Podcast: Views on Antiziganism/Antigypsyism (Hindi) – Mohit Trendster

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दुनिया भर में फैले रोमा, सिंटी समुदाय (जिन्हें जिप्सी भी कहा जाता है), के साथ सदियों से हो रहे भेदभाव और अत्याचार पर मेरे कुछ विचार। इस समस्या से जुड़े कुछ और मुद्दे आगे रखने की कोशिश करूँगा। इस से पहले रोमा लोगो पर “सभ्य रोमानी” बंजारा और “उदार प्रयोग” नामक 2 कहानियां लिखा चुका हूँ। – मोहित शर्मा ज़हन
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जीवन दण्ड (कहानी) – Mohit Trendster

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ढेरी नामक तटीय क्षेत्र के जंगल में मानव सभ्यता से दूर टोमस जंगली प्रजाति रहती थी। अब तक दुनिया में ऐसी गिनी-चुनी प्रजातियां रह गयीं थी जिनका मानव सभ्यता से कोई संपर्क नहीं हुआ हो। किसी भी संपर्क की कोशिश पर टोमस जंगली बेहद आक्रामक हो जाते और इनकी सुरक्षा के लिए सरकार या सेना को पीछे हटना पड़ता। समय के साथ प्रगति करते देश में विदेशी निवेशकों और उद्योगपतियों का प्रभाव बढ़ने लगा। कुछ वर्षों बाद एक प्रभावशाली उद्योगपति की नज़र उस जंगल और तटीय क्षेत्र पर पड़ी। वहाँ मिलने वाले कुछ खनिजों का उत्खनन उसकी संपत्ति कई गुना बढ़ा सकता था पर उसके रास्ते में थी टोमस प्रजाति। समय के साथ सरकार का रुख बदला और उद्योगपति ने छद्म रूप से टोमस जंगलियों को खत्म करवाना शुरू किया। साम-दाम-दण्ड-भेद के बल पर 1-2 वर्षों में टोमस प्रजाति के सौइयों लोगो को मारा गया और बाकी बचे जंगलियों ने अपनी सुरक्षा के लिए आस-पास के क्षेत्रों में प्रवास कर लिया।

अपनी सफलता पर इतराता वह कॉर्पोरेट माफिया उस क्षेत्र में बहुत सा निवेश ले आया और जंगल के बड़े हिस्से की कटाई के साथ खनन कार्य शुरू किया। गाहे-बगाहे उसे, उसकी टीम या मज़दूरों को वो जंगली दिख जाते तो जंगली घूरते हुए कुछ मंत्र पढ़ देते। ये लोग ऐसे जंगलियों को हँसी में टाल जाते। कुछ महीनों बाद 8 रिक्टर स्केल का भूकंप और सुनामी आई जिस से खनन के लिए हुआ सारा इंतेज़ाम तहस-नहस हो गया और उत्खनन कार्य मे लगे कई लोग मारे गए। बड़े भौगोलिक परिवर्तन में उस तटीय क्षेत्र और जंगल का एक बड़ा हिस्सा जलमग्न हो गया और साथ ही उस उद्योगपति का सारा निवेश डूब कर उसे कंगाल बना गया। कर्जदारों से बचने के लिए उसने आत्महत्या करने की ठान ली पर अपने हाथों से अपनी जान लेने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। अपराधबोध-ग्लानि से भरे उस व्यक्ति ने प्रजाति के प्रमुख के सामने समर्पण कर दिया कि वो तो उसे मार ही देगा। प्रमुख ने उसे ज़िंदा छोड़ दिया और अब वह कॉर्पोरेट किंग अपने अपराधों के बोझ ढोता जंगलों में भटकता है…शायद मरने के बाद भी भटकेगा।

समाप्त!

