Nazm : Ab Lagta Hai (अब लगता है…) | मोहित शर्मा ज़हन

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*) – अब लगता है….

मेरे पहरे में जो कितनी रातों जगी,
कब चेहरा झुकाए मुझे ठगने लगी,
पिछले लम्हे तक मेरी सगी,
जानी पहचानी नज़रें अब चुभने लगीं।
याद है हर लफ्ज़ जो तुमने कहा था
अब लगता है….
इश्क़ निभाना इतना भी मुश्किल न था….

अटके मसलात पर क़ाज़ी रस्म निभाए,
उम्मीदों में उलझा वो फिर कि…
…पुराने कागज़ों में वो ताज़ी खुशबू मिल जाए।
जाते-जाते एक खत सिरहाने रखा था,
अब लगता है….
इश्क़ निभाना इतना भी मुश्किल न था….

कागज़ों से याद आया कभी तालीम ली थी…..
कुछ वायदों के क़त्ल पर मिले रुपयों से…
….आसान कसमें पूरी की थी।
मासूमियत गिरवी रखकर दुनियादारी खरीदी थी…
यहाँ का हिसाब वगैरह यहीं निपटा कर मरना था,
अब लगता है….
इश्क़ निभाना इतना भी मुश्किल न था….

किसी का हाथ पकडे,
गलत राह पकड़ी,
पीछे जाने की कीमत नहीं,
उनसे नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं…
आगे जाने से इंकार करता मन बंजारा,
गलत सफर तो फिर भी राज़ी,
गलत मंज़िल इसे न गंवारा….

तो मरने तक यहीं किनारे बैठ जाता हूँ,
कोई भटका मुसाफिर आये तो उसे समझाता हूँ…
दूर राहगीर की परछाई में तेरी तस्वीर बना लेता था,
अब लगता है….
इश्क़ निभाना इतना भी मुश्किल न था….
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*) – Ab lagta hai….

Mere pehre mey jo kitni raaton jagi,
Kab chehra jhukaye mujhe thagne lagi,
pichhle lamhe tak meri sagi,
Jaani pehchaani Nazren ab chubhne lagi….
Yaad hai har lafz jo tumne kaha tha,
Ab lagta hai….
Ishq nibhaana itna bhi mushkil na tha….

Atke maslaat par Qazi rasm nibhaye,
Ummeedon mey uljha wo phir ki,
Purane kagazon mey wo taazi khushboo mil jaaye,
Jaate-jaate ek khat sirhaane rakha tha….
Ab lagta hai….
Ishq nibhaana itna bhi mushkil na tha….

Kagazon se yaad aaya kabhi taleem li thi…..
Kuch vaaydo ke qatl par mile rupayon se….
….aasaan kasme poori ki thi,
Masoomiyat girvi rakhkar Duniyadaari khareedi thi….
Yahan ka hisaab wagehrah yahin nipta kar marna tha…
Ab lagta hai….
Ishq nibhaana itna bhi mushkil na tha….

Kisi ka haath pakde,
Galat raah pakdi,
Pichhe jaane ki keemat nahi,
Unse nazren milane ki himmat nahi…
Aage jaane se inkaar karta mann banjara,
Galat safar to phir bhi raazi,
Galat manzil ise na gawara….

To marne tak yahin kinare baith jaata hun,
Koi bhatka musafir aaye to usey samjhata hun…
Door raahgir ki parchaai mein teri tasveer bana leta tha….
Ab lagta hai….
Ishq nibhaana itna bhi mushkil na tha….

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Event news (March 2016)

news2

Amazing event!

Shayari #‎ज़हन

यूँ ही फिर दिल को कोई नयी बात लुभा गई,
गिचपिच, मन की संकरी गलियों से किसी पुरानी याद को हटा गई…
जो याद हटी….जाते-जाते आखरी बार ख़्वाब में आ गई…

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दुनियाभर को बकवास जिसने बताया,
वो रुखा दार्शनिक…एक बच्चे की मुस्कान पर रिझ गया…
कितने बही खाते सिफर में उलझे रहे,
और एक तस्वीर में सारा जहाँ सिमट गया…
अब याद नहीं…बेमतलब बातों में कितना वक़्त साथ गुज़ारा,
तुमसे आँखों के मिलने का पल मेरे पास रह गया….

