SPB Event Update

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।।बातें, किताबें और मुलाक़ातें।।

28 जनवरी 2018
नई दिल्ली में।

इवेंट डिटेल्स
https://goo.gl/CSrL92

Sooraj Pocket Books Event
Upcoming #event #Delhi ….Hope to see you there! 🙂
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निर्णय (लघुकथा)

प्रांप्ट – “टूटती शाखें” प्रतियोगिता के लिए

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शोल कबीले के सरदार का निर्णय सभी सदस्यों के लिए एक झटका था। उनका प्रमुख जिसने दशकों इस कबीले का नेतृत्व किया, हर सदस्य को जीने के गुर सिखाये…आज उनके द्वीप पर 7 जहाज़ों से आये बाहरी लोगो का प्रस्ताव मान रहा था। सरदार ने स्थिति भांप अपना पक्ष रखा – “मेरा तो जीवन कट गया, पर अपने गार्सिया द्वीप के बदले बाहर ये विदेशी आप सबको बेहतर जीवन और ठिकाना देंगे…”

सरदार की बात एक युवक ने काटी – “…पर अपना सब कुछ छोड़कर उनकी शर्तों पर जीना कहाँ का इंसाफ है? इतने साल आपसे युद्ध कौशल सीखने का क्या लाभ? धिक्कार है ऐसी कायरता पर!”

सरदार – “एक बार मेरे बचपन में कुछ विदेशीयों ने ऐसी शर्त मेरे जन्मस्थान द्वीप टाइगा पर रखी थी। 450 से अधिक कबीलेवासी शर्त न मान कर लड़े और क्या खूब लड़े। उनमे मेरे परिवार समेत सिर्फ 8 परिवार टाइगा से पलायन कर बच पाए। तब जहाज़ 2 थे और इन जहाज़ों से बहुत छोटे थे। उस समय विशाल वृक्ष से टूटी धूलधूसरित शाखें किसी तरह फिर से कोपल सींच पाईं पर ज़रूरी नहीं हर बार ऐसा हो। बाहर जाओ और शोल वृक्ष को समृद्ध करो, इतना की आज उनकी शर्त पर जियो और कल सक्षम बन उनको अपनी शर्त पर झुकाओ। आज ख़ाक हो जाओगे तो कल कभी नही आएगा।”

– मोहित शर्मा ज़हन

इंटरनेटी अफवाह (लघुकथा) – मोहित ट्रेंडी बाबा

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प्राइम टाइम न्यूज़ का सेट, जिसपर लाइव देश का प्रख्यात पत्रकार-एंकर आनंद कुमार। 

“…और ब्रेक से पहले जैसा हम चर्चा कर रहे थे इंटरनेट की विश्वसनीयता और वहां फैले झूठ, अफवाहों की। पिछले बुलिटिन में ही हमने आपको खबर दी थी कि गुमनामी में रहने वाले प्रख्यात लेखक सोहन वर्मा की हृदयघात से मौत हो गयी है जबकि कुछ देर पहले हमारे पत्रकार ने उनसे मिलकर उनके ठीक होने की पुष्टि की है। सोशल मीडिया पर अच्छी फोर्मैटिंग और भाषा-शैली की अफवाहों से धोखे में ना पड़े।”

अपनी फैन फॉलोइंग द्वारा उसके हर अंदाज़ की तारीफ से जन्मी आत्म मुग्धता में आनंद ने प्रोटोकॉल से बाहर आकर चुटकी ली।

“यह देखिये अभी तक हमारे स्टूडियो का टेली प्रॉम्पटर सोहन जी की मृत्यु का समाचार दिखा रहा है। हा हा हा… लगता है आज टीम ने चाय-कॉफी नहीं ली।”

सामने गुस्से में प्रोडूसर से भी प्रोटोकॉल टूट गयी और वो चिल्ला कर बोला।

“अबे! इस बार वो सच में मर गए हैं।”

समाप्त!

