कलाकार श्री सुरेश डिगवाल

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मेरे एक कलाकार-ग्राफ़िक डिज़ाइनर मित्र ने मुझसे शिकायत भरे लहज़े में कहा कि मैं अक्सर भारतीय कॉमिक्स कलाकारों, लेखकों के बारे में कम्युनिटीज़, ब्लॉग्स पर चर्चा करता रहता हूँ पर मैंने कभी सुरेश डिगवाल जी का नाम नहीं लिया। मैंने ही क्या अन्य कहीं भी उसने उनका नाम ना के बरारबर ही देखा होगा। वैसे बात में दम था, अगर एक-दो सीजन का मौसमी कलाकार-लेखक होता तो और बात थी पर सुरेश जी ने डोगा, परमाणु, एंथोनी जैसे किरदारों पर काफी समय तक काम किया। उसके बाद भी कैंपफायर ग्राफ़िक नोवेल्स, पेंगुइन रैंडम हाउस, अन्य कॉमिक्स, बच्चो की किताबों और विडियो गेम्स में उनका काम आता रहा। अब सुरेश जी गुड़गांव में जेनपैक्ट कंपनी में एक कॉर्पोरेट लाइफ जी रहे हैं।

जहाँ तक उनपर होने वाली इतनी कम चर्चा की बात है उसपर मेरी एक अलग थ्योरी है। जिसको तुलनात्मक स्मृति थ्योरी कहा जा सकता है। किसी एक समय में एक क्षेत्र में जनता ज़्यादा से ज़्यादा 4 नाम ही याद रख पाती है (बल्कि कई लोगो को सिर्फ इक्का-दुक्का नाम याद रहते हैं)। उन नामो के अलावा उस क्षेत्र में सक्रीय सभी लोग या तो लम्बे समय तक सक्रीय रहें या फिर उन नामो को नीचे धकेल कर उनकी जगह लें। भाग्य और अन्य कारको से अक्सर कई प्रतिभावान लोग उस स्थान पर नहीं आ पाते जिसके वह हक़दार होते हैं, ओलंपिक्स की तरह दशमलव अंको से छठवे, सातवे स्थान या और नीचे स्थान पर रह जाते है जहाँ आम जनता स्मृति पहुँच नहीं पाती। सुरेश जी का दुर्भाग्य रहा कि एक समय वह इतना सक्रीय रहते हुए भी प्रशंसको के मन में बड़ा प्रभाव नहीं छोड़ पाए।

उनकी इंकिंग, कलरिंग जोड़ियों पर टिप्पणी नहीं करूँगा पर मुझे उनकी शैली पसंद थी। मुझे लगता है अगर वह कुछ और प्रयोग करते, कुछ भाग्य का साथ मिल जाता तो आज मुझे अलग से उनका नाम याद ना करवाना पड़ता। एक वजह यह है कि बहुत से कलाकारों को अपना प्रोमोशन करना अच्छा नहीं लगता, इन्टरनेट-सोशल मीडिया की दुनिया से दूरी बनाकर वो अपनी कला में तल्लीन रहते हैं। खैर, कॉमिक्स के बाहर एक बहुत बड़ी दुनिया है जहाँ सुरेश डिगवाल जी कला निर्देशन, एनिमेशन, चित्रांकन, विडियो गेम्स, ग्राफ़िक डिजाईन और शिक्षा में अपना योगदान दे रहे हैं। आशा है आगे हम सबको उनका काम निरंतर देखने को मिलता रहेगा।
अधिक जानकारी के लिए इन्टरनेट पर सुरेश जी की ये मुख्य प्रोफाइल्स और पोर्टफोलियो हैं –
https://www.behance.net/yogmaya
http://www.coroflot.com/Yogmaya/portfolio
https://www.linkedin.com/in/sureshdigwal

लेख: सेलेब्रिटी पी.आर. का घपला (मोहित शर्मा ज़हन)

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पैसा और सफलता अक्सर अपने साथ कुछ बुरी आदते लाते हैं। कुछ लोग इनसे पार पाकर अपने क्षेत्र में और समाज में ज़बरदस्त योगदान देते हैं वहीं कई शुरुआती सफलता के बाद भटक जाते हैं। एक बड़े स्तर पर आने के बाद प्रतिष्ठित व्यक्ति पर इमेज, ब्रांड मैनेजमेंट की ज़िम्मेदारी आ जाती है लोगो पर, अब या तो आप मेहनत और साफ़-सुथरे तरीके से ये काम करे या फिर अपनी मन-मर्ज़ी का जीवन जीते हुए बाद मे अपने कृत्यों को सही ठहराने की कोशिश करें। इन्ही में कुछ विख्यात लोग लोकप्रियता बढ़ाने के लिए अपने पीआर एजेंट या नेटवर्क का सहारा लेते हैं। जैसे अगर कोई सेलिब्रिटी कोई गलत बात, काम करता पकड़ा जाए या उसकी वजह से जनता, समाज को कोई नुक्सान हो तो अपनी टीम की मदद से वो ये बातें प्रचारित करने की कोशिश करेगा कि उसका ये मतलब नहीं था वो तो इस काम से समाज की मानसिकता दिखाना चाहता/चाहती थी या उसे सेलिब्रिटी होने की सज़ा मिल रही है। ये सही है….सेलिब्रिटी होने के मज़े तक सब ठीक पर उस लाइफ में एडजस्ट करने वाले हिस्सो में शिकायत करो।

उदाहरण के लिए किसी सेलिब्रिटी ने एक मुद्दे पर बिना जानकारी के कोई बेवकूफी भरी बात कही अब उसका सोशल मीडिया आदि जगह मज़ाक उड़ा। तो उसकी बेवकूफी गयी एक तरफ और उसने निकाल लिया अपने अल्पसंख्यक, महिला या किसी अन्य मजबूरी का कार्ड, फिर क्या मीडिया, जनता का ध्यान कहीं और गया। यानी अगर उस बात की तारीफ़ होती तब कोई दिक्कत नहीं थी, जहाँ एक वर्ग ने मज़ाक उडा दिया तो घुमा-फिरा कर बात अपने ऊपर मत आने दो।

