #mohit_trendster #freelancetalents #harendrasaini #trendybaba #youdhveersingh #ज़हन #आनंदसिंह #मोहित #prakashbhalavi #freelance_talents #indiancomics

इश्क़ बकलोल (उपन्यास) समीक्षा

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“इश्क़ बकलोल”, नाम पढ़कर आपको लगा होगा कि खुद में एक बड़ा बाज़ार बन चुकी फूहड़ता का फायदा उठाने को एक पुस्तक और लिख दी गयी। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। किसी रोलरकॉस्टर राइड सी भारतीय परिवेश में भावनाओं की गुत्थमगुत्था है इश्क़ बकलोल। 2012 में देवेन पाण्डेय जी ने अपने अनुभवों, इनके साथ घटी बातों पर लिखना शुरू किया तब लगा कि कई शौकिया लेखकों की तरह ये कुछ समय बाद लेखन को टाटा कर देंगे। नौकरी, पारिवारिक ज़िम्मेदारियां संभालते हुए इन्होने लेखन जारी रखा और कम समय में काफी सुधार किया। एक दिन इनका मैसेज आया कि इन्होने एक उपन्यास लिखा है और मैं उपन्यास की इंट्रो पोएम लिखूं। उपन्यास का संक्षिप्त आईडिया जो सुना उसके अनुसार एक नज़्म भेज दी। सूरज पॉकेट बुक्स के सौजन्य से इश्क़ बकलोल अब बाजार में उपलब्ध है, जिसकी अच्छी बिक्री हो रही है।

कवर पेज इंटरनेट से किसी स्टॉक तस्वीर को ना लेकर आकर्षक चित्रांकन रखा गया। सूरज पॉकेट बुक्स की ये पहल मुझे बढ़िया लगी। कहानी के विस्तार में ना जाकर इतना कहूँगा कि इसे रोमांटिक के बजाय एक सामाजिक उपन्यास कहना उचित होगा। भारतीय समाज के अंदर बसी विविधता को बड़ी सुंदरता से दर्शाया है। जीवन की घटनाओं – दुर्घटनाओं के बीच किस तरह हम बिना सोचे कितना कुछ कर जाते हैं (या असमंजस में कुछ नहीं करते) जिनके दूरगामी परिणाम जीवन की दिशा बदल देते हैं। कहानी के दौरान पात्रों की प्रवृत्ति -नज़रिये में आये बदलाव अच्छे लगे। अक्सर ज़बरदस्ती करैक्टर आर्क दिखाने के चक्कर में घटक जोड़ दिए जाते हैं वो यहाँ नहीं हुआ। मनोरंजन की दुनिया में मार्केटिंग जुमला बन चुके फ़र्जी देसीपन की जगह यहाँ किरदारों में असली देसीपन पढ़ने को मिला। कुछ जगह भाषा शैली, कथा के प्रवाह और दृश्य परिवर्तन में सुधार की सम्भावना है, जिसे पहले प्रयास के हिसाब से अनदेखा किया जा सकता है। ये देवेन जी का स्नेह है कि कहानी में एक किरदार मेरा भी है। मुझे पता चला कि मेरा किरदार बड़ा था पर कहानी के लिए उसे छोटा करना पड़ा (इस कारण रेटिंग में आधा अंक काट लेता हूँ….हाहा)। आशा है आगामी उपन्यास और भी धमाकेदार हो। शुभकामनाएं!

