कुपोषित संस्कार (व्यंग) #ज़हन

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वर्ष में एक बार होने वाले धार्मिक अनुष्ठान, हवन के बाद अपने अपार्टमेंट की छत पर चिड़ियों को पूड़ी-प्रसाद रखने गया तो 150 पूड़ियाँ देख के मन बैठ गया कि मेरी पूड़ी तो इतनी कुरकुरी भी नहीं लग रही जो बाकी डेढ़ सौ को छोड़ कर कोई कौवा या चिड़िया इसमें कुछ रूचि ले। फिर कुत्ते और गाय को नीचे ढूंढ़ने निकला ही था कि कुछ पडोसी मिल गए जो मेरी तरह प्रसाद लिए नीचे आ रहे थे। सोसाइटी के बाहर आवारा कुत्ते जो अपनी टाँगे ऊपर कर अलग-अलग कोण पर शवासन में पड़े थे, हम लोगो को देख कर दौड़ पड़े। उनका थुलथुल मुखिया जिसकी थूथन से लेकर पूँछ की नोक तक गोलकोण्डा छाप मेटीरियल से बनी थी, ऐसा भागा है ना भाईसाहब…जैसे पहले फिल्मों के क्लाइमेक्स में मौत के डर से अमरीश पुरी नहीं भागता था हांफता हुआ…वैसे! कुत्ते तो कुत्ते, पिल्लै तक हाथ नहीं आये। कोई ढलान पे लुढ़कता चला गया, कोई नाली में घिसट गया…पता नहीं किस बात की इतनी दहशत? हमने सोचा चलो गाय मिल जायेगी इनको बाद में देखते हैं। थोड़ा चले तो कुछ लोग पूड़ी लिए भाग रहे थे और उनके आगे कुत्तो वाली दहशत आँखों में लिए 2 गईया भागी जा रही थी। सामने अपार्टमेंट के अंकल जी अपना पेट पकडे बैठे थे। “कैसे हुआ?” पूछने पर पता चला कि जब ये ज़बरदस्ती कोशिश कर रहे थे तो गाय ने अपना कुंद सींग मार दिया। चलो ठीक ही हुआ इस बहाने इनका लिवर भी चेक हो जाएगा। अगले गेट पर एक गाय बेहोश पड़ी थी।

हद है! “आज हो क्या रहा है?” वैसे मैंने यह बात यूँ ही बोली थी, उस से पूछा तो नहीं था पर 4 लोगो के सामने गार्ड का बताने का / स्टाइल मारने का मन कर रहा होगा तो वो बोला – “सर! एकसाथ इतना खाने की आदत नहीं है ना बेचारी को, इसलिए महीने भर का नाश्ता खा के होश फाख्ता हो गए इसके। सोसाइटी में इतने अपार्टमेंट के चार-पांच सौ घरो से जो खाने की सुनामी आई है उसमे यहाँ के गिने-चुने कुपोषित गाय-कुत्ते बह गए हैं…कुछ तो ख़ुशी के मारे पागल ही हो गए हैं। कोई आधे घंटे से बजरी में लोट रहा है, कोई गरम तारकोल के कनस्टर में पीठ रगड़ रहा है, कोई ई-रिक्शा के पीछे की निन्नी सी जगह में बैठ के स्टेट बॉर्डर पार ही चला गया, किसी की मम्मी नाले के पाइप में फंस गयी हैं…ये सब जानवर ओवरवेल्म हो गए हैं और पक्षी लोग तो आते ही नहीं सर अब इस एरिया में। आप ऐसा करो, 26 किलोमीटर दूर राज्य का बॉर्डर पार कर के कुछ गांव शुरू होते हैं वहां मिल जायेंगे आपको सब जीव-जंतु…और जब जा ही रहे हो तो उस कुत्ते को ले आना जो ई-रिक्शा में बैठा चला गया, रात में जगा रहता है कम से कम…”

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*आप सभी से निवेदन है कि अपनी क्षमता अनुसार आस-पास के जीवो का ध्यान रखें, किसी विशेष अवसर, उपलक्ष्य की प्रतीक्षा में न रहें।*

समाप्त!