साथ ही ये लोग समय, स्थिति के अनुसार नए-नए स्टंट सोचते हैं। जैसे अपने बीते जीवन में किसी दुखद काल्पनिक घटना को जोड़ देना या किसी बीमारी (खासकर मानसिक) से जूझकर उस से जीतना दिखाना। क्या यार….आपके एक जीवन में घटनाओ का घनत्व कुछ अधिक नहीं हो गया? मैं यह नहीं कह रहा कि सब बड़े लोग ऐसा दिखावा करते है पर ऐसा करने वाले लोगो का अनुपात बहुत ज़्यादा है। आम जन – ख़ास लोग सबका जीवन चुनौतियों, संघर्षो वाला होता है पर ज़बरदस्ती के पीआर स्टंट कर के कम से कम खुद से झूठ मत बोलिये। इस नौटंकी के बिना भी आप लोकप्रिय और महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों पर जनता का ध्यान ला सकते हैं (बशर्ते आप वैसा करना चाहें ना की केवल अपनी पब्लिसिटी के चक्कर में पड़े रहे)। हालांकि, पैसे के पीछे भागते मीडिया को नैतिक-अनैतिक से कोई मतलब नहीं होता। हर दिन कुछ नया वायरल करने की होड़ में मीडिया के लिए कुछ नैतिकता की सोचना पाप है। वैसे व्यक्ति के बारे में थोड़ी रिसर्च और पहले का रिकॉर्ड देख कर आप जान सकते हैं कि कौन सही दावा कर रहा है और कौन पीआर के रथ पर सवार है।

जो पाठक सोच रहे है कि क्या फर्क पड़ता है? बेकार में मुद्दा बनाया जा रहा है! अगर ऐसा करने से किसी को नुक्सान नहीं पहुँच रहा तो क्या गलत है? उन मित्रो से मेरा यह कहना है कि कभी-कभी किसी वर्ग को लंबे समय से छद्म रूप से हो रहा नुक्सान सीधे नुक्सान से बड़ा होता है। जिन लोगो को वाकई मीडिया, जनता के ध्यान-पैसे की आवश्यकता है वो बेचारे तरसते रह जाते हैं और उनका हिस्सा, उनकी फुटेज गलत संस्थाएं, लोग खा लेते हैं। मुश्किल है पर सबसे निवेदन है कि अपरंपरागत न्यूज़ सोर्सेज पर ध्यान दें, सही लोगो-संस्थाओ को आगे बढ़ने मे हर संभव मदद करें। छोटे बदलाव से धीरे-धीरे ही सही पर बड़ा असर पड़ेगा।

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My We Heart It Profile

Posted by Mohit Sharma at 1:40 AM

इंडी आर्टिस्ट का मतलब क्या है?

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Art – Thomas Lepine
Originally posted (COP Website)

किसी रचनात्मक क्षेत्र में किये गए स्वतंत्र काम को इंडी (Indie/Indy) यानी इंडिपेंडेंट रचना कहा जाता है। इंडी काम कई प्रकार और स्तर का हो सकता है, कभी न्यूनतम या बिना किसी निवेश के बनी रचना केवल कला के बल पर अनेक लोगो तक पहुंच सकती है और धन अर्जित कर सकती है, तो कभी कलाकार का काफी पैसा लगने के बाद भी असफल हो सकती है। किसी लेबल, कंपनी या प्रकाशक के ना होने के कारण इंडी रचनाओं में कलाकार पर उसके दिमाग में उपजे विचारों को बाजार के हिसाब से बदलने का दबाव कम हो जाता है। वहीं कभी-कभी अपनी मर्ज़ी चलने का घाटा यह होता है कि जनता कलाकार के विज़न को पूरी तरह समझ नही पाती। मुझे लगता है हर लेखक, कवि या कलाकार को इंडी चरण से गुज़ारना ही चाहिए, सीधे किसी बड़े लेबल से चिपकना भी अच्छा नहीं। अपनी कला के विकास के लिए तो स्वत्रंत रहकर अलग-अलग शैलियों, स्थितियों और अन्य कलाकारों के साथ प्रयोग करना बेहद आवश्यक है। ऐसा करने से व्यक्ति को पता चलता है कि उसे अपना समय किन बातों में देना चाहिए और किन बातों में उसकी मेहनत अधिक लगती है पर परिणाम कम आता है। जैसे लेखन में ही दर्जनों शैलियाँ हैं, कहने को तो लेखक सबमे लिख ले पर किनमें उसे सहजता है और किन शैलियों के संगम में वह कमाल करता है ये बातें धीरे-धीरे प्रयोग करते रहने से ही समझ आती है। कई मामलों में कम बजट वाली छोटी कंपनियों के लेबल के साथ प्रकाशित हुए काम को कम मुनाफे और पहुँच की वजह से इंडी श्रेणी में रखा जाता है।

