सिर्फ मर्सिडीज़ ही चाहिए? (लेख) #मोहितपन

4631f387468449c89c1914f6d9cf0e24

जब से लेखन, कला, कॉमिक्स कम्युनिटीज़ में सक्रीय हूँ तो ऑनलाइन और असल जीवन में कई लेखकों, कलाकारों से मिलने का मौका मिला है। एक बात जो मैं नये रचनाकारों को अक्सर समझाता हूँ वो आज इस लेख में साझा कर रहा हूँ।

3-4 साल पहले एक युवा कवि/लेखक ने मेरे ब्लॉग्स पढ़कर मुझसे संपर्क किया और हम ऑनलाइन मित्र बन गये। कुछ समय तक उनके काव्य, कहानियां पढ़ने को मिली फिर वो गायब से हो गये। वो अकेले ऐसे उदाहरण नहीं हैं, पिछले 11 वर्षों में कई प्रतिभावान लेखक, कलाकार यूँ नज़र से ओझल हुए। निराशा होती है कि एक अच्छे कलाकार को पता नहीं क्या बात लील गयी….कहने को तो व्यक्ति के वश से बाहर जीवन में कई बातें उसे रचनात्मक पथ से दूर धकेल सकती हैं पर एक कारक है जिसके चलते कई हार मान चुके कलाकार अपना क्षेत्र छोड़ देते हैं। एक लेखक का उदाहरण देकर समझाता हूँ। मान लीजिए नये लेखक को ऑनलाइन मैगज़ीन के लिए लिखने का मौका मिला, उसने मना कर दिया। मैगज़ीन पेज पर 700 फॉलोवर और प्रति संस्करण 450 डाउनलोड वाली ऑनलाइन पत्रिका पर वह अपना समय और एक आईडिया क्यों बर्बाद करे? इस क्रम में लेखक ने कई वेबसाइट को ठेंगा दिखाया कि वो उसके स्तर की नहीं। चलो सही है, थोड़े समय बाद उसे एक स्थानीय प्रिंट मैगज़ीन या अखबार में कुछ भेजने को कहा गया फिर उसने समझाया – जो प्रकाशन 2-3 शहरों तक सीमित हो उसमे छपना भी क्या छपना। पब्लिश हो तो इस तरह कि दुनिया हिल जाए! हम्म…. कुछ अंतराल बाद इनके किसी मित्र को लेखन अच्छा लगा तो अपनी शार्ट फिल्म के लिए स्क्रिप्ट की बात करने आया। जवाब फिर से ना और मन में (“अबे हट! ऐसे वेल्ले लोगो की फिल्म थोड़े ही लिखूंगा, सीधा चेतन भगत की तरह एंट्री मारूंगा।”) और इस तरह मौके आते गये-जाते गये। अब ऐसे लेखक, कवि और कलाकार एक समय बाद भाग्य को दोष देकर हार मान लेते हैं और इनकी ऑनलाइन गिनी चुनी रचना पड़ी मिलती हैं और इनके मेल ड्राफ्ट्स में डेढ़-दो सौ आईडिया सेव होते हैं जो कभी दुनिया के सामने नहीं आते क्योकि इन्हे एक खुशफ़हमी होती है कि ये जन्मजात आम दुनिया से ऊपर पैदा हुए हैं तो आम दुनिया जैसी मज़दूरी किये बिना ये डायरेक्ट सलमान खान, ऋतिक रोशन के लिए फिल्म लिखेंगे या 90 के दशक के वेद प्रकाश शर्मा जी की तरह एक के बाद एक बेस्टसेलर किताबें बेचेंगे। मतलब खरीदेंगे तो सीधा मर्सिडीज़ बीच में साइकिल, बाइक, मारुती 800, वैगन आर, हौंडा सिटी लेने का मौका मिलेगा भी तो भाड़ में जाए….ऐसा नहीं करेंगे तो बादशाह सलामत की शान में गुस्ताखी हो जायेगी ना!