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Read लालच का अंकुर (कहानी)

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लालच का अंकुर (कहानी) #ज़हन

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वास्तु वन्य अभयारण्य की खासियत उसके तरह-तरह के पशु, पक्षी थे। इतने कम क्षेत्रफल में इतनी अधिक विविधता पर्यटकों को लुभाती थी क्योंकि उन्हें पता था कि यहाँ आने पर उन्हें कई जंगली और लुप्तप्राय जानवर ज़रूर दिखेंगे। वास्तु अभयारण्य की दुर्गम स्थिति और अच्छी सुरक्षा के कारण अभी तक यह स्थान तस्करों, शिकारियों से बचा हुआ था। अभयारण्य के पास ही हाथी-महावतों की बस्ती थी जो पर्यटकों और वन अधिकारीयों को अनुज्ञप्त जंगली क्षेत्र में घुमाते थे। 12 महीने मेहनत के बाद भी मुश्किल से सभी महावत परिवारों का गुज़ारा चलता था। अपने पशु साथियों से महावतों का प्रेम ऐसा था कि चाहे अपने लिए कुछ कम पड़ जाए पर हाथियों को कोई कमी नहीं होनी चाहिए। एक बार किसी महावत ने लालचवश हाथीदांत के लिए तस्कर से संपर्क किया, जब यह बात बस्ती में फैली तो उसे वन अधिकारीयों के हवाले कर दिया गया और उसके परिवार को बस्ती से निकाल दिया गया।

बस्ती का कोई मुखिया नहीं था पर 2-3 वृद्ध महावतों की बात सब मानते थे, जिनमे से एक का नाम था सुमंकुट्टी। जंगल में कुछ चेक पोस्ट्स का निर्माण कार्य चल रहा था, जिसके शोर से उनके 2 हाथी भटक गए और उनमे से एक का शरीर बिजली के तार से छू गया। तेज़ करंट लगने से वो हाथी मरणासन्न अवस्था में पहुँच गया। उसके चारो ओर बैठे डेढ़ दर्जन महावत और उनके परिवार शोक में डूबे थे। कुछ देर बाद सुमंकुट्टी के लड़के सूर्यकुट्टी ने उनके कान मे कुछ कहा। अपने लड़के की बात सुनकर वो आगबबूला हो गए और छड़ी से सूर्यकुट्टी की पिटाई करने लगे। लोगो के पूछने पर उन्होंने बताया कि उनका पुत्र मरने वाले हाथी के दांत तस्करो को बेचने की बात कर रहा है ताकि कुछ पैसे आ सकें।

अपने संगी-साथियों की शंका भरी नज़रों को भांप कर सुमंकुट्टी बोले, “आप लोगो ने पहले इक्का-दुक्का हाथीयों के मरने पर भी ऐसे सवाल किये हैं कि जब हाथी मर गया तो उसके दांत को बेचें या ना बेचें क्या फर्क पड़ता है, जो तब मैंने टाल दिए या सही से सबको समझा नहीं पाया। बात मृत हाथी या जीवित हाथी की नहीं है। एक बार तस्कर उद्योग रुपी शेर के मुँह में खून लग गया तो हमारे हाथी और यह पूरा अभयारण्य उनकी नज़र में आ जाएगा, वो नये हथकंडे, लालच लेकर आयेंगे और फिर यह वास्तु पशु विहार केवल नाम का अभयारण्य रह जाएगा…हमारे अलावा सरकार क्या करती है उसपर हमारा बस नहीं पर अपने से जितना ज़्यादा हो सके उतना अच्छा इसलिए लालच का अंकुर फूटने से पहले ही बीज हटाना बेहतर है। “

समाप्त!

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Other Titles: अन-अंकुरित, अन-अंकुरण 
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काश में दबी आह! (कहानी) #ज़हन

