जीवन में विलेन ढूँढने की आदत (लेख) #ज़हन

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कॉमिक्स लेखन में एक कहावत है, “विलेन भी अपनी नज़रों में हीरो होता है।” खलनायक अपनी छोटी भूल से लेकर जघन्य अपराधों तक का इतनी चपलता से स्पष्टीकरण देता है कि लगे उस स्थिति में सबसे ठीक विकल्प वही था। बचपन से हमें बुराई पर अच्छाई की जीत वाली कई गाथाओं का इस तरह रसपान करवाया जाता है तो कोई भी बुरा नहीं बनना चाहता। अब सवाल उठते हैं कि अगर कोई बुरा नहीं तो फिर समाज में फैली बुराई का स्रोत क्या है? दुनिया में सब अच्छे क्यों नहीं? जवाब उस कॉमिक विलेन वाला है, ‘अपनी पिक्चर में हर कोई नायक होता है।’ दुनिया में ना कोई पूरी तरह अच्छा है और ना ही कोई बुराई का पुतला है। फिर भी खलनायक ढूँढने, बनाने की आदत हम सबके अंदर है। ये आदत कहाँ से जन्मी? शायद मानव मन को एक सांत्वना सी मिल जाती है और अपनी बुराइयों, कमियों से ध्यान हट जाता है। कभी-कभार परिवेश और घटनाओं के आधार पर किसी को डीमनाइज़ करना समझा जा सकता है पर जब यह आदत लोग अपने निजी जीवन के हर पहलु में लगाने लगें तो समस्याओं का जाल बन जाता है।

*) – प्रकृति की कारस्तानी: नेचर का एक नियम होता है कि हर जैविक प्रजाति धरती पर हो रहे बदलाव के अनुसार खुद को ढालते हुए निश्चित विकास के साथ बढ़ती रहे। अब अगर सबसे विकसित दिमाग वाला प्राणी मनुष्य, बात बात पर अंतःकरण की आवाज़ सुनकर खुद पर सवाल करने लगेगा तो उस प्रजाति में अवसाद, हीन भावना आदि मानसिक समस्याओं का औसत काफी बढ़ जाएगा। ऐसा होने पर मानव प्रजाति के विकास में बाधा आ सकती है। इस कारण से आम इंसान का ध्यान बँटाने के लिए प्रकृति ने उसमे ऐसा तंत्र फिट किया है कि वह दुनियाभर की बुराई को मैग्नीफाई करके खुद को दिलासा देता रहता है कि “मैं तो फिर भी बहुत ठीक हूँ बाकियों से।” इस सोच को बढ़ावा देने में मीडिया का बड़ा योगदान है जिसे किसी नैरेटिव और मसाले के लिए लगभग हर कहानी में किसी ना किसी को खलनायक बनाने का शौक है।

*) – घटनाओं की नवीनता: …यानी रीसेन्सी ऑफ़ इवेंट्स का मतलब किसी व्यक्ति द्वारा अपनी सुविधानुसार पास की घटनाओं के हिसाब से मन बनाना। वहीं पहले हुई घटनाएँ जो उसकी याददाश्त के कम्फर्ट जोन से बाहर हों उन्हें सोच में शामिल ना करना। यहाँ सुविधा सिर्फ कुछ याद रखने के दायरे में ही नहीं बल्कि अपने एजेंडे के हिसाब से घटनाओं को रखने और हटाने में भी है। अक्सर सोशल मीडिया पर किसी राजनैतिक बहस पर आप ऐसा देख सकते हैं। किसी असत्यापित खबर पर हम इसी अनुसार सही और गलत पक्ष का निर्णय सुना देते हैं।

*) – निजी जीवन: बाहरी घटक तो एक बार के लिए फिर भी संभाले जा सकते हैं पर अगर कोई इंसान अपने जीवन में अहम् किरदार लिए लोगो को डीमनाइज़ करना शुरू कर दे तब वह अनजाने में अपना ही नुक्सान करने लगता है। उसके पेशे, रिश्तों पर इसका बुरा असर पड़ता है। बिना किसी ठोस आधार के अपनी कल्पनाओं के अम्बार को आग लगाकर हम अपने जीवन के रावणो को ढूँढ लेते हैं। समय के साथ ये आदत प्रबल हो जाती है पर इतनी प्रत्यक्ष होकर भी हमें दिखाई नहीं देती।

पूछें खुद से ये सवाल – उसकी जगह मैं होता तो क्या करता? क्या कोई ऐसी बात तो नहीं जो मुझसे अनदेखी रह गयी? कहीं मैं मन में गढ़ी बातों को असल बातों में मिला तो नहीं रहा? इस मसले पर बिना किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त व्यक्ति की क्या राय होती? मन के ध्यान बटाऊ टैक्टिस में फँसने के बजाय इन सवालों के ईमानदार जवाब कई मामलों में ग़लतफहमी दूर कर देंगे और शर्तिया 10 में से 8-9 बार आपकी कहानी में बिना बात कोई काल्पनिक खलनायक नहीं रहेगा।

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Read समूह वाली मानसिकता (लेख)

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समूह वाली मानसिकता (लेख) #ज़हन