उपन्यास के संसार में देवेन पाण्डेय के पदार्पण को मैं रेट करता हूँ – 7.5/10

P.S. मुझे नहीं पता कि मैं रात के डेढ़ बजे अपनी रसोई में धूप का चश्मा लगाकर सेल्फी क्यों ले रहा हूँ।

जीवन में विलेन ढूँढने की आदत (लेख) #ज़हन

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कॉमिक्स लेखन में एक कहावत है, “विलेन भी अपनी नज़रों में हीरो होता है।” खलनायक अपनी छोटी भूल से लेकर जघन्य अपराधों तक का इतनी चपलता से स्पष्टीकरण देता है कि लगे उस स्थिति में सबसे ठीक विकल्प वही था। बचपन से हमें बुराई पर अच्छाई की जीत वाली कई गाथाओं का इस तरह रसपान करवाया जाता है तो कोई भी बुरा नहीं बनना चाहता। अब सवाल उठते हैं कि अगर कोई बुरा नहीं तो फिर समाज में फैली बुराई का स्रोत क्या है? दुनिया में सब अच्छे क्यों नहीं? जवाब उस कॉमिक विलेन वाला है, ‘अपनी पिक्चर में हर कोई नायक होता है।’ दुनिया में ना कोई पूरी तरह अच्छा है और ना ही कोई बुराई का पुतला है। फिर भी खलनायक ढूँढने, बनाने की आदत हम सबके अंदर है। ये आदत कहाँ से जन्मी? शायद मानव मन को एक सांत्वना सी मिल जाती है और अपनी बुराइयों, कमियों से ध्यान हट जाता है। कभी-कभार परिवेश और घटनाओं के आधार पर किसी को डीमनाइज़ करना समझा जा सकता है पर जब यह आदत लोग अपने निजी जीवन के हर पहलु में लगाने लगें तो समस्याओं का जाल बन जाता है।

*) – प्रकृति की कारस्तानी: नेचर का एक नियम होता है कि हर जैविक प्रजाति धरती पर हो रहे बदलाव के अनुसार खुद को ढालते हुए निश्चित विकास के साथ बढ़ती रहे। अब अगर सबसे विकसित दिमाग वाला प्राणी मनुष्य, बात बात पर अंतःकरण की आवाज़ सुनकर खुद पर सवाल करने लगेगा तो उस प्रजाति में अवसाद, हीन भावना आदि मानसिक समस्याओं का औसत काफी बढ़ जाएगा। ऐसा होने पर मानव प्रजाति के विकास में बाधा आ सकती है। इस कारण से आम इंसान का ध्यान बँटाने के लिए प्रकृति ने उसमे ऐसा तंत्र फिट किया है कि वह दुनियाभर की बुराई को मैग्नीफाई करके खुद को दिलासा देता रहता है कि “मैं तो फिर भी बहुत ठीक हूँ बाकियों से।” इस सोच को बढ़ावा देने में मीडिया का बड़ा योगदान है जिसे किसी नैरेटिव और मसाले के लिए लगभग हर कहानी में किसी ना किसी को खलनायक बनाने का शौक है।

*) – घटनाओं की नवीनता: …यानी रीसेन्सी ऑफ़ इवेंट्स का मतलब किसी व्यक्ति द्वारा अपनी सुविधानुसार पास की घटनाओं के हिसाब से मन बनाना। वहीं पहले हुई घटनाएँ जो उसकी याददाश्त के कम्फर्ट जोन से बाहर हों उन्हें सोच में शामिल ना करना। यहाँ सुविधा सिर्फ कुछ याद रखने के दायरे में ही नहीं बल्कि अपने एजेंडे के हिसाब से घटनाओं को रखने और हटाने में भी है। अक्सर सोशल मीडिया पर किसी राजनैतिक बहस पर आप ऐसा देख सकते हैं। किसी असत्यापित खबर पर हम इसी अनुसार सही और गलत पक्ष का निर्णय सुना देते हैं।

*) – निजी जीवन: बाहरी घटक तो एक बार के लिए फिर भी संभाले जा सकते हैं पर अगर कोई इंसान अपने जीवन में अहम् किरदार लिए लोगो को डीमनाइज़ करना शुरू कर दे तब वह अनजाने में अपना ही नुक्सान करने लगता है। उसके पेशे, रिश्तों पर इसका बुरा असर पड़ता है। बिना किसी ठोस आधार के अपनी कल्पनाओं के अम्बार को आग लगाकर हम अपने जीवन के रावणो को ढूँढ लेते हैं। समय के साथ ये आदत प्रबल हो जाती है पर इतनी प्रत्यक्ष होकर भी हमें दिखाई नहीं देती।