अब भाग्य के फेर से कुछ लोग इंडी चरण में कुछ समय के लिए नाम को आते हैं और सीधा बड़ा टिकेट पाते हैं। जबकि कई इक्का-दुक्का मौको को छोड़ कर जीवनभर इंडी रह जाते हैं। कला का स्तर और कीमत सामने खड़े व्यक्ति के नज़रिये पर निर्भर करता है, फिर भी अगर 100 में से 70 से अधिक लोग किसी चीज़ पर एक राय रखते हैं तो उसको एक मापदंड माना जा सकता है। मापदंड ये कि यह कलाकृतियां, रचनाएं क्या पैसा कमा पाएंगी या नहीं। यह सवाल कई कलाकारों को दुख देता है लेकिन इसका सामना सबको करना पड़ता है बशर्ते आपकी पैतृक संपत्ति भयंकर हो या आप मनमौजी कलाकार हो, जो एक के बाद एक रचना निर्माण में मगन रहता है। पैसा आये तो अच्छा, पैसा ना आये तो खाना तो मिल ही रहा है! मनमौजी कलाकारों को भगवान् तेज़ स्मृति देते हैं जो सारी की सारी वो अपने काम में लगा देते हैं। उन्हें आस-पास की दुनिया में हुए पिछले क्षण चाहे याद ना हों पर 11 वर्ष पहले अगर उन्होंने कोई आईडिया कहीं इस्तेमाल किया तो उसमे क्या दिमागी दांव-पेंच हुए और क्या परिणाम आया सब याद रहेगा। अक्सर पैसों और मार्गदर्शन के अभाव में कई आर्टिस्ट संघर्ष के शुरुआती वर्षों में ही कोई और राह चुन लेते हैं, फिर कुछ ऐसे हैं जो कला से संन्यास तो नहीं होते पर सेमी-रिटायर होकर कभी-कभार कुछ काम दिखा देते हैं। ये कलाकार अपने जैसे अन्य कलाकारों, लेखको को पसंद करते हैं पर अपने क्षेत्र और हरदम मस्तिष्क के रचनात्मक जाल में उलझे होने के कारण ढंग से प्रोत्साहित नहीं कर पाते हैं। स्वयं पर निर्भर होने के कारण सफलता मिलने में अधिक समय लगता है। जो लोग पैसे को प्राथमिकताओं में नही रखते उनके लिए रास्ता मुश्किल है। धन से आप अपनी रचनाओं की पहुंच परिवर्धित कर सकते हैं, पैसे के साथ आप सिर्फ अपनी कला पर ध्यान लगा सकते हैं, नही तो एक बार का दाल-पेट्रोल का भाव नापने में आपके 4 आईडिया सुसाइड कर लेंगे। अपने कलात्मक सफर के बीच-बीच में एक नज़र आर्थिक पहलुओं पर रखना फायदे का सौदा है।

आप सभी से निवेदन है कि अपनी रूचि के विषयों में सक्रीय इंडी लेखको, कलाकारों के बारे में अधिक से अधिक जानकारी जुटाएं, उस जानकारी के आधार पर उनकी रचना, किताबें, कलाकृतियां खरीदकर, खरीदने में सक्षम नही तो अन्य लोगो को बताकर इन कलाकारों के विकास में अपना सहयोग दें।

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कॉमिक्स फैन फिक्शन लेखकों के लिए कुछ सुझाव – मोहित शर्मा ज़हन

Beta Testing Units (Indian Comics)

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नमस्ते! यह विचार काफी समय से मन में है और संजय गुप्ता जी से साझा कर चूका हूँ हालांकि उस समय विस्तार से समझा नहीं पाया था पर जितना उन्होंने सुना था उन्हें पसंद आया था। मित्रों, प्रो रसलिंग आप देखते होंगे या उसके बारे में थोड़ा बहुत अंदाज़ा होगा। वर्ल्ड रसलिंग एंटरटेनमेंट या डब्लू.डब्लू.ई. के अलावा अमेरिका और विश्व में कई छोटे-बड़े रसलिंग प्रोमोशन्स हैं। दक्षिण अमेरिका, जापान और यूरोप में कुछ राष्ट्र स्तर की कंपनी कई दशकों से लोगो का मनोरंजन कर रहीं हैं। इन बड़ी कंपनियों की सफलता इनके रोस्टर (इनके लिए काम करने वाले सभी रसलर) और इनकी शैली पर निर्भर करती है। अपने शोज़ में 2 लोगो के बीच में फ्यूड (रंजिश) बनाने के लिए लड़ाई के अलावा एक सीरियल की तरह यहाँ कई सेगमेंट वाली स्टोरीलाइन होती है, जिसमें रसलिंग के दांव-पेंच के साथ अभिनय, जनता में अपना पक्ष रखना जैसी बातें ज़रूरी होती हैं। इस सबकी मदद से व्यक्ति एक पहलवान से एक किरदार बनता है जो लोगो से अच्छी या बुरी चरम प्रतिक्रिया निकलवाता है। जिसे लोग जीतते हुए या बुरी तरह मार खाते हुए देखना चाहते हैं।

डब्लू.डब्लू.ई. जैसे बड़े प्रोमोशन नए या सीख रहे पहलवान को पहले अपनी डेवलपमेंटल टेरिटरी भेजते हैं। यहाँ सुरक्षित रसलिंग छोटे-छोटे गुर सीखने के अलावा रसलर अपनी क्षमता अनुसार यह जान पाता है कि वह क्या कर सकता है? कौन से किरदार उसपर बेहतर लगेंगे, क्या पहनावा होना चाहिए, बोलने की कौनसी शैली उसपर फब्ती है आदि। इतना ही नहीं अगर किसी अन्य कंपनी से कोई जाना-पहचाना सितारा आता है तो पहले उसे भी डेवलपमेंटल यूनिट में समय बिताना पड़ता है ताकि वो कंपनी के माहौल, शैली से सामंजस्य बिठा सके। अब आती है पते कि बात, अन्य क्षेत्रों की ट्रेनिंग से उलट यहाँ रसलर जनता के बीच और टेलीवजन पर शोज़ करते हैं, सीखते हैं। इसका मतलब मुख्य कंपनी के स्केल से छोटा दूसरे दर्जे का शो जिसमे लोग आते हैं, टेलीविजन पर प्रसारित होता है। डब्लू.डब्लू.ई. में NXT ऐसा शो है, जो कंपनी को काफी मुनाफा और पब्लिसिटी देता है। इन ट्रेनिंग यूनिट्स के कुछ फायदें हैं –

1. अगर ट्रेनिंग यूनिट अच्छा करती है तो मुख्य कंपनी श्रेय लेती है कि “आखिर यूनिट किसकी है?” और अगर यूनिट का प्रदर्शन अच्छा नहीं तो भी मुख्य कंपनी उसको दोयम दर्जे की ट्रेनिंग यूनिट बता कर पल्ला झाड़ लेती है कि ट्रेनिंग फेज में ऊंच-नीच चलती है।
2. इस माध्यम से बहुत से ऐसे प्रयोग किये जा सकते हैं जो मुख्य कंपनी के प्रारूप में संभव नहीं या जिनपर शक है कि यह प्रयोगात्मक आईडिया चलेगा या नहीं? फिर वही ऊपर लिखी बात प्रयोग सफल हुआ तो मुख्य कंपनी के चैनल में वाहवाही लो, नहीं हुआ तो आई-गयी बात!
3. यहाँ कई युवा, प्रतिभावान लोगो का काम देखने का मौका मिलता है। 2 या अधिक लोगो के साथ किये काम का अवलोकन किया जा सकता है कि क्या ये दोनों मुख्य रोस्टर में फिट बैठेंगे।
4. यूनिट अगर चल निकले तो अच्छा पैसा भी बनाया जा सकता है।

