3 Laghu kathayen – मोहित शर्मा (ज़हन) ‪#‎mohitness‬

*) – सच्चाई की सज़ा (कहानी)

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खोजी पत्रकार जैकी डेरून और उनके सहयोगी रॉजर वॉटसन के अथक प्रयासों के बाद उन्हें पिछड़े एशियाई एवम अफ़्रीकी देशो में संसाधनो के लालच में विकसित देशो और प्रभावी बहुराष्ट्रीय सरकारी-निजी संस्थाओं द्वारा बड़े स्तर पर किये गए अपराधो, नरसंहारों के पुख्ता सबूत और रिकॉर्डिंग्स मिले थे। उनके इस अभियान के कारण उनके पीछे कुछ गुप्त संस्थाओं के जासूस और हत्यारे लग गए थे। चूहे-बिल्ली के इस खेल में कुछ हफ्तों से जैकी और रॉजर किसी तरह अपनी जान बचा रहे थे, आखिरकार वह दोनों ऑस्ट्रेलिया के पास एक मानवरहित द्वीप पर फँस गये।
रॉजर – “हमारे पास अब आधा घंटा भी नहीं है, किसी भी पल कोई युद्धपोत या विमान हमारे परखच्चे उड़ा देगा। क्या हमने इस दिन के लिए की थी इतने वर्षो मेहनत?”
जैकी – “इतना भी नकारात्मक मत सोचो, रॉजर। मैंने अपने कुछ जर्नलिस्ट दोस्तों को कई दस्तावेज़, तस्वीरें और सबूत मेल कर दी है। आज यहाँ आने से पहले मैंने दुनियाभर की दर्जनो वेबसाइट्स पर अपने डाक्यूमेंट्स अपलोड भी कर दिए है।”
4-5 मिनट्स बाद कोई युद्धपोत या लड़ाकू विमान नहीं बल्कि कुछ मोटरबोट्स में सोइयों कमांडोज़ आये।
जैकी (एक ख़ुफ़िया जासूस के पास आने पर) – “कोई फायदा नहीं हमने अपने कंप्यूटरस और गैजेट्स जला दिए है।”
जासूस – “दिमाग के पक्के हो पर तकनीक में कच्चे हो! अब टेक्नोलॉजी इतनी विकसित है कि केवल सिग्नल्स के बल पर हमने दुनियाभर में बैठे तुम्हारे 11 पत्रकार मित्र जिनको तुमने मेल्स भेजे को “प्राकृतिक मौत” मार दिया, लगभग वो सभी 150 वेबसाइट्स बंद करवाई या वो वेबपेजेस डिलीट किये जहाँ तुमने कुछ भी अपलोड किया था, वह भी सिर्फ 5 घंटो के अंदर।
रॉजर – “जब सब कुछ ख़त्म कर दिया, तो हमे ज़िंदा पकड़ने का क्या मतलब?”
मतलब बंदी रॉजर और जैकी को अगले दिन प्रेस कांफ्रेंस में पता चला।
“लक्ज़मबर्ग निवासी पत्रकार जैकी डेरून और उनके सहयोगी रॉजर वॉटसन को ऑस्ट्रेलिया में आदिवासी इलाके क़ि महिलाओं के यौन उत्पीड़न का दोषी पाया गया है। इस खुलासे के बाद दुनियाभर से 7 अन्य महिलाओं ने इन दोनों पर यौन हिंसा के आरोप लगाएं है।”
प्रेस कांफ्रेंस पूरी होने से पहले ही दोनों के विरुद्ध आक्रोशित भीड़ के नारे लगने लगे। कुछ-एक प्रदर्शनकारी तो पुलिस बैरियर तोड़ कर उन्हें पीटने लगे। दुनियाभर से उन्हें मृत्युदंड देने की मांग उठने लगी। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि किस तरह बड़ी संस्थाएं, सरकारें अपने खिलाफ उठी आवाज़ों का इतनी क्रूरता से दमन करती है। उन्हें इस स्कैंडल में इसलिए डाला गया ताकि बाद में कभी अगर उनके नाम से कोई बचा हुआ दस्तावेज़, बात आदि कुछ उभरे तो लोगो में उनकी अपराधिक छवि के पूर्वाग्रह का फायदा उठाते हुए उन बचे-खुचे सबूतों को आसानी से नष्ट किया जा सके। अपना बाकी जीवन जैकी और रॉजर ने अमरीका की एक गुप्त जेल में अमानवीय यातनाएं सहते हुए काटा।
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*) – पुलिस बनाम जनता (लघुकथा)