अरे! स्टेटस या अहं की बात बनाने के बजाए ऐसे छोटे मौकों को आगे मिलने वाले बड़े अवसरों के पायदान और अभ्यास की तरह लीजिए। अगर आप वाकई अपने जुनून के लिए कुछ रचनात्मक कर रहे हैं तो इन बातों का असर तो वैसे भी नहीं पड़ना चाहिए। मंज़िल के साथ-साथ यह ध्यान रखें कि आप सफर में धीमे ही सही पर आगे बढ़ रहे हैं या नहीं। आप कलात्मक क्षेत्र में जिन्हे भी अपना आदर्श मानते हैं उनकी जीवनी खंगालें, लगभग सभी का सफर ऐसे छोटे अवसरों से मिले धक्के से बड़े लक्ष्य तक पहुँचा मिलेगा। हाँ, अपनी प्राथमिकताएं सही रखें, ऐसा ना हो कि सामने कोई बड़ा अवसर मिले और आप किसी बेमतलब की चीज़ में प्रोक्रैसटीनेट कर रहे हों। संतुलन बिगड़ने मत दीजिये और खुद पर विश्वास बनाये रखें। गुड लक!

#ज़हन

Posted by Mohit Sharma

Advertisements

लेख: सेलेब्रिटी पी.आर. का घपला (मोहित शर्मा ज़हन)

14925302_1235529103206857_8598406039823181883_n

पैसा और सफलता अक्सर अपने साथ कुछ बुरी आदते लाते हैं। कुछ लोग इनसे पार पाकर अपने क्षेत्र में और समाज में ज़बरदस्त योगदान देते हैं वहीं कई शुरुआती सफलता के बाद भटक जाते हैं। एक बड़े स्तर पर आने के बाद प्रतिष्ठित व्यक्ति पर इमेज, ब्रांड मैनेजमेंट की ज़िम्मेदारी आ जाती है लोगो पर, अब या तो आप मेहनत और साफ़-सुथरे तरीके से ये काम करे या फिर अपनी मन-मर्ज़ी का जीवन जीते हुए बाद मे अपने कृत्यों को सही ठहराने की कोशिश करें। इन्ही में कुछ विख्यात लोग लोकप्रियता बढ़ाने के लिए अपने पीआर एजेंट या नेटवर्क का सहारा लेते हैं। जैसे अगर कोई सेलिब्रिटी कोई गलत बात, काम करता पकड़ा जाए या उसकी वजह से जनता, समाज को कोई नुक्सान हो तो अपनी टीम की मदद से वो ये बातें प्रचारित करने की कोशिश करेगा कि उसका ये मतलब नहीं था वो तो इस काम से समाज की मानसिकता दिखाना चाहता/चाहती थी या उसे सेलिब्रिटी होने की सज़ा मिल रही है। ये सही है….सेलिब्रिटी होने के मज़े तक सब ठीक पर उस लाइफ में एडजस्ट करने वाले हिस्सो में शिकायत करो।

उदाहरण के लिए किसी सेलिब्रिटी ने एक मुद्दे पर बिना जानकारी के कोई बेवकूफी भरी बात कही अब उसका सोशल मीडिया आदि जगह मज़ाक उड़ा। तो उसकी बेवकूफी गयी एक तरफ और उसने निकाल लिया अपने अल्पसंख्यक, महिला या किसी अन्य मजबूरी का कार्ड, फिर क्या मीडिया, जनता का ध्यान कहीं और गया। यानी अगर उस बात की तारीफ़ होती तब कोई दिक्कत नहीं थी, जहाँ एक वर्ग ने मज़ाक उडा दिया तो घुमा-फिरा कर बात अपने ऊपर मत आने दो।

साथ ही ये लोग समय, स्थिति के अनुसार नए-नए स्टंट सोचते हैं। जैसे अपने बीते जीवन में किसी दुखद काल्पनिक घटना को जोड़ देना या किसी बीमारी (खासकर मानसिक) से जूझकर उस से जीतना दिखाना। क्या यार….आपके एक जीवन में घटनाओ का घनत्व कुछ अधिक नहीं हो गया? मैं यह नहीं कह रहा कि सब बड़े लोग ऐसा दिखावा करते है पर ऐसा करने वाले लोगो का अनुपात बहुत ज़्यादा है। आम जन – ख़ास लोग सबका जीवन चुनौतियों, संघर्षो वाला होता है पर ज़बरदस्ती के पीआर स्टंट कर के कम से कम खुद से झूठ मत बोलिये। इस नौटंकी के बिना भी आप लोकप्रिय और महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों पर जनता का ध्यान ला सकते हैं (बशर्ते आप वैसा करना चाहें ना की केवल अपनी पब्लिसिटी के चक्कर में पड़े रहे)। हालांकि, पैसे के पीछे भागते मीडिया को नैतिक-अनैतिक से कोई मतलब नहीं होता। हर दिन कुछ नया वायरल करने की होड़ में मीडिया के लिए कुछ नैतिकता की सोचना पाप है। वैसे व्यक्ति के बारे में थोड़ी रिसर्च और पहले का रिकॉर्ड देख कर आप जान सकते हैं कि कौन सही दावा कर रहा है और कौन पीआर के रथ पर सवार है।