मेरा विचार यह था कि ऐसी डेवलपमेंटल यूनिट की तरह अगर बड़ी कॉमिक कंपनी जैसे राज कॉमिक्स, कैंपफायर उभरते कलाकारों, लेखकों के लिए ऐसा कुछ करें तो यह सबके लिए फायदे का सौदा होगा। जैसे युवा कलाकार, लेखक, इंकर और कलरिस्ट की कॉमिक्स को अपनी वेबसाइट, पेज पर जगह देना या अलग नाम से (जैसे RC Gen-Next, Campfire Yuva) साइट और पेज पर पोस्ट करना, प्रिंट ऑन डिमांड या सीमित संख्या में प्रकाशित करना। इस से कलाकारों को बड़ी कंपनी का बैनर मिलेगा, 2 सेट या इवेंट के बीच में जो लंबा गैप होता है वो भर जाएगा और यह माध्यम ज़्यादा लोगों तक कॉमिक्स को पहुंचाएगा।
यह विचार कितना व्यवहारिक है? आप लोगो को यह जंच रहा है ज़रूर बताएं! धन्यवाद!

– मोहित शर्मा ज़हन

Original Post – Indian Comics Fandom FB Page

दुग्गी ऑफ़ ऑल ट्रेड्स

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नमस्ते! 🙂 अक्सर किसी क्षेत्र में सफल या अच्छी जगह पहुंचे लोगो को किस्मत को कोसते, कहते देखता हूँ कि हम यहाँ तो सफल हैं पर इस चक्कर में जिस दूसरे क्षेत्र में भी रूचि थी उसमे कुछ न कर पाने या कम कर पाने का मलाल है। मतलब आपको विराट कोहली भी बनना है और सुनीता विलियम्स भी? या मोहम्मद अली तो बनेंगे ही पर साथ में नेताजी बोस वाला तमगा भी चाहिए? एक जगह समय दिया, मेहनत की तो फल भी उसी में मिलना चाहिए न? आपका ऐसा बोलना इन क्षेत्रों में कर्म की तपस्या से सफल हुए, अपना पूरा जीवन एक दिशा में लगा चुके लोगो का अपमान है। अंधो में काणा राजा होना और वाकई में विलक्षण प्रतिभा होना दो अलग बातें है। जैसे संभव है आप अपने परिवार और दोस्तों के बीच सबसे अच्छी स्केचिंग करते हों पर असल दुनिया में जिन्हे पेशेवर कहा जाता है वो लोग वर्षो-दशकों तक दिन पर दिन, तिल-तिल संघर्ष कर अपना हुनर निखारते हैं, तो अपने गाहे-बगाहे के काम पर ज़बरदस्ती की आहें न भरें।

अब या तो आप अरबों में एक हों और जन्मजात एक से अधिक क्षेत्रों में ख्याति पाने लायक हों (ज़्यादा खुश न हों अरबों में एक लिखा है…. चले गुलाबी मोर बनने :p) या आपने वाकई अपने मुख्य क्षेत्र के साथ-साथ अन्य क्षेत्रो में कई वर्षों या दशकों तक काम किया हो तब सोचा जा सकता है। उदाहरण के लिए किसी रचनाकार का यह कहना कि भगवान् ने इतना दिमाग दिया है, मैं चाहता तो ये आई.टी., कोडिंग फलाना क्या मुश्किल था मेरे लिए? क्या भैया? किसी की स्किल, कला, प्रतिभा का सम्मान करना इतना मुश्किल भी नहीं है! भाग्य, परिस्थिति और रूचि के चक्कर से अगर वह आपकी तरह किसी कलात्मक क्षेत्र में होता तो आपका डीम्ड पापा/मम्मी होता। आपके क्लोज सर्किल में लोगो ने तारीफ कर दी तो आप तो दिल पर ही ले बैठे। यह वेरीफाई ज़रूर करें कि आप मास्टर ऑफ़ ऑल ट्रेड्स हैं की जगह दुग्गी ऑफ़ ऑल ट्रेड्स तो नहीं हैं? ऐसा करने से आप खुद को कमाल आर. खान या वो एक्टर-डायरेक्टर-सिंगर-वाइब्रेटर बाबा जैसो की राह पर चलने से रोक सकते हैं।

इस स्थिति में एक अपवाद है अगर कोई अन्य विधा, स्किल आपके क्षेत्र से जुडी हो तो समय के साथ आप उसमे अच्छे हो सकते हैं। जैसे एक लेखक के लिए समीक्षक होना, किसी खेल के पूर्व खिलाडी के लिए उस खेल का कोच या रेफरी बन जाना थोड़ा आसान होता है। हालांकि, इस बदलाव के भी अच्छे होने की गारंटी नहीं है। जीवन में आपने जो राह चुनी है, जो निर्णय लिए हैं, उनकी अच्छी-बुरी बातें स्वीकार करें। साथ ही अपने चुनाव, निर्णय के सही होने पर जैसे कूद कर पूरा श्रेय आप लेते हैं उसी तरह गलत होने पर वैसे ही कूद कर नहीं आ सकते कोई बात नहीं पर, ज़िम्मेदारी लेने से न बचें। परिवार या अन्य किसी व्यक्ति, बात पर दोष डालना उचित नहीं क्योकि आप कोई 7 साल के बच्चे नहीं हैं!

