जागते रहो! (हॉरर कहानी) #mohit_trendster

13620151_1048933615220827_7865657880743179932_nनील को पता था कि उसे सीवियर स्लीप पैरालिसिस की समस्या थी। इस विकार में कभी-कभी नींद खुलने पर उसका दिमाग कई मिनट जगा रहता था और अपने आस-पास की चीज़ें महसूस करता था पर वह अपनी मर्ज़ी से अपना शरीर नहीं हिला पाता था। ऊपर से सोने पर सुहागा ये कि ऐसी अवस्था में अक्सर उसे भ्रम की स्थिति होती थी। भ्रम और डर में उसे लगता था कि कटे चेहरे वाली बच्ची उसकी छाती पर बैठी अपने नाखूनों से आड़ी-तिरछी रेखाएं बना रही है, बच्ची से नज़र मिलाने पर वह उसके गले के पास तेज़ी से ऐसी रेखाएं बनाने लगती। इतना ही नहीं कभी उसे अपने आस-पास बच्चे खेलते प्रतीत होते तो कभी एक विकृत चेहरे वाली बुढ़िया उसे घूरती।

फैक्टरी से छुट्टी मिलने पर कुछ दिनों के लिए नील अपने गाँव रोशक गया। एक दिन गर्मी से परेशान होकर वह मकान की छत पर सो गया।

थोड़ी देर बाद उसकी नींद खुली और उसने खुद को स्लीप पैरालिसिस की स्थिति में पाया। तभी उसे जानी-पहचानी बच्चों की आवाज़ें आने लगीं। उसने आँखें घुमायी तो कुछ बच्चों को आकृतियाँ खेलती दिखीं। पूर्णिमा की रात में एक-दो दिन थे इसलिए नील को चांद की रोशनी में उन बच्चों की परछाई तक दिख रही थी। बच्चों को जैसे ही लगा की नील की आँखें उनकी तरफ हैं वो चिल्लाते हुए उसकी तरफ दौड़े, डर के मारे-पसीने से  लथपथ नील कुछ हिला और बच्चे गायब हो गए। थकान के कारण नील को बहुत तेज़ नींद आ रही थी इसलिए वह फिर सो गया। कुछ समय बाद नींद टूटने पर उसे अपनी गर्दन पर वही जाना-पहचाना कटे चेहरे वाली नन्ही बच्ची का स्पर्श महसूस हुआ।

 “यह क्या हो रहा है? ऐसा पहले तो नहीं हुआ कभी!“ उसने सोचा।

पहले एक रात में या तो बच्चे या यह बच्ची या विकृत बुढ़िया आती थी पर एक रात में इनमे से 2 कभी नहीं आए। बच्ची अपने रूटीन को अपनाते हुए नील की छाती पर रेखाएं बनाने में लगी थी। न चाहते हुए भी नील की नज़रें बच्ची से मिलीं और गुस्से में वह भूतहा बच्ची नील की गर्दन पर कलाकारी करने लगी। नील ने पूरा ज़ोर लगाकर एक झटके में अपना सर हिलाया, उसकी हरकत से वह बच्ची अपने-आप गायब हो गई और पास रखे ईंटों के ढेर से उसका सिर इतनी तेज़ी से लड़ा कि वह बेहोश हो गया। यह भी पहली बार हुआ था कि नील के शरीर ने स्लीप पैरालिसिस की अवस्था मे कुछ हरकत की थी नहीं तो हमेशा ही उसे कई मिनट तक यह डर झेलना पड़ता था।

जब बेहोशी से उसे होश आया तो एक बार फिर नील स्लीप पैरालिसिस में जड़ था। उसके दिमाग ने कहा अब बुढ़िया की बारी है।

“बेटे! ले खा लें आम!”

नील का खून ठंडा पड़ गया, लो आज बुढ़िया बोलने भी लगी।

“गोलू आम खा…”

बुढ़िया उसकी तरफ आम लेकर बढ़ने लगी, जो अंदर से किसी मानव अंग जैसा लग रहा था। पूर्णिमा सी रोशनी में बुढ़िया का चेहरा और भयावह दिख रहा था जिसमे कीड़े-मकोड़े कुलमुला रहे थे। नील को लगा कि इस बार वह हिलेगा तो फिर ये बला भी गायब हो जायेगी।

“बेटा आम खा ले…इतने प्यार से खिला रही हूँ। सुनता क्यूँ नहीं तू?”

