अक्ल-मंद समर्थक (कहानी) – मोहित शर्मा #ट्रेंडस्टर

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Scene 1) – एक हिंसक गैंगवार के बाद एक छोटे कसबे के घायल नेता को उसके समर्थको की भीड़ द्वारा अस्पताल लाया गया। डॉक्टर्स ने जांच के बाद नेता जी को मृत घोषित कर दिया।

“अरे ऐसे कैसे हमारे मसीहा को मरा हुआ बता दिया?” समर्थको का गैंगवार से मन नहीं भरा था। …..उन्होंने डॉक्टर्स को ही पीट-पीट कर मृत घोषित कर दिया। घटना के बाद अस्पताल के मैनेजमेंट ने फैसला किया कि आगे से किसी नेता, दबंग या प्रभावशाली व्यक्ति की मौत होने पर भी उसे ज़िंदा बताकर दिल्ली या पास के किसी बड़े शहर के अस्पताल रेफर कर दिया जाएगा।

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Scene 2) – ऐसे ही गैंगवार में दूसरे गुट का गंभीर रूप से घायल नेता जब अस्पताल लाया गया तब ड्यूटी पर डॉक्टर एक ऑपरेशन में व्यस्त थे। समर्थको से डॉक्टर्स का इंकार और इंतज़ार बर्दाश्त नहीं हुआ। डॉक्टर्स को भीड़ ने पीट-पीट का लहूलुहान, बेहोश कर दिया।  जब तक डॉक्टर्स होश में आये तब तक ऑपरेशन वाला पहला मरीज़ और इंतज़ार कर रहे नेता जी दोनों त्वरित इलाज के अभाव में दुनिया को टाटा कर चुके थे। समझदारी का परिचय देते हुए यहाँ के डॉक्टर्स ने दूसरे नेता जी को लखनऊ के हॉस्पिटल रेफर कर दिया।

समाप्त!

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बाइनरी मम्मी (लघुकथा) – लेखक मोहित शर्मा ज़हन

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नेत्र रोग डॉक्टर के पास, अपने 5 वर्ष के बच्चे के साथ चिंतित माँ-बाप बैठे थे।

माँ – “सीनू के पापा को मोटे वाला डबल-लेंस चश्मा लगा था तो इसे भी चश्मा ना लगे इसलिए नियमित गाजर का जूस, विटामिन और सारे घरेलु नुस्खे करती थी। फिर भी पता नहीं कैसे इसे इतनी कम उम्र में ही धुंधला दिखने लगा?”

डॉक्टर – “बच्चे को ज़रुरत से अधिक विटामिन A देने की वजह से उसे हाइपरविटामिनोसिस-ए विकार हो गया है। जिस से उसका लिवर, हड्डियां कमज़ोर हो गयी हैं और उसकी दृष्टि पर असर पड़ा है।”

महिला का पति सोचने लगा कि घर के अन्य सदस्यों में भी उसकी पत्नी ने किसी न किसी विटामिन का हाइपरविटामिनोसिस करवा रखा होगा। एक बार खुद पत्नी को किसी ने अनीमिया के लक्षण बता दिए, तबसे अब तक पता नहीं देश का कितना लोखंड खा चुकी होगी। तभी महिला की आवाज़ से उसका ध्यान टूटा।

“आज से गाजर का जूस बंद!”

समाप्त!

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Art – Shivani Ramaiah
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50 वर्ष की अनिद्रा (कहानी) – मोहित शर्मा (ज़हन)

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कुश्ती में विश्वविख्यात पहलवान शिव मोंगा बढ़ती उम्र की वजह से संन्यास ले रहे थे। उन्हें विश्व कुश्ती परिषद एवम अन्य स्थानीय, अंतर्राष्ट्रीय फेडरेशन्स सम्मानित कर रहीं थी। पत्रकारों, प्रशंषको से सवालों की बौछार हो रही थी। करियर के हर पड़ाव को याद कर शिव किस्से सुना रहे थे।

