टप…टप…टप…(हॉरर कहानी)

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चन्द्रप्रकाश को पानी बहने से चिढ थी और पानी बहना तो वो सह लेता था पर कहीं से धीमे-धीमे पानी का रिसना या नल से पानी टपकना…

टप…टप…टप…

जैसे हर टपकती बूँद उसके मस्तिष्क पर गहरे वार करती थी। जब तक चन्द्रप्रकाश पानी का टपकना बंद न कर देता तब तक वह किसी बात पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता था। कभी भी 1 मिनट से ज़्यादा नहीं हुआ होगा जो वह पानी बहने पर दौड़कर नल बंद करे न गया हुआ। अगर कुछ ही सेकण्ड्स में कोई बात सिर में दर्द करने लगे तो किसी की भी प्रतिक्रिया ऐसी ही होगी।

टप…टप…टप…

एक छुट्टी के दिन वह घर में अकेला था और बाथरूम की टंकी बहने लगी। वह अपनी धुन में तुरंत उसे बंद कर आया। फिर एक-एक कर के घर के सभी नल बहते और वह खीज कर उन्हें बंद कर आता। एक-दो बार उसे भ्रम हुआ की बाथरूम में या बाहर के नल के पास उसने किसी परछाई को देखा पर मोबाइल पर व्यस्त उसने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया।

टप…टप…टप…

लो हद ही हो गयी, अब रसोई का नल चलने लगा। चन्द्रप्रकाश के सिर में दर्द शुरू हो चुका था, उसने रसोई की टंकी कसकर बंद की और मुँह उठाया तो देखा दीवार से चिपकी चिथड़े हुए शरीर और सफ़ेद रक्तरहित चेहरे वाली लड़की उसको घूर रही है। डर के झटके से चन्द्रप्रकाश पीछे जाकर गिरा। लड़की ने हल्की मुस्कान के साथ नल थोड़ा सा घुमाया…

टप…टप…टप…

अब चन्द्रप्रकाश का दिमागी मीनिया और सामने दीवार पर लटकी लड़की का डर आपस में जूझने लगे। अपनी स्थिति में जड़ हाथ बढ़ाये वह खुद से ही संघर्ष कर रहा था।

टप…टप…टप…

हर टपकती बूँद लावे की तरह सीधे उसके दिमाग पर पड रही थी। कुछ ही देर में उसका शरीर काफी ऊर्जा व्यय कर चुका था।

टप…टप…टप…

किसी तरह घिसटते चन्द्रप्रकाश ने लड़की से नज़रें बचाते हुए टंकी बंद की और निढाल होकर गिर गया। अचानक लड़की गायब हो गयी, चन्द्रप्रकाश को लगा कि उसने अपने डर पर विजय पा ली लेकिन तभी पानी बहने की आवाज़ आने लगी और अत्यधिक मानसिक-शारीरिक दबाव में चन्द्रप्रकाश के दिमाग की नस फटने से उसकी मौत हो गयी। अपने जीवन के आखरी क्षणों में उसने जो पानी की आवाज़ सुनी वो बाहर शुरू हुई बारिश की थी पर कमज़ोरी के कारण उस आवाज़ में उसका दिमाग अंतर नहीं कर पाया।

नल से पानी फिर टपकने लगा।

टप…टप…टप…

समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन

मोहल्ले का (कु)तर्क गुम हो गया – मोहित शर्मा ज़हन

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लघुकथा 

“माना राजनीती में कुछ ऊँच-नीच हो जाती है, पर नेता जी हमारे लिए तो अच्छे है। हम लोगो से तो व्यवहार अच्छा है, छोटे-मोटे काम करवा देते है मोहल्ले के और क्या चाहिए? अब समाज का ठेका थोड़े ही ले रखा है हम लोगो ने!”

ऐसे तर्क होते थे वर्धा ब्लॉक मोहल्ले वालो के जब उन्हें शहर और उसके आस-पास के गाँव-देहात में उनके मोहल्ले की भव्य महलनुमा कोठी मे निवास कर रहे नेता जी एवम उनके गुर्गो की गुंडई, मनमानी के किस्से सुनने को मिलते थे। एक दिन नेता जी द्वारा दर्जनो व्यापारियों से की गयी मारपीट, वसूली के बाद शहर के हज़ारो उपद्रवी व्यापारियों और ऐसा कोई मौका ढूँढ रहे नेता जी के विरोधियों  ने मोहल्ले पर धावा बोल, भीड़ का फायदा उठाकर वहाँ के स्थानीय निवासियों से मारपीट, कई गाड़ियों एवम संपत्ति में आगजनी करते हुए  नेता जी के घर पर धावा बोल दिया जिसमे उनके कुछ समर्थको, परिवार समेत बर्बर हत्या कर दी गयी।

इस घटना में गंभीर रूप से घायल नेता जी के शुभचिंतक पडोसी सिंह साहब ठीक होने के बाद दिवंगत नेता जी के लिए कोई तर्क नहीं रखते। उनके दिमाग के उस हिस्से पर गहरी चोट आई जो तर्क समझता और प्रेषित करता है, इस कारण अब वो किसी भी तरह का तर्क नहीं रख पाते….बाकी मोहल्ले वालो के सर में चोटें नहीं आयीं….पर वो भी अब तर्कों को दूर से नमस्ते करते है!