जो पाठक सोच रहे है कि क्या फर्क पड़ता है? बेकार में मुद्दा बनाया जा रहा है! अगर ऐसा करने से किसी को नुक्सान नहीं पहुँच रहा तो क्या गलत है? उन मित्रो से मेरा यह कहना है कि कभी-कभी किसी वर्ग को लंबे समय से छद्म रूप से हो रहा नुक्सान सीधे नुक्सान से बड़ा होता है। जिन लोगो को वाकई मीडिया, जनता के ध्यान-पैसे की आवश्यकता है वो बेचारे तरसते रह जाते हैं और उनका हिस्सा, उनकी फुटेज गलत संस्थाएं, लोग खा लेते हैं। मुश्किल है पर सबसे निवेदन है कि अपरंपरागत न्यूज़ सोर्सेज पर ध्यान दें, सही लोगो-संस्थाओ को आगे बढ़ने मे हर संभव मदद करें। छोटे बदलाव से धीरे-धीरे ही सही पर बड़ा असर पड़ेगा।

============

My We Heart It Profile

Posted by Mohit Sharma at 1:40 AM

स्वर्ण बड़ा या पीतल? (कहानी)

young girl balancing on ice skates clipart

शीतकालीन ओलम्पिक खेलों की स्पीड स्केटिंग प्रतिस्पर्धा में उदयभान भारत के लिए पदक (कांस्य पदक) जीतने वाले पहले व्यक्ति बने। यह पदक इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योकि भारत में शीतकालीन खेलों के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी। मौसम के साथ देने पर हिमांचल, कश्मीर जैसे राज्यों में कुछ लोग शौकिया इन खेलों को खेल लेते थे। भारत लौटने पर उदयभान का राजा की तरह स्वागत हुआ। राज्य और केंद्र सरकार की तरफ से उन्हें 35 लाख रुपये का इनाम मिला। साथ ही स्थानीय समितियों द्वारा छोटे-बड़े पुरस्कार मिले। जीत से उत्साहित मीडिया और सरकार का ध्यान इन खेलों की तरफ गया और चुने गए राज्यों में कैंप, इंडोर स्टेडियम आदि की व्यवस्था की गयी। खेल मंत्रालय में शीतकालीन खेलों के लिए अलग समिति बनी। इस मेहनत और प्रोत्साहन का परिणाम अगले शीतकालीन ओलम्पिक खेलों में देखने को मिला जब उदयभान समेत भारत के 11 खिलाडियों ने अपने नाम पदक किये। उदयभान ने अपना प्रदर्शन पहले से बेहतर करते हुए स्वर्ण पदक जीता।

जब मीडियाकर्मी, उदयभान के घर पहुंचने पर उनका और परिवार का साक्षात्कार लेने आये तो उदयभान के माता-पिता कुछ खुश नहीं दिखे। कारण –

“रे लाला ने इतनी मेहनत की! पहले से जादा लगा रहा…गोल्ड जित्ता, फेर भी पहले से चौथाई पैसा न दिया सरकारों ने। यो के बात हुई? इस सोने से बढ़िया तो वो पीतल वाला मैडल था।”

उदयभान के साथ सभी मीडियाकर्मियों में मुस्कराहट फ़ैल गयी। पहले स्पॉटलाइट में उदयभान पहला और अकेला था…अब उसका पहला होना रिकॉर्ड बुक में रह गया और उसके साथ 10 खिलाडी और खड़े थे। जिस वजह से उसे पहले के कांस्य जीतने पर जितने अवार्ड और पैसे मिले थे, उतने इस बार स्वर्ण जीतने पर नहीं मिले।

समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन
===============

Read टप…टप…टप…(हॉरर) Story – Mohit Trendster Archives

Dushman (Anti-Body) Short film – Original Sequence, Behind the Scenes…etc

art-artist-black-canvas-Favim.com-2386989

कल पुणे के थीएट्रिकस ग्रुप द्वारा एलियन हैंड सिंड्रोम नामक मानसिक विकार (जिसमे व्यक्ति का एक हाथ कभी-कभी उसके नियंत्रण से बाहर होकर अपनी मर्ज़ी से हिलने-डुलने लगता है, चीज़ें पकड़ने लगता है और कुछ मामलों में लोगो पर या स्वयं पीड़ित पर हमला करता है) पर मेरी लिखी कहानी-स्क्रिप्ट पर ‘दुश्मन (एंटी-बॉडी)’ नामक शॉर्ट फिल्म बनायीं।

Dushman (Vimeo)

Youtube Link 1

Youtube Link 2

जिसके लिए मुझे अबतक अच्छी प्रतिक्रियाएं ज़्यादा मिली हैं। टीम ने उम्मीद से अच्छा काम किया है। वैसे फिल्म को मैंने एक लड़की किरदार के हिसाब से लिखा था पर कास्टिंग में समस्या होने की वजह से स्क्रिप्ट बदलनी पड़ी और तुफ़ैल ने मुख्य भूमिका निभाई। इस फिल्म को फाइनैंस मैंने किया था और फिल्म बनते समय कुछ दृश्य कम बजट की वजह से हटाने पड़े। पुणे से इतनी दूर सिर्फ इंटरनेट के माध्यम से कोलैबोरेशन करने की वजह से कुछ बातें खासकर मेडिकल, साइंटिफिक कोण फिल्म में मंद पड़ गए या हो नहीं पाये। ओवरआल जितना अच्छा किया जा सकता था उतना हो नहीं पाया, जिसकी ज़िम्मेदारी मैं लेता हूँ। शायद इसलिए कि इस जटिल आईडिया को कार्यान्वित करने में कई बातों का ध्यान रखते हुए बहुत सावधानी बरतनी थी। वैसे ऐसा मेरे साथ पहले कई बार हुआ है पर तब सोचा गया आईडिया और फाइनल रिजल्ट में अंतर कम या काम चलाऊ होता था। चलिए इस बहाने कई बातें सीखी इस दौरान। सबसे बड़ी बात यह की अगर आप कहीं मौजूद नहीं हो सकते तो जटिल कहानियां, सीन को इस तरह प्रेषित करें कि वह आसान लगे करने वालो को, किरदार कर रहे लोग कनेक्ट करें। साथ ही किसी भी माध्यम के कलाकारों चाहे वो चित्रकार हो, ग्राफ़िक डिज़ाइनर हो, अभिनेता हो या और कोई रचनाकार हो…माध्यम में उनके सकारात्मक पहलुओं और कमियों के हिसाब से आईडिया या कहानी की नींव रखनी चाहिए। इसे मेरी सफाई मत समझिए बस कभी आगे भूल जाऊं इसलिए सबकी मदद के लिए, एक रिफरेन्स की तरह, सबसे शेयर करना चाहता था। यहाँ जो सोचा था इस फिल्म को बनाने से पहले उसके मुख्य अंश लिख रहा हूँ।

===================

1. Story Plot

सोनल को ग्रेजुएशन के बाद नौकरी मिलती है और वह उत्साह के साथ कंपनी ज्वाइन करती है। अपनी मिलनसार, jolly-chirpy नेचर की वजह से वह सबसे घुल – मिल जाती है। कुछ महीनो बाद एक एक्सीडेंट (सीढ़ियों से गिरकर / रोड एक्सीडेंट) में उसके सर पर चोट लगती है जिसके बाद से उसके अंदर धीरे-धीरे “Alien Hand Syndrome” के लक्षण दिखने लगते है। शुरू में पब्लिक प्लेसेस पर राइट हैंड में झटके से लगना, लोगो के सर या कमर पर हलके से मारना फिर स्थिति बिगड़ना – एक हाथ द्वारा उल्टा-सीधा मेकअप कर देना, स्ट्रीट मार्किट में कोई चीज़ उठा लेना जो उसे नहीं चाहिए: दुकानदार के पूछने पर मना करना पर उस चीज़ को ना छोड़ना फिर दुकानदार से लड़ाई / बहस, colleague-boss को पीटना और फिर बिना उसकी बात सुने पागल, चुड़ैल आदि संज्ञा देकर उसे नौकरी से निकाला जाना  etc . इस सब के दौरान उसकी दोस्त तान्या हमेशा उसके साथ रहती है।