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3 Micro Fiction Experiments (Author Mohit Trendster)

Mohit Trendster’s Micro Fiction Experiments (Youtube Playlist)

Micro Fiction Experiment # 01 – Theme: अपहरण (Kidnapping)*) – बाहरी लोग सही कहते थे जंगली लोग जादू-टोना करते है। दो महीनों तक घने जंगल की गुमनामी में बंधक बना पर्यटकों का दल आज उन्हें बचाने आये कमांडोज़ और उनके अपरहरणकर्ता कबीले वालों के बीच में ढाल बनकर खड़ा था। *) – बब्बन पाशा चिंतित था। बड़े गुटों के कुछ आत्मघाती, अपहरण मिशन फेल हुए तो बिल उसके गिरोह के नाम फाड़ दिया गया। अब भारी सुरक्षा से उसने एक विदेशी राजनयिक को अगवा किया तो कोई मान के नहीं दे रहा उल्टा उसके आतंकी संगठन से मिलते जुलते नाम वाले संगठन को श्रेय दिया जा है खबरों में। *) – क्रोध में बिलबिलाता पर कुछ करने में असमर्थ मोज़ेस ठगा सा महसूस कर रहा था क्योंकि एक तो वह नास्तिक था और तो राजनीती वगैहरह में नहीं पड़ता था। बेचारा बस एक टेनिस मैच देखने आया था, वो भी जीवन में पहली बार। अब किन्ही धर्मों की लड़ाई में उसको क्यों किडनैप कर लिया गया। *) – विभोर ने बंदूकें फिल्मों में ही देखी थी। उसका मन थर-थर काँप रहा था जबकि बाहर से उसका स्थिर-शांत तन तरह-तरह की भाव भंगिमाओं से अपनी 4 साल की बच्ची का समस्या से ध्यान बँटाने और सब ठीक हो जाने का दिलासा देने में लगा था। *) – किटकिटाते दांतों से खुद को गरियाने की कोशिश करती गरिमा सोच रही थी कि जहाँ भाग कर आयी उस वीराने में इस दन्त-कुड़कुड़िया सर्दी से बेहतर तो वो गुंडे ही रख रहे थे। *) – बंगले के बाहर जमा किडनैपर गुट का मकसद हत्या नहीं था, पर दंगों से उबर रहे शहर में अफवाहें ज़ोरो पर थी। दुछत्ती में छिपे परिवार के अन्य सदस्यों की जान बचाने के लिए माँ ने रो रहे नवजात का गला घोंट दिया। *) – अब उसे पता चला कि गिरोह के सरगना ने बंधक से आँखें मिलाने को क्यों मना किया था। जाने क्यों अपने किडनैपर को भी उम्मीदों से देख रहीं थी वो आँखें…कसम से अगर 2 क्षण उन आँखों में और देख लेता तो साइड बदल कर उन्ही का हो जाता। —————————————

Micro Fiction Experiment # 02 – Theme: Science
*) – कृतिम रूप से लैब में निर्मित चींटी, दल में घुसपैठ करने के बाद समझ नहीं पा रही थी कि उसकी प्राकृतिक बेवकूफ बहनो में मेहनत और अनुशासन की इतनी सनक क्यों सवार है।
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*) – रोज़ाना ज़िन्दगी से छोटे-बड़े समझौते करते हुए जिस प्रयोग में उसने अपना जीवन समर्पित कर दिया, जब वह लगभग पूर्णता पर था…तब खबर आयी कि वैसा ही प्रयोग दुनिया के किसी साधन-संपन्न वैज्ञानिक ने कर दिया है।
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*) – जो प्रजातियां प्रयोग के लिए चाहिए थी, असिस्टेंट उनके बजाये दिहाड़ी मज़दूर ले आया।
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*) – जेनेटिकली मॉडिफाइड क्रॉप्स (जनुकीय परावर्तित अन्न) फ़ल-सब्जी के सेवन पर व्रत में मनाही थी। सूखा ग्रस्त क्षेत्र में भी उस भोजन का आधार जीवाणु की कोशिका का मांसाहार अंश धर्म-भ्रष्ट करने को काफी थी।
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*) – जिस हथियार के आविष्कार से उसे विश्व में नाम, मान-सम्मान मिला…..बाद में उसे बनाने की ग्लानि में ही उसने अपनी जान ली।
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*) – आज को जिन युगों ने इतनी रफ़्तार दी, खैरात में मिली उन रफ्तारों के योग पर सवार यह पीढ़ी पुराने युगों की धीमी रफ्तारों का कितनी आसानी से मज़ाक बना लेती है!
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Micro Fiction Experiment # 03 (नासमझ इतिहास)

