कुपोषित संस्कार (व्यंग) #ज़हन

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वर्ष में एक बार होने वाले धार्मिक अनुष्ठान, हवन के बाद अपने अपार्टमेंट की छत पर चिड़ियों को पूड़ी-प्रसाद रखने गया तो 150 पूड़ियाँ देख के मन बैठ गया कि मेरी पूड़ी तो इतनी कुरकुरी भी नहीं लग रही जो बाकी डेढ़ सौ को छोड़ कर कोई कौवा या चिड़िया इसमें कुछ रूचि ले। फिर कुत्ते और गाय को नीचे ढूंढ़ने निकला ही था कि कुछ पडोसी मिल गए जो मेरी तरह प्रसाद लिए नीचे आ रहे थे। सोसाइटी के बाहर आवारा कुत्ते जो अपनी टाँगे ऊपर कर अलग-अलग कोण पर शवासन में पड़े थे, हम लोगो को देख कर दौड़ पड़े। उनका थुलथुल मुखिया जिसकी थूथन से लेकर पूँछ की नोक तक गोलकोण्डा छाप मेटीरियल से बनी थी, ऐसा भागा है ना भाईसाहब…जैसे पहले फिल्मों के क्लाइमेक्स में मौत के डर से अमरीश पुरी नहीं भागता था हांफता हुआ…वैसे! कुत्ते तो कुत्ते, पिल्लै तक हाथ नहीं आये। कोई ढलान पे लुढ़कता चला गया, कोई नाली में घिसट गया…पता नहीं किस बात की इतनी दहशत? हमने सोचा चलो गाय मिल जायेगी इनको बाद में देखते हैं। थोड़ा चले तो कुछ लोग पूड़ी लिए भाग रहे थे और उनके आगे कुत्तो वाली दहशत आँखों में लिए 2 गईया भागी जा रही थी। सामने अपार्टमेंट के अंकल जी अपना पेट पकडे बैठे थे। “कैसे हुआ?” पूछने पर पता चला कि जब ये ज़बरदस्ती कोशिश कर रहे थे तो गाय ने अपना कुंद सींग मार दिया। चलो ठीक ही हुआ इस बहाने इनका लिवर भी चेक हो जाएगा। अगले गेट पर एक गाय बेहोश पड़ी थी।

हद है! “आज हो क्या रहा है?” वैसे मैंने यह बात यूँ ही बोली थी, उस से पूछा तो नहीं था पर 4 लोगो के सामने गार्ड का बताने का / स्टाइल मारने का मन कर रहा होगा तो वो बोला – “सर! एकसाथ इतना खाने की आदत नहीं है ना बेचारी को, इसलिए महीने भर का नाश्ता खा के होश फाख्ता हो गए इसके। सोसाइटी में इतने अपार्टमेंट के चार-पांच सौ घरो से जो खाने की सुनामी आई है उसमे यहाँ के गिने-चुने कुपोषित गाय-कुत्ते बह गए हैं…कुछ तो ख़ुशी के मारे पागल ही हो गए हैं। कोई आधे घंटे से बजरी में लोट रहा है, कोई गरम तारकोल के कनस्टर में पीठ रगड़ रहा है, कोई ई-रिक्शा के पीछे की निन्नी सी जगह में बैठ के स्टेट बॉर्डर पार ही चला गया, किसी की मम्मी नाले के पाइप में फंस गयी हैं…ये सब जानवर ओवरवेल्म हो गए हैं और पक्षी लोग तो आते ही नहीं सर अब इस एरिया में। आप ऐसा करो, 26 किलोमीटर दूर राज्य का बॉर्डर पार कर के कुछ गांव शुरू होते हैं वहां मिल जायेंगे आपको सब जीव-जंतु…और जब जा ही रहे हो तो उस कुत्ते को ले आना जो ई-रिक्शा में बैठा चला गया, रात में जगा रहता है कम से कम…”

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*आप सभी से निवेदन है कि अपनी क्षमता अनुसार आस-पास के जीवो का ध्यान रखें, किसी विशेष अवसर, उपलक्ष्य की प्रतीक्षा में न रहें।*

समाप्त!