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प्राकृतिक और सामाजिक कारणों से हम सभी की पहचान कुछ समूहों से जुड़ जाती है। उदाहरण के लिए एक इंसान की पहचान कुछ यूँ – महिला, भारतीय, अच्छा कद, गेहुँआ रंग, शहरी (दिल्ली निवासी), प्रौढ़, सॉफ्टवेयर क्षेत्र में काम करने वाली, हिन्दू (दलित), मध्यमवर्गीय परिवार आदि। अब पूरा जीवन इन समूहों और उनसे निकले उप-समूहों को जीते हुए उस महिला के मन में इन सबके बारे में काफी अधिक जानकारी आ जाती है जबकि बाकी दुनिया के अनगिनत दूसरे समूहों के बारे में उसे ऊपरी या कम जानकारी होती है। ऐसी ऊपरी जानकारी पर उसके साथ समूह साझा कर रहे लोग नमक-मिर्च लगा कर ऐसा माहौल बनाते हैं कि अधिकांश लोग धीरे-धीरे मानने लगते हैं कि वो जिन समूहों से हैं, दुनिया की सबसे ज़्यादा चुनौतियाँ सिर्फ उन्हें ही देखनी पड़ती हैं और उनका समूह सर्वश्रेष्ठ है। दुनिया की हर खबर, बात, मुद्दे पर वो अपने समूहों के हिसाब से विचार बनाते हैं।

जहाँ वो महिला कई पुरुषों द्वारा गोरे वर्ण की स्त्रियों को वरीयता देने की समस्या को समझेगी, वहीं खुद छोटे कद के या पतले पुरुषों का सहेलियों में मज़ाक उड़ाने या उन्हें वरीयता ना दिए जाने की गलत बात पर दोबारा सोचेगी भी नहीं। जहाँ उसे सॉफ्टवेयर दुनिया का सबसे कठिन क्षेत्र लगेगा, वहीं अपने पिता द्वारा दिवाली पर डाकिये को दिए इनाम पर वह सवाल करेगी कि साल में 2-4 बार तो आता है (पर उसे यह नहीं पता या शायद वह जानना नहीं चाहती कि इस डाकिया के ज़िम्मे डेढ़ हज़ार हज़ार घर और सौ दफ्तर हैं)। कभी सवाल करने पर वह रक्षात्मक होकर अपने समूह पर अनगिनत रटी हुई दलीलें सुना देगी…बिना यह समझे की संघर्ष तो सबके जीवन में है; कई बार उसके नज़रिये से ‘गिफ़्टेड’ या ‘कम मेहनत’ वाले समूहों से जुड़े लोगो में उसके समूहों से अधिक। यह मानसिकता लेकर व्यक्ति जीवनभर कुढ़ता रहता है। मन ही मन ऐसे अनेक लोगो से दूर हो जाता है जिनसे उसका अच्छा नाता बन सकता था और दोनों एक दूसरे के बहुत काम आ सकते थे। एक संभावना यह बनती है कि आपको अपना मित्र पसंद है बस उसकी कुछ बातें नहीं पसंद क्योंकि वो ‘कुछ बातें’ उसके अंदर दूसरे समूहों से आई हैं, जिनमे आप नहीं हो।

इस सामाजिक अनुकूलन (सोशल कंडीशनिंग) के जाल से बाहर आकर ही समाज में निष्पक्ष, सकारात्मक योगदान देना संभव है। यहाँ ये मतलब नहीं कि अपने समूह के अधिकारों, बातों पर आवाज़ ना उठायी जाए; पर ऐसा करते हुए बिना जांचे गलत बातों-अफवाहों को बढ़ावा देना, अन्य आवाज़ों को अनसुना करना, उनको अपनी बड़ी कालजयी पहल के आगे छोटा मानना या भ्रान्ति में जीना गलत है। समूहों की तुलना में भावनाओं के बजाय तर्कों और इतिहास की घटनाओं से बने वर्तमान समीकरण के अनुसार बात करना बेहतर है।
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सिर्फ मर्सिडीज़ ही चाहिए? (लेख) #मोहितपन

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जब से लेखन, कला, कॉमिक्स कम्युनिटीज़ में सक्रीय हूँ तो ऑनलाइन और असल जीवन में कई लेखकों, कलाकारों से मिलने का मौका मिला है। एक बात जो मैं नये रचनाकारों को अक्सर समझाता हूँ वो आज इस लेख में साझा कर रहा हूँ।

