निर्णय (लघुकथा)

प्रांप्ट – “टूटती शाखें” प्रतियोगिता के लिए

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शोल कबीले के सरदार का निर्णय सभी सदस्यों के लिए एक झटका था। उनका प्रमुख जिसने दशकों इस कबीले का नेतृत्व किया, हर सदस्य को जीने के गुर सिखाये…आज उनके द्वीप पर 7 जहाज़ों से आये बाहरी लोगो का प्रस्ताव मान रहा था। सरदार ने स्थिति भांप अपना पक्ष रखा – “मेरा तो जीवन कट गया, पर अपने गार्सिया द्वीप के बदले बाहर ये विदेशी आप सबको बेहतर जीवन और ठिकाना देंगे…”

सरदार की बात एक युवक ने काटी – “…पर अपना सब कुछ छोड़कर उनकी शर्तों पर जीना कहाँ का इंसाफ है? इतने साल आपसे युद्ध कौशल सीखने का क्या लाभ? धिक्कार है ऐसी कायरता पर!”

सरदार – “एक बार मेरे बचपन में कुछ विदेशीयों ने ऐसी शर्त मेरे जन्मस्थान द्वीप टाइगा पर रखी थी। 450 से अधिक कबीलेवासी शर्त न मान कर लड़े और क्या खूब लड़े। उनमे मेरे परिवार समेत सिर्फ 8 परिवार टाइगा से पलायन कर बच पाए। तब जहाज़ 2 थे और इन जहाज़ों से बहुत छोटे थे। उस समय विशाल वृक्ष से टूटी धूलधूसरित शाखें किसी तरह फिर से कोपल सींच पाईं पर ज़रूरी नहीं हर बार ऐसा हो। बाहर जाओ और शोल वृक्ष को समृद्ध करो, इतना की आज उनकी शर्त पर जियो और कल सक्षम बन उनको अपनी शर्त पर झुकाओ। आज ख़ाक हो जाओगे तो कल कभी नही आएगा।”

– मोहित शर्मा ज़हन

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अर्द्धअच्छा काम (कहानी)

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दिनेश ऑफिस से थका हारा घर पहुंचा। उसकी पत्नी रूपाली जो 1 महीने बाद अपने मायके से लौटी थी, उसके पास आकर बैठी। दोनों बीते महीने की बातें करने लगे। फिर दिनेश ने महीने की बातों के अंत के लिए एक किस्सा बचा कर रखा था। “परसो एक आदमी फ़ोन पर बात कर रहा था। जल्दबाज़ी में ऑफिस के बाहर बैग छोड़ गया, मैंने फिर वापस किया…नहीं तो काफी नुक्सान हो जाता बेचारे का।”

रूपाली – “अरे वाह…प्राउड ऑफ़ यू! आखिर पति किसके हो! पर इसमें क्या ख़ास बात है जो बताने से पहले इतना हाइप बना रहे थे?”

दिनेश – “पहले मैंने बैग चेक किया। उसमे वीडियो कैमरा, डाक्यूमेंट्स, 75 हज़ार रुपये, घडी-कपडे टाइप सामान था। तो 17 हज़ार रुपये निकाले, बाकी सामान एक बंदे से उसके पते पर छुड़वा दिया।”

रुपाली – “हौ! चोर! ऐसा क्यों किया? गलत बात!”

दिनेश – “देखो जैसा लोग काम करते हैं, वैसा उन्हें फल मिलता है, लापरवाही करोगे तो कुछ सज़ा मिलनी चाहिए ना? मुझे तो भगवान ने बस साधन बनाया। अब उस आदमी को सबक मिलेगा।”

रुपाली – “ये देखो गीता पढ़ कर भगवान कृष्ण के दूत बनेंगे सर। अरे लौटा दो बेचारे के पैसे।”

दिनेश – “नहीं हो सकता, ये देखो।”

रुपाली – “यह क्या है?”

दिनेश – “जो फ़ोन तुम्हे गिफ्ट किया उसकी रसीद। 16990 रुपये का है, अब 10 रुपये लौटाने क्या जाऊं। इसकी एक-एक ऑरेंज चुस्की खा लेते हैं।”

रुपाली – “यू आर सच ए…”

दिनेश – “आखिर पति किसका हूँ?”