पूछें खुद से ये सवाल – उसकी जगह मैं होता तो क्या करता? क्या कोई ऐसी बात तो नहीं जो मुझसे अनदेखी रह गयी? कहीं मैं मन में गढ़ी बातों को असल बातों में मिला तो नहीं रहा? इस मसले पर बिना किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त व्यक्ति की क्या राय होती? मन के ध्यान बटाऊ टैक्टिस में फँसने के बजाय इन सवालों के ईमानदार जवाब कई मामलों में ग़लतफहमी दूर कर देंगे और शर्तिया 10 में से 8-9 बार आपकी कहानी में बिना बात कोई काल्पनिक खलनायक नहीं रहेगा।

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Read समूह वाली मानसिकता (लेख)

समूह वाली मानसिकता (लेख) #ज़हन

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प्राकृतिक और सामाजिक कारणों से हम सभी की पहचान कुछ समूहों से जुड़ जाती है। उदाहरण के लिए एक इंसान की पहचान कुछ यूँ – महिला, भारतीय, अच्छा कद, गेहुँआ रंग, शहरी (दिल्ली निवासी), प्रौढ़, सॉफ्टवेयर क्षेत्र में काम करने वाली, हिन्दू (दलित), मध्यमवर्गीय परिवार आदि। अब पूरा जीवन इन समूहों और उनसे निकले उप-समूहों को जीते हुए उस महिला के मन में इन सबके बारे में काफी अधिक जानकारी आ जाती है जबकि बाकी दुनिया के अनगिनत दूसरे समूहों के बारे में उसे ऊपरी या कम जानकारी होती है। ऐसी ऊपरी जानकारी पर उसके साथ समूह साझा कर रहे लोग नमक-मिर्च लगा कर ऐसा माहौल बनाते हैं कि अधिकांश लोग धीरे-धीरे मानने लगते हैं कि वो जिन समूहों से हैं, दुनिया की सबसे ज़्यादा चुनौतियाँ सिर्फ उन्हें ही देखनी पड़ती हैं और उनका समूह सर्वश्रेष्ठ है। दुनिया की हर खबर, बात, मुद्दे पर वो अपने समूहों के हिसाब से विचार बनाते हैं।

जहाँ वो महिला कई पुरुषों द्वारा गोरे वर्ण की स्त्रियों को वरीयता देने की समस्या को समझेगी, वहीं खुद छोटे कद के या पतले पुरुषों का सहेलियों में मज़ाक उड़ाने या उन्हें वरीयता ना दिए जाने की गलत बात पर दोबारा सोचेगी भी नहीं। जहाँ उसे सॉफ्टवेयर दुनिया का सबसे कठिन क्षेत्र लगेगा, वहीं अपने पिता द्वारा दिवाली पर डाकिये को दिए इनाम पर वह सवाल करेगी कि साल में 2-4 बार तो आता है (पर उसे यह नहीं पता या शायद वह जानना नहीं चाहती कि इस डाकिया के ज़िम्मे डेढ़ हज़ार हज़ार घर और सौ दफ्तर हैं)। कभी सवाल करने पर वह रक्षात्मक होकर अपने समूह पर अनगिनत रटी हुई दलीलें सुना देगी…बिना यह समझे की संघर्ष तो सबके जीवन में है; कई बार उसके नज़रिये से ‘गिफ़्टेड’ या ‘कम मेहनत’ वाले समूहों से जुड़े लोगो में उसके समूहों से अधिक। यह मानसिकता लेकर व्यक्ति जीवनभर कुढ़ता रहता है। मन ही मन ऐसे अनेक लोगो से दूर हो जाता है जिनसे उसका अच्छा नाता बन सकता था और दोनों एक दूसरे के बहुत काम आ सकते थे। एक संभावना यह बनती है कि आपको अपना मित्र पसंद है बस उसकी कुछ बातें नहीं पसंद क्योंकि वो ‘कुछ बातें’ उसके अंदर दूसरे समूहों से आई हैं, जिनमे आप नहीं हो।