नील ने पूरी शक्ति जुटाकर करवट ली पर उसे अपनी स्थिति का पता नहीं था कि धीरे-धीरे वह खिसक कर छत के कोने में जा चुका है और वो अपने कच्चे मकान की छत से नीचे आ गिरा। छत से गिरने के कारण नील  की कई हड्डियां टूटी और उसके सिर में चोट आने की वजह से उसको लकवा मार गया। अब सिर्फ उसे दिखने वाले बच्चों का झुंड, चेहरा-कटी बच्ची और बुढ़िया नील को हरदम परेशान करते हैं और वह कुछ नहीं कर पाता। हाँ, अब भी वह उनमे से किसी से भी आँखें मिलाने से बचता है।

समाप्त!

– मोहित शर्मा जहन

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ज़रूरत (कहानी) – मोहित शर्मा ज़हन

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तकनीकी गड़बड़ी से एक यात्री विमान ज़मीन से हज़ारों मीटर ऊपर भीषण डीकम्प्रेशन से बिखर कर बंगाल की खाड़ी में गिर गया था। अचानक दबाव के लोप हुआ धमाका इतना भीषण था कि किसी यात्री के बचने की संभावना नहीं थी। 279 यात्रियों और विमान दल में केवल 112 व्यक्तियों की क्षत-विक्षत लाशें मलबे से चिपकी या तैरती मिली, बाकी लोगो को सागर लील गया। बैंक लिपिक रूबी के पिता शॉन इस फ्लाइट में थे। पूरे दिन के सफर के बाद जांच-बचाव केंद्र पर पहुंच कर रूबी को पता चला की एक को छोड़कर बाकी सभी शवो की उनके परिजनों द्वारा पहचान हो चुकी है। हाल ही में कैंसर पीड़ित अपनी माँ को खो चुकी रूबी ने बुझे मन से आखरी शव को देखा तो चेहरा और शरीर पहचान में न आ सकने वाली हालत में थे, पर शव के पैर पर चोट का लंबा निशान रूबी के लिए अपने मृत पिता को पहचानने के लिए काफी था। सिसकती हुई रूबी औपचारिकताओं के लिए आगे बढ़ी तो उसे एक आवाज़ ने रोका।

“तुम्हे कोई गलतफहमी हो गई है बेटी! यह मेरे पति हैं।”

रूबी ने उस वृद्धा को दया से देखा और कुछ देर समझाने की कोशिश की, पर वह औरत अपनी बात पर अड़ी रही। थोड़े समय बाद रूबी के सब्र का बांध टूट गया और वह उस बूढ़ी महिला पर चिल्लाने लगी। आस-पास अन्य यात्रियों के कुछ परिजन और जांच अधिकारी आ गए। भीड़ मे कोई बोला – “अरे…ये औरत पागल हो गई है। पहले 2 लाशों को अपना पति बता रही थी फिर वहां से भगाया इसे।”

अब रूबी ने उस औरत पर ध्यान दिया, उसका हुलिया व्यवस्थित था। वह शांत थी और उसके व्यवहार में पागलपन जैसा कुछ नहीं दिख रहा था।

एक अधिकारी ने मामला सुलझाना चाहा – “देखिए अगर शव पहचान में विवाद है तो डीएनए जांच के लिए भेजे जा सकते हैं।”

रूबी – “नहीं ऑफिसर! डीएनए टेस्ट मत करवाइये, मैं अपना क्लैम वापस लेती हूँ…यह मेरे पिता नहीं हैं।”

सबकी अविश्वास भरी नज़रों और मुँह पर लेकिन के जवाब में रूबी दबी ज़ुबान में बोली “…शायद इस समय मुझे मेरे पिता से ज़्यादा इन्हे इनके पति की ज़रूरत है।”

एक बार शव को प्यार से छूकर रूबी ने नम आँखों से ही पिता का अंतिम संस्कार कर विदा ली।

समाप्त!

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शोबाज़ी (कहानी) – मोहित शर्मा ज़हन

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छात्रों के पास से गुज़रती प्रोफेसर के कानो में कुलदीप की एक बात पड़ी।

“हमारे पूर्वजो ने तुम्हे बचाया। तुम लोगो के घर-बार और तुम्हारी बहु-बेटियों की इज़्ज़त लुटने से बचाने वाले हम लोग ही थे। अगर हम न होते तो क्या होता तुम्हारे समुदाय का?”