– मोहित शर्मा ज़हन

परदे के पीछे (Laghu Katha) – मोहित शर्मा (ज़हन)

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…परदे के पीछे
प्रतिष्ठित टीवी चैनल के आगामी रिएलिटी शो के लिए बैठी कॉलेज से निकली उत्साहित इंटर्न टीम ने हज़ारों एंट्रीज़ में से काफी मशक्कत के बाद कुछ दर्जन योग्य लोग छांटें। तभी उनके सीनियर्स काम का अवलोकन करने पहुँचे।
इंटर्न – “मैडम! इन लोगो कि प्रोफाइल्स हमारे शो के प्रारूप से फिट बैठती है, अब इनमे से किसका चयन करें और किसका नहीं? सब लगभग बराबर से है।”
प्रबंधक मैडम – “इनमे से कोई भी नहीं चलेगा।”
इंटर्न – “ऐसा क्यों मैडम?”
प्रबंधक मैडम – “फिर से लिस्ट बनाओ और अनाथ, अपंग, अपराध या उत्पीड़न के शिकार लोगो को सेलेक्ट करो। उनकी कहानी बोरिंग हो तो उसमें और ड्रामा एलिमेंट्स जोड़ों। ऐसे ही किसी को भी सेलेक्ट मत किया करो….”
– मोहित शर्मा (ज़हन) ‪#‎mohitness‬ ‪#‎mohit_trendster‬

लघुकथा – “दहेज़ डील” (मोहित शर्मा ज़हन)

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लघु कथा – “दहेज़ डील” (from ‘Bonsai Kathayen’ collection) 

कसबे का लड़का लग गया मोबाईल टावर लगाने और उसकी मरम्मत करने वाली कंपनी मे। तनख्वाह भी अच्छी और घर से भी ठीक-ठाक। कसबे कि जवान लडकियाँ (जो उसकी जाति की थी) उनके माँ-बाप के लिए वो लड़का सोने की खान था। ऐसे ही एक आशावान माँ-बाप अपना भाग्य आजमाने लड़के के घर पहुँचे।

कसबे भर मे लगातार मिल रहे मुफ्त के सम्मान से लड़के के परिवार के भाव बढ़ गए थे।

लड़के की माँ – “हम्म …लड़की तो सुन्दर है पर दहेज़ का क्या रहेगा?”

लड़की के पिता – ” ….जी! बारहवी के बाद कम्पूटर कोरस भी किया है, ढाई हज़ार कमा रही है स्कूल मे। सारे काम कर लेती है। वो शादी अच्छे से करेंगे …और ..”

लड़के के पिता – ” ….हाँ जी! पर दहेज़ का भी तो बताइए …”

लड़की की माँ – “जी …देने को तो ज्यादा कुछ नहीं है. ..पर ..”

लड़के की माँ -” फिर तो जी मुश्किल है …”

लड़की के पिता – “वकील साहब स्टेशन के पास ज़मीन है थोड़ी और थोड़े घर के पास कुछ खेत है।”

लड़के के माता-पिता ज़मीन सुनकर खुश हो गए।

“तो आप ज़मीन दोगे बेटी के साथ ….”

लड़की के पिता – “नहीं जी, आप बेटे जी से कह कर 2-3 टावर लगवा दो मोबाइल वाले हमारी ज़मीन और खेतो मे। उनके जो हर महीने 20-22 हज़ार आयेंगे वो आप लोगो के …”

– मोहित शर्मा (ज़हन) ‪#‎mohitness‬ ‪#‎mohit_trendster‬

लघुकथा सरफिरा अनशन – मोहित शर्मा (ज़हन)

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सरफिरा अनशन
पत्रकार – “आप किस के खिलाफ आमरण अनशन पर बैठे है?”
युवक – “आप लोगो के…”
पत्रकार – “क्यों ऐसा क्या कर दिया हम मीडिया वालो ने?”
युवक – “पिछले साल मेरी सहकर्मी ने एक लड़ाई के बाद मुझ पर बलात्कार का आरोप लगाया। आप लोगो ने बिना जांच किये पहले पन्ने पर वो खबर छापी। फैसला आने से पहले मैं दोषी हो गया, आपके सौजन्य से मेरे खिलाफ कैंडल मार्च होने लगे और आप लोगो ने उस खबर का फॉलोअप किया जब तक…
…जब तक किसी अनजान जनूनी का पत्थर मेरे पिता जी के सर पर लगकर उन्हें पागल नहीं कर गया, जब तक माँ ने सल्फास की गोलियाँ खाकर अपनी जान नहीं ले ली। पर अब जब यह साबित हुआ कि मैं निर्दोष हूँ तो पहले पेज पर वह खबर क्यों नहीं? दोषियों का फॉलोअप क्यों नहीं? अपनी गलती मानते लेख क्यों नहीं? दूसरों के साँस लेने, पलकें झपकाने तक में खामी निकाल देने वाले अपनी गलतियों की ज़िम्मेदारी लेने में घोंघे क्यों बन जाते हो?”
अगले दिन अखबार की हेडलाइन! –
“सरफिरे युवक के सड़क पर बैठ जाने से शहर की नयी सड़क पर यातायात व्यवस्था में अवरोध। 3 घंटे तक यात्रियों का हाल बेहाल।”
– मोहित शर्मा (ज़हन) #mohitness #mohit_trendster