– मोहित शर्मा ज़हन

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Dushman (Anti-Body) Short film – Original Sequence, Behind the Scenes…etc

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कल पुणे के थीएट्रिकस ग्रुप द्वारा एलियन हैंड सिंड्रोम नामक मानसिक विकार (जिसमे व्यक्ति का एक हाथ कभी-कभी उसके नियंत्रण से बाहर होकर अपनी मर्ज़ी से हिलने-डुलने लगता है, चीज़ें पकड़ने लगता है और कुछ मामलों में लोगो पर या स्वयं पीड़ित पर हमला करता है) पर मेरी लिखी कहानी-स्क्रिप्ट पर ‘दुश्मन (एंटी-बॉडी)’ नामक शॉर्ट फिल्म बनायीं।

Dushman (Vimeo)

Youtube Link 1

Youtube Link 2

जिसके लिए मुझे अबतक अच्छी प्रतिक्रियाएं ज़्यादा मिली हैं। टीम ने उम्मीद से अच्छा काम किया है। वैसे फिल्म को मैंने एक लड़की किरदार के हिसाब से लिखा था पर कास्टिंग में समस्या होने की वजह से स्क्रिप्ट बदलनी पड़ी और तुफ़ैल ने मुख्य भूमिका निभाई। इस फिल्म को फाइनैंस मैंने किया था और फिल्म बनते समय कुछ दृश्य कम बजट की वजह से हटाने पड़े। पुणे से इतनी दूर सिर्फ इंटरनेट के माध्यम से कोलैबोरेशन करने की वजह से कुछ बातें खासकर मेडिकल, साइंटिफिक कोण फिल्म में मंद पड़ गए या हो नहीं पाये। ओवरआल जितना अच्छा किया जा सकता था उतना हो नहीं पाया, जिसकी ज़िम्मेदारी मैं लेता हूँ। शायद इसलिए कि इस जटिल आईडिया को कार्यान्वित करने में कई बातों का ध्यान रखते हुए बहुत सावधानी बरतनी थी। वैसे ऐसा मेरे साथ पहले कई बार हुआ है पर तब सोचा गया आईडिया और फाइनल रिजल्ट में अंतर कम या काम चलाऊ होता था। चलिए इस बहाने कई बातें सीखी इस दौरान। सबसे बड़ी बात यह की अगर आप कहीं मौजूद नहीं हो सकते तो जटिल कहानियां, सीन को इस तरह प्रेषित करें कि वह आसान लगे करने वालो को, किरदार कर रहे लोग कनेक्ट करें। साथ ही किसी भी माध्यम के कलाकारों चाहे वो चित्रकार हो, ग्राफ़िक डिज़ाइनर हो, अभिनेता हो या और कोई रचनाकार हो…माध्यम में उनके सकारात्मक पहलुओं और कमियों के हिसाब से आईडिया या कहानी की नींव रखनी चाहिए। इसे मेरी सफाई मत समझिए बस कभी आगे भूल जाऊं इसलिए सबकी मदद के लिए, एक रिफरेन्स की तरह, सबसे शेयर करना चाहता था। यहाँ जो सोचा था इस फिल्म को बनाने से पहले उसके मुख्य अंश लिख रहा हूँ।

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1. Story Plot

सोनल को ग्रेजुएशन के बाद नौकरी मिलती है और वह उत्साह के साथ कंपनी ज्वाइन करती है। अपनी मिलनसार, jolly-chirpy नेचर की वजह से वह सबसे घुल – मिल जाती है। कुछ महीनो बाद एक एक्सीडेंट (सीढ़ियों से गिरकर / रोड एक्सीडेंट) में उसके सर पर चोट लगती है जिसके बाद से उसके अंदर धीरे-धीरे “Alien Hand Syndrome” के लक्षण दिखने लगते है। शुरू में पब्लिक प्लेसेस पर राइट हैंड में झटके से लगना, लोगो के सर या कमर पर हलके से मारना फिर स्थिति बिगड़ना – एक हाथ द्वारा उल्टा-सीधा मेकअप कर देना, स्ट्रीट मार्किट में कोई चीज़ उठा लेना जो उसे नहीं चाहिए: दुकानदार के पूछने पर मना करना पर उस चीज़ को ना छोड़ना फिर दुकानदार से लड़ाई / बहस, colleague-boss को पीटना और फिर बिना उसकी बात सुने पागल, चुड़ैल आदि संज्ञा देकर उसे नौकरी से निकाला जाना  etc . इस सब के दौरान उसकी दोस्त तान्या हमेशा उसके साथ रहती है।

नौकरी जाने के साथ-साथ इस डिसऑर्डर की वजह से उसका ब्रेकअप भी हो जाता है। परेशान होकर उसे अपना राइट हैंड काटने के अलावा कोई चारा नहीं दिखता, वो अपना हाथ काट लेती है, उसकी लाइफ दोबारा सामान्य हो जाती है। पर थोड़े दिन बाद एक रात वो साँस रुक जाने से जागती है और देखती है की उसके लेफ्ट हैंड ने उसका गला पकड़ रखा है।

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2. एलियन हैंड सिंड्रोम (मेकअप सीन)

सोनल को ऑफिस लौटने की जल्दी थी। आखिर नयी जॉब में कुछ दिनों बाद ही लंबी छुट्टी लेना कहाँ जमता है। वजह चाहे जायज़ भी हो पर अंजान शहर में खुद को साबित करने की राह शुरू करते ही स्पीडब्रेकर आत्मविश्वास डिगा देता है। अब एक्सीडेंट के बाद से सर में होने वाला दर्द काफी कम हो गया था। उसने बॉस और साथियों को बता दिया था कि वह आज से ऑफिस आएगी। अकेले रहने का यह फायदा भी था कि सोनल की एक हॉबी मेकअप तसल्ली से होता है। मस्कारा, नेल आर्ट, फाउंडेशन, हेयर स्ट्रीक सब में मास्टरी, खुद पर इतने प्रयोग जो किये थे बचपन से अबतक। नहीं तो कसबे के छोटे घर में कभी मम्मी झाँक के देख रही हैं, कभी पापा फाइल उठाने या जूते का रैक झाड़ने आ गए, एक कमांडो की तरह लाइट मेकअप करना पड़ता था।

अचानक सोनल को दाएं हाथ में एक झटका लगा। शायद नस फड़की होगी सोच कर सोनल वापस अपनी हॉबी में तल्लीन हो गयी। तभी उसका उसकी मर्ज़ी के बिना हाथ मस्कारा उठाकर उसकी आँखों के चारो तरफ गोले बनाने लगा। सोनल की डर से घिग्घी बन्ध गयी।

“ये हो क्या रहा है? कहीं मुझमे कोई भूत-चुड़ैल तो नहीं आ गया? नहीं….नहीं मुझे ऑफिस जाना है। शायद नींद में हूँ!”