*) – अठारवीं सदी की बात है, दुनिया के सबसे दुर्गम नोलाम द्वीप पर तब तक कोई मानव नहीं पहुंचा था।
*) – बेहतर जहाज़ों और तकनीकों के बल पर दुनिया के तीन शक्तिशाली देशों में वहाँ सबसे पहले पहुँचने की होड़ लगी थी।
*) – एक देश द्वारा दल भेजे जाने की खबर के तुरंत बाद बाकी दोनों देशों ने भी आनन-फानन में अपने जहाज़ी दस्ते रवाना किये।
*) – देश A और देश C लगभग एकसाथ वहां पहुंचे। संचार का कोई माध्यम ना होने के कारण अब एक ही रास्ता बचा था।
*) – A और C के जहाज़ी दलों में एक दूसरे को समाप्त करने के विध्वंसक युद्ध छिड़ गया।
*) – कुछ घंटो बाद आखिरकार देश C के दल ने देश A के क्रू को ख़त्म करने के साथ-साथ उनका जहाज़ डुबो दिया।
*) – दल C के कप्तान और 4 सदस्य ज़िंदा बच पाए, तभी उन्हें देश B का जहाज़ आता दिखा।
*) – अब दुनियाभर  में इतिहास की किताबों में पढ़ाया जाता है कि दुर्गम नोलाम टापू पर सबसे पहले देश B के लोग पहुँचे।
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मुदित चोर नहीं है! – लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)

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“गलती आपकी है जो 150 की जगह 1500 का रिचार्ज कर दिया।” मन ही मन खुश होते मुदित ने दुकानदार से कहा।

दुकानदार – “कभी-कबार जीरो की गलती हो जाती है, आँखें कमज़ोर हो गयी है। अभी सब देने को नहीं कह रहा बाद में जब इस्तेमाल कर लो तब दे देना, या धीरे-धीरे लौटा देना। अब बुढ़ापे में ऐसा तो….”

मुदित – “बूढ़े हो गए है तो घर पर बैठिये। मैंने डेढ़ सौ बोला था उतने ही दूंगा, बाकी आपने क्या देखा, किया उस से मुझे मतलब नहीं। इतनी चलती है आपकी शॉप, अभी दो-चार घंटो में सब वसूल हो जायेगा।” इतना कहकर वृद्ध दुकानदार की बातें अनसुनी करता हुआ मुदित वहाँ से निकल गया। उसने यह भी सोचा कि अब से वह इस जगह टॉपअप-रिचार्ज करवाने नहीं आएगा।

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कुछ दिन बाद व्यथित मुदित फ़ोन पर एक डिश कंपनी के कॉलसेंटर कर्मी पर अपना गुस्सा निकाल रहा था।

मुदित – “अरे ऐसे कैसे काट लिए 75 रुपये मेरे टीवी पैक से?”

कालसेंटर कर्मी – “सर एक महीने के लिए हमारा स्पेशल “महालोलू पैक” फ्री था तब आपने उसका सब्सक्रिप्शन लिया था। समय पूरा होने के बाद भी आपने पैक हटवाया नहीं इसलिए ऑटोमैटिक डिडक्ट हो गए पैसे।”

मुदित – “अच्छा मुझे मत पढ़ा बे! बस लोगो को लूटने के लिए ऑफर्स बना रखें है। हुँह! चोर है सब @#$&% “

समाप्त! 

– मोहित शर्मा (ज़हन)
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किस्मत से कुश्ती – लेखक मोहित शर्मा ज़हन