समाप्त!

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– मोहित शर्मा ज़हन

राष्ट्र-प्रकृति (कहानी) #mohit_trendster

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दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों में से एक सीन की राजधानी चीबिंग में 5 दिवसीय विश्व सम्मलेन होने वाला था जिसमे लाखों की संख्या में लोग आने की सम्भावना थी। लगभग उसी समय चीबिंग और आस-पास के क्षेत्रों में लगातार कुछ दिन भारी बारिश होने के आसार बन रहे थे। सीन के तानाशाह राष्ट्रपति ने वैज्ञानिकों से एक मौसमी प्रयोग करने को कहा जिस से इन 5 दिनों के सम्मलेन में मौसम का कोई व्यवधान ना पड़े। बड़े कार्गो हवाई जहाज़ों की मदद से लगातार हवा की ऊपरी परतों में रसायन छोड़े गए और तरह-तरह के वैज्ञानिक चोचले हुए। आखिरकार दबाव का क्षेत्र बदला और बादल-बरखा चीबिंग से छितर गए।

सम्मेलन अच्छी तरह निपटा और अहम मौके पर मौसम को मात देने की ख़ुशी में राष्ट्रपति छुट्टी मनाने देश के तटीय छोर पर आ गए। दबाव के क्षेत्र में बदलाव से देश का वातावरण उलट-पुलट हो गया। विश्व सम्मलेन में मौसम से की गयी छेड़छाड के कारण अचानक एक ऐसा तूफ़ान तेज़ी से सीन के तटीय क्षेत्रों की तरफ खिंचा चला आया जो सामान्य स्थिति में समुद्र तक सीमित रहता। ग्लाइडर पर प्रकृति का आनंद ले रहे राष्ट्रपति का प्रकृति ने आनंद ले लिया और उन्हें एक क्षतिग्रस्त न्यूक्लियर संयंत्र के कोर में ला पटका। सीन में भारी जान-माल का नुक्सान हुआ और बचाव कर्मियों ने विकिरण स्नान किये राष्ट्रपति को कोमा की हालत में पाया।

समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन

एकल-युगल-पागल (कहानी) – मोहित शर्मा ज़हन

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“जी सर! मैंने चक्कू घोंप दिया ससुरे की टांगों में अब आपका जीतना पक्का।”

टेनिस एकल प्रतिस्पर्धा में स्टीव जो एक जाना-पहचाना नाम था, जिसके नाम कुछ टाइटल थे। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों के दौरान वह सफलता से दूर ही रहा। फिटनेस के हिसाब से उसमे 2-3 सीजन का खेल बचा था और इस बीच वह अधिक से अधिक टाइटल अर्जित करना चाहता था। सबसे पहले वह तुलनात्मक रूप से आसान और नीची रैंक के खिलाड़ियों से भरे टूर्नामेंट चुनता था ताकि उसके जीतने की सम्भावना बढ़े, किस्मत से वह एक नामी टूर्नामेंट के सेमीफाइनल में पहुंचा जहां उसका प्रतिद्वंदी दुनिया का नंबर एक खिलाड़ी था। इस खिलाड़ी से पार पाना स्टीव के बस की बात नहीं थी। स्टीव ने उस खिलाड़ी को घायल करवाने के लिए अपने एक जुनूनी देशवासी को ब्रेनवाश किया कि देश के नाम और सम्मान के लिए उसे वर्ल्ड नंबर वन को खिलाड़ी घायल करना है। पूरी रात पार्टी कर अगले दिन वॉकओवर मिलना सुनिश्चित मान स्टीव कोर्ट पर उतरा जहाँ फिट्टम-फिट दुनिया का नंबर एक खिलाड़ी उसका इंतज़ार कर रहा था। उसके पैरो तले ज़मीन और खोपड़े छज्जे आसमान खिसक गए। काश कल न्यूज़ में कन्फर्म कर लेता तो दारु तो ना पीता, अब तो 6-0, 6-0 पक्का! पता नहीं किस बेचारे के पैरों में चक्कू घोंप दिया गधे ने?