इज़्ज़त का अचार (कहानी) – मोहित शर्मा ज़हन

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होपी नामक क़स्बा नक्काशी के काम और पुराने मंदिरों की वजह से पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र था। यहाँ आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या काफी थी। संपन्न परिवार का दिनेश वहां अकेले ट्रेवल एजेंसी, टूर गाइड्स, होटल आदि काम संभालता था। उसे लगता था उसके पुरखों को कमाना नहीं आता था और जितना वे कमा सकते थे उतना कमाया नहीं। वह अपने ड्राइवर्स, होटल मैनेजर, गाइड्स आदि के साथ मिलकर हर सेवा के विदेशी पर्यटकों से ज़्यादा पैसे वसूलता, घटिया सामान खरीदवाता और मौका मिलने पर अपने ही पॉकेटमार, चोर लड़के-लड़कियों से पर्यटकों के पैसे और कीमती सामान उठवाता।

एक दिन यूँ ही काम का जायज़ा ले रहे दिनेश के पिता ने उसे टोका तो उसका जवाब था – “पिता जी आप बेफिक्र रहो! पुलिस अपनी जेब में है, बस टूरिस्ट को दिखाने का नाटक करते हैं। न इस जगह कोई दूसरा कॉम्पिटिशन है अपना।”

बिजनस सँभालने के डेढ़ साल के अंदर ही पहले से काफी अधिक मुनाफा हुआ तो दिनेश ने खाना खाते हुए अपने बुजुर्गो को ताना मारा – “बाउ जी ऐसे कमाया जाता है रुपया।”

इन डेढ़ वर्षों के दौरान इंटरनेट फ़ोरम्स, सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ रिपोर्ट्स में होपी क़स्बा पर्यटकों से चोरी, धोखाधड़ी के मामलो में कुख्यात हो गया था। कभी हज़ारो विदेशी पर्यटकों के आकर्षण पर अब गिने-चुने विदेशी आने लगे। दिनेश के काम एक-एक कर ठप होने लगे और ज़मीन बेचने की नौबत आ गयी। बाबा से रहा न गया – “बेटा, ज़मीन के अलावा घर भी बेचना पड़े कोई बात नहीं…. इन्हे बेच कर इस परिवार, जगह और देश की खोई इज़्ज़त वापस मिले तो लेते आना।”

समाप्त!

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मासूम ममता (Bonsai Kathayen) – लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)

Bonsai Kathayen (2013) katha sangrah ki pehli laghu katha.
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मासूम ममता
“हद है यार … कुतिया ने परेशान करके रखा है। अभी सिंधी साहब ने अपने बागीचे से इसको भगाया, ज़रा सी देर को मैंने फ्यूज़ बदलने के लिए गेट खोला होगा और ये मेरे आँगन मे घुस आई।”
“हाँ! गर्ग भाई साहब! आदत जो बिगड़ गयी है इसकी, रोटी-बिस्कुट खा-खा कर बिलकुल सर पर ही चढ़े जा रही है। कल से नोट कर लो आप और मै जब भाभी जी लौटकर आएँगी उन्हें भी बता दूँगी इसको अब से कुछ नहीं देना है।”

कुतिया अब भी मासूम नज़रों से पूँछ हिलाती हुई और लगातार कूं-कूं करती मिस्टर गर्ग को देख रही थी।

एक पल को तो गर्ग जी मासूमियत  से हिप्नोटाइज से हुए पर फिर कुतिया को रोष से घूरती हुई सिंधी  भाभी की भाव-भंगिमाओं से सहमति जताते हुए गर्ग जी ने कुतिया के मुँह पर एक लात रसीद की।

“सही किया भाई साहब! अब से दरवाज़े पर डंडा रखूंगी।”

सिंधी मेमसाब तो जैसे दर्द से सिसकारी मारती कुतिया को डपटते हुए बोलीं।

रात मे गली मे कुत्तो के भोकने-गुर्राने और लड़ने की तेज़ आवाजों ने पूरे मोहल्ले को जगा दिया।

पर इस बार अपने घरो से पहले बाहर निकलने वाले थे श्रीमती गर्ग और श्रीमान सिंधी

“क्या हुआ गर्ग भाभी?”