छोटे द्वीप समूहों से बने एक गरीब देश के आधा दर्जन खिलाडियों और दर्जन भर स्टाफ के दल में पदक की उम्मीद किसी खिलाडी से नहीं थी, ओलम्पिक में क्वालीफाई करना ही उनके सबके लिए बड़ी बात थी। उनमे एक महिला कुश्ती पहलवान जोएन का लक्ष्य था बेहतर से बेहतर करते हुए स्पर्धा में दूर तक जाना। उसके साथी देशवासी शुरुआती चरणो में ही बाहर हो गए और 4 राउंड्स जीत कर जोएन अपने भार वर्ग के सेमी फाइनल्स में पहुँच गयी। यहाँ उसका सामना पूर्व चैंपियन अमेरिकी पहलवान मार्था से था। मुक़ाबला तगड़ा और बराबरी का चला जिसमे मार्था ने बातों और चीप दावों से जोएन को विचलित करने की भरसक कोशिश की, मैच में बीच-बीच में अपनी संभावित हार देख रही परेशान मार्था की विवशता और गुस्सा साफ़ दिख रहे थे। अंततः परिणाम निर्णायक मंडल में मतभेद के साथ लगभग बराबरी का रहा जिसमे एक पॉइंट के मार्जिन से मार्था को विजय प्रदान की गयी।
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जीत के नशे में चूर मार्था निराश जोएन का मज़ाक बनाती और अपशब्दों की बौछार करती निकल गयी। कांस्य पदक के मुकाबले से पहले केवल एक मैच के लिए जोएन को एक प्रायोजक मिल गया। पर 2 सपोर्ट स्टाफ सदस्यों को छोड़ कर देश के कैंप के बाकी लोग पहले ही स्वदेश लौट गए थे। सीमित साधनो और बदले कड़े माहौल में इतने दिन रहने के कारण जोएन की तबियत मैच से पहले बिगड़ गयी। पैसो के लालच में वह मैच में उतरी और तगड़ी प्रतिद्वंदी ने आसानी से उसे हरा दिया। इसके बाद मार्था ने इस वर्ग का स्वर्ण पदक अपने नाम किया।
कुछ वर्षो बाद कई अन्य उपलब्धियाँ बटोर चुकी मार्था का नाम विश्व के महानतम और अमीर एथलीट्स में लिया जाता है और जोएन ने अपने देश लौटकर प्रायोजक से मिले पैसों से वो फल-सब्ज़ी की दुकान खरीद ली जो वह पहले किराये पर लेकर चलाती थी। उस ओलम्पिक के बाद जोएन फिर कभी किसी कुश्ती प्रतियोगिता में नहीं दिखी।
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श्रीमान सुविधानुसार – मोहित शर्मा (ट्रेंडस्टर) #laghukatha

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श्रीमान सुविधानुसार…वैसे तो आमजन की तरह ही हर बात में अपनी सुविधा देखते थे पर दूसरो को शॉर्टकट मारते या कुछ गलत करते हुए देख, दुख और घृणा से बड़े कायदे में सर हिलाते या आपत्ति जताते थे। हाँ, स्वयं वैसा करने पर एक बार भी खुद को नहीं रोकते और पकडे जाने पर अनेक बहाने तैयार रखते। घर पर शनिवार के दिन प्याज जैसे तामसिक पदार्थ के भूलवश खाने में आ जाने पर श्रीमती जी को कानफाडू डेसीबल्स में डांट पिलाई। रोज़मर्रा में ऐसी माइक्रोस्कोपिक गलतियां कुत्ते की चपलता से ढूंढकर बिना वजह क्लेश करने में पेशेवर थे श्री सुविधानुसार जी। चाहे वो कुछ ना बोलें, अपने किसी काम  व्यस्त हों या सो रहे हो पर उनके घर में होने से श्रीमती जी का मंन परेशान ही रहता था कि ना जाने अब कौन सी बात पकड़ लें उनके पति।

ऑफिस के मित्रों संग श्रीमान गोलगप्पे खाने आये और जैसे बड़े-बुज़ुर्ग कहते है यहाँ किये गलत काम की सज़ा यहीं मिलती है। जो पहला आलू-प्याज-मसालों से भरा पानी बताशा स्वाद की लपलपाहट में श्रीमान जी ने हपक के चाबा, लाखो में एक गोलगप्पे की अतिसख्त सूजी की पापड़ी इनके तालु में ऐसे कोण पर घुसी की खून के स्वाद से भर गया इनका मुहँ। रात में इस घाव को भरने के लिए हल्दी का दूध पीने के लिए एक गिलास उठाते वक़्त वो रैक में काफी पीछे रखे गिलास पर लगी ज़रा सी बर्तन मांझने की साबुन पर श्रीमती जी को ऊँचे स्वर में कोसने लगे। फिर सुविधानुसार झूठा गिलास ज़रा सा उचक कर सिंक में रखने के बजाये रैक में ही रख दिया।

– मोहित शर्मा (ज़हन)

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मोहल्ले का (कु)तर्क गुम हो गया – मोहित शर्मा ज़हन

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लघुकथा 

“माना राजनीती में कुछ ऊँच-नीच हो जाती है, पर नेता जी हमारे लिए तो अच्छे है। हम लोगो से तो व्यवहार अच्छा है, छोटे-मोटे काम करवा देते है मोहल्ले के और क्या चाहिए? अब समाज का ठेका थोड़े ही ले रखा है हम लोगो ने!”