बगल के कोर्ट में इस प्रतियोगिता का युगल (डबल्स) टेनिस खेल रही एक टीम को वॉकओवर मिला क्योंकि उनकी विरोधी टीम के एक खिलाड़ी पर पिछली रात टांगलेवा हमला हुआ था, यह खिलाड़ी विश्व डबल्स टेनिस में नंबर एक रैंक पर था।

इस कहानी से शिक्षा मिलती है जुनूनी के साथ-साथ थोड़ी अक्ल वाले बंदे-बंदियों से ऐसे काम करवाने चाहिए।

समाप्त!

बाहरी परत (कहानी) – मोहित शर्मा ज़हन

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ओलम्पिक 800 मीटर दौड़ क्वालीफाइंग राउंड में रमन ने गिर कर भी रस पूरी की और क्वालीफाई किया। हालांकि, गिरने के दौरान रमन की कुछ पसलियां टूट गईं, और अंदरूनी चोटें लगी। अन्य राउंड के दौरान यह अपडेट दुनियाभर में दर्शकों को मिली। उन्हें यह भी बताया गया कि रमन ने फाइनल राउंड में दौड़ने का फैसला लिया है। इस हालत में और दौड़ने का मतलब था नुकसान को बढ़ाना। अपने घर पर ओलम्पिक खेलों का सीधा प्रसारण देख रहा आलोक बोला – “सरफिरा है यह इंसान! दौड़ के लिए जान दांव पर लगा रहा है।”

फाइनल में रमन ने दर्द से लड़ते हुए रजत पदक जीता। फिर साक्षात्कार के एक सवाल में जैसे उसने घर बैठे आलोक को उत्तर दिया।

“मेरी उम्र 29 साल है, 4 साल रुकने का कोई औचित्य नहीं था क्योंकि 33 वर्ष का एथलीट अब ओलम्पिक की इस श्रेणी में नहीं दिखता। पिछले 22 वर्षों से मैं इस मंच पर आने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा हूँ। रोज़ सुबह 4 बजे से रात 10 बजे तक मेरी ट्रैनिंग, खान-पान, विचार सब ओलम्पिक मेडल की तरफ केंद्रित रहे। यहाँ आने के लिए मैंने दोस्तो के कई प्लान मिस किए हैं, मेरे जीवन में कॉलेज-प्यार जैसे पड़ाव मैंने स्किप कर डाले, परिवार के साथ तसल्ली से बैठकर बातें करना-समय बिताना छोड़ा है….सपनो की चुभन से रोज़ चैन की नींद छोड़ी है। अब यहाँ तक आकर कैसे लौट जाता? मैंने आगे के जीवन में चैन की नींद चुनी, मैंने अपने घरवालों, मित्रों और चाहने वालो से आँखें मिलाना चुना।”

आलोक को समझ आया कि अक्सर बातों और लोगो की दिखाई दे रही बाहरी परत के अलावा भी दुनिया होती है।

समाप्त!

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Old Stories (Mail Drafts 2008)

आज 2 पुराने मेल ड्राफ्ट्स दिखे जिनमे ये कहानियां थी। इनसे संतुष्ट तो नहीं हूँ पूरी तरह क्योकि रिसर्च और सही प्रारूप की कमी लग रही है पर फिर भी यहाँ शेयर कर देता हूँ।

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1. मुफ्तखोर

जिला न्यायालय के बाहर एक व्यक्ति को कुछ मीडियाकर्मी घेरे खड़े थे।

पत्रकार – “जैसा हमने ब्रेक से पहले दर्शकों को बताया कि अभिनेता-कॉमेडियन हरबंस जी ने नामी कॉमेडियन सुखबीर पाल पर अपने 4 चुटकुले चुराने का केस दायर किया है। अब वो हमारे साथ हैं, हरबंस जी सभी जानना चाहते हैं हैं कि सिर्फ 4 चुटकुलों के लिए आपने सुखबीर पाल जी पर केस क्यों डाला। इतना तो आपको उन 4 चुटकुलों से मिलता नहीं जितना आप अब भाग-दौड़ में गंवा देंगे?”

