बाज़ीगरनी (लघुकथा) – लेखक मोहित शर्मा ट्रेंडस्टर

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अक्सर सही होकर भी बहस में हार जाना दीपा की आदत तो नहीं थी, पर उसका बोलने का ढंग, शारीरिक भाषा ऐसी डरी-दबी-कुचली सी थी कि सही होकर भी उसपर ही दोष आ जाता था। जब वह गलत होती तब तो बिना लड़े ही हथियार डाल देती। आज उसकी एफ.डी. तुड़वा कर शेयर में पैसा लगाने जा रहे पति से हो रही उसकी बहस में उसके पास दमदार तर्क थे।

“आप…आपने पहले ही कितना पैसा गंवाया है शेयर्स में! ये एफ.डी. इमरजेंसी के लिए रख लेते हैं ना? वो…आप दोबारा जोड़ कर लगा लेना पैसे शेयर में।”

“अरे चुप! पति एकसाथ तरक्की चाह रहा है और तू वही चिंदी चोरी जोड़ने में लगी रहियों। तेरी वजह से मेरी अक्ल पर भी पत्थर पड़ जाते हैं!”

“मेरी वजह से? मैंने…क्या किया? मैंने कुछ नहीं किया!”

…और इस तरह दीपा ने एक बार फिर से जीत के मुंह से हार छीन ली। अपनी आदत उसे पता थी और इस बार उसे हार नहीं माननी थी।

कुछ देर बाद पति पैसे लेकर बाहर निकला तो 2 नकाबपोश बाइक सवार उसका झोला झपट के चले गए। पति ओवरलोडेड इंजन की तरह आवाज़ निकालता थाने गया और वो 2 बाइक सवार दीपा को झोला पकड़ा कर चले गए। दीपा ने अपने भाई को सारी बात बताई और भाई ने अपने दोस्त भेज कर दीपा को हार कर भी जीतने वाली बाज़ीगर बनवाई।

समाप्त!

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