सोनल ने मस्कारा के निशान साफ़ करने के लिए हाथ बढ़ाया तो दांया हाथ ड्रेसिंग टेबल पर पड़े मेकअप के सामान पर झपट पड़ा और दहाड़ें मारती सोनल पर अलग-अलग आकृतियां बनाने लगा। कुछ देर बाद जब वह हाथ रुका और सोनल के आया तब तक सोनल थक कर निढाल हो चुकी थी। सर में फिर से दर्द शुरू हो गया था, शीशे के सामने मेकअप से वीभत्स हुआ चेहरा देख वह बेहोश होकर सीधे शीशे पर गिरी। जब होश आया तो सोनल ने खुद को संभाल कर ऑफिस फ़ोन किया कि वह आज नहीं आ सकती।

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3. Basic Scene/Sequence Break 

सीन 1 (short scene)

सोनल (फ़ोन पर) – “डैड! मुझे नौकरी मिल गयी। अपने बैच में सबसे पहले। आप चिंता मत करो मेरे साथ यहाँ तानिया है।”

सीन 2 (short scene)

सोनल अपने ऑफिस में बॉस और कलीग्स से formally मिलती हुयी।

सीन 3 (split)

सोनल सीढ़ियों से गिरती है या उसकी स्कूटी का एक्सीडेंट होता है (अगर ज़्यादा रिस्क है तो symbolic दिखा दें।) उसके सिर में चोट लगती है। Head Injury क़े लिये bandage दिखायें। तानिया एक कमरे में उसके पास बैठी है।

तानिया – “सब ठीक हो जायेगा सोनल, तू बहुत स्ट्रांग है।”

सीन 4 (split)

*) – इसके बाद सोनल रिकवर करती है पर वह धीरे-धीरे एलियन हैंड सिंड्रोम के लक्षण दिखाने लगी।

i) – Doing makeup and one of her hands making bizarre figures on her face from maskara, powder etc.

अपने बिगड़े हुए चेहरे के साथ सोनल रोते हुए ऑफिस फोन कर रही है – “आज मैं ऑफिस नहीं आ पाऊँगी।”

ii) – . Alien Hand grabbing articles from street market and surprised vendor.

वेंडर – “मैडम पर्स चाहिए तो बोलो, ऐसे हैंडल टूट जाएगा।”

सोनल – “नहीं!!! मुझे यह पर्स नहीं चाहिए। (बड़ी मुश्किल से सोनल पर्स नीचे रखती है)

सोनल अब एक बेल्ट खींचने लगती है।

वेंडर – “मैडम या तो तुम पागल है या चोर, जो भी हो यहाँ से निकलो नहीं तो constable को बुलाऊंगा।”

सोनल – “मै चोर नहीं हूँ…कितने की है ये बेल्ट, कितने का पर्स है, ला दे। पागल नहीं हूँ!”

सीन 5

 Sonal beating a colleague and when her boss interferes she beats him, Embarrassed Sonal is fired from her job. (People calling her crazy not believing her rare disorder)

Colleague 1 (साहिल) – “सोनल तुम्हे सर ने clients की जो लिस्ट दी थी वो मुझे चाहिए।”

सोनल उसके बाल पकड़ कर पीटने लगती है।

साहिल – “अरे…..क्या मज़ाक है यह? छोडो मुझे। “

Colleague 2 (Rahul) – “सोनल छोडो साहिल को, ये तुम्हारा college नहीं है। “

बॉस आता है।

बॉस – “सोनल क्या हुआ? साहिल ने कुछ किया क्या तुम्हारे साथ? डरो मत मुझे बताओ!”

सोनल – “यह मैं नहीं… सर सॉरी but मैं तो… “

सोनल का हाथ साहिल को छोड़ कर उसके boss को मारने लगता है।

साहिल – “पागल… पागल है यह लड़की।”

बॉस – “सोनल अभी के अभी यहाँ से निकलो। तुमने जितने दिन का काम किया है उतने पैसे तुम्हारे अकाउंट में आ जाएंगे। यू आर फायर्ड!”

सीन 6 (Short)

Her Boyfriend breaking up with her (on phone only)

सीन 7

 आख़िरकार परेशान होकर उसने अपना हाथ काट दिया।

(Dark Circles under her eyes, वो अपने हाथ को पकड़ कर उसे डाँट रही है उसपर चिल्ला रही है। जवाब में उसका हाथ उसे मार रहा है, बाल खींच रहा है। परेशान होकर वह अपना हाथ काट लेती है। हाथ काटने के बाद उसे पकड़ कर सोनल चिल्लाती है – “अब मार मुझे, मार। अपनी मर्ज़ी से हिल। ” (पीछे चीखती हुयी तानिया – “यह क्या कर दिया सोनल!”

सीन 8

 (After few weeks) लाइफ फिर से नार्मल हुयी।

सोनल (तानिया से) – हाँ, डिसेबल्ड quota में एक गवर्नमेंट बैंक में क्लर्क कि जॉब है। फैमिली की बहुत expectations है, ऐसे सब ख़त्म नहीं हो सकता। मैं कल ऑफिस ज्वाइन करुँगी।

तानिया – “You are a fighter, इतना सब होने के बाद भी तुमने हिम्मत नहीं हारी। I am proud of you!”

सीन 9

 फिर उस रात वो उठती है और देखती है उसके दूसरे हाथ ने उसका गला पकड़ रखा है।

The End!