ऐसे तर्क होते थे वर्धा ब्लॉक मोहल्ले वालो के जब उन्हें शहर और उसके आस-पास के गाँव-देहात में उनके मोहल्ले की भव्य महलनुमा कोठी मे निवास कर रहे नेता जी एवम उनके गुर्गो की गुंडई, मनमानी के किस्से सुनने को मिलते थे। एक दिन नेता जी द्वारा दर्जनो व्यापारियों से की गयी मारपीट, वसूली के बाद शहर के हज़ारो उपद्रवी व्यापारियों और ऐसा कोई मौका ढूँढ रहे नेता जी के विरोधियों  ने मोहल्ले पर धावा बोल, भीड़ का फायदा उठाकर वहाँ के स्थानीय निवासियों से मारपीट, कई गाड़ियों एवम संपत्ति में आगजनी करते हुए  नेता जी के घर पर धावा बोल दिया जिसमे उनके कुछ समर्थको, परिवार समेत बर्बर हत्या कर दी गयी।

इस घटना में गंभीर रूप से घायल नेता जी के शुभचिंतक पडोसी सिंह साहब ठीक होने के बाद दिवंगत नेता जी के लिए कोई तर्क नहीं रखते। उनके दिमाग के उस हिस्से पर गहरी चोट आई जो तर्क समझता और प्रेषित करता है, इस कारण अब वो किसी भी तरह का तर्क नहीं रख पाते….बाकी मोहल्ले वालो के सर में चोटें नहीं आयीं….पर वो भी अब तर्कों को दूर से नमस्ते करते है!

– मोहित शर्मा ज़हन

महत्वपूर्ण मैत्री – मोहित ट्रेंडस्टर

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अपनी आँखों से थोड़ा दूर अपनी हथेली ऐसे लाएं की वो आपकी दृष्टि का बड़ा हिस्सा बाधित कर दे, कुछ क्षणों में आप पायेंगे कि आपकी आँखों ने उस बाधा के होते हुए भी आस-पास और आगे देखने की आदत बना ली है। जीवन में मित्रता का महत्व हम देखते-सुनते ही रहते है पर कुछ बातें इतनी प्रत्यक्ष होती है हमारे सामने कि व्यस्त दिनचर्या के चलते उनकी भूमिका हम सभी अनदेखी कर दिया करते है। संगती के प्रभाव पर यह तक कहा गया है कि मनुष्य का व्यक्तित्व मुख्यतः अपने करीबी 5-7 लोगो का मिश्रण होता है जिनके साथ वह सबसे अधिक समय व्यतीत करता है। ऑनलाइन मैत्री ने ऐसी परिभाषाओं और समीकरणों को बदला ज़रूर है पर बात की महत्ता अब भी कम नहीं हुयी है। हाँ, अब उन करीबी लोगो में यांत्रिक उपकरण और उनकी दुनिया भी शामिल हो गयी है।

मानव अपने पूर्वज बंदर कि भांति किसी की सीधी नक़ल तो नहीं करता पर अवचेतन मस्तिष्क में किसको देखा, किस से सीखा, क्या अनुभव हुए की खिचड़ी बन जाती है और हम अनजाने में अपने मित्रों, परिवार जन और सहकर्मियों के अच्छे-बुरे गुण, हाव-भाव, बोली पकड़ते चलते है जिससे अपने व्यक्तित्व में कई बदलाव आते है। एक बड़ा और करीबी दोस्तों का दल अत्यंत आवश्यक है बच्चो एवम किशोरों के लिए, क्योकि बड़े दल की विविधता हर तरह से एक बच्चे का दायरा बढ़ाती है और जीवन को देखने के नज़रिये में संतुलन प्रदान करती है। मैंने अपने स्कूल, कॉलेज, लेखन तथा कार्यक्षेत्र के मित्रों से अनेको बातें, सबक सीखें है। किसी की दशमलव प्रतिशत में किसी की दहाई प्रतिशत में मेरे जीवन पर पड़ी छाप अब मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा है। अलग-अलग कारकों से किन्ही दो व्यक्तियों के जीवन पर उनके निकट दोस्तों का असर समान नहीं होता पर यह निश्चित है की ऑनलाइन या आमने-सामने आपकी दिनचर्या में अच्छे मित्र आपके जीवन पर बड़ा सकारात्मक प्रभाव छोड़ेंगे और बुरे मित्रों से कई अनचाही बातें आपको तब तक घेरें रहेंगी जब तक आप उनके साथ रहने के आदि होकर जीवन में कई समझौते नहीं कर लेते। “अच्छे” से मतलब आपके लक्ष्य, जीवन की दिशा में प्रेरणा देने वाले। अगर आप टाइप ए या टाइप बी केटेगरी में फसें हों तो सही मित्र आपको दोनों पर्सनालिटी वर्गीकरण का बढ़िया मिश्रण प्रदान कर सकता/सकते है। यहाँ यह भी विचारणीय है कि आप कितने लोगो के जीवन को प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से किन दिशाओं में प्रभावित कर रहे है, कितने लोग आपको अपना अच्छा मित्र मानते है। यहाँ परोक्ष अधिक महत्व लिए है क्योकि कम समय में आपको अपने जीवन पर ध्यान देना है इसलिए कइयों के करीबी होने में आपका समय बहुत व्यय होगा।