3-4 साल पहले एक युवा कवि/लेखक ने मेरे ब्लॉग्स पढ़कर मुझसे संपर्क किया और हम ऑनलाइन मित्र बन गये। कुछ समय तक उनके काव्य, कहानियां पढ़ने को मिली फिर वो गायब से हो गये। वो अकेले ऐसे उदाहरण नहीं हैं, पिछले 11 वर्षों में कई प्रतिभावान लेखक, कलाकार यूँ नज़र से ओझल हुए। निराशा होती है कि एक अच्छे कलाकार को पता नहीं क्या बात लील गयी….कहने को तो व्यक्ति के वश से बाहर जीवन में कई बातें उसे रचनात्मक पथ से दूर धकेल सकती हैं पर एक कारक है जिसके चलते कई हार मान चुके कलाकार अपना क्षेत्र छोड़ देते हैं। एक लेखक का उदाहरण देकर समझाता हूँ। मान लीजिए नये लेखक को ऑनलाइन मैगज़ीन के लिए लिखने का मौका मिला, उसने मना कर दिया। मैगज़ीन पेज पर 700 फॉलोवर और प्रति संस्करण 450 डाउनलोड वाली ऑनलाइन पत्रिका पर वह अपना समय और एक आईडिया क्यों बर्बाद करे? इस क्रम में लेखक ने कई वेबसाइट को ठेंगा दिखाया कि वो उसके स्तर की नहीं। चलो सही है, थोड़े समय बाद उसे एक स्थानीय प्रिंट मैगज़ीन या अखबार में कुछ भेजने को कहा गया फिर उसने समझाया – जो प्रकाशन 2-3 शहरों तक सीमित हो उसमे छपना भी क्या छपना। पब्लिश हो तो इस तरह कि दुनिया हिल जाए! हम्म…. कुछ अंतराल बाद इनके किसी मित्र को लेखन अच्छा लगा तो अपनी शार्ट फिल्म के लिए स्क्रिप्ट की बात करने आया। जवाब फिर से ना और मन में (“अबे हट! ऐसे वेल्ले लोगो की फिल्म थोड़े ही लिखूंगा, सीधा चेतन भगत की तरह एंट्री मारूंगा।”) और इस तरह मौके आते गये-जाते गये। अब ऐसे लेखक, कवि और कलाकार एक समय बाद भाग्य को दोष देकर हार मान लेते हैं और इनकी ऑनलाइन गिनी चुनी रचना पड़ी मिलती हैं और इनके मेल ड्राफ्ट्स में डेढ़-दो सौ आईडिया सेव होते हैं जो कभी दुनिया के सामने नहीं आते क्योकि इन्हे एक खुशफ़हमी होती है कि ये जन्मजात आम दुनिया से ऊपर पैदा हुए हैं तो आम दुनिया जैसी मज़दूरी किये बिना ये डायरेक्ट सलमान खान, ऋतिक रोशन के लिए फिल्म लिखेंगे या 90 के दशक के वेद प्रकाश शर्मा जी की तरह एक के बाद एक बेस्टसेलर किताबें बेचेंगे। मतलब खरीदेंगे तो सीधा मर्सिडीज़ बीच में साइकिल, बाइक, मारुती 800, वैगन आर, हौंडा सिटी लेने का मौका मिलेगा भी तो भाड़ में जाए….ऐसा नहीं करेंगे तो बादशाह सलामत की शान में गुस्ताखी हो जायेगी ना!

अरे! स्टेटस या अहं की बात बनाने के बजाए ऐसे छोटे मौकों को आगे मिलने वाले बड़े अवसरों के पायदान और अभ्यास की तरह लीजिए। अगर आप वाकई अपने जुनून के लिए कुछ रचनात्मक कर रहे हैं तो इन बातों का असर तो वैसे भी नहीं पड़ना चाहिए। मंज़िल के साथ-साथ यह ध्यान रखें कि आप सफर में धीमे ही सही पर आगे बढ़ रहे हैं या नहीं। आप कलात्मक क्षेत्र में जिन्हे भी अपना आदर्श मानते हैं उनकी जीवनी खंगालें, लगभग सभी का सफर ऐसे छोटे अवसरों से मिले धक्के से बड़े लक्ष्य तक पहुँचा मिलेगा। हाँ, अपनी प्राथमिकताएं सही रखें, ऐसा ना हो कि सामने कोई बड़ा अवसर मिले और आप किसी बेमतलब की चीज़ में प्रोक्रैसटीनेट कर रहे हों। संतुलन बिगड़ने मत दीजिये और खुद पर विश्वास बनाये रखें। गुड लक!

#ज़हन

Posted by Mohit Sharma

Magazine: Anik Planet (अनिक प्लैनेट) – Issue #01

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Cover story for Comics Our Passion magazine Anik Planet – अनिक प्लैनेट (Issue # 01), November 2016. They were kind enough to advertise my upcoming projects “Kadr” and “Peripheral Angel” in this issue.

कलाकार श्री सुरेश डिगवाल

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मेरे एक कलाकार-ग्राफ़िक डिज़ाइनर मित्र ने मुझसे शिकायत भरे लहज़े में कहा कि मैं अक्सर भारतीय कॉमिक्स कलाकारों, लेखकों के बारे में कम्युनिटीज़, ब्लॉग्स पर चर्चा करता रहता हूँ पर मैंने कभी सुरेश डिगवाल जी का नाम नहीं लिया। मैंने ही क्या अन्य कहीं भी उसने उनका नाम ना के बरारबर ही देखा होगा। वैसे बात में दम था, अगर एक-दो सीजन का मौसमी कलाकार-लेखक होता तो और बात थी पर सुरेश जी ने डोगा, परमाणु, एंथोनी जैसे किरदारों पर काफी समय तक काम किया। उसके बाद भी कैंपफायर ग्राफ़िक नोवेल्स, पेंगुइन रैंडम हाउस, अन्य कॉमिक्स, बच्चो की किताबों और विडियो गेम्स में उनका काम आता रहा। अब सुरेश जी गुड़गांव में जेनपैक्ट कंपनी में एक कॉर्पोरेट लाइफ जी रहे हैं।