हरबंस – “बात पैसों की न होकर सही-गलत की है। एक सच्चा कलाकार वर्षों तक अपनी विधा में मेहनत कर अलग स्टाइल, कंटेंट खोजता है जबकि सुखबीर पाल जैसे लोग एक ऐसे सॉफ्टवेयर (एग्रीगेटर) की तरह होते हैं जो अपना समय सिर्फ अन्य कलाकारों खासकर छोटे या स्थानीय मंच वाले कलाकारों की कला चुराकर पेश करने का काम करते हैं। केवल मैं ही नहीं उनके शोज़ में अन्य हास्य अभिनेताओं का छिटपुट काम दिख ही जाता है। हम लोग 2-4 शहरों में रोज़ी के लिए बुढ़ापे तक दौड़ते रहते हैं और इन्हे देश-दुनिया में लोग राजा बना देते हैं फिर एक दिन किसी पार्टी में हमारे किसी किस्से या पंच पर पीछे से कोई गाली देते हुए कहता है ये तो फलाने सुपरस्टार का उठा लिया मुफ्तखोर ने! पते की बात यह है कि सब पता होते हुए भी, दुकानदार से मोल-भाव में झूझते हुए, पत्नी-बच्चों को बेहतर जीवन न दे पाने पर उनसे नज़रे चुराने के बाद भी हम लोग सफलता का ऐसा रास्ता नहीं अपनाते क्योकि…दिल नहीं मानता।”

समाप्त!

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2. सुधार

आज के मुख्य समाचार पर 2 भाइयों की नज़र थी, “वर्षो से पीड़ित AZ वर्ग को फलाना क्षेत्र में 50% कोटा मिला, जहां पहले उनकी भागीदारी केवल 28% थी और XW वर्ग का वर्चस्व था।
भरत – “वाह! यह तो अच्छी खबर है, समान अधिकार सबका हक़ है।”सुमंत – “खबर तो अच्छी है पर कुछ चिंता का विषय भी हैं।”भरत – “आप फैसले से खुश नहीं, हम XW वर्ग से हैं कहीं इसलिए तो आप परेशान नहीं?”सुमंत – “ऐसी बात नहीं है। बात यह है कि एक क्षेत्र में 2 वर्गों के बीच अंतर कई सदियों से बना है जिसको एकदम से अगर बराबर करने की कोशिश की जाएगी तो देश पर और भावी पीढ़ियों पर बहुत दबाव पड़ेगा। दोनों वर्गों में उस काम और क्षेत्र के प्रति जो मानसिकता है उसके कारण AZ वर्ग में उस क्षेत्र से जुड़ी शैक्षिक योग्यता, अनुभव और कौशल काफी कम है। इस आदेश के बाद 50 प्रतिशत के लक्ष्य को पूरा करने के लिए ज़बरदस्ती कम योग्य लोग लिए जाएंगे जिसका असर ना केवल इस क्षेत्र पर बल्कि देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। साथ ही XW वर्ग के कई योग्य उम्मीदवार रह जाएंगे, क्योंकि यहाँ हज़ार-डेढ़ हज़ार लोगो की नहीं लाखों-करोड़ों लोगो की बात हो रही है।”

भरत – “तो इसका समाधान क्या होना चाहिए?”सुमंत – “28 प्रतिशत की वर्तमान भागीदारी में हर सीजन 2-3 प्रतिशत कोटा बढ़ायें ताकि उचित संख्या में भागीदारी होने तक देश पर अतिरिक्त दबाव ना पड़े। नहीं तो यहां वही हाल होगा कि गांव के नेतृत्व में महिलाओं की भागीदारी की बात चली और प्रधान ने सीट छोड़ी तो बेचारी गरीब महिलाओं को किसी ने नहीं पूछा बल्कि प्रधान की पत्नी ही गांव की नई प्रधान बन गई और खानापूर्ति के लिए सरकारी रिकॉर्ड में दिखा दिया कि यह गांव एक महिला के नेतृत्व में है। तो धीरे-धीरे पहले नींव मजबूत हो फिर आगे काम किया जाए।”

समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन

माँ को माफ़ कर दो…(मोहित शर्मा ज़हन)