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Read लालच का अंकुर (कहानी)

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कैशलेस रिश्वत (Cashless Bribe)

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एक सरकारी दफ्तर में एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, सौरभ घुसता है। सौरभ अपना झोला लेकर अंदर आता है और अपने विभाग से जुड़े एक बाबू (क्लर्क) के बारे में पूछता है। उसकी डेस्क पर जाकर वो अपना दुखड़ा रखता है।

“सर मेरा कई सालों का ट्रेवल अलाउंस, पेट्रोल अलाउंस, नच बलिये अलाउंस कुछ नहीं आया है, अब आप ही कुछ कीजिये।”

बाबू – “कर तो दें पर उसके लिए आपको भी कुछ करना होगा ना। इस हाथ दे, उस हाथ ले….नहीं तो लात ले।”

सौरभ – “हाँ झोला वामपंथी फोटोशूट के लिए थोड़े ही लाया हूँ!” (सौरभ झोले में हाथ डालता है)

बाबू – “एक तो नाड़े को झोले की डोरी बना रखा है….जी कर रहा है इसी का फंदा सा बना के झूला दूँ तुझे बदतमीज़!”

सौरभ – “मैंने क्या किया? बदतमीज़ी का तो मौका ही नहीं मिला अभी तक 30 सेकंडस में?

बाबू – “अरे जब पूरा देश डिजिटल इंडिया के नारे लगा रहा है और तुम अभी तक झोले में घुसे हो। तुम जैसे लोगो की वजह से ही देश तरक्की नहीं कर पाता। भक! नहीं करनी तुमसे बात।”

सौरभ – “बात नहीं करनी? बाबू हो पर गर्लफ्रेंड की तरह क्यों बिहेव कर रहे हो? अच्छा तो आप ही कुछ उपाय बताओ।”

बाबू – “कैशलेस सरकाओ हौले से….”

सौरभ – “ओह! हाँ जी अपना मोबाइल नंबर दो।”

बाबू – “मेरी इस महीने की लिमिट पूरी हो गयी है।”

सौरभ – “तभी मूड ख़राब है आपका! तो क्या इस महीने काम नहीं होगा मेरा?”

बाबू – “अरे क्यों नहीं होगा, देश को आगे बढ़ने से रोकने वाले भला हम कौन होते हैं? मेरे चपरासी का नम्बर नोट करो। उसकी भी लिमिट हो गयी हो तो बाहर बैठे नत्थू भिखारी के मोबाइल में 15% उसकी कमीशन जोड़ के डाल देना। बड़ा ईमानदार बंदा है! पिछले महीने का एक ट्रांसक्शन मैं भूल गया था वो भी हिसाब के साथ देकर गया है लौंडा। सारा काम छोड़ के, जय हिन्द बोल के उसके माथे की चुम्मी ली मैंने तुरंत… ”

समाप्त!

ज़हनजोरी (कहानी संग्रह) – Zahanjori Back Cover

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ए माइनस बनाम बी प्लस (story) – मोहित #ट्रेंडस्टर