जहाँ तक उनपर होने वाली इतनी कम चर्चा की बात है उसपर मेरी एक अलग थ्योरी है। जिसको तुलनात्मक स्मृति थ्योरी कहा जा सकता है। किसी एक समय में एक क्षेत्र में जनता ज़्यादा से ज़्यादा 4 नाम ही याद रख पाती है (बल्कि कई लोगो को सिर्फ इक्का-दुक्का नाम याद रहते हैं)। उन नामो के अलावा उस क्षेत्र में सक्रीय सभी लोग या तो लम्बे समय तक सक्रीय रहें या फिर उन नामो को नीचे धकेल कर उनकी जगह लें। भाग्य और अन्य कारको से अक्सर कई प्रतिभावान लोग उस स्थान पर नहीं आ पाते जिसके वह हक़दार होते हैं, ओलंपिक्स की तरह दशमलव अंको से छठवे, सातवे स्थान या और नीचे स्थान पर रह जाते है जहाँ आम जनता स्मृति पहुँच नहीं पाती। सुरेश जी का दुर्भाग्य रहा कि एक समय वह इतना सक्रीय रहते हुए भी प्रशंसको के मन में बड़ा प्रभाव नहीं छोड़ पाए।

उनकी इंकिंग, कलरिंग जोड़ियों पर टिप्पणी नहीं करूँगा पर मुझे उनकी शैली पसंद थी। मुझे लगता है अगर वह कुछ और प्रयोग करते, कुछ भाग्य का साथ मिल जाता तो आज मुझे अलग से उनका नाम याद ना करवाना पड़ता। एक वजह यह है कि बहुत से कलाकारों को अपना प्रोमोशन करना अच्छा नहीं लगता, इन्टरनेट-सोशल मीडिया की दुनिया से दूरी बनाकर वो अपनी कला में तल्लीन रहते हैं। खैर, कॉमिक्स के बाहर एक बहुत बड़ी दुनिया है जहाँ सुरेश डिगवाल जी कला निर्देशन, एनिमेशन, चित्रांकन, विडियो गेम्स, ग्राफ़िक डिजाईन और शिक्षा में अपना योगदान दे रहे हैं। आशा है आगे हम सबको उनका काम निरंतर देखने को मिलता रहेगा।
अधिक जानकारी के लिए इन्टरनेट पर सुरेश जी की ये मुख्य प्रोफाइल्स और पोर्टफोलियो हैं –
https://www.behance.net/yogmaya
http://www.coroflot.com/Yogmaya/portfolio
https://www.linkedin.com/in/sureshdigwal

इंडी आर्टिस्ट का मतलब क्या है?

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Art – Thomas Lepine
Originally posted (COP Website)

किसी रचनात्मक क्षेत्र में किये गए स्वतंत्र काम को इंडी (Indie/Indy) यानी इंडिपेंडेंट रचना कहा जाता है। इंडी काम कई प्रकार और स्तर का हो सकता है, कभी न्यूनतम या बिना किसी निवेश के बनी रचना केवल कला के बल पर अनेक लोगो तक पहुंच सकती है और धन अर्जित कर सकती है, तो कभी कलाकार का काफी पैसा लगने के बाद भी असफल हो सकती है। किसी लेबल, कंपनी या प्रकाशक के ना होने के कारण इंडी रचनाओं में कलाकार पर उसके दिमाग में उपजे विचारों को बाजार के हिसाब से बदलने का दबाव कम हो जाता है। वहीं कभी-कभी अपनी मर्ज़ी चलने का घाटा यह होता है कि जनता कलाकार के विज़न को पूरी तरह समझ नही पाती। मुझे लगता है हर लेखक, कवि या कलाकार को इंडी चरण से गुज़ारना ही चाहिए, सीधे किसी बड़े लेबल से चिपकना भी अच्छा नहीं। अपनी कला के विकास के लिए तो स्वत्रंत रहकर अलग-अलग शैलियों, स्थितियों और अन्य कलाकारों के साथ प्रयोग करना बेहद आवश्यक है। ऐसा करने से व्यक्ति को पता चलता है कि उसे अपना समय किन बातों में देना चाहिए और किन बातों में उसकी मेहनत अधिक लगती है पर परिणाम कम आता है। जैसे लेखन में ही दर्जनों शैलियाँ हैं, कहने को तो लेखक सबमे लिख ले पर किनमें उसे सहजता है और किन शैलियों के संगम में वह कमाल करता है ये बातें धीरे-धीरे प्रयोग करते रहने से ही समझ आती है। कई मामलों में कम बजट वाली छोटी कंपनियों के लेबल के साथ प्रकाशित हुए काम को कम मुनाफे और पहुँच की वजह से इंडी श्रेणी में रखा जाता है।