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बीच सड़क पर चिल्ला रहे, ज़मीन पीट रहे, खुद को खुजा रहे और दिशाभ्रमित भिखारी से लगने वाले आदमी को भीड़ घेरे खड़ी थी। लोगो की आवाज़, गाड़ियों के हॉर्न से उसे तकलीफ हो रही थी। शाम के धुंधलके में हर दिशा से आड़ी-तिरछी रौशनी की चमक जैसे उसकी आँखों को भेद रहीं थी। जिस कार ने उसे टक्कर मारी थी वो कबकी जा चुकी थी। कुछ सेकण्ड्स में ही लोगो का सब्र जवाब देने लगा।

“अरे हटाओ इस पागल को !!” एक साहब अपनी गाडी से उतरे और घसीट कर घायल को किनारे ले आये। खरीददारी कर रिक्शे से घर लौट रही रत्ना घायल व्यक्ति के लक्षण समझ रहीं थी। एकसाथ आवाज़, चमक की ओवरडोज़ से ऑटिज़्म या एस्पेरगर्स ग्रस्त वह व्यक्ति बहुत परेशान हो गया था और ऐसा बर्ताव कर रहा था। भाग्य से उसे ज़्यादा चोट नहीं आई थी।

“रोते नहीं, आओ मेरे साथ आओ।” रत्ना उस आदमी को बड़ी मुश्किल से अपने साथ एक शांत पार्क में लाई और उसे चुप कराने की कोशिश करने लगी। “भूख लगी है? लो जूस पियो-चिप्स खाओ।” फिर न जाने कब रत्ना उस प्रौढ़ पुरुष को अपने सीने से लगाकर सिसकने लगी। पार्क में इवनिंग वाक कर रहे लोगो के लिए यह एक अजीब, भद्दा नज़ारा था। उनमे कुछ लोग व्हाट्सप्प, फेसबुक आदि साइट्स पर अपने अंक बनाने के लिए रत्ना की तस्वीरें और वीडियों बनाने लगे…पर रत्ना सब भूल चुकी थी, उसके दिमाग में चल रहा था…“काश कई साल पहले उस दिन, मेरी छोटी सोच और परिवार के दबाव में तीव्र ऑटिज़्म से पीड़ित अपने बच्चे को मैं स्टेशन पर सोता छोड़ कर न आती।”

समाप्त!

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Art – Frederic Belaubre

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बाज़ीगरनी (लघुकथा) – लेखक मोहित शर्मा ट्रेंडस्टर

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अक्सर सही होकर भी बहस में हार जाना दीपा की आदत तो नहीं थी, पर उसका बोलने का ढंग, शारीरिक भाषा ऐसी डरी-दबी-कुचली सी थी कि सही होकर भी उसपर ही दोष आ जाता था। जब वह गलत होती तब तो बिना लड़े ही हथियार डाल देती। आज उसकी एफ.डी. तुड़वा कर शेयर में पैसा लगाने जा रहे पति से हो रही उसकी बहस में उसके पास दमदार तर्क थे।

“आप…आपने पहले ही कितना पैसा गंवाया है शेयर्स में! ये एफ.डी. इमरजेंसी के लिए रख लेते हैं ना? वो…आप दोबारा जोड़ कर लगा लेना पैसे शेयर में।”

“अरे चुप! पति एकसाथ तरक्की चाह रहा है और तू वही चिंदी चोरी जोड़ने में लगी रहियों। तेरी वजह से मेरी अक्ल पर भी पत्थर पड़ जाते हैं!”

“मेरी वजह से? मैंने…क्या किया? मैंने कुछ नहीं किया!”

…और इस तरह दीपा ने एक बार फिर से जीत के मुंह से हार छीन ली। अपनी आदत उसे पता थी और इस बार उसे हार नहीं माननी थी।

कुछ देर बाद पति पैसे लेकर बाहर निकला तो 2 नकाबपोश बाइक सवार उसका झोला झपट के चले गए। पति ओवरलोडेड इंजन की तरह आवाज़ निकालता थाने गया और वो 2 बाइक सवार दीपा को झोला पकड़ा कर चले गए। दीपा ने अपने भाई को सारी बात बताई और भाई ने अपने दोस्त भेज कर दीपा को हार कर भी जीतने वाली बाज़ीगर बनवाई।

समाप्त!