प्रोफेसर के कदम थम गए, ऐसा वाक्य उन्होंने पहली बार नहीं सुना था। वो उन लड़को के समूह के पास गईं और बोलीं।

“तो क्या अपने पूर्वजो के कामो की अलग से रॉयल्टी चाहिए?”

प्रोफेसर को उग्र देख कुलदीप सहम कर बोला – “ऐसी बात नहीं है मैम…मैं तो बस…”

प्रोफेसर – “देखो कुलदीप, जिन समुदाय-लोगो की तुम बात कर रहे हो उनकी संख्या करोड़ो में थी और इतिहास देखोगे तो हर धर्म के लोगो ने अनेको बार एक दूसरे पर एहसान और अत्याचार किए हैं। यह संभव है जिन पूर्वजो की तुम बात कर रहे हो उनके पूर्वजो या उनसे भी पहले उस मज़हब के लिए किसी और समुदाय ने कुछ अच्छे काम किए हों जिनसे उनके जीवन मे सकारात्मक बदलाव आए हों। इतिहास जानना ज़रूरी है पर पुरखों से शान उधार लेकर अपने नाम पर लगाना गलत है। खुद समाज के लिए कुछ करो फिर यह शोबाज़ी जायज़ लगेगी…हाँ, माता-पिता या दादा आदि की संपत्ति, गुडविल, रॉयल्टी अलग बात है पर 1492 में कुलदीप से ऊपर 32वी पीढ़ी ने क्या तीर मारे वो किताबो तक ही रहने दो, उनका क्रेडिट तुम मत लो…क्योंकि ऐसे हिसाब करोगे तो फिर कभी हिसाब होगा ही नहीं।”

समाप्त!

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माँ को माफ़ कर दो…(मोहित शर्मा ज़हन)

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बीच सड़क पर चिल्ला रहे, ज़मीन पीट रहे, खुद को खुजा रहे और दिशाभ्रमित भिखारी से लगने वाले आदमी को भीड़ घेरे खड़ी थी। लोगो की आवाज़, गाड़ियों के हॉर्न से उसे तकलीफ हो रही थी। शाम के धुंधलके में हर दिशा से आड़ी-तिरछी रौशनी की चमक जैसे उसकी आँखों को भेद रहीं थी। जिस कार ने उसे टक्कर मारी थी वो कबकी जा चुकी थी। कुछ सेकण्ड्स में ही लोगो का सब्र जवाब देने लगा।

“अरे हटाओ इस पागल को !!” एक साहब अपनी गाडी से उतरे और घसीट कर घायल को किनारे ले आये। खरीददारी कर रिक्शे से घर लौट रही रत्ना घायल व्यक्ति के लक्षण समझ रहीं थी। एकसाथ आवाज़, चमक की ओवरडोज़ से ऑटिज़्म या एस्पेरगर्स ग्रस्त वह व्यक्ति बहुत परेशान हो गया था और ऐसा बर्ताव कर रहा था। भाग्य से उसे ज़्यादा चोट नहीं आई थी।

“रोते नहीं, आओ मेरे साथ आओ।” रत्ना उस आदमी को बड़ी मुश्किल से अपने साथ एक शांत पार्क में लाई और उसे चुप कराने की कोशिश करने लगी। “भूख लगी है? लो जूस पियो-चिप्स खाओ।” फिर न जाने कब रत्ना उस प्रौढ़ पुरुष को अपने सीने से लगाकर सिसकने लगी। पार्क में इवनिंग वाक कर रहे लोगो के लिए यह एक अजीब, भद्दा नज़ारा था। उनमे कुछ लोग व्हाट्सप्प, फेसबुक आदि साइट्स पर अपने अंक बनाने के लिए रत्ना की तस्वीरें और वीडियों बनाने लगे…पर रत्ना सब भूल चुकी थी, उसके दिमाग में चल रहा था…“काश कई साल पहले उस दिन, मेरी छोटी सोच और परिवार के दबाव में तीव्र ऑटिज़्म से पीड़ित अपने बच्चे को मैं स्टेशन पर सोता छोड़ कर न आती।”

समाप्त!