“गली की कुतिया ने सामने नाले किनारे बच्चे दे दिए और साथ की गली वाले कुत्तों बच्चो को मार कर उठा ले गए। थोड़ी देर कुतिया सबसे लडती रही जब तक उन्हें कॉलोनी वालो ने भगाया तब तक तो उन्होंने इसका भी आधा सर खा ही लिया …..लगता है ये भी नहीं बचेगी।

अब तक आँखें मॉल रहे श्रीमान गर्ग और श्रीमती सिंधी की मामला समझ आने पर नज़रें मिली और दोनों ने ही तड़पती कुतिया को देख कर अपनी गलती की मोन स्वीकृति दी।

समाप्त!
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जीवनशैली में संतुलन – लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)

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Mohit Trendster @ Lucknow, 2010
 
पर्यटन के स्वरुप में बड़े बदलाव आयें है। सदियों तक जो पर्यटन स्थल दुनियाभर में मशहूर थे, जिन्हे सिर्फ देखना लाखो-करोडो की दिली ख्वाइश होती थी….अब वहाँ जाने वाले नयी पीढ़ी के बहुत से लोग उन्हें बोरिंग बताते है, वहाँ घूम कर आने के बाद वो सवाल करते है कि आखिर क्या ख़ास है इन जगहों में? इतना हव्वा किस बात का बनाया जाता है इनपर? कारण जानने से पहले इस बात पर ध्यान दें कि हम लोग ट्रांज़िशन दौर का हिस्सा रहे जिसमे तकनीक बड़ी तेज़ी से बदली, और हमे समाज के दोनों छोर देखने-जीने को मिले। अब आप कहेंगे की बदलाव तो हर पीढ़ी देखती है, तो इस दौर से जुडी पीढ़ियों पर यह टिप्पणी क्यों? सोचिये आप सन 1828 में जी रहे है और एकदम से आपको 1850 में भेजा जाए तो आपको  बदली बातें, चीज़ें समझने में अधिक कठिनाई नहीं आयेगी पर यह कठिनाई 1970 से सीधे 1990 जाने पर बढ़ेगी और 1992 से अगर कोई 2015 में आयेगा उसको आजकल की दिनचर्या में कई बदलाव दिखेंगे जिनकी उसे आदत नहीं होगी।
इस बदलाव के बाद हम जैसे मनोरंजन और जानकारी के अनेको मल्टीमीडिया साधनो से घिर गये। ग्राफिक्स, एनीमेशन, विडीयोज़ में दुनिया का क्या से क्या खंगाल डाला, जिस वजह से किसी चीज़ का क्रेज़ क्या होता है यह लगभग भूल गए। अनुभवों के लिए सिर्फ डिजिटल साधनो पर निर्भर हो चुके है और इनके इतर दुनिया जो भी है उस से कटने लगे। शायद जो लोग ऐतिहासिक इमारतों, जगहों को बोरिंग बता रहे थे वो उस जगह को देखने, उसकी कहानी जानने के अलावा यह भी अपेक्षा रख रहे थे कि वो ईमारत ब्रेक डांस करेगी, टूट कर फिर अपने आप बन जायेगी, या टूरिस्ट गाइड की जगह खुद अपना इतिहास बताएगी।
अब बच्चे-युवा और बड़े भी जो शहरी जीवन के आदि हो चुके है उन्हें 2 दिन गाँव में बिताने भारी पड़ जाते है और बातों से ज़्यादा हम मोबाइल टेक्स्ट्स, मैसेजेस से वार्तालाप करते है। इस लेख से मैं आपको वर्तमान तौर-तरीके छोड़ कर वापस इतिहास में जाने की सलाह नहीं दे रहा, बस एक संतुलन बनाने की बात बता रहा हूँ। कुछ समय स्वयं को, अपनों को और प्रकृति को दें – डिजिटल प्रारूपों में औरों से अनुभव लेने के साथ-साथ ज़िन्दगी में खुद अपने अनुभव बटोरें। एक जीवनशैली की अधिकता से स्वयं को एक मशीन में ना बदलने दें। बैलेंस बनाना मुश्किल ज़रूर है पर ज़माना कितना भी आगे बढ़ जाये कई मूलभूत बातें जस की तस रहती है, बस उन्ही के सिरे पकड़ते हुए शुरुआत करें।
– मोहित शर्मा (ज़हन)
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सपनो की एक्सपायरी डेट – मोहित शर्मा (ज़हन)