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स्कूल जाने को तैयार होती शिक्षिका सुरभि पड़ोस के टीवी पर चलता एक गाना सुनकर ठिठक गई। पहले इक्का-दुक्का बार उसे जो भ्रम हुआ था आज तेज़ गाने की आवाज़ ने वो दूर कर दिया। जाने कब वो सब भूलकर सुनते-सुनते उस गाने के बोल पड़ोस के घर के गेट से सटकर गुनगुनाने लगी। अपनी धुन में मगन सुरभि का ध्यान पडोसी की 4 साल की बेटी पीहू के अवाक चेहरे पर गया और वह मुस्कुराते हुए सामान्य होकर वहाँ से स्कूल की तरफ बढ़ चली। आज स्कूल में सुरभि का मन नहीं लग रहा था, वो तो यादों के सागर में गोते लगा रही थी। किस तरह वह अपने गायक, गिटारिस्ट बॉयफ्रेंड घनश्याम के गानों, रियाज़ को घंटो सुना करती थी। उसके दर्जनों गानों के बोल सुरभि को आज भी याद थे।

ज़िन्दगी को सुलझाते हुए जाने कब दोनों का रिश्ता उलझ गया और अपने सपनो का पीछा करता घनश्याम सुरभि से अलग हो गया। सुरभि में अपने परिवार से बग़ावत करने की हिम्मत नहीं थी। दूर जाने का दर्द तो दोनों को बहुत था पर अक्सर चल रहे पल इंसान के सामने कुछ ऐसे दांव रखते हैं कि बीते लम्हों की याद आने में काफी समय लग जाता है। कभी दो जिस्म, एक जान यह जोड़ा अब एकल जीवन में व्यस्त एक-दूसरे के संपर्क में भी नहीं था।  दोनों का लगा शायद वक़्त एक मौका और देगा पर कुछ सालों बाद सुरभि की शादी हो गई। आज वो खुश थी कि देर से सही पर कम से कम उसके पूर्व प्रेमी को अपनी मंज़िल तो मिली। शाम को लौटकर सबसे पहले उसने इंटरनेट पर इन गानों और घनश्याम का नाम ढूँढा। सुरभि हैरान थी कि इन गानों के साथ घनश्याम का नाम कहीं नहीं था। उसे लगा शायद घनश्याम ने मायानगरी जाकर अपना नाम बदल लिया हो पर गायको, म्यूजिक टीम की तस्वीरों, वीडिओज़ में घनश्याम कहीं नहीं था। सुरभि के आँसुओं की धारा में एक से अधिक दुख बह रहे थे। प्यार को जलाकर रिश्ते की आँच पर जो सपने पकायें थे उनके व्यर्थ जाने का दुख, घनश्याम की तरह हिम्मत ना दिखाने का दुख, उसका प्रेमी ज़िंदा भी है या नहीं यह तक ना जान पाने की टीस…

उधर लालगंज से दूर फ़िरोज़ाबाद में चूड़ी की दूकान पर खरीददार महिला को कंगन पहनाते घनश्याम के कानो पर रेडियो में किसी और द्वारा गाये अपने गानों का कोई असर नहीं पड़ रहा था। उसकी आँखों की तरह उसकी बातें भी पत्थर बन चुकी थीं।

समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन

टीनएज ट्रकवाली (कहानी) #ज़हन

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थाने में बैठा कमलू सिपाहियों, पत्रकारों और कुछ लोगो की भीड़ लगने का इंतज़ार कर रहा था ताकि अपनी कहानी ज़्यादा से ज़्यादा लोगो को सुना सके। पुलिस के बारे में उसने काफी उल्टा-सुल्टा सुन रखा था तो मन के दिलासे के लिए कुछ देर रुकना बेहतर समझा।