A Minus – “जब-तब लोगो को कहते सुनता हूँ कि फलाना 25 वर्षों से हमारी समिति के सदस्य है, यह वरिष्ठ सदस्या ढिमकानी बहन जी दशको से इस संस्था की सेवा करती आ रही है। इन उदाहरणों में थोड़े वेरिएशंस और जोड़ लो।”
B Plus – “हाँ तो दिक्कत क्या है, कोई वर्षो तक कहीं अपना योगदान दे तो उसका सम्मान होना चाहिए। यह तो लग रहा है तुम जलनवश कह रहे हो प्रादेशिक समिति पुरूस्कार समाहरोह में ऐसे वरिष्ठ लोगो कि धूम देख कर।”
A Minus – “जलन से नहीं अपने विश्लेषण से कह रहा हूँ। अब देखो जैसे तुम समिति से लगभग 4-5 सालों से जुड़े हो जिसमे तुम हर सप्ताह 1-2 बार समिति के कार्यक्रमों, कैंप्स और यहाँ तक कि अवकाश के दिनों में ग्रामीण टूर्स पर भी जाते हो। यानी लगभग सवा 300 सश्रम हाज़िरीयां, अब कई “वरिष्ठ” सदस्य ऐसे होते है जो खानापूर्ति के लिए समिति के वार्षिक समारोह और इक्का-दुक्का ख़ास मौकों पर दिख जाते है और फिर कहते है हम 20 साल से समिति की सेवा में लगे है, यानी 50-60 हाज़िरियां। अब बताओ किस कोण से वो तुमसे अधिक वरिष्ठ हुए?”
B Plus – “पर उनके घर-परिवार भी होंगे, अन्य ज़िम्मेदारियाँ होंगी, क्या पता उनमे कोई-कोई पांच-सात समितियों का भी सदस्य हो। ऐसे कुछ निर्णय सुना देना ठीक नहीं!”
A Minus – “यहीं छिपी है असल बात, जिसने जहाँ जितना योगदान दिया उसको वहां उस अनुपात में फायदा हो, नाम-मान्यता मिले। जो यहाँ नियमित आ रहे है निश्चित ही वो अपनी दूसरी ज़िम्मेदारियों से समय और योगदान बचा कर यहाँ लगा रहे है। अब यह थोड़े ही कि सचिन भी बन जाओ और न्यूटन भी हो लो हवा में। संख्याओं और तुलनात्मक बातों को समझने, उनके पीछे जाने की आदत नहीं है हम सबकी इसलिए आलस में बिना जाँचे फैसले लेते है, इस कारण कई सहायक किरदार भी सुपर हीरो-हीरोइन बना दिए जाते है।
समाप्त!
– मोहित शर्मा (ज़हन)
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Bageshwari # 03 Magazine

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….in Bageshwari # 03 Magazine

Sunehri jo Meera (Poem) and Dhongi Filmkaaro ki jamaat (Article) published in May 2015 edition of Bageshwari Magazine.

Google Playstore Link – http://books.google.co.in/books/about?id=wTCzCAAAQBAJ&redir_esc=y

– Mohit Sharma (Trendster) #mohitness #mohit_trendster #trendy_baba #bageshwari #rajasthan #india

झोलाछाप टैलेंट – लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)

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मेरा नाम है रवि यादव….प्यार से लोग मुझे झोलाछाप लेखक बुलाते है।
कभी अपने सपनो का पीछा करते-करते मैं मुंबई आया था। रहने के लिए कमरा ढूँढ़ते हुए डीलर ने लोकेश गौतम से मिलवाया, मेरी तरह वह भी मुंबई एक बड़ा राइटर बनने आया था। बड़ा सभ्य और सभी से प्यार से मिलने वाला बंदा था। मैं जैसे तैसे एक अखबार में लगा पर उसका कुछ नहीं हो पाया। उसमे लेखक वाली बात जो नहीं थी, इधर-उधर जोड़कर बनायीं कहानियाँ, आइडियाज कहाँ चलते है? पर उसके मुँह पर यह बात बोलने की हिम्मत नहीं थी मुझमे। शायद इसलिए क्योकि कहीं ना कहीं लोकेश में मुझे अपने बड़े भईया दिखते थे।
कुछ समय बाद मुझे बेहतर तनख़्वाह पर एक मैगज़ीन में काम मिला तो अपनी जगह मैंने उसको काम पर लगवाया। एक दिन जब घर लौटा तो देखा मेरी कुछ अधूरी स्क्रिप्ट्स गायब थी और साथ ही लोकेश का भी कोई अता-पता नहीं था। लालच में उसने मेरी कहानियां अपने नाम से एक प्रोडक्शन हाउस को बेच दी। मेरी कहानियाँ राइटर्स एसोसिएशन में रजिस्टर्ड थी पर थोड़ा बहुत हेर-फेर कर नक़ल को असल बनाने में उसे महारथ थी इसलिए केस करने पर भी कुछ साबित नहीं होने वाला था। मैंने सोचा चार-पांच स्क्रिप्टस से कितने महीने जी लेगा? मेरा दिमाग तो नहीं चुराया उसने। आखिर टैलेंट के आगे तो नक़ल को हमेशा झुकना पड़ता है।
तबसे आज 12 बरस हो चुके है। आखिरकार मेरा संघर्ष रंग लाया, मुझे एक महान हस्ती के ऊपर बन रही बड़े बजट की बायोग्राफिकल फिल्म की स्क्रिप्ट लिखने का काम मिला है। वह महान शख्स जिसके ऊपर यह फिल्म बन रही है….लोकेश गौतम।
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– मोहित शर्मा (ज़हन)
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एक बटन सा.. – मोहित शर्मा (ज़हन)

