काव्य कॉमिक्स – मतलबी मेला (फ्रीलैंस टैलेंट्स)

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New poetry Comic “Matlabi Mela” published, based on my 2007 poem of the same name.
*Bonus* Added an extra poem “खाना ठंडा हो रहा है…” in the end.
Language: Hindi, Pages: 22
Illustration – Anuj Kumar
Poetry & Script – Mohit Trendster
Coloring & Calligraphy – Shahab Khan

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Available (Online read or download):
ISSUU, Freelease, Slideshare, Ebook Home, Archives, Readwhere, Scribd, Author Stream, Fliiby, Google Books, Play store, Daily Hunt, Smashwords, Pothi and Ebook Library etc.

खाना ठंडा हो रहा है…(काव्य) #ज़हन

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साँसों का धुआं,
कोहरा घना,
अनजान फितरत में समां सना,
फिर भी मुस्काता सपना बुना,
हक़ीक़त में घुलता एक और अरमान खो रहा है…
…और खाना ठंडा हो रहा है।

तेरी बेफिक्री पर बेचैन करवटें मेरी,
बिस्तर की सलवटों में खुशबू तेरी,
डायन सी घूरे हर पल की देरी,
इंतज़ार में कबसे मुन्ना रो रहा है…
…और खाना ठंडा हो रहा है।

काश की आह नहीं उठेगी अक्सर,
आईने में राही को दिख जाए रहबर,
कुछ आदतें बदल जाएं तो बेहतर,
दिल से लगी तस्वीरों पर वक़्त का असर हो रहा है…
…और खाना ठंडा हो रहा है।

बालों में हाथ फिरवाने का फिरदौस,
झूठे ही रूठने का मेरा दोष,
ख्वाबों को बुनने में वक़्त लग गया,
उन सपनो के पकने का मौसम हो चला है…
…और खाना ठंडा हो रहा है।

तमाशा ना बनने पाए तो सहते रहोगे क्या?
नींद में शिकायतें कहते रहोगे क्या?
आज किसी ‘ज़रूरी’ बात को टाल जाना,
घर जैसे बहाने बाहर बना आना,
आँखों को बताने तो आओ कि बाकी जहां सो रहा है…
…और खाना ठंडा हो रहा है।

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Thumbnail Artwork – Arpit Shankar‎
#मोहित_शर्मा_ज़हन #mohitness #mohit_trendster
*Second poem in Matlabi Mela (Kavya Comic Series)

Poetic Post from latest Kavya Comic #kavya_comics

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नमस्ते! दुनियाभर में अनेको लोग अपनी इच्छा के विरुद्ध किसी संस्था, प्रभावशाली व्यक्ति, विचारधारा, सामाजिक प्रणालियों की परछाई में अपना जीवन काट देते है। उनसे अधिक दुर्भाग्यशाली लोग ऐसे होते है जो इतने जागरूक ही नहीं हो पाते कि अपनी सोच बना पायें। स्थापित प्रणाली पर बिना सवाल उठाये भेड़चाल का हिस्सा बन अपना जीवन काट देते है। उन्ही परिस्थितियों में काफी कम संख्या में लोग गलत परन्तु प्रचलित बातों के खिलाफ आंदोलन करते है। शांत, संतुष्ट जनता का बड़ा बहुमत होने के कारण सरकारों एवम शासको के लिए ऐसे विद्रोहों, आंदोलनों को कुचलना आसान बन जाता है।

अक्सर ऐसी कई आहुतियों की लपट हम तक पहुँच नहीं पाती। जैसे सूखी लकड़ियों और घी-कपूर में प्रज्वलित अग्नि में हवन सामग्री स्वाहा हो जाती है, वैसे ही शायद इस संघर्ष  का महत्त्व इन इकाई बलिदानो में साफ़ ना दिख पाये पर लगातार मंत्रो के बाद पड़ रही हवन सामग्री अग्नि की प्रचंडता समाप्त कर देती है, ठीक  वैसे ही लगातार छोटे-छोटे संघर्षों की बूँदें एक सैलाब बनकर भव्य शासको, शक्तिशाली विचारधारों को बहा ले जाती है। जनता को पूरे न्याय की ना जानकारी होती है और ना ही उम्मीद पर समस्या तब आती है जब बूँद-बूँद के लिए करोडो, अरबों को घिसटते हुए जीवन व्यतीत करना पड़ता है।  हर सक्षम नागरिक कि नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है कि असल और ढोंग के संघर्षों में फर्क करते हुए अपने कम भाग्यशाली देशवासियों की मदद में योगदान दे, प्रयासरत रहे। इस काव्य कॉमिक की प्रेरणा मुझे तिब्बत संघर्ष में बरसो से खुद को जलाकर, अपनी बलि दे रहे प्रदर्शनकारियों से मिली।

यह यश ठाकुर ( हरीश अथर्व) जी कि पहली कॉमिक है जो काफी समय से अटकी हुयी थी, आखिरकार उनकी मेहनत सबके सामने है जिसके लिए उन्हें बहुत बधाई! हालाँकि, इस बीच उनकी कला में काफी सुधार आया है। पाठको और फेनिल शेरडीवाला जी के सुझावों, अवलोकन अनुसार आगे बेहतर काम आप सभी के सामने होगा।

आपका

मोहित शर्मा (ज़हन)