“हज़ारो किलोमीटर लम्बा सफर करते हैं हम ट्रक वाले साहब! एक बार में पूरा देश नाप देते हैं। जगह-जगह रुकता हूँ, सब जानते हैं मुझे। आपके थाने में 4 ढाबे पड़ते हैं पर रात में केवल एक खुला मिलता है तो अक्सर यहाँ रुकना होता है। एक बार उसके अगले पेट्रोल पंप के बाहर बैठी एक लड़की देखी, यहाँ की नहीं लग रही थी और पता नहीं रात को वहाँ क्या कर रही थी…या शायद मुझे पता था पर मैं मानना नहीं चाहता था। अगली बार जब आया तो वह लड़की मरी आँखों वाली एक औरत  बन गई थी। सोचा ‘काश उस दिन रुक जाता! पर रुककर, कर भी क्या लेता…रुक के देख तो ले पगले…शायद कुछ हो जाए।’ लोगो और पुलिस की नज़रों से बचने के लिए पेट्रोल पंप वाला धंधे पर एक-दो लड़कियाँ ही रखता था, जब किसी की नज़र पड़ती भी थी तो उसपर पैसे डाल दिया करता। पहले आप लोगो को बताया तो मुझे बाहर से ही भगा दिया फिर अपने जमा रुपयों से ये लड़की खरीदी और हेल्पर हटाकर इसे रख लिया। कुछ हफ्तों बाद यहाँ से जाते हुए एक लड़की दिखी, आदत ऐसे थोड़े ही जाती है। मैंने पंप के मालिक को समझाने की बहुत कोशिश की पर वो नहीं माना, उल्टा मुझे बेची लड़की ज़बरदस्ती वापस लेने की बात करने लगा। किसी तरह वो लड़की भी खरीदी, अब मेरी 2 हेल्पर हो गयीं। फिर महीनेभर बाद के चक्कर में एक और…मैंने कह-कहा के अपने एक दोस्त की शादी उस से करवा दी। जब अगले चक्कर में नई लड़की खड़ी दिखी तो रहा नहीं गया। मोड़ दिया ट्रक पेट्रोल पम्प की ओर और कुचल दिए उसके मालिक और 3 नौकर। फिर एक्सिलरेटर दबा के कूद गया बाहर, ट्रक लड़ा पेट्रोल टंकी में और ब्लास्ट हो गया।”

एक पत्रकार ने पूछा, “यह सही रास्ता नहीं है….तुम्हारे पागलपन में 2 निर्दोष लोग मारे गए और कुछ घायल हुए उनका क्या?”

कमलू मुस्कुराकर बोला – “उनका कुछ नहीं….जैसे रोज़ सबके सामने बिकती इन लड़कियों का कुछ नहीं। सही रास्ते पर चलकर देख लिया बाबू! कहीं नहीं जाता, बस गोल-गोल घुमाते हो तुम लोग और आदमी थक-हार कर लड़ाई छोड़ देता है।”

वह पत्रकार साथी पत्रकारों के सामने अपनी इतनी आसान चेक-मेट कैसे मान लेता, “अब इन लड़कियों का क्या होगा? इतनी ही फ़िक्र थी इनकी तो यह काम करने से पहले इनका तो सोचा होता।”

कमलू – “बाकी 15-16 की हैं पर इनमे एक 19 साल की है, उसको थोड़ा सिखाया है और लाइसेंस दिलवा दिए हैं। अभी छोटे रुट पर ट्रक चलाएगी बाकियों को बैठाकर।”

पत्रकार – “लाइसेंस दिलवा दिए हैं मतलब ट्रक के अलावा और क्या चलाएगी?”

कमलू – “ज़रुरत पड़ने पर बंदूक भी चलाएगी….”

समाप्त!

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जीत का समझौता (कहानी)

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इंटरकॉन्टिनेंटल कप के पहले दौर में हारकर बाहर होने के बाद पापुआ न्यू गिनी क्रिकेट खेमे के एक कोने में 2 खिलाडियों के बीच गंभीर वार्ता चल रही थी।

“आप जब खुद यह टीम नहीं छोड़ रहे हैं तो मुझसे ऐसा करने के लिए क्यों कह रहे हैं?” परेशान होकर मेज़ के कोने को मसलने की कोशिश करते क्रिकेटर पॉल ने अपने गुरु जैसे सीनियर जिम्मी से पूछा।

जिम्मी सोच रहा था कि किस तरह ऐसे वाक्य गढ़े जो पॉल की चिंता को कम करें। फिर अपने निर्णय का ध्यान करते हुए वह बोला – “मुझे पापुआ न्यू गिनी में क्रिकेट का भविष्य नहीं दिखता। बाहर निजी क्रिकेट लीग्स में तुम जैसे खिलाडियों को अच्छे अवसर मिलते हैं।”

पॉल – “आप मुझसे बेहतर क्रिकेट खेलते हैं। तो अकेले मेरे जाने का क्या मतलब?”