अब भाग्य के फेर से कुछ लोग इंडी चरण में कुछ समय के लिए नाम को आते हैं और सीधा बड़ा टिकेट पाते हैं। जबकि कई इक्का-दुक्का मौको को छोड़ कर जीवनभर इंडी रह जाते हैं। कला का स्तर और कीमत सामने खड़े व्यक्ति के नज़रिये पर निर्भर करता है, फिर भी अगर 100 में से 70 से अधिक लोग किसी चीज़ पर एक राय रखते हैं तो उसको एक मापदंड माना जा सकता है। मापदंड ये कि यह कलाकृतियां, रचनाएं क्या पैसा कमा पाएंगी या नहीं। यह सवाल कई कलाकारों को दुख देता है लेकिन इसका सामना सबको करना पड़ता है बशर्ते आपकी पैतृक संपत्ति भयंकर हो या आप मनमौजी कलाकार हो, जो एक के बाद एक रचना निर्माण में मगन रहता है। पैसा आये तो अच्छा, पैसा ना आये तो खाना तो मिल ही रहा है! मनमौजी कलाकारों को भगवान् तेज़ स्मृति देते हैं जो सारी की सारी वो अपने काम में लगा देते हैं। उन्हें आस-पास की दुनिया में हुए पिछले क्षण चाहे याद ना हों पर 11 वर्ष पहले अगर उन्होंने कोई आईडिया कहीं इस्तेमाल किया तो उसमे क्या दिमागी दांव-पेंच हुए और क्या परिणाम आया सब याद रहेगा। अक्सर पैसों और मार्गदर्शन के अभाव में कई आर्टिस्ट संघर्ष के शुरुआती वर्षों में ही कोई और राह चुन लेते हैं, फिर कुछ ऐसे हैं जो कला से संन्यास तो नहीं होते पर सेमी-रिटायर होकर कभी-कभार कुछ काम दिखा देते हैं। ये कलाकार अपने जैसे अन्य कलाकारों, लेखको को पसंद करते हैं पर अपने क्षेत्र और हरदम मस्तिष्क के रचनात्मक जाल में उलझे होने के कारण ढंग से प्रोत्साहित नहीं कर पाते हैं। स्वयं पर निर्भर होने के कारण सफलता मिलने में अधिक समय लगता है। जो लोग पैसे को प्राथमिकताओं में नही रखते उनके लिए रास्ता मुश्किल है। धन से आप अपनी रचनाओं की पहुंच परिवर्धित कर सकते हैं, पैसे के साथ आप सिर्फ अपनी कला पर ध्यान लगा सकते हैं, नही तो एक बार का दाल-पेट्रोल का भाव नापने में आपके 4 आईडिया सुसाइड कर लेंगे। अपने कलात्मक सफर के बीच-बीच में एक नज़र आर्थिक पहलुओं पर रखना फायदे का सौदा है।

आप सभी से निवेदन है कि अपनी रूचि के विषयों में सक्रीय इंडी लेखको, कलाकारों के बारे में अधिक से अधिक जानकारी जुटाएं, उस जानकारी के आधार पर उनकी रचना, किताबें, कलाकृतियां खरीदकर, खरीदने में सक्षम नही तो अन्य लोगो को बताकर इन कलाकारों के विकास में अपना सहयोग दें।

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कॉमिक्स फैन फिक्शन लेखकों के लिए कुछ सुझाव – मोहित शर्मा ज़हन

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नमस्ते! यह विचार काफी समय से मन में है और संजय गुप्ता जी से साझा कर चूका हूँ हालांकि उस समय विस्तार से समझा नहीं पाया था पर जितना उन्होंने सुना था उन्हें पसंद आया था। मित्रों, प्रो रसलिंग आप देखते होंगे या उसके बारे में थोड़ा बहुत अंदाज़ा होगा। वर्ल्ड रसलिंग एंटरटेनमेंट या डब्लू.डब्लू.ई. के अलावा अमेरिका और विश्व में कई छोटे-बड़े रसलिंग प्रोमोशन्स हैं। दक्षिण अमेरिका, जापान और यूरोप में कुछ राष्ट्र स्तर की कंपनी कई दशकों से लोगो का मनोरंजन कर रहीं हैं। इन बड़ी कंपनियों की सफलता इनके रोस्टर (इनके लिए काम करने वाले सभी रसलर) और इनकी शैली पर निर्भर करती है। अपने शोज़ में 2 लोगो के बीच में फ्यूड (रंजिश) बनाने के लिए लड़ाई के अलावा एक सीरियल की तरह यहाँ कई सेगमेंट वाली स्टोरीलाइन होती है, जिसमें रसलिंग के दांव-पेंच के साथ अभिनय, जनता में अपना पक्ष रखना जैसी बातें ज़रूरी होती हैं। इस सबकी मदद से व्यक्ति एक पहलवान से एक किरदार बनता है जो लोगो से अच्छी या बुरी चरम प्रतिक्रिया निकलवाता है। जिसे लोग जीतते हुए या बुरी तरह मार खाते हुए देखना चाहते हैं।