इस सामाजिक अनुकूलन (सोशल कंडीशनिंग) के जाल से बाहर आकर ही समाज में निष्पक्ष, सकारात्मक योगदान देना संभव है। यहाँ ये मतलब नहीं कि अपने समूह के अधिकारों, बातों पर आवाज़ ना उठायी जाए; पर ऐसा करते हुए बिना जांचे गलत बातों-अफवाहों को बढ़ावा देना, अन्य आवाज़ों को अनसुना करना, उनको अपनी बड़ी कालजयी पहल के आगे छोटा मानना या भ्रान्ति में जीना गलत है। समूहों की तुलना में भावनाओं के बजाय तर्कों और इतिहास की घटनाओं से बने वर्तमान समीकरण के अनुसार बात करना बेहतर है।
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#मोहित_शर्मा_ज़हन #mohitness #mohit_trendster

अंतर (लघु कहानी) #ज़हन

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पुलिस निरीक्षक शलभ कुमार को टी.ए. अलाउंस भरते देखे उनके साथी ने उन्हें टोका।

“क्या यार जब देखो कोई ना कोई फॉर्म भरते रहते हो या साहब के दफ्तर भागते रहते हो। साल भर के काम की रेटिंग में 2-4 नंबर ज़्यादा पा जाओगे तो कहाँ तीर मार लोगे। तुम भी यहीं उतनी दौड़-भाग कर रहे हो और बाकी तुम्हारे समकक्ष लोग भी। थोड़ा एन्जॉय करो लाइफ! अब तक 50 बार फॉर्म भरते देखा होगा तुम्हे जिसमे से सालों बाद कोई एक-दो अलाउंस मिला होगा डेढ़-दो हज़ार का, इस से बढ़िया रिलैक्स करते। सरकारी नौकरी है, सब सेट है और क्या चाहिए?”

शलभ ने हँस कर बात टाल दी। कुछ वर्षो बाद जब शलभ का बैच सेवानिवृत्त होने वाला था तब उसके साथ के सभी अधिकारी उस से एक या दो रैंक नीचे थे, साथ ही शलभ की पेंशन उनके कई साथियों से 15-20 हज़ार रुपये प्रति माह अधिक तय होने वाली थी। 37 वर्षों की नौकरी में हर वर्ष जो 2-3 नंबर, इंसेंटिव शलभ ने बिना कोताही जुटाये थे उसका फल उसे अब मिल रहा था। उस बैच के कुछ अफसर अपनी पेंशन 3-4 हज़ार बढ़वाने की उम्मीद में  नौकरी के अंतिम महीनो में रिकॉर्ड की नेगेटिव एंट्रीज़ हटाने की भाग-दौड़ में लगे हुए थे।

समाप्त!

#mohitness #mohit_trendster

Acid Attack Painting with Artist Jyoti Singh

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Painting Theme: Acid Attack with Artist Jyoti Singh, 30×30 inch, Oil on Canvas. #concept #art #painting #brainstorming #acidattacks #canvas #oilpainting

पुरुष आत्महत्या का सच (कहानी) #ज़हन

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Art – L. Naik

पार्क में जॉगिंग करते हुए कर्नल शोभित सिंह अपने पडोसी लिपिक शिवा आर्यन से रोज़ की तरह बातें कर रहे थे। उनकी वार्ता में एक बात से दूसरी बात और एक विश्लेषण से कहीं और का मुद्दा ऐसे बदल जाते थे जैसे किशोर टीवी चैनल बदलते हैं। दोनों के लिए अपनी चिंता, मानसिक दबाव कम करने का इस से बेहतर साधन नहीं था। जॉगिंग के बाद जब दोनों बेंच पर बैठकर अखबार पढ़ने लगे तो एक रिपोर्ट ने उनका ध्यान खींचा।