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अपने सपनो के लिए जगदोजहद, मेहनत करते लोगो को देखना प्रेरणादायक होता है। एक ऐसा आकर्षण जिसकी वजह से हम फिल्मो, टीवी सीरियल्स से बंधे रहते है, उनके किरदारों में अपने जीवन को देखते है, ऐसा आकर्षण जिसके कारण कठिन समय में हम खुद को दिलासा देते है कि यह सब झेलने के बाद, यह वक़्त गुजरने के बाद हमे अपना सपना मिल जायेगा या उस से दूरी और कम हो जायेगी। कुछ ख्वाबो का महत्व इतना होता है कि उनके पूरे या ना पूरे होने पर जीवन की दिशा बदल जाती है, जबकि कुछ सपने बस किसी तरह अपनी जगह आपके ज़हन में बना लेते है – बाहर से देखने पर यह सपने बचकाने लगते है पर फिर भी अक्सर यह आपको परेशान करते है।
व्यक्ति की आयु, परिस्थिति अनुसार सपने बदलते है, नए सपने इतने बड़े हो जाते है जो किसी उम्र के अधूरे-पुराने सपनो के आड़े आकर धुँधला कर देते है। मैंने कहीं सुना था कि सपनो को साकार करने का कोई समय नहीं होता जब साधन, भाग्य साथ हों तब उन्हें पूरा कर उनका आनंद लीजिए। पर जीवन तमाम चुनौतियाँ, उबड़-खाबड़ रास्ते लेकर आता है जिसके चलते निरंतर कुछ न कुछ सोचता दिमाग उन बिन्दुओं से काफी आगे बढ़ चुका होता है।
अपना ही उदाहरण देता हूँ। मुझे बचपन से ही प्लेन में बैठने बड़ी इच्छा थी पर समस्या यह थी कि उस समय लगभग सभी करीबी रिश्तेदार दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड के सीमावर्ती शहरों में रहते थे जहाँ 100 से 600 किलोमीटर्स के दायरे में होने के कारण अगर कोई आपात्कालीन स्थिति ना हो तो वैसे शादी आदि समाहरोह में पहुँचने के लिए साधनो में एरोप्लेन से पहले वरीयता ट्रैन, बसों को मिलती है। ऊपर से मध्यमवर्गीय परिवार तो 90 के दशक में टीवी पर ही प्लेन देखकर खुश हो लेता था। (अब घरेलु यात्रा हवाई टिकटों के दामो में काफी कमी आयी है खासकर पहले बुक करने पर, कभी-कभी तो बहुत लम्बी दूरी की हवाई यात्रा ट्रैन यात्रा से सस्ती पड़ती है) तो स्थिति यह रही कि बचपन से किशोरावस्था आई, जिसमे हवाई यात्रा की प्रबल इच्छा बनी रही पर कभी ऐसा मौका नहीं बना। वर्तमान में जहाँ सक्रीय हूँ यानी मेरठ, दिल्ली इनकी दूरी 70-75 किलोमीटर्स है और अब तक प्लेन में नहीं “घूमा”।
पर अब वो सपना मर गया है, इच्छा कहीं गुम हो गयी जैसे उसकी एक्सपायरी डेट निकल गयी हो। किसी समय एक बच्चे की जो सबसे बड़ी विश होती थी जिसके लिए वो भगवान जी से प्रार्थना करता था, आज उसके पूरे होने ना होने से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। उल्टा चिढ होती है, बेवजह गुस्सा आता है इस ख्वाईश के कभी याद आने पर। अब अगर कभी हवाईजहाज़ में बैठने का अवसर मिलेगा तो मन किसी प्रौढ़ उधेड़बुन में लगा होगा, रूखी आँखों में उस बच्चे या किशोर की चंचलता नहीं होगी जो अक्सर सपनो में प्लेन में बैठकर दुनियाभर की सैर कर आता था।
कुछ सपनो का पूरा होना आपके हाथ में होता है और कुछ का भाग्य पर निर्भर। अपने बस में जो बातें हो उन्हें प्रगाढ़ता से पूरा करें ताकि इच्छाएँ मरने या बदलने से पहले….सपनो की एक्सपायरी डेट से पहले वो पूरे हो जायें।  🙂
 – मोहित शर्मा (ज़हन)
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सिर्फ दस सवाल | लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)