डब्लू.डब्लू.ई. जैसे बड़े प्रोमोशन नए या सीख रहे पहलवान को पहले अपनी डेवलपमेंटल टेरिटरी भेजते हैं। यहाँ सुरक्षित रसलिंग छोटे-छोटे गुर सीखने के अलावा रसलर अपनी क्षमता अनुसार यह जान पाता है कि वह क्या कर सकता है? कौन से किरदार उसपर बेहतर लगेंगे, क्या पहनावा होना चाहिए, बोलने की कौनसी शैली उसपर फब्ती है आदि। इतना ही नहीं अगर किसी अन्य कंपनी से कोई जाना-पहचाना सितारा आता है तो पहले उसे भी डेवलपमेंटल यूनिट में समय बिताना पड़ता है ताकि वो कंपनी के माहौल, शैली से सामंजस्य बिठा सके। अब आती है पते कि बात, अन्य क्षेत्रों की ट्रेनिंग से उलट यहाँ रसलर जनता के बीच और टेलीवजन पर शोज़ करते हैं, सीखते हैं। इसका मतलब मुख्य कंपनी के स्केल से छोटा दूसरे दर्जे का शो जिसमे लोग आते हैं, टेलीविजन पर प्रसारित होता है। डब्लू.डब्लू.ई. में NXT ऐसा शो है, जो कंपनी को काफी मुनाफा और पब्लिसिटी देता है। इन ट्रेनिंग यूनिट्स के कुछ फायदें हैं –

1. अगर ट्रेनिंग यूनिट अच्छा करती है तो मुख्य कंपनी श्रेय लेती है कि “आखिर यूनिट किसकी है?” और अगर यूनिट का प्रदर्शन अच्छा नहीं तो भी मुख्य कंपनी उसको दोयम दर्जे की ट्रेनिंग यूनिट बता कर पल्ला झाड़ लेती है कि ट्रेनिंग फेज में ऊंच-नीच चलती है।
2. इस माध्यम से बहुत से ऐसे प्रयोग किये जा सकते हैं जो मुख्य कंपनी के प्रारूप में संभव नहीं या जिनपर शक है कि यह प्रयोगात्मक आईडिया चलेगा या नहीं? फिर वही ऊपर लिखी बात प्रयोग सफल हुआ तो मुख्य कंपनी के चैनल में वाहवाही लो, नहीं हुआ तो आई-गयी बात!
3. यहाँ कई युवा, प्रतिभावान लोगो का काम देखने का मौका मिलता है। 2 या अधिक लोगो के साथ किये काम का अवलोकन किया जा सकता है कि क्या ये दोनों मुख्य रोस्टर में फिट बैठेंगे।
4. यूनिट अगर चल निकले तो अच्छा पैसा भी बनाया जा सकता है।

मेरा विचार यह था कि ऐसी डेवलपमेंटल यूनिट की तरह अगर बड़ी कॉमिक कंपनी जैसे राज कॉमिक्स, कैंपफायर उभरते कलाकारों, लेखकों के लिए ऐसा कुछ करें तो यह सबके लिए फायदे का सौदा होगा। जैसे युवा कलाकार, लेखक, इंकर और कलरिस्ट की कॉमिक्स को अपनी वेबसाइट, पेज पर जगह देना या अलग नाम से (जैसे RC Gen-Next, Campfire Yuva) साइट और पेज पर पोस्ट करना, प्रिंट ऑन डिमांड या सीमित संख्या में प्रकाशित करना। इस से कलाकारों को बड़ी कंपनी का बैनर मिलेगा, 2 सेट या इवेंट के बीच में जो लंबा गैप होता है वो भर जाएगा और यह माध्यम ज़्यादा लोगों तक कॉमिक्स को पहुंचाएगा।
यह विचार कितना व्यवहारिक है? आप लोगो को यह जंच रहा है ज़रूर बताएं! धन्यवाद!

– मोहित शर्मा ज़हन

Original Post – Indian Comics Fandom FB Page

बस एक फोटो भगवान् जी…Only 1 !! #mohitness

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सेल्फी लेती अपनी टीनएजर कज़िन से जब पूछा इतनी सेल्फी क्यों ले रही हो। तो उसने कहा हर इवेंट या नयी जगह पर 20-30 सेल्फ़ीज़ लेती है और उनमे से बेस्ट 1-2 को अपने इंस्टाग्राम, ट्विटर, फेसबुक आदि सोशल मीडिया एकाउंट्स पर पोस्ट कर देती है। मुझे सेल्फी लेते हुए किशोरों से काफी जलन होती है। क्यों? यह बताता हूँ…