शिवा आर्यन – “हम्म….औरतों की तुलना में मर्द क्यों दुगनी संख्या में सुसाईड करते हैं? इसका जवाब मुझे पता है।” (अखबार साइड में रखकर) अरे आप तो सीरियस हो गए…गलत टॉपिक छेड़ दिया लगता है। कल के क्रिकेट मैच से बात शुरू करनी चाहिए थी। चलो कोई नहीं, चिल्ल कर के बैठो सर! लोड मत लो, मैं यहाँ अपनी दुखभरी कहानी से आपको परेशान नहीं करने वाला। बस अपने उदाहरण से यह मुद्दा समझा रहा हूँ। मेरी लाइफ नार्मल है, बचपन से लेकर अब तक हर बात साधारण रही है। मैं, मेरा परिवार, मेरी क्लर्क की नौकरी, मेरी पत्नी, मेरा मकान, मेरा रूटीन….सब कुछ आर्डिनरी।

जब किसी घर में लड़का पैदा होता है तो माँ-बाप की आँखों में ढेर सारे सपने पलने लगते हैं कि हमारा लाडला पता नहीं कौनसी तोप उखाड़ेगा, कलेक्टर बनेगा, दुनिया बदल देगा फलाना-ढिमका। बच्चे के बड़े होने के साथ कुछ सपने मर जाते हैं और कुछ ज़बरदस्ती उसपर थोप दिए जाते हैं कि कम से कम इतना तो करना ही पड़ेगा। उन सपनो को बस्ते में ढोकर वो बच्चा अपने जैसे करोड़ो बच्चों से रेस लगता है। तब उसे पता चलता है कि सपनो को ज़िंदा रखने के लिए करोड़ो में सिर्फ अच्छा होना काफी नहीं बल्कि असाधारण होना पड़ता है। इस रेस में करोड़ो बच्चो को हराकर और करोड़ो से हारकर वो बच्चा मेरे जैसी साधारण ज़िन्दगी वाली स्थिति में पहुँच जाता है। पहले माँ-बाप के सपने मरते देखता हूँ, फिर शादी के बाद मेरी पत्नी की आँखों के सपनो मुझे सोने नहीं देते थे। ऐसा नहीं कि मैं मेहनत नहीं करता, अक्सर ओवरटाइम करता हूँ – टाइम पर बोनस पाता हूँ पर 19-20 मेरी नौकरी की एक रेंज है, आगे भी रहेगी और वो रेंज मेरे अपनों के सपनो की रेंज से बहुत नीचे है। समय के साथ मेरी तरह सबने एडजस्ट करना सीख लिया। सबने सिवाय मेरी नन्ही गुड़िया ने! उसके लिए मैं टीवी पर आने वाले सुपरहीरोज़ से बढ़कर था जो दुनिया में कुछ भी कर सकता है। एक ऐसा हीरो जिसके इर्द-गिर्द उसकी छोटी सी दुनिया बसी थी। जैसे-जैसे गुड़िया बड़ी हो रही है, दुनिया के आईने में उसका सुपरहीरो पापा हर दिन छोटा होता जा रहा है। अब मुझसे उसकी आँखों में मर रहे सपने देखे नहीं जाते। सबसे आँखें चुरा सकता हूँ पर अपनी गुड़िया से ऐसी आदत डालने में बहुत दर्द होगा, ऐसा दर्द जो किसी से बाँट भी नहीं सकता। यह घरेलु हिंसा की तरह दिखने वाले ज़ख्म नहीं है, अंदर घुट-घुट कर कलेजा छलनी करने वाले घाव हैं। मैं आत्महत्या नहीं करूँगा…साला हिम्मत के मामले में भी आर्डिनरी हूँ। पर समझ सकता हूँ कुछ आर्डिनरी लोगो की घुटन, अंदर के ज़ख्म इतना दर्द देते होंगे कि उन्हें सुसाइड के अलावा कोई रास्ता नहीं दिखता होगा।