नौकरी जाने के साथ-साथ इस डिसऑर्डर की वजह से उसका ब्रेकअप भी हो जाता है। परेशान होकर उसे अपना राइट हैंड काटने के अलावा कोई चारा नहीं दिखता, वो अपना हाथ काट लेती है, उसकी लाइफ दोबारा सामान्य हो जाती है। पर थोड़े दिन बाद एक रात वो साँस रुक जाने से जागती है और देखती है की उसके लेफ्ट हैंड ने उसका गला पकड़ रखा है।

==================

2. एलियन हैंड सिंड्रोम (मेकअप सीन)

सोनल को ऑफिस लौटने की जल्दी थी। आखिर नयी जॉब में कुछ दिनों बाद ही लंबी छुट्टी लेना कहाँ जमता है। वजह चाहे जायज़ भी हो पर अंजान शहर में खुद को साबित करने की राह शुरू करते ही स्पीडब्रेकर आत्मविश्वास डिगा देता है। अब एक्सीडेंट के बाद से सर में होने वाला दर्द काफी कम हो गया था। उसने बॉस और साथियों को बता दिया था कि वह आज से ऑफिस आएगी। अकेले रहने का यह फायदा भी था कि सोनल की एक हॉबी मेकअप तसल्ली से होता है। मस्कारा, नेल आर्ट, फाउंडेशन, हेयर स्ट्रीक सब में मास्टरी, खुद पर इतने प्रयोग जो किये थे बचपन से अबतक। नहीं तो कसबे के छोटे घर में कभी मम्मी झाँक के देख रही हैं, कभी पापा फाइल उठाने या जूते का रैक झाड़ने आ गए, एक कमांडो की तरह लाइट मेकअप करना पड़ता था।

अचानक सोनल को दाएं हाथ में एक झटका लगा। शायद नस फड़की होगी सोच कर सोनल वापस अपनी हॉबी में तल्लीन हो गयी। तभी उसका उसकी मर्ज़ी के बिना हाथ मस्कारा उठाकर उसकी आँखों के चारो तरफ गोले बनाने लगा। सोनल की डर से घिग्घी बन्ध गयी।

“ये हो क्या रहा है? कहीं मुझमे कोई भूत-चुड़ैल तो नहीं आ गया? नहीं….नहीं मुझे ऑफिस जाना है। शायद नींद में हूँ!”

सोनल ने मस्कारा के निशान साफ़ करने के लिए हाथ बढ़ाया तो दांया हाथ ड्रेसिंग टेबल पर पड़े मेकअप के सामान पर झपट पड़ा और दहाड़ें मारती सोनल पर अलग-अलग आकृतियां बनाने लगा। कुछ देर बाद जब वह हाथ रुका और सोनल के आया तब तक सोनल थक कर निढाल हो चुकी थी। सर में फिर से दर्द शुरू हो गया था, शीशे के सामने मेकअप से वीभत्स हुआ चेहरा देख वह बेहोश होकर सीधे शीशे पर गिरी। जब होश आया तो सोनल ने खुद को संभाल कर ऑफिस फ़ोन किया कि वह आज नहीं आ सकती।

==================

3. Basic Scene/Sequence Break 

सीन 1 (short scene)

सोनल (फ़ोन पर) – “डैड! मुझे नौकरी मिल गयी। अपने बैच में सबसे पहले। आप चिंता मत करो मेरे साथ यहाँ तानिया है।”

सीन 2 (short scene)

सोनल अपने ऑफिस में बॉस और कलीग्स से formally मिलती हुयी।

सीन 3 (split)