जिम्मी – “बात को समझो पॉल! तुम अभी से बाहर जाकर संघर्ष करोगे तब जाकर कुछ सालों बाद उसका फल मिलेगा। यहाँ से निकलने में जितनी देर करोगे उतना ही बाहर की लीग्स में सफल होने की सम्भावना कम हो जायेगी। दो साल बाद वर्ल्ड कप क्वालिफाइंग टूर्नामेंट है, जिसमे पापुआ न्यू गिनी के जीतने की और अपना एक दिवसीय दर्जा बचाने की ना के बराबर उम्मीद है। मैंने किशोरावस्था से 2 दशक से अधिक इस देश के क्रिकेट में लगाएं हैं। ना के बराबर ही सही पर दशमलव में कुछ उम्मीद तो है? बस उसी के लिए रुका हूँ…पर तुम्हे यह सलाह नहीं दूंगा।”

पॉल – “आप मेरे आदर्श रहे हैं…”

जिम्मी – “मुझे अपना आदर्श क्रिकेट मैदान के अंदर तक मानो, उसके बाहर अपनी स्थिति अनुसार बातों को समझो और करो। तुम देश के बाहर जाकर किसी विदेशी टीम में नाम कमाओगे तो भी इसी देश के वासी कहलाओगे, इस धरती का नाम रोशन करोगे, क्रिकेट के टैलेंट स्काउट्स तुम्हारे नाम का हवाला देकर यहाँ नए खिलाड़ी खोजने आयेंगे। हारे हुए संघर्ष से बेहतर जीता हुआ समझौता है।”

पॉल के झुके सिर को हामी में हिलता देख जिम्मी ने खुद को दिलासा दिया कि इस डूबते जहाज़ से उसने एक यात्री को बचा ही लिया।

समाप्त!

#ज़हन

तेरे प्यार के बही-खाते…(नज़्म) #ज़हन

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जुबां का वायदा किया तूने
कच्चा हिसाब मान लिया मैंने,
कहाँ है बातों से जादू टोना करने वाले?
तेरी कमली का मज़ाक उड़ा रहे दुनियावाले…
रोज़ लानत देकर जाते,
तेरे प्यार के बही-खाते…

तेरी राख के बदले समंदर से सीपी मोल ली,
सुकून की एक नींद को अपनी 3 यादें तोल दी।
इस से अच्छा तो बेवफा हो जाते,
कहीं ज़िंदा होने के मिल जाते दिलासे।
जाने पहचाने रस्ते पर लुक्का-छिपी खिलाते,
तेरे प्यार के बही-खाते…

फिर तेरे हाथ पकड़ आँगन से आसमान तक लकीरें मिला लूँ,
दिल पर चेहरा लगा कर नम नज़रों से तेरा सीना सींच दूँ…
पीठ पीछे हँसने वालो के मुँह पर मंगल गा लूँ,
इस दफा फ़रिश्ते लेने आयें…तो पीछे से टोक लगा दूँ।
काश अगले जन्म तक बढ़ पाते,
तेरे प्यार के बही-खाते…

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Last Nazm in Kavya Comic Jug Jug Maro

Jug Jug Maro #2 – Nashedi Aurat (Alcoholic Woman)

Cover

 जुग जुग मरो #2
नशे, दारु की लथ में अपना पति खो चुकी औरत नशे में ही उसे ढूँढ रही है और पूछ रही है ऐसी क्या ख़ास बात है नशे में जो कितनी आसानी से कितनी ज़िन्दगीयां लील लेता है। इस बार एक कविता और एक नज़्म के साथ पेश है – नशेड़ी औरत! (काव्य कॉमिक्स)
Illustrator – Amit Albert
Poet, Script – Mohit Trendster
Colorist – Harendra Saini
Letterer – Youdhveer Singh

Read or Download 
(Combined Part 1-2 Ecomic available on Google Play, Google Books, Readhwhere, Dailyhunt, Scribd, AuthorStream, ISSUU, Archives and other major ebook websites)

अंतर (लघु कहानी) #ज़हन

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पुलिस निरीक्षक शलभ कुमार को टी.ए. अलाउंस भरते देखे उनके साथी ने उन्हें टोका।

“क्या यार जब देखो कोई ना कोई फॉर्म भरते रहते हो या साहब के दफ्तर भागते रहते हो। साल भर के काम की रेटिंग में 2-4 नंबर ज़्यादा पा जाओगे तो कहाँ तीर मार लोगे। तुम भी यहीं उतनी दौड़-भाग कर रहे हो और बाकी तुम्हारे समकक्ष लोग भी। थोड़ा एन्जॉय करो लाइफ! अब तक 50 बार फॉर्म भरते देखा होगा तुम्हे जिसमे से सालों बाद कोई एक-दो अलाउंस मिला होगा डेढ़-दो हज़ार का, इस से बढ़िया रिलैक्स करते। सरकारी नौकरी है, सब सेट है और क्या चाहिए?”