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सिर्फ दस सवाल
 
यह एक लेख या पोस्ट से ज़्यादा एक विनती है आप सभी से। देश और दुनिया इतने विस्तृत है कि हर स्थान के हर पक्ष की जानकारी रखना असंभव है। गूगल-इंटरनेट पर निर्भरता के कारण पहले जो थोड़ा बहुत ज़ोर देते थे वो भी नहीं देते। पर ऐसे कुछ पक्ष है जिनकी जानकारी ना होना चिंताजनक और शर्म की बात है। अक्सर लोगो से किसी विषय पर बात करते हुए दुख होता है कि अपने देश से जुड़े ज़रूरी मुद्दों पर अज्ञानता, अरुचि के भाव रखते है। इसी अरुचि और अज्ञान का लाभ ऊँचे ओहदों पर आसीन, राजनैतिक और सामाजिक रूप से शक्तिशाली लोग बरसो से उठाते आये है। लोगो को समझाने पर जवाब मिलता है कि अब दुनिया भर की बातों में क्या-क्या याद रखें, कहाँ-कहाँ सर खपायें? प्रकृति से एक औसत मनुष्य को इतना दिमाग मिला है कि उसमे अनेको  ज्ञानकोष समां जायें। अड़चन ज्ञान की अधिकता की नहीं है, अड़चन है कि आम जनता का ध्यान कहाँ केंद्रित है। अब सीरियल्स, फिल्में, सेलेब्रिटीज़, मनोरंजन, खेलों में ध्यान रहेगा तो बाकी बातें अपने आप ज़हन से ओझल हो जायेंगी और यहाँ मतलब मनोरंजन आदि की आदतों को ख़त्म करना नहीं बल्कि उन्हें कम या संतुलित करना बाकी पहलुओं के अनुपात में क्योकि अगर आसाम, लक्ष्यद्वीप, केरला आदि राज्यों से कोई खबर आये तो वो किसी पराये देश से आई खबर प्रतीत ना हो। तो आप सभी से निवेदन है कि कम से कम इन 10 विषयों और सवालो पर अधिक से अधिक जानकारी लेकर खुद को जागरूक रखें, अपने आस-पास लोगो को भी जागरूक करें।
1) – देश का वर्तमान नक्शा क्या है और कैसे कट-छंट कर वर्तमान रूप में आया ?
2) – भारत की आंतरिक भाषायी राजनीती। हिंदी से बाकी स्थानीय भाषाओं का घर्षण, अन्य भाषाओँ का आपस में घर्षण और उपजे दुष्परिणाम।
3) – 1947 से 1991 का लाइसेंस राज समय, जब सरकारी पाबंदियां अधिक थी। उस दौर में अन्य देशो से रिश्ते।
4) – किन देशो से हमारी सीमा साझा होती है और उनसे हमारे कैसे संबंध रहे है, चल रहे है? 5) – भारत के विभिन्न क्षेत्रों में फैली सामाजिक समस्याएँ।
6) – किन वस्तुओं, सेवाओं में भारत अग्रणी देशों में आता है (किन चीज़ों, स्थानो में सम्भावनाएँ है) और किन बातों में भारत दूसरे देशो पर निर्भर है ?
7) – भारत में जनसँख्या का किस अनुपात में बंटवारा किन धर्मो में है और उन धर्मो का उद्गम, विस्तार किस तरह हुआ?
8) – देश का युद्ध इतिहास।
9) – राजनैतिक पार्टियों का इतिहास।
10) – दुनिया के प्रमुख देशो के व्यावसायिक समीकरण।
वैसे तो महत्वपूर्ण विषय, बातें और भी बहुत है पर अधिकतर की धुरी यह विषय है। जय हिन्द!
– मोहित शर्मा (ज़हन)
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Aaj phir us dar se lautna hua…. – मोहित शर्मा (ज़हन)

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Aaj phir us dar se lautna hua….