एक समाचार वार्ता, खबर विश्लेषण प्रोग्राम में विचारकों, समाज सेवको, विशेषज्ञों, जनता और न्यूज़ एंकर ने वहाँ उपस्थित पुलिस अधीक्षक पर सवालो, कटाक्ष और पुलिस की आलोचना करती हुयी बातों की वर्षा कर दी। अपनी सफाई देने के लिए या योजनाएं-उपलब्धियां बताने के लिए वो जैसे ही होते तभी कहीं से तीखे शब्दों के तेज़ बाण वार्ता का रुख अपनी ओर कर लेते। कुछ ही देर में अधीक्षक महोदय अपनी लाचारी से खीज गये, और जवाब देने की आतुरता खोकर सबकी बातें सुनने लगे। अलग लोगो कि बातें अलग पर उन्होंने एक ट्रेंड गौर किया सबकी बातों मे जो मुख्यतः ये थी –
“इस लचर व्यवस्था पर क्या कहना चाहेंगे आप?”, “इस मेट्रो शहर में हर रोज़ होते अपराधो पर है कोई जवाब आपके पास?”, “कैसी बेदम और भ्रष्ट है यह पुलिस?”
अंततः उन्हें कार्यक्रम के अंत से ज़रा पहले औपचारिकता के लिए अपनी सफाई देने के लिए कहा गया तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ कि कोई वाकई में उनकी बात सुनने में इच्छुक है। अब तक वो अपनी रिपोर्ट्स के अंक-निष्कर्ष, भावी योजनाओ का सारांश आदि भूल चुके थे। इसलिए उन्होंने अपनी सफाई कम शब्दों में दी।
पुलिस अधीक्षक – “टैक्स-बिजली-अनाज चोरी से लेकर खून खराबे, दंगो तक खुद जनता को सारे कलयुगी काम करने है और पुलिस उन्हें सतयुग से उतरी चाहिए! पुलिसवाले अमावस की रात स्पेसशिप से उतरे एलियंस नहीं होते, इसी समाज से निकले लोग होते है….जैसी जनता – वैसी पुलिस….सिंपल!…बल्कि इस पैमाने के आधार पर तो जैसी जनता है उस हिसाब से यहाँ पुलिस काफी बेहतर है।”
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*) – झेल ले बिटिया…फिर तो राज करेगी
हर संयुक्त परिवार में सूरज बड़जात्या की “हम साथ साथ है” जैसी फिल्मो की तरह सतयुग सा माहौल होता है, यह भ्रम था कीर्ति और उसके परिवार को जो कीर्ति की शादी होते ही टूट गया। ससुराल में 5 भाइयों में कीर्ति तीसरे नंबर के भाई विनोद कि वधु बनी। कीर्ति अपनी ससुराल में खुश नहीं थी, जैसे सपने देखे थे वैसा कुछ नहीं था। वैसे एक प्यार करने वाला पति, चुपचाप बैठे ससुर जी और जेठ-देवर थे पर समस्या सासू माँ से थी। जो कीर्ति और उसकी 2 जेठानियों के लिए एक सास कम हिटलर ज़्यादा थी। बुज़ुर्ग होते हुए भी किसी बिगड़ैल किशोर सा अहंकार, बहुओं पर तरह-तरह की पाबंदियां, काम सही होने पर भी ताने और गलती होने पर तो बहुओं से ऐसा बर्ताव होता था जैसे उनकी वजह से दुनिया में प्रलय आ गयी। अब कीर्ति को पछतावा हो रहा था कि काश उसने शादी से पहले जेठानियों से किसी तरह बात कर ली होती। शादी के तुरंत बाद जब कीर्ति ने अपनी व्यथा अपने मायके में सुनाई तो माँ-बाप ने दिलासा देते हुए समझाया कि 4-5 साल सहन कर लो उसके बाद सास वैसे ही उम्रदराज़ होकर या तो अक्षम सी हो जायेंगी या परलोक सिधार जायेंगी। फिर तू अपने घर में राज करना।
22 वर्ष बाद सभी भाइयों की शादी हो चुकी है, सबके स्कूल-कॉलिज में पढ़ रहे बड़े बच्चे है। सास की दिनचर्या पहले की तरह सीमा पर तैनात एक सैनिक की तरह है, उनका स्वास्थ्य स्थिर है। कीर्ति के ससुर जी और माता-पिता स्वयं परलोक जा चुके है। कीर्ति के बड़े जेठ-जेठानी कुछ महीनो पहले लम्बी बीमारियों के बाद छोटे अंतराल में नहीं रहे। अब वह अपनी दूसरी जेठानी की तेरहवी में रिश्तेदारो और पंडितों को संभाल रही है, पीछे से सासू माँ का कोसना, टोकना, धक्का देना अनवरत जारी है।
दूर के कुछ रिश्तेदार आपस में बात कर रहे है।
“सेठ जी का पोता (सबसे बड़े लड़के का बेटा) जल्दी नौकरी पर लग गया, अपनी दीपाली के लिए अच्छा रहेगा।”
“पर सुना है सेठानी जी कुछ सनकी है। चौबीसो घंटे बहुओं के पीछे पड़ी रहती है। “
“जल्दी देख लो बाउजी, कहीं लड़का हाथ से निकल ना जाये।… अब मुश्किल से दो-चार बरस का जीवन है इनका, फिर आराम से रहेगी दीपाली।”
उनकी बात सुन रही, पास खड़ी कीर्ति ठहाके मारकर ज़मीन पर लोट गयी।
“….सदमा लगा है बेचारी को, जेठानी-देवरानी नहीं थी ये दोनों तो सहेलियों जैसी थी सच्ची….बहुत बुरा हुआ।”
समाप्त!
– मोहित शर्मा (ज़हन) ‪#‎mohitness‬ ‪#‎mohit_trendster‬ ‪#‎freelance_talents‬
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