सोनल सीढ़ियों से गिरती है या उसकी स्कूटी का एक्सीडेंट होता है (अगर ज़्यादा रिस्क है तो symbolic दिखा दें।) उसके सिर में चोट लगती है। Head Injury क़े लिये bandage दिखायें। तानिया एक कमरे में उसके पास बैठी है।

तानिया – “सब ठीक हो जायेगा सोनल, तू बहुत स्ट्रांग है।”

सीन 4 (split)

*) – इसके बाद सोनल रिकवर करती है पर वह धीरे-धीरे एलियन हैंड सिंड्रोम के लक्षण दिखाने लगी।

i) – Doing makeup and one of her hands making bizarre figures on her face from maskara, powder etc.

अपने बिगड़े हुए चेहरे के साथ सोनल रोते हुए ऑफिस फोन कर रही है – “आज मैं ऑफिस नहीं आ पाऊँगी।”

ii) – . Alien Hand grabbing articles from street market and surprised vendor.

वेंडर – “मैडम पर्स चाहिए तो बोलो, ऐसे हैंडल टूट जाएगा।”

सोनल – “नहीं!!! मुझे यह पर्स नहीं चाहिए। (बड़ी मुश्किल से सोनल पर्स नीचे रखती है)

सोनल अब एक बेल्ट खींचने लगती है।

वेंडर – “मैडम या तो तुम पागल है या चोर, जो भी हो यहाँ से निकलो नहीं तो constable को बुलाऊंगा।”

सोनल – “मै चोर नहीं हूँ…कितने की है ये बेल्ट, कितने का पर्स है, ला दे। पागल नहीं हूँ!”

सीन 5

 Sonal beating a colleague and when her boss interferes she beats him, Embarrassed Sonal is fired from her job. (People calling her crazy not believing her rare disorder)

Colleague 1 (साहिल) – “सोनल तुम्हे सर ने clients की जो लिस्ट दी थी वो मुझे चाहिए।”

सोनल उसके बाल पकड़ कर पीटने लगती है।

साहिल – “अरे…..क्या मज़ाक है यह? छोडो मुझे। “

Colleague 2 (Rahul) – “सोनल छोडो साहिल को, ये तुम्हारा college नहीं है। “

बॉस आता है।

बॉस – “सोनल क्या हुआ? साहिल ने कुछ किया क्या तुम्हारे साथ? डरो मत मुझे बताओ!”

सोनल – “यह मैं नहीं… सर सॉरी but मैं तो… “

सोनल का हाथ साहिल को छोड़ कर उसके boss को मारने लगता है।

साहिल – “पागल… पागल है यह लड़की।”

बॉस – “सोनल अभी के अभी यहाँ से निकलो। तुमने जितने दिन का काम किया है उतने पैसे तुम्हारे अकाउंट में आ जाएंगे। यू आर फायर्ड!”

सीन 6 (Short)

Her Boyfriend breaking up with her (on phone only)

सीन 7

 आख़िरकार परेशान होकर उसने अपना हाथ काट दिया।

(Dark Circles under her eyes, वो अपने हाथ को पकड़ कर उसे डाँट रही है उसपर चिल्ला रही है। जवाब में उसका हाथ उसे मार रहा है, बाल खींच रहा है। परेशान होकर वह अपना हाथ काट लेती है। हाथ काटने के बाद उसे पकड़ कर सोनल चिल्लाती है – “अब मार मुझे, मार। अपनी मर्ज़ी से हिल। ” (पीछे चीखती हुयी तानिया – “यह क्या कर दिया सोनल!”

सीन 8

 (After few weeks) लाइफ फिर से नार्मल हुयी।

सोनल (तानिया से) – हाँ, डिसेबल्ड quota में एक गवर्नमेंट बैंक में क्लर्क कि जॉब है। फैमिली की बहुत expectations है, ऐसे सब ख़त्म नहीं हो सकता। मैं कल ऑफिस ज्वाइन करुँगी।

तानिया – “You are a fighter, इतना सब होने के बाद भी तुमने हिम्मत नहीं हारी। I am proud of you!”

सीन 9

 फिर उस रात वो उठती है और देखती है उसके दूसरे हाथ ने उसका गला पकड़ रखा है।

The End!