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Art – Frederic Belaubre

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भाई-यार (संवाद-कहानी) | मोहित शर्मा ज़हन

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देश के चहेते अभिनेता प्रणय पाल का नाम पैसो के गबन के मामले में सामने आया। प्रणय के एक बड़े प्रशंषक को यह खबर नहीं पची।

“भाई! ये सब चोचले होते हैं मीडिया और इनके एंटी कैंप वालो के। इतनी बड़ी हस्ती का नाम ख़राब करने की नौटंकी है बस।”

प्रशंषक का भाई रुपी दोस्त बोला – “हाँ भाई, मीडिया और एंटी कैंप करते हैं ऐसी हरकतें पर कभी-कभी सही भी होती हैं ये ख़बरें। इस बार तो मुझे भी शक है…”

पर यह बात प्रशंषक को जँची नहीं – “यार वो तेरे फेवरेट एक्टर नहीं हैं तो ज़बरदस्ती चिढ मत।”

भाई से फ़िर यार बना व्यक्ति बोला – “चिढ़ने की बात कहाँ से आ गयी? उस रिपोर्ट में सिर्फ इनका ही नाम नहीं है। कई विदेशी लोगो के नाम हैं, जिनमे से कुछ अपने देशो की जांच में दोषी मिले हैं। भारत से इतनी दूर एक छोटे से देश में जहाँ न बॉलीवुड चलता हो, न जिनका भारत से कुछ ख़ास नाता हो….वहां सिर्फ इनका नाम क्यों? किसी क्षेत्र में बड़ी हस्ती होना और दिल का साफ़ होना अलग बात है। ज़रूरी नहीं कि बड़ा इंसान एक अच्छा इंसान भी हो।”

यार की बात के दम ने उसे दोबारा भाई बना दिया।

“ठीक है फिर…भाई-यार फैसला आने तक रुक जाते हैं।”

समाप्त!

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क्रॉस कनेक्शन (लघुकथा) – मोहित ट्रेंडस्टर

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बगल के घर से आती आवाज़ों को सुन सुमेर सोच रहा था कि लोगो को उसके पडोसी मनसुख लाल की तरह नहीं होना चाहिए जो अपने परिवार की खातिर और कानून के डर से अपनी हिंसक बीवी सुशीला के हाथो पिटता रहे और कानो मे काँच सा घोलते तानो को ताउम्र सहता चला जाये। इधर शाम को आसमान को एकटक निहारते अपने पडोसी को देख कर मनसुख लाल सोचने लगा कि लोगो को सुमेर कुमार जैसा नहीं होना चाहिए जो पत्नी राधा के 2-4 तानो को अपनी मर्दानगी पर ले उसे दोमंज़िल से नीचे फ़ेंक दें और फिर हादसे का बहाना बना कर जीवन भर कोमा में पड़ी बीवी का बिल भरता रहे, ससुराल वालो से केस लड़ता रहे। तीसरे-चौथे पडोसी आपस में बातें कर रहे थे कि सुमेर की शादी सुशीला से होनी चाहिए थी और मनसुख का बंधन राधा से बंधना चाहिए था, तब कम से कम एक जोड़ा सुखी रहता और सुमेर -सुशीला के भी दिमाग ठिकाने रहते।
समाप्त!
टिप्पणी – जीवन में संतुलन हमेशा पूरा व्यक्तित्व बदल कर नहीं बल्कि अक्सर व्यक्ति में कुछ गुण, व्यवहार बदल कर भी लाया जा सकता है।
– मोहित शर्मा (ज़हन)
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3 Laghu kathayen – मोहित शर्मा (ज़हन) ‪#‎mohitness‬

*) – सच्चाई की सज़ा (कहानी)