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एक बटन सा…(Laghu Katha)

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छोटे शहर के एक बड़े साइकोलॉजिस्ट जाधव जी के खाली क्लीनिक में एक और आलसी शाम। 31 वर्षीय शिवांश कुमार को संतुष्टि मिली कि कोई अन्य मरीज़ ना होने के कारण “डॉक्टर” के साथ उसे अधिक समय का सेशन मिल जाएगा। कुछ औपचारिकता के बाद डॉक्टर के केबिन में….

शिवांश – “वैसे तो मैं आपके पास ना आता पर आपका इंटरव्यू पढ़ा जिसमे आपने सही कहा कि जब जिम जाने वालो को अपंग नहीं समझा जाता तो आपके पास आने वालो पर यह धब्बा क्यों लगाया जाता है कि वो मानसिक रूप से ठीक नहीं? आपके सेशंस को एक्सरसाइज की तरह लिया जाना चाहिए।”

जाधव जी – “धन्यवाद! छिट-पुट मानसिक परेशानी हर इंसान को होती है। मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ तो कोई नहीं होता। तो शुरू कीजिये, बताएँ समस्या क्या है?”

शिवांश – “डॉक्टर लाइफ मौज में कट रही थी, सब कुछ कितना साफ़-सरल था फिर पता नहीं कोई बटन सा दबा और मैं 2008 से सीधा 2015 में पहुँच गया। कुछ समझ नहीं आ रहा क्या करूँ। अब या तो लाइफ रिवर्स करने का उपाय बताएं या फिर इतना सुनिश्चित करवा दें कि आगे कभी ऐसा कोई बटन ना दबे जीवन में…. ”

– मोहित शर्मा (ज़हन)