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भाई-यार (संवाद-कहानी) | मोहित शर्मा ज़हन

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देश के चहेते अभिनेता प्रणय पाल का नाम पैसो के गबन के मामले में सामने आया। प्रणय के एक बड़े प्रशंषक को यह खबर नहीं पची।

“भाई! ये सब चोचले होते हैं मीडिया और इनके एंटी कैंप वालो के। इतनी बड़ी हस्ती का नाम ख़राब करने की नौटंकी है बस।”

प्रशंषक का भाई रुपी दोस्त बोला – “हाँ भाई, मीडिया और एंटी कैंप करते हैं ऐसी हरकतें पर कभी-कभी सही भी होती हैं ये ख़बरें। इस बार तो मुझे भी शक है…”

पर यह बात प्रशंषक को जँची नहीं – “यार वो तेरे फेवरेट एक्टर नहीं हैं तो ज़बरदस्ती चिढ मत।”

भाई से फ़िर यार बना व्यक्ति बोला – “चिढ़ने की बात कहाँ से आ गयी? उस रिपोर्ट में सिर्फ इनका ही नाम नहीं है। कई विदेशी लोगो के नाम हैं, जिनमे से कुछ अपने देशो की जांच में दोषी मिले हैं। भारत से इतनी दूर एक छोटे से देश में जहाँ न बॉलीवुड चलता हो, न जिनका भारत से कुछ ख़ास नाता हो….वहां सिर्फ इनका नाम क्यों? किसी क्षेत्र में बड़ी हस्ती होना और दिल का साफ़ होना अलग बात है। ज़रूरी नहीं कि बड़ा इंसान एक अच्छा इंसान भी हो।”

यार की बात के दम ने उसे दोबारा भाई बना दिया।

“ठीक है फिर…भाई-यार फैसला आने तक रुक जाते हैं।”

समाप्त!

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पगलऊ वार्डन (लघुकथा) #मोहित_ट्रेंडस्टर

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9 वर्ष की बच्ची के साथ कुकर्म करने और उसे कोमा में पहुंचाने के बाद स्कूल सर्टिफिकेट के दम पर 15 वर्ष का पवन राज जुवेनाइल कोर्ट के कटघरे में मासूम बना खड़ा था। पुलिस, लड़की के परिजन, पत्रकार और स्वयं न्यायाधीश जानते थे कि लड़का 19-20 साल से कम नहीं है। पुलिस ने सही आयु जानने के लिए बोन डेंसिटी टेस्ट करने की मांग रखी तो लड़के के बाप ने मानवाधिकार आयोग से बाधा लगवा दी। लड़के को बाल सुधार गृह में सिर्फ 3 साल की कैद हुई। कई दुकानों वाले सुनार बाप मुकेश राज की पहुँच कम नहीं थी।

पवन को चिंता थी – “पापा जी, सुना है मेरे जैसे केस वालो को देखकर जुवेनाइल सेंटर के वार्डन पर पागलपन सवार हो जाता है। दो लड़को को पीट-पीट कर मार ही डाला, फिर कोई एक्सीडेंट दिखा दिया।” बाप जी ने दिलासा दिया – “घबरा मत! उस पगलऊ का मैं ट्रांसफर करवाता हूँ।”

वार्डन का ट्रांसफर हुआ और क्यों हुआ यह उसे पता था। जाते-जाते वार्डन ने कुछ कागज़ अपने विभाग में आगे किये और स्टाफ मीटिंग की। पवन अपने सेल में आया और उस रात समलैंगिक अफ़्रीकी किशोरों ने उसका सामूहिक दुष्कर्म किया। उसने मदद की गुहार लगायी पर स्टाफ या अन्य किशोर ने उसकी मदद नहीं की। पवन को लगा शायद एक बार की बात होगी पर अब यह उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। एक दिन पवन ने अपना मानसिक संतुलन खो दिया। पगलऊ वार्डन ने जाते-जाते रेव पार्टी में पकडे गए समलैंगिक अफ़्रीकी किशोरों का ट्रांसफर इस बाल सुधार गृह में पवन के सेल में करवाया था।

समाप्त!
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