जब सवाल पूछा गया कि उनके लिए सबसे कठिन चुनौती कौन पहलवान था। तो उनके जवाब से पहले कई मशहूर पहलवानो के नाम जनता में से आने लगे जिनके साथ वर्षो तक शिव की तगड़ी प्रतिद्वंदिता चली।

“ऐसे एक नहीं दो पहलवान थे, पर जो आपने अंदाज़ा लगाया रेसलिंग में ना सर्बिया का चैंपियन ना मेक्सिको का दैत्य मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती था। गांव में निर्मल भूरा नाम के पहलवान ने मुझे खूब पटखनी दी। उन कुछ महीनो में अक्सर निर्मल से हार कर मैं इतना हतोत्साहित हो गया था कि कुछ और काम करने की सोचने लगा था, पर ऐसा होने से पहले गरीबी में वह पहलवानी छोड़ पटवारी बन गया और मैं घर के सहयोग से आगे बढ़ता चला गया। मैं चाहता तो उस वक़्त पैसो की मदद से उसको पहलवानी जारी रखवा सकता था पर मैंने ऐसा किया नहीं। दूसरा मेरा जुड़वाँ भाई विष्णु। वह मुझसे कुछ सेकण्ड्स छोटा था पर फूर्ति और दांवपेच में बहुत आगे। बचपन उसके साये में बीत रहा था। मैं तंग आ गया था उसे मिल रहे प्यार और इनामों से। 8-9 साल की उम्र में एक बार नहर में नहाते हुए उसे धक्का दे दिया और वह डूब कर मर गया। शायद ऊपर मेरा भाई, माँ-बाप और जनता मुझे माफ़ कर दें। ये मेरी आँखों के नीचे काले घेरे बचपन से हैं। 50 सालों से करवट बदलता रहा हूँ। कम से कम आज के बाद चैन से सोऊंगा।”

समाप्त!

Read New Story इंटरनेटी अफवाह (लघुकथा) – मोहित ट्रेंडस्टर

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नशीले शेड्स (लघुकथा) by Mohit Trendy Baba

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“क्या हुआ चौबे साहब, कुछ चिंतित लग रहे है?” तहसीलदार ने शहर के दानी उद्योगपति श्री लोमेश चौबे से पूछा।

चौबे जी ने गंभीर स्वर में कहा, “कुछ लोगो को शहर के रैनबसेरे, धार्मिक स्थलों आदि कहीं पर भी ठोर ठिकाना नहीं दिया जाता था उनके चाल-चलन की वजह से, ऐसे बेसहारा लोगो के लिए शहर में कुछ जगह शेड्स लगवाये थे।”

तहसीलदार उनके सामने अपने पॉइंट्स बनाते हुए बोला, “वाह! धर्मात्मा हो तो आपसा, जिनको सबने दुत्कार दिया उनके लिए आपने सोचा। वैसे कौन अभागे लोग हैं वो?”

लोमेश चौबे – “स्मैकिया-नशेड़ी-चरसी लोग, जो शेड्स लगवाये थे वहां लगे बाकी सामान के साथ बेच कर उन गधो ने उसका भी नशा कर लिया।”

यह बात सुनकर सहमे खड़े तहसीलदार की हँसी नहीं छूटी बल्कि पूरा ठहाका निकल गया। जो पॉइंट्स उसने चौबे जी की तारीफ़ करके बनाये थे उनसे ज़्यादा कट कर उसका अकाउंट माइनस मे चला गया। इधर चौबे जी की ज़मीन पर खुले आकाश के नीचे नशेड़ी लोट लगा रहे थे, ऐसी लोट लोग अपने बाप के यहाँ भी नहीं लगाते।

समाप्त!