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खोजी पत्रकार जैकी डेरून और उनके सहयोगी रॉजर वॉटसन के अथक प्रयासों के बाद उन्हें पिछड़े एशियाई एवम अफ़्रीकी देशो में संसाधनो के लालच में विकसित देशो और प्रभावी बहुराष्ट्रीय सरकारी-निजी संस्थाओं द्वारा बड़े स्तर पर किये गए अपराधो, नरसंहारों के पुख्ता सबूत और रिकॉर्डिंग्स मिले थे। उनके इस अभियान के कारण उनके पीछे कुछ गुप्त संस्थाओं के जासूस और हत्यारे लग गए थे। चूहे-बिल्ली के इस खेल में कुछ हफ्तों से जैकी और रॉजर किसी तरह अपनी जान बचा रहे थे, आखिरकार वह दोनों ऑस्ट्रेलिया के पास एक मानवरहित द्वीप पर फँस गये।
रॉजर – “हमारे पास अब आधा घंटा भी नहीं है, किसी भी पल कोई युद्धपोत या विमान हमारे परखच्चे उड़ा देगा। क्या हमने इस दिन के लिए की थी इतने वर्षो मेहनत?”
जैकी – “इतना भी नकारात्मक मत सोचो, रॉजर। मैंने अपने कुछ जर्नलिस्ट दोस्तों को कई दस्तावेज़, तस्वीरें और सबूत मेल कर दी है। आज यहाँ आने से पहले मैंने दुनियाभर की दर्जनो वेबसाइट्स पर अपने डाक्यूमेंट्स अपलोड भी कर दिए है।”
4-5 मिनट्स बाद कोई युद्धपोत या लड़ाकू विमान नहीं बल्कि कुछ मोटरबोट्स में सोइयों कमांडोज़ आये।
जैकी (एक ख़ुफ़िया जासूस के पास आने पर) – “कोई फायदा नहीं हमने अपने कंप्यूटरस और गैजेट्स जला दिए है।”
जासूस – “दिमाग के पक्के हो पर तकनीक में कच्चे हो! अब टेक्नोलॉजी इतनी विकसित है कि केवल सिग्नल्स के बल पर हमने दुनियाभर में बैठे तुम्हारे 11 पत्रकार मित्र जिनको तुमने मेल्स भेजे को “प्राकृतिक मौत” मार दिया, लगभग वो सभी 150 वेबसाइट्स बंद करवाई या वो वेबपेजेस डिलीट किये जहाँ तुमने कुछ भी अपलोड किया था, वह भी सिर्फ 5 घंटो के अंदर।
रॉजर – “जब सब कुछ ख़त्म कर दिया, तो हमे ज़िंदा पकड़ने का क्या मतलब?”
मतलब बंदी रॉजर और जैकी को अगले दिन प्रेस कांफ्रेंस में पता चला।
“लक्ज़मबर्ग निवासी पत्रकार जैकी डेरून और उनके सहयोगी रॉजर वॉटसन को ऑस्ट्रेलिया में आदिवासी इलाके क़ि महिलाओं के यौन उत्पीड़न का दोषी पाया गया है। इस खुलासे के बाद दुनियाभर से 7 अन्य महिलाओं ने इन दोनों पर यौन हिंसा के आरोप लगाएं है।”
प्रेस कांफ्रेंस पूरी होने से पहले ही दोनों के विरुद्ध आक्रोशित भीड़ के नारे लगने लगे। कुछ-एक प्रदर्शनकारी तो पुलिस बैरियर तोड़ कर उन्हें पीटने लगे। दुनियाभर से उन्हें मृत्युदंड देने की मांग उठने लगी। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि किस तरह बड़ी संस्थाएं, सरकारें अपने खिलाफ उठी आवाज़ों का इतनी क्रूरता से दमन करती है। उन्हें इस स्कैंडल में इसलिए डाला गया ताकि बाद में कभी अगर उनके नाम से कोई बचा हुआ दस्तावेज़, बात आदि कुछ उभरे तो लोगो में उनकी अपराधिक छवि के पूर्वाग्रह का फायदा उठाते हुए उन बचे-खुचे सबूतों को आसानी से नष्ट किया जा सके। अपना बाकी जीवन जैकी और रॉजर ने अमरीका की एक गुप्त जेल में अमानवीय यातनाएं सहते हुए काटा।
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*) – पुलिस बनाम जनता (लघुकथा)