….बात नवंबर 2005 की है, मैं 12 क्लास में था और मार्च 2006 में इस स्कूल के चक्कर से छुट्टी मिल जानी थी। मेरी एक टीचर ने अचानक यूँ ही क्लास में कहा, “मोहित तुम्हे मॉडल बनना चाहिए।” क्लास में हूटिंग शुरू हो गयी और मुझे भी अच्छा लगा कि चलो फॉर ए चेंज कोई कॉम्पलिमेंट मिला। हाइट को लेकर लोग पहले से कॉम्पलिमेंट देते रहते थे पर उसका ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता था। यह कुछ नया था। कुछ समय पहले तक बहुत पतला था और क्लास 9-10 में लंबाई बढ़ने की वजह से लुक अजीब लगता था। अब शरीर थोड़ा अनुपात में ठीक हो रहा था तो दिखने में बेहतर हो रहा था। खैर, लोगो के कम्प्लीमेंट्स और अटेंशन की मुझे आदत नहीं थी पर अब यह सब अच्छा-खासा मिल रहा था। फिर स्कूल ख़त्म और कॉलेज, कंप्यूटर इंस्टीट्यूट, कैट की कोचिंग के चक्कर शुरू। कॉलेज में ड्रेस कोड नहीं था और ना ही अटेंडेंस का चक्कर पर दिक्कत ये थी की अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम्स को-एड नहीं थे, इसलिए कॉलेज का क्रेज कम हो गया … ही ही (पढ़ाई भी नाम की होती थी वैसे, बस एग्जाम से कुछ दिन पहले)। स्कूल की पाबंदियां ख़त्म हुयी तो बाल बढ़ाने और लुक पर ध्यान देने का शौक चढ़ा।

बस फिर तो हीरो बन गया। यह परफेक्ट टाइम 2007 के कुछ महीनो तक चला यानी कुल डेढ़-दो साल। उसके बाद धीरे-धीरे लुक और बॉडी बदलने लगी। हालांकि, उसके बाद कुछ सालो तक आउट ऑफ़ कंट्रोल कुछ नहीं हुआ पर कॉम्पलिमेंट पहले कम और धीरे-धीरे बंद हो गया….मतलब वो बात नहीं रही। फिर मेरा ध्यान भी पढाई, लेखन और दोस्तों में लग गया। उस समय की ख़ास बात यह भी है कि तब टेलीकॉम सेक्टर, मोबाइल बहुत विस्तार कर रहा था। फिर भी मोबाइल एक नोवेल्टी था, खासकर टीनएजर के लिए। मिडिल क्लास घर में पापा-मम्मी के पास मोबाइल फ़ोन होते थे, बाकी लोग घर के लैंडलाइन फ़ोन या पापा-मम्मी के मोबाइल से ही काम चलाते थे। हमे जो मोबाइल मिलते भी थे तो नोकिया के सांप के खेल वाले, बिना मल्टीमीडिया वाले बेसिक फ़ोन। मैन्युअल कैमरा कहीं दबा पड़ा होगा घर में, जिसको कभी इस्तेमाल किया नहीं। उस दौर में फोटोज कम खींची और जो खींची तो कभी मोबाइल की मेमोरी बचाने को डिलीट कर दी, कभी दोस्त की हार्डड्राइव क्रैश हो गयी तो कभी बात टल गयी। तब ऑनलाइन फोटो अपलोड करने का भी इतना ट्रेंड नहीं था। बस यह 1-2 सालों का ट्रांज़िशन समय था फिर तो मोबाइल लगभग सबके पास हो गए थे। अभी यह बातें अटपटी लगें पर उस समय टीनएज में रहे लोग समझ रहे होंगे।

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तो सार ये है कि उस समय का मेरा एक….योर हॉनर….एक भी फोटो नहीं है। फिर लुक या शरीर कभी प्राथमिकता नहीं रहे तो समय के साथ वज़न बढ़ा, रात में जगे रहने से चेहरा सूजा-सूजा सा लगने लगा, सोने पर सुहागे एक-दो चोट के निशान परमानेंट हो गए, 2-4 बच्चों के बाप का सा लुक आ गया। खैर, फिट तो मैं हो जाऊँगा…. अपनी उम्र के हिसाब से ठीक लगूंगा पर ये मलाल रहेगा कि लुक वाइज़ अपने प्राइम के, थोड़े शो ऑफ के लिए…अपने बच्चे-नाती-पोतों को दिखाने के लिए कुछ सही सा होगा नहीं। खैर, जो होता है अच्छे के लिए होता है। मॉडल किसी और जन्म में बन लूंगा। 🙂 :p

P.S. EK bike waali pic November 2007 ki hai aur ye khambe waali 2008 k end quarter mein kabhi…..
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लेखकों के लिए कुछ सुझाव

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हर लेखक (या कवि) अपनी शैली और पसंद के अनुसार कुछ रचना-पद्धतियों (genres) में अच्छा होता है और कुछ में उसका हाथ तंग रह जाता है। यह कहना ज़्यादा ठीक होगा कि कुछ विधाओं में लेखक अधिक प्रयास नहीं करता। समय के साथ यह उसकी शैली का एक हिस्सा बन जाता है। अक्सर किसी अनछुई विधा को कोई लेखक पकड़ता भी है तो उसमे अनिश्चितता और असंतोष के भाव आ जाते है। सबसे बड़ा कारण लेखक ने इतने समय में स्वयं के लिए जो मापदंड बनाए होते हैं, उनपर इस नयी विधा की लेखनी खरी नहीं बैठती। ऐसा होने पर लेखक रही उम्मीद भी छोड़ कर वापस अपनी परचित विधाओं की तरफ वापस मुद जाता है। अपने अनुभव की बात करूँ तो मुझे हास्य, हॉरर, ट्रेजेडी, इतिहास, ड्रामा, सामाजिक संदेश जैसे विषयों पर लिखना अधिक सहज लगता है, जबकि रोमांटिक या साइंस फिक्शन जैसी थीम पर मैंने काफी कम लेखन किया है। नयी श्रेणियों में पैर ज़माने का प्रयास कर रहे लेखकों और कवियों के लिए कुछ सुझाव हैं।