नवीन रंजिश – मोहित शर्मा (ज़हन) #mohit_trendster

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यह कहानी है दो खानदानों के बीच पीढ़ियों से चली आ रही रंजिश की, जिसका अंत देखने सुनने वालो को असंभव लगता था। बदले ज़माने के नये परिवेश में भी राणा और वर्मा परिवारों की दुश्मनी बरकरार थी, और होती भी क्यों ना? इनके पुरखों ने ना जाने कितनी आहुतियाँ दे डाली थी अब तक इन झगड़ों में। सीधे ढर्रे पर चलते जीवन में जैसे सुर्ख रंग की मिलावट की आदत पड़ गयी थी इन्हे।
आज बरसो बाद एक बार फिर से दोनों परिवार आमने सामने थे। क्या पुरुष – क्या महिला, सबकी आँखों में बरसों का रोष झलक रहा था। एक तरफ वर्मा परिवार के मुखिया भानु वर्मा, जिन्हे अपनी पीएचडी डिग्री का गुमान और दूसरी तरफ राणा परिवार के सर्वेसर्वा संग्राम राणा जिन्होंने अपने पुरखों की शान में अपनी मूँछे नहीं कटाई। पर यह ऊपरी आडम्बर किसकी तसल्ली के लिए गढ़े जा रहे थे इसका जवाब किसी के पास नहीं था?
क्या इतिहास खुद को आज दोहराने वाला था? तो क्या कहानी का एक और पन्ना खून के रंग में रंगने वाला था? जानते हैं भानु वर्मा की शान, उनके अनुज बलिदान वर्मा कि ज़ुबानी।
“अरे कुछ ना हुआ भैया जी….मैं पहले ही कह रहा था कि बात सुलटा लो पर दोनों तरफ इतने कलमुँहे, कुल्टा लोग भरे पड़े है कि नहीं जी चाहे मकान-दुकान चले जायें पर आन-बान-शान ना चली जाये। और सब लड़ने को तैयार, मेरी भी मती मारी गयी थी जो जोश में आकर अपने भईया से भी आगे कूद के आगे आ गया। वही बात है कि जब एड्रिनलिन पम्प करता है तो आदमी जम्प करता है। तेज़ बहस, ललकारों को सुनकर मुफ्त की लड़ाई देखने की आस में भीड़ इखट्टा हो गयी, जिनको देखकर पास के स्कूल से हटकर चूरन-चाट वालो ने हमारे आस-पास ठेले लगा लिए। दोनों साइड जो कुछ एक लड़ना नहीं चाह रहे थे उन्हें लगा कि इतनी भीड़ और ठेले लग गये है उन्हें निराश घर नहीं भेजना चाहिए।
जंग का आगाज़ हुआ और……आई मम्मी इतनी ज़ोर का सरिया लगा ना मेरे खोपड़े पे कि डेढ़ सेकंड में गिव-अप कर दिया मैंने और चुस्की वाले की रेहड़ी की टेक लेके बैठ गया। लड़ाई शुरू होती इस से पहले ही गली के अपार्टमेंट की एक बालकनी जहाँ पूरी नवीन किराना स्टोर जॉइंट फैमिली संडे मूवी का प्लान कैंसल कर के हमारे युद्ध के एंटरटेनमेंट से अपने पैसे बचाने के मूड में थी, छज्जे समेत हम सबके ऊपर डह गयी।
संग्राम राणा परं ईंटो की बरसात हो गयी, जिसमे से एक ईंट ने घिसट कर उसकी मूँछ को नेस्तोनाबूद कर दिया। मेरे बड़े भ्राता भानु के खोपड़े पर नवीन किराना वालो कि नववधु का घुटना ऐसा लगा कि वह पीएचडी डॉक्टर से सीधा सातवी कक्षा वाले हो गए। ऊपर किसी कि गंदी नाली का पाइप चोक था वो टूटकर हमारी बहु-बेटियों का मेकअप धो गया।
किसकी टांग कौनसी है, किसकी कोहनी किसके पेट में चुभ रही है….कुछ पता नहीं। दुश्मनो के जो मुँह एक दूसरे को देखना तक पसंद नहीं करते थे वो मलबे के नीचे कामुक मुद्राओं दबे अनचाहे आपस में कहाँ-कहाँ चुंबन ले रहे थे। ताऊ जी जो मिलने आये थे और मज़े-मज़े में साथ आ गए और नवीन किराने वालो के कुत्ते के मुँह इस तरह मलबे में आमने-सामने पोज़ीशण्ड थे कि मदद आने तक कुत्ते से मुँह चटवाने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं था। ये जो रायता फैला इसके साफ़ होने के बाद पता चला दोनों पार्टीज की नानीयां, दादियां टकली हो गयी है। फिर किसी ने बताया की बुढ़िया के बाल वाले के कस्टमर ज़्यादा हो गए थे इसलिए उसने…..”
अंत में अस्पताल में ही सुलह हुई और दोनों परिवारो को यह बात समझ आई कि पुरानी रंजिशों को चलाते रहने में समझदारी नहीं है। अब दोनों परिवारो कि नयी रंजिश शुरू हुयी……नवीन किराना स्टोर फैमिली से।
– मोहित शर्मा (ज़हन) #mohitness #mohit_trendster #freelance_talents

Nyctophobia Struggle…. #mohit_trendster

Nyctophobia Struggle….

