बोगस परग्रही (कहानी) #ज़हन

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बोगस परग्रही सीरीज़ में आपका स्वागत है। यहाँ हर एपिसोड में हम कवर करेंगे भौजीकसम ग्रह के दो खोजी-टोही वैज्ञानिक कुच्चु सिंह और पुच्चु सिंह के रोमांचक कारनामे।

ब्रह्माण्ड में तैरते अनगिनत पत्थरों में से उन दोनों को पृथ्वी की खोजबीन और जांच की जिम्मेदारी मिली थी। उनके उन्नत यान में सदियों तक ईंधन और आहार की कमी नहीं होने वाली थी। पृथ्वी के इतना पास होते हुए भी मानवो के अंतरिक्ष स्टेशन, अन्य यंत्र उन्हें नहीं देख पाते थे। कुच्चु-पुच्चु बुद्धिमान तो थे पर अव्वल दर्जे के आलसी भी थे। उनका साढ़े तीन फ़ीट का कद भौजीकसम ग्रह पर औसत से 4-5 इंच ऊपर था, जिसका उन्हें घमंड था पर पृथ्वी की जानकारी, तस्वीरें और वीडियो देख कर उनका मुँह पार्थिव पटेल से भी छोटा बन गया। भौजीकसम का एक वर्ष पृथ्वी के 26 वर्षो के बराबर था और उन्हें 15 भौजीकसम वर्षों में अपने कई मिशन निपटाने थे। उनके पास 390 वर्ष हैं, इस जानकारी के बाद दोनों और ज़्यादा आराम में आ गए। पहले कुछ वर्ष सुस्ताने के बाद अपने मिशन की शुरुआत के लिए उन्होंने धरती का सबसे विविध देश भारत चुना। कुछ असफल मिशन और कई सालों बाद एक मिशन की तैयारी करते हुए दोनों बात कर रहे थे।

कुच्चु – “पुच्चु यार पहले की तरह नहीं करना है, देश के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों को उठाना था तो तुम न्यूज़ साइट्स के भरोसे निर्मल बाबा, राखी सावंत, मीका सिंह, के.आर.के. को उठा लाये थे। फिर सबकी मेमोरी एडजस्ट करनी पड़ी थी, उनके दिमागों में इतना कचरा भरा था हमारे सिस्टम क्रैश होते-होते बचे।”

पुच्चु – “नहीं इस बार आलस नहीं होगा। कॉम्प्रिहेन्सिव विक्ट्री होगी इस बार! जय सोहनी महिवाल।”

कुच्चु – “सोहनी महिवाल? दुनिया का इतिहास कम देख, रोज़ अलग लव स्टोरी पढ़के डिप्रेस हो जाता है। रात में तकिये में मुंह घुसाये मीरा को छोड़ दो राणा जी, उसे कृष्णा में रम जाने दो, ज़हर मत पिलाओ…चिल्लाते हुए सुबक रहा था।”

तभी उनका यान चक्करघिन्नी बन जाता है। दोनों कंट्रोल्स सँभालने की कोशिश करते हैं पर तेज़ी से घूमते दिशाहीन यान में कुच्चु किचन में जा गिरता है और उसका मुँह ओवन में फँस जाता है, वहीं पुच्चु खोपड़े पर लगे आघात के बाद अचेत हो जाता है। सब सामान्य होने के बाद उन्हें अपने यान में एक घायल परग्रही मिलता है।

पुच्चु – “ऐ छी-छी सी शक्ल वाले भईया ! कौन हो तुम?”

परग्रही – “हाँ तेरी शक्ल बड़ी मिस यूनिवर्स वाली है! लोलू सिंह! सुनो मेरे पास ज़्यादा समय नहीं है। बड़ी ऊर्जा लगानी पड़ी तुम्हारे यान के अंदर आने में… “

कुच्चु – “तो कहीं भी घुस आओगे? हम नहीं दे रहे अपना समय उधार। जाओ आगे बढ़ो!”

परग्रही – “ऐसा ज़ोर का घुसंड मारूंगा कि षठकोण जैसे मुँह के आठों कोण पिचक जाएंगे।”

कुच्चु – ” षठकोण….उसमे तो 6 कोण होते हैं ना?”