एक समाचार वार्ता, खबर विश्लेषण प्रोग्राम में विचारकों, समाज सेवको, विशेषज्ञों, जनता और न्यूज़ एंकर ने वहाँ उपस्थित पुलिस अधीक्षक पर सवालो, कटाक्ष और पुलिस की आलोचना करती हुयी बातों की वर्षा कर दी। अपनी सफाई देने के लिए या योजनाएं-उपलब्धियां बताने के लिए वो जैसे ही होते तभी कहीं से तीखे शब्दों के तेज़ बाण वार्ता का रुख अपनी ओर कर लेते। कुछ ही देर में अधीक्षक महोदय अपनी लाचारी से खीज गये, और जवाब देने की आतुरता खोकर सबकी बातें सुनने लगे। अलग लोगो कि बातें अलग पर उन्होंने एक ट्रेंड गौर किया सबकी बातों मे जो मुख्यतः ये थी –
“इस लचर व्यवस्था पर क्या कहना चाहेंगे आप?”, “इस मेट्रो शहर में हर रोज़ होते अपराधो पर है कोई जवाब आपके पास?”, “कैसी बेदम और भ्रष्ट है यह पुलिस?”
अंततः उन्हें कार्यक्रम के अंत से ज़रा पहले औपचारिकता के लिए अपनी सफाई देने के लिए कहा गया तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ कि कोई वाकई में उनकी बात सुनने में इच्छुक है। अब तक वो अपनी रिपोर्ट्स के अंक-निष्कर्ष, भावी योजनाओ का सारांश आदि भूल चुके थे। इसलिए उन्होंने अपनी सफाई कम शब्दों में दी।
पुलिस अधीक्षक – “टैक्स-बिजली-अनाज चोरी से लेकर खून खराबे, दंगो तक खुद जनता को सारे कलयुगी काम करने है और पुलिस उन्हें सतयुग से उतरी चाहिए! पुलिसवाले अमावस की रात स्पेसशिप से उतरे एलियंस नहीं होते, इसी समाज से निकले लोग होते है….जैसी जनता – वैसी पुलिस….सिंपल!…बल्कि इस पैमाने के आधार पर तो जैसी जनता है उस हिसाब से यहाँ पुलिस काफी बेहतर है।”
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*) – झेल ले बिटिया…फिर तो राज करेगी
हर संयुक्त परिवार में सूरज बड़जात्या की “हम साथ साथ है” जैसी फिल्मो की तरह सतयुग सा माहौल होता है, यह भ्रम था कीर्ति और उसके परिवार को जो कीर्ति की शादी होते ही टूट गया। ससुराल में 5 भाइयों में कीर्ति तीसरे नंबर के भाई विनोद कि वधु बनी। कीर्ति अपनी ससुराल में खुश नहीं थी, जैसे सपने देखे थे वैसा कुछ नहीं था। वैसे एक प्यार करने वाला पति, चुपचाप बैठे ससुर जी और जेठ-देवर थे पर समस्या सासू माँ से थी। जो कीर्ति और उसकी 2 जेठानियों के लिए एक सास कम हिटलर ज़्यादा थी। बुज़ुर्ग होते हुए भी किसी बिगड़ैल किशोर सा अहंकार, बहुओं पर तरह-तरह की पाबंदियां, काम सही होने पर भी ताने और गलती होने पर तो बहुओं से ऐसा बर्ताव होता था जैसे उनकी वजह से दुनिया में प्रलय आ गयी। अब कीर्ति को पछतावा हो रहा था कि काश उसने शादी से पहले जेठानियों से किसी तरह बात कर ली होती। शादी के तुरंत बाद जब कीर्ति ने अपनी व्यथा अपने मायके में सुनाई तो माँ-बाप ने दिलासा देते हुए समझाया कि 4-5 साल सहन कर लो उसके बाद सास वैसे ही उम्रदराज़ होकर या तो अक्षम सी हो जायेंगी या परलोक सिधार जायेंगी। फिर तू अपने घर में राज करना।
22 वर्ष बाद सभी भाइयों की शादी हो चुकी है, सबके स्कूल-कॉलिज में पढ़ रहे बड़े बच्चे है। सास की दिनचर्या पहले की तरह सीमा पर तैनात एक सैनिक की तरह है, उनका स्वास्थ्य स्थिर है। कीर्ति के ससुर जी और माता-पिता स्वयं परलोक जा चुके है। कीर्ति के बड़े जेठ-जेठानी कुछ महीनो पहले लम्बी बीमारियों के बाद छोटे अंतराल में नहीं रहे। अब वह अपनी दूसरी जेठानी की तेरहवी में रिश्तेदारो और पंडितों को संभाल रही है, पीछे से सासू माँ का कोसना, टोकना, धक्का देना अनवरत जारी है।
दूर के कुछ रिश्तेदार आपस में बात कर रहे है।
“सेठ जी का पोता (सबसे बड़े लड़के का बेटा) जल्दी नौकरी पर लग गया, अपनी दीपाली के लिए अच्छा रहेगा।”
“पर सुना है सेठानी जी कुछ सनकी है। चौबीसो घंटे बहुओं के पीछे पड़ी रहती है। “
“जल्दी देख लो बाउजी, कहीं लड़का हाथ से निकल ना जाये।… अब मुश्किल से दो-चार बरस का जीवन है इनका, फिर आराम से रहेगी दीपाली।”
उनकी बात सुन रही, पास खड़ी कीर्ति ठहाके मारकर ज़मीन पर लोट गयी।
“….सदमा लगा है बेचारी को, जेठानी-देवरानी नहीं थी ये दोनों तो सहेलियों जैसी थी सच्ची….बहुत बुरा हुआ।”
समाप्त!
– मोहित शर्मा (ज़हन) ‪#‎mohitness‬ ‪#‎mohit_trendster‬ ‪#‎freelance_talents‬