शलभ ने हँस कर बात टाल दी। कुछ वर्षो बाद जब शलभ का बैच सेवानिवृत्त होने वाला था तब उसके साथ के सभी अधिकारी उस से एक या दो रैंक नीचे थे, साथ ही शलभ की पेंशन उनके कई साथियों से 15-20 हज़ार रुपये प्रति माह अधिक तय होने वाली थी। 37 वर्षों की नौकरी में हर वर्ष जो 2-3 नंबर, इंसेंटिव शलभ ने बिना कोताही जुटाये थे उसका फल उसे अब मिल रहा था। उस बैच के कुछ अफसर अपनी पेंशन 3-4 हज़ार बढ़वाने की उम्मीद में  नौकरी के अंतिम महीनो में रिकॉर्ड की नेगेटिव एंट्रीज़ हटाने की भाग-दौड़ में लगे हुए थे।

समाप्त!

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माहौल बनाना (कहानी) #ज़हन

15578850_1199889026770473_6364765217519918854_nArt – Harikant Dubey

वृद्ध लेखक रंजीत शुक्ला की अपने पोते हरमन से बहुत जमती थी। जहाँ नयी पीढ़ी के पास अपनों के अलावा हर किसी के लिए समय होता है वहाँ हरमन का रोज़ अपने दादा जी के साथ समय बिताना जानने वालो के लिए एक सुखद आश्चर्य था। बातों से बातें निकलती और लंबी चर्चा खिंचती चली जाती। एक दिन हरमन ने रंजीत से पूछा कि उन्हें अपने जीवन में किस चीज़ का मलाल है।

रंजीत गंभीर मुद्रा में कुछ सोचकर बोले – “कठिन सवाल है! इतने वर्षो में जाने कितनी गलतियाँ की हैं जिनपर सोचता हूँ कि उस समय कोई और निर्णय लिया होता तो अबतक जीवन कितना अलग होता फिर सोचता हूँ कि जिन बातों पर पछता रहा हूँ अगर वो ना की होती तो क्या आज, अबतक ‘मैं’ वाकई ‘मैं’ रहता? एक राह चुनने पर दूसरी राहों को छोड़ने का मलाल स्वाभाविक है।”

हरमन – “यानी मलाल हैं भी और नहीं भी? बड़ी अजीब स्थिति हो गयी ये तो। मुझे लगा जीवन के इस पड़ाव पर आपका हर जवाब निश्चित हो गया होगा।”

रंजीत – “वैसे एक चीज़ और रह गई। अपनी ज़िन्दगी के एक बड़े हिस्से मेरी एक आदत के कारण मैंने अनेक अवसर गंवाएं होंगे। वो आदत थी, किसी भी काम को करने के लिए माहौल बनाने की आदत।”

हरमन – “मैं समझा नहीं! माहौल मतलब?”

रंजीत – “मतलब हर बड़े काम को करने या महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले सभी बातें मेरे अनुकूल बनाने या उनके अनुकूल होने का इंतज़ार करना। मान लो मुझे कार खरीदनी है। तो कभी मार्किट के ठीक होने का इंतज़ार करना, कभी नौकरी बदलने या प्रमोशन की बाट जोहना, कभी सोचना इस शहर के हिसाब से मेरी पसंद की गाडी ठीक नहीं…एक बात को इतना टाल देना कि या तो वो साकार ही ना हो पाए या उसके पूरे होने पर मज़ा ना आये, एक अधूरापन लगे। इसी तरह किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में, घर लेने के निर्णय में, कोई किताब शुरू करने से पहले या निवेश में सभी आंतरिक और बाहरी घटकों के मेरे हिसाब से हो जाने का इंतज़ार करना। कभी कभार ऐसा करना गलत नहीं पर इसे एक आदत बना लेने से हम अपनी मेहनत से अधिक अपने भाग्य के भरोसे बैठ जाते हैं क्योकि जो बस के बाहर है उस स्थिति पर मन मसोस कर रह जाना सही नहीं।”

हरमन – “चलिए, मैं आज यह शपथ लेता हूँ कि पार्टी के अलावा कहीं माहौल नहीं बनाऊंगा…हा हा हा।”

समाप्त!