*) – अपनी वर्तमान लेखन क्षमता, शैली और उसकी उसकी लोकप्रियता की तुलना नयी विधा में अपने लेखन से मत कीजिये। ऐसा करके आप नयी रचना-पद्धति में अपने विकास को शुरुआती चरण में रोक देते हैं। खुद को गलती करने दें और नए काम पर थोड़ी नर्मी बरतें। याद रखें बाकी लेखन शैलियों को विकसित करने में आपको कितना समय लगा था तो किसी अंजान शैली को अपना बनाने में थोड़ा समय तो लगेगा ही।

*) – शुरुआत में आसानी के लिए किसी परचित थीम के बाहुल्य के साथ अंजान थीम मिलाकर कुछ लिखें। इस से जिस थीम में महारत हासिल करने की आप इच्छा रखते हैं उसमे अलग-अलग, सही-गलत समीकरण पता चलेंगे। थोड़े अभ्यास के बाद परिचित थीम का सहारा भी ख़त्म किया जा सकता है।

*) – आदत अनुसार कहानी, लेख या कविता का अंत करने के बजाए उस थीम में वर्णन पर ध्यान दें। चाहे एक छोर से दूसरा छोर ना मिले या कोई अधूरी-दिशाहीन रचना बने फिर भी जारी रहें। इस अभ्यास से लेखन में अपरिचित घटक धीरे-धीरे लेखक के दायरे में आने लगते हैं।

*) – यह पहचाने की आपकी कहानी/रचना इनसाइड-आउट है या आउटसाइड-इन। इनसाइड-आउट यानी अंदर से बाहर जाती हुयी, मज़बूत किरदारों और उनकी आदतों, हरकतों के चारो तरफ बुनी रचना। आउटसाइड-इन मतलब दमदार आईडिया, कथा के अंदर उसके अनुसार रखे गए किरदार। वैसे हर कहानी एक हाइब्रिड होती है इन दोनों का पर कहानी में कौन सा तत्व ज़्यादा है यह जानकार आप नए क्षेत्र में अपनी लेखनी सुधार सकते हैं।

– मोहित शर्मा ज़हन

Read चनात्मक प्रयोगों से डरना क्यों?

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रचनात्मक प्रयोगों से डरना क्यों?

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एक कलाकार अपने जीवन में कई चरणों से गुज़रता है। कभी वह अपने काम से पूरी तरह संतुष्ट रहता है तो कभी कई महीने या कुछ साल तक वो खुद पर शक-सवाल करता है कि क्या वह वाकई में कलाकार है या बस खानापूर्ति की बात है। इस संघर्ष में गिरते-पड़ते उसकी कला को पसंद करने वालो की संख्या बढ़ती चली जाती है। अब यह कला लेखन, कैमरा, चित्रांकन, शिल्प आदि कुछ भी हो सकती है। अपनी कला को खंगालते, उसमे सम्भावनाएं तलाशते ये कलाकार अपनी कुछ शैलियाँ गढ़ते है। धीरे-धीरे इन शैलियों की आदत इनके प्रशंषको को पड़ जाती है। कलाकार की हर शैली प्रशंषको को अच्छी लगती है। अब अगर कोई नया व्यक्ति जो कलाकार से अंजान है, वह उसके काम का अवलोकन करता है तो वह उन रचनाओं, कलाकृतियों को पुराने प्रशंषको की तुलना में कम आंकता है। बल्कि उसकी निष्पक्ष नज़र को उन कामों में कुछ ऐसी कमियां दिख जाती है जो आम प्रशंषक नहीं देख पाते।

इन शैलियों की आदत सिर्फ प्रशंषको को ही नहीं बल्कि खुद कलाकार को भी हो जाती है। इस कारण यह ज़रूरी है कि एक समय बाद अपनी विकसित शैलियों से संतुष्ट होकर कलाकार को प्रयोग बंद नहीं करने चाहिए। हाँ, जिन बातों में वह मज़बूत है अधिक समय लगाए पर अन्य शैलियों, प्रयोगों में कुछ समय ज़रूर दे। साथ ही हर रचना के बाद खुद से पूछे कि इस रचना को अगर कोई पुराना प्रशंषक देखे और कोई आपकी कला से अनभिज्ञ, निष्पक्ष व्यक्ति देखे तो दोनों के आंकलन, जांच और रेटिंग में अधिक अंतर तो नहीं होगा? ऐसा करने से आपकी कुछ रचनाओं औेर बातों में पुराने प्रशंषको को दिक्कत होगी पर दीर्घकालिक परिणामों और ज़्यादा से ज़्यादा लोगो तक अपनी रचनात्मकता, संदेश पहुँचाने के लिए ऐसा करना आवश्यक है।

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