नवीन रंजिश – मोहित शर्मा (ज़हन) #mohit_trendster

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यह कहानी है दो खानदानों के बीच पीढ़ियों से चली आ रही रंजिश की, जिसका अंत देखने सुनने वालो को असंभव लगता था। बदले ज़माने के नये परिवेश में भी राणा और वर्मा परिवारों की दुश्मनी बरकरार थी, और होती भी क्यों ना? इनके पुरखों ने ना जाने कितनी आहुतियाँ दे डाली थी अब तक इन झगड़ों में। सीधे ढर्रे पर चलते जीवन में जैसे सुर्ख रंग की मिलावट की आदत पड़ गयी थी इन्हे।
आज बरसो बाद एक बार फिर से दोनों परिवार आमने सामने थे। क्या पुरुष – क्या महिला, सबकी आँखों में बरसों का रोष झलक रहा था। एक तरफ वर्मा परिवार के मुखिया भानु वर्मा, जिन्हे अपनी पीएचडी डिग्री का गुमान और दूसरी तरफ राणा परिवार के सर्वेसर्वा संग्राम राणा जिन्होंने अपने पुरखों की शान में अपनी मूँछे नहीं कटाई। पर यह ऊपरी आडम्बर किसकी तसल्ली के लिए गढ़े जा रहे थे इसका जवाब किसी के पास नहीं था?
क्या इतिहास खुद को आज दोहराने वाला था? तो क्या कहानी का एक और पन्ना खून के रंग में रंगने वाला था? जानते हैं भानु वर्मा की शान, उनके अनुज बलिदान वर्मा कि ज़ुबानी।
“अरे कुछ ना हुआ भैया जी….मैं पहले ही कह रहा था कि बात सुलटा लो पर दोनों तरफ इतने कलमुँहे, कुल्टा लोग भरे पड़े है कि नहीं जी चाहे मकान-दुकान चले जायें पर आन-बान-शान ना चली जाये। और सब लड़ने को तैयार, मेरी भी मती मारी गयी थी जो जोश में आकर अपने भईया से भी आगे कूद के आगे आ गया। वही बात है कि जब एड्रिनलिन पम्प करता है तो आदमी जम्प करता है। तेज़ बहस, ललकारों को सुनकर मुफ्त की लड़ाई देखने की आस में भीड़ इखट्टा हो गयी, जिनको देखकर पास के स्कूल से हटकर चूरन-चाट वालो ने हमारे आस-पास ठेले लगा लिए। दोनों साइड जो कुछ एक लड़ना नहीं चाह रहे थे उन्हें लगा कि इतनी भीड़ और ठेले लग गये है उन्हें निराश घर नहीं भेजना चाहिए।
जंग का आगाज़ हुआ और……आई मम्मी इतनी ज़ोर का सरिया लगा ना मेरे खोपड़े पे कि डेढ़ सेकंड में गिव-अप कर दिया मैंने और चुस्की वाले की रेहड़ी की टेक लेके बैठ गया। लड़ाई शुरू होती इस से पहले ही गली के अपार्टमेंट की एक बालकनी जहाँ पूरी नवीन किराना स्टोर जॉइंट फैमिली संडे मूवी का प्लान कैंसल कर के हमारे युद्ध के एंटरटेनमेंट से अपने पैसे बचाने के मूड में थी, छज्जे समेत हम सबके ऊपर डह गयी।
संग्राम राणा परं ईंटो की बरसात हो गयी, जिसमे से एक ईंट ने घिसट कर उसकी मूँछ को नेस्तोनाबूद कर दिया। मेरे बड़े भ्राता भानु के खोपड़े पर नवीन किराना वालो कि नववधु का घुटना ऐसा लगा कि वह पीएचडी डॉक्टर से सीधा सातवी कक्षा वाले हो गए। ऊपर किसी कि गंदी नाली का पाइप चोक था वो टूटकर हमारी बहु-बेटियों का मेकअप धो गया।
किसकी टांग कौनसी है, किसकी कोहनी किसके पेट में चुभ रही है….कुछ पता नहीं। दुश्मनो के जो मुँह एक दूसरे को देखना तक पसंद नहीं करते थे वो मलबे के नीचे कामुक मुद्राओं दबे अनचाहे आपस में कहाँ-कहाँ चुंबन ले रहे थे। ताऊ जी जो मिलने आये थे और मज़े-मज़े में साथ आ गए और नवीन किराने वालो के कुत्ते के मुँह इस तरह मलबे में आमने-सामने पोज़ीशण्ड थे कि मदद आने तक कुत्ते से मुँह चटवाने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं था। ये जो रायता फैला इसके साफ़ होने के बाद पता चला दोनों पार्टीज की नानीयां, दादियां टकली हो गयी है। फिर किसी ने बताया की बुढ़िया के बाल वाले के कस्टमर ज़्यादा हो गए थे इसलिए उसने…..”
अंत में अस्पताल में ही सुलह हुई और दोनों परिवारो को यह बात समझ आई कि पुरानी रंजिशों को चलाते रहने में समझदारी नहीं है। अब दोनों परिवारो कि नयी रंजिश शुरू हुयी……नवीन किराना स्टोर फैमिली से।
– मोहित शर्मा (ज़हन) #mohitness #mohit_trendster #freelance_talents