इसका मतलब ये मत लगाना कि सपने मार दो। बस अपने बाप, भाई, पति, प्रेमी को सपनो से हारने मत दो, उसको बताओ कि चाहे जो हो – आपके जीवन की पिक्चर का हीरो वो है और रहेगा। एक सपना मरेगा तो 10 नए आ जाएंगे पर कहीं किसी गुड़िया का हीरो चला जाएगा तो वो किसके कंधो पर चढ़कर सपने देखेगी…वो तो सपनो से ही डरने लगेगी।”

समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन

#mohitness #mohit_trendster

दूजी कोख में ‘अपना’ बच्चा (कहानी)#mohit_trendster

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“यह सर राजस्थान कहाँ पैसे भेज रहे हैं पिछले कुछ समय से? किसी कोर्ट केस में फँस गए क्या? इतने सालो से विदित सर के साथ हूँ, ऐसा कुछ छुपाते तो नहीं हैं वो मुझसे।” स्टील व कपडा उद्योगपति पंकज जाधव के अकाउंटेंट सुमंत ने उनके सेक्रेटरी कुणाल से पूछा।

कुणाल को तो जैसे यह बात बाँटने का बहाना चाहिए था। “एक औरत ब्लैकमेल कर रही है सर को…”

सुमंत ने उत्साह में कुणाल की बात काट कर उसका आधा वाक्य खा लिया।

सुमंत – “ओह! अपने सर भी गलत आदमी निकले! यह समझ नहीं आया कि मुझसे इनकी ये आदत अबतक छुपी कैसे रही?”

कुणाल – “सुमंत के बच्चे, बात तो पूरी करने दिया कर। वो औरत सर और रुचिका मैम दोनों को ब्लैकमेल कर रही है। सरोगेसी का मामला है।”

सुमंत – “सॉरी भाई, बात ऐसी थी कि रहा नहीं गया। सरोगेसी यानी किसी और औरत की कोख से अपना बच्चा करवाना? बेचारी रुचिका मैडम…”

कुणाल – “बेचारी नहीं हैं तभी तो ब्लैकमेल किया जा रहा है। मैंने इनकी बातें सुनी हैं, पंकज सर और मैम दोनों पूरी तरह ठीक हैं और बच्चा कर सकते थे पर मैडम 9 महीनो की टेंशन और बच्चा जनने का दर्द नहीं सहना चाहती थी। बच्चे के बाद बिगड़ने वाले फिगर की भी रुचिका मैम को चिंता थी, तो दोनों ने IVF तकनीक से अपने शुक्राणु-अंडाणु से बना भ्रूण एक राजस्थानी औरत की किराये पर खरीदी कोख में रखवा दिया। 9 महीने बाद प्राकृतिक रूप से इनके अंश का बच्चा, दोनों के डीएनए के गुण लेकर जन्म लेता जिसका जन्म देने वाली सरोगेट माँ से कोई नाता नहीं होता। इस काम में जिस एजेंट ने इनकी मदद की थी जब उसको पंकज सर के बड़े बिज़नस के बारे में पता चला तो उसने उस औरत को भड़काया कि ‘देख देश का इतना बड़ा व्यापारी 9 महीने के कष्ट के कितने कम पैसे दे रहा है तुझे’, फिर उस औरत ने इन्हें कोर्ट, मीडिया में जाने की धमकी दी। अब बच्चा होने में 2 महीने हैं, बात बाहर निकलेगी तो जनता में इनकी इमेज धूमिल हो जाएगी। दूर के ही सही नाते-रिश्तेदारो को जो रुचिका मैम की झूठी प्रेगनेंसी की बात बता रखी है उसपर दर्जनों बाते होंगी सो अलग, इसलिए हर हफ्ते लाखो रूपया भेजा जा रहा है।”

सुमंत – “इतना झंझट करने की ज़रुरत ही क्या थी? इस से अच्छा तो किसी बेचारे अनाथ बच्चे या बच्ची को गोद ले लेते।”

कुणाल – “तू बहुत भोला है यार! वो अनाथ बच्चा इनका ‘अपना’ थोड़े ही होता।”

समाप्त!

