Comics Theory (Issue #01)

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Comics Theory’s Ghosts of India Issue 1, released now! (Anthology includes 1 short comic by me and Harendra Saini) Recent event – Indie Comix Fest 13 May 2018, Noida/Delhi.
#comics #horror #india #mohitness #comicstheory #anthology

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Special Edition

कलाकार श्री सुरेश डिगवाल

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मेरे एक कलाकार-ग्राफ़िक डिज़ाइनर मित्र ने मुझसे शिकायत भरे लहज़े में कहा कि मैं अक्सर भारतीय कॉमिक्स कलाकारों, लेखकों के बारे में कम्युनिटीज़, ब्लॉग्स पर चर्चा करता रहता हूँ पर मैंने कभी सुरेश डिगवाल जी का नाम नहीं लिया। मैंने ही क्या अन्य कहीं भी उसने उनका नाम ना के बरारबर ही देखा होगा। वैसे बात में दम था, अगर एक-दो सीजन का मौसमी कलाकार-लेखक होता तो और बात थी पर सुरेश जी ने डोगा, परमाणु, एंथोनी जैसे किरदारों पर काफी समय तक काम किया। उसके बाद भी कैंपफायर ग्राफ़िक नोवेल्स, पेंगुइन रैंडम हाउस, अन्य कॉमिक्स, बच्चो की किताबों और विडियो गेम्स में उनका काम आता रहा। अब सुरेश जी गुड़गांव में जेनपैक्ट कंपनी में एक कॉर्पोरेट लाइफ जी रहे हैं।

जहाँ तक उनपर होने वाली इतनी कम चर्चा की बात है उसपर मेरी एक अलग थ्योरी है। जिसको तुलनात्मक स्मृति थ्योरी कहा जा सकता है। किसी एक समय में एक क्षेत्र में जनता ज़्यादा से ज़्यादा 4 नाम ही याद रख पाती है (बल्कि कई लोगो को सिर्फ इक्का-दुक्का नाम याद रहते हैं)। उन नामो के अलावा उस क्षेत्र में सक्रीय सभी लोग या तो लम्बे समय तक सक्रीय रहें या फिर उन नामो को नीचे धकेल कर उनकी जगह लें। भाग्य और अन्य कारको से अक्सर कई प्रतिभावान लोग उस स्थान पर नहीं आ पाते जिसके वह हक़दार होते हैं, ओलंपिक्स की तरह दशमलव अंको से छठवे, सातवे स्थान या और नीचे स्थान पर रह जाते है जहाँ आम जनता स्मृति पहुँच नहीं पाती। सुरेश जी का दुर्भाग्य रहा कि एक समय वह इतना सक्रीय रहते हुए भी प्रशंसको के मन में बड़ा प्रभाव नहीं छोड़ पाए।

उनकी इंकिंग, कलरिंग जोड़ियों पर टिप्पणी नहीं करूँगा पर मुझे उनकी शैली पसंद थी। मुझे लगता है अगर वह कुछ और प्रयोग करते, कुछ भाग्य का साथ मिल जाता तो आज मुझे अलग से उनका नाम याद ना करवाना पड़ता। एक वजह यह है कि बहुत से कलाकारों को अपना प्रोमोशन करना अच्छा नहीं लगता, इन्टरनेट-सोशल मीडिया की दुनिया से दूरी बनाकर वो अपनी कला में तल्लीन रहते हैं। खैर, कॉमिक्स के बाहर एक बहुत बड़ी दुनिया है जहाँ सुरेश डिगवाल जी कला निर्देशन, एनिमेशन, चित्रांकन, विडियो गेम्स, ग्राफ़िक डिजाईन और शिक्षा में अपना योगदान दे रहे हैं। आशा है आगे हम सबको उनका काम निरंतर देखने को मिलता रहेगा।
अधिक जानकारी के लिए इन्टरनेट पर सुरेश जी की ये मुख्य प्रोफाइल्स और पोर्टफोलियो हैं –
https://www.behance.net/yogmaya
http://www.coroflot.com/Yogmaya/portfolio
https://www.linkedin.com/in/sureshdigwal

उदार प्रयोग (कहानी)- मोहित शर्मा ज़हन #trendster

Barker Thomas, The Gypsy Girl

“पोराजिमोस बोलते हैं उसे, जर्मनी और उसके सहयोगी देशो में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नाज़ी सरकार द्वारा रोमानी जिप्सी समुदाय का नरसंहार। पता सबको था कि कुछ बुरा होने वाला है फिर भी मुस्कुराते हुए नाज़ी सिपाहियों को देख कर भ्रम हो रहा था। शायद जैसा सोच रहें है या जो सुन रहें है वह सब अफवाह हो। हज़ारो इंसानो को एकसाथ मारने वाले नाज़ी गैस चैम्बर असल में कोई कारखाने हों। भोले लोगो की यही समस्या होती है, वो बेवकूफ नहीं होते पर उन्हें बेवकूफ बनाना आसान होता है। मेरे 4 सदस्यों के परिवार पर एक अफसर को दया आ गयी उनसे पूरे परिवार को बचा लिया। हम सब उसके घर और बड़े फार्म में नौकर बन गए।