परग्रही – “टेक्निकेलिटीज़ में ही मर जाना दोनों सरऊ! हमारे ग्रह पर 8 होते हैं। सुनो इस बार टोक मत देना, मर जाओगे। टोही यंत्रों से मुझे तुम दोनों के बारे में सब पता चल गया है। तुम्हारी बकवास भाषा भी यूँ चुटकी में सीख ली। मेरा नाम सोनपपड़ा है, मैं तुमसे कई प्रकाश वर्ष दूर डॉयबिटीज़ ग्रह से उसी काम के लिए आया था जो तुम दोनों कर रहे हो यानी पृथ्वी की रिसर्च फलाना। हम जैसे और भी कुछ परग्रही गुप्त अनुसंधान यान पृथ्वी के आस-पास अदृश्य घूम रहे हैं। मेरे शरीर पर बदला बम बंधा है, अगर फट गया तो यान और तुम दोनों का नामोनिशान नहीं मिलेगा। तुम्हे पृथ्वी पर जाकर मेरा एक बदला लेना होगा…”

पुच्चु – “भक! तुम किसी लाला के ज़ुल्म से पीड़ित हमारी बिछड़ी मम्मी हो जो तुम्हारे बिहाफ पर बदला लें?”

सोनपपड़ा ने एक हल्का ऊर्जा वार किया और पुच्चु के होंठ गलत प्लास्टिक सर्जरी के बाद सूजे होंठ जैसे हो गये।

सोनपपड़ा – “आया मज़ा? या और मस्त माहौल में जीना है?”

कुच्चु – “नहीं…नहीं अंकल जी! हम समझ गये। किस तरह का बदला लेना है आपको? आप घायल कैसे हो गये? लाइए आपके चरणों की चुम्मी ले लूँ…”

सोनपपड़ा खुश होते हुए बोला – “नहीं, इट्स ओके! मेरी परी जैसी गर्लफ्रेंड परिया को कुकिंग का बहुत शौक है। मेरे बर्थडे पर मुझे सरप्राइज़ देने के लिए उसने धरती से कुछ सामान बटोर कर आलू पकोड़े बनाये। मैं तो बाहर का सारा सामान यान के अनुसार चेक करके लाता था पर सरप्राइज के चक्कर में वो आलू उठा लायी। हमारे यान के मेटीरियल में पता नहीं क्या रिएक्शन हुआ और एक तेज़ धमाके में यान तहस-नहस हो गया। विशेष सूट के कारण धमाके की वेव में हम लोग तुरंत नहीं मरे पर घायल अंतरिक्ष में जा गिरे। बेचारी परिया तो पूरी चुड़ैलिया बन गयी, आलू को गाली देती हुई जाने कहाँ भाग गयी। इधर मेरे शरीर के मिनरल जा चुके हैं, मैं अब कुछ देर का मेहमान हूँ। उस से पहले मैंने अपने मन में बदला बम एक्टिवेट कर लिया है।”

पुच्चु – “किस से बदला? पृथ्वी से?”

सोनपपड़ा – “नहीं! आलू से बदला। ये तरल तुम किसी भी आलू की फसल पर डाल आओ। उस आलू के आंतरिक गुण के अनुसार इस तरल का एक चैन रिएक्शन शुरू होगा, जिसकी किरणों से धरती के सारे आलू लुप्त हो जायेंगे, चाहे उनके खेत एक-दूसरे से हज़ारो किलोमीटर्स दूर ही क्यों ना हों।”

कुच्चु – “…पर आलू जैसी महत्वपूर्ण फसल लुप्त होने से तो धरती का पारितंत्र (इकोसिस्टम) बिगड़ जायेगा? इस से तो पृथ्वी की कई प्रजातियों पर बुरा असर पड़ेगा, कुछ तो शायद लुप्त जाएं। पृथ्वी पर त्राहि-त्राहि मच जायेगी।”

सोनपपड़ा – “ये ब्रैकेट में इकोसिस्टम बताने की ज़रुरत नहीं थी, मुझे भी पता है पारितंत्र का मतलब और प्रजातियां लुप्त हों या चपातियां मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। बदला इज़ बदला! अगर नहीं माने तो बम फोड़ दूँगा। दोनों में से कोई एक जाओ यह तरल लेकर, अगर तुम्हारे आने से पहले मैं मर गया तो भी बम फूट जाएगा और ऑबवियस्ली तुम्हारा साथी, यान स्पेस डस्ट बन जायेंगे। जब तक तुम मुझे नष्ट हुए आलू के सैंपल नहीं लाकर दिखाते तब तक मुझे चैन नहीं मिलेगा। मेरे मन की तसल्ली ही इस बम को डिफ्यूज कर सकती है।”