मोहित शर्मा ज़हन
 
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लेखकों के लिए कुछ सुझाव

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हर लेखक (या कवि) अपनी शैली और पसंद के अनुसार कुछ रचना-पद्धतियों (genres) में अच्छा होता है और कुछ में उसका हाथ तंग रह जाता है। यह कहना ज़्यादा ठीक होगा कि कुछ विधाओं में लेखक अधिक प्रयास नहीं करता। समय के साथ यह उसकी शैली का एक हिस्सा बन जाता है। अक्सर किसी अनछुई विधा को कोई लेखक पकड़ता भी है तो उसमे अनिश्चितता और असंतोष के भाव आ जाते है। सबसे बड़ा कारण लेखक ने इतने समय में स्वयं के लिए जो मापदंड बनाए होते हैं, उनपर इस नयी विधा की लेखनी खरी नहीं बैठती। ऐसा होने पर लेखक रही उम्मीद भी छोड़ कर वापस अपनी परचित विधाओं की तरफ वापस मुद जाता है। अपने अनुभव की बात करूँ तो मुझे हास्य, हॉरर, ट्रेजेडी, इतिहास, ड्रामा, सामाजिक संदेश जैसे विषयों पर लिखना अधिक सहज लगता है, जबकि रोमांटिक या साइंस फिक्शन जैसी थीम पर मैंने काफी कम लेखन किया है। नयी श्रेणियों में पैर ज़माने का प्रयास कर रहे लेखकों और कवियों के लिए कुछ सुझाव हैं।

*) – अपनी वर्तमान लेखन क्षमता, शैली और उसकी उसकी लोकप्रियता की तुलना नयी विधा में अपने लेखन से मत कीजिये। ऐसा करके आप नयी रचना-पद्धति में अपने विकास को शुरुआती चरण में रोक देते हैं। खुद को गलती करने दें और नए काम पर थोड़ी नर्मी बरतें। याद रखें बाकी लेखन शैलियों को विकसित करने में आपको कितना समय लगा था तो किसी अंजान शैली को अपना बनाने में थोड़ा समय तो लगेगा ही।

*) – शुरुआत में आसानी के लिए किसी परचित थीम के बाहुल्य के साथ अंजान थीम मिलाकर कुछ लिखें। इस से जिस थीम में महारत हासिल करने की आप इच्छा रखते हैं उसमे अलग-अलग, सही-गलत समीकरण पता चलेंगे। थोड़े अभ्यास के बाद परिचित थीम का सहारा भी ख़त्म किया जा सकता है।

*) – आदत अनुसार कहानी, लेख या कविता का अंत करने के बजाए उस थीम में वर्णन पर ध्यान दें। चाहे एक छोर से दूसरा छोर ना मिले या कोई अधूरी-दिशाहीन रचना बने फिर भी जारी रहें। इस अभ्यास से लेखन में अपरिचित घटक धीरे-धीरे लेखक के दायरे में आने लगते हैं।

*) – यह पहचाने की आपकी कहानी/रचना इनसाइड-आउट है या आउटसाइड-इन। इनसाइड-आउट यानी अंदर से बाहर जाती हुयी, मज़बूत किरदारों और उनकी आदतों, हरकतों के चारो तरफ बुनी रचना। आउटसाइड-इन मतलब दमदार आईडिया, कथा के अंदर उसके अनुसार रखे गए किरदार। वैसे हर कहानी एक हाइब्रिड होती है इन दोनों का पर कहानी में कौन सा तत्व ज़्यादा है यह जानकार आप नए क्षेत्र में अपनी लेखनी सुधार सकते हैं।

– मोहित शर्मा ज़हन

Read चनात्मक प्रयोगों से डरना क्यों?

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रचनात्मक प्रयोगों से डरना क्यों?

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एक कलाकार अपने जीवन में कई चरणों से गुज़रता है। कभी वह अपने काम से पूरी तरह संतुष्ट रहता है तो कभी कई महीने या कुछ साल तक वो खुद पर शक-सवाल करता है कि क्या वह वाकई में कलाकार है या बस खानापूर्ति की बात है। इस संघर्ष में गिरते-पड़ते उसकी कला को पसंद करने वालो की संख्या बढ़ती चली जाती है। अब यह कला लेखन, कैमरा, चित्रांकन, शिल्प आदि कुछ भी हो सकती है। अपनी कला को खंगालते, उसमे सम्भावनाएं तलाशते ये कलाकार अपनी कुछ शैलियाँ गढ़ते है। धीरे-धीरे इन शैलियों की आदत इनके प्रशंषको को पड़ जाती है। कलाकार की हर शैली प्रशंषको को अच्छी लगती है। अब अगर कोई नया व्यक्ति जो कलाकार से अंजान है, वह उसके काम का अवलोकन करता है तो वह उन रचनाओं, कलाकृतियों को पुराने प्रशंषको की तुलना में कम आंकता है। बल्कि उसकी निष्पक्ष नज़र को उन कामों में कुछ ऐसी कमियां दिख जाती है जो आम प्रशंषक नहीं देख पाते।

इन शैलियों की आदत सिर्फ प्रशंषको को ही नहीं बल्कि खुद कलाकार को भी हो जाती है। इस कारण यह ज़रूरी है कि एक समय बाद अपनी विकसित शैलियों से संतुष्ट होकर कलाकार को प्रयोग बंद नहीं करने चाहिए। हाँ, जिन बातों में वह मज़बूत है अधिक समय लगाए पर अन्य शैलियों, प्रयोगों में कुछ समय ज़रूर दे। साथ ही हर रचना के बाद खुद से पूछे कि इस रचना को अगर कोई पुराना प्रशंषक देखे और कोई आपकी कला से अनभिज्ञ, निष्पक्ष व्यक्ति देखे तो दोनों के आंकलन, जांच और रेटिंग में अधिक अंतर तो नहीं होगा? ऐसा करने से आपकी कुछ रचनाओं औेर बातों में पुराने प्रशंषको को दिक्कत होगी पर दीर्घकालिक परिणामों और ज़्यादा से ज़्यादा लोगो तक अपनी रचनात्मकता, संदेश पहुँचाने के लिए ऐसा करना आवश्यक है।

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“Bade ho jao!”- Writer Mohit Sharma Trendster

“बड़े हो जाओ!” – मोहित शर्मा (ज़हन)