My entry for Red Streak Publications Fire for Fear Contest.
Entry #4
from meerut
डर हर किसी के जीवन का अंग है, बस उसके कारक अलग-अलग हो सकते है पर डर का अनुभवकभी ना कभी हम सभी करते है। अपने अनुभव से मैंने यह सीखा है कि डर को टाल कर हम उसे अपनी आदत में आने का और बड़ा होने का अवसर दे देते है जबकि उसका सामना कर उसको हराना उतना मुश्किल नहीं जितना हम समझते है। जीत कभी तुरंत मिल जाती है और कभी धीरे-धीरे भय को मारा जाता है।
मेरा डर अँधेरे से था। वजह तो पता नहीं पर बस यही एक बात थी जिस से मुझे बेचैनी होती थी। बचपन तो मम्मी-पापा के बीच में राजा की तरह सोकर कट गया पर टीनएजर होने पर बड़े भैया और दीदी के अलग शहरों में जाने के बाद अपना कमरा मिला तो रात में लाइट ऑफ करना मेरे लिए एक संघर्ष बन गया। जैसा मैंने कहा कि इसका कारण मुझे याद नहीं पर अवचेतन मन में शायद कोई बचपन में सुनी कहानी घर कर गयी थी या मैंने खुद ही कोई अनजान अनुभव गढ़ लिया था। धीरे-धीरे घरवालो ने इस आदत के लिए टोकना शुरू किया पर हमेशा मेरे पास कुछ ना कुछ बहाने रहते थे लाइट जली छोड़ने के। शायद समय के साथ मेरे पिता जी जान चुके थे पर मुझे बुरा ना लगे इसलिए उन्होंने कभी ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया इस बात पर मेरे बड़े होने के बाद भी।
यह भय केवल अंधकार का नहीं था बल्कि उसमे गढ़ी अज्ञात बातों, काल्पनिक भूत-प्रेतों, जीवों का भी भय था। जब भी लाइट ऑफ कर सोने की कोशिश करता तो ऐसा लगता जैसे कोई कमरे में बैठा मुझे देख रहा है। उस ओर पीठ कर सोने को होता तो लगता कि वह और पास आ गया है। वैसे अंधेरे में कहीं बाहर टहलने में, किसी अँधेरी जगह जाने में यह डर शायद इसलिए नहीं लगता था क्योकि मन को गाड़ियों-लोगो कि आवाज़ों से यह तस्सली रहती थी कि आस-पास कोई है और कुछ अनहोनी होने पर मैं दौड़ कर उनके पास पहुँच सकता हूँ। पर रात को ना लोगो कि आवाज़े रहती और ना ही मैं परिवार के सदस्यों को परेशान करना चाहता था इसलिए चाहे-अनचाहे मुझे अपने कमरे में मुझे घूरते अनजान जीवों के साथ रहना पड़ता।
इन्वर्टर आम होने के ज़माने से पहले लाइट जाने पर रात में अगर मेरी नींद खुलती तो 15-20 मिनट्स तक करवटें बदलने तक अगर लाइट वापस नहीं आती तो मुझे बरामदे में टहलना पड़ता जहाँ दूर की स्ट्रीट लाइट्स से, घरों से थोड़ी बहुत रौशनी रहती थी। वैसे तो टोर्च भी थी पर घुप्प अँधेरे में टोर्च की रौशनी घरवालो का ध्यान खींच सकती थी और उसे किसी तरह ढकने या एंगल बदलने पर फायदा ना होता। पूरी कोशिश रहती थी की मेरे परिवार पर यह बात ज़ाहिर ना हो इसलिए रात में कम से कम हरकते करता था। एक बार तो सरकारी मकान में अपने कमरे कि खिड़की के कोने में अच्छा-खासा छेद कर दिया जिस से लाइट जाने पर भी दूर अलग फेज़ की स्ट्रीट लाइट की बीम से कमरे में थोड़ा उजाला रहे।
समय के साथ चीज़ें बदली पर यह आदत जैसे मेरे रूटीन में आ गयी। अगर मैं कहीं किसी के यहाँ कुछ दिनों के लिए बाहर जाता या किसी फंक्शन आदि वजह से कोई मेरे कमरे में सोता तब मुझे ऐसा कोई डर नहीं लगता था। पर यह बात 25 साल के हो जाने के बाद भी जारी रहने पर मुझे परेशान करने लगी। जब भी मैं लाइट बंद कर सोने की कोशिश करता तो कुछ ही देर में इतनी बेचैनी हो जाती कि उठकर स्विच ऑन करना पड़ता। अब खुद पर गुस्सा बढ़ने लगा था। पहले तो 6 फ़ीट से ऊपर अपने शरीर को देख कर लगता था कि ऐसा क्यों करता हूँ मैं, फ़िर इस बात को बचपन से अब तक घसीटते जाने पर। एक यह सोचने पर हँसी और रोष दोनों आते थे कि बचपन से अब तक मैं कितनी लाइट वेस्ट कर चुका हूँ इस डर के चक्कर में।
समस्या पर गौर करने पर मैंने पाया कि अब तक मैं सिर्फ इसको अनदेखा कर रहा था, टालते हुए बच रहा था पर असल में मैंने कभी इसका सामना तो किया ही नहीं। सबसे पहले तो मैंने पाया की मेरा शरीर और मेरी आँखें रात में रौशनी की इतनी अभ्यस्त हो चुकी थी कि उजाला कम या बंद होने पर अपने आप मेरी नींद टूट जाती थी, शायद तभी कहते है कि बहुत लम्बे समय तक बुरी आदत के साथ रहने पर उस से पीछा छुड़ाना लगभग नामुमकिन सा हो जाता है। फिर मैंने अपने कमरे में रात के लिए अलग से ज़ीरो वॉट का बल्ब लगाया और कुछ हफ्ते उसमे सोया। जब मुझे कुछ अंतर महसूस हुआ तो समय था डर से सीधे उसके इलाके में युद्ध करने का। मैंने एक रात वह बल्ब भी ऑफ कर दिया पर पूरी रात सो नहीं पाया, पसीने से लथपथ बेचैनी का यह सिलसिला कुछ दिनों तक चला। फिर मैंने ध्यान बटाऊ टैक्टिक्स सोचे जैसे सोने से पहले खुद को अलग-अलग विचारों में डुबा देना, एक्सरसाइज से बहुत थका लेना, भगवान जी का स्मरण करते रहना, म्यूजिक सुनना आदि जिस से फायदा हुआ पर लगा कि यह भी भय को टालना हुआ, उसका सामना करने के बजाए।
अब मैंने बिना सहारे के सीधा मुकाबला करने की ठानी। मैं कमरे में हर उस तरफ उन काल्पनिक आँखों में देखता रहता जब तक मुझे नींद नहीं आती। अंतर लग रहा था, मैं बेहतर महसूस कर रहा था। कुछ दिन बाद अपने रूटीन में मैंने बिस्तर से तुरंत उठ कर कमरे के उन कोनो, जगहों पर जाकर घूरना शुरू कर दिया जहाँ मुझे लगता कोई मुझे बैठा/खड़ा घूर रहा है। इस बात कि घूरने वाले/वाली को शायद आदत नहीं थी, अब मैं भी अंधेरे के उन काल्पनिक लोगो को वैसे ही परेशान कर रहा था जैसे होश संभालने के बाद से अब तक उन्होंने मेरी नींद हराम कि थी (और मेरे पापा का बिजली का बिल बढ़वाया था)। आखिरकार मैंने इस डर को खुद से अलग कर लिया था और जैसे एक भ्रम को राख कर मन से एक भारी बोझ कम कर लिया। मैं चैन से सोने के लिए अब उजाले पर निर्भर नहीं। अब कभी कभी वह घूरने वाला कमरे मे आता है तो उस तरफ मुस्कुरा कर आराम से सो जाता हूँ।
– Mohit Sharma (Trendster) from Meerut, U.P. #fireforfear