पुच्चु और कुच्चु धर्मसंकट में फँस गये। यह एक काम करने से उनके कई आगामी मिशन बर्बाद हो सकते थे। दोनों मन ही मन अपने आलस्य को कोस रहे थे कि अगर मेहनत से काम किया होता तो अबतक कितने मिशन, अनुसंधान आदि पूरे हो चुके होते। टिक टिक गुज़रते समय के बीच, दिल पर पत्थर रखकर और पुच्चु को पुच्ची देकर कुच्चु पृथ्वी की ओर कूच कर गया। जल्द ही वह आधे गुलगुले, आधे राख हो चुके आलू के सैंपल लाया, जिन्हे वह एक भारतीय खेत में तरल डालने के बाद लाया था। नष्ट हुए आलू को देखकर सोनपपड़ा के दिल को करार आया और वह परिया को याद करते हुए हमेशा की निन्नी सो गया।

पुच्चु – “माफ़ करना भाई! मेरी जान बचाने के लिए तुम्हे आलू ख़त्म करने पड़े। श्री अक्षय कुमार जी की कोट ख़राब कर दी कि जब तक रहेगा समोसे में आलू… “

कुच्चु – “अबे रिलैक्स! कुछ नहीं हुआ। इसकी आड़ में हमारा एक मिशन और पूरा हो गया। इस सोहनहलवे का दिया तरल मैं एक भारतीय प्रयोगशाला के खेत में डाल कर आया हूँ। वहाँ जेनेटिकली मॉडिफाइड आलू (आनुवांशिक रूप से रूपांतरित फसल) उग रहे थे। उस खेत में एक लुप्तप्राय बैक्टीरिया और आलू के अंश से बड़े आलू उगाने पर टेस्ट चल रहा था। अब उस तरल से निकली किरणों से सिर्फ उस खेत और 2-3 जगह उस जैसे आंतरिक गुण लिए मॉडिफाइड आलू ही लुप्त हुए बाकी सारी पृथ्वी के आलू बच गए क्योकि सिर्फ उस खेत के आलूओं के गुणों के अनुसार बनी तरल की घातक किरणे बाकी आलू की फसल को पकड़ ही नहीं पाई।”

पुच्चु – “वाह भाई! आज तूने मेरी जान, हमारे भौजीकसम ग्रह की लाज और पृथ्वी बचा ली। आज से दोनों टाइम का खाना मैं बनाऊँगा…
…एक हफ्ते तक।”

समाप्त!
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2 अंत (लघुकथा) – मोहित शर्मा ज़हन

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एक निजी कंपनी के 2 सहकर्मी दोपहर का भोजन साथ कर रहे थे।

अनिरुद्ध – “मुझे पता चला कि आप हवाई यात्रा नहीं करते। अफवाह है या विमान में बैठने से डर लगता है?”

रोनित – “सही सुना है आपने। हवाई यात्रा से डर नहीं लगता, पहले कई बार बैठ चुका हूँ।”

अनिरुद्ध – “अरे…आपको कंपनी के काम से देश में कहाँ-कहाँ जाना पड़ता है। ऐसे तो बहुत समय बर्बाद होता होगा…आखिर विमान यात्रा से बचने का क्या कारण है?”

रोनित – “हमारे घर के एक पुराने पंडित जी हैं, आज तक उनकी बताई हर बात सच हुई है। उन्होंने बताया कि मेरी मृत्यु एक विमान दुर्घटना में होगी तो मैंने सोचा जब तक सिर पे कोई आपात स्थिति न पड़े तब तक तो विमान यात्रा से बचने का प्रयास करूं।”

अनिरुद्ध – “हम्म…जैसा आप अपने पंडित जी के बारे में बता रहे हैं फिर तो इतनी सावधानी सही है।”

उसी रात रोनित को अनिरुद्ध का फोन आया।

अनिरुद्ध – “माफ कीजिए अब कॉल कर रहा हूँ, रोनित जी। एक विचार मन में आया सोचा आपसे साझा करूं। यह भी तो हो सकता है कि विमान दुर्घटना में विमान जिस जगह पर क्रैश हो वहाँ आप मौजूद हों।”

अंत 1) – रोनित को उस रात के बाद से कभी चैन की नींद नहीं आई।

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अंत 2) – अनिरुद्ध की बात सुनकर रोनित कुछ बोल पाता उस से पहले ही कॉल कट गई और कुछ देर बाद ही अनिरुद्ध को पता चला कि रोनित के घर पर एक यात्री विमान गिरा है जिसमे सभी यात्रियों समेत रोनित की मृत्यु हो गई है।

समाप्त!

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