अपनी बच्ची को सनस्क्रीन लोशन लगा कर और उसके हाथ पांव ढक कर भी उसे संतुष्टि नहीं मिली। कहीं कुछ कमी थी…अरे हाँ! हैट तो भूल ही गया। अभी बीमार पड़ जाती बेचारी…गर्दन काली हो जाती सो अलग। उस आदमी को भरी धूप, गलन-कोहरे वाली कड़ी सर्दी या बरसात में भीगना कैसा होता है अच्छी तरह से पता था। ऐसा नहीं था कि वो किसी गरीब या अभागे परिवार में जन्मा था। पर अपने दोस्तों, खेल या कॉमिक्स के चक्कर में वो ऐसे मौसमो में बाहर निकल आता जिनमें वो किसी और बात पर बाहर निकलने की सोचता भी नहीं। ये उसका पागलपन ही था कि जब समाचारपत्र उसके शहर में माइनस डिग्री सेल्सियस पर जमे, कई दशको के न्यूनतम तापमान पर हेडलाइन्स छाप रहे थे, तब बुक स्टाल पर उन्हें अनदेखा करते हुए वह ठिठुरता हुआ उन अखबारों के बीच दबी कॉमिक्स छांट रहा था। या जो भूले बिसरे ही अपनी कॉपी-किताबों पर मुश्किल से कवर चढ़ाता था, वह कुछ ख़ास कॉमिक्स पर ऐसी सावधानी से कवर चढ़ाता था कि दूर से ऐसा लगे की शहर का कोई नामी कलाकार नक्काशी कर रहा हो। या वो जिसे स्कूल में कॉमिक्स का तस्कर, माफिया तक कहा जाता हो। जाने कितने किस्से थे उसके जूनून के, जो औरों को बाहर से देखने पर पागलपन लगता था। “बच्चो वाली चीज़ छोडो, बड़े हो जाओ!” यह वाक्य उसने 11 साल की उम्र में पहली बार सुना। उसने तब खुद को तसल्ली दी की अभी तो वो बच्चा ही है। फिर उसे यह बात अलग-अलग लोगो से सुनने और इसे नज़रअंदाज़ करने की आदत हो गयी।

समय के साथ जीवन और उसकी प्राथमिकताएं बदली। यकायक व्यवहारिक, वास्तविक दुनिया ने चित्रकथा की स्वप्निल दुनिया को ऐसा धोबी पाट दिया कि कभी जो घर का सबसे ख़ास कोना था वह सबसे उपेक्षित बन गया। उसकी शादी हुयी! पत्नी द्वारा उस कोने की बात करने पर वह कोई ना कोई बहाना बनाकर टाल देता, जैसे वो अबतक अपने घरवालों को टालता आया था। जिसपर अब भी वह ख़ुशी से “बड़े हो जाओ” का ताना सुन लेता था। उसके दिमाग का एक बड़ा हिस्सा व्यवहारिक होकर स्वयं उसे बड़े हो जाने को कह रहा था। जबकि कहीं उसके मन का एक छोटा सा हिस्सा अक्सर नींद से पहले, सपनो में या यूँ ही बचपन, किशोरावस्था में उसके संघर्ष, जूनून की कोई स्मृति ले आता।  वो मन जिसे उसने वर्षो तक इस भुलावे में रखा था कि यही सब कुछ है बाकी दुनिया बाद में। अब मन का छोटा ही सही पर वह हिस्सा ऐसे कैसे हार मान लेता।

फिर उसके घर एक नन्ही परी, उसकी लड़की का आगमन हुआ। जिसने बिना शर्त पूरे मन (उस छोटे हिस्से को भी) हाईजैक कर लिया। आखिरकार, उसने अपनी हज़ारों कॉमिक्स निकाली। हर कवर को देख कर उसकी कहानी, वर्ष, रचनाकारों के साथ-साथ उस प्रति को पाने का संघर्ष उसके मन में ताज़ा हो गया। जैसे एक बार कमेंटरी में मोहम्मद अज़हरुद्दीन को डिहाइड्रेशन होने की बात बताये जाने पर उसने ही अपने मित्रों को इस बात का मतलब समझाया था…. क्योंकि एक बार डॉक्टर ने यह उसे तब बताया था जब उसके घरवाले उसे कमज़ोरी, चक्कर आने पर पड़ोस में ले गए थे। उसे चक्कर जून की गर्मी में बाहर किस वजह से रहने से आये होंगे यह बताने की ज़रुरत नहीं। 2 किशोर उसके घर आये जिन्हे उसने अपनी कॉमिक्स के गट्ठर सौंपे। बड़े जोश में उसने अपने किस्से, बातें सुनाने शुरू किये पर उनसे बात करने के थोड़ी ही देर में उसे अंदाज़ा हो गया कि समय कितना बदल गया है और दोनों पार्टीज एक दूसरे की बातों से जुड़ नहीं पा रहें है। अंततः उन किशोरों ने विदा ली और दरवाज़े पर उन्हें छोड़ते हुए, मन का वह छोटा हिस्सा जो अबतक रूठा बैठा था, दबी सी आवाज़ में बोला “ख़्याल रखना इनका।”

 कुछ महीनों बाद दिनचर्या बदली, काम और ज़िम्मेदारियाँ बढ़ीं। एक दिन पत्नी ने टोका – “इतने चुप-चुप क्यों रहते हों? क्या सोचते रहते हो? इंसान हो मशीन मत बनो! क्या हमेशा से ही ऐसे थे?”

अच्छा लगा कि फॉर ए चेंज`व्यवहारिक, वास्तविक दुनिया वाले दिमाग को खरी-खोटी सुनने को मिली। पर फ़िर से जीवन की किसी उधेड़बुन को सोचते हुए उसने कहा – ” …बड़ा हो गया हूँ! यही तो सब चाहते थे।” 🙂 
समाप्त!

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 Notes: काल्पनिक कहानी, यहाँ बाकी दुनिया को बेकार नहीं कह रहा, बस एक दुनिया छूट जाने का दर्द लिख रहा हूँ जो अक्सर देखता हूँ मित्रों में। Artworks by Mr. Saket Kumar (Ghulam-e-Hind Teaser)

Bageshwari Magazine (Sep-Oct 2015)

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Read my latest Laghukathayen (short stories) in Bageshwari Magazine (September – October 2015 Issue). Published by Yoguru Technologies.

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