मोहित शर्मा ज़हन
 
#mohitness #mohit_trendster #theatrix #trendybaba #freelance_talents #freelancetalents

भूरा हीरो बनाम ग्रीक गॉड – मोहित शर्मा (ज़हन)

Rebel-Star-Prabhas-Photos-016

उम्र बढ़ने के साथ हम जीवन के विभिन्न पहलुओं में सामाजिक ढाँचे के अनुसार ढलते है और कभी-कभी ढाले जाते है। जैसे किसी देश में अगर मनोरंजन के किसी साधन या स्रोत पर पाबंदी है या प्रोत्साहन है वहाँ जनता की पसंद-टेस्ट उस अनुसार ढल जायेगी, यहाँ तक कि सामाजिक परिदृश्य को देखने में भी वैसा ही चश्मा पहना जाने लगेगा। दुनिया भर के मनोरंजन स्रोत देखने पर आप पाएंगे कि हर जगह कितना दूषितवर्गीकरण व्याप्त है साथ ही पश्चिमी देशो के गोरे वर्ण के लोगो को इतना अधिक इस तरह प्रोजेक्ट किया जाता है कि दुनिया में मानवजाति के वह सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। धीरे-धीरे समय के साथ हम बाकी किस्म के लोगो में भी वो मनोरंजन के साधन देखते-देखते यह बात और भावना घर कर जाती है। एक निश्चित सीमा और प्रारूप (format) के आदि हो जाने के कारण अगर उस से अलग या नया कुछ होता है तो कई लोग उसे सिरे से नकार देते है।

बाहुबली मेरे कुछ जानने वालो को सिर्फ इसलिए पसंद नहीं आई क्योकि ऐसे एक्शन और स्टोरीलाइन में वो गोरे रंग के ग्रीक गॉड मॉडल जैसे हीरोज़ को देखते आये है और यह दक्षिण भारतीय नायक प्रभास उन्हें जमा नहीं। यह नायक उन्हें किसी बॉलीवुड या स्थानीय मसाला फॉर्मेट में ही जमता। ऐसा शायद इस फिल्म के समापन भाग में अभिनेत्री अनुष्का शेट्टी को भी सुनने को मिले जो तब युवा अवस्था के किरदार में दिखेंगी। क्या इतना कड़ा है यह फॉर्मेट की आदत पड़ जाने का बंधन जो हम सौइयों अन्य बातों को भूलकर सिर्फ वर्ण या स्थान का रोना रोने बैठ जाएँ? मेहनत और प्रयोगो को सराहना सीखें क्योकि दुनिया के आगे बढ़ने में इन दोनों बातों का महत्वपूर्ण योगदान है। किसी ने टोका कि यह तो लोमड़ी के अंगूर खट्टे वाली बात हो गयी, भारत में ऐसे लोग मिलेंगे ही नहीं जो फॉर्मेट में फिट बैठे तो उन्हें बता दूँ कि भारत आपकी सोच से कहीं अधिक विशाल है, रैंडम देश के 15 – 20 शहरों का दौरा करें आपको हर तरह के प्रारूप के अनेको लोग मिल जायेंगे।

एक सम्बंधित एक्सट्रीम उदाहरण और उसका परिणाम भी बताना चाहूंगा, पाकिस्तान और बांग्लादेश के अलग होने के पीछे भी यह भावना थी। वही भावना कि वह हमारे जैसे नहीं है तो हम में से एक कैसे होंगे? पाकिस्तानी नेतृत्व, भारत के दूसरी तरफ बसे अपने बंगाली भाग के नागरिको से दोयम दर्जे सा व्यवहार करता था (दोनों रीजन्स के विकास में बहुत अंतर था) और उनका मखौल सा उड़ाता था (regional, ethnic ego) जिस वजह से दोनों स्थानो में दरार बढ़ती चली गयी और बांग्लादेश अलग हुआ। अलग बातों, चीज़ों, लोगो के प्रति लचीला रवैया अपनाये, ज़रूरी नहीं कि अगर कोई प्रारूप अनदेखा है तो बेकार ही होगा।

– मोहित शर्मा (ज़हन)
#mohitness #trendster #mohit_trendster #bahubali #prabhas #india #hindi