राष्ट्र-रक्षक (कहानी)

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उफनते समुद्र से फामित देश के राष्ट्रपति और उनके परिवार को नौका में बचा कर लाते लाओस कोस्ट गार्ड (तटरक्षक) प्रमुख को उनकी टीम के सदस्य घृणा भाव से देख रहे थे। अब तक जिस व्यक्ति को उन्होंने अपना आदर्श माना, आज उसपर से उनका भरोसा उठ गया था। कुछ देर पहले प्रमुख को 2 आपातकाल संदेश आए थे और सीमित साधनों के साथ वो सिर्फ एक जगह जा सकते थे। अचानक ख़राब हुए मौसम में एक संदेश राष्ट्रपति की नाव से था और दूसरा विपरीत दिशा में डूब रहे एक छोटे जहाज़ से जिसमे लगभग 150 लोग थे। टीम राष्ट्रपति और उनके परिवार को तट पर पहुंचा कर उस जहाज़ की दिशा में गए और 120 में से 72 लोगो को बचा पाये। 48 लोगो की जान चली गयी पर सबको पता था कि तटरक्षक प्रमुख पर राष्ट्रपति की तरफ से इनामो की बौछार होने वाली है। सब कुछ निपटाने के बाद कोस्ट गार्ड प्रमुख ने अपना पक्ष बताने के लिए टीम मीटिंग रखी।

“मैं यहाँ सबकी आँखों में पढ़ सकता हूँ कि आप लोग मुझसे नाराज़ हैं। सबको लगता है की राष्ट्रपति की जान बचाने का फैसला मैंने पैसे, प्रोमोशन के लालच में लिया और 5 लोगो को बचाने में 48 लोगो की जान गंवा दी। फामित देश में नाम का लोकतंत्र हैं और राजनैतिक उथल-पुथल मची रहती है। राष्ट्रपति के कारण इतने समय बाद कुछ समय से देश में स्थिरता आई है। अगर ये मर जाते तो गृहयुद्ध निश्चित था, जिसमे हज़ारों-लाखों लोग मरते। गृहयुद्ध की स्थिति ना भी होती तो सिर्फ नए सिरे से चुनाव होने पर पहले ही मंदी के दबाव में झुके देश पर अरबों डॉलर का बोझ पड़ता। जिसका असर पूरे फामित के लाखो-करोडो लोगो के जीवन पर पड़ता और उनमे किस्मत के मारे हज़ारों लोग भुखमरी, आत्महत्या, बेरोज़गारी में मारे जाते। किसी ट्रैन ट्रैक पर अगर कोई जीवित व्यक्ति हो तो क्या ट्रैन का ड्राइवर उसकी जान बचाने के लिए ट्रैन पटरी से उतारने का जोखिम लेगा? मुझे उन लोगो की मौत का बहुत दुख है और शायद आज के बाद मुझे कभी चैन की नींद ना आये पर उस समय मैं 2 में से एक ही राह चुन सकता था।”

समाप्त!

– मोहित शर्मा ज़हन

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