Ek Raah mujrim tang thi,

Do musafiron ka saath chalna hua,

Ek pyaar betarteeb yun…

Kitne shikven aur ek muflis shukriya,

Aaj phir us dar se Lautna hua !

Koshish rahegi umr bhar,

Ek naam par nikle dua…

Jin kamro mey Tanhaai thi,

Wahin yaadon se milna hua..

Aaj phir us dar se lautna hua !

Jo vaayda aankhon mey hua,

Veeranon mein Armaano ka majma laga

Parda naa hone ka malaal unhe,

Jab shafaaq-O-shabhnam thi darmiyaa,

Aaj phir us dar se lautna hua !

Khudgarz kab patjhad laga,

Saawan kasam dene laga…

Ek khwaab dil ke kareeb tha,

Khwaishon mein jo shaheed hua…

Tab himmat se haara karte the…

Ab kismet se haare jua…

Aaj phir us dar se lautna hua !

Jiske shafugta hone par jashn tha,

Jaane kahan wo gum hua,

Jinse rooh wabasta thi,

Kis mod wo Tanha hua,

Aaj phir us dar se lautna hua….

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आज फिर उस दर से लौटना हुआ…

आज फिर उस दर से लौटना हुआ…

एक राह मुज़रिम तंग थी,

2 मुसाफिरों का साथ चलना हुआ,

एक प्यार बेतरतीब यूँ…

कितने शिक़वे और एक मुफ़लिस शुक्रिया,

आज फिर उस दर से लौटना हुआ…

कोशिश रहेगी उम्र भर,

एक नाम पर निकले दुआ,

जिन कमरो में तन्हाई थी,

वहीं यादों से मिलना हुआ,

आज फिर उस दर से लौटना हुआ….

जो वायदा आँखों में हुआ,

वीरानों में अरमानों का मजमा लगा,

पर्दा ना होने का मलाल उन्हें,

जब शफ़ाक़ ओ शभनम दरमियाँ…

आज फिर उस दर से लौटना हुआ…

खुदगर्ज़ कब पतझड़ लगा,

सावन कसम देने लगा,

एक ख्वाब दिल के करीब था,

ख्वाइशों में जो शहीद हुआ…

तब हिम्मत से हारा करते थे,

अब किस्मत से हारे जुआ…

आज फिर उस दर से लौटना हुआ…

जिसके शगुफ़्ता होने पर जश्न था,

जाने कहाँ वो गुम हुआ,

जिनसे रूह वाबस्ता थी,

किस मोड़ वो तन्हा हुआ?

आज फिर उस दर से लौटना हुआ….

– मोहित शर्मा (ज़हन)

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The Aryanist Journal 2013 & 2014 Editions

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1. The Aryanist Journal # 01, Language: Hindi, English, 40 Pages (Published – October 2013)

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The Aryanist Journal # 02

Language: English, ISBN: 9781311414564, Pages – 79

Cover – Jyoti Singh, Publishing Partner – Freelance Talents, Archaeology Online

*) – Readwhere
http://www.readwhere.com/read/390991/The-Aryanist-02/The-Aryanist-Journal-2

*) – Smashwords
https://www.smashwords.com/books/view/499743

*) – Archives
http://document.li/41vf

*) – Snacktools
http://share.snacktools.com/96B7A85C5A8/bhnfw39h

*) – Doc Droid
http://docdroid.net/mlxn

*) – Doc Stoc
http://www.docstoc.com/docs/173230978/The-Aryanist-Journal-_-02-_Freelance-Talents_

*) – 4Shared
http://www.4shared.com/office/MahN_wWHba/The_Aryanist_Journal__02__Free.html

*) – Scribd
https://www.scribd.com/doc/249441617/The-Aryanist-Journal-02-Freelance-Talents

*) – Mediafire
http://www.mediafire.com/view/n8jsaq3ccdjgvry/The_Aryanist_Journal_#_02_(Freelance_Talents).pdf

Also available – ebook3000, ISSUU, Pothi, drive and allied networks.

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