परदे के पीछे (Laghu Katha) – मोहित शर्मा (ज़हन)

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…परदे के पीछे
प्रतिष्ठित टीवी चैनल के आगामी रिएलिटी शो के लिए बैठी कॉलेज से निकली उत्साहित इंटर्न टीम ने हज़ारों एंट्रीज़ में से काफी मशक्कत के बाद कुछ दर्जन योग्य लोग छांटें। तभी उनके सीनियर्स काम का अवलोकन करने पहुँचे।
इंटर्न – “मैडम! इन लोगो कि प्रोफाइल्स हमारे शो के प्रारूप से फिट बैठती है, अब इनमे से किसका चयन करें और किसका नहीं? सब लगभग बराबर से है।”
प्रबंधक मैडम – “इनमे से कोई भी नहीं चलेगा।”
इंटर्न – “ऐसा क्यों मैडम?”
प्रबंधक मैडम – “फिर से लिस्ट बनाओ और अनाथ, अपंग, अपराध या उत्पीड़न के शिकार लोगो को सेलेक्ट करो। उनकी कहानी बोरिंग हो तो उसमें और ड्रामा एलिमेंट्स जोड़ों। ऐसे ही किसी को भी सेलेक्ट मत किया करो….”
– मोहित शर्मा (ज़हन) ‪#‎mohitness‬ ‪#‎mohit_trendster‬

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