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शाकाहारी मनोज का मांसाहारी बदला (कहानी) #mohitness

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Artwork – Kedar Naik

पंखे की आवाज़ से ध्यान हटाकर मनोज कुछ महीनो पहले की अपनी मनोस्थिति सोच रहा था। तब गाँव से शहर आकर पढाई और सरकारी नौकरियों की प्रतियोगी परीक्षाओं तैयारी करना मनोज को जितना कठिन लग रहा था, असल में उतना था नहीं। यहाँ बने घनिष्ठ मित्रों, शिक्षको के सहयोग से मनोज का सफर कुछ आसान हो गया था। हालांकि, कुछ बातों में उसका मत और पसंद अपने मित्रो के समूह से अलग होते थे। अक्सर उसके दोस्त उसे मांसाहार खाने की ज़िद करते पर वह हमेशा उन्हें टाल देता। जब मनोज कहता कि उसने बचपन से नहीं खाया इसलिए खाने का मन नहीं होता तो उसके मित्र कहते कि “जीवन में कभी ना कभी तो कोई चीज़ पहली बार करते ही हो, यह भी कर के देख लो।” एक बार मनोज के मुँह से निकल गया कि वह पंडित है तो सब हँसते हुए बोले कि “अरे! आजकल पंडित ही तो सबसे ज़्यादा खाते हैं।” बहस करने और उसमे जीतने की मनोज को आदत नहीं थी। ऐसी कोई स्थिति आने पर वह असहज होकर वहाँ से निकलने के बारे में सोचता रहता था।  उसके घर के माहौल और निजी मत के अनुसार मांसाहार वर्जित था। उसे यह बात खटकती थी कि जब वह अपने दोस्तों पर मांसाहार छोड़ने के लिए दबाव नहीं डालता तो वो लोग उसके पीछे क्यों पड़े रहते हैं?

एक दिन मनोज के मित्रों ने धोखे से उसे एक मांसाहार व्यंजन, पनीर-मशरूम की ख़ास डिश कहकर खिलाया। मनोज ने जब खाने के स्वाद की तारीफ़ की तो सबने उसका मज़ाक उड़ाया और बताया कि मांसाहार खाने के बाद भी वह इंसान ही है और उस में कुछ नहीं बदला। उस जैसे इंसान मांस खाते हैं और बिना किसी परेशानी के जीते हैं। मनोज को इस बात से बड़ी ठेस पहुंची और पर उसने मित्र मंडली के सामने अपनी निराशा नहीं जताई। समय बीतने के साथ सब आगामी एग्जाम की तैयारी मे जुट गए और एग्जाम होने के बाद मनोज ने सबको अपने कमरे पर आमंत्रित किया। मनोज तरह-तरह के व्यंजन लाया था और सबने बड़े चाव से दावत का मज़ा लिया। हालांकि, धोखे से मनोज मांसाहार खा चुका था पर उसने आज अपने लिए शाकाहार व्यंजन ही रखे। दावत ख़त्म होने के बाद मनोज बोला….

“बिरयानी के साथ कुत्ते का शोरबा, छिपकली की चटनी कैसी लगी?”

इतना सुनना था कि सबके कुत्ते वाले मुँह बन गए। पहले तो मित्रो ने विश्वास नहीं किया पर फिर मनोज की मुस्कराहट देख कर कोई उल्टी करने दौड़ा तो किसी ने मनोज का गिरेबान पकड़ लिया। मनोज ने अपने दोस्तों की टोन में जवाब दिया – “चिंता मत करो…कुत्ता या छिपकली चीन, म्यांमार, ताइपे देशो में इंसानो द्वारा खाये जाते हैं और इन्हें खाने के बाद भी तुम सब इंसान ही रहोगे, तुम्हारे अंदर कुछ नहीं बदलेगा।”

समाप्त!

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