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किस्मत से कुश्ती – लेखक मोहित शर्मा ज़हन

छोटे द्वीप समूहों से बने एक गरीब देश के आधा दर्जन खिलाडियों और दर्जन भर स्टाफ के दल में पदक की उम्मीद किसी खिलाडी से नहीं थी, ओलम्पिक में क्वालीफाई करना ही उनके सबके लिए बड़ी बात थी। उनमे एक महिला कुश्ती पहलवान जोएन का लक्ष्य था बेहतर से बेहतर करते हुए स्पर्धा में दूर तक जाना। उसके साथी देशवासी शुरुआती चरणो में ही बाहर हो गए और 4 राउंड्स जीत कर जोएन अपने भार वर्ग के सेमी फाइनल्स में पहुँच गयी। यहाँ उसका सामना पूर्व चैंपियन अमेरिकी पहलवान मार्था से था। मुक़ाबला तगड़ा और बराबरी का चला जिसमे मार्था ने बातों और चीप दावों से जोएन को विचलित करने की भरसक कोशिश की, मैच में बीच-बीच में अपनी संभावित हार देख रही परेशान मार्था की विवशता और गुस्सा साफ़ दिख रहे थे। अंततः परिणाम निर्णायक मंडल में मतभेद के साथ लगभग बराबरी का रहा जिसमे एक पॉइंट के मार्जिन से मार्था को विजय प्रदान की गयी।
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जीत के नशे में चूर मार्था निराश जोएन का मज़ाक बनाती और अपशब्दों की बौछार करती निकल गयी। कांस्य पदक के मुकाबले से पहले केवल एक मैच के लिए जोएन को एक प्रायोजक मिल गया। पर 2 सपोर्ट स्टाफ सदस्यों को छोड़ कर देश के कैंप के बाकी लोग पहले ही स्वदेश लौट गए थे। सीमित साधनो और बदले कड़े माहौल में इतने दिन रहने के कारण जोएन की तबियत मैच से पहले बिगड़ गयी। पैसो के लालच में वह मैच में उतरी और तगड़ी प्रतिद्वंदी ने आसानी से उसे हरा दिया। इसके बाद मार्था ने इस वर्ग का स्वर्ण पदक अपने नाम किया।
कुछ वर्षो बाद कई अन्य उपलब्धियाँ बटोर चुकी मार्था का नाम विश्व के महानतम और अमीर एथलीट्स में लिया जाता है और जोएन ने अपने देश लौटकर प्रायोजक से मिले पैसों से वो फल-सब्ज़ी की दुकान खरीद ली जो वह पहले किराये पर लेकर चलाती थी। उस ओलम्पिक के बाद जोएन फिर कभी किसी कुश्ती प्रतियोगिता में नहीं दिखी।
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क्रॉस कनेक्शन (लघुकथा) – मोहित ट्रेंडस्टर

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बगल के घर से आती आवाज़ों को सुन सुमेर सोच रहा था कि लोगो को उसके पडोसी मनसुख लाल की तरह नहीं होना चाहिए जो अपने परिवार की खातिर और कानून के डर से अपनी हिंसक बीवी सुशीला के हाथो पिटता रहे और कानो मे काँच सा घोलते तानो को ताउम्र सहता चला जाये। इधर शाम को आसमान को एकटक निहारते अपने पडोसी को देख कर मनसुख लाल सोचने लगा कि लोगो को सुमेर कुमार जैसा नहीं होना चाहिए जो पत्नी राधा के 2-4 तानो को अपनी मर्दानगी पर ले उसे दोमंज़िल से नीचे फ़ेंक दें और फिर हादसे का बहाना बना कर जीवन भर कोमा में पड़ी बीवी का बिल भरता रहे, ससुराल वालो से केस लड़ता रहे। तीसरे-चौथे पडोसी आपस में बातें कर रहे थे कि सुमेर की शादी सुशीला से होनी चाहिए थी और मनसुख का बंधन राधा से बंधना चाहिए था, तब कम से कम एक जोड़ा सुखी रहता और सुमेर -सुशीला के भी दिमाग ठिकाने रहते।
समाप्त!
टिप्पणी – जीवन में संतुलन हमेशा पूरा व्यक्तित्व बदल कर नहीं बल्कि अक्सर व्यक्ति में कुछ गुण, व्यवहार बदल कर भी लाया जा सकता है।
– मोहित शर्मा (ज़हन)
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