2 समय का खाना और सोने की जगह मिल गयी, कितना दयालु अफसर था वह। कुछ हफ्तों बाद अफसर ने हमे बताया कि एक बड़े उदार जर्मन वैज्ञानिक हमारे जुड़वाँ लड़को को गोद लेना चाहते हैं। वो उनका अच्छा पालन-पोषण करेंगे। शायद फिर कभी अपने बच्चो को हम दोनों ना देख पाते पर उनके बेहतर भविष्य के लिए हमने उन्हें जाने दिया। उनके जाने से एक रात पहले मैं सो नहीं पायी। जाने से पहले क्या-क्या करुँगी, बच्चो को क्या बातें समझाउंगी सब सोचा था पर नम आँखों में सब भूल गयी। हमेशा ऐसा होता है, सोचती इतना कुछ हूँ और मौका आने पर बस ठगी सी देखती रह जाती हूँ।

युद्ध समाप्त होने की ओर बढ़ा और हमे रूस की लाल सेना द्वारा आज़ाद करवाया गया। इंसानो के अथाह सागर में अपने बच्चो को ढूंढने की आस में जगह-जगह घूमे हम दोनों। किसी ने उस वैज्ञानिक के बेस का पता बताया। वहां पहुंचे तो हमारे कुपोषित बच्चे टेबल पर पड़े तड़प रहे थे। उनपर उस वैज्ञानिक ने जाने क्या-क्या प्रयोग किये थे। बच्चो का शरीर फफोलों से भरा था,  हाथ-पैरों से मांस के लोथड़े लटक रहे थे। उनकी आँखों से आंसूओं के साथ खून टपक रहा था। पता नहीं जान कैसे बाकी थी उन दोनों में….शायद मुझे आखरी बार देखने के लिए ज़िंदा थे दोनों। उन्हें गले से चिपटाकर रोने का मन था पर छूने भर से वो दर्द से कराह रहे थे। मैंने पास खड़े सैनिक की रिवाल्वर निकालकर दोनों बच्चो को गोली मार दी। उसके बाद मैंने कमरे में मौजूद सैनिको पर गोलियां चलाना शुरू किया। वो सब चिल्लाते रहे कि वो मेरी मदद के लिए आये हैं… पर अब किसी पर विश्वास करने का मन नहीं। मेरे पति मुझे पागल कहकर कर झिंझोड़ रहे थे, चिल्ला रहे थे। गुस्सा करना उनकी पुरानी आदत है, सिर्फ मुझपर बस चलता है ना इनका।”

अपने पति का गुस्सा अनसुना कर खून के तालाब के बीच, वह रोमानी-जिप्सी महिला बच्चो को सीने से लगाकर लोरी सुनाने लगी।

समाप्त!

Read related story – सभ्य रोमानी बंजारा

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भीगी बैसाखी (Jallianwala Bagh Massacre)

भीगी बैसाखी!!!!!

 Jallianwala Bagh Massacre (Amritsar, 13 April 1919)

 

बड़ा गहरा है तेरा कुआँ….
जो गुम हुई इसमे माँ की दुआ…
खुदगर्जी में तूने अपनी दीवारों को लाल कर डाला…
कितना ज़ालिम है तू ओ जलियांवाला…

खेलते बच्चों को किसने गुमसुम कर डाला,
कितना काला है वो गोरी चमड़ी वाला…

सुबह से खड़े थे वो तो तेरे जवाब सुनने के वास्ते,
शाम तक पट गए लाशो से संकरे रास्ते.

आयेंगे वो दिन उसको यकीन था,
दौड़ी चौखट तक…कोई नहीं था.

ऐसा तो न था मासूमो का विरोध,
जो तेरी ‘महारानी’ ने उन्हें तोहफे मे दिया बारूद.

कम पड़ रहे थे क्या भीगे जज़्बात,
क्यों पड़ने लगी ये बरसात?

पलके कहाँ झपकेंगी,
देखना है कितनी लम्बी होगी ये रात.

ज़ख़्मी बिछड़े अब कहाँ जायेंगे…
तेरे निजाम के कर्फ्यू मे अपनों से पहले लाशो तक गिद्ध, कुत्ते आयेंगे…

उसके मन मे था ये बैसाखी मेला लेकर आयेगी…
अब से वो अभागी कभी बैसाखी नहीं मनायेगी…

तेरी इबारत मे एक माँ ठगी गयी…
सच को दबाकर अपनी बात को तो साबित कर दिया सही…
अरे..रुक कर देख तेरी एक गोली किसी नन्हे से  दिल को भेद गयी…

– Mohit