– मोहित शर्मा (ज़हन) #mohitness #mohit_trendster #trendybaba #freelance_talents

कुछ पल और गुज़ार ले… | मोहित शर्मा (ज़हन)

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Artwork – Kinannti
रजनी का एक राष्ट्रीय चिकित्सीय प्रतियोगी परीक्षा का यह अंतिम अवसर था। रजनी की मेहनत घर में सबने देखी थी और डॉक्टर बनने का सपना भी लगनशील रजनी और उसके परिवार ने साथ देखा था। यह लगन ऐसी संक्रामक थी कि जीवन में कोई ध्येय ना लेकर चलने वाली, स्वभाव में विपरीत रजनी की जुड़वाँ बहन नव्या, सिर्फ उसके सहारे मेडिकल फील्ड लिए बैठी थी। यह रजनी की संगत का ही असर था जो पढाई में कमज़ोर नव्या ने अच्छे अंको से दसवी, बारहवीं पास की थी, यह नव्या भी इस राष्ट्रीय परीक्षा में अंतिम अवसर था। इंटरनेट पर परिणाम घोषित हुआ और एक बार फिर से रजनी बहुत कम अंतर से असफल हुयी। रजनी का जैसे पूरा संसार ही अंधकारमय हो गया। जब तक कोई कुछ समझाता, समझता उस से पहले ही रजनी ने आत्महत्या कर ली।
नव्या को पहले ही पता था कि वह सफल नहीं हो पाएगी और परिणाम ने उसके अंदेशे पर मोहर लगा दी पर खुद से ज़्यादा दुख नव्या को अपनी मेहनती बहन रजनी के लिए था। अब उसे लगा कि काश उसे थोड़ा समय मिल पाता अपनी बहन को समझाने का। माता-पिता अविश्वास से एकटक कहीं देखकर अपनी कल्पनाओ को सच्चाई पर हावी करने की हारी हुयी कोशिश कर रहे थे। कुछ समय बाद अपने परिवार के लिए नव्या ने स्वयं को संभाला और क्लीनिकल रिसर्च में 8 महीनो का कोर्स कर उसे अच्छे वेतन पर एक विदेशी कंपनी में नौकरी मिली। नव्या को पता था कि अगर उसकी जगह उसकी बहन होती तो अपने ज्ञान और मेहनत के दम पर उस से अच्छे स्थान पर होती, उस स्थान पर जो  उसे उस प्रतियोगी परीक्षा में सफल होने के बाद भी ना मिलता। कुछ समस्याएँ जो कभी जीवन को चारो और से घेरे ग्रहण लगाये सी प्रतीत होती है, जिनके कारण सुखद भविष्य की कल्पना असंभव लगती है, चंद महीनो बाद ऐसी समस्या का अस्तित्व तक नहीं रहता। थोड़ा और समय बीत जाने के बाद  तो दिमाग पर ज़ोर डालना पड़ता है कि ऐसी कोई दिक्कत थी भी जीवन में। नव्या अक्सर सपने में रजनी को समझाते हुए नम आँखें लिए जाग जाती है – “बहन! बस ये थोड़े लम्हें काट ले, जो इतना सहा…वो दर्द सहकर बस कुछ पल और गुज़ार ले….सवेरा होने को है…”
 समाप्त!
– मोहित शर्मा (ज़हन)
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