Kuboolnama (Nazm) – Poet Mohit Sharma

कुबूलनामा (नज़्म)

 

एक दिलेर कश्ती जो कितने सैलाबों की महावत बनी,

दूजी वो पुरानी नज़्म उसे ज़ख्म दे गयी।

एक बरसो से घिसट रहा मुकदमा,

दूजी वो पागल बुढ़िया जो हर पेशी हाज़िरी लगाती रही।

मय से ग़म गलाते लोग घर गए,
ग़मो की आंच में तपता वहीँ रह गया साकी,
अपने लहज़े में गलत रास्ते पर बढ़ चले,
…..और रह गया कुछ राहों का हिसाब बाकी।

वीरानों में अक्सर हैरान करती जो घर सी खुशबू ,

आँचल में रखी इनायत घुल रही है परदेसी आबशार में…

मेरे गुनाह गिनाना शगल है जिसका,

फ़िर भी बैर नहीं करती लिपटी रोटी उस अखबार में।

रोज़ की शिकायत उनकी,

बेवजह पुराने सामान ने जगह घेर रखी….

काश अपनी नज़र से उन्हें दिखा पाता,

भारी यादें जमा उन चीज़ों पर धूल के अलावा।

उलट-सुलट उच्चारण के तेरे मंत्र-आरती चल गए,

रह गए हम प्रकांड पंडित फीके…

दुनियादारी ने चेहरों को झुलसा दिया,

उनमे उजले लगें नज़र के टीके।

समाप्त!

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Kubulnama (Nazm)

Ek diler kashti jo kitne sailaabo ki mahavat bani,

Dooji wo purani nazm jo use zakhm de gayi.

Ek barso ghisat raha mukadma,

Dooji wo pagal budhiya jo har peshi haziri lagati rahi.

Mayy se gham galaate log ghar gaye,

Ghamon ki aanch mein tapta wahin reh gaya saaki,
Apne lehze mein galat raaste par badh chale,
…..aur reh gaya kuch raahon ka hisaab baaki.

Veerano mein aksar hairaan karti jo ghar si khushboo,

Aanchal mein rakhi inayat ghul rahi pardesi aabshar mein…

Mere Gunaah ginana shagal hai jiska,

Phir bhi bair nahi karti lipti roti us akhbar mein.

Roz ki shikayat unki,

Bewajah puraane samaan ne jagah gher rakhi….

Kaash apni nazar se unhe dikha paata,

Bhaari yaaden jama un cheezon par dhool ke alawa.

Ulat-sulat uchchharan ke tere mantra-aarti chal gaye,

Reh gaye hum prakaand pandit pheeke…

Duniyadaari mein jhulse chehre,

Unme ujle lage nazar ke teeke….

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 बहुत समय बाद कुछ शायरी की है, वैसे निरंतर कुछ ना कुछ लिख रहा हूँ पर यह ब्लॉग कम अपडेट कर रहा हूँ। वैसे नेट पर मेरा पिछले कुछ महीनो का काफी काम मिलेगा।

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आज़ादी Poetry – #मोहित_ज़हन‬

बिना शिकन वो पूछ रहे “देश बर्बाद है! किस बात की आज़ादी? कैसी आज़ादी?”
कि कॉन्फिडेंस से पूरी क्रिकेट टीम पैदा कर लो….
कि सालों-दशको-सदियों पुराने “बदलो” के हिसाब में लड़-मरलो….
कि कुतिया में परिवर्तित होकर औरों का हक़ मारने में उसेन बोल्ट का रिकॉर्ड हरलो…
और ज़िम्मेदारी निभाने में ‘पहले आप – पहले आप’ करलो…
कि न्यूज़ रिपोर्ट्स से देश को कोसते हुए AC में दूध ठंडा करलो….
अपने गिरेबां में झाँको तो पाओगे तुम हिन्द नहीं सोमालिया डिज़र्व करते हो सालो!
और अजब है अपना भारत भी…
जो इतने कमीनों के होते हुए भी 200 मुल्कों में डेढ़ सौ से बेहतर है अपनी “आज़ादी”
अनगिनत पाप की आज़ादी, आस्तीन के सांप की आज़ादी!
जय हिन्द! First deserve, then desire…
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P.S. Artwork from latest Kavya Comic “Desh Maange Mujhe”
— celebrating Indian Independence

Bageshwari # 03 Magazine

bageshwari

….in Bageshwari # 03 Magazine

Sunehri jo Meera (Poem) and Dhongi Filmkaaro ki jamaat (Article) published in May 2015 edition of Bageshwari Magazine.

Google Playstore Link – http://books.google.co.in/books/about?id=wTCzCAAAQBAJ&redir_esc=y

– Mohit Sharma (Trendster) #mohitness #mohit_trendster #trendy_baba #bageshwari #rajasthan #india

Infra-Surkh Shayars vs. Life (Poetry Collection) #freelance_talents

Promo ISSvsL

A collection of poems in English, Hindi, Spanish and Urdu.

Infra-Surkh Shayars (What is Life?)
Pages: 43

Published: October 2013

ISBN: 9781311426581

Artists – Melina Dina (Melibee) :: Dr. Inayat Khan Qazi :: Mohit Sharma (Trendster)

Editor – Kamlesh Sharma

© Freelance Talents (2013), all rights reserved.
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