लघुकथा – “दहेज़ डील” (मोहित शर्मा ज़हन)

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लघु कथा – “दहेज़ डील” (from ‘Bonsai Kathayen’ collection) 

कसबे का लड़का लग गया मोबाईल टावर लगाने और उसकी मरम्मत करने वाली कंपनी मे। तनख्वाह भी अच्छी और घर से भी ठीक-ठाक। कसबे कि जवान लडकियाँ (जो उसकी जाति की थी) उनके माँ-बाप के लिए वो लड़का सोने की खान था। ऐसे ही एक आशावान माँ-बाप अपना भाग्य आजमाने लड़के के घर पहुँचे।

कसबे भर मे लगातार मिल रहे मुफ्त के सम्मान से लड़के के परिवार के भाव बढ़ गए थे।

लड़के की माँ – “हम्म …लड़की तो सुन्दर है पर दहेज़ का क्या रहेगा?”

लड़की के पिता – ” ….जी! बारहवी के बाद कम्पूटर कोरस भी किया है, ढाई हज़ार कमा रही है स्कूल मे। सारे काम कर लेती है। वो शादी अच्छे से करेंगे …और ..”

लड़के के पिता – ” ….हाँ जी! पर दहेज़ का भी तो बताइए …”

लड़की की माँ – “जी …देने को तो ज्यादा कुछ नहीं है. ..पर ..”

लड़के की माँ -” फिर तो जी मुश्किल है …”

लड़की के पिता – “वकील साहब स्टेशन के पास ज़मीन है थोड़ी और थोड़े घर के पास कुछ खेत है।”

लड़के के माता-पिता ज़मीन सुनकर खुश हो गए।

“तो आप ज़मीन दोगे बेटी के साथ ….”

लड़की के पिता – “नहीं जी, आप बेटे जी से कह कर 2-3 टावर लगवा दो मोबाइल वाले हमारी ज़मीन और खेतो मे। उनके जो हर महीने 20-22 हज़ार आयेंगे वो आप लोगो के …”

– मोहित शर्मा (ज़हन) ‪#‎mohitness‬ ‪#‎mohit_trendster‬