#मोहित_शर्मा_ज़हन

Read Parallel (Terminal Tributaries) – Vibhuti Dabral, Mohit Trendster

Parallel Comic Link 2

छूटी डोर (कहानी)

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हिन्दी, अंग्रेजी साहित्य के बहुत बड़े समीक्षक-आलोचक, अनुवादक श्री अनूप चौबे का टी.वी. साक्षात्कार चल रहा था। साक्षात्कारकर्ता अनूप के पुराने मित्र नकुल प्रसाद थे। कुछ सवालो बाद नकुल को एक बात याद आ गई और अपने साथ लाये सवालो के बीच उन्होंने एक सवाल रखा।

“आपने पहले कई बार अपना उपन्यास, कथा/काव्य संग्रह लिखने की मंशा मुझसे साझा की थी। उस बारे में कुछ बताएं?”

हालाँकि, यह इंटरव्यू लाइव नहीं था पर चौबे जी असहज हो गए। कुछ संभलने के बाद उन्होंने फिर बोलना शुरू किया।

“वर्षो तक एक के बाद एक ना जाने कितनी कहानियों, कविताओं और उपन्यासों को पास से देखा। कई बार तो किसी रचना के लेखक, कवि से अधिक उस रचना के साथ समय बिताया। दूसरो के गढ़े काल्पनिक जगत में गलतियां, कमियां निकालने का जूनून पता नहीं कब आदत में बदल गया। एक समीक्षक की तरह लिखना या अनुवाद करना अलग है पर जब भी लेखक की तरह कुछ लिखता हूँ तो मेरी यह आदत किसी मीनिया की तरह मेरा पीछा करती है। अपनी कल्पना के कुछ वाक्य पूरे करते ही मन उनपर अपना नकारात्मक फरमान सुना देता है। अपना लिखा मेरी नज़र से कभी पास हो ही नहीं पाता है जो किसी और तक पहुँच पाये। कभी-कभी तो रात में उठकर पिछले दिन लिखे पन्ने फाड़े हैं ताकि चैन से सो सकूँ।”

नकुल प्रसाद – “ओह! क्षमा चाहता हूँ! मुझे यह स्थिति पता नहीं थी। आप चिंता मत कीजिये, मैं वो सवाल और आपकी प्रतिक्रिया एडिट करवा दूंगा।”

अनूप चौबे – “कोई बात नहीं…अगर मैंने यह क्षेत्र ना चुना होता तो शायद मैं अच्छा साहित्य लिख पाता क्योकि सच कहूँ तो रचना की अपूर्णता, उसकी कमियां ही उसका साज-श्रृंगार हैं। ऐसी बातें ही रचना की एक अलग छाप बनाती हैं। आपने देखा होगा कैसे कोई अपने चेहरे की कमी बताता है और उसकी वही चीज़ जिसे वह कमी मानता है अक्सर लोगो को पसंद आती है। सबसे बड़ी रचनाकार प्रकृति जो हमे मरते दम तक अपनी कलाकृतियों से विस्मित करती है, में पूर्णता से दूर अनगिनत छूटी डोर हैं। साहित्य में सामाजिक दायरे की फ्रीक्वेंसी पर सेट दिमागी पैमाने को संतुष्ट करना असंभव है। चलिए कोई बात नहीं, यह जन्म इस रोल में ही सही…”
समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन

Read सुविधानुसार न्यूक